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Wednesday, July 3, 2019

नारियल का वृक्ष



आज सफाई कर्मचारी नहीं आया, नैनी को भी अपना काम खत्म कर बच्चों को स्कूल छोड़ने जाना था, सफाई का काम अधूरा ही पड़ा है. कुछ वर्ष पहले यदि ऐसा हुआ होता तो वह झुंझला जाती फिर खुद ही करने में जुट जाती पर अब मन में एक ख्याल भर आया, उम्मीद पर दुनिया टिकी है, हो ही जायेगा सब जून के आने से पहले. अभी पौन घंटा शेष है न. आज धूप अच्छी निकली है, ठंड पहले से कम है फिर भी काफ़ी है, क्योंकि इनर पहनने के बाद भी स्वेटर तो पहनना ही पड़ा है. आज सुबह आचार्य प्रद्युम्न का प्रवचन सुना. सगुण ईश्वर व निर्गुण ब्रह्म का भेद स्पष्ट हुआ. जीव माया के अधीन है और माया ईश्वर के अधीन है. सतोगुण बढ़ने पर जीव माया के पार जा सकता है और ईश्वर की भक्ति करने से भी. मन को दूषित करते हैं रजोगुण तथा तमोगुण. सतोगुण आत्मा को हल्का बनाता है. समाधि की अवस्था में तमोगुण घटता है, संस्कार मिटते हैं तथा आत्मा को नई ऊर्जा मिलती है.

सुबह टहलने गये तो ठंड अधिक नहीं थी. सूरज का लाल गोला उनके साथ साथ चल रहा था. मौसम अब बदल रहा था. आज बहुत दिनों बाद उसने दोपहर के भोजन में इडली बनाई है. माली ने बगीचे से नारियल लाकर दिया था, उसकी चटनी बनाई. सुबह क्लब की सेक्रेटरी के साथ जाना था, एक पुराने कमरे को देखने जो भविष्य में क्लब का दफ्तर बन सकता है. हालत अच्छी नहीं है, काफ़ी काम करवाना होगा. स्कूल का पुराना फर्नीचर भी एक बड़े हॉल में रखवा दिया गया है, उसने सुझाव दिया, इसे दान कर देना चाहिए. कितने ही पुराने ब्लैक बोर्ड भी थे. आजकल वह योग दर्शन में 'समाधि पाद' के श्लोकों का भाष्य सुन रही है. संस्कार के रूप में ज्ञान उनके भीतर रहता है, जो वृत्तियों के रूप में प्रकट होता है. क्लिष्ट व अक्लिष्ट दोनों तरह की वृत्तियाँ भीतर हैं तथा दोनों से संस्कार भी बनते हैं. वे संस्कार फिर वृत्तियों को जन्म देते हैं. हर वृत्ति एक संस्कार को छोड़ जाती है, चित्त में वृत्ति-संस्कार चक्र अनवरत चलता रहता है. ज्ञान प्राप्त करने के बाद भी क्लिष्ट वृत्तियाँ उठ सकती हैं पर उनमें उतनी तेजी नहीं रहती. जब चित्त शांत हो जाता है तब क्लिष्ट वृत्तियाँ नहीं उठतीं.

पिछले तीन दिन कुछ नहीं लिखा. कारण सोचे तो कुछ भी नहीं है. स्मरण ही नहीं रहा. आज इस समय शाम के सात बजे हैं. अभी-अभी 'अष्टावक्र गीता' पर गुरूजी की व्याख्या सुनी, जिसमें भिन्न-भिन्न आसक्तियों की चर्चा गुरूजी कर रहे थे. जून भी सुन रहे हैं आजकल. उन्हें तरह-तरह के व्यंजन बनाना पसंद है, क्या यह भोजन के प्रति आसक्ति कही जाएगी ? आज दोपहर को बच्चों के साथ 'सरस्वती पूजा' का उत्सव मनाया. जून सुबह वाग्देवी की एक तस्वीर प्रिंट करके लाये थे, घर में फ्रेम मिल गया जो नन्हे को उपहार में मिला था. काले चनों और नारियल का प्रसाद बांटा. दो दिन पहले धोबी ने अपने हाथ से लगाये नारियल के पेड़ से नारियल लाकर दिया था. बच्चों ने तस्वीर देखकर अपने हाथों से उसकी अनुकृति बनाई. आज माली ने गमलों में फूलों के पौधे लगाये. फ्लॉक्स और डायंथस अब खिलने लगे हैं. फरवरी के अंत तक बगीचा फूलों से भर जायेगा. आज सुबह मृणाल ज्योति गयी, बहुत लोग आये थे. पिछले वर्ष लगे एक कैम्प में सौ परिवारों का चयन किया गया था, जिन्हें सरकार की तरफ से दिव्यांग बच्चों एक लिए किट बांटे गये. स्थानीय एम एल ए महोदय भी आये थे. कल वहाँ भी सरस्वती पूजा है, उसने लड्डू मंगाए हैं कल लेकर जाएगी.   

Tuesday, April 24, 2018

सिया के राम



कल रात्रि संदेह के संस्कार को भीतर स्पष्ट देखा, सद्गुरू कहते हैं, विकार को देखना ही उससे मुक्त होने की क्रिया है. व्यर्थ ही मन संदेह से ग्रस्त रहता है, व्यर्थ ही वस्तु, व्यक्ति तथा परिस्थिति के प्रति मन में आशंका होती है, किसी से मिलने जाना हो तो मन कहेगा, शायद वह घर पर न हो, अथवा हो तो व्यस्त हो, शायद ऐसा हो शायद वैसा हो..! कितना हल्का लग रहा है भीतर, मन अब अस्तित्त्व के प्रति अर्थात सभी के प्रति विश्वास से भर गया है. सुबह घने कोहरे के मध्य टहलने गये वे. स्नान के बाद सभी के फोन व संदेश आने लगे, आज उनके विवाह की सालगिरह है. दोपहर को क्लब की मीटिंग है, शाम को मेहमान आयेंगे. वह गाजर-ब्रोकोली और पनीर भी बना रही है शेष व्यंजनों के साथ. नन्हे का भी मुबारकबाद का फोन आया, उसे एक अच्छा रसोइया मिल गया है पर दिन में एक ही बार आता है. बड़ी बुआ ने भी शुभकामना दी, अब उनका स्वास्थ्य पहले से काफी ठीक है. पिताजी का फोन आया, ‘सिया के राम’ उन्हें भी अच्छा लग रहा है. वह कह रहे थे, सीता का अभिनय कर रही कलाकार में उन्हें उसकी झलक मिलती है, पिता का हृदय सन्तान के प्रति कितना स्नेह से भरा होता है. पिछले दो-तीन दिनों में ड्राइव-वे पर किसी ने खाली बोतल फेंकी, कांच बिखर गया. जून ने आज शिकायत की है. समाचारों में सुना, पठानकोट में हुए आतंकी हमले में कितने जवान मारे गये, सभी आतंकवादी भी मारे गये. जब से दुनिया बनी है शायद तभी से यह संघर्ष चल रहा है, जैसा संघर्ष मानव के भीतर चलता रहता है !

नकारात्मकता का कीट एक क्षण के लिए सिर उठाता है और ज्ञान का प्रकाश उसे पुनः भाग जाने के लिए विवश करता है. माया का जादू अब और नहीं चल सकता. माया ने बहुत नचा लिया अब भीतर जो स्थिरता डिग-डिग जाती थी, अचल होने लगी है. यूनिवर्स से कितना सुंदर संदेश मिला आज, कुछ बातें तर्क से परे होती हैं. इन संदेशों के लेखक एक आधुनिक संत हैं जो लाखों लोगों को प्रेरित कर रहे हैं, कल का संदेश बिलकुल वही है जो आजकल वह स्वयं भी अनुभव कर रही है. उनकी दुनिया उनके मन का ही खेल है. मन में ड़ू’बे रहकर वे वस्तविकता से दूर ही रह जाते हैं और व्यर्थ ही ऊर्जा गंवाते हैं. जिस क्षण भी वे सत्य से हटते हैं, माया के घेरे में आ जाते हैं. इसीलिए संत कहते आये हैं, ज्ञान का पथ तलवार की धार पर चलने जैसा है. कल शाम का उत्सव अच्छा रहा, उन्होंने शकरकंद भूना और विशेष भोज ग्रहण किया. सुबह मृणाल ज्योति गयी, क्लब के लिए खरीदा गया बड़ा सा कार्पेट लेकर, जिसपर बैठकर बच्चों ने योगासन किये.

चीजें अब स्पस्ट होती जा रही हैं, उनके व्यर्थ के संकल्प ही सबसे बड़ी बाधा हैं. उनकी वाणी की अस्पष्टता ही उनके विकास में बाधा है. मन जितना-जितना शांत होगा, सहजता में रहेगा, वाणी भी सहज होती जाएगी. उसे अपने जीवन में क्या चाहिए, एक सहज मन और स्पष्ट, सुमधुर वाणी, इसके होने पर शेष तो आ ही जायेगा. परमात्मा के प्रति जितना गहन समर्पण भाव होगा, जितना प्रेम होगा उसी अनुपात में मन शांत होगा, उसी अनुपात में व्यर्थ के शब्द मुख से नहीं निकलेंगे. सुबह समय पर उठे, रात देर तक क्लब से गाने की आवाजें आती रहीं, पर नींद कब आ गयी पता ही नहीं चला. भीतर एक होश बना रहा फिर भी कुछ याद नहीं है, टहलने गये तो वापसी में वर्षा आरम्भ हो गयी, लौट कर घर आये ही थे कि वर्षा तेज होने लगी, जैसे उसे पता चल गया हो कि वे सुरक्षित घर लौट आये हैं.     

Wednesday, December 9, 2015

संकल्प की छत


अपने अभ्यास के द्वारा जो वे प्राप्त करते हैं वही टिकता है, गुरू की शरण में जाने का अर्थ है गुरू बनने की प्रक्रिया की शरण में जाना. सत्य के समान कोई मंगल नहीं, जिसने अपने अभ्यास और वैराग्य से सत्य की झलक देख ली वही ऊँची उड़ान भर सकता है. आनन्द की चरम अवस्था का अनुभव वही कर सकता है, वह तृप्ति के सुख को जानता है वह पूर्णकाम होता है. वह अपने उदाहरण द्वारा कितनों को आनन्द व सुख का रास्ता बता सकता है. उसके प्रति पूर्ण श्रद्धा और समर्पण हो तभी सत्य की झलक मिलती है. उन्हें डर भी किस बात का है, वे इस जगत में कुछ भी तो लेकर नहीं आये थे, न ही कुछ लेकर जाने वाले हैं, उन्हें जो भी मिला है यहीं मिला है, वे तो सदा लाभ में ही हैं. जगत का उन पर कितना बड़ा उपकार है, उसे लौटाने का तरीका यही हो सकता है कि वे किसी पर भी अपना अधिकार न मानें, यहीं की वस्तु यहीं लौटा दें. स्वयं सदा मुक्त रहें, खाली ! तब इससे भीतर वह भरेगा जो उनका अपना है, उसे वे लेकर जायेंगे और वही वे लेकर आये थे !  

सद्गुरु कहते हैं, क्यों न दुखद स्थितियों का उपयोग जागने के लिए कर लें, जैसे दुःस्वप्न नींद को तोड़ देते हैं. दुःख में वे पूर्ण जागृत हो सकते हैं सुख में बेहोशी छा जाती है. भूख के समय वे जागृत रहते हैं, उपवास का तभी इतना महत्व है, उपवास में कोई अपने पास रह सकता है, जगा रहता है, शरीर के कष्ट के समय भी मन सोया नहीं रह सकता. भय की अवस्था में भी पूर्ण जागरूक होते हैं, तेज गति में भी मन निर्विचार हो जाता है, जीवन की हर परिस्थिति का साधन के रूप में उपयोग किया जा सकता है. यह जीवन निरंतर जल रहा है, यहाँ हर घड़ी खुद की तरफ ले जाना चाहती है, पर वे इसका उपयोग और बेहोश होने के लिए करते रहते हैं. होश पूर्ण विश्रांति ही तो ध्यान है, परिधि पर कुछ न हो रहा हो, केंद्र पर सजगता बनी रहे तभी ध्यान घटता है.

जाने कब से वे माया के बंधन में हैं और जाने कब से परमात्मा की कृपा भी बरस रही है. मन जब व्यर्थ बातों से हटकर उसकी तरफ मुड़ता है तो वह बाहें खोले ही मिलता है. वह परम सत्ता सदा जागृत है, पर वे उसे देखकर भी अनदेखा करते हैं. परमात्मा के चिह्न चारों और बिखरे हैं, वही भीतर भी है जो उनके होने का कारण है, कितना आश्चर्य है कि वे उसे नहीं जानते, वह जो जानकर भी नहीं जाना जाता, वह जब होता है तो वे नहीं रहते, वहाँ से लौटकर कोई आया ही नहीं, वास्तव में परमात्मा ने ही परमात्मा का अनुभव किया है !

आज भी उसने एक सुंदर संदेश सुना, सर्वोत्तम पद है आत्मपद, इसकी शपथ उन्हें ग्रहण करनी है, नकारात्मक भाव से मुक्त रहना, कटुवचन नहीं कहना और सभी को प्रेम देना..ये तीन बातें इस शपथ में शामिल करनी हैं. उन्हें इस शपथ रूपी संकल्प की छत बनानी है, जिससे मन खाली रहे, यह व्यर्थ की बातों से नहीं भरता. नया संकल्प, नयी कल्पना, नया चिंतन तभी मन में आ सकता है, जब पुराना वहाँ न हो, जगह खाली हो तो आत्मा मुखरित हो जाती है. मन बाह्य संसार से ही विचारों को ग्रहण करता है यदि शपथ रूपी छत हो तो उनकी वर्षा से वे बच सकते हैं. अनावश्यक बातों को त्यागकर वे केवल आवश्यक को ही ग्रहण करें तो कितनी ऊर्जा बचा सकते हैं. फिर वही ऊर्जा भीतर जाने में सहायक होती है और वे मनुष्यत्व के पद की प्रतिष्ठा तभी बनाये रख सकते हैं जब भीतर जाकर आत्मा के प्रदेश में प्रवेश हो ! तभी जीवन सुंदर बनता है. ज्ञानी कर्म बाँधते नहीं हैं, कर्म छोड़ते रहते हैं, उन्हें भी प्रतिपल सजग रहकर अपने कर्मों को छोड़ते जाना है.     



Monday, October 5, 2015

काजीरंगा के अरण्य


कितना रहस्यमय है यह जीवन, इसमें प्रवेश करें तो न जाने कितनी दीवारें खड़ी हो जाती हैं, किसी भी सवाल का जवाब नहीं मिलता, सद्गुरु कहते हैं कुछ प्रश्न अति प्रश्न हैं जिनका उत्तर साधना की परम अवस्था तक पहुंचा हुआ व्यक्ति ही दे सकता है, क्योंकि जब तक कोई उस अवस्था तक न  पहुंचे तब तक उसे बताये जाने पर भी नहीं समझ सकेगा. आजकल वह बच्चन सिंह’ की एक पुस्तक पढ़ रही है, ‘महाभारत पर आधारित इस पुस्तक में पांडवों व अर्जुन-कृष्ण की महानता पर प्रश्नचिह्न लगाया गया है. वे जिन्हें पूज्य मानते हैं उन पर कोई आक्षेप कैसे लगा सकते हैं, वास्तव में माया के प्रभाव से कोई नहीं बच पाता, ‘माया’ मानव व देवता दोनों को ही नचाती है. जब तक भीतर का विवेक नहीं जगता, तब तक कुछ भी कहने का अधिकार उन्हें नहीं है. पौराणिक कथाएं न जाने कितने रूप बदल कर समुख आती हैं, और प्रतीकात्मक होती हैं. कोई उनसे कुछ सीख ले सके तो अच्छा है वरना उन्हें मात्र कथा मानकर ही पढ़ना उचित है. जीवन तो स्वयं के ज्ञान से ही चलेगा. ज्ञान और ज्ञानी के प्रति श्रद्धा ज्ञान प्राप्त करने के लिए प्रेरित करेगी, लेकिन काम तो वह अर्जित ज्ञान ही आएगा. दिसम्बर आ चुका है यानि एक वर्ष और बीत गया. जनवरी में उसने स्वयं से वायदा किया था कि इस वर्ष अध्यात्म के पथ पर और आगे बढ़ेगी पर अभी भी लगता है कुछ नहीं जानती. अभी भी खोज जारी है. कल नन्हा आ रहा है.

शाम के पौने छह बजे हैं, वे परसों सुबह काजीरंगा के लिए रवाना हुए थे और आज वापस लौट आए. वर्षों पहले भी वे एक बार गये थे, तब ठंड बहुत थी. इस बार मौसम अच्छा था, कई पशु-पक्षी देखे, हाथी की सवारी भी की. वापस आकर घर साफ करते तथा कपड़े आदि धोते-धोते, खाना बनाते इतना वक्त लग गया और अब वे आराम से बैठे हैं. कल रात्रि सोने से पूर्व जंगल, नदी, पशु-पक्षी जैसे भीतर पुनः जागृत हो गये थे. सब कुछ कितना स्पष्ट दिख रहा था, जो बाहर है वही भीतर है, यहाँ तक कि पक्षियों की आवाजें भी स्पष्ट सुनाई दे रही थीं. अभी-अभी उन्होंने पुरानी फोटो देखीं ‘अरण्य’ की, जिसमें इस बार पुनः गये, कुछ-कुछ बदल गया है, कुछ-कुछ वैसा ही है. जैसे वे स्वयं भी समय के साथ कुछ बदल जाते हैं कुछ वैसे ही रहते हैं. यह वर्ष जाने को है, इस साल को विदा करें इसके पूर्व कुछ नये वादे करने हैं खुद से जिन्हें अगले वर्ष पूरा करना है. हर दिन एक कविता लिखनी है और हर दिन एक गीत गाना है. हर दिन बगीचे में भी काम करना है और हर दिन वे सारे काम भी करने हैं जो पिछले साल करती आई है जैसे ध्यान अदि ! व्यर्थ चिन्तन, व्यर्थ बातें, व्यर्थ कार्यों से बचना है. अभी कुछ देर पहले सासु माँ का फोन आया, वह स्वयं सत्संग में गयीं और स्वयं फोन किया उनका आत्मविश्वास बढ़ा है.


आज जीसस का जन्मदिन है, क्रिसमस का शुभ दिन ! बचपन में कितने गीत उन्होंने गाये हैं प्यारे यीशू के. यीशु उसका गड़रिया है, वह उसकी भेड़ है, वह उसका चरवाहा है, उसका दूल्हा है इस भाव में भी संत टेरेसा के साथ वह कई बार डूबी है, यीशू अद्भुत है, अनोखा है, उसे सारे प्यार करें यह बिलकुल स्वाभाविक है, उसे फिर भी मरना पड़ा, कोई जितना-जितना सत्य के करीब जाता है उसे अपमानित किया जाता है, सत्य कोई सहन नहीं कर पाता, सत्य की आंच को कोई सह नहीं पाता तो वह पलट कर वार करता है. कोई यदि मीठे-मीठे शब्दों से काम लेता रहे तो सभी खुश रहते हैं. यीशू सच्चा है, गाँधी सच्चा है तो उन्हें मरना ही पड़ेगा और बाद में लोग उनको याद करेंगे, कितनों को वे प्रेरणा भी देंगे, क्रिसमस के बाद आता है नया वर्ष ! आने वाले साल में वह पहले से भी ज्यादा उस परमेश्वर के निकट जाये, उसे प्रेम करे, उसका ज्ञान भीतर प्रकट हो और वह उसके व्यवहार में उतरे, उसका आचरण पवित्र हो, भाव पवित्रतर हों तो ही पवित्रतम प्रभु भीतर उतरेगा. यीशु का जन्म भीतर होगा जब मन मरियम की तरह पाक होगा. नये वर्ष में कितने ही कार्य उसे करने हैं. अगले पृष्ठ पर वह अपनी दिनचर्या लिखेगी. काजीरंगा पर लिखी कविताएँ अभी तक ठीक नहीं की हैं वापस आकर, नन्हा दिन-रात कम्प्यूटर पर काम रहता है. नये वर्ष में उसका ध्यान-कक्ष भी बन जायेगा !   

Wednesday, July 8, 2015

प्रकृति के रंग-ढंग


उसके भीतर एक अजीब सी व्यथा ने जन्म लिया है, यह विरह की पीड़ा है या नहीं, नहीं जानती पर अब उसके सब्र का बाँध टूटता जा रहा है. सद्गुरु कहते हैं दुःख का कारण भीतर ही है पर यह दुःख बिलकुल अलग तरह का है, यह किसी कामना से नहीं उपजा है, यह एक कसक है जो अपने होने की, अपनी अस्मिता की वजह से उपजी है. कौन है वह ? यह जगत क्यों है ? यह गोरख धंधा क्या है ? यह जगत इतना निष्ठुर क्यों है ? अन्याय, अपराध, दुःख, पीड़ा, अत्याचार की बढ़ती हुई घटनाओं को देखकर कोई कब तक उदासीन रहने का भ्रम पाल सकता है ? कब तक कोई अपने भीतर से मिलने वाले आनंद को देखकर, पाकर जगत से आँखें मूंदे रह सकता है, कभी तो सत्य का उद्घाटन होना चाहिए, कभीं तो कोई यह राज खोले, यह संसार जो हर पल बदल रहा है, उसे देखने वाला कोई तो है वह जो अबदल है, कौन है वह ? क्या चाहता है ? क्यों है वह, प्रकृति इतनी सुंदर है कि मन मोह लेती है लेकिन वही प्रकृति कभी क्रूर भी हो जाती है माँ काली की तरह. उसके मन में उठने वाले इन सवालों का जवाब कौन देगा ? कहीं यह पीड़ा अहंकार जनित तो नहीं. दुःख का मूल कारण अहंकार है, पर किस बात का अहंकार. यहाँ तो कुछ है ही नहीं, अपना आप भी नहीं तो कैसा अहंकार और कौन करेगा अहंकार ? ये सारे प्रश्न कौन उठा रहा है ? क्या वही तो अहंकार नहीं कर रहा, प्रश्न कौन उठाता है, मन, बुद्धि या अहंकार ? इनसे परे जो आत्मा है वह कब मिलेगी ? जब ये तीनों शांत हो जायेंगे !

आज छोटी बहन का पत्र मिला, पिछले महीने जब दिल्ली से शारजाह जा रही थी तो वे उसे छोड़ने गये थे, तभी का लिखा पत्र आज मिला है. उसने पिछले कई महीनों से कोई पत्र नहीं लिखा, विरक्ति सी हो गई है. वे कुछ भी कर लें, कह लें, इस जगत कि जो रीत है वह उसी के अनुसार चलता जाता है. वे ही अपनी खुशफहमी का शिकार होते रहते हैं कि फलां को हम कुछ प्रभावित कर सकते हैं. यह जगत ऐसा ही है, न कोई राग रहे न द्वेष रहे, क्योंकि यह है तो उसी परमात्मा की रचना, जिसे वे प्रेम करने का दम भरते हैं, वास्तव में प्रेम करते हैं या नहीं यह भी वे नहीं जानते, लेकिन उसे नाता जोड़ने की आवश्यकता तो हर क्षण अनुभव करते ही हैं. वे अपने मन से दुखी हैं, क्योंकि मन संसार के पीछे भागता है, ठोकर खाता है, गिरता है फिर पछताता है पर अपनी आदत से बाज नहीं आता, यह कैसा विरोधाभास है. ईश्वर से उनका सहज संबंध है, जीव ईश्वर का अंश है, जीव सहित यह सारी सृष्टि उसी प्रभु की शक्ति से ही प्रकट हुई है फिर उन्हें उससे दूर कौन करता है, माया ही मन के रूप में आकर उनके बीच परदा बन कर छायी है, अब और सहन नहीं होता, इस माया को जाना होगा. भीतर की यह छटपटाहट अब सहन नहीं होती, भीतर की तलाश अब हर क्षण बढ़ती जा रही है, वह जो झलक दिखाकर ही रह जाता है उसे अब प्रकट होना ही होगा !

आज सुबह ध्यान में बार-बार कुछ अनुभव किया, जैसे ही कोई विचार आता था, एक झटका सा लगता था और वह पुनः सचेत हो जाती थी, सब कुछ कितना अद्भुत था. मन से परे प्रकाश का साम्राज्य है, प्रेम तथा शांति भी वहीं है. कल रात को भी वह मात्र अस्तित्त्व को अनुभव कर रही थी, बल्कि अनुभव ही शेष था, क्या था वह, कौन जानता है, शब्दों से परे का अनुभव शब्दों में कैसे कहा जायेगा. अब लगता है समाधान हो रहा है, मन को कोई आधार मिल गया है.