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Wednesday, December 9, 2015

संकल्प की छत


अपने अभ्यास के द्वारा जो वे प्राप्त करते हैं वही टिकता है, गुरू की शरण में जाने का अर्थ है गुरू बनने की प्रक्रिया की शरण में जाना. सत्य के समान कोई मंगल नहीं, जिसने अपने अभ्यास और वैराग्य से सत्य की झलक देख ली वही ऊँची उड़ान भर सकता है. आनन्द की चरम अवस्था का अनुभव वही कर सकता है, वह तृप्ति के सुख को जानता है वह पूर्णकाम होता है. वह अपने उदाहरण द्वारा कितनों को आनन्द व सुख का रास्ता बता सकता है. उसके प्रति पूर्ण श्रद्धा और समर्पण हो तभी सत्य की झलक मिलती है. उन्हें डर भी किस बात का है, वे इस जगत में कुछ भी तो लेकर नहीं आये थे, न ही कुछ लेकर जाने वाले हैं, उन्हें जो भी मिला है यहीं मिला है, वे तो सदा लाभ में ही हैं. जगत का उन पर कितना बड़ा उपकार है, उसे लौटाने का तरीका यही हो सकता है कि वे किसी पर भी अपना अधिकार न मानें, यहीं की वस्तु यहीं लौटा दें. स्वयं सदा मुक्त रहें, खाली ! तब इससे भीतर वह भरेगा जो उनका अपना है, उसे वे लेकर जायेंगे और वही वे लेकर आये थे !  

सद्गुरु कहते हैं, क्यों न दुखद स्थितियों का उपयोग जागने के लिए कर लें, जैसे दुःस्वप्न नींद को तोड़ देते हैं. दुःख में वे पूर्ण जागृत हो सकते हैं सुख में बेहोशी छा जाती है. भूख के समय वे जागृत रहते हैं, उपवास का तभी इतना महत्व है, उपवास में कोई अपने पास रह सकता है, जगा रहता है, शरीर के कष्ट के समय भी मन सोया नहीं रह सकता. भय की अवस्था में भी पूर्ण जागरूक होते हैं, तेज गति में भी मन निर्विचार हो जाता है, जीवन की हर परिस्थिति का साधन के रूप में उपयोग किया जा सकता है. यह जीवन निरंतर जल रहा है, यहाँ हर घड़ी खुद की तरफ ले जाना चाहती है, पर वे इसका उपयोग और बेहोश होने के लिए करते रहते हैं. होश पूर्ण विश्रांति ही तो ध्यान है, परिधि पर कुछ न हो रहा हो, केंद्र पर सजगता बनी रहे तभी ध्यान घटता है.

जाने कब से वे माया के बंधन में हैं और जाने कब से परमात्मा की कृपा भी बरस रही है. मन जब व्यर्थ बातों से हटकर उसकी तरफ मुड़ता है तो वह बाहें खोले ही मिलता है. वह परम सत्ता सदा जागृत है, पर वे उसे देखकर भी अनदेखा करते हैं. परमात्मा के चिह्न चारों और बिखरे हैं, वही भीतर भी है जो उनके होने का कारण है, कितना आश्चर्य है कि वे उसे नहीं जानते, वह जो जानकर भी नहीं जाना जाता, वह जब होता है तो वे नहीं रहते, वहाँ से लौटकर कोई आया ही नहीं, वास्तव में परमात्मा ने ही परमात्मा का अनुभव किया है !

आज भी उसने एक सुंदर संदेश सुना, सर्वोत्तम पद है आत्मपद, इसकी शपथ उन्हें ग्रहण करनी है, नकारात्मक भाव से मुक्त रहना, कटुवचन नहीं कहना और सभी को प्रेम देना..ये तीन बातें इस शपथ में शामिल करनी हैं. उन्हें इस शपथ रूपी संकल्प की छत बनानी है, जिससे मन खाली रहे, यह व्यर्थ की बातों से नहीं भरता. नया संकल्प, नयी कल्पना, नया चिंतन तभी मन में आ सकता है, जब पुराना वहाँ न हो, जगह खाली हो तो आत्मा मुखरित हो जाती है. मन बाह्य संसार से ही विचारों को ग्रहण करता है यदि शपथ रूपी छत हो तो उनकी वर्षा से वे बच सकते हैं. अनावश्यक बातों को त्यागकर वे केवल आवश्यक को ही ग्रहण करें तो कितनी ऊर्जा बचा सकते हैं. फिर वही ऊर्जा भीतर जाने में सहायक होती है और वे मनुष्यत्व के पद की प्रतिष्ठा तभी बनाये रख सकते हैं जब भीतर जाकर आत्मा के प्रदेश में प्रवेश हो ! तभी जीवन सुंदर बनता है. ज्ञानी कर्म बाँधते नहीं हैं, कर्म छोड़ते रहते हैं, उन्हें भी प्रतिपल सजग रहकर अपने कर्मों को छोड़ते जाना है.     



Friday, November 27, 2015

चाँदी की पायल


आज सदगुरु ने अभ्यास और वैराग्य पर प्रकाश डाला, जिसे साधक चित्त की वृत्तियों को शांत कर सकें. अभ्यास के लिए समय की आवश्यकता है पर वैराग्य काल निरपेक्ष है. जिस क्षण किसी को चैतन्य सत्ता से प्रेम हो जाता है जगत तत्क्षण फीका पड़ जाता है, यही तो वैराग्य है. एक बार जिसने अमृत चख लिया हो वह पुनः विष की तरफ कैसे जायेगा ? सदगुरु कितने सहज होकर सरल शब्दों में पुनः पुनः पथ पर लौटा लाते हैं, उन्हें जो बार-बार रास्ते से भटक जाते हैं. आज बहुत दिनों के बाद ध्यान की गहराई को महसूस किया. मन कितना गहरा है उन्हें इसकी कोई खबर ही नहीं है. भीतर अनंत शक्ति छिपी है इसकी भी खबर नहीं है. छोटी-छोटी चीजों के पीछे जाकर वे अपना समय और शक्ति नष्ट करते रहते हैं. उस खजाने को अनछुआ ही छोड़ देते हैं. बहुत हुआ तो थोड़ा सा ही पाकर संतुष्ट हो जाते हैं. झलक मात्र से ही संतुष्ट हो जाते हैं. पुनः-पुनः लौटकर आने में जो अब तक का कमाया था वह नष्ट प्रायः ही हो जाता है जैसे कोई एक तरफ से झोली में डाले और नीचे से निकलता जाये तो कैसे भरेगी झोली और फिर वे भरने का प्रयास ही छोड़ देते हैं. अध्यात्म का पथ निरंतर सजगता का पथ है, एक-एक क्षण में सजग. कभी भी यह न मानें कि जान लिया, पा लिया, यह तो जीवन भर की साधना है !

‘कुछ हूँ’ से ‘हूँ’ तथा ‘हूँ’ से ‘है’ तक की यात्रा ही अध्यात्म की यात्रा है. जब ‘है’ की अनुभूति होती है तो कोई भेद नहीं रहता. मुक्त अवस्था तभी मिलती है. आज सुना अभ्यास के द्वारा जो समाधि मिलती है वह असम्प्रज्ञात है, प्रेम, श्रद्धा तथा वीरता से भी समाधि घटती है. मन जब अपने मूल स्वरूप में टिक जाये तत्क्षण समाधि घटती है. आज ध्यान में उसे कुछ अनोखे दृश्य दिखे. चाँदी की पायजेब पहने सुंदर पैर, सम्भवतः कृष्ण के वे चरण जो वह उनकी मूर्ति में देखती है. रंग, प्रकाश और ध्वनि..यह आत्मा का ही स्फुरण है, उसी की ज्योति है, उसी का नाद है, उसके ही रंग हैं, मन जब ठहर जाता है तो ये सब दीखते हैं, इनसे परे वह दृष्टा है जो इन्हें देखता है और द्रष्टा से भी परे  जो है वही वह सत्ता है जिसका कोई नाम नहीं है, कोई रूप नहीं है. जो है. मन न रहे अर्थात मन ठहर जाये तो जगत भी लुप्त हो जाता है. मन ही तो जगत है. उन्हें मन को खाली करना है तब वह प्रकाश और नाद से भरेगा जब उससे भी खाली होगा तब केवल परमात्मा ही रहेगा. सच्चिदानंद स्वरूप परमात्मा, उसे कोई भी नाम दें वह एक ही सत्ता है.


आत्मा में रहना जिसे आ जाये उसे मन परेशान कैसे कर सकता है. आत्मा शुद्ध, बुद्ध, चिन्मात्र सत्ता है, वह आकाशवत् है, मन उसमें उठने वाला एक आभास ही तो है, आभास से न तो डरने की आवश्यकता है न ही उसमें बंधने की जरूरत है ! मन को जब वे अलग सत्ता दे देते हैं तभी दुःख का शिकार होते हैं. जहाँ द्वैत है वहीं दुःख है. विचार भी उसी आत्मा की लहरें हैं जो आनन्दमयी है. भीतर उठने वाले सारे संशय, डर तथा भ्रम उसी आत्मा से ही उपजे हैं, वे दूसरे नहीं हैं, उनसे कैसा डर, विचार तो शून्य से उपजा है और शून्य में ही विलीन हो जाने वाला है. सागर क्या अपनी लहरों से कभी डरेगा, चाहे लहर कितनी भी विशाल क्यों न हो, आकाश क्या बादलों की गर्जन से डरेगा ? वे क्यों अपने मन से डरते हैं, वे सागर की तरह गहरे तथा आकाश की तरह अनंत हैं, वे निर्मल हैं, स्वच्छ पावन हैं. एक भी दुर्गुण उनके भीतर प्रवेश नहीं कर सकता. वे जो हैं वहाँ न कोई गुण है न दुर्गुण वहाँ कुछ भी नहीं है. निर्दोष अनछुए वे शुद्ध प्रकाश हैं, प्रकाश का कोई आकार नहीं. वे उससे भी सूक्ष्म हैं, ऐसा प्रकाश जो भौतिक नहीं है, जो पदार्थ से परे है, ऐसी ध्वनि जो अनाहत है ऐसे स्पंदन जो स्वतः हैं, वे उन सबसे भी परे हैं, मन, बुद्धि आदि तो सहायक हैं उनके न कि दुश्मन, जिनसे बचने के लिए वे ..?  

Saturday, August 9, 2014

किचन में रंग-रोगन


इतने दिनों से सन्त वाणी सुनकर उसे इतना तो निश्चय हो गया है कि उन्हें अपने जीवन को आध्यात्मिक बनाना है. बाबाजी ने बताया, अध्यात्म का अर्थ है अपने भीतर उतरना, भीतर का संयोजन, नियोजन व शोधन, आत्म विश्लेषण ! मन को उच्च आदर्शों, उत्थान, और मूल्यों के प्रति समर्पित करना, अंतकरण को पवित्र करना और अपने मूल स्वरूप को पहचानना. ऊपरी मन बहुरूपिया है कभी उत्थान की ओर जाता है कभी पतन की ओर ले जाता है. कभी संयमी हो जाता है कभी विलासी, यह मन मात्र ही चरित्र का गठन नहीं कर सकता, इससे परे एक ऐसा मन भी है जिसे आत्मा कह सकते हैं, जो निर्विकार है, जहाँ उतार-चढ़ाव नहीं हैं. वहीं तक पहुंचना, अभ्यास व वैराग्य के द्वारा वहाँ तक पहुंचना ही अध्यात्म है. इसके लिए जरूरी है उनकी आस्था का केंद्र उच्च हो, मन में श्रद्धा हो. मन इच्छाओं से मुक्त हो, ऐसा मन निर्मल आकाश की तरह है - स्वच्छ, असीम, अनंत ! जीवन यदि प्रेम, भावना, करुणा से युक्त हो तो मन आत्मा में ही रहता है.

आज उसने फिर सुना, प्रेम एक व्यापक तत्व है, समन्दर की तरह विशाल और आकाश की तरह निस्सीम ! मोह संकीर्ण धारा की तरह है, मोह बंधन में डालता है जबकि प्रेम मुक्त करता है. रात से ही वर्षा की झड़ी लगी थी, जून और नन्हा जब गये तो वर्षा हो ही रही थी, अब थमी है, आकाश जो बादलों से ढक गया था फिर स्पष्ट दिखाई दे रहा है, नीला आकाश जो उसके मन का स्वभाव है, स्वच्छ, निर्मल विशाल और मुक्त ! उन्हें अपने मन के उसी स्वभाव में रहना सीखना है, विचारों के बादल उसे आच्छादित कर भी लें तो भी उन्हें उसकी स्मृति को बनाये रखना है प्रतिपल, प्रतिक्षण ! उसका मन जो चारों दिशाओं में बिखरा-बिखरा सा रहता है उसे एकत्रित करना है एक रूप देना है, यानि प्रतिक्षण जागरूक रहना है. यह संसार जैसा उसे दिखाई देता है वास्तव में वैसा है नहीं, प्रतिक्षण बदलते इस संसार को साक्षी भाव से देखते जाना है. दीदी ने बहुत पहले लिखा था, प्रतिक्रिया ही दुःख का कारण है, देर-सबेर सत्य अपने आप ही सम्मुख आ जाता है, सत्य की स्थापना नहीं करनी पडती, वह तो स्वयंभू है.

Sunday , it is quarter to eight in the evening. Today they got up at six in the morning, did all Sunday jobs, went for a walk in the afternoon. Watched tera jadu chal gya on tv, talked to parents and one friend, who came back today from Bombay. Now they are watching ‘Rishtey’ on Zee tv. Nanha is studying in his room, jun is here with her. Rishtey is very very touchy and warm  serial, really they feel it in their heart.


धर्म उसका है जो उस पर चलता है. जो खुद के प्रति ईमानदार है. जो नये-नये कर्म बंधन नहीं बांधता, ह्रदय में जो गांठे पड़ गयी हैं उन्हें खोलता चलता है. जो स्वयं के लिए सुख-सुविधापूर्ण जीवन की अभिलाषा नहीं रखता बल्कि जैसा समय और परिस्थितियां हों स्वयं को उनके अनुसार ढाल लेता है. धर्म तो भीतर की वस्तु है, अंतर्मन की, भीतर क्या-क्या चल रहा है, क्या वे अपने सहज स्वाभाविक रूप में सदा रह पाते हैं या अपने आप से नजरें चुराते हैं, यदि वे स्वयं की नजरों में धार्मिक हैं तभी दुनिया की नजरों में धार्मिक बने रहने का उन्हें अधिकार है.


उन्हें ऊपर की ओर उठना है, नीचे गिरना तो सहज है, पतन के लिए प्रयास नहीं करना पड़ता, पुरुषार्थ तो उसी में है जब मन आत्मा में स्थित रहे. आज उन्हें दिगबोई जाना है, नन्हे के स्कूल में पैरेंट-टीचर मीटिंग है. अगले सोमवार से उसकी परीक्षाएं आरम्भ हो रही हैं. तैयारी ठीक चल रही है, अब हर वक्त उसे उसके साथ नहीं बैठना होता, स्वयं ही याद करता है, स्वयं को ही सुनाता है. उसे उसकी पढ़ाई से कोई शिकायत नहीं है, जून और वह दोनों संतुष्ट हैं कि उनका पुत्र बुद्धिमान है. कल दोपहर को पहली बार उसे कुछ असहज सा महसूस हुआ शरीर में, कल रात ठीक से सो नहीं पायी. आज सुबह से ही फिर अस्वस्थ महसूस कर रही है. आज ही किचन में रंग-रोगन होने की भी बात थी पर रात से लगातार होती वर्षा के कारण शायद वे लोग आज न आयें, यही बेहतर होगा. कल शाम वे एक मित्र-दंपत्ति से मिलने गये. अगले महीने वे फिर अगले इलाज के लिए जा रहे हैं. ईश्वर चाहेंगे तो उसकी सखी की दिली इच्छा कि वह माँ बने जल्दी ही पूरी होगी.