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Tuesday, May 26, 2026

‘शक्कर के पाँच दाने’

‘शक्कर के पाँच दाने’



आज सुबह मन शिकायती हुआ, इसका अर्थ है नीचे के केंद्रों में आ गया कुछ पलों के लिए, या कहें देह भाव में, आत्मा में रहे तो एकत्व भाव की अनुभूति सहज ही होती है। आज सुबह रजिस्ट्रार के दफ़्तर से घर के कागज मिल गये, नन्हा भी वहीं आ गया था। एओएल का अनुवाद कार्य किया, अगले आश्रम में कला-फ़ोरम ‘भाव’ का आयोजन होने वाला है। गुरुजी वापस आ रहे हैं। वे दोनों आश्रम जाएँगे। 


आज सुबह नूना उठी तो मन ध्यानस्थ था, उठकर भी काफ़ी देर बिस्तर पर बैठी रही। सुबह-सुबह मन कितना शांत होता है, सब कुछ स्पष्ट नज़र आता है। वे टहलने निकले तो एकादशी का चंद्रमा और तारे गगन को सजा रहे थे। वापस आकर प्राणायाम किया, पता नहीं कौन भीतर से करवा रहा था, प्राणमय कोष को सबल करने के लिए किस तरह गहरी श्वास लेनी है। उनके भीतर कितनी शक्तियाँ छिपी हैं, पर वे उनके प्रति आँखें मूँदे रहते हैं। उनकी सारी ऊर्जा केवल शरीर को बनाये रखने में ही खर्च हो जाती है। दोपहर को ‘ऑडिबल’ पर ‘एक योगी की आत्मकथा’ का कुछ अंश सुना। ओशो की किताब पढ़ी। गुरुजी की भगवद्गीता की व्याख्या का एक-एक पन्ना सुबह-शाम रोज़ पढ़ती है।नवनीत में कुछ कहानियाँ पढ़ीं, बहुत अच्छी हैं। वह भी कहानी लिख सकती है, यदि थोड़ा सा प्रयास करे। गीत चतुर्वेदी का एक साक्षात्कार सुना। आज नन्हे ने गुलेल भेजी है, जैसे उस दिन लट्टू लाया था, जो उन्होंने उस दिन के बाद चलाया ही नहीं। नन्हे के भीतर एक बच्चा अभी भी रहता है। वह कल शाम को वापस आएगा, कंपनी की ‘ऑफ साइट मीटिंग’ में गया है। आज फिर उसे डेंटिस्ट के पास जाना था, अब तीन हफ़्ते बाद जाना है, अगले महीने के अंत तक नया दाँत लग जायेगा।


आज वे बैंगलुरु में पहली बार ‘लाहे-लाहे’ नामक संस्था की ओर से प्रस्तुत किया एक नाटक देखने गये।मानव कौल द्वारा लिखित ‘शक्कर के पाँच दाने’ सोलो नाटक का मुख्य पात्र जे झा ने निभाया। नाटक में जिसका नाम राजकुमार था, रघु उसका ट्रक वाला दोस्त था, पुंडलीक व माँ के अलावा चार अन्य पात्र थे। नाटक अच्छा लगा। जिसमें मध्यवर्गीय जीवन के अंतर्द्वंद्व, अर्थहीनता और अस्तित्त्व की तलाश को दिखाया गया है। नायक अपने जीवन को शक्कर के पाँच दानों की तरह देखता है। सुबह वैक्यूम क्लीनर से सफ़ाई की तो नैनी ने कहा, नन्हा, माँ का बहुत ध्यान रखता है। आज से एक छात्र हिन्दी पढ़ने आने लगा है, उसे वर्णमाला से शुरुआत करनी होगी। 


इतवार की सुबह सुहानी थी। नन्हे और सोनू ने ‘थाई’ भोजन बनाया। शाम को वे सब एक झील पर गये, थर्मस में चाय बनाकर ले गये थे। पंछियों, हवा, धूप और पानी के सान्निध्य में कुछ समय बिताया।पापाजी को भी मोबाइल पर जंगल व झील दिखाए। वापस आकर बच्चों ने ‘सूशी’ बनायी। टेलीस्कोप से ज्यूपिटर देखा। उसके बाद वे अपने घर चले गये।नन्हे ने उसके लिए मानव कौल की कुछ किताबें दी हैं।


आज सुबह साढ़े नौ बजे वे लालबाग गये थे। जहाँ फूलों की प्रदर्शनी लगी है। अद्भुत नज़ारे थे, फूलों का रूप कितना सुंदर होता है और रंग कितने शोख़ ! गुलाब, जीनिया, पिटुनिया, डहेलिया, गुलदाउदी, गेंदा, जरबेरा, ऑर्किड्स और सैकड़ों तरह के रंगों वाले फूल ! कितने लोगों ने कितने दिनों, महीनों श्रम करके इन्हें उगाया होगा। उन्होंने फूलों की कई तस्वीरें उतारीं और कुछेक ख़रीदीं भी। वापस लौटे तो डेढ़ बजे थे।


आज वे बहुत दिनों बाद गुरुजी के सत्संग में शामिल होने आश्रम गये। काफ़ी भीड़ थी। वह हिन्दी, अंग्रेज़ी और कन्नड़ तीनों भाषाओं में बोल रहे थे।कुचिपुड़ी नृत्य की एक प्रस्तुति भी हुई।जून ने अगले महीने होने वाली उनकी यात्रा की टिकट्स बुक कर दी हैं। दीदी ने बताया, दोनों भांजियों ने फिर से जॉब शुरू कर दी है। बच्चों के जन्म के बाद कुछ वर्षों तक वे पूर्णकालिक माँ की भूमिका में थीं। 


आज वे एक वृद्ध महिला से मिलने गये, जिनके स्वर्गवासी पति जून की कंपनी में वर्षों पहले एक उच्च पद पर थे। उन्होंने कई किताबें भी लिखी हैं। वृद्धा मैम इस उम्र में भी बहुत ऊर्जावान हैं, मिलनसार भी। उनको वर्तमान सोसाइटी में आये अधिक दिन नहीं हुए हैं, पर सबसे जान-पहचान कर ली है। जून के पूर्व अधिकारी भी अपनी पत्नी के साथ आये थे। वापसी में उन्हें उनके घर छोड़ते हुए वे वापस आये। रास्ते में  धीरेंद्र शास्त्री के बारे में एक वीडियो देखा, आजकल उनकी बहुत चर्चा है। कल सुबह नन्हा और सोनू एक मित्र के विवाह में सम्मिलित होने कोलकाता जा रहे हैं। 


आज गणतंत्र दिवस होने के कारण सुबह आठ बजे वे झंडा आरोहण के लिए मल्टी पर्पस कोर्ट गये। अधिक लोग नहीं आये थे, जून को ध्वज फहराने का अवसर मिला। वापस आकर टीवी पर शानदार परेड देखी, जिसमें संस्कृति मंत्रालय द्वारा प्रस्तुत किए गये विशेष नृत्य ‘वंदे भारतम:नारी शक्ति’ में पाँच तत्वों के माध्यम से महिलाओं की असीम ऊर्जा को दर्शाया गया था। देश भर से आये लगभग पाँच सौ शास्त्रीय और लोक कलाकारों ने इसमें भाग लिया। विभिन्न राज्यों और मंत्रालयों की झांकियाँ भी मनमोहक थीं, नूना के अनुसार गुजरात की झांकी  प्रथम और लोक निर्माण विभाग की झांकी दूसरे स्थान पर आने योग्य है। शाम को सवा पाँच बजे वे आश्रम गये। गायन, वादन तथा नृत्य के कार्यक्रम देखने के साथ हेमामालिनी और गुरुजी के उद्बोधन सुने।  


Monday, August 4, 2025

योग दिवस

आज भी नूना ने एओएल का एक अनुवाद कार्य किया। योग के महत्व पर एक बहुत अच्छा लेख था किन्हीं कमलेश का, नाम से पता नहीं चलता वह लेखक है या लेखिका। इस इतवार को नन्हा और सोनू दोपहर डेढ़ बजे तक रह सकते हैं, कर्फ़्यू में २ बजे तक ढील दी जाएगी। सोमवार से शाम पाँच बजे तक बाज़ार खुला रहेगा। विशेषज्ञ कह रहे हैं, कोरोना की तीसरी लहर निकट भविष्य में आ सकती है। आज सुबह भी छत पर धुआँ था, जून ने पड़ोसी को लिखा, उनके मज़दूर लकड़ी पर खाना बनाते हैं, उसी का धुआँ आता है। उनका जवाब आया, क्षमा माँगी है और मज़दूरों को जगह बदलने को भी कहा है। इस समय भी कमरे में हल्की गंध है। जबकि शाम को सारे दरवाज़े, खिड़कियाँ बंद कर दिये थे।आज सुबह वे थित्ताहल्ली गये थे, एक नया स्थान देखा। फलवाले मुनिकुमार की दुकान के पास एक छोटी सी लड़की पेड़ से टँगे झूले पर झूल रही थी, बाजार के शोर से बेख़बर वह अपनी मस्ती में खोयी थी।


आज का पूरा दिन ऊर्जा और उत्साह से भरा था। सुबह ठंडी हवा और घने बादलों के सान्निध्य में टहल कर आये।वापस आकर कार से पुन: गये, बगीचे की क्यारियों के चारों ओर लगाने के लिए पत्थर लाए, जो कल सुबह सड़क किनारे पड़े देखे थे। शायद ख़ाली पड़े प्लॉट्स में सफ़ाई के लिए ट्रैक्टर चलाते समय ज़मीन से निकले होंगे। उनका छोटा सा लॉन अब पहले से भी सुंदर लग रहा है। शाम को योग दिवस के लिए सूर्य नमस्कार का वीडियो बनाया।पापाजी से बात हुई, उन्होंने उसकी कविताएँ पढ़ीं और कहा, अधिकतर लोग अध्यात्म में रुचि नहीं लेते।               


आज पितृ दिवस है। सुबह साढ़े आठ बजे सोनू, नन्हा और उसका एक मित्र आ गये थे। जून के लिए जूते और प्रसाधन सामग्री लाए हैं, नूना के लिए भी एक लोशन है। नाश्ते में जून ने पनियप्पम बनाये। उसके बाद एक नया बोर्ड गेम खेला, पैंडेमिक, अच्छा खेल है।पापा जी से बात की, उन्हें पितृ दिवस पर उनके लिए लिखी कविताओं का संग्रह भेजा। शाम को छोटे भाई का फ़ोन आया, वह लखनऊ में होटल से गेस्टहाउस में शिफ्ट हो गया है, इस महीने के अंत तक वहीं रहेगा। 


आज योग दिवस है, सुबह डीडी पर मोदी जी का प्रभावशाली भाषण सुना, योगासन किए। शाम को भी प्राणायाम किया। पापाजी से योग का महत्व पर चर्चा हुई। एक सखी से बात हुई, उसकी नयी नवेली बहू ने भी उसके साथ योग किया, बताते हुए वह बहुत खुश थी। बड़े भाई, दीदी-जीजाजी को भी योग दिवस की बधाई दी, यानी कुल मिलाकर अच्छा रहा योग दिवस।


आज सुबह उठने में पंद्रह मिनट की देरी हुई, उसकी वजह से पंद्रह मिनट कम पाठ किया। नाश्ते के बाद जून ड्राइव पर ले गये। कल से उसने सोचा था, अस्तित्त्व जो कराये हो जाने देना चाहिए, कोई आनाकानी नहीं की। वापस आते आते सवा ग्यारह हो गये। यानी लिखने के लिए सुबह जो एक घंटा मिलता है, वह नहीं मिला। दोपहर को जून के एक व्यवहार से मन उदास हो गया, जिसका असर शाम तक रहा। आख़िर ध्यान के समय उनसे कहना ही पड़ा, परमात्मा ने ही कहलवाया। अब जो कुछ भी उसके साथ हो रहा है, या होगा, सब कुछ उस मालिक की मर्ज़ी से हो होगा। आज पापाजी से बात हुई, उन्होंने कहा, कविता बहुत उच्च स्तर की थी, वह दो पंछियों वाली, जो एक ही वृक्ष पर रहते हैं; एक साक्षी है, दूसरा जीवन के रस को भोगने को इच्छुक। एक आत्मा दूसरा परमात्मा। शाम को असमिया सखी का फ़ोन आया, सुबह साढ़े छह बजे योग नहीं कर पाएगी, आज सुबह ही उसने कहा था, वीडियो कॉल पर उसके साथ किया करेगी।अपने लिए समय निकालना कितना कठिन होता है कुछ लोगों के लिए। 


रात को स्वप्न में गुरुजी को देखा, वह उनके घर की पूजा में आये हैं पर वह तैयारी में लगी रहने के कारण पूजा में नहीं बैठ पायी। फिर कुछ देर बाद आवाज़ आयी, आप पूजा कर रही हैं? देखा, तो  दूसरे कमरे में बैठकर वह उसकी खिड़की से आवाज़ दे रहे थे; यानि वह भी पूजा में नहीं बैठे थे। कह रहे थे, वहाँ पूजाघर में बहुत उमस थी।कल बहुत गर्मी थी। कैसा विचित्र सा था स्वप्न!


आजकल बिजली आंखमिचौली खेलती रहती है दिन में कई बार जाती है, फिर जेनसेट से काम चलाना होता है, आ जाती है कुछ देर में। इस समय भी नदारद है। पंखा एक पर चल रहा है, एसी बंद हो गया है। खिड़की-दरवाज़ा सब बंद है, सो गर्मी हो गई है। पता नहीं कब आ जाएगी। सुबह समय से उठे थे, कल जो पत्थर एकत्र किए थे, आज कुछ और लाये, गुड़हल व रात की रानी के पौधों के चारों ओर रख दिये हैं। आज जून दशहरी, लंगड़ा और यहाँ के लोकल आम भी ले आये हैं। उन्हें लीची भी मिल गई। टीवीएफ़ पर ‘पंचायत’ देखा, अच्छा अभिनय किया है नायक ने। पापा जी आजकल ‘अथातो भक्ति जिज्ञासा’ पढ़ रहे हैं, ओशो के दिये हुए प्रवचनों पर आधारित पुस्तक है। शाम को टहलते समय मदार के फूलों व फलों की तस्वीरें उतारीं। दीदी-जीजाजी का फ़ोन आया, उन्हें जून का भेजा मोबाइल स्टैंड मिल गया है, अब उस पर वीडियो बनायेंगे। कन्नड़ भाषा का अभ्यास छूत गया है। ‘साईं’  के सारे एपिसोड समाप्त हो जाने के बाद पुन: आरंभ करेगी। सोने से पूर्व पुस्तक पढ़ने का क्रम भी आजकल छूट गया है।                                                                                              


   


Wednesday, July 19, 2023

ध्वनि की ऊर्जा

आज शाम से ही वर्षा हो रही है। कुछ देर पहले नन्हे से बात हुई, उसने बताया दिवाली का उत्सव वे अभी तक मना रहे हैं। आज सुबह एक मित्र परिवार ने उन्हें नाश्ते पर बुलाया था, दोपहर को उन्होंने पड़ोसियों को लंच पर आमंत्रित किया, शाम को पुन: उन दोनों को एक सहकर्मी के यहाँ दिवाली की चाय पर जाना था। रात को नौ बजे से उनका नृत्य अभ्यास है, जो एक मित्र के विवाह के अवसर पर उन्हें करना है। आज दीदी ने वर्ष भर पूर्व  उनके साथ की गई हिमाचल की यात्रा का विवरण भेजा, पढ़कर वे सारे दृश्य आँखों के सम्मुख आ गये। उसने सोचा, वह भी डायरी में लिखे यात्रा विवरण को टाइप करके उन्हें भेजेगी । बड़ी ननद के विवाह की वर्षगाँठ पर उसने एक कविता लिखी ।कल एक सखी के माँ-पापा के लिए श्रद्धांजलि स्वरूप एक छोटा सा आलेख लिखा था, उसने अपने परिवार जनों की प्रतिक्रियाएँ भेजी हैं, अब तक बीस आ चुकी हैं। उनका परिवार बहुत बड़ा है। उसे महसूस हुआ, शब्दों में कितनी ताक़त होती है। 


सुबह वे टहलने निकले तो भोर का तारा गाढ़े नीले आकाश पर दमक रहा था। हवा शीतल थी। रात की रानी की सुगंध दूर से ही आ रही थी। मुख्य सड़क के मध्य में एक लंबी क़तार में इनके पौधे लगे हैं। योगासन के अभ्यास के दौरान छत से दिखा सूर्योदय का दृश्य अनुपम था। उसी दौरान पुन: गायत्री परिवार के लाल बिहारी जी का मनोमय कोष की साधना पर दिया व्याख्यान सुना। उनकी वाणी में कितनी प्रखरता है, बहुत गहरी साधनाएँ उन्होंने की हैं। बाद में एक परिचित, जो इसी सोसाइटी के  निवासी हैं, मिलने आये थे, तमिलनाडु के हैं। हर सुबह दौड़ लगाते हुए मिलते हैं। वे सात बार विपासना का कोर्स कर चुके हैं। उनसे बात करते हुए उसे अपने विपासना अनुभव याद आ रहे थे, उसके लिए एक बार ही यह अनुभव करना पर्याप्त है।  


बाहर से कुछ आवाज़ें आ रही हैं। उनकी बैठक की दीवारों में पानी के रिसाव के निशान दिख रहे थे, इस समस्या से छुटकारे के लिए बाहर दीवारों के पास खुदाई का काम चल रहा है, एक बार फिर से जलनिरोधी प्लासतर करना होगा। आज दिन में दो बार ‘सावधानी हटी और दुर्घटना घटी’ । एक प्याला टूटा और खाने की मेज़ पर पानी से भरा गिलास उलट गया। दोनों बार दाहिने हाथ से, अर्थात हाथ पर मन का नियंत्रण नहीं था और मन पर ख़ुद का। नन्हा और सोनू विवाह में पहुँच गये हैं, उसके मित्र ने लिंक भेजा है, चाहे तो वे भी यहाँ से सम्मिलित हो सकते हैं।’देवों के देव’ में कार्तिकेय और गणेश के मध्य प्रतिस्पर्धा होने वाली है। गणेश ही विजयी होंगे, कार्तिकेय के मन में एक गहरा घाव है जो इंद्र ने उसे दिया है अथवा उसके जन्म की घटनाओं के कारण उसे मिला है। वह कई बार कैलाश छोड़कर जा चुके हैं, कोई न कोई उन्हें मनाकर वापस लाता है। 


सुबह वे जल्दी उठे। उठने से पूर्व उसे लगा जैसे किसी ने कहा हो, ध्वनि एक ऊर्जा है। प्रात: भ्रमण के दौरान इसी बात पर मनन करते हुए मंत्र जाप किया। हर शब्द  की तरंगों का शरीर पर असर होता है।ओम के उच्चारण का अति प्रभाव होता है, इसीलिए इस पर इतने शोध हो रहे हैं। हज़ारों वर्षों से ऋषि यह कहते आये हैं। शरीर तरंगों से बना है, तो ध्वनि की तरंगें उसे प्रभावित करें इसमें आश्चर्य भी क्या है ? भीतर निरंतर एक गुंजन चल रही है, उसे सुनें या ना सुनें, वह हो ही रही है। वह ध्वनि कहाँ से आ रही है, क्या वह प्राण ऊर्जा की गति के कारण है, जैसे बिजली की तारों से एक ध्वनि आती है। इस देह में न जाने कितने रहस्य छिपे हैं। गुरुजी के भगवद्गीता पर दिये प्रवचन का एक अंश सुना। वे गूढ़ विषयों को भी सरल भाषा में समझा देते हैं। शाम को एक निर्देशित ध्यान किया था, मन कितना हल्का हो गया था उसके बाद। जून को भी अच्छा लगा। अब वह पुन: कर रहे हैं। उन्हें अपने आप ध्यान के लिए बैठे देखकर अच्छा लगा। उन्हें ध्यान के महत्व का ज्ञान हो रहा है।  


आज साप्ताहिक सफ़ाई का दिन था। सुबह सर्दियों की ठंड के साथ शुरू हुई। तापमान चौदह डिग्री था, वे जैकेट आदि से मुस्तैद होकर निकले। दोपहर को धूप निकल आयी थी। फूलों के चित्र उतारे, जो धूप में और भी शोख़ लग रहे थे। शाम को सूर्यास्त के चित्र  फ़ेसबुक पर प्रकाशित किए। आर्ट ऑफ़ लिविंग के अनुवाद कार्य के बाद  दोपहर को ब्लॉग पर लेखन  व पठन कार्य, लिखा कम, पढ़ा अधिक। हिमाचल की यात्रा का वृतांत पिताजी व दीदी दोनों को अच्छा लगा। नन्हे के मित्र ने विवाह के बाद एक उपहार भेजा है, बहुत बड़ा सा पैकेट है। उन्होंने अनुमान लगाया, उसमें क्या हो सकता है। 

   


Tuesday, May 18, 2021

ओल्ड पाथ व्हाइट क्लाउड्स

नए वर्ष में पहली बार डायरी खोली है। मन में एक गहरी शांति है और कुछ भी लिखने जैसा नहीं लग रहा है। ‘कविता’ भी कई दिनों से नहीं लिखी। बुद्ध के बारे में दोपहर को पढ़ा, बहुत अच्छा लगा। ‘ओल्ड पाथ व्हाइट क्लाउड्स’ में गौतम बुद्ध के जीवन और शिक्षाओं को कितनी खूबसूरती से प्रस्तुत किया गया है. इसमें बुद्धि के जीवन के अस्सी वर्षों को गांव के एक भैंस चराने वाले लड़के स्वस्ति, जो बाद में उनका शिष्य बन जाता है, के माध्यम से और आंशिक रूप से स्वयं बुद्ध के माध्यम से दर्शाया गया है. जीवन के कितने गहरे सत्यों का अनुभव बुद्ध ने किया था, बच्चे उनके प्रथम शिष्य थे। बच्चों को सत्य आसानी से अनुभव में आता है, क्योंकि उनके पास अहंकार की कोई बाधा नहीं होती, न ही वे हर बात को बुद्धि से तोलते हैं, वे सीधे आत्मा से ही अनुभव करते हैं। बुद्ध कहते हैं, जीवन में सभी कुछ परस्पर निर्भर है और नश्वर है; चीजें निरंतर बदल रही हैं। ध्यान की गहराई में जब तन, मन, भावना और विचार सब कुछ स्पष्ट दिखाई देते हैं तब उनके द्वारा प्रभावित होने का डर नहीं रहता। सत्य कभी बदलता नहीं और जगत एक सा रहता नहीं। इस बात को जब भीतर अनुभव कर लिया जाता है तो जीवन सरल हो जाता है। प्रेममय हो जाता है और सारा विषाद खो जाता है। वर्तमान में टिकना ही जागरण है, वर्तमान के क्षण में ही जीवन से मुलाकात हो सकती है। जैसे ही मन अतीत या भविष्य में जाता है, सत्य से नाता टूट जाता है। अतीत जा चुका वह मिथ्या है, भविष्य अभी आया नहीं, केवल यही क्षण सत्य है, इसमें पूरे होश के साथ जीना ही साधक का कर्तव्य है। ऊर्जा का संरक्षण तब ही संभव है।  


सम्यक वाणी साधक के लिए अति आवश्यक है, उतनी ही जितना सम्यक कर्म, सम्यक विचार और सम्यक ध्यान। भोजन भी साधक को समुचित मात्रा में लेना चाहिए, ऐसा भोजन जो सुपाच्य हो और हल्का हो। आज सुबह का ध्यान अत्यंत प्रभावशाली था, चीजें कितनी स्पष्ट दिखाई दे रही थीं। समझ जैसे  भीतर से स्वत: ही बह रही थी। मानव के भीतर कितनी समझ है और कितनी शांति, एक स्थिरता भरा अनंत आकाश है भीतर ! इसमें टिके रहना ही तो ध्यान है। 


आज भी ब्लॉग पर कुछ नहीं लिखा। कल से प्रारंभ करना है। आर्ट ऑफ लिविंग के एप में गुरुजी की लिखी कई किताबें हैं, वीडियो भी हैं, एक पूरा खजाना है। कल वे आश्रम जाएंगे। गुरुजी एक सप्ताह के लिए आश्रम में रहेंगे। वे स्वयं सेवक का कोर्स भी करने वाले हैं। आज भी दोपहर बाद बुद्ध की पुस्तक पढ़ी, कितनी अच्छी किताब है यह, उल्हास नगर की यात्रा के दौरान मासी के यहाँ यह किताब देखी थी, फिर यहाँ आकर मँगवाई। उसे उनका कृतज्ञ होना चाहिए। बुद्ध कहते हैं सभी कुछ आपस में जुड़ा है और नश्वर है। चीजें जैसी हैं वैसी ही उन्हें देखना आ जाए तो कहीं कोई तनाव, क्रोध, ईर्ष्या, घृणा, नकारात्मकता नहीं टिक सकती। स्वयं में टिककर ही वे आत्मा की शांति और आनंद का अनुभव कर सकते हैं। जो मुक्ति का वरण करता है उसे संसार का आकर्षण नहीं लुभाता। वह तट पर बैठे व्यक्ति की भांति लहरों का आना जाना देखता रहता है और स्वयं में तृप्त रहता है. 


आज गुरूजी को देखा, सुना. वर्षों पहले उन्हें टीवी में नियम से सुनती थी. कैसा सौभाग्य है कि उनके आश्रम में उनको सुनने का अवसर मिल रहा है. वह सरल शब्दों में सभी प्रश्नों के कितने सुंदर उत्तर देते हैं. सत्य में प्रतिष्ठित व्यक्ति कैसा होता है और सिद्ध कौन होता है, आत्म अनुभव कैसा होता है, ऐसे और इसी तरह के प्रश्नों के उत्तर कितनी सहजता से वह दे रहे थे. हिंदी व अंग्रेजी दोनों ही भाषाओँ पर उनकी गहरी पकड़ है और परमात्मा से अभिन्न हैं वह ! आज बुद्ध की किताब आगे पढ़ी, मैत्री और करुणा का कितना सुंदर वर्णन किया है और प्रेम का भी, हृदय कितनी गहरी विश्रांति का अनुभव कर रहा है. संसार के हर जीव के प्रति प्रेम का भाव मन में उदित हो रहा है, सभी तो अपने ही हैं, एक ही हैं, शाम को एक पुरानी सखी का फोन आया, कितना आश्चर्य है कि दोपहर को उसका स्मरण हो आया था और अंतर में प्रेम था. जून के प्रति भी भीतर कितना स्नेह प्रकटा था, उनका स्वभाव बहुत अच्छा है, शाम से उनका व्यवहार भी कितना प्रेमिल लग रहा है. गुरूजी की बात अक्षरशः सत्य सिद्ध हो रही है कि सभी एक ही चेतना से बने हैं ! कल विवाह की सालगिरह है , उससे भी पूर्व से वे एक-दूसरे से परिचित हैं, यानि साथ पुराना है.  


भगवान बुद्ध ने बच्चों को भी ध्यान सिखाया था. उनकी शिक्षा और समझ कितनी लाभप्रद है और कितनी गहरी. वे जीवन और मृत्यु के रहस्य को समझाते हैं, जीवन की नश्वरता और जगत के मिथ्या होने को भी, जैसे गुरूजी कहते हैं, अब तक का उनका जीवन एक स्वप्न से ज्यादा क्या है ? इतने वर्ष बीत गए कुछ वर्ष और हैं, यह देह एक दिन नष्ट हो जाएगी, उनके पहले कितने लोग चले गए, अब उनकी कोई खबर नहीं, वे भी एक दिन हवा हो जायेंगे तो क्यों न इसी क्षण स्वयं के कुछ न होने को स्वीकार कर लें. जीवन एक खेल से ज्यादा क्या है, कृष्ण की लीला या राम की लीला ... आज वे आश्रम गए थे. एच आर विभाग आज भी बन्द था, परसों भी देर हो जाने से कोई नहीं मिला था. कल जून के एक पुराने मित्र परिवार सहित आये, अपने साथ सुंदर सफेद बेला और लाल गुलाब के फूलों की मालाएं लेकर आये थे, एक-दूसरे को पहनने को कहा, तस्वीरें भी खींचीं. शाम को नन्हा व सोनू आये, गुलदाउदी के फूलों का एक गुलदस्ता, खजूर व मिठाई लाये.  लेखन कार्य अभी शुरू नहीं हुआ है, जो पुस्तक पढ़ रही है, उसके खत्म होने पर ही लिखना हो पायेगा. 

 

Monday, January 27, 2020

आंतरिक मौन


आंतरिक मौन 



समय की कीमत जो जानता है, विचार की कीमत जो जानता है, वह और तरह से जीएगा. परिवार, मित्र, जीवन, प्राण, सभी धन हैं. इतनी संवेदना भीतर जगे कि इस जगत को त्यागपूर्वक भोगें. आजकल नियमित ध्यान नहीं होने के कारण मन चंचल रहता है, अनुशासित होकर कम से कम आधा घन्टा ध्यान करना होगा. ग्यारह बजने वाले हैं, जून आज आयल फील्ड गए हैं, आने में शायद देरी हो सकती है. आज नासिकाग्र पर मीठी सी गन्ध का अनुभव हो रहा है. गन्ध पृथ्वी का गुण है. पहले नाद सुनाई देता था जो आकाश का गुण है, फिर प्रकाश दिखता था, जो अग्नि का गुण है. साधना काल के बहुत आरंभ में पूरे शरीर में प्राणों का प्रवाह होता प्रतीत होता था, जो वायु का गुण है. अब वे भी सब होते रहते हैं पर गन्ध प्रमुख है. इन्हें ही तन्मात्रा कहते हैं शायद. कल शाम को क्लब की कमेटी की मीटिंग है, उसे एक और सदस्या के साथ मिलकर चाय-नाश्ते  का इंतजाम करना है. सुबह से ही तैयारी करनी होगी. 

रात्रि के आठ बजे हैं. टीवी पर इंग्लैण्ड-भारत एक दिवसीय क्रिकेट मैच का प्रसारण हो रहा है. भारत के सामने ३२२ रन का विशाल लक्ष्य रखा है. आज शाम  लर्नर ड्राइविंग लाइसेंस के लिए फार्म जमा कर दिया. घर आने से पूर्व वे नदी तक गए. सूर्यास्त का सुंदर दृश्य कैमरे में कैद किया. नदी में पानी बहुत बढ़ गया है. सर्दियों में लोग जहाँ पिकनिक मनाते हैं, रेत के वे मैदान पानी में डूब गए हैं. आज सुबह ड्राइविंग की थ्योरी क्लास थी, वर्षा बहुत तेज होने लगी, टीचर की आवाज सुनाई देना बंद हो गयी. आधा घन्टा सभी ने प्रतीक्षा की, वर्षा रुकी तो क्लास पुनः आरम्भ हुई. दस क्लासेस के बाद लर्नर लाइसेंस मिलेगा. आज सुबह एक योग साधिका अपने माँ-पिता को लेकर आयी थी. वह उन्हें प्राणायाम के लिए प्रेरित करे, ऐसी उनकी मंशा थी. इसी बीच चाची जी का फोन आया और प्रेसीडेंट का भी. पहला फोन बीच में काटना पड़ा, शायद सामान्य हाल-चाल जानने के लिए ही किया होगा. छोटे भांजे से बात हुई, वह क़ानून की पढ़ाई करने कालेज पहुँच गया है, परिवार में पहला वकील बनेगा. आज बगीचे से चार नारियल तुड़वाये हैं एक वर्ष और उन्हें ताजा नारियल पानी पीने को मिलेगा. कल  मीटिंग ठीक से हो गयी. 

सुबह के साढ़े आठ बजे हैं, ड्राइवर के आने का इंतजार है. प्रतीक्षा के इन पलों को रचनात्मक बना लिया जाये तो समय क्षण भर में कट जाता है. आज सुबह से भीतर के मौन को अनुभव कर पा रही है वह, कितना मधुर है यह सन्नाटा ! आज का गुरूजी का सन्देश भी यही कहता है कि  मन के द्वंद्व को समाप्त करने की कोशिश से वह और बढ़ेगा क्योंकि उसे ऊर्जा मिलेगी, बल्कि उसे आत्मा का आश्रय लेकर समाप्त कर देना चाहिए. आत्मा में परम् विश्राम है. परमात्मा में क्या होगा यह तो वही जानता है ! आत्मा व परमात्मा दो हैं या एक, इसका निश्चय आज तक नहीं हो पाया. वे एक ही होने चाहिए. भीतर जो अनन्त मौन है वह परम् मौन ही कहा जा सकता है. कुछ देर पूर्व क्लब की अध्यक्षा का फोन आया. स्कूल के लिए नयी अकाउंटेंट मिल गयी है, उसका इंटरव्यू लेना है, उसे भी जाना होगा. आज भीतर सन्नाटा है तो बाहर भी मौन छाया है. नैनी व सफाई कर्मचारी चुपचाप अपना काम कर रहे हैं. बाहर उनके घर के पांच बच्चों में से इस समय कोई भी नहीं रो रहा है. 






Monday, August 26, 2019

मरणोपरांत स्तवन



आज कोर्स का तीसरा दिन था, सुबह छह बजे वे निर्धारित स्थान पर पहुँच गये थे. सुबह वह जल्दी तैयार होकर ड्राइवर की प्रतीक्षा कर रही थी तो कपोफूल के चित्र उतारे, फेसबुक पर पोस्ट भी किये. सुबह के सत्र में दो बार पद्म साधना करवाई गयी. नाश्ते में दलिया मिला, जो काफ़ी स्वादिष्ट था पर नमक थोड़ा कम था. एक प्रक्रिया करवाई गयी जिसमें अपनी पहचान बदल लेनी थी, एक महिला प्रतिभागी के साथ उसने अपनी पहचान बदली. वह पटना में रहने वाली अपनी जेठानी के व्यवहार से बहुत परेशान है. उत्तर भारत में विवाह किया जब वह दिल्ली युनिवर्सिटी में थी, एक पुत्री है पर अब डिस्टेंट मैरिज चला रही है, क्योंकि सरकारी नौकरी है उसकी स्कूल में. लेकिन वह आश्वस्त है कि शादी निभेगी. एक अन्य प्रक्रिया में एक नेता जैसे चलेगा समूह के सभी लोगों को वैसे ही चलना है. उससे दो बार भूल हुई इसमें, समूह के अन्य सदस्यों को सही करना है यदि कोई भूल करता है. दो बार योग निद्रा की, तीन बार भस्त्रिका प्राणायाम. देह में ऊर्जा का स्तर बढ़ गया है और बहुत सारी सीमाएं टूटी हैं. मन में जो बाधाएं थीं उनका भान हुआ है. गुरूजी का दूसरा सेशन था आज. उन्होंने कमिटमेंट के बारे में बहुत अच्छी तरह समझाया और प्रश्नों के उत्तर दिए. एक व्यक्ति कोर्स के दौरान परेशान हो गये और टीचर को उनकी कठोरता के लिए कुछ शब्द कहे. अहंकार को तोड़ने के लिए किये गये उपाय बताये गये हैं इस कोर्स में, सो अहंकार को चोट लगना स्वाभाविक है. प्रतिभागियों को उन तीन क्षेत्रों के बारे में लिखने को भी कहा जिनमें वे अटक गये हैं और आगे नहीं बढ़ पा रहे हैं. कल रात्रि जो गृहकार्य दिया गया था, वह अद्भुत था. उनकी मृत्यु हो चुकी है और उन्हें अपनी मृत्यु के बाद eulogy लिखी है, अर्थात मरणोपरांत लिखने वाला संदेश लिखना है. आज सुबह उनका नया जन्म हुआ है, जीवन को अब नये दृष्टिकोण से देखना होगा. वे देह नहीं हैं, एक आत्मा हैं, जिसे यह देह मिली है. जिसके द्वारा उन्हें अपने जीवन की शेष कहानी लिखनी है, कुछ ऐसा करना है जिससे उनके इर्दगिर्द कुछ परिवर्तन आये. डीएसएन का यह कोर्स उसके जीवन में अवश्य ही एक परिवर्तनकारी मोड़ साबित होगा. सत्रह वर्ष पहले उसने बेसिक कोर्स किया था, इतने समय के बाद यह अवसर मिला है. अवश्य ही परमात्मा उसके जीवन की बागडोर उसके विवेक के हाथ में देना चाहते हैं न कि उसके मन के हाथों में. कल से खुली आँखों से ही जो भी दृश्य सोचती है मन में, देख पा रही है. शिवानी कहती है, मन सोचता है, बुद्धि दिखाती है. आज यह स्पष्ट हो रहा है. उनके मन की क्षमता अपार है, जिसे उलीचना उन्हें आना चाहिए.

आज कोर्स का अंतिम दिन था. टीचर का उत्साह देखते ही बनता है. उन्होंने प्रतिभागियों को प्रेरित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी है. अब यह उन पर निर्भर करता है कि अपने लक्ष्य के प्रति वे कितने समर्पित हैं. इस समय रात्रि के साढ़े आठ बजे हैं. सुबह चार बजे उठी थी, पौने सात बजे से कोर्स आरंभ हुआ. पहले साधना, फिर टीचर ने शुभकामना कार्ड्स बनाने को कहा, बाद में पता चला निमन्त्रण पत्र बनाने हैं जो गुरूजी के जन्मदिन पर लोगों को बांटने हैं. एक प्रक्रिया में समूह के सभी लोग एक सदस्य को एक-एक कर उसकी एक भूल बताते हैं. उसे अन्तर्मुखी होने, खुद में ही व्यस्त रहने, अहंकारी होने तथा दूसरों की बात न सुनने का दोषी पाया गया. ये सारी बातें किसी हद तक सही हैं. अपने सामने उसे कोई कोई नजर नहीं आता क्योंकि दूसरा यहाँ कोई है ही नहीं. पर पारमार्थिक सत्य और व्यावहारिक सत्य में अंतर होता है. आज वे ज्ञान के मन्दिर भी गये. नाश्ता और भोजन आज दोनों ही विशेष थे और गरिष्ठ भी. टीचर ने अन्य सभी आर्ट ऑफ़ लिविंग टीचर्स को जिन्होंने यह कोर्स करवाने में मदद की, सामने बुलाकर सम्मानित किया और उनके अनुभव सुनवाये. इसी महीने पहला तथा अगले महीने दूसरा बेसिक कोर्स करवाना है, 'गतिमय उसे' भी इसमें सहयोग देना है. एक टीचर ने कहा, तीसरे महीने वह ध्यान का कोर्स भी करवाएगी. उन्हें गुरूजी के आध्यात्मिक सैनिक बनकर समाज में ज्ञान का प्रचार और प्रसार करना है. कोर्स के दौरान तीन तरह के लोगों की बात भी गुरूजी ने बताई. पहले वे जो दूसरों को सुख देते हैं, दूसरे जो लोगों के साथ सहज व्यवहार करते हैं और तीसरे वे जो अन्यों को परेशान करते हैं. इसी तरह कुछ लोग चींटी की तरह होते हैं, कुछ मक्खी की तरह, कुछ तितली की तरह और कुछ मधुमक्खी की तरह होते हैं. उन्हें समाज के लिए उपयोगी बनना है. सेवा का छोटा सा कृत्य भी उन्हें तृप्त कर देता है.


Friday, March 22, 2019

उपनिषद का श्रवण




आज से ईशोपनिषद सुनना आरम्भ किया है. उपनिषद उन्हें परमात्मा के निकट ले जाते हैं. भारतीय संस्कृति की आत्मा अध्यात्म ही है. आचार्य सत्यजित सरल ढंग से व्याख्या करते हैं. वह कहते हैं, मुख्य ग्यारह उपनिषदों का अध्ययन वह धीरे-धीरे करायेंगे. ईशोपनिषद सर्वश्रेष्ठ माना जाता है. यह यजुर्वेद के एक भाग से लिया गया है. दस उपनिषद ब्राह्मण ग्रन्थों से लिए गये हैं कुछ आरण्यक ग्रन्थों से भी. विद्या, अविद्या, आनंद और तुरीय में अविद्या को छोड़कर तीन अमृत स्वरूप हैं. आत्मा का स्वरूप आनंद है, उसका गुण ज्ञान अथवा विद्या है, वह अविनाशी है. जो सदा एक रूप में न रहे वह अविद्या है. देह निरंतर बदल रही है. जब कोई पदार्थ किसी विशेष गुण में प्रकट हो जाये तो वह विवर्त कहलाता है. माया, कला अथवा अविद्या परमात्मा का विवर्त है. ब्रह्म का एक चरण विश्व के रूप में प्रकट हुआ है, उसके तीन चरण अमृतमय हैं.  

आज मौसम सुहाना है, वर्षा रात भर होती रही. सुबह वे छाता लेकर टहलने गये. जून को डाक्टर ने एक घंटा टहलने के लिए कहा है, इससे उनका स्वास्थ्य भी सुधर रहा है. उन्होंने विटामिन डी व थायराइड का परीक्षण भी कराया है, रिपोर्ट अगले हफ्ते मिलेगी. सभी प्राणी स्वयं को केवल अन्नमय कोश के रूप में जानते हैं. इस तरह तो वे भोजन पचाने का एक उद्योग मात्र ही तो हैं. वे अन्न पर निर्भर हैं पर केवल अन्नमयकोश ही नहीं हैं, वे देह से परे एक ऊर्जा भी हैं, जो स्वयं में पूर्ण है. कल रात स्वप्न में अपने पीले कुरते में उसने एक सैनिक का अवशेष ले जाते हुए देखा, सूखा हुआ. एक दुर्घटना भी देखी, लोगों को घायल अवस्था में देखकर भी वे निर्लिप्त भाव से आगे बढ़ जाते हैं. पर स्वप्न में भी यह ख्याल आया, देखो, वे उनकी मदद नहीं कर रहे हैं. पिछले दो दिन फिर पूर्ण शुद्धि नहीं हुई. देह भारी हो तो मन भ्रमित हो जाता है.

कल मृणाल ज्योति की मीटिंग थी, दस में से केवल चार ही जन थे. इसका कारण वहाँ के दो नये कर्मचारियों की अपेक्षाएं थीं, उनकी मांग थी. कितना सही है, अपेक्षाएं आनंद को घटा देती हैं. उसे भी कुछ कार्य करने हैं. शिक्षक दिवस पर एक प्रेरणात्मक वर्कशॉप करनी है. स्कूल में हर हफ्ते जाना है. आज ध्यान के बाद हाथों में एक अनोखी ऊर्जा का अहसास हो रहा है. उस एक ने उसके हृदय पर अपना अधिकार कर लिया है. धी, धृति, स्मृति में वही समा गया है. जून ने कहा है वह कंपनी में कार्यरत दिव्यांग जनों की सूची दिला सकते हैं तथा स्कूल के पानी का परीक्षण भी करवा सकते हैं. ये दोनो बातें कल मीटिंग में उठी थीं. जून भी मृणाल ज्योति के आजीवन सदस्य बने हैं. इस माह उसका जन्मदिन है उसने सोचा क्यों न इस बार सर्वेंट लाइन के बच्चों व उनकी माओं को भी पार्टी दे.


Monday, October 15, 2018

लहर और बादल



आठ बजने को हैं. आज भी मौसम ठंडा ही रहा. बदली बनी रही. वे अभी-अभी बाहर टहल कर आये हैं. आकश पर सफेद बादलों के मध्य पूर्णिमा से एक दिन पूर्व का सुंदर चाँद चमक रहा था. कल यहाँ लक्ष्मी पूजा का उत्सव है, उत्तर भारत में दीपावली के दिन यह उत्सव होता है. यहाँ उस दिन काली की पूजा होती है. सुबह वह मृणाल ज्योति गयी, चाइल्ड प्रोटेक्शन कमेटी की मीटिंग थी. बच्चों द्वारा रंगे कुछ सुंदर दीए खरीदे. कम्प्यूटर ठीक हो गया है, ब्लॉग पर नई पोस्ट प्रकाशित की. कल सुबह डिब्रूगढ़ डाक्टर के पास जाना है, जून के घुटने में दर्द है.
शनिवार व इतवार कैसे बीत गये पता ही नहीं चला. इस समय शाम के चार बजे हैं. जून एक दिन के लिए आज देहली गये हैं, देर शाम तक पहुंचेंगे, परसों लौटेंगे. परसों शाम उन्होंने यूरोप के सभी चित्र टीवी की बड़ी स्क्रीन पर दिखाए, भव्य इमारतें और सुंदर बगीचे. कल शाम को वह थोड़ा परेशान हो गये थे जब उसने कहा कि काजीरंगा जाने का समय वह केवल अपने लिए तय कर सकते हैं, अन्यों के लिए नहीं. बाद में उसे समझ में आ गया कि अपने-अपने संस्कारों के वशीभूत होकर वे क्रिया-प्रतिक्रिया करते हैं. उसके बाद उनके मध्य पुनः सकारात्मक ऊर्जा बहने लगी. ऊर्जा का आदान-प्रदान सहज होता रहे, यही तो साधना है. सुबह वे घर में ही कुछ देर टहले, डाक्टर ने उन्हें दो दिन आराम करने को कहा है, आज वह अपना घुटना आराम से मोड़ पा रहे थे. उनकी कम्पनी और आधुनिक चिकित्सा विज्ञान कितना सहायक सिद्ध हुआ है, उसका मन कृतज्ञता से भर गया. कुछ देर पहले मृणाल ज्योति से ईमेल आया, टीचर्स की जानकारी थी. अब वे उनके लिए भली-प्रकार योजना बना सकते हैं. वे इस समय जहाँ खड़े हैं, वहाँ से उन्हें आगे लेकर जाना है. उसने क्लब की एक परिचित सदस्या को, जो असमिया लेखिका भी है, प्रेरणात्मक वक्तृता के लिए कहा है.
आज सुबह वह उठी तो आँखें खुलना ही नहीं चाहती थीं, कुछ देर के लिए ऐसे ही बैठ गयी, बाद में सुदर्शन क्रिया करते समय भी अनोखा अनुभव हुआ. शांति की अनुभूति इतनी स्पष्ट पहले कभी नहीं हुई थी. वह इस देह के भीतर प्रकाश रूप से रहने वाली एक ऊर्जा है जिसके पास तीन शक्तियाँ हैं, मन रूप से इच्छा शक्ति, बुद्धि रूप से ज्ञान शक्ति तथा संस्कार रूप से कर्म करने की शक्ति. यदि ज्ञान शुद्ध होगा, तो इच्छा भी शुद्ध जगेगी, और उसके अनुरूप कर्म भी पवित्र होंगे. उनके पूर्व के संस्कार जब जगते हैं और बुद्धि को ढक लेते हैं तब मन उनके अनुसार ही इच्छा करने लगता है. हर संस्कार भीतर एक संवेदना को जगाता है, उस संवेदना के आधार पर उनका मन विचार करता है. यदि संवेदना सुखद है तो वह उस वस्तु की मांग करने लगता है, यदि दुखद है तो द्वेष भाव जगाकर विपरीत विचार करता है. अपने संस्कारों के प्रति सजग होना होगा तथा नये संस्कार बनाते समय भी जागरूक होना होगा. वे स्वयं ही अपने भाग्य के निर्माता हैं. वह ऊर्जा ही इस देह पुरी का शासन करने वाली देवी है, उसे स्वयं में संतुष्ट रहकर इस जगत में परमात्मा की दिव्य शक्ति को लुटाना है.
आज स्कूल जाने के लिए तैयार हुई पर ‘बंद’ के कारण नहीं जा सकी, बच्चे शायद उसकी प्रतीक्षा करते होंगे, सोचकर एक पल के लिए मन कैसा तो हो गया पर ज्ञान की एक पंक्ति पढ़ते ही स्मृति आ गयी और शांति का अनुभव हुआ. वे स्वयं को ही भूल जाते हैं और व्यर्थ के जंजाल में पड़ जाते हैं. जीवन उनके चारों और बिखरा है और वे उसे शब्दों में ढूँढ़ते हैं. करने को कितना कुछ है, दीपावली का उत्सव आने वाला है, एक सुंदर सी कविता लिखनी है.

सागर की गहराई में शांति है,
अचल स्थिरता है, हलचल नहीं..
लहरें जो निरंतर टकराती हैं तटों से,
उपजी हैं उसी शांति से..
भीतर उतरना होगा मन सागर के
आकाश की नीलिमा में भी बादल गरजते है,
टकराते हैं, उमड़ते-घुमड़ते आते हैं और खो जाते हैं !
आकाश बना रहता है अलिप्त.
पहचानना है लहर और बादल की तरह मन के द्वन्द्वों को
जो जीवन का पाठ पढ़ाते हैं.
लहर और बादल को मिटने का दर्द भी सहना होगा
अवसर में बदलना होगा चुनौतियों को
और पाना होगा लक्ष्य-शाश्वत सत्य !   

Thursday, September 27, 2018

महालया अमावस्या


आज महालया है. नवरात्रि का समय संधिकाल है, संधि बेला है. ग्रीष्म खत्म होने को है सर्दियां शुरू होने को हैं. गुरूजी कह रहे हैं, इन दिनों में यदि कोई श्रद्धा से उपासना करेगा, तो गहन तृप्ति के रूप में उसका लाभ उसे अवश्य मिलेगा. इष्ट के प्रति एकनिष्ठ होकर यदि कोई नवरात्रि का अनुष्ठान करता है, भोजन को प्रसाद मानकर ग्रहण करता है, तब सहज आनंद के रूप में उसे पूजन का लाभ मिलेगा. मानव की देह मिली है तो उसका पूर्णलाभ लेना होगा. भावना और श्रद्धापूर्वक किया गया नवरात्रि पूजन उन्हें तृप्त कर देता है. साधक को ज्ञान प्राप्त करना है फिर सब कुछ छोड़कर शरण में आ जाना है.
आज प्रथम नवरात्र है. मन में एक विचित्र शांति का अनुभव हो रहा है. मन जैसे पिघलना चाहता है. अस्तित्त्व के चरणों में बह जाना चाहता है. परमात्मा इतना उदार है और अपार है उसकी कृपा..उसके प्रति प्रेम की हल्की सी किरण भी सूरज की खबर ले आती है एक न एक दिन.
आज मौसम गर्म है. नैनी घर की सफाई में लगी है, अभी यह हफ्ता लगेगा पूरा घर साफ होने में. आज तीसरा नवरात्र है. दोपहर को अयोध्या काण्ड में आगे लिखना आरम्भ किया पर पूरा नहीं किया. कुछ देर पतंजलि योग सूत्र पर एक सखी से कल लाई किताब पढ़ी. जून की यूरोप से लायी काफी पी.
जीवन को सुंदर बनाने के लिए दो वस्तुओं की आवश्यकता होती है. ज्ञान तथा ऊर्जा, इसीलिए वे शिव और शक्ति दोनों की आराधना करते हैं. दुर्गापूजा के नौ दिनों में प्रथम तीन दिनों में काली की पूजा होती है, जो तमोगुण का प्रतीक है, फिर अगले तीन दिन लक्ष्मी की तथा अंत में सरस्वती की, जो रज तथा सत गुण की प्रतीक हैं. उनके भीतर की ऊर्जा तीनों गुणों से प्रभावित होती है ! कभी वे तमोगुण के शिकार हो जाते हैं, तो कभी सतो या रजोगुण से. ज्ञान की देवी सरस्वती की कृपा तभी होगी जब तमोगुण से मुक्त होकर वे क्रियाशील बनते हैं, सौन्दर्य का सृजन करते हैं. अस्तित्त्व प्रतिपल अपना सौन्दर्य लुटा रहा है, वही सृजन उसका ज्ञान है, ज्ञान से ही प्रकटा है और ज्ञान इसके बाद भी अक्ष्क्षुण है. जड़ता को हटाकर क्रियाशील होने के बाद जो विश्रांति का अनुभव होता है, वही तृप्त करने वाला है !
आज स्कूल जाना है. ग्रैंड पेरेंट्स डे पर कुछ बातें जो उस दिन लिखी थीं, उनके साथ बांटने के लिए. बातें जो वे सब जानते हैं पर समय आने पर याद नहीं रहतीं. दादा-दादी के महत्व को कौन नकार सकता है एक बच्चे के जीवन में, पर यह बात माता-पिता को समझ में नहीं आती. उन्हें लगता है बच्चे पर पूर्ण रूप से उनका ही अधिकार है और उसकी परवरिश से जुड़ा हर फैसला केवल वे ही ले सकते हैं. जब समझ आती है तब बहुत देर हो चुकी होती है. जिसकी बुद्धि खुल गयी है, जो सभी को अपना अंश मानता है, वह तो प्रेम के किसी भी रूप का सम्मान करेगा. प्रेम बाँटने और और प्रेम स्वीकारने में कंजूसी करते हैं जो, वे उस महान प्रेम को महसूस नहीं कर पाएंगे. माता-पिता के प्रति कृतज्ञता जब तक भीतर महसूस नहीं होगी, तब तक उनके स्नेह की धारा में वे भीग नहीं सकते. जीवन उन्हें चारों और से पोषित करना चाहता है. उनके पूर्वजों का रक्त उनके भीतर बह रहा है. वे बहुत संकुचित दृष्टिकोण रखते हैं और तात्कालिक हानि-लाभ को देखते हैं, अपने अतीत और भविष्य की तरफ जिसकी नजर होगी, वह पूर्वजों का सम्मान करेगा. आज की उसकी वक्तृता यकीनन दिल से ही बोली जाएगी. कागज पर लिखा वहीं का वहीं रह जायेगा.

Tuesday, September 25, 2018

जय हनुमान ज्ञान गुणसागर



शाम के पांच बजे हैं. सुबह सवा ग्यारह बजे नींद छाने लगी, कुछ देर सोयी. दोपहर बाद बैठे-बैठे कमर में दर्द सा महसूस हुआ. मकर आसन में लेटकर एक सखी से फोन पर कुछ देर बातचीत की और दर्द गायब, प्रकृति सारे उत्तर अपने भीतर ही छिपाए है. सखी ने बताया, उसकी बाहरवीं में पढ़ने वाली बेटी को वह अगले वर्ष हॉस्टेल में रखकर पढ़ाना चाहते हैं वे लोग, पर वह घर पर रहकर पढ़ना चाहती है. कल छोटी भांजी का जन्मदिन है, कविता लिख कर भेजी है उसके लिए. जून का फोन आया, उसके लिए नया सूटकेस खरीदा है, पुराना निकाल देना चाहिए. दीवाली की सफाई भी शुरू करनी है परसों से. सुबह भ्रमण के लिए गयी तो भीतर वाले की बात सुनी. अब कुछ भी याद नहीं है. परमात्मा बहुत धीरे बोलता है, उन्हें चुप होकर उसे सुनना है. उसका साथ शक्ति से भर देता है, उससे योग लगाकर वे प्रेम, शांति और आनन्द का अनुभव करते हैं. उस शक्ति और ज्ञान का उपयोग फिर जगत में करना है, जो भी मिले उसे शुभ भावनाएं देकर.. उसके प्रति शुभकामना हृदय में भरकर ! यदि कोई आत्मस्थ रहे तो सहज ही उससे शुभ तरंगें निकलेंगी. उनके हाथों से से निरंतर ऊर्जा प्रवाहित हो तरही है, यदि मन शांत होगा स्थिर होगा तो प्रेम की तरंगें प्रवाहित होंगी वरना..
आज सुबह कितनी अनोखी थी, ठीक चार बजे थे, एक आवाज आई जो किट से मिलती-जुलती थी, फिर भीतर शब्द कौंधा, हनुमान या अनंत..या ऐसा ही कुछ, हनुमान तो स्पष्ट था. एक अद्भुत भावना से तन-मन स्पन्दित हो गया. हनुमान रामभक्त हैं तथा राम के भक्तों की सहायता करते हैं, एक सखी का स्मरण हो आया, उसने कहा था, वह हनुमान को मानती है और हनुमान चालीसा का पाठ करती है, उस समय उसे कहा था, भगवद गीता भी पढ़ा करो, हनुमान चालीसा तो ठीक है. मुरारी बापू का भी स्मरण हो आया, वह अपनी कथा के आयोजन में हनुमान का विशाल चित्र लगते हैं, राम का नहीं. परमात्मा कितने-कितने उपायों से उन्हें जगाने आता है, वह उन्हें प्रेम करता है. आज स्कूल में हनुमान आसन कराया बाद में ध्यान भी. वापस आकर दो नई पोस्ट लिखीं. भीतर कोई प्रेरणा दे रहा था जैसे. जून लौट आये हैं, उनका स्वास्थ्य अभी भी पूर्ण रूप से ठीक नहीं हुआ है, काम बढ़ गया है, अपने लिए बिलकुल समय नहीं निकाल पाते. शाम को महिला क्लब की मीटिंग है. अभी एक घंटा ध्यान करना है और स्वयं को ऊर्जा से भरना है.

आज सुबह उठने से पूर्व आज्ञा चक्र पर ज्योति दिखाई दी, जलती हुई लौ, परमात्मा हर रोज कोई न कोई उपहार देकर उठाता है. वह उनके सच्चा सुहृद है, सच्चा मीत है. आज आयल के अस्पताल की तरफ से आयोजित वाकाथन में गयी. हर समय कोई न कोई सुगंध साथ रहती है, कभी जाने-पहचानी कभी नामालूम सी सी कोई खुशबू...परमात्मा एक रहस्य है और जो उसे प्रेम करे, उसे भी एक रहस्य बना देता है. आज ओशो का विज्ञान भैरव से लिया एक ध्यान किया. किसी वस्तु को प्रेम से देखो और उस वस्तु में ही सत्य की झलक मिलती है. वे कहने को तो स्वयं से प्रेम करते हैं पर अपनी देह के साथ कितनी नाइंसाफी करते हैं. न खाने योग्य पदार्थ खाकर वे उसे सताते हैं. देह की हर कोशिका एक प्रेम भरी दृष्टि की प्रतीक्षा में है. उनका मन भी विश्राम चाहता है, पर वे किसी न किस उधेड़बुन में उसे लगाये रखते हैं. चौबीस घंटे धडकता हुआ उनका हृदय भी सुकून ही तो चाहता है. पेट की मांग है, शीतलता, वह मिर्च-मसालों से जल रहा है. प्रेम की धार यदि निरंतर बहनी हो तो चाह के पत्थर मार्ग से हटाने होंगे.

Thursday, September 6, 2018

मुरली की धुन



अगस्त आरम्भ हुए तीन दिन बीत गये और डायरी खोले पांच दिन. पिछले दिनों ऐसी व्यस्तता रही कि कलम कहाँ पड़ी है, इसका भी ख्याल नहीं आया. उस दिन कमेटी मीटिंग में जो भोजन परोसा गया उसे किसी भी तरह स्वास्थ्यवर्धक नहीं कह सकते. घर आकर रस्क, दूध व आम खाए जो जून ने शीघ्रता से लाकर  दिये. अगले दिन विशेष बच्चों के स्कूल गयी, बारह बजे लौटी, तीन बजे से कुछ पहले वे तिनसुकिया गये, लौटे तो शाम को जून के एक मित्र सहकर्मी के जन्मदिन की पार्टी में चले गये. अगला दिन रविवार का था. उसी रात को आर्ट ऑफ़ लिविंग के एक टीचर का फोन आया. रूद्र पूजा के लिए एक स्वामी जी तिनसुकिया आ गये हैं तथा सोमवार की रात्रि उनके यहाँ आयेंगे. सोम की सुबह स्कूल जाना था, दोपहर को मेहमान कक्ष साफ करवाया. एक घंटा राखियाँ बनाने में लगाया. मंगल व बुध स्वामी जी रहे. पूजा में शामिल होने सेंटर भी गयी. आज सुबह वह चले गये सो इस तरह आज समय मिला है डायरी खोलने का. शाम को योग सत्र में आठ-दस महिलाएं आ रही हैं, अच्छा लगता है समूह में साधना करना. कल दोपहर महिला क्लब में सिलाई कला से जुड़े एक प्रोजेक्ट का कार्यक्रम भी है. ‘एक जीवन एक कहानी’ में आजकल जून की पिछली अस्वस्थता का जिक्र आ रहा है, आजकल उनके घुटने का दर्द कम हुआ है.

आज टीवी पर मुरली सुनी, कृष्ण की मुरली नहीं, वह तो तब सुनी थी जब एओएल के कोर्स में वह अनुभव हुआ था और नियमित ध्यान करना आरम्भ किया था. यह मुरली तो एक ब्रह्मकुमारी द्वारा पढ़ी गयी थी. उसके अनुसार वह आत्मा है, जो परमधाम से अवतरित हुई है और विश्व के लिए कल्याणकारी है. यह स्मृति उन्हें सदा सजग बनाये रखेगी और सर्व शक्तियों का स्फुरण स्वतः ही होता रहेगा. उन्हें चलते-फिरते प्रकाश स्रोत बनकर सेवा करनी है, कितना उच्च भाव है यह. गुरूजी भी कहते हैं, वे सब ऊर्जा का केंद्र हैं, अग्नि स्वरूप हैं. परमात्मा के ज्ञान और प्रेम के वे अधिकारी हैं. वे उस राजा के बच्चे हैं, उसके दिल के तख्त पर आसीन रहते हैं. उस तख्त से नीचे नहीं उतरना है उन्हें. स्वयं को चुम्बक जैसा बनाना है ताकि शांति और प्रेम की तरंगे फैलने लगें. जैसे जल से तृषा बुझती है, वैसे आत्मा के लिए शांति और प्रेम ही जल है जिससे उसकी तृषा बुझ सकती है. वे यदि शांति और प्रेम में टिक जाएँ तो किरणें अपने आप ही प्रसरित होने लगेंगी. स्वयं यदि कोई तृप्त है तो सम्पर्क में आने वाले भी तृप्ति का अनुभव करेंगे. याद की यात्रा में निरंतर रहना है उन्हें. निरन्तरता ही चाहिए. शक्तिशाली संकल्प द्वारा भी उन्हें सेवा का कार्य करना है. परमात्मा चाहते हैं आत्मा उनके जैसी हो जाये. दोनों का लक्ष्य एकत्व ही है.

यह समय सुनने का समय है. प्रकृति पुकार रही है, आये दिन की प्राकृतिक आपदाएं यही तो बता रही हैं. व्यक्ति पुकार रहे हैं. यह पुकार सुनने में नहीं आती क्योंकि वे छोटी-छोटी बातों में लगे हैं. आत्म स्मृति में रहकर ही उनकी उन्नति हो सकती है, इससे उनकी ऊर्जा का सदुपयोग होने लगता है. परमात्मा से कैसे मिलें इस प्रतीक्षा काल को भूलकर अब तो उसे अपने सम्मुख पाना है. जैसे गुलाब के साथ कांटा होता है वैसे ही ये तकलीफें परमात्मा के और निकट जाने का साधन ही बनती हैं.

Friday, June 8, 2018

इमर्सन के अनमोल वचन


कल कुछ नहीं लिखा, दोपहर को जून चेन्नई के लिए रवाना हो गये, उसके बाद सिर में दर्द के कारण सो गयी, उठी तो तीन बजे थे, भूख तब भी नहीं लगी थी. रात्रि को योग कक्षा के बाद ही भोजन किया. पित्त बढ़ने के कारण ही ऐसा हुआ होगा. नींद से उठाने के लिए एक स्वप्न आया, महिला क्लब की मीटिंग उनके यहाँ है, पर उसने उनके लिए भोजन आदि की कोई व्यवस्था नहीं की है. उसी स्वप्न में माँ-पिताजी को भी देखा. बाद में पिताजी से फोन पर बात की, वह अपने भोजन के लिए कहने दुकान पर गये थे, होटल वाला सुबह शाम घर पर ही टिफिन दे जायेगा. भाभी कुछ दिनों के लिए मायके गयी हैं, उनकी माँ का स्वास्थ्य ठीक नहीं है. वह बड़ी बेटी हैं और अपनी जिम्मेदारी बखूबी निभा रही हैं

आज सुबह स्कूल गयी, खड़े होकर करने वाला ध्यान कराया, अच्छा रहा. उसका मौन ही उन्हें कुछ दे सकता है, उसके भीतर का मौन ! ध्यान साक्षी में टिकना ही है. भीतर जो सन्नाटा है, स्थिरता है, एकरसता है, वही साक्षी है. जो सबकुछ देखता रहता है, पर अचल रहता है. आज सिर में दर्द नहीं है, यह भी वह देख रहा है, दर्द के कारण भीतर गहराई में जाने का अवसर मिला. पुराने संस्कार से मुक्ति का अवसर भी मिला. सद्गुरू से वार्तालाप करने का भी ! शाम को एक घंटा कैसे बीता, पता ही नहीं चला. ज्ञान के पथ पर चलना सचमुच तलवार की धार पर चलने जैसा है, पर एक बार जिसे साक्षी में टिकना आ जाये, उसके लिए यह श्वास लेने जितना सहज है.

शाम के पौने छह बजने को हैं, कुछ देर पहले लाइब्रेरी से पुस्तकें लेने गयी, आज शुक्रवार है, सो लाइब्रेरी बंद थी. जून वापस आकर क्लब में चल रही एक सरकारी मीटिंग में चले गये हैं. ढेर सारे फल लाये हैं और मेवे भी, कई तरह की चाय भी. आज सुबह ध्यान में एक दृश्य देखा, प्लेट में चाय डालकर कोई दे रहा है. बचपन में सुबह का नाश्ता होता था चाय के साथ तिकोना परांठा. तब से कितने गहरे संस्कार मन पर पड़ गये हैं, पर इनसे मुक्त होना ही है. इस समय कितनी शांति प्रतीत हो रही है. जब कोई इच्छा नहीं रह जाती, तब ऊर्जा स्वयं पर लौट आती है. स्वयं से मिलन होता है और तब परमात्मा के सम्मुख जाने लायक वे होते हैं. आज भी पिताजी से बात की, उन्होंने कहा, ओशो की एक किताब में पढ़ा, अंग्रेजी के लेखक इमर्सन ने कहा है, शिक्षा का अर्थ शाब्दिक ज्ञान नहीं है, वह ज्ञान जो व्यक्त्तित्व से झलकता है, वही शिक्षा है. जो किसी के होने मात्र से झलकती है, व्यवहार से झलकती है, वही शिक्षा है. आत्मा के बारे में कोई कितना भी ज्ञान सुन-पढ़ ले, जब तक निरंतर आत्मा में स्थिति नहीं हो जाती, तब तक लक्ष्य से दूरी बनी ही हुई है.

साढ़े नौ बजे हैं रात्रि के, जून अभी तक क्लब से नहीं आये हैं, दस बजे तक आयेंगे सम्भवतः. मन आज कितना हल्का है, जैसे हो ही न. शाम को लाइब्रेरी से हिंदी की दो किताबें लायी, निराला की कहानियाँ और बच्चन की कविताएँ. सेक्रेटरी का फोन आया, कल मीटिंग है और कल ही शाम को क्लब में ‘’नीरजा’ फिल्म है. नन्हे से बात की, वह घर का काम करवा रहा है, काफी कुछ खराब था, विशेष तौर से नल आदि, जो बदलवाने पड़े हैं, इसी माह में वह शिफ्ट हो जायेगा. सुबह घर का साप्ताहिक सफाई का दिन था, हीटर व ब्लोअर अब पैक करके रख दिए हैं, रजाई भी वापस अपने स्थान पर चली गयी है. कल फरवरी का अंतिम दिन है. आज इस मौसम में पहली बार सुबह से स्वेटर नहीं पहना है. आम के पेड़ पर बौर आ गया है और कंचन भी खिल गया है, हालाँकि बहुत अधिक फूल अभी नहीं आये हैं. मालिन ने बताया, माली सुबह से पीकर पड़ा है, दोपहर को उसने भोजन भी नहीं किया. आदमी कितना बेसमझ है, कितना दुखी भी, अपने ही पैरों पर कुल्हाड़ी मारता है. आज कई दिनों के अख़बार खंगाले. उनके अनुसार देश के हालात कुछ ठीक नजर नहीं आते. देशभक्ति के नाम पर कुछ लोग बवाल कर रहे हैं और कुछ लोग देशद्रोह को अपना रहे हैं. समाज में एकरसता की जो धारा थी वह सूखती जा रही है. भारत को जोड़ने वाला जो एक सूत्र था वह कहीं खो गया सा लगता है !  


Wednesday, February 28, 2018

योग का योगदान



अक्तूबर आरम्भ हुए चार दिन हो गये, आज पहली बार डायरी खोली है. योग की दो कक्षाएं हो चुकी हैं. तीसरी सम्भवतः परसों सुबह होगी. कल शाम शायद क्लब में पार्टी है, सो हॉल नहीं मिलेगा, ऐसा संयोजिका ने कहा, इस ‘शायद’ का अर्थ वही जानती है. गुरूजी कहते हैं, इस दुनिया में हर तरह के लोग होते हैं, सच्चे, कच्चे व..ज्ञानी सभी को साक्षी भाव से देखता है, व मस्त रहता है. सामाजिक क्षेत्र में कदम रखने पर इन सबका सामना तो करना ही होगा. बच्चों को योग सिखाना कितना सहज है, कितने मासूम होते हैं वे ! आज सुबह स्कूल में सिखाते वक्त तितली के रूप में अस्तित्त्व फिर आया, वह तो यूँ भी हर क्षण, हर पल साथ ही है. उसके ही नहीं, सबके साथ, वे सजग रहें तो उसका अनुभव सहज ही होता है. असजग होते ही भीतर स्वप्न चलने लगता है, ऊर्जा व्यर्थ चली जाती है. कुछ भी हाथ नहीं आता. वह परमात्मा अकारण ही दयालु है. प्रेम उसका स्वभाव है, शांति उसका वस्त्र है, ज्ञान और शक्ति के रूप में वह परिपूर्ण है. सुख और पवित्रता उसके भीतर रचे-बसे हैं. वह पतितपावन है. उसमें रहकर वे भी पवित्र हो जाते हैं. जीवन कितना अनमोल है यदि उसका साथ हो, अन्यथा एक बोझ..ईश्वर उन सभी को सद्बुद्धि दे जो उससे विमुख हैं और दुखपूर्ण हैं..ग्यारह बजने को हैं, कुछ देर में जून आने वाले हैं, उनका जीवन भी समृद्धि की ओर जा रहा है. उन्हें तरक्की मिली है. कुछ ही  दिनों में एसी कार भी मिल जाएगी.

कल दिन भर व्यस्तता रही. शाम को क्लब गयी. आज भी दो मीटिंग्स हैं. पहली मृणाल ज्योति में विश्व विकलांग दिवस के लिए और दूसरी महिला क्लब की. आज सुबह योग कक्षा में दो महिलाएं ही  उपस्थित थीं. कल व परसों उन्हें घर पर आने को ही कहा है. मन कैसी शांति का अनुभव कर रहा है, किसी को कुछ देने के बाद मन कैसा तृप्त हो जाता है. परमात्मा ही बंटता है जैसे..ऊर्जा ही तो बंटती है. आज योगनिद्रा का अभ्यास कराया, यकीनन उन्हें अच्छा लगा होगा. कुछ देर पहले असमिया सखी से बात की, आवाज से लगा वह काफी परेशान है. स्वास्थ्य ठीक न रहे तो व्यक्ति का जीवन एक भार बन जाता है, लेकिन उन्हें अपने जीवन को सुंदर बनाने का प्रयत्न प्रतिपल करना है. ईश्वर का अनुग्रह तो बरस ही रहा है.  
कल की दोनों मीटिंग्स अच्छी रहीं और अच्छा रहा आज का योग अभ्यास भी. आज चार लोग आये थे. सुबह उठी तो गला कुछ खराब लग रहा था. कल शाम को तली हुई कुछ वस्तुएं खायीं, फिर वापस आकर ठंडा पानी पिया, शायद इसी कारण. उपाय आरम्भ कर दिये हैं. तीर टोपी ही लेकर जायेगा, गर्दन नहीं. आज एकादशी है, भोजन भी हल्का रहेगा. कल क्लब में ‘सेल’ है, सुबह नौ बजे ही उन्हें जाना है. आज संध्या भी तैयारी हेतु जाना होगा. विश्व विकलांग दिवस पर एक लेख लिखना है, जो एक बुलेटिन में छपेगा, जिसका भार उसे सौंपा गया है. बुलेटिन में अन्य लेखों के लिए आग्रह पत्र भी लिखकर भेजने हैं. जब कोई किसी काम को करने में सक्षम  होता है, तभी अस्तित्त्व उसे उस काम के लिए चुनता है.

कल का आयोजन भी हो गया. उसने भी काफी कुछ खरीदारी की. अब दिसम्बर में उन्हें पुनः एक सेल आयोजित करनी है. आज सप्ताहांत है, सुबह घर की साप्ताहिक विशेष सफाई भी हुई और तन की भी, मन की तो हर क्षण  होती है, जब चाहा अमनी भाव में चले गये, वही उसकी सफाई है. अब परमात्मा और संसार दो नहीं रह गये हैं, एक ही है सब. जून विशेष साप्ताहिक खरीदारी करने बाजार गये हैं. नैनी की छोटी बिटिया का जन्मदिन है, उसके लिए उपहार भी लायेंगे. मृणाल ज्योति की मीटिंग कल होगी, इतवार को वह व्यस्त रहती है, एक व्यस्तता और सही. जिसे स्वयं के लिए कुछ नहीं चाहिए उसका सारा समय संसार के लिए या भगवान के लिए. एक सखी के परिवार के किसी सदस्य ने एक बंगाली लघु फिल्म बनाई है, अच्छी लगी. बताया गया है, परिवार में संस्कार कैसे एक पीढ़ी से दूसरी में जाते हैं. उसके भीतर जो ऊर्जा थी वही नन्हे को मिली है, साहसी है वह भी और उसे भी अपनी ऊर्जा को सकारात्मक बनाना होगा, समय ही सिखाएगा उसे ! महिला क्लब की प्रेसीडेंट का विदाई दिन भी नजदीक आ रहा है, उनसे मिलकर कुछ जानकारी लेनी है. वह एक बेबाक, खरी-खरी सुना देने वाली महिला हैं. रोबदार बुलंद आवाज है उनकी, अपने रुतबे का लाभ उठाती हैं और मस्त रहती हैं !



Wednesday, July 12, 2017

किताबों वाला घर


जून का महीना भी कल आरम्भ हो गया. मौसम काफी गर्म है. आज स्कूल गयी थी, करेंट नहीं था, बच्चों को पसीना बहाते हुए व्यायाम/आसन कराए. छोटे बच्चे बहुत आनंद लेते हैं. एओल की टीचर का फोन आया, वह कल से आने वाली थीं, पर अब लडकियों को वहीं बुलाया है. कल से वे जाएँगी. शाम के सवा चार बजे हैं, बाहर धूप इतनी तेज है जैसे भरी दोपहर हो. ब्लॉग पर उसकी कहानी अब अध्यात्म की ओर बढ़ रही है. एक वर्ष पहले से ही भूमिका बननी शुरू हो गयी थी, तभी क्रिया के दौरान वह अनुभव हुआ. सद्गुरू तक उसकी प्रार्थना पहुंच ही गयी थी. कितना विचित्र है परमात्मा का यह चक्र, यह व्यवस्था कितनी अबूझ है. वह परम कितना दूर है पर कितना निकट...जीवन कितना अद्भुत है, यदि वे जाग जाएँ तो हर पल उसकी उपस्थिति का अनुभव कर सकते हैं. स्वप्न की धारा जो भीतर चलती रहती है, जिसने उनकी नींद को भी निर्दोष नहीं रहने दिया और उनके जागरण को भी, उसे रोकना ही साधना का लक्ष्य है. वह धारा उनके नियन्त्रण से बाहर हो गयी है क्योंकि वे इतने कमजोर हो गये हैं. पहले उन्हें जानना होगा किस तरह वे मन से पृथक हैं, जैसे आकाश बादलों के पार है, वैसे ही वे भी मन के पार हैं. स्वयं के मुक्त स्थान में स्थित होते ही वे मन के पार चले जाते हैं. जब वे उस स्रोत से जुड़ जाते हैं, उत्साह से भर जाते हैं, ऊर्जा से भर जाते हैं. उन्हें परमात्मा से जुड़कर पहले शक्तिशाली बनना है फिर इस धारा पर उनका नियन्त्रण होगा !

वही दोपहर की बेला है, पंछियों की आवाज के अतिरिक्त मौन की गूंज ही है जो सुनाई दे रही है. दोनों बहनें सो रही हैं, वे आज सुबह योग की कक्षा में गयी थीं, पहला दिन था, उन्हें आनंद नहीं आया. बच्चे तो बच्चे ही हैं, अब कल वे जाएँगी या नहीं, यह उन पर निर्भर करता है. आज सुबह भीतर जो भय जगा लेडीज क्लब के दफ्तर में चल रहे खिडकियों पर जाली लगाने वाले काम को लेकर, क्रोध के रूप में प्रकट हुआ नैनी की एक भूल के कारण उसके ऊपर, जो आज अचानक ही जल्दी आ गयी थी. एक ही ऊर्जा तो विभिन्न रूपों में प्रकट होती है. सुबह ध्यान किया, केवल शुद्ध चेतना में रहने का अभ्यास, स्वप्न की जो श्रृंखला जो भीतर चलती रहती थी अब खंडित होने लगी है, विचार वे स्वयं ही बनाते हैं और स्वयं ही उनसे पीड़ित होते हैं, सुबह इसका कितना स्पष्ट अनुभव हुआ. परमात्मा कितनी कृपा करता है जो पहले उन्हें प्रेम से भर देता है, वे तो उसे बाद में प्रेम कर पाते हैं. सद्गुरू को आज टीवी पर देखा, fb पर रोज ही देखती है. आज शाम उन्हें क्लब ले जाना है, आज क्लब का स्थापना दिवस है.

टीवी पर आज गुरूजी अपने कार्य के आरम्भिक दिनों के बारे में बता रहे हैं. हर इन्सान को अपना मार्ग स्वयं चुनना होता है और यदि वह सच्चे हृदय से प्रार्थना करे तो ईश्वर स्वयं उसका मार्ग प्रशस्त करते हैं. उन्हें अपने सीमित दायरे से बाहर निकल कर ही कुछ करना होता है. आज उसे क्लब की कुछ सदस्याओं के साथ मोरान ब्लाइंड स्कूल जाना है. सेक्रेटरी का फोन आया, उनके साथ इस वर्ष उसकी कई यात्रायें हो रही हैं, कितना कुछ सीखने को भी मिला है.

आज नन्हे के बचपन के मित्र, असमिया सखी के पुत्र का जन्मदिन था, उसने फोन किया. एक अन्य सखी से बात हुई, उन्होंने पोहा बनाने का अच्छा तरीका बताया, भांजियों ने वैसा ही बनाया. दोनों निकट ही बंगाली की दुकान पर भी गयीं, फल खरीदे और अपने लिए मैगी भी. दोनों बहुत शांत व समझदार हैं, अपने काम से काम रखने वालीं. क्लब की एक सदस्या सदा के लिए जा रही हैं, उनके पति रिटायर हो गये हैं, किताबों से भरा था उनका घर, ड्राइंग रूम में बड़ी सी आलमारी तो भरी ही थी, छोटी-छोटी शेल्फ पर भी ढेरों किताबें सजी थीं. उनके पति लेखक हैं, वे स्वयं भी लिखती हैं. वर्षों से बच्चों के लिए एक सांस्कृतिक विद्यालय चला रही हैं. उसने सोचा उनके लिए भी एक कविता लिखेगी. आज फेसबुक पर अस्सी वर्षीय एक महिला को सालसा नृत्य करते देखा, कमाल का नृत्य था, बच्चों की तरह वे घूम रही थीं.  देह, मन के अधीन रहे तो वे उसे अपनी इच्छा से प्रयोग कर सकते हैं. तमस और जड़ता से भरी देह मन पर हावी हो जाती है. जून आजकल बहुत व्यस्त रहते हैं, कल उन्हें दिल्ली जाना है. नन्हे के दफ्तर में एक प्रतियोगिता होनी थी, अच्छी ही होगी. वह अपनी टीम का हेड हो गया है अब. जे कृष्णमूर्ति की जो किताब वह वर्षों पहले बोस्टन से लायी थी, मिल नहीं रही थी, उस दिन मिल गयी, पढ़ना शुरू किया है.  


Monday, May 22, 2017

कविता और नृत्य


नन्हा आज चला गया, अभी तो रास्ते में ही होगा, रात तक घर पहुंचेगा. पिताजी को उसके आने से काफी अच्छा लगा, उनके स्वास्थ्य में सुधार हुआ है. उन्हें भी उसके रहने से अस्पताल की ड्यूटी में कुछ राहत मिली. सहायक की अनुपस्थिति में भी जून को रात को वहाँ नहीं सोना पड़ा. इस बार वह काफी शांत लगा. आज से सहायक सोयेगा जब तक उसका कोई अन्य काम नहीं निकल आता.
आज मौसम अच्छा है, मन भी सुवासित है, ऊर्जा का प्रस्फुरण हो रहा है. ऊर्जा का ही खेल है यह जगत. हर पल उनके भीतर से ऊर्जा का संचरण हो रहा है, सकारात्मक भी और नकारात्मक भी...जैसी ऊर्जा वे भीतर निर्मित करते हैं, वैसी ही बाहर भेजते हैं और वही उन्हें पुनः मिलती है. एक चक्र का निर्माण होता है. वे सद्भावनाएँ भेजते हैं तो वही उन्हें मिलती हैं. भीतर कठोर हो जाते हैं तो वही कठोरता कई गुनी होकर उन्हें मिलती है..ऊर्जा का अनंत भंडार उनके चारों और फैला हुआ है, वे चाहे जितनी ऊर्जा उसमें से ले लें. वह कभी समाप्त होने वाली नहीं है..प्रेम अनंत है..आनन्द अनंत है..शांति अनंत है..सुख अनंत है...और ज्ञान अनंत है...लुटा रहा है वह खुले दिल से..जितना भर ले कोई अपनी झोली में..जीवन एक अनमोल उपहार है जो परमात्मा ने स्वयं को व्यक्त करने के लिए उन्हें दिया है. वह प्रकट हो रहा है नृत्य की किसी मुद्रा में..चित्र में..कविता में और प्रकृति के हजार-हजार रूपों में..वह..
आज फिर ‘वर्षा’ रानी अपना जौहर दिखाने आयी है. कल दिन भर पिताजी लगभग सोये ही रहे, आज सुबह-सुबह जगे थे, नाश्ता भी किया, उनका नया घर तैयार हो रहा है. अगले महीने उन्हें वहाँ जाना है, जून का कनाडा का कार्यक्रम स्थगित होने जा रहा है, सम्भवतः उन्हीं दिनों वे शिफ्ट करेंगे. कल रात कोई स्वप्न देखा हो, याद नहीं आता पर वे तो दिन भर में ही न जाने कितने स्वप्न देखते रहते हैं. ‘समाधि’ के अतिरिक्त शेष स्वप्न ही तो है. एक ही सत्ता है जो प्रतिबिम्बित हो रही है भिन्न-भिन्न रूपों में. ‘महादेव’ में पार्वती को समाधि का अनुभव होने वाला है. सद्गुरू की कृपा से उसे भी इसी जन्म में समाधि का अनुभव अवश्य होगा. नैनी की बिटिया यहीं पास में खेल रही है, पूछ रही है कि आप क्या कर रही है !
पिछले दो दिन कुछ नहीं लिखा, आज अभी अस्पताल जाना है, पिताजी पहले से काफी ठीक हैं, उठकर बैठे भी, कहा, पोते की शादी देखनी है, इन्सान की जिजीविषा कितनी प्रबल है, वह हर कठिनाई को पार कर जीना चाहती है, कल नन्हे को कहा तो है कि वह तैयार हो तो जल्दी ही मंगनी की रस्म हो सके. कौन जानता है, भविष्य में क्या लिखा है ? परमात्मा हर वक्त उनके साथ है, बल्कि वही तो है..
पौने तीन बजे हैं, मौसम अच्छा है, ठंडी हवा बह रही है, अभी कुछ देर पहले उसका एक विद्यार्थी पढ़कर गया है. कह रहा था, बहुत दिनों से पापा से मार नहीं खायी, मार खाकर ऊर्जा आती है, अजीब बच्चा है, उसकी लिखाई खराब है, थोडा आलसी है, उसकी माँ ने ज्यादा लाड़-प्यार से उसे ऐसा बना दिया है, और इधर उसका मन भी ज्यादा लाड़-प्यार से उसे ही दिक् कर रहा है. पुराने संस्कार ढीठ बच्चे की तरह होते हैं, कहना ही नहीं मानते, उसे व्यस्त रहकर उनकी उपेक्षा रखनी है और कुछ नहीं हटाने से वे और भी जिद्दी हो सकते हैं. साक्षी भाव से उन्हें देखना भर है, अच्छा ! ऐसा भी होता है, कहकर आश्चर्य व्यक्त करना है..आज पुस्तकालय भी जाना है, बंगाली सखी को अपनी बेटी की किताबें पुस्तकालय में देनी हैं. आज फिर बिजली नहीं है. कल से वे अपने नये घर में कुछ सामान शिफ्ट कर रहे हैं.