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Tuesday, June 2, 2020

सरसों के फूल



नया वर्ष ! आज सफाई करते समय उसे वर्षों पुरानी एक डायरी मिली, जब वह कालेज के अंतिम वर्ष में थी.  उसके पहले पन्ने पर लिखा है, आज प्रथम जनवरी है. कल रात्रि टीवी पर नए वर्ष के विशेष कार्यक्रम देखे सो वर्ष के प्रथम दिन ही देर से उठी. आज भी तो ऐसा ही हुआ. उस समय भी उसे लगा था कि एक ही दिन में पिछला वर्ष पुराना कैसा हो गया. वही आकाश, वही धरती बस मानव का बनाया हुआ सन ही तो बदला है. एक वर्ष गुजरता है तो उनकी उम्र का एक वर्ष और बढ़ गया, नहीं घट गया..., फिर भी नया साल मुबारक हो !  एक पुस्तक में एक पंक्ति पढ़ी थी उसने उस दिन, जैसे या जो कुछ आप करते हैं, वही आप हैं, पढ़कर चौंक गयी थी एकबारगी, पर बाद में लगा ठीक ही तो है किसी के मन में क्या है यह उसके कर्मों से ही तो जाहिर होता है. यदि मन में आदर्श भरे हों पर आचरण उनके अनुकूल न हो तो, आज भी वाचा, मनसा, कर्मणा एक होने की बात वह कहती है. जितना -जितना भाव, विचार तथा कर्मों में एकता होती जाएगी जीवन से दुःख विदा होते जायेंगे. 

दो जनवरी को मंझले भाई का जन्मदिन होता है, उस समय फूफाजी भी जीवित थे, दोनों के लिए अपने-अपने घरों में गाजर का हलवा बना करता था. आज भी यह प्रथा कायम है, सभी भाई-बहनों के जन्मदिन पर माँ एक विशेष व्यंजन अवश्य बनाती थीं. उन दिनों पिताजी उन्हें रविवार को गांव-खेत में घुमाने ले जाया करते थे. सर्दियों की उतरती हुई धूप में खेतों की पगडंडियों पर चलते हुए वे सब बेवजह ही ख़ुशी से भरे रहते थे. इतवार की फिल्म भी सब साथ बैठकर देखते थे, उस दिन सिकन्दर देखी थी, पृथ्वीराज कपूर सिकन्दर बने थे और सोहराब मोदी पोरस, दोनों बड़े कलाकार ! उन दिनों रेडियों पर कवि सम्मेलन आया करते थे, शिव कुमार की एक कविता की कुछ पंक्तियां भी उसने लिखी हैं - 

हवा बंधी पर नए बन्धन  में गुजर गयी पगडंडी से 
पीले-पीले चेहरे वाले हिला किये सरसों के फूल 
शायद किसी किशोरी की वेणी आमन्त्रित इन्हें करे 
देर रात तक जगते रहते यह छलिये सरसों के फूल
मौसम के अपशब्द सहे अपमान सहा हँसते-हँसते
खेतों के सुकरात बने खूब जिए सरसों के फूल !

दस दिन बाद कालेज खुलना था, गयी भी, किन्तु हाकी मैच जीतने की ख़ुशी में बन्द था. कम्पनी बाग़ के रास्ते से बेरी बाग चली गयी. कम्पनी बाग़ बिल्कुल वैसा ही लगा जैसा उस समय से दस वर्ष पहले था, उसके बचपन की कितनी ही संध्याएं वहाँ गुजरी हैं. वहां एक छोटी लड़की से भेंट हुई, कितनी प्यारी और समझदार ! उस नन्ही बच्ची में सौंदर्य की सराहना करने की शक्ति है, हवा में भागते हवा से खेलते बोली, हम कबूतरों की तरह उड़ रहे हैं. वह नदी को सराह सकती थी, उसने ठंडी हवा और उसकी मित्रता को  एक वाक्य कहा - तुम अच्छी लगती हो ! आज भी याद  करे तो उस सुबह के दृश्य उसकी आँखोँ  के सामने आ जाते हैं. अगले पन्ने पर भी किसी कविता की चार पंक्तियाँ लिखी हैं -

आँखें पगडंडी पर रख दीं दिया रख दिया देहरी पर 
तुमने मेरे इंतजार में लट में क्यों उलझाई रात 
पलकें हैं बोझिल-बोझिल और चेहरे पर सिंदूर लगा 
सुबह पूछती है सूरज से बोलो कहाँ बितायी रात !

Thursday, March 28, 2019

ओस की बूँदें



तीन दिनों का अन्तराल ! डायरी लेखन की कला अब जैसे छूटती जा रही है. रात्रि के पौने नौ बजे हैं. जून बंगलूरु हवाई अड्डे से नन्हे के घर जा रहे हैं. पांच-छह दिन बाद आयेंगे. उसे इस समय का उपयोग अपनी साधना में करना होगा. सुबह कितने सुंदर वचन सुने थे, जिनकी सुगंध से मन का कण-कण अभी तक भीगा हुआ है पर क्या कहा था, कुछ भी याद नहीं है. कल से साथ-साथ नोट कर लेना उचित होगा, पर शब्दों का उद्देश्य तो पूर्ण हो ही गया. गुरूजी कहते हैं जो शब्द मौन में ले जाते हैं, वे ही सार्थक हैं. शाम को एक पुरानी परिचिता का फोन आया, दोपहर को भी एक सखी का फोन आया था, कल से इन दोनों को व्हाट्सएप ग्रुप में शामिल कर लेगी. दोपहर वाली सखी नन्हे की तारीफ कर रही थी. उसने इन्हें न केवल अपने घर आने का निमन्त्रण दिया, बल्कि कहा, नाश्ता भी यहीं करें और यहीं से उनकी बिटिया कालेज जाये. उसका कालेज यहाँ से निकट है. वह नन्हे के बचपन की बातें भी बता रही थी, उसका पुत्र और नन्हा साथ ही बड़े हुए हैं. कल ही एक अन्य पुरानी सखी ने फेसबुक पर वर्षों पहले की एक समूह तस्वीर पोस्ट की, उसमें की एक महिला ने कल से ही योग कक्षा में आना आरंभ किया है. वक्त कैसे बिछुड़े हुओं को बार-बार मिलाता है. आज दोपहर मृणाल ज्योति गयी थी. नेट पर दिव्यांगों के लिए सरकार की तरफ से चलाई जाने वाली योजनाओं के बार में पढ़ा. उसे उनके लिए एच आर पालिसी बनाने के लिए कुछ सुझाव देने को कहा गया है. नन्हे और सोनू से बात की, सोनू ड्राफ्ट बनाकर कल तक भेजेगी.  

परमात्मा स्वयं की उपस्थिति जताता है. वह अनंत ज्ञान का सागर है. वही आत्मा रूप से इस देह में व अनंत देहों में विद्यमान है. इस सृष्टि का चक्र कितनी कुशलता से चला रहा है. वास्तव में प्रकृति में सारी क्रियाएं हो रही हैं. यह हाथ कलम के माध्यम से लिख रहा है, चेतन इसका साक्षी मात्र है. बुद्धि में चिन्तन चलता है, मन में भाव उठते हैं, इन्हें भी कोई देखता है. रात्रि के नौ बजने को हैं, जून अपने गन्तव्य पर पहुँच गये हैं. सुबह नन्हे के आसन करते हुए फोटो उन्होंने भेजे, अच्छा लगा. मौसम आज काफी गर्म है. तापमान चौंतीस डिग्री है. दीदी घर आ गयी हैं, और छोटी बहन अपने घर. मंझला भाई अपनी नई पोस्टिंग पर चला गया है. जीवन अपनी गति से आगे बढ़ता ही रहता है.

आज सुबह सवा चार बजे नींद खुली. सुबह होने के बाद भी वातावरण में उमस थी, हवा बंद थी, हरी घास पर नंगे पैर चलने से गर्मी का असर कुछ कम हुआ. प्राणायाम करने बैठी तो एक सखी का फोन आया. उसकी तबियत कल रात से ही खराब है, पतिदेव टूर पर हैं. बुखार, पेट दर्द और सिर दर्द भी. नहाकर हार्लिक्स पीया, फिर सात बजे से कुछ पहले ही उसके घर गयी फिर अस्पताल. नौ बजे घर लौटी, उसके लिए नाश्ता बनाकर आई. उसकी बिटिया को दोपहर के भोजन के लिए निमन्त्रण देकर. उसे चिल्ड्रेन मीट के लिए डांस प्रेक्टिस में भी जाना है. सबसे बड़ा बल है आत्मा का बल और वह जन्मता है श्रद्धा और प्रेम से. स्वयं तथा परम के प्रति आस्था से. किताब जो लाइब्रेरी से लायी थी काश्मीर पर, काफी रोचक है, कुछ देर बाद पढ़ेगी.

शाम के पांच बजे हैं. बाहर धूप है, शायद शाम तक बदली छा जाये. जून मदुराई से वापस बंगलूरू पहुँच गये हैं. आज वे उनका नया घर विला देखने जाने वाले हैं. परमात्मा ने उन्हें कितना कुछ दिया है. इस सुंदर सृष्टि में मानव जन्म दिया, सद्गुरू का सान्निध्य दिया. यह सृष्टि कितनी रहस्यपूर्ण है. यहाँ वे कुछ भी तो नहीं जानते. गुरूजी के सुंदर वचन सुने. कितना अद्भुत ज्ञान उन्होंने सरल शब्दों में दे दिया. आज की सुबह सुंदर थी. हरी घास पर ओस की बूंदे थीं, उन पर टहलना व ज्ञान के मोतियों को भीतर समेटना एक साथ हो रहा था. दोपहर को नैनी बगीचे से ढेर सारी सब्जियां लेकर आई. पड़ोसी के यहाँ भिजवाई, पर उनके यहाँ भी इतनी ही सब्जी हो रही है. इसी बहाने उससे बात हो गयी. कल क्लब की प्रेसिडेंट से ‘योग दिवस’ पर ‘आर्ट ऑफ़ लिविंग’ का ‘बेसिक कोर्स’ कराने के सिलसिले में बात की. अब वह सखी स्वस्थ है पर उसकी बिटिया के हाथ में चोट लग गयी है, एक्सरे कराया है, परसों रिपोर्ट मिलेगी. मिलने गयी तो उसने औरा देखना सिखाया और एक ध्यान के बारे में बताया जिसमें सभी चक्रों पर विभिन्न रंगों का ध्यान करना होता है.

Wednesday, March 8, 2017

चने की दाल की कढ़ी


याद आता है बहुत दिन पहले ओशो को सुना था जिसकी तीसरी आँख खुलने वाली होती है उसे पहले एक आंख स्वप्न में या ध्यान में दिखाई देती है, उस दिन स्वप्न में गुरूजी ने जो उसे इतनी बड़ी सी आँख दिखाई थी वह संभवतः इसी की पूर्व सूचना थी जो दो-तीन दिन बाद उसने अनुभव किया, अपने भीतर का आकाश और चाँद-तारे..उनके भीतर कितने रहस्य भरे पड़े हैं. उस दिन की वर्षा जिसमें मन तो भीग गया पर तन सूखा ही रहा ! आज एकादशी है, उसका अंतर इतना हलका महसूस कर रहा है जैसे अभी हवा में उड़ जायेगा. कल शाम को टहलते समय भी भारहीनता का अनुभव हो रहा था. आज भी मौसम सुहावना है. वर्षा अभी थमी है. दीदी आज यात्रा पर निकल रही हैं उनसे बात हुई, छोटी बहन व मंझली भाभी से बात की. उस दिन की कविता शायद शायद कुछ ही समझ सकें, जिसका अनुभव न किया हो उसे समझना मुश्किल तो है ही. परमात्मा की अमृत वर्षा बरस ही रही है, जब शिष्य तैयार होता है तो गुरू अपने-आप प्रकट हो जाता है. यह बात बिलकुल सच्ची है, वह इसकी गवाही दे सकती है. कल की पुरानी कहानी में बात ‘धन’ तक आ पहुंची है, अब भरपूर धन है उसके पास, परमात्मा ने हर तरह से उसे मालामाल कर दिया है, वह बरस ही रहा है अनवरत...

आज सुबह ध्यान में बैठी तो चालीस मिनट में ही उठ जाना पड़ा. देह में भारीपन लग रहा था, शरीर को स्वस्थ रखने में ही कितनी ऊर्जा चली जाती है उनकी. कल शाम वह स्कूल गयी थी, एक बच्चे के पैर पर काफी फुंसियों के निशान थे, गर्मी के कारण कमरे में गंध भी थी. पंखा शायद नहीं था या था ध्यान नहीं दिया, पर चल नहीं रहा था. निर्धनता का अभिशाप सबसे बुरा है, लेकिन जहाँ तक अभी शिक्षा नहीं पहुँची, सडकें नहीं पहुँचीं, बिजली नहीं पहुँची, वहाँ अमीरी कैसे पहुंच सकती है. कल ब्लॉगर रश्मिप्रभा जी ने कहा कि एक दिन के लिए शासनडोर की बागडोर आपके हाथ में आ जाये तो आप क्या करेंगे. करने को कितना कुछ है, यहाँ  कभी कुछ पूर्ण होता ही नहीं. जून आज पिताजी की आँखें दिखाने तिनसुकिया जायेंगे.

आज आखिर वह चने की दाल की कढ़ी बना रही है जिसकी रेसिपी अख़बार में पढ़कर पिताजी ने कई बार बताई है. आज भी मौसम अच्छा है. सुबह वर्षा के कारण वे टहलने नहीं जा सके, शाम को जायेंगे. उसका ध्यान आजकल गहरा नहीं हो पा रहा है, वैसे तो मन हर पल ही ध्यानस्थ रहता है, सब कुछ स्वप्न जो लगता है, न जाने कब जीवन की शाम आ जाये और यह स्वप्न टूट जाये, इससे पूर्व ही असंग हो जाना बेहतर है. अनंत काल उनके पीछे है और अनंत काल उनके आगे है, अनंत को पाना हो तो इस वर्तमान के नन्हे से पल में जागना होगा जिसके एक क्षण पूर्व भी अनंत है और एक क्षण बाद भी अनंत है, तो वहाँ भी वही हुआ. आज सुबह एक पंक्ति मन को छू गयी थी, ‘घर खो गया है’
आज शरणार्थी दिवस भी है इसी पर कुछ लिखेगी. एक और वाक्य मन में गूँजा कि ‘जो उन्हें मिला ही हुआ है, उसे वे न देखने का नाटक करते हैं और बाहर भी उसी को खोजते हैं, जो छूट ही जाने वाला है उसे पकड़ने का निरर्थक प्रयास करते हैं’. मानव की पीड़ा का यही कारण है, सार को असार में खोजते हैं, असार में कुछ असार भी नहीं तो सार कैसे मिलेगा. जो अभी बीज है उसमें फूल खोजते हैं, पहले उसे बोना होगा धरा में, शीत, ताप सहना होगा.


Monday, May 23, 2016

द सीक्रेट - रोंडा बर्न की किताब

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मई का महीना आरम्भ हुए दो हफ्ते होने को हैं. आज पहली बार डायरी खोली है. कितना कुछ हुआ, हो रहा है और होने वाला है, भीतर भी और बाहर भी ! परहेज न करने के कारण सर्दी-जुकाम हो गया. सेहत बनाने के चक्कर में एक बार पुनः सेहत का बिगाड़ कर लिया. दो बार मृणाल ज्योति जाना हुआ, उनकी समस्याओं से रूबरू हुई. उन्हें आर्थिक संकट से जूझना पड़ रहा है, उनका सेंटर जहाँ पर है वह स्थान बहुत नीची जगह पर है. मैदान बनवाने के लिए अथवा निर्माण कार्य करने से पहले जमीन को मिट्टी से भरवाना पड़ता है, जिसमें बहुत खर्च आता है. उनके पास बच्चों को लाने व छोड़ने के लिए एक वैन है जो पुरानी हो गयी है और उसके रख-रखाव पर काफी खर्चा आ रहा है, कोई बाऊँड्री वाल नहीं है, जिसे बनवाने के लिए फंड चाहिए. बूंद –बूंद से सागर बनता है, अगर वह क्लब में सहायता के लिए अपील करे तो कुछ लोग मदद करने के लिए आगे आ सकते हैं.

संतजन कहते हैं सभी मंजिल पर पहुंच सकें, इसलिए देह रूपी वाहन मिला है, जीवन की लालसा उन्हें इस वाहन में बैठे रहने पर विवश करती है. क्योंकि वे मंजिल तक पहुंच नहीं पाते, मृत्यु से भय लगता है. जिसे मंजिल का पता चल गया वह मृत्यु से नहीं डरता, असली जीवन इस ज्ञान के बाद ही शुरू होता है ! भय मुक्त मन ही अस्तित्त्व के प्रति प्रेम से भर जाता है और ऐसा मन ही परमात्मा के प्रति समर्पित हो सकता है ! लेकिन मानव इस सत्य से अनभिज्ञ रहता है और सारा जीवन गुजार देता है ! मृत्यु उसे डराती है और वह अपना मानसिक संतुलन खो बैठता है. अविद्या, अशिक्षा व अज्ञान सबसे बड़े रोग हैं, स्कूली व कालेज की शिक्षा नहीं बल्कि जीवन की शिक्षा ! जो सद्गुरु देते हैं, लेकिन वे सद्गुरु के द्वार तक ही नहीं पहुंच पाते. गुरु परमशान्ति का द्वार है लेकिन उस शांति का अनुभव बिरले ही कर पाते हैं.

पिछले हफ्ते सास-ससुर यहाँ आये तब उन्हें माँ की बीमारी के बारे में ठीक से पता चला. वृद्धावस्था की कारण वह भूलने की बीमारी से ग्रसित हो गयी हैं. उन्हें दिन का, समय का, महीने का कोई बोध नहीं रह गया है. जब से यहाँ आई थीं, शारीरिक रूप से वह स्वस्थ हो रही हैं पर मानसिक रूप से अस्वस्थ ही हैं, वृद्धावस्था अपने आप में एक रोग है. वह स्वयं भी तो उसी की ओर कदम बढ़ा रही है, आँखों की शक्ति घट रही है, मन सदा विचारों से भरा रहता है. पिछले कई दिनों से कुछ नया लिखा भी नहीं. जून बाहर गये हैं, अभी तीन दिन और हैं उन्हें लौटने में, समय की कमी नहीं है. कल लाइब्रेरी से दो किताबें लायी. पहली The Secret  दूसरी पुस्तक बराक ओबामा पर है. इस बार कई अच्छी पुस्तकें आई हैं. 

एक दिन और बीत गया, माँ की बीमारी घटती नजर नहीं आती. सम्भवतः उन्हें मतिभ्रम हो गया है. हर बात में शिकायत करना स्वभाव बन गया है, सहन शक्ति बिलकुल खत्म हो गयी है. पिताजी कितने उपाय करके उन्हें समझाते हैं पर कोई असर होता नजर नहीं आता. इस समय रात के साढ़े नौ बजे हैं. परसों दोपहर जून आ रहे हैं, सबके लिए कुछ न कुछ ला रहे हैं.

Tuesday, September 29, 2015

दीपों का उत्सव


कल दीपावली है, उन्होंने रात को दीवाली भोज का आयोजन करने का निश्चय किया है. छह-सात परिवारों को बुलाया है. आज छोटी दीवाली है, दोपहर को गुलाबजामुन बनाने का विचार है, कुछ देर के लिए क्लब भी जायेंगे. कल सुबह बच्चों को मिठाई बांटने तथा योग की कक्षा लेने भी जाना है, सो कल का दिन व्यस्तता में बीतने वाला है. आज जून को लंच पर घर आने में एक घंटे की देर हो गयी है, फोन भी नहीं किया, उसके शरीर पर भूख के लक्षण अथवा तो कहें समय पर भोजन न  मिलने के लक्षण दिखाई दे रहे हैं. कल शाम को कई रिश्तेदारों से फोन पर बात हुई, त्योहार पर भीतर से जुड़ने की स्वाभाविक इच्छा जगती है. उत्सव मानव के जीवन में सरसता तो लाते ही हैं, उन्हें जोड़ते भी हैं. अभी-अभी उसने जून को फोन किया तो उन्होंने काट दिया, शायद किसी मीटिंग में हैं, और अब फोन आया, दस मिनट में आ रहे हैं.
खो जाता है छोटा मन
उत्सव घटता है
दुखों से मुक्ति का मिलता है प्रसाद
उजाले की प्रसाद युक्त आभा भर जाती है भीतर
कृतज्ञता और आनंद के मध्य में है वह
एक सौभाग्य है जिसका मिलना..
अंधकार में छिपे ढके
कुछ रह जाते हैं विहीन उससे
वंचित जीवन की एक बड़ी उपलब्धि से
खो देते हैं इस सुंदर संपदा को...   

दीपों का यह उत्सव अंतर्मुख होने के लिए है, पूरे वर्ष का लेखा-जोखा करने के लिए है. पाप और पुण्य की बैलेंस शीट बनाने के लिए है. पुण्य होने से जमा होता है और पाप से उधार होता है. क्रोध आदि पाप बाँधते हैं और प्रेम पुण्यशाली है. उन्हें देखना है कि किस तरह यह बैलेंस शीट ठीक रहे, नुकसान न हो, मुनाफा बढ़े. उनसे किसी को दुःख न हो, यदि हो भी गया तो तुरंत प्रतिक्रमण कर लें. यह जगत प्रतिध्वनित करने वाला कुआं है, उनके कर्मों के अनुसार ही उन्हें फल मिलते हैं. दीवाली पर वे यह तय करें कि सुख की दुकान खोलनी है. उनके जीवन में जो भी कोई आये उसे उनसे केवल सुख ही मिले..उनके जीवन का पूर्ण लाभ इस जगत को मिल सके, वे स्वयं को पूर्ण अभिव्यक्त कर सकें तभी उनका इस जगत में आना सार्थक होगा. उनका वास्तविक कर्त्तव्य क्या है ? धर्म क्या है ? यह गुरू ही बताते हैं. टीवी पर मुरारी बापू कह रहे हैं कि मानव जीवन पाकर भी जो भीतर की मुस्कान को जाग्रत नहीं कर सका वह पूर्ण जीया ही नहीं और वह धर्म भी धर्म नहीं जो सहज मुक्त रूप से हँसना नहीं सिखा देता.

पिछले हफ्ते मंगल को वे गोहाटी गये, माँ-पापा वापस चले गये हैं. उस दिन के बाद आज सोमवार को डायरी खोली है. इस समय सिर में हल्का दर्द है, सम्भवतः अपच के कारण. किसी ने ठीक ही कहा है, पहला सुख नीरोगी काया, उधर ससुराल में माँ को भी सिर में थोड़ी सी चोट लग गयी है वह गिर गयी थीं जब शाम को गली में टहलते समय भैंस ने उन्हें गिरा दिया. जीवन में सुख-दुःख एक क्रम से आते ही हैं. आज सुबह ध्यान करने बैठी तो कितने सारे विचार आ रहे थे, मन अपनी सत्ता बनाये रखना चाहता है. यात्रा के दौरान कई बार ऐसा लगा कि मन खाली हो गया है, कितनी शांति का अनुभव होता था तब, कल पिताजी से बात हुई, उनका जन्मदिन धूमधाम से मनाया गया. बड़ी बुआ व फुफेरी बहन का फोन नम्बर उन्होंने दिया, दोनों अस्वस्थ हैं, शाम को वह बात करेगी.

पुनः-पुनः वह असजग होती है और पुनः-पुनः सद्गुरु के वचन मन को नये विश्वास से भर देते हैं. वह फिर अज्ञात की ओर चल पड़ती है, वह परमशक्ति जो अपना अनुभव तो कराती है पर दिखाई नहीं देती. जगत दीखता है, मन दीखता है, विचार तथा भावनाएं दिखती हैं पर वे जहाँ से प्रकटे हैं वह स्रोत नहीं दीखता. ध्यान में वह उसी में स्थित होती है पर ध्यान भी तो ज्यादा गहरा नहीं हो पाता, यहाँ-वहाँ का कोई विचार आ ही जाता है. सद्गुरु से की गयी प्रार्थना ही मनोबल बढ़ाती है.  




Sunday, September 7, 2014

गुजरात का भूकंप


परसों सुबह छोटी बहन ने फोन पर खबर दी, बात करते वक्त वह सामान्य थी पर फोन रखते-रखते ही रुलाई फूट पड़ी. मन जानता था कि यह होने ही वाला है. गुजरात में आए भूचाल में लाखों प्रभावित हुए हैं, हजारों की मौत हो गयी. एक झटके में वे गहरी नींद में सो गये. जीवन कितना क्षण भंगुर है. इलाहबाद में महाकुम्भ में एक ओर लाखों स्नान कर रहे हैं, वहीं दूसरी ओर गुजरात के लोग दुःख और पीड़ा में डूबे हुए हैं. इन्सान प्रकृति के आगे कितना बेबस है.

कुछ देर पूर्व मंझली भाभी से बात की. आज वहाँ सभी फूल चुनने गये हैं. आज चौथा रस्म है, शनिवार को दसमी और छह को तेहरवीं. कल दिन भर जून बेहद उदास दिखे, उन्हें ऐसा देखकर उसने सामान्य रहने का प्रयास किया, पर सहज रूप से रहना अलग बात है कोशिश करना अलग. नन्हे का स्कूल आज बंद है, आज बसंत पंचमी है. सरस्वती पूजा का आयोजन जगह-जगह किया जा रहा है.

जीवन के सच बहुत कड़वे होते हैं, मानव आँखों पर रेशमी पर्दे डाले रहता है पर सच्चाई सारे पर्दे उठा सामने आ खड़ी होती है. मृत्यु भी एक ऐसी सच्चाई है. आज बापू की पुण्य तिथि भी है ‘शहीद दिवस’, सो आज मरण दिवस ही है. पर मृत्यु के बाद नया जन्म भी तो होता है. आत्मा को नव शिशु का कलेवर मिलता है एक बार फिर मृत्यु का ग्रास बनने के लिए. इसलिए ही संतों ने इस चक्र से मुक्ति को ही मानव का अंतिम लक्ष्य माना है. कितने जन्मों में कोई कितना कुछ पाए अथवा खोये, अंततः मृत्यु सब समेट लेगी. किन्तु इससे जीवन की महत्ता कम तो नहीं हो जाती. जीवन चाहे एक क्षण का हो या कुछ वर्षों का, अपने आप में एक उपहार है. जैसे और भौतिक वस्तुएं सदा साथ नहीं देतीं वैसे ही शरीर भी एक दिन नष्ट हो जायेगा. यही सनातन सत्य है. फूल खिलता है झरता है फिर खिलता है फिर झरता है, इससे फूल की महत्ता कम तो नहीं होती. जिसका जितना साथ मिला है उतना ही कृतज्ञ होते हुए उसे सम्मान देना चाहिए. गुजरात के उन हजारों लोगों को जो भूकम्प से आहत हुए हैं या मृत हो गये हैं, सच्ची श्रद्धांजलि वे सैनिक और समाज सेवी संस्थाओं के कार्यकर्ता दे रहे हैं जो दिन-रात वहाँ काम में जुटे हैं.


मन के आकाश पर काले घने बादल छा गये कहीं कोई रोशनी की लकीर नहीं, फिर एकाएक बादल छंटने लगे और नीला आकाश धूप की चमक लिए स्पष्ट हो उठा, यह आकाश जिस तरह है नहीं पर दीखता है, उसी तरह मन का यह भ्रम उहापोह है नहीं, दीखता है. सब कुछ स्वप्नवत है आज जागरण में फिर शरीर की अनित्यता और परमात्मा की नित्यता के बारे में सुना, वर्षों से सुनती आ रही है कि देह मरण धर्मी है. लगता था कि समझ भी लिया है पर ऊपर-ऊपर से समझना और उसे वास्तव में जानना, इन दोनों में काफी फर्क है. पता नहीं कहाँ से यह दुःख मन में आकर बैठ गया है जो माँ के इस तरह चले जाने से ही उत्पन्न हुआ है. पहले-पहल लगा था कि मन सम्भला रहेगा पर पिछले दिनों की तरह उनकी स्मृति के अलावा कोई और बात मन में नहीं टिकती. शायद उसे स्वयं को ज्यादा समय देना चाहिए, धीरे-धीरे सब स्वयं ही सामान्य हो जायेगा. जून भी आजकल बहुत चुप रहते हैं. कल जब वह आये और यह बताया कि वे नहीं जा रहे हैं तो उसे बहुत दुःख हुआ. उन दोनों में से एक को वहाँ पहुंचना है ऐसा निर्णय वे कर चुके थे क्यों कि नन्हे को ले जाना ठीक नहीं होगा. कल उसके स्कूल में कवि सम्मेलन प्रतियोगिता थी. उसका हाउस अंतिम स्थान पर रहा, उसने भाग लिया और आज working model competition में भी भाग ले रहा है. सुबह दो सखियों के फोन आये उनके साथ भी वही बात हुई. गुजरात में मृतकों की संख्या बढ़ती जा रही है. प्रकृति निर्मम है. 

Monday, September 1, 2014

रॉबिन कुक की किताब - टॉक्सिन


 नये वर्ष का दूसरा दिन, सारा दिन घर की सफाई में बीता. शाम को वे टहलने गये, जबकि जून को हल्का जुकाम है, दफ्तर में काम भी ज्यादा था, इसी हफ्ते उन्हें टूर पर भी जाना है. वे कल ही घर से वापस आये हैं, पर यह सुंदर ब्राउन डायरी उसे जून ने आज लाकर दी है. नन्हा पढ़ाई में व्यस्त है, बीच-बीच में पत्रिकाएँ पढ़ने लगता है. आज सुबह फोन से अन्य सभी से बात हुई. दीदी का फोन शायद कल आये. छोटी बहन बेहद उदास थी, उसे बेटियों की बहुत याद आ रही थी, जो उसकी फील्ड ड्यूटी के कारण पिछले कुछ दिनों से दादी के पास हैं. माँ, पिता और बच्चे तीनों अलग-अलग शहरों में रहने को विवश हैं, परिस्थितियाँ कुछ ऐसी हैं कि वे साथ नहीं रह सकते. माँ की तबियत फिर ज्यादा खराब हो गयी थी, वे दवा लेना बंद कर देती हैं फिर तकलीफ उठाती हैं. वृद्धावस्था इन्सान को लाचार बना देती है. पड़ोसिन को उसका लाया हल्के धानी रंग का चिकन का सूट पसंद आया, जो उसने मंगाया था. कल बंगाली सखी ने उनके दोपहर के खाने का और उड़िया सखी ने रात के खाने का इंतजाम किया था, थकान भी बहुत थी, सो अच्छा लगा. एक अन्य सखी से फोन पर बात हुई. इस बार उसने कुछ आध्यात्मिक पुस्तकें भी खरीदीं. एक पुस्तक ‘रेकी’ पर भी ली जो ट्रेन में ही पढ़ ली थी, प्रयोग में लाने हेतु कई बातें हैं, ध्यान की विधि भी है. परसों रात वे ट्रेन में थे जब पिछला साल गुजरा और नये वर्ष ने पदार्पण किया. पर इस बार कुछ विशेष नहीं लगा. अब पहले की तरह ख़ुशी के मौके तलाशने का मन नहीं होता, हर पल, हर दिन एक सा लगता है. यह रोजमर्रा की जिन्दगी, यह दिन-रात, महीने-वर्ष का बीतना तो चलता ही रहता है. असली चीज तो इसके पीछे है. परमेश्वर से उनका नाता.. जो सदा एक सा है !

‘मानव के पास विचार, भाव और विवेक का बल है लेकिन वह उसका उपयोग नहीं करता. अपने बाहरी  व्यक्तित्व को संवारने का यत्न तो करता है पर मानसिक, बौद्धिक व आत्म व्यक्तित्व को निखारने का प्रयास नहीं करता, सो आडम्बर और पाखंडपूर्ण जीवन जीता है’. उसे लगा, सचमुच भीतर से वे जितन सत्य के निकट होंगे, यथार्थ का सामना करेंगे, वास्तविकता को पहचानेंगे, उतना ही आंतरिक व्यक्तित्व व्यक्त होगा. अपने आदर्शों को मूर्त रूप देना होगा तथा उसे जीवन में उतारना होगा.

जनवरी की ठंड का अहसास आज पहली बार हुआ जब दोपहर होने से पहले हल्की बूंदाबांदी शुरू हो गयी पर बाद में धूप निकल आई. सुबह वे पांच बजे उठे, रोजमर्रा के कामों को करते-करते सुबह गुजरी. सफाई का कुछ काम भी जारी रहा, कुछ अब भी शेष है. दोपहर को साड़ी में पीको किया, फाल लगाई. इतवार को क्लब मीट में पहनने के लिए नई पोशाक तैयार है. कल शाम उद्घाटन था, वे नहीं गये, आज भी शायद ही जाएँ. शाम को ठंड में ठिठुरते हुए अलाव के पास लोगों की भीड़ देखने जाने का मन अब नहीं होता. आज सुबह बहन से बात हुई, वह दोनों बच्चों और सास के साथ हिमाचल आ गयी है. उन्होंने उससे कहा है उसकी छोटी बिटिया को वे अपने साथ रख सकते हैं जब तक उसकी सर्विस का अनुबंध काल खत्म नहीं होता, पर उसे नहीं लगता यह सम्भव होगा. वे तीनों बहुत निर्भर हैं एक-दूसरे पर सो अलग-अलग रहना उनके लिए सजा न बन जाये. नन्हा फिजिक्स के गृहकार्य में लगा हुआ है. इस यात्रा में उसने रॉबिन कुक की किताब toxin उपहार मिले पैसों से खरीदी. बनारस में काफी घूमा और पतंगें उडायीं. सास-ससुर का स्वास्थ्य भी ठीक ही लगा. अगले एकाध महीने में वे लोग नये मकान में चले जायेंगे, जीवन में परिवर्तन होगा जो अच्छा ही है. इस छोटी सी यात्रा ने उनके मनों में भी नया जोश व उत्साह भर दिया है. यहाँ तक की नैनी भी काम मन लगाकर कर रही है. आज सम्भवतः वे कुछ देर बगीचे में भी टहल सकें, यदि जून समय पर घर आ जाएँ. उन्हें कल अपग्रेडेशन का लेटर मिला है, इतवार को उन्हें दिल्ली जाना है.

सुबह उठे तो ठंड बहुत थी, फिर समाचारों में सुना, पूरे उत्तर भारत में शीत लहर का प्रकोप है. शिमला में हिमपात हुआ है. बहन का ख्याल हो आया, पर इस समय धूप निकल आयी है. पंछियों की आवाजें रह रहकर आ रही हैं जो धूप का स्वागत करती प्रतीत होती हैं. आज ‘जागरण’ में उच्च विचार सुने जो प्रेरणादायक होने के साथ-साथ दर्पण का कार्य भी कर रहे थे. उसे भी लगा, वे छद्मवेश बनाये रखते हैं. उनकी कथनी व करनी के बीच की खाई निरंतर गहरी होती जाती है. मानव होने के नाते उनके कुछ कर्तव्य हैं कुछ उत्तरदायित्व हैं जो वे सुविधा होने पर पूरा करते हैं, कभी असुविधा का बहाना बना टालते रहते हैं. इस समय उसके मन में कई विचार एक साथ आ रहे हैं सो गड्ड-मड्ड हो रहे हैं, सर्वप्रथम अपने स्वास्थ्य के प्रति जागरूक होते हुए उसे एक्सरसाइज कर लेनी चाहिए तब तक मन भी व्यवस्थित हो चुका होगा.   




Thursday, July 31, 2014

खिलौनों की दुनिया


She read -Even if you are on right track, you’ll get run over if you just sit there, by  Will Rogers
 So man has but to move, move forward, towards great heights, great ideas, towards God !
मानव का सतत प्रयास यही होता है कि वह उन्नति करे, आगे ही आगे बढ़े अनंत की ओर. उसका प्रस्थान उसी ऊँचाई की तलाश है जहाँ वह पहुंचना चाहता है. अपने आस-पास के समाज को यदि वह गहराई से देखे तो उन्नति के स्पष्ट चिह्न दिखाई पड़ते हैं, भौतिक उन्नति के साथ साथ एक और क्षेत्र भी है जहाँ मानव ने अपने कदम बढाये हैं आत्मिक उन्नति, जहाँ आगे बढने के लिए उसे ईश्वरीय प्रेरणा सहायक होती है. ईश्वर को मानव ने अपने ही आदर्शों का मूर्त रूप बनाकर स्थापित किया है ऐसा कहते हुए वह मानवीय चेतना को चरम स्थिति पर पहुंचा रही है. वह ऐसी स्थिति है जहाँ मानव और ईश्वर के बीच कोई भेद ही नहीं रहता, सो किसने किसको बनाया यह प्रश्न स्वयं ही बेमानी हो जाता है, कोई वहाँ पहुंच चुका है यह बात अन्यों को प्रेरणा देती है. जितने भी मानवीय मूल्य समाज में विद्यमान हैं सभी को कभी न कभी तो प्रथम बार व्यवहार में लाया गया होगा, वक्त की कसौटी पर खरे उतरते हुए वे आज उनके सम्मुख हैं, यदि वे उनका आदर करते हैं तो अपने लक्ष्य की ओर शीघ्र पहुंचेंगे अन्यथा न जाने कितने-कितने रूप उन्हें और मिलेंगे. पानी का स्वभाव है सदा ऊपर से नीचे की ओर बहना लेकिन मानवता का स्वभाव है सदा ऊपर की ओर बढना ! 

She is sitting in their bedroom on a bedside chair, weather is cool due to rain which has stopped now. There is a double bed, two steel almiras and one wooden inbuilt almira. Television is kept on one show case, this show case has many books also some toys and games. Nanha has decorated them, these days he plays only computer games but GIGOE and other planes etc are still dear to him. There is one dressing table also and one small table for keeping two telephones. Yesterday they talked to mother, she has recovered soon, looking fresh on phone. She is very happy for her. Life is precious and one should respect it, live it justly and should follow the laws of nature. She was describing their bedroom, colour on walls is light green and on roof is white, curtains are old but in good condition and match with the room. One small table and a stool  are also part of this room which is used by Nanha as dining table. When her  parents  came three years back, father suggested to write about the house, its dimensions its location and other things, then she could not appreciate him even she was angry with him for suggesting this to her ie a poetess but now she thinks he was right. In this way she will remember always her dear house.

मन की चादर मैली है लेकिन ईश्वर की कृपा से यह स्वच्छ भी हो सकती है, ईश्वर की कृपा पाने के लिए किन्तु मन को पवित्र करना होता है, तो तात्पर्य यह हुआ कि मन की चादर मैली ही न होने दो ! आज सुबह उसने जून को चिढ़ाया, पर इसी तरह वह छोटी-छोटी बातों पर झुंझलाना छोड़ेंगे. नन्हे ने कल रात गणित में मदद मांगी अच्छा लगा पर पहले जो सर में हल्का दर्द था पौन घंटा बैठने के बाद बढ़ गया, डिस्प्रीन लेकर ही सो पायी. कल माँ-पिता का पत्र भी आया, उनके घर से आने के बाद का पहला पत्र. आज सुबह पांच बजने से पूर्व ही उठ गयी थी, हवा ठंडी थी, नभ पर काले बादल अभी भी छाये हैं, कल उसने दुसरे सूट की कमीज भी सिली, थोड़ा सा हाथ का काम शेष है. अब बाबा जी टीवी पर आ गये हैं. कल उन्होंने कहा, ईश्वर दूर नहीं है, उसको खोजना भर है और वह इतना निकट है कि दिखाई नहीं देता.






Saturday, July 12, 2014

खीरे का रस


गीता का एक सुंदर श्लोक है, जिसका अर्थ है, वैश्वानर अग्नि के रूप में ईश्वर उनके द्वारा खाए अन्न को पचाने में मदद करता है. ईश्वर तो हर तरह से उनकी सहायता करता है. सोचने, समझने के लिए बुद्धिबल दिया है, आत्मोद्धार के लिए आत्मबल. कल दोपहर बाद से वे व्यस्त रहे एक मित्र परिवार के साथ, जो यहाँ से जा रहे हैं. आज शाम को भी उन्हें भोजन के लिए बुलाया है. जागरण में आज की बात उसे पसंद नहीं आई. भूत-प्रेत की बातें बताकर लोगों को अन्धविश्वासी बना रहे हैं ऐसा लगा, चमत्कार की बात ही करनी है तो इस सुंदर सृष्टि की रचना अपने आप में क्या कम चमत्कार है ? आज नैनी की जगह उसकी भांजी काम करने आई है, धीरे-धीरे काम करती है वह. नन्हे और जून के जाने के बाद उसने नाश्ता किया कुछ देर टीवी देखा. स्कूल की एक टीचर का फोन आया, एक छात्रा के पिता को संदेह है कि उसकी कापी ठीक से जांची नहीं गयी सो री-चेक करवानी होगी. स्कूल छोड़ने के बाद भी सभी खबरें मिलती रहती हैं, कल एक टीचर ने बताया कि एक फेल हो गये बच्चे के पिता ने भूख हड़ताल करने की धमकी दी है, यदि उसे पास न किया गया. पड़ोसिन के बगीचे में कैंडीटफ्ट के फूल हो रहे हैं, उनका सुंदर गुलदस्ता उसने बनाकर दिया. उनकी जीनिया की पौध में से आठ-दस पौधे पूसी नष्ट कर चुकी है. उसने नाराज होकर उसे कुछ भी नहीं दिया, सोचकर कि वह यहाँ से चली जाये पर वह पूरे श्रद्धा भाव से टिकी रही और आज उसे उस पर दया आ गयी. ऐसे ही ईश्वर उनकी लगन चाहता है.

“उठ जाग मुसाफिर भोर भयी, अब रैन कहाँ जो सोवत है”. अब उसके भी जागने का वक्त आ गया है. हर क्षण मन पर नजर रखकर अतीत या भावी का चिन्तन न कर वर्तमान को सही परिप्रेक्ष्य में देखकर इस जागृति का अनुभव किया जा सकता है. उसके बिना कोई आधार नहीं, बुद्धि भी हार जाती है एक सीमा तक तर्क करके. इस जग का नियंता जो भी है वही उनके मार्ग को प्रशस्त कर सकता है. मानव उसका ही प्रतिबिम्ब है, जब वे उसे प्रसन्न करेंगे तो स्वयं भी प्रसन्न हो जायेंगे. क्योंकि प्रतिबिम्ब में परिवर्तन करने के लिए वस्तु में ही परिवर्तन करना होगा. उसे प्रसन्न करने का उपाय अपने अंदर सद्गुणों को विकसित करना व उससे प्रेम करना है. सद्गुणों का तो वह भंडार है, मानव उसका चिन्तन करेंगे तो वे गुण भी उनके भीतर आ जायेंगे. इतनी सी बात उसकी समझ में नहीं आती थी जो आज सुनी. दीदी इतनी बार राम का जाप क्यों करती हैं व लिखती हैं, आज स्पष्ट हुआ है.

एक लम्बा अन्तराल ! पिछले दिनों कुछ नहीं लिख पायी, एक-दो बार पेन हाथ में लिया पर बात नहीं बनी. जून आज जल्दी आकर जल्दी चले गये थे, वह जरा सुस्ताने लेटी तो खुमारी छा गयी, नींद से जागकर कुछेक छोटे-मोटे काम किये कि नन्हा आ गया, फिर जून और शाम का सिलसिला शुरू हो गया. माँ-पिता, ननद-ननदोई जी और दो प्यारे बच्चे आये और चले भी गये. उनके घर जाने में भी मात्र एक महीना रह गया है. कल शाम वे पूर्व निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार एक मित्र के यहाँ गये, दिन भर धूप में फील्ड ड्यूटी करने के बाद जून के सिर में दर्द था, पर वे, “जो वादा किया है निभाना पड़ेगा”...में यकीन करते हैं. फिर वे जल्दी ही लौट आये. अगले हफ्ते उन्हें मुम्बई जाना है, off shore well के सिलसिले में. नन्हा आज छुट्टी के दिन भी स्कूल गया है, कुछ दिन बाद उसके स्कूल में science exhibition है. उसे याद आया दोनों घरों को पत्र भेजने हैं, और भेजने से पूर्व उन्हें लिखना पड़ता है. पिछले दो-एक दिन से food for health से पढकर चेहरे पर आलू व खीरे का रस लगा रही है. क्रीम बंद, देखें इस प्राकृतिक इलाज का क्या असर होता है. कल रात स्वप्न में देखा, स्कूल फिर से ज्वाइन कर लिया है, अर्थात वासना अभी तक मिटी नहीं, उस दिन एक परिचिता को कैसेट न देकर भी यह सिद्ध हो गया कि लोभ की जड़ें बड़ी गहरी हैं मन में, ईश्वर जो अपना आप बन कर बैठा है सब देखता है और मुस्काता है कि उसका नाम लेने वाले भी किस तरह सन्सार में फंसे हैं !










Monday, May 12, 2014

ग्रीक पौराणिक कथाएं


इन सर्दियों में आज पहली बार धूप में बैठकर लिख रही है, पंछियों के कलरव, गुलाब, गेंदे, गुलदाउदी के पौधों के मध्य. कभी ऐसा होता है कि चलते-चलते अचानक बैठकर सुस्ताने का मन हो, पीछे मुड़कर देखने का भी, कितना रस्ता तय कर आये, कितना अभी बाकी है. सो आज उसके साथ यही हो रहा है, पिछले दिनों थककर बैठने का सुस्ताने का वक्त ही नहीं था, हर वक्त कोई न कोई व्यस्तता लगी ही रही, अब लम्बे सफर पर जाने से पूर्व थोड़ा थम कर सोचने का वक्त मिला है. नन्हा स्कूल गया तो कुछ सुस्त लग रहा था, पर उसे लगता है, स्थान परिवर्तन का उसपर अच्छा असर होगा लौटकर आएगा तो उत्साह से परिपूर्ण होगा.

...पूसी लौट आई है, कहानियों में सुना था कि मीलों दूर जाकर भी पालतू पशु अपने घर लौट आते हैं, कल वह बगीचे पीछे वाले भाग में गयी, तो देखा लीची के पेड़ के नीचे वह बैठी थी, आश्चर्य और ख़ुशी से उसने जून और नन्हे को बताया, उसके पास जाते ही पैरों से लिपटने लगी, थोड़ी मोटी हो गयी है, जैसे कुनमुना कर कुछ कहने का प्रयत्न कर रही थी.

आज उसकी बंगाली सखी के विवाह की वर्षगाँठ है, आजकल वे लोग भारत से बहुत दूर हैं, किसी पश्चिमी देश में, लोग अपना घर-परिवार देश छोड़कर दूर निकल जाते हैं और नये-नये आयाम तलाश लेते हैं. आज भी वही कल का सा वक्त है, धूप है, पूसी है, हरी घास है, कितने अचरज की बात है चिड़ियाँ हर वक्त बोलती हैं, पर मानव अपने कान उनकी तरफ से बंद किये रहते हैं. परसों की पिकनिक पर वे देर से जाकर जल्दी आने की बात सोच रहे हैं. सभी से मेल-मुलाकात भी हो जाएगी और बुधवार को उनकी यात्रा के लिए एक छोटी सी रिहर्सल भी. नदी किनारे रेत पर बैठकर महल बनाना और स्वादिष्ट भोजन, पिकनिक का इस साल यही अर्थ होगा, पानी में पैर डालकर बैठना भीगना-भिगोना और दूर तक जंगल में घूमने जाना सम्भव नहीं होगा. उसने ऊपर देखा, चारों ओर की हरियाली को छोड़कर जाना, जिसके पीछे से आकाश की नीलिमा झांक रही है कितना मुश्किल है. आज सुबह बहुत दिनों बाद जागरण में ‘गोयनका जी’ को सुना, श्वास का आना-जाना देखते-देखते विकारों से मुक्ति की बात सिखा रहे थे. मनुष्य के पास सुधरने के के लिए हर वक्त गुंजाइश रहती है, हर कृत्य में सुधार किया जा सकता है.

आज उनके लॉन में एक नन्ही बच्ची की आवाजें भी हैं, नैनी की बेटी की बेटी की तुतलाहट भरी आवाज, पीढ़ी दर पीढ़ी इसी तरह परिवार बढ़ते हैं अपने विचार रीति-रिवाज, परंपरायें एक दूसरे को सौंपते हुए हर नई पीढ़ी उसमें कुछ और जोड़ती चली जाती है. उनके बाएं तरफ की पड़ोसिन ने कल भी ठीक इसी वक्त अपने ड्राइंग रूम की खिड़की खोली थी, उससे मिले भी कई दिन हो गये हैं. वह धूप में बैठी है, स्वेटर भी पहना है, पर धूप का अहसास नहीं हो रहा है, वहीं दूसरी ओर वह नन्ही बच्ची एक सूती फ्राक पहने छाया में दौड़ रही है. आजकल वह ग्रीक कथाओं की एक पुस्तक पढ़ रही है. ये कथाएं भी भारतीय पौराणिक कथाओं की तरह बहुत रोचक हैं, she finds herself near to Hestia, the Goddess of the earth and fire, she remains in back ground and is content in herself.






Tuesday, March 25, 2014

बुद्ध पूर्णिमा का अवकाश


तीन दिन बाद नन्हे को कविता पाठ प्रतियोगिता में भाग लेना है, अभी तक उसने याद नहीं की है, लेकिन वह जानती है आधे घंटे में ही याद कर लेगा, उसकी स्मरण शक्ति अच्छी है. उसका एक मित्र कविता पाठ की तैयारी में नूना से सहयोग लेने आया है, हिंदी जानने वाली महिला के रूप में उसका नाम थोड़ा बहुत लोग जानने लगे हैं. आज वह कम्प्यूटर से सीखी रेसिपी के अनुसार कढ़ी बनाएगी, उन्हें एक सीडी निशुल्क मिला है, ‘कम्प्यूटर एट होम’ जिसमें कई भारतीय व्यंजन है. कल से जून ने उसे कम्प्यूटर पर काम करना सिखाना शुरू किया है. आज दोपहर लंच पर एक मित्र परिवार आ रहा है, वे लोग ट्रेन से दोपहर एक बजे तक पहुंचेंगे. आज सुबह वे छह बजे उठे, पहले ट्रांजिस्टर पर समाचार सुने फिर star पर निनाद  सुना और फिर ‘जी इंडिया’ पर सन्त वाणी सुनी. भारत के कण-कण में, जन-जन के मन में उपनिषदों की वाणी का प्रचार, प्रसार है. यह कोई रहस्य नहीं रह गया है, न ही कभी था, कि मानव का शरीर प्रतिक्षण बदलता रहता है, किन्तु भीतर कुछ है जो कभी नहीं बदलता, वही आत्मा है, और वही परमात्मा का अंश है.

नौ बजने को हैं, पिछले दो दिनों की हलचल के बाद आज घर शांत है, कल ‘बुद्ध पूर्णिमा’ के कारण नन्हा और जून दोनों की छुट्टी थी. शाम को वे क्लब गये extempore speech में नन्हे ने भाग लिया पर कविता पाठ में नहीं ले पाया. बहुत देर हो चुकी थी, और उन दोनों को नींद आने लगी थी. सुबह स्कूल भी जाना है यह कहकर जून थोड़ा नाराज होकर उन सबको घर ले आये, वह भी ठीक से सो नहीं पायी, नन्हे ने तैयारी की थी पर भाग नहीं ले पाया इसी बात का दुःख अलग-अलग तरीके से तीनों ही महसूस कर रहे थे. पर सुबह वे सामान्य थे. उस दिन क्लब से ‘अनिता देसाई’ की एक किताब लायी थी, आधी पढ़ ली है, अच्छी है पर कड़वी सच्चाईयों से भरी हुई, इस दुनिया में हरेक को अपना बोझ स्वयं उठाना पड़ता है. सभी को सहारा नहीं मिलता.

कल बहुत दिनों बाद चचेरे भाई-बहन का पत्र मिला, अच्छा लगा, आजकल पत्र आना एक दुर्लभ घटना हो गयी है. अभी कुछ देर पहले फिर से पढ़ा कि मानव अपने शुद्ध रूप में आत्मा है और सर्वशक्तिमान परमात्मा से अलग नहीं है किन्तु अहम् का पर्दा होने से वह इस संबंध को पहचान नहीं पाता, ध्यान का अभ्यास भी किया पर गहराई तक नहीं पहुंच सकी. अच्छी बातें जो सुनने और पढ़ने में अच्छी लगती है उनका चित्रण साहित्य में किस तरह कर सकती है. जीवन के शाश्वत मूल्यों का चित्रण बिना किसी आडम्बर और शब्दजाल के, स्वाभाविक रूप से. देसाई की किताब के दो पात्रों तारा और विमला में से वह स्वयं को तारा के निकट क्यों पाती है, जबकि वह  किसी भी तरह से आगे नहीं है, कमजोर, डरी-डरी, लाचार, किसी न किसी पर आश्रित अपनी इस छवि से उसे बाहर निकलना ही होगा.


कल से उसे जुकाम ने जकड़ा हुआ है, बदन में हरारत सी महसूस हो रही है, नाक लाल हो गयी है, आँखें भारी सी हैं पर इन सबके बावजूद उसकी जीवनी शक्ति ज्यों की त्यों बरकरार है, यानि अपने रोजमर्रा के कार्यों को करने का उत्साह भी है और इच्छा भी. यह बात अलग है कि थोड़ा धीरे-धीरे ही कर पा रही है. अपनी छात्रा को कम्प्यूटर पर science encyclopedia दिखाया, नये स्वीपर से बाहर का नाला साफ करवाया, वह काम करना ही नहीं चाहता, दीनदास नाम है और शरीर भी मजबूत है पर थोड़ा आलसी है, सभी उतना ही काम करना चाहते हैं जितना करने भर से काम चल जाये. आज सुबह समाचार नहीं सुन पायी. परमाणु विस्फोटों के खिलाफ किस देश ने क्या कहा और कितने प्रतिबन्ध लगाये, आजकल यही तो होता है. कल शाम वे एक मित्र के यहाँ गये वहाँ उनकी अमीर दीदी के किस्से सुनकर (हजारों रूपये के गहने-कपड़े) कैसा तो लगा, वह  कल यूँ ही जुकाम से परेशान थी, फिर बाल भी धुले नहीं थे, साड़ी भी पुरानी पहनी थी. खैर कपड़ों से ही कोई अमीर नहीं बन जाता है, उसे अपनी अच्छी साड़ियाँ संभाल कर रखने के बजाय  पहननी चाहियें इतनी सीख तो मिली. आज मौसम यूँ तो गर्म है पर उसे पंखे की आवश्यकता महसूस नहीं हो रही है शायद हरारत की वजह से. उनके पेड़ में छोटी छोटी अम्बियाँ लगी हैं, एक दो तोड़कर शाम को चटनी बनाएगी, पुदीना भी अभी हरा है और हरी मिर्च के पौधे भी भरे हुए हैं. यानि सभी कुछ ताजा और शुद्ध...