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Tuesday, September 29, 2015

निराला की कविताएँ - दूधनाथ सिंह


आज सुबह पाँच बजे के बाद उठी, रात सोने में थोड़ी देर हुई थी. उसके पूर्व लेटे-लेते ही ध्यान भी किया, जिसमें तन की हर कोशिका में जीवन महसूस किया. शरीर तरंगों से भरा हुआ है, कानों में तरह-तरह की आवाजें हर क्षण गूँजती हैं. आजकल एक सुगंध का अहसास भी कई बार होता है. मन  यदि एक बात पर अटक जाता है तो क्षण भर में ही वापस भी आ जाता है, भीतर एक शांति का अहसास होता है. इस समय शाम के साढ़े छह बजे हैं, अभी कुछ देर पूर्व ही वे सांध्य भ्रमण से वापस आये. आज सुबह गुरूजी को ध्यान कराते हुए देखा, सुना, हृदय भावों से भर गया. नीरुमाँ को सुना, दोनों से ही किशोर उम्र के लडकों ने अपने हृदय की भावनाओं को व्यक्त किया, इतनी कम उम्र में संत के प्रति श्रद्धा होना कितने सौभाग्य की बात है. कल हिंदी कार्यशाला अच्छी रही, उसने भी काफी कुछ सीखा.. कुछ देर पूर्व दीदी से बात की, उन्होंने कहा कि छोटी बहन की तबियत ठीक नहीं थी, वह अपने जॉब से भी खुश नहीं है. जब तक अपने भीतर ख़ुशी का स्रोत नहीं मिल जाता, तब तक बाहर की वस्तुओं से ख़ुशी मिलना सम्भव ही नहीं है. आज निराला की कविताओं पर ‘दूधनाथ सिंह’ की किताब पढनी शुरू की है. उनकी कविताओं को समझाते हुए, उनकी व्याख्या करते हुए कितने सुंदर ढंग से यह किताब लिखी है. आधुनिक लेखकों को उसने पहले कभी पढ़ा ही नहीं था, पहले काशीनाथ सिंह और अब दूधनाथ सिंह की किताब पढ़कर कविता लेखन के प्रति उसका प्रेम जैसे और बढ़ रहा है !

आज सुबह साढ़े चार बजे नींद खुल गयी पर उठते-उठते दस मिनट और लग गये. गुरू माँ कहती हैं नींद मृत्यु की निशानी है. वे सो रहे हैं अज्ञान की नींद में, कब जगेंगे ? दोपहर को निराला की किताब में मृत्यु की बात पढ़ते-पढ़ते भी उसे नींद आ रही थी, तमस छाया रहता है, मौसम भी ठंडा हो गया है. उसके बाएं कान में हर वक्त कुछ सुरसुराहट सी होती है, हवा की आवाज आती है. आज वस्त्रों को व्यवस्थित किया तथा अन्य सामान अल्मारी से बाहर किया. क्लब में एक कार्यक्रम है जिसमें उन्हें जाना है. जून तैयार हो चुके हैं. अज सुबह ‘आस्था’ पर कवि सम्मेलन में गरीबी, भूख और गरीबों की विवशता पर एक कानून के शिक्षक की कविता सुनी, हृदय द्रवित हो गया, लेकिन  चंद आँसूं जो वे गरीबी का वर्णन सुनकर बहते हैं, वे किस काम आते हैं उनके, वह कवि तो अपने तौर पर कुछ सार्थक कर रहा है, उसने गरीब बच्चों के लिए एक ट्रस्ट बनाया है. सुबह सद्गुरु को भी सुना, पिछले तीन-चार दिन रोज ही सुनती रही. वह मुम्बई में ध्यान-प्राणायाम शिविर में हजारों लोगों को अपनी उपस्थिति से लाभान्वित कर रहे थे. पूर्वोदय में कविताएँ भेजने के लिए ईमेल भेजा है, देखे क्या होता है. उसे एक सखी की बड़ी बिटिया के लिए एक कविता लिखनी है, कल उस सखी की शादी की वर्षगांठ भी है, उसके लिए भी. सभी के लिए उसके हृदय में ढेर सारी शुभकामनायें उमड़ रही हैं. उन दोनों के परिवारों के हर एक व्यक्ति के लिए.. सारे विश्व के लिए. उसका अंतर इस वक्त खाली है. खाली उर में ही प्रेम उमड़ता है.


अभी साढ़े चार हुए हैं शाम के और अँधेरा हुआ ही चाहता है. सर्दियां अब शुरू हो गयी हैं. स्वेटर, रजाई, हीटर, ब्लोअर अभी निकल चुके हैं, धूप अब सुहाने लगी है. उसका पेन कितना रुक-रुक कर लिख रहा है, जैसे कविता लिखने तथा टाइप करने का कार्य रुक-रुक कर चल रहा है. आज सुबह भगवद् गीता पढ़ते समय भीतर एक सत्य जगा, वह कर्ता नहीं है, आत्मा तो साक्षी मात्र है, वह कुछ नहीं करता. मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार तो करण हैं, वे कर्ता हो नहीं सकते तो फिर यह कर्ता है कौन ? कोई भी नहीं सारे कार्य अपने आप हो रहे हैं, वे यदि कर्ता बनेंगे तो भोक्ता भी उन्हें ही बनना होगा. कर्ता बनेंगे तो आत्मपद में स्थिति नहीं हो पायेगी. अहंकार जब तक बचा रहेगा तब तक आत्मा में स्थिति होना कठिन है. माना हुआ कल्पित ‘मैं’ ही कर्ता बनता है और फिर सुख-दुखी होता है. कितना हल्का हो जाता है मन जब उसे पता चलता है कि वह कर्ता नहीं है, मन खाली हो जाता है और खाली मन ही आत्मा को प्रतिबिम्बित कर सकता है. योग वशिष्ठ में भी ऐसा ही ज्ञान वशिष्ठ मुनि राम को दे रहे हैं. अद्भुत ज्ञान है यह, फल की इच्छा नहीं करें इससे भी आगे का ज्ञान है यह, जब कुछ किया ही नहीं तो फल की इच्छा कोई कर भी कैसे सकता है !

Monday, May 25, 2015

परमहंस की कथा


आज सद्गुरु ने सरल शब्दों में ज्ञान योग पर चर्चा की. हृदय की सारी गाँठे जैसे खुलती जा रही हैं. ‘मैं’ और ‘मेरा’ की माया में जो मन उन्हें भटकाता है उसे अपने वास्तविक स्वरूप का ज्ञान हो रहा है. वह अलिप्त है, अकर्ता है, अभोक्ता है, अव्यक्त है, पूर्ण है, आनन्दमय है, ज्ञान से परिपूर्ण है. जैसे आकाश पर बादल आते और चले जाते हैं वैसे ही मन, बुद्धि आदि आत्मा कर चिदाकाश पर आने-जाने वाले बादलों के समान स्थित हैं, ज्ञान का सूर्य निकलता है तो स्वच्छ नीलिमा दिखाई पडती है !

‘साहित्य अमृत’ में श्रीरामकृष्ण परमहंसदेव की अद्भुत कथा पढ़ने को मिली, अनोखे संत थे वह, पर बहुत प्यारे. हँस माने ऐसा पक्षी जो संसार से सार( दूध) को ग्रहण करे और असार (जल) को छोड़ दे. उन्हें भी जीवन में सार्थक क्षणों को अपनाना है. इस छोटे से जीवन में इतना समय किसके पास है कि सभी कुछ ग्रहण करता चले. मन जितना खाली रहे उतना ही अच्छा है. कुछ भी ऐसा न हो जिससे किसी को दुःख हो, कर्त्तव्य का पालन करते हुए शेष सारे समय का उपयोग अपने लक्ष्य की प्राप्ति में लगाना है. आवश्यकता और इच्छा में भेद को विवेक से समझना है. ज्ञान में जब तक स्थिति नहीं होगी, द्वन्द्वों से मुक्ति नहीं होगी.

आज टीवी पर रामायण का वास्तविक अर्थ सुना, सद्गुरु कह रहे थे, राम अर्थात आत्मा का जन्म किसी के भीतर तब होता है जब दशरथ अर्थात दस इन्द्रियों का मिलन कौशल्या यानि कुशलता से होता है. जीवन में मैत्री भाव और श्रद्धा होती है, जो सुमित्रा और कैकेयी हैं. मन या बुद्धि सीता है, जिसका हरण अहंकार रूपी रावण कर लेता है, तब हनुमान अर्थात श्वास की सहायता से अहंकार को पराजित कर मन को वापस लाते हैं. मन तथा आत्मा का मिलन होता है. इसी तरह महाभारत भी प्रतिपल हो रहा है. एक ओर लोभ आदि दुर्गुणों का प्रतीक दुर्योधन है तो दूसरी ओर सात्विकता का प्रतीक अर्जुन और आत्मा रूपी कृष्ण हैं. उन्हें प्रतिक्षण प्रेय अथवा श्रेय में से चुनना होता है, चयन ही भविष्य की नींव रखता है. आज अख़बार में पढ़ा कि मृत्यु कितनी सृजनात्मक है. जन्म होने की प्रक्रिया सदा एक सी है पर इन्सान कितने विभिन्न तरीकों से मरते हैं. हर व्यक्ति की मृत्यु किसी न किसी खास रोग अथवा कारण से होती है. अनगिनत रोग हैं और कितनी प्राकृतिक आपदाएं हैं. युद्ध, हिंसा, आतंक के शिकार भी होते हैं कुछ लोग और कुछ स्वयं ही अपनी मृत्यु का चुनाव करते हैं. जो जन्मा है वह मरेगा ही यह ध्रुव सत्य है पर जो मरा है वह पुनः जन्मेगा, यह तय नहीं है. वह मुक्त भी हो सकता है !

अभी कुछ देर पूर्व उसने बड़े भाई-भाभी से बात की, आज उनके विवाह की चौबीसवीं वर्षगाँठ है, फिर दीदी-जीजाजी से बात की, सभी ठीक हैं और सभी उसके प्रिय हैं उसी तरह जैसे इस जगत की हर शै उसे प्रिय है, क्योंकि वह सब कुछ उसके कान्हा का है. कृष्ण का नाम उसके कण-कण में एक सिहरन सी जगा देता है और आँखों में नमी, वह इतना असर डालता है कि कभी-कभी उसको याद करते डर लगता है कि किसी ने उसकी यह हालत देख ली तो..ईश्वर से प्यारा कुछ हो भी कैसे सकता है, एक उसी को जान लो तो सब कुछ अपने आप स्पष्ट होने लगता है. एक उसी को चाहो तो प्रकृति भी साथ देने लगती है. एक उसी का आश्रय ले मन, उसी को भजे तो संसार खो जाता है.

प्रातः वे समय से उठे, क्रिया आदि करके बड़ी को सुखाने के लिए रखा, कल दोपहर उन्होंने बनाई थी मेथी की बड़ी पर हमेशा की तरह वर्षा होने लगी, सो ओवन को गर्म करके उस पर रखा. नन्हे का आज फिजिक्स प्रैक्टिकल है. नैनी कल दिन भर नहीं आई थी, आज उसका काम ज्यादा हो गया है. उसे अभी पाठ करना है फिर ध्यान, समय का प्रतिबन्ध ‘ध्यान’ के लिए आवश्यक है ऐसा सद्गुरु ने बताया. जीवन में अनुशासन हो, नियम हो तो एक क्रमबद्धता आती है. मन में भी सुबह-सुबह पवित्र भाव उठते हैं, वैसे तो कृष्ण हर क्षण उसके साथ रहते हैं, वह जो भी है, जैसी भी है उनसे छिपा नहीं है पर वह उन जैसी होना चाहती है, जैसे वह गुणातीत हैं. सृष्टि के भीतर रहते हुए भी इससे अलग हैं. उनसा होने के लिए उनको जानना, उनको सुनना, उनसे प्रेम करना ही एकमात्र उपाय है. अध्यात्म ही अपने आप से मिलाता है !   

Tuesday, April 28, 2015

नाश्ते में परांठे


कल शाम को माँ-पिता जी वापस चले गये, अभी तो वे ट्रेन में होंगे, आने वाली शाम को पहुंचेंगे. वह उस अद्वैत, अच्युत, अनादि कृष्ण की कथा सुन रही है. जीवात्मा यदि भक्त हो तो वह कृष्ण की कथा में ही तो रस लेगा ! इस मार्ग पैर कितनी ही सफलता मिले, फिसलने का डर रहता ही है. सद्गुरु माँ-पिता की तरह कभी प्रेम से तो कभी डांट-फटकर कर सन्मार्ग पर ले जाने का प्रयत्न करते हैं. पिछले दिनों कई बार ऐसा हुआ जब वह मोह का शिकार हुई, अर्थात उसकी बुद्धि विकृत हो गई, पर झट ही सचेत भी हुई. शुद्ध अन्तःकरण में ही ईश्वर का प्रागट्य होगा. कृष्ण का अवतरण हृदय की जेल में होगा तो सारे बंधन खुल जायेंगे, सारी गांठें भी खुल जाएँगी, तब शर्मिंदा नहीं होना पड़ेगा. अभी बहुत कुछ सीखना है. यह मार्ग कितना भी लम्बा क्यों न हो पर सुखदायक है. सद्गुरु का ममता भरा हाथ और कृष्ण का अहैतुक प्रेम सदा-सर्वदा उसके साथ जो है.

“पायी संगत जो संतन की, पायी पूंजी अपने मन की” सद्गुरु ने अपने वचनों और अपने कार्यों से उन्हें ‘स्वयं’ से मिला दिया है, और उन्हें अपने आप से प्यार हो गया है. पहले स्वयं से आँख मिलते भी डरते थे और दूसरों से भी. अब हर जगह वही दीखता है तो डर किसे और किसका ? उन्होंने स्वयं ही अपने लिए बाधाएँ खड़ी की हुई थीं, अब इनका अंत होता नजर आता है. बुद्धिफल है अनाग्रह, किसी भी स्थिति का आग्रह नहीं करना है, समर्पित बुद्धि को ही यह फल मिलता है. आज सुबह जून ने अपने घटते हुए वजन को देखते हुए नाश्ते में परांठा बनाने को कहा, साथ-साथ उन्होंने नाश्ता किया सो अभी व्यायाम नहीं कर पायी है. ग्यारह बजे तक सभी शेष कार्य हो जायेंगे यदि एक-एक मिनट का उपयोग किया तो. मौसम आज अच्छा है, पापा-माँ अभी भी ट्रेन में बैठे होंगे  !

नौ बजने को हैं, आज भी मौसम बदली भरा है, नैनी किचन की विशेष सफाई कर रही है. कल शाम को फोन आया, वे लोग सकुशल पहुंच गये हैं, उन्हें यहाँ रहना यकीनन अच्छा लगा होगा, वह बल्कि परीक्षा में कई बार फेल होते-होते बची. सबसे पहले तो असत्य भाषण, चाहे कितना भी निर्दोष असत्य हो..पर उससे छुटकारा तो पाना है न, दूसरा क्रोध, यह बहुत कम रह गया है पर समाप्त नहीं हुआ है, तीसरा लोभ, यह बहुत ज्यादा है, वस्त्रों की कमी का अहसास और किसी को दिए जाने वालों सामानों पर नजर रखने की प्रवृत्ति.. मन यदि शुद्ध नहीं तो ध्यान कैसे होगा और ध्यान में उतरे बिना ज्ञान भी नहीं टिकेगा...जीवन में ज्ञान नहीं तो पशु से भी गया गुजरा है जीवन...कृष्ण को सदा मन में बसाये रखे तो वही मुक्त करेगा... संगीत का अभ्यास हो चुका है. उसके गले में हल्की सी खराश है, सिर भी थोड़ा भारी है, कल रात पंखा तेज करके सोयी सम्भवतः यही कारण हो, पर यह इतनी मामूली सी बात है कि..अभी पाठ करना शेष है, माँ थीं तो वे सुबह-सुबह ही पाठ कर लेते थे, वे रोज सुनती थीं. एक सखी के ससुरजी  अस्पताल में दाखिल हैं. सम्भवतः अंतिम दिन नजदीक आ रहे हैं, आत्मा की नश्वरता के बारे में जानकर इतना ज्ञान तो हो चुका है कि शरीर जो जर्जर हो चुका है, उसके प्रति मोह न रहे. सो मन में दुःख नहीं होता. जीवन जितना भी जियें होशपूर्वक जियें, तभी सार्थक है अन्यथा तो लकड़ी के लट्ठे का सा ही जीवन है. सजगता अत्यंत आवश्यक है. एक चेतन सत्ता है जो उनके प्रत्येक कार्य, विचार व वचन की साक्षी है, उससे वे कुछ भी छुपा नहीं सकते. वह उनका आदर्श बने, तभी मुक्ति सम्भव है. श्रद्धा रूपी जल, मन रूपी सुमन था अपने कर्मफल और अपने अंतर का प्रेम भरा अश्रुजल यही ईश्वर को समर्पित करना है.





Monday, March 16, 2015

मूंग का हलुआ


आज पूर्णिमा है. उसके हृदय गगन में भी परमात्मा रूपी चन्द्रमा का आगमन होगा ऐसी सूचना मिल रही है. मन शांत है, ध्यानस्थ है, सद्गुरु की छवि हटती नहीं. सुमिरन अपने आप चलता है. ईश्वर को छोड़कर कोई विचार मन में नहीं टिकता. एक उसी की याद हर वक्त बनी हुई है और कैसी अद्भुत गहराई का अनुभव हो रहा है. जैसे सब कुछ ठहर गया हो. सारा जगत स्थिर हो मन की तरह, कहीं कोई उहापोह नहीं, विक्षेप नहीं, अद्भुत है यह क्षण ! कल दोपहर स्वामी योगानन्द जी की आत्मकथा पढ़ी. साधना के अनगिनत सूत्र उनकी इस पुस्तक से हाथ लगते हैं. पढ़ते-पढ़ते मन ध्यान में टिक जाता है. परसों ध्यान में आवाज सुनी थी “निरभिमानी बन” उसके और प्रभु के मध्य अहंकार का पर्दा ही तो है, इसे चूर-चूर करना होगा. मन के सूक्ष्म अहंकार को निर्दयता से उखाड़ फेंकना होगा. कठोर बनना पड़ेगा मन के प्रति, कड़ी नजर रखनी होगी कि कहीं कोई भाव ऐसा तो नहीं आ रहा जो अहंकार को पोषित करे. पूर्ण समर्पण तभी सम्भव है. सद्गुरु इतनी दूर रहकर भी उसे सचेत कर रहे हैं. सुबह स्वप्न देखा जो उसकी एक और कमजोरी की ओर ध्यान दिला रहा था. मिथ्याभाषण अथवा तो आवश्यकता से अधिक भाषण, एक बात को बार-बार कहने की बुरी आदत, नन्हे और जून को कई बार इसका शिकार होना पड़ा है. ज्यादा बोलने से बातें अतिरंजित भी हो जाती हैं और निर्दोष असत्य भी मुख से निकल जाता है. कल शाम को सत्य का सामना वह ठीक से नहीं कर पायी. हर क्षण सजग रहना होगा तभी पाषाण हृदय चमक उठेगा और उसमें परमात्मा की छवि प्रकट होगी. कृष्ण की गीता पढ़े या सद्गुरु के वचन सुने सभी मन की शुद्धि चाहते हैं !   

उसका हृदय परमात्म सुख से परिपूर्ण है, कोई होश में रहे तो विकार पास नहीं फटकते और यदि कोई भाव ऐसा उठा भी तो होश में उसे देखा जा सकता है. सुबह उठी तो एक स्वप्न देख रही थी. उसके हाथ में स्वादिष्ट हलुआ है, शायद मूंग की दाल का, शुद्ध घी और मेवों से युक्त, मीठा और स्वादपूर्ण पर दो छोटी बच्चियों के कारण बहुत सा व्यर्थ जमीन पर गिर जाता है. सपना सचेत करता है कि परमात्मा का जो आनंद उसे मिला है उसे छोटे-छोटे सुखों के पीछे कहीं व्यर्थ न गंवा दे. सुबह क्रिया के बाद किसी के होने का, किसी अशरीरी के होने का अहसास हुआ, एक लय में जैसे किसी के साँस लेने की आवाज आ रही थी. बहुत पहले भी उसे ऐसा अनुभव हुआ था. सद्गुरु की स्मृति भी हर क्षण रहती है, ऐसा लगता है जैसे उनसे मानसिक सम्पर्क बन रहा है. वह उसकी प्रार्थना ईश्वर तक पहुँचा देते हैं क्योंकि वह हर क्षण उनसे जुड़े रहते हैं. ऐसा लगता है सारे संशय मिट गये हैं और अंततः एक ऐसा प्रकाश मिला है जो उसे कभी छोड़ नहीं सकता. कृष्ण की अनुकम्पा है. यह सारा विश्व उसी का विस्तार है. उस एक की शक्ति ही हर ओर बिखरी है. जिसके मूल में प्रेम है अहैतुक प्रेम ! यह संसार प्रेम से ही बना है, प्रेम पर ही टिका है और प्रेम में ही स्थित है ! 

कल शाम वे एक विवाह भोज में गये. कल रात स्वप्न में माँ को देखा, वह ठीक नहीं लग रही थीं, अस्त-व्यस्त सी कहीं जा रही थीं. दीदी की सास को भी कल बहुत सालों के बाद स्वप्न में देखा, कहीं ऐसा तो नहीं उनकी आत्माएं ही उसे दिख रही हों. आत्मा का अस्तित्त्व शरीर छूटने के बाद भी रहता है. वह इतनी सूक्ष्म होती है कि दिखती नहीं, तरंग का सा रूप होता है, एक ऊर्जा ! वास्तव में प्राणी सारा जीवन उस मृत्यु की ओर पल-पल बढ़ते रहते हैं जो अवश्यम्भावी है, फिर भी वे उसके लिए कोई तैयारी नहीं करता. मृत्यु से पूर्व ही उन्हें यह जानने का प्रयास करना है कि वे कहाँ से आये हैं, क्योंकि वहीं लौटना होगा..


Thursday, March 12, 2015

वृक्ष, नदी, आकाश, हवा


आज सुबह वह उठी तो तन-मन दोनों क्लांत थे, पर क्रिया के बाद तेज प्रकाश का अनुभव हुआ आज्ञा चक्र में और उसे लगा कृष्ण ने आश्वासन दिया है. वह सदा उसके साथ हैं, प्रतिक्षण भीतर से आश्वस्त करते हुए, जग की कोई पीड़ा, कोई दुःख उस आनंद को कम नहीं कर सकता जो कान्हा का साथ उसे देता है. वह उसे अपने बहुत निकट महसूस करती है, वही है जो उसकी आँखों से झाँकता है जब वह दर्पण के सामने खड़ी होती है. वही है जो मुस्कान बनकर छा जाता है जब वह ‘ध्यान’ से उठती है. आज ‘जागरण’ में सुना, विवेक को जाग्रत करना है, विवेक का उपयोग करने की स्वतन्त्रता प्रभु ने उन्हें दी है, जितना विवेक जीवन में होगा उतना जीवन उन्नत होगा. माया रूपी रात्रि में संयम रूपी ब्रेक और विवेक रूपी लाइट लगी जीवन की गाड़ी यदि वे चलायें तो दुर्घटना से बचेंगे और ईश्वर के प्रति श्रद्धा अविचल रहेगी. कल शाम को कुछ देर जून को उसने हृदय के भीतर उमड़ते प्रकृति के प्रति प्रेम को बताया, पता नहीं वे कितना समझ पाए. पेड़-पौधे, नदी, आकाश, हवा, पानी, कीट, पंछी और सभी लोग...सभी एक ही डोर में बंध हैं. वह है साँस की डोर. वे किस तरह जुड़े हैं एक-दूसरे से, ईश्वर ही सबका कारण है, उसी एक का विस्तार है यह सृष्टि. वे इसके प्रति कृतज्ञता से भर जाते हैं, समपर्ण करते हैं, उसे प्रेम करते हैं क्योंकि एक वही है जिसे चाहा जाये और उस एक को चाहने से सभी को चाहना हो जाता है. अहैतुकी भक्ति का उदय हृदय में होता है. ईश्वर जानते हैं कि उनके लिए क्या उचित है, वह उनकी सभी उचित कामनाओं की पूर्ति करते हैं, वही उनके जीवन का आधार है. आज बाबाजी ने अपने चुटीले हाव-भावों से बहुत हँसाया.

It’s a lovely June morning. Rain has just stopped. Breeze is cool and wet. She has finished her morning jobs. Mali is cutting hedge. Nanha went  to his friend’s home in the morning. Music sir came and gave three sargam to learn and aaroh- avroh of rag yaman. So she is continuing in second year. Day before yesterday they went to see the Buri dihing river. It was nice to see the sun setting and water flowing calmly. One fisherman was spreading his net perhaps he was not looking at the beauty of the water but only at the fish in the river. When they for evening walks she always looks at the   trees, flowers and surroundings with an awe. Daily she sees some new tree or some change in them. Nature is very beautiful, human beings are not so, they pretend they act and they want to be beautiful, but it is not that natural. Last evening she attended a meeting in club for Mrinal Jyoti. She and one more lady was assign the job of arranging some special classes in the school once a week. She will definitely enjoy doing it. Today she heard babaji. He was in bliss as always and told many beautiful things about life.

आज पूर्णिमा है, सुबह-सवेरे से ईश्वर की भक्ति की चर्चा कानों में पड़ रही है, ईश्वर उस के प्रति  कृपालु हैं, वह उसे सद्प्रेरणा देते हैं था गुरुजनों को जिन्होंने उसे पा लिया है, उन्हें टीवी के माध्यम से उनके घर भेजते हैं. कर्त्तव्य निष्ठ होकर, प्रेमपूर्वक, भक्तिभाव से उन्हें यह जीवन जीना है. ईश्वर के वे निमित्त मात्र हैं. वही कर्ता है और वही भोक्ता है. वही उसे प्रेरित करता है कि उसे जाने और उसके अंश होने के कारण उसी के समान बनने का प्रयत्न करें अथवा तो स्वयं को पहचानें.   



  

Wednesday, March 4, 2015

कृष्ण की गीता


ज्ञानी गुरू की कृपा के बिना संसार सागर से पार होना असम्भव है, गुरू का हाथ उनके सिर पर रहे तभी उनका कल्याण होगा. कल के उत्सव में उसने एक कविता पढ़ी, जो सभी ने पसंद की, पर यह उतना महत्वपूर्ण नहीं है जितना यह कि गुरूजी ने ही उसे प्रेरित किया. कल उनकी पुस्तक पढ़ी. ज्ञान कितना अनमोल है यदि कोई इसे समझे, तो ही !
दोपहर को पन्द्रह-बीस मिनट ही सोयी पर भारीपन छा गया है, जबकि इससे अधिक देर तक ध्यान करने से भी थकान मिट जाती है. ध्यान में अवश्य ऐसी कोई बात है. आज सुबह बाबाजी ने अपने पुराने अनुभवों का जिक्र किया, उन्होंने विपरीत परिस्थियों में सात वर्ष गुजारे. ईश्वर प्राप्ति के लिए कठिन साधना करनी पडती है और आग में तपकर जब वह ज्ञान प्राप्त कर सके तो संत के पद पर लोगों ने उन्हें बैठाया. गुरू पद को प्राप्त करना अत्यंत कठिन है, और शिष्य बनना सम्भवतः उससे भी कठिन. अपने अहम् को मिटा देना होता है. विनम्र होकर ही गुरू से कोई कुछ पा सकता है. वरन अपने मिथ्या  अभिमान से वह स्वयं ही दबता रहेगा. अध्यात्म के मार्ग पर चलना बहुत कठिन है पर उतना ही मधुर भी...मानसिक तप करते करते मन को अपना दास बनाना है. मन ही उन्हें ऊंचाइयों पर ले जायेगा. मन की एक न सुनते हुए ज्ञान की सुनें, विवेक की सुनें तो सही मार्ग से विचलित नहीं होंगे. उसने घड़ी की ओर देखा, अब शाम के खाने की तैयारी का वक्त है.

परमात्मा की शरण में जाने पर हृदय अपने आप पावन होने लगता है. प्रज्ञा स्थूल होने पर ही अकरणीय कर्म कर बैठती है, बुद्धि यदि परमात्मा में स्थिर हो तभी प्रज्ञा सूक्ष्म होगी, यानि ईश्वर को ईश्वर से ही जाना जा सकता है. मन में न जाने कितने जन्मों के संस्कार हैं, जिनकी छाप इतनी गहरी है कि उसे मिटने में समय तो लगेगा ही. ध्यान के समय निर्विचारता की स्थिति आये उसके पूर्व लम्बे रस्ते से गुजरना होगा. कुछ देर के लिए ऐसा लगता है मन खो गया है पर जैसे ही यह भाव आता है फिर कहीं से कोई विचार प्रकट हो जाता है. ध्यान में बैठना लेकिन बहुत अच्छा लगता है. अज गुरुमाँ कहा कि संगीत अपने आप में कठिन साधना है और इसमें वर्षों लग सकते हैं. सुरों को मन में बैठना ही सबसे कठिन है. इस माह परीक्षा के बाद वह संगीत अध्यापक से विदा ले लेगी और पहले स्वयं रियाज करके जितना सीखा है उसे ही पचाना है. कल रात जून को नींद नहीं आयी, उसकी भी नींद थोड़ी डिस्टर्ब रही. शुभ-अशुभ की स्मृति न रहे, शुभ-अशुभ में प्रीति न रहे तो मन शांत रहेगा. कृष्ण ने कहा है, यदि सारे कर्मों को निष्काम भाव से करते हुए चित्त को उसमें लगाये रखेंगे तो वह बुद्धियोग प्रदान करेंगे. सभी परिस्थितियों में समभाव बनाये रखना भी चित्त को प्रभु में लगाये कहने जैसा ही है. अज वह न व्यायाम कर सकी न ध्यान, उसकी एक पुरानी छात्रा आयी थी, कलकत्ता में रहकर पढ़ी क्र रही है. आज सुबह क्रिया के बाद मन बेहद शांत था, बल्कि मन था ही नहीं, सिर्फ एक मौन था !

पिछले दो दिन डायरी नहीं खोली, शनिवार और इतवार इधर-उधर के कामों में कैसे बीत गये पता ही नहीं चला. कल शाम वह aol के भजन में गयी, योग शिक्षक आये थे, जब उन्होंने गुरू वन्दना शुरू की, उसका मन कृतज्ञता से आप्लावित हो गया. आज गुरुमाँ ने ध्यान की विधि बतलायी. विचार यदि आते हैं तो उनसे लड़ना नहीं है, असंग रहना है. एक विचार आता है वह चला जाता है, अगला अभी आया नहीं है. उस क्षण में स्थिर रहना है. गुरुमाँ नित नये तरह के वस्त्र पहनती हैं, बहुत प्यारी लगती हैं. कभी न कभी  इस जीवन में उनसे भेंट हो, यह उसकी हार्दिक इच्छा है और ईश्वर उसकी इच्छाएं सदा पूरी करते आये हैं ! बाबाजी ने बताया किस तरह संकल्प शक्ति को बढ़ाते जाना है. आत्मा में सुना, सब कारणों के कारण कृष्ण हृदय में रहते हैं, शुभ-अशुभ कर्मों तथा विचारों के साक्षी है. वही कर्म करने के लिए प्रेरित करते हैं. शरीर, मन और बुद्धि की दासता को त्याग कर जब कोई कृष्ण के प्रेम का बंधन स्वीकारता है तो सारा का सारा विषाद न जाने कहाँ चला जाता है !




Wednesday, August 27, 2014

कालिया नाग पर नृत्य


आज चाचा नेहरू का जन्मदिवस है “बाल दिवस ! बाबाजी कह रहे हैं, “शरीर स्वस्थ रहे, मन में शांति रहे, हृदय में आनंद रहे, क्योंकि स्वास्थ्य, शांति और आनंद स्वाभाविक हैं, इनके विपरीत अस्वाभाविक हैं. इनको पाने की इच्छा शेष सभी तुच्छ इच्छाओं को निगल जाती है और अंततः वह इच्छा भी स्वयं ही शांत हो जाती है, हृदय शुद्ध हो जाता है और अपने सहज रूप को पा लेता है. आदि भौतिक कर्म से आदि दैविक फल मिले ऐसा प्रयास करना चाहिए क्योंकि वह कर्म स्वार्थ पर नहीं टिका होगा”. आज उसने क्लब की पत्रिका के लिए हिदी की रचनाओं हेतु दो-तीन महिलाओं को फोन किये, उसे भी दो रचनाएँ तैयार रखनी हैं.

आज दोपहर वह असमिया सखी के यहाँ जा रही है, उसे बुनाई में उसकी आवश्यकता है. कल शाम को क्लब की मीटिंग में होने वाले कार्यक्रम के लिए गीत का चुनाव हुआ, ‘तीसरी कसम’ के एक गीत को चुना है, सिखाने वाली हैं एक बंगाली महिला, कल वह पहली बार उनसे मिली, अच्छा स्वभाव है उनका. कल जून ने seven spiritual laws for success भी प्रिंट कर दिए. परसों शाम उन्होंने ही टाइप किये थे. आज सुबह उसने दो बातों के लिए उन्हें टोका, पर गलत बात के लिए टोका न जाये तो.... क्या किया जाये ? परसों नन्हे के स्कूल में वार्षिक उत्सव मनाया जा रहा है.

“अंतः करण की यमुना में सहस्र फन वाला कालिया नाग रहता है, आत्मा रूपी कृष्ण यदि जप और पूजन का नृत्य उसके फनों पर करता रहे तो सदियों की पुरानी आदत शीघ्र नहीं जाएगी, फन टूटेंगे फिर बनेंगे पर अंततः विजय आत्मा की ही होगी”. हमारे मानस में इच्छाओं, कामनाओं, और वासनाओं के अनगिनत सर्प फन उठाये बैठे हैं जिन्हें अपने वश में करना है. आज बाबाजी ने कृष्ण की कथा का सुंदर अर्थ बताया. चित्त जैसा देखता है वैसा होता है, सन्त को देखते ही ईश्वर का स्मरण होना स्वाभाविक है. आज नन्हे को नहाने के लिए जबरदस्ती बाथरूम में भेजा तो वह पूरे चालीस मिनट बाद निकला. इस सारे वक्त वह नहा तो नहीं रहा होगा बल्कि मुँह फुलाकर बैठा रहा होगा.

“रक्तबीज की तरह मन में विकारों के बीज गिरते हैं तो नये विकार उत्पन्न होते हैं, चंडी माँ की तरह रक्तबीज को खप्पर में एकत्र करते हैं तो विकार बढ़ते नहीं. मानस की उपजाऊ धरती न मिले तो बीज नष्ट हो जाते हैं”. बुद्धि के स्तर पर गोयनका जी की कही यह बात उसे समझ में आने लगी है पर व्यवहार के समय इसे अपना नहीं पाती. होशा जगा रहे तो ही यह सम्भव है. अनुभूति वाला ज्ञान जगने लगे तभी यह सम्भव है. आज सुबह दीदी का फोन आया, उन्हें भी गोयनका जी के प्रवचन के बारे में बताया.

दोपहर के एक बजे हैं, आज मसूर की छिलके वाली दाल बनाई थी जो बहुत गरिष्ठ होती है सो आज एक अलसता सी मन पर छाई है. धूप निकल आई है, पिछले दिनों वर्षा के कारण मौसम बेहद ठंडा रहा. कल फोन से सभी के समाचार मिले, वे एक-एक कर सभी को कार्ड भेज रहे हैं जो नन्हे ने बनाये हैं. कल उसे स्कूल से पुरस्कार में पांच किताबें  मिलीं, सभी उपयोगी हैं. आज शाम को उसे एक सखी के जन्मदिन की पार्टी में जाना है. उससे पूर्व जून को क्लब में होने वाली मीटिंग में जाना है जो ग्रेटर नोएडा में बनने वाले फ्लैट्स  के सिलसिले में है. उन्होंने भी एक फ़्लैट बुक किया है. वर्षों बाद जब वे रिटायर होकर यहाँ से जायेंगे तो उनके रहने के लिए एक घर सुरक्षित स्थान पर होगा जहाँ अपने जीवन के शेष दिन शांति से गुजार सकेंगे. नन्हा तब पढ़ाई पूर्ण कर नौकरी कर रहा होगा, उसका परिवार भी होगा. अगले दो दशकों में उनका जीवन कुछ और ही होगा. समय की धारा यूँ ही बहती चली जाएगी. पूसी के दो छोटे-छोटे बच्चों को आज देखा, बाहर भीगी जमीन पर गर्म पानी के बर्नर के पास एक के ऊपर एक सिमटे पड़े थे.  


  

Thursday, September 6, 2012

फिर फिर बरसे बदली-बादल




फिर बदली छाई है आज, बस दो दिन धूप निकली, ठंड भी कितनी बढ़ गयी है. कल शाम वह थोड़ी देर के लिये उदास हो गयी थी फिर सोनू की किसी बात पर हँसी तो बस... जैसे सारी उदासी छंट गयी. उसे थोड़ा सा प्यार करो तो कैसा खुश हो जाता है, नन्हा फरिश्ता ही तो है वह उसका, कितनी प्यारी-प्यारी बातें करता है और कितने नए-नए तरीके से. आज से वह उसे कभी नहीं डांटेगी, जब तक कि बहुत ही जरूरी न हो. प्यार से सब समझ जाता है पर जब देखता है कि उसका मूड ठीक नहीं है, तो वह भी रुख बदल लेता है. आज शाम उन्हें किसी परिचित के यहाँ जाना है, वे लेने आएँगे. जून परसों आ जायेंगे घर फिर से भर जायेगा, उन्हें कहीं आने-जाने की जरूरत नहीं रहेगी, उनका छोटा सा घर और वे तीनों. देखें वह बनारस की क्या खबर लाते हैं, उसने सोचा.

कल लगभग सारा दिन उन्होंने बाहर बिताया, सुबह नौ बजे ही उसकी मित्र का फोन आ गया था, वह बारह बजे वहाँ पहुंच गयी, शाम को पांच बजे लौटी. अच्छा रहा पूरा वक्त, नन्हा खेल रहा था उनकी बेटी के साथ, एक बार भी नहीं रोया, वही रोई तीन-चार बार, जैसी की उसकी आदत है. उसकी एक दूसरी मित्र कुछ नाराज दिखी, उसे अजीब लगा, स्वार्थ के लिए मनुष्य कितना गिर सकता है, इतने वषों की मित्रता का भी उसे ख्याल नहीं आया. उसके भीतर एक उदासी छा गयी है. सब कुछ कितना पीछे छूट गया सा लगता है, लगता है यहाँ अकेले है, एकांत चाहने पर अकेलेपन से भय तो नहीं लगना चाहिए न, लगता है कोई कमी है जरूर, नहीं तो दिल में कांटे की तरह न चुभती छोटी सी बात.

परसों जून आ गए, सुबह ही आ गये थे नाईट सुपर से, दिल्ली का ट्रिप एक तरह से व्यर्थ ही गया, इतनी तकलीफें उठानी पडीं सो अलग, हाँ यह अच्छा हुआ कि बनारस होकर सबसे मिलकर आ गए. बताया कि माँ अभी भी पूर्ववत बनी हुई हैं, उदास रहती हैं, माँ का हृदय होता ही ऐसा है, या कहें स्त्री का हृदय. वे लोग अगले माह वहाँ जायेंगे. आज फिर मौसम बादलों भरा है. असम को सच ही वर्षा का घर कहते हैं. जून जब यहाँ नहीं थे, उनके विभाग के किसी अधिकारी ने बॉस को बताने की कोशिश की थी की वह इंटरव्यू के लिए गए हैं न कि घर. यह दुनिया स्वार्थी लोगों से भरी हुई है.. कल देवर की एक मित्र की चिट्ठी पढ़ी, कैसा लगता है किसी अदृश्य व्यक्ति के नाम लिखा कुछ पढ़ना, वह होता तो कितनी बातें सोचता, पढ़कर जवाब देता, फिर सिलसिला चलता रहता अब तो एक तरफा खालीपन है जो कितनी आवाजें दो, जवाब में कुछ नहीं भेजेगा. एकाएक उसे ध्यान आया आज फार्म में लगाने के लिए फोटो खिंचाने उसे स्टूडियो जाना पड़ेगा, वह लिखना छोड़ कर काम में लग गयी.



Thursday, August 23, 2012

किताबों की दुनिया



सत्य, प्रिय, हितकर और दूसरे को उद्वेग न देने वाले वचनों को बोलना और स्वाध्याय वाणी का तप है. अभी भगवद् गीता के सत्रहवें अध्याय में यह श्लोक पढ़ा. पिछले कई दिनों से जब से उसने सुबह गीता पाठ में नियमितता बरती है उसकी वाणी कुछ कोमल होती जा रही है. जून को परेशान, दुखी करने वाले कई शब्द जो वह पहले हृदय हीनता का परिचय देती हुई कह जाती थी, कहीं विलीन हो गए. उसने फिर वही पुरानी दिनचर्या शुरू कर दी है, पहले स्नान, फिर पाठ, फिर डायरी और उसके बाद नन्हें का कार्य फिर भोजन बनाना. संभवतः आज सफाई कर्मचारी भी आये, पिछले हफ्ते बाढ़ के कारण नहीं आया. बाढ़ का प्रकोप अभी भी बना हुआ है, आज ही खबरों में सुना तेल का उत्पादन भी ठप है. कल इतवार शाम की फिल्म किरायेदार अच्छी थी और दोपहर की बंगला फिल्म फटिक चंद तो उससे भी अच्छी थी.

हफ्तों से घर से पत्र नहीं आया, पता नहीं क्या बात है. बल्कि कल छोटी बुआ का पत्र आया था, फूफाजी का स्वास्थ्य पहले से ठीक है. मौसम आज सुहाना है, पिछले हफ्ते उसे कॉमन कोल्ड हो गया था, कुछ करने का उत्साह नहीं था. जून ने उसी दिन दांत निकलवाया हा, उसे सूजन थी अब दोनों ठीक हैं.

वर्षा अभी भी हो रही है. ऐसा लगता है कि जब भी वह डायरी लेकर बैठी है वर्षा लगातार होती ही रही है. आज वे तिनसुकिया जायेंगे यदि तब तक मौसम ठीक हो गया. कल उसने हिमांशु श्रीवास्तव की किताब खत्म की, नई सुबह की धूप, अच्छी पुस्तक है, अब दूसरी पुस्तक निमाई भट्टाचार्य की मेमसाहब भी पढ़ेगी. बहुत दिनों पहले भी पढ़ी थी जब जून को पत्र लिखा करती थी, कुछ पंक्तियाँ उसमें से चुरा कर भी लिखी थीं. उसने सोचा देखें अब उन लाइनों का वैसा असर होता है यह नहीं. कल चित्रहार में साधना का नृत्य और यह गीत सुंदर था, ‘घेरे नजरें हसीं यानि तुम हो हसीं..’

कल वे तिनसुकिया गए थे, बाद में वर्षा थम गयी थी . अच्छा रहा ट्रिप, खूब खरीदारी की, वाल्मीकि रामायण, ओवन, कुकर, इडली स्टैंड, चप्पल तथा भुने हुए चने. शाम तक थकान हो गयी थी. आलू- गोभी की तहरी ही बनायी. आज अभी आठ बजने वाले हैं, नन्हा अभी सोया है, दस मिनट ही रामायण पाठ किया होगा कि घंटी बजी, स्वीपर आया था. एक दिन भी सफाई न हो तो घर कितना गंदा हो जाता है. सुबह रसोईघर साफ किया, कितनी चीटियाँ आ जाती हैं आजकल हर जगह. उन्होंने बैठक में एक शो केस कम बुक केस रखा है, कमरा कितना भर सा गया है, जून ने किताबें भी कितने करीने से लगायी हैं उसमें.