Showing posts with label दांत. Show all posts
Showing posts with label दांत. Show all posts

Wednesday, July 23, 2014

डेंटिस्ट से मुलाकात


उसके दांत में कैविटी है, कल एक्सरे कराया था, डाक्टर आज आगे का इलाज बतायेंग. कल से ही दर्द भी है, यह सब उसकी ही असावधानी के कारण है. खैर इलाज करने पर ठीक हो जायेगा. आज भी वर्षा हो रही है. सुबह के आवश्यक कार्य हो चुके हैं, अब नन्हे को मदद करनी है व जून के आने से दस मिनट पहले फुल्के सेंकने हैं. उन्हें भी सर्दी-जुकाम ने परेशान किया है. कल घर से आने के बाद पहली बार लाइब्रेरी गयी, दो किताबें लीं जो दस दिनों में वापस करनी होंगी वरना फाइन देना पड़ेगा. कल उस सखी में यहाँ भी गयी, उसका छोटा-बेटा बिलकुल माँ पर गया है, छोटे-छोटे हाथ-पैर और लम्बी-लम्बी उँगलियाँ बहुत अच्छी लग रही थीं. उसकी सास से भी पहली बार मिली. बड़ा बेटा बहुत एक्टिव हो गया है. कल अंततः वह संगीत के लिए नहीं जा सकी, अब अगले सोमवार को जा पायेगी या उससे भी अगले सोमवार को. आज सबह व्रत की महत्ता पर सुना, तो उसे लगा, पन्द्रह दिन में एक बार उन्हें व्रत करना चाहिए, या फिर शुरुआत वे महीने में एक दिन पूर्णिमा के व्रत से करते हैं. उसे अपने साथ जून को भी व्रत करवाने का ख्याल तो ऐसे आ रहा है जैसे वह भी फौरन मान जायेंगे, क्योंकि उन्होंने सुख में, दुःख में, स्वास्थ्य में, अस्वास्थ्य में, मृत्यु में, जीवन में यानि जीवन के हर क्षण में साथ निभाने की कसम जो खायी है.

आज बहुत दिनों के बाद उसने ‘योगासन’ किये, फिर देह का नाप लिया और अपने वस्त्रों को अपने अनुसार ठीक करने के बारे में निर्णय लिया. गर्मी के मौसम में कुरते की बाहें यदि कोहनी से ऊपर हों तो सुविधा रहती है और सलवार का पायंचा अगर पैरों में न फंसे तो चला कितना आसान. आज सुबह जून थोड़ा देर से उठे, पर समय पर ही दफ्तर जा पाए. उसकी नासिका में हल्की सी सुरसुरी लग रही है, कहीं यह आने वाले दिनों में होने वाले उपद्रव की शुरुआत के संकेत तो नहीं. कल एक मित्र परिवार को लंच पर बुलाया था, वे कल ही घर से आये थे, सो सारी सुबह उसी में व्यस्त रही, दोपहर नन्हे को पढ़ाने में, पढ़ता तो वह खुद ही है बस उसे उस पर नजर रखनी पडती है, शाम जून के साथ. कल स्पीकिंग ट्री में sub-conscious mind पर कई बातें पढ़ीं. किसी के सोचने का नजरिया ही उसके आने वाले कल को निर्धारित करता है. यदि उनके विचार अच्छे होंगे तो कल भी अच्छा होगा. अभी एक सखी का फोन आया उसने बताया केन्द्रीय विद्यालय में कल ‘वाक इन इंटरव्यू’ है, उसका पिछला अनुभव देखते हुए इस विषय में बात करना या सोचना भी भूल होगी.   

कल जून ने डेंटिस्ट से बात की, वह उसके दांत का rct करने को राजी हो गये. वे दोपहर साढ़े बारह बजे अस्पताल गये और पौने एक बजे डाक्टर आये, उसे लोकल anesthesia के तीन इंजेक्शन दिए. थोड़ी ही देर में दायाँ गाल सुन्न हो गया लगा जैसे गाल फूल गया हो. जून उसे छोड़कर चले गये. पन्द्रह-बीस मिनट बाद ही इलाज शुरू हुआ जो आधा घंटा चला होगा. डाक्टर बार-बार उसे मुँह खोलने के लिए कहते रहे, जितना हो सकता था उतना उसने खोला पर पीछे का दांत होने के कारण शायद उन्हें देखने में परेशानी हो रही थी. न उसे वहाँ दर्द का अहसास हुआ न घर आकर ही, लेकिन मुँह में उस दवा का स्वाद लगातार बना हुआ है जो कैविटी में भरकर उस पर रुई लगा दी है. जून कहते हैं उन्हें दवा के कारण कोई परेशानी नहीं हुई बल्कि दर्द बहुत हुआ था. उन्हें बहुत अजीब लग रहा था कि वह दवा के कारण कुछ कहा खा नहीं रही है पर बाद में वह उसकी हालत समझ गये. आज सुबह ससुराल से फोन आया उन्होंने माँ के स्वास्थ्य के बारे में नूना के पिता को फोन किया था. कल एक परिचित का फोन आया उनकी कक्षा नौ में पढने वाली बेटी हिंदी व्याकरण पढ़ना चाहती है, उसने मंगलवार से आने के लिये कह दिया है. व्यस्त रहकर शायद वह rct का ज्यादा असर नहीं ले, जून ने आज कहा यह तो छोटी सी समस्या है, कइयों को तो इससे कहीं ज्यादा तकलीफ होती है. Living 7 Habits में ही कल पढ़ा कैंसर के बावजूद कुछ लोग जिंदगी से मुंह नहीं मोड़ते सो अगर उसके मुंह में दवा का टेस्ट है तो यह कोई चिंता की बात नहीं !


Saturday, April 5, 2014

गोद्ज़िला का सीडी


आज वर्षा नहीं हो रही है, वातावरण में उमस सी है. सुबह साढ़े चार बजे वे उठे, उसने पढ़ाया, जून बाहर से अमरूद तोड़ कर लाये, पता नहीं किसने लगाया होगा यह वृक्ष जिसके मीठे फल वे खा रहे हैं. वर्षों बाद उनका लगाये नींबू, संतरे व आड़ू के पेड़ भी किसी और को फल देंगे. ध्यान के लिए आजकल सुबह समय निकालना मुश्किल होता है, सो मन किसी न किसी बात पर पल भर के लिए ही सही झुंझला जाता है, स्वयं को समझाना कितना मुश्किल है !

कल सुबह एक मित्र परिवार आया था, उन्हें घर जाना था, जाने से पूर्व नाश्ता यहीं करवाया तथा साथ ले जाने के लिए कुछ बनाकर भी उसने दिया. दोपहर को KSKT देखी, अंत बहुत दर्दनाक है, लेकिन दोनों के परिवार वालों को यही सजा मिलनी चाहिए थी. उसके एक दांत में अमरूद का बीज फंस जाने से दर्द हो रहा था, आज एक्सरे कराने जाना है. पर उसे लगता है, एक दांत निकलवाने के बाद भी यह दर्द पूरी तरह से चला जायेगा ऐसा नहीं है, इसलिए उसे सही देखभाल और सफाई के द्वारा ही दांतों को ठीक रखना चाहिए. कल शाम वे क्लब गये, रेफरेंस बुक्स की प्रदर्शनी लगी थी, इतनी मोटी-मोटी किताबें और दाम सैकड़ों, हजारों में..वे सिर्फ देखकर आ गये. वैसे भी कम्प्यूटर आ जाने के बाद वैसी किताबों की आवश्यकता नहीं रह जाती. नन्हा कल शाम बेहद चुप-चुप था, बाद में गोद्ज़िला का CD देखते देखते ही सामान्य हो गया, उसका उदास चेहरा नूना से देखा नहीं जाता. शायद ऐसा ही जून को उन दिनों लगता होगा जब विवाह के बाद शुरू-शुरू में घर की याद आने से वह  चुप हो जाती थी और उन्हें उसकी चुप्पी नागवार गुजरती थी. जो प्रेम करते हैं वे प्रियपात्र की उदासी को सहन नहीं कर सकते. जून को इस माह के अंत तक एक पेपर लिखकर भेजना है. व्यस्तता उन्हें प्रसन्न रखती है.

उसे आश्चर्य हुआ कि तिथियों के मामले में इतनी लापरवाह कैसे हो गयी, उसने जून से कहा परसों पन्द्रह अगस्त है सो आज ही उन्हें मित्रों को उस दिन लंच के लिए निमंत्रित कर देना चाहिए. डायरी खोली तो पता चला अभी चार दिन हैं पन्द्रह अगस्त आने में. नन्हा अपना प्रिय कार्यक्रम ‘डिजनी आवर’ देख रहा है. उसने कुछ देर पूर्व लाला हरदयाल की पुस्तक में पढ़ा, धर्म के नाम पर हजारों लोग मारे गये, धर्म ने लाभ के बजाय हानि ही पहुंचाई है. मानव रहस्य दर्शी है, और भगवान से बड़ा रहस्य कौन है, इसलिए तो इतने सारे धर्मों का उदय हुआ. वह खुद भी तो प्रकृति की इस अनुपम सुन्दरता को देखकर इस विशाल ब्रह्मांड को बनाने वाले के प्रति श्रद्धा से भर जाती है. उसका भगवान इस संसार का नहीं है, वह तो ऊर्जा का अंतिम स्रोत है जिससे यह सब हुआ है.


आज उसकी छात्रा ने कहा, अब वह नहीं आयेगी, पिछले दो वर्षों से हिंदी पढ़ाने का क्रम अब टूट जायेगा. उसे वाकई अच्छा लगा, हिंदी व्याकरण का ज्ञान इसी कारण उसे भी हुआ. उसके मन में एक स्वप्न है हफ्ते में दो दिन ही सही छोटी-छोटी लडकियों को पढ़ाये, यह कार्य उसके मन का होगा और इससे समय के सदुपयोग के साथ आत्म संतोष भी मिलेगा. अगले हफ्ते से नन्हे का स्कूल भी खुल रहा है. उसे कम्प्यूटर कोर्स करने का भी मन है. काम करना और अर्थपूर्ण काम करना उसकी जरूरत है सही मायनों में जीवन कार्य का ही दूसरा नाम है.

Tuesday, March 12, 2013

ला ओपेला का सेट



गुलदाउदी के पौधे एक-दो दिनों में मिल जायेंगे, फोन उसकी सखी ने ही किया था, सो उसका यह आक्षेप कि सदा उसे ही फोन करना पड़ता है, गलत सिद्ध हो गया जिसकी उसे खुशी है. शाम को असमिया सखी के घर जाना है, उससे भी बात हुई है, वह उसके नए लाल सूट में इंटर लॉकिंग कर के देगी अपनी नई फ्लोरा पर, और आज सुबह से दो बार प्रेम की अधिकता या भावों की अधिकता के कारण उसकी आँखों में अश्रु झलक आये, कल भी ऐसा हुआ था, कहीं यह उस स्वप्न का असर तो नहीं, या सम्भव है सात्विक भाव प्रगट हुए हों. लेकिन मन ने कल एक-दो बार ऐसा सोचा कि उनकी परवाह किसी को नहीं, उन्हें ही सबकी परवाह है - लेकिन यह सत्य नहीं है, और अगर ऐसा हो भी तो इसमें उदास होने की कोई बात नहीं, बल्कि उन्हें किसी से अपेक्षा करने का कोई अधिकार नहीं. जून के दांत का दर्द कम है, कल उन्हें फिर जाना है. नन्हा आज जल्दी उठ गया था, पर तैयार होते-होते उसे पौने नौ बज गए, शायद उसे खांसी फिर से परेशान कर रही है, वैसे वह गंध के प्रति बहुत संवेदन शील है, हल्की सी गंध से खांसने लगता है.

मौसम भीगा-भीगा है, बादल बरस कर अभी-अभी थमे हैं. खिडकी से नजर बाहर डालो तो बस हरियाली ही हरियाली है. जून इस वक्त तिनसुकिया में होंगे. नन्हा कह रहा था आज से उसकी छुट्टी देर से होगी, उसका टाइम टेबिल आज से बदल रहा है. उसकी पुरानी पड़ोसिन का फोन आया तो उसे अच्छा लगा. कल रात को एक बार गर्मी के कारण नींद खुली फिर सुबह ठंड के कारण- एक जमाना था कि नींद आती थी तो सर्दी-गर्मी और मच्छर किसी का पता नहीं चलता था. बेसुध और बेखुद हो जाती थी. रात बचपन को याद करके सोयी थी, बचपन के माँ-पिता को भी. कल उनका पत्र आया था, लिखा है, अगले महीने उनका घर बनना आरम्भ हो जायेगा, जनवरी तक पूरा भी हो जायेगा. कल जून एक महिलाओं की एक अंग्रेजी पत्रिका लाए, इंग्लैण्ड में प्रकाशित, वहाँ कि संस्कृति यहाँ से कितनी अलग है, उसने गार्डनिंग पर एक लेख पढ़ा, फिर पड़ोसिन से हेज के पास खड़े होकर बात करने लगी पता ही नहीं चला सवा घंटा कैसे बीत गया. उसके बेटे को चिकन पॉक्स हो गया है, वह सो रहा था.

  कल उसके जीवन का एक बहुत अच्छा दिन था, शाम को उसकी एक छात्रा अपने माँ-पिता व छोटी बहन के साथ आयी. वे लोग उसके लिए एक उपहार भी लाए. उन्हें उन सबके आने की उम्मीद नहीं थी, उसके पहले एक मित्र परिवार आया था, घर काफी अस्त-व्यस्त सा हो गया था, खैर.. वे लोग अचछे लगे सरल और सहज..और इतना सुंदर ला ओपेला ला का dessert set.

  उसके पैरों में आज वही दर्द है, डायरी उठाई है, दस बजने को हैं अभी..बस..कुछ..भी..ये चारों शब्द उसके मन की अस्थिरता के परिचायक हैं. कल फेमिना में एक बहुत अच्छा लेख पढ़ा. रात को देर तक सोचती रही कि उसे अपने वक्त का सदुपयोग करना चाहिए, कोई न कोई काम करते रहने की वैसे उसकी आदत तो है ही, बस काम थोड़ा उद्देश्यपूर्ण हो इसका ध्यान रखना होगा. लेकिन अब इस दर्द में तो सिर्फ आराम से बैठकर पढ़ा जा सकता है, नहीं जी, अब इतना भी नाजुक नहीं होना चाहिए इंसान को कि जरा सा मौका मिला नहीं कि लम्बी तान ली...मगर वह तो पढ़ने की बात कर रही थी और वह भी विवेकानंद की किताब का तृतीय अध्याय.  

  दोपहर के पौने दो बजे हैं. किसी परिचिता ने बताया कि नन्हे को कल बस में किसी बच्चे ने मारा था, उसने उन्हें बताया नहीं, शायद इसका कारण यह तो नहीं कि वे उसे कमजोर कहते हैं, मार खाकर आने पर, इस तरह तो वह अपनी समस्या बताएगा नहीं, उसने मन ही मन तय किया, अब से वह ऐसा नहीं करेगी. वह आजकल सुबह सब काम समय पर कर लेता है, पहले की तरह बार-बार नहीं कहना पड़ता. नन्हे से पूछने पर उसने इंकार कर दिया कि बस में किसी से झगड़ा हुआ था, इसका अर्थ हुआ कि सूचना सही नहीं थी. उसका गणित का टेस्ट कल फिर नहीं हुआ. कल ड्राइंग प्रतियोगिता है, पिछले दो-तीन दिनों से उसके मित्र शाम को खेलने आ जाते हैं. वे सब अँधेरा होने तक खेलते रहते हैं, उसे अपने बचपन के दिन याद आ जाते हैं, जब माँ भीतर से आवाज देती थीं और वह अपनी सहेलियों के साथ रस्सी कूदने, गेंद गिट्टी खेलन में व्यस्त रहती थी.

Monday, March 11, 2013

भोज के वृक्ष



भारत छोडो आन्दोलन की स्वर्ण जयंती के उपलक्ष में आज अवकाश है, वे तिनसुकिया गए, एक और परिचिता व उसके छोटे से बेटे के साथ. शाम को एक परिवार मिलने आया, दिन भरा-भरा सा रहा. शाम को जून को थकावट हो गई, धूप में ड्राइविंग करने के कारण ही शायद.
अभी-अभी कल्याण में उसने पढ़ा, जिसके हृदय में भगवान रहते हैं वहाँ भय, विषाद, शोक, व्याकुलता, उद्वेग, निराशा, क्षोभ, संदेह, अश्रद्धा, ईर्ष्या, कायरता, द्वेष आदि का स्थान कहाँ है ? वहाँ तो निर्भयता, शक्ति, तेज, प्रकाश, प्रेम, निष्कामता, संतोष और परम आनंद का निवास होता है. जब ईश्वर अपना लेते हैं, तब वही जो कुछ विधान करेंगे, कल्याण के लिए करेंगे. दुःख हम अपनी ही भूल से अनुभव करते हैं, उस भूल को मिटाने की देर है कि चित्त स्थिर रह सकता है. जैसे स्वप्न में वह तरह-तरह की आपदाओं को झेलती है मगर यह भान होते ही कि यह तो स्वप्न है, मन शांत हो जाता है उसी तरह जीवन में कोई परेशानी हो तो उसे स्वप्न वत मानकर झेल लेना चाहिए क्योंकि उसके बाद तो सुदिन आएंगे ही.

  आज जन्माष्टमी है, सुबह से जो मन शांत था अभी कुछ देर पूर्व नन्हे पर झुंझला ही गया, बच्चे तो आखिर बच्चे ही हैं, काम धीरे-धीरे ही करेंगे न. आज उसने व्रत रखा है, नन्हे और उसने मिलकर मंदिर सजाया है, अच्छा लगता है ईश्वर के करीब रहना लेकिन मन फिर कहीं  और चला जाता है. कल दीदी का छब्बीस का लिखा पत्र आया और कैसा संयोग है उसी दिन उसने भी उन्हें लिखा था. कल छोटे भाई के लिए जन्मदिन का कार्ड लायी थी. नन्हे का स्कूल खुला है, जून आज किसी से लिफ्ट लेकर ऑफिस गए हैं, ‘स्टूडेंट्स यूनियन’ ने चौबीस घंटे का बंद घोषित किया है, कार ले जाना ठीक नहीं था. कल शाम एक सखी के बुलाने पर वे लोग उसके यहाँ गए. लेकिन आज उसे इन दुनियादारी की बातों से मन हटाकर पूर्णता की ओर ले जाना है, जहाँ कोई उलझन नहीं..अद्भुत प्रकाश है, जिसके आगे कुछ पाना शेष नहीं रहता न ही कुछ जानना. दीदी ने लिखा है, “कहीं कुछ ऐसा पढ़ो जिसके आगे लगे कि अब और कुछ नहीं, फ़िलहाल कुछ भी नहीं, तो लिखना”. उसने सोचा अभी पढ़ेगी विवेकानंद की दूसरी पुस्तक उसमें अवश्य ही ऐसा कुछ मिलेगा.

  कल का उपवास अच्छी तरह से सम्पन्न हो गया. जून को कल दोपहर दांत में दर्द था, आज तिनसुकिया गए हैं डेंटिस्ट के पास. आज उसने लंच अकेले ही खाया, जून अभी एक घंटे बाद आएंगे. शायद उन्हें रूट कैनाल ट्रीटमेंट करना पड़ेगा. कई बार जाना होगा. सुबह अलमारी की सफाई के काम में लगी रही. पढ़ने की कोशिश की पर मन नहीं लगा, रात को फिर स्वप्न देखे, इधर-उधर के, अभी उस दिन ही मरते-मरते बची थी एक स्वप्न में. शाम को उन्हें एक परिवार के साथ बैठकर “हम हैं राही प्यार के” देखनी है, कल जून का जन्म दिन है, उसने अभी-अभी एक कार्ड बनाया है. कुछ देर पहले जून को विवाह से पूर्व लिखे कुछ खत पढ़े, कितन प्रगाढ़ था उनका रिश्ता, प्यार के रिश्ते सचमुच कितने मजबूत होते हैं.

  जून का जन्मदिन अच्छा रहा, उसने केक बनाया था. घर पर ही भुजिया भी बनाई थी. पन्द्रह अगस्त पर वे तीनों नेहरु मैदान गए, झंडा आरोहण में सम्मिलित होने. कल रात को एक मधुर स्वप्न देखा, वर्षों बाद भी वह सब उसके अवचेतन में उतना ही सजीव है जितना उस क्षण था, सोलह-सत्रह वर्ष पहले की बात है जब वे पहाड़ों में रहे थे, लेकिन अब भी स्मृति पटल पर सब कुछ कितना स्पष्ट है. वर्षों से स्वप्नों में ही मिलती रही है, लगता है हर साल एक बार मिलना हो जाता है उन वादियों से. यूँ फूट-फूट कर रोना...एक अनजानी तृषा..एक अधूरा वादा लिए ही लगता है इस जग से जाना होगा...वे झरने.. वे रास्ते..वे पहाड़ कभी मिलेंगे उसे? अभी तक जैसे पोर-पोर महसूस कर रहा है वह सब कुछ..स्वप्न इतने मधुर भी हो सकते हैं ? अभी तक उसके मन का एक कोना सुरक्षित है उन यादों के लिए यह उसे स्वयं भी मालूम नहीं था, इतनी शिद्धत से महसूस कर सकती है उस छुअन को इस पल जो वर्षों पहले भी अनजानी थी और आज भी है पर स्वप्न सारे बांध तोड़ देते हैं..नदियाँ मिल जाती हैं..तट तोड़कर...और स्वप्न क्या सिर्फ उसके हिस्से में ही हैं ? और यह भी कि प्रेम सिर्फ बचपना नहीं है..प्रेम उम्र की सीमाओं से परे है. जैसे उसका मन इस समय एक अनोखे प्रेम से लबरेज है..कसक भरा प्यार उन भोज वृक्षों के लिए और फूलों की घाटी में बहती उस चांदी के समान जल धार के लिए..   





Monday, January 7, 2013

दांत का दर्द



उसकी बंगाली सखी का जन्मदिन आने वाला था, जिसे बागवानी में बहुत रूचि थी. उसने सोचा एक कविता लिखेगी उसके लिए-
फूलों सा हो मन उसका
कलियों जैसी ऑंखें,
खुले पलक तो रंग-बिरंगी
मुस्कानें बिखरा दे !

पात-पात से बात करे
ऐसी भाषा उसकी हो
पंखुरी-पंखुरी ओस बिछी जो
ऐसी हँसी बिखेरी हो !

सुरभि कुसुम की बने भावना
विचार पराग बना हो,
वायु सुवासित ज्यों उपवन की
जीवन प्रमुदित उसका हो !

लहरा कर ज्यों झूमा करतीं
कुसुम कतारें विकसित हो,  
सहला दे हर मन की उलझन
पवन झकोरा प्रमुदित हो !

आज उन्हें साथ-साथ चलते हुए पूरे सात साल हो गए हैं. उसक मन भरा है भावों से और उन स्मृतियों से जब उन्होंने प्रेम के अमृत का घूंट पहली बार पिया था...जब पहले-पहल उन्होंने एक-दूसरे को चाहा था. तब से कितनी बार..कितनी ही बार महसूस हुआ है की जितना प्रेम वह उससे करता है उतना किसी ने किसी को नहीं किया होगा..क्या उसे भी कभी ऐसा लगा है ? और अब तो वे एक-दूसरे में इतना रच-बस गए हैं कि एक के बिना दूसरे का अस्तित्व ही नहीं..कुछ साल पहले उसने अपनी डायरी की शरुआत सात जनवरी से की थी और आज भी इस साल का पहला पन्ना है. कल रात एक स्वप्न देखा कि वे लोग यहाँ से जा रहे हैं..इतनी जल्दी में कि किसी से मिल भी नहीं सके, सामान पैक हो गया है बस कार का इंतजार है, हो सकता है यह स्वप्न उस बातचीत के कारण हो जो सोने से पूर्व उन्होंने की थी, वे उसकी छोटी बहन की शादी में जाने की बात पर चर्चा कर रहे थे.

कल व परसों नहीं लिख पायी, दांत में दर्द ज्यादा था, बांया गाल फूलकर गोलगप्पा हो गया है...चार-पांच दिन पूर्व ही उसने सोचा था कि अब वह पूर्ण स्वस्थ है कुछ भी नही होता..और ऐसा सोचना ही शायद पूर्वाभास था कि अब कुछ होने वाला है. डेंटिस्ट को अभी दिखाया नहीं है, पर दिखाना जरूरी है यहाँ या तिनसुकिया जाएँ शायद कल. कल से दवा शुरू की है, पता नहीं कब पूरी तरह ठीक होगा. कल उनकी ट्रेन व फ्लाईट की टिकट हो गयीं. उसने गलती से एक दिन पहले के पेज पर लिख दिया है..हालात क्या इतने बिगड़ गए हैं...

मौसम इस तरह बदले हैं अब के बरस
बरसात आ के चली गयी खबर ही न हुई

कल टीवी पर एक बेहद अच्छा कार्यक्रम देखा, आधुनिक उर्दू शायर मोयद्दीन पर, शेर कैसे होता है ? कितना अच्छा जवाब था उतने ही अच्छे सवाल का, एक बेचैनी सी होती है..कैफियत सी ..फिर शेर होता है खुदबखुद, बेइरादा. जून को यह प्रोग्राम पसंद नहीं...अगर वह भी साहित्य में दिलचस्पी लेता तो शायद ...मगर उसे इन बातों से कोई खास या आम कोई असर नहीं होता, उसका मन जल्दी पिघलता नहीं है जैसे वह कोई पंक्ति पढकर या सुनकर भावुक हो जाती है...फिर भी तो वह उसकी जान है, उसके होने से ऐसा लगता है जैसे अब कोई डर नहीं वह सब कुछ सम्भाल लेगा.. सम्भाल ही लेगा, और नन्हे की भी अपने पापा के बारे में कुछ यही राय है.





Tuesday, September 18, 2012

आपके अनुरोध पर..



आज सुबह घर में सत्यनारायण की कथा हुई थी, दिन भर उसकी सुगंध फैली रही. नन्हा भी आज जल्दी उठ गया था, शाम को उसे लेकर माँ के साथ गंगा घाट तक गयी, वह बेहद खुश था, नदी को देखते ही दूर से बोला, गंगा जी ..वापसी में जैसे ताकत भर गयी थी उसमें. इस समय रात्रि के साढ़े आठ बजे हैं, ननद ने पेठे की मिठाई का एक टुकड़ा दिया, उसके मुख में दाहिने तरफ दांत में दर्द होने लगा है.
आज का दिन शायद उनके लिए कोई विशेष अर्थ रखता है, जून को भी याद होगा, यही तारीख तो थी कितना इंतजार किया होगा उसने उसके पत्र का तब..और आज भी उतना ही इंतजार रहता है. जब तक यह इंतजार बरकरार है, प्यार भी बरकरार है. आज सुबह नींद पौने छह बजे खुली. एक बार सुबह उठी थी, सोनू ने पानी माँगा था, तब चार बजे थे, सोचा इतनी शीघ्र उठके क्या करेगी, लेकिन उसके बाद नींद खुली तो..दिन काफी चढ़ आया था. शायद आजकल साढ़े पाँच बजे से भी पहले सूर्योदय हो जाता है. अप्रैल समाप्ति पर है. उसे याद आया आज इतवार है, जून भी सुबह की चाय पी रहे होंगे, उसने पूछा, बोलो क्या कार्यक्रम है आजका ?

सुबह के पाँच बजे हैं, ऊपर छत पर सोने का सबसे बड़ा लाभ यह है कि सुबह नींद जल्दी खुल जाती है. वरना पिछले दो-तीन दिन पौने छह बजे से पूर्व उठ ही नहीं पाती थी. अभी सूर्योदय नहीं हुआ है, दिन और रात के मिलन का समय कितना भला होता है, आकाश हल्की कालिमा की चादर ओढ़ लेता है कि सब कुछ छिपा भी रहे और दिखाई भी दे. नन्हा सो रहा होगा. वह नीचे सीढ़ियों पर बैठी है, यहाँ हवा रुकी हुई सी है. बैठना तो ऊपर ही चाहती थी पर छत पर और भी लोग सो रहे हैं.

..पर अब वह ऊपर आ गयी है, ऊपर काफी रोशनी है ठंडक भी एक टेबिल फैन जो चल रहा है. आज जून का पत्र आना ही चाहिए, अन्यथा...अन्यथा क्या, कुछ भी तो नहीं, इंतजार करेंगे और क्या. कल शाम टीवी पर ‘अनुरोध’ फिल्म दिखाई गयी थी, वर्षों पूर्व माँ-पिता, भाई-बहनें सभी मिलकर गए थे यह फिल्म देखने, कहाँ पर, यह तो याद नहीं, शायद बनारस में ही, पर बहुत अच्छी लगी थी सभी को यह फिल्म, उसे लगा कि इसी तरह उन सभी को भी यह बात जरूर याद आयी होगी, यदि वे भी इतवार शाम की फिल्म देखते होंगे.

कल जून का एक पत्र मिला और एक बैंक ड्राफ्ट भी, समझ नहीं आता कि इससे उसे खुशी हुई है या परेशानी बढ़ी है. उसे कल रात पहली बार स्वप्न देखा, कितना दुबला-पतला, खोया-खोया सा लग रहा था, दाढ़ी बढ़ी हुई थी. किन्ही परिचित के यहाँ जाने की बात कह रहा था, कोई डिपार्टमेंटल समस्या थी. उसने मन ही मन उसे शुभ प्रभात कहा और स्नेह भेजा. इस समय सुबह के सवा छह बजे हैं, नन्हा सोया है और छत पर आए बंदरों के कारण आँगन में शोर मचा हुआ है. उसे नीचे जाकर पढ़ने की बात सोचनी चाहिए पर उस कमरे में कितनी घुटन होगी रात भर बंद रहने के कारण. रात फिर छत पर सोये थे, शाम से ही लाइट गायब थी. अँधेरे में और गर्मी में किचन में अकेले रहने का उसका कोई इरादा नहीं था, सो खाने में उसने सिर्फ नमकीन चावल बना दिए थे, जो पिताजी को पसंद नहीं आया, उनके अनुसार पूरा खाना बनना चाहिए था. कल उसने जून को पत्र लिखा. याद आया कि कितने दिन हो गए दीदी का पत्र नहीं आया. उसका मन शांत नहीं है, तनाव से जैसे मस्तिष्क तना है, वजह, चारों और से आती आवाजें, एकांत अब सम्भव नहीं है, सर्दियों की बात और थी, सुबह जल्दी उठकर एक घंटा स्वयं के साथ हो सकती थी.


 



Thursday, August 23, 2012

किताबों की दुनिया



सत्य, प्रिय, हितकर और दूसरे को उद्वेग न देने वाले वचनों को बोलना और स्वाध्याय वाणी का तप है. अभी भगवद् गीता के सत्रहवें अध्याय में यह श्लोक पढ़ा. पिछले कई दिनों से जब से उसने सुबह गीता पाठ में नियमितता बरती है उसकी वाणी कुछ कोमल होती जा रही है. जून को परेशान, दुखी करने वाले कई शब्द जो वह पहले हृदय हीनता का परिचय देती हुई कह जाती थी, कहीं विलीन हो गए. उसने फिर वही पुरानी दिनचर्या शुरू कर दी है, पहले स्नान, फिर पाठ, फिर डायरी और उसके बाद नन्हें का कार्य फिर भोजन बनाना. संभवतः आज सफाई कर्मचारी भी आये, पिछले हफ्ते बाढ़ के कारण नहीं आया. बाढ़ का प्रकोप अभी भी बना हुआ है, आज ही खबरों में सुना तेल का उत्पादन भी ठप है. कल इतवार शाम की फिल्म किरायेदार अच्छी थी और दोपहर की बंगला फिल्म फटिक चंद तो उससे भी अच्छी थी.

हफ्तों से घर से पत्र नहीं आया, पता नहीं क्या बात है. बल्कि कल छोटी बुआ का पत्र आया था, फूफाजी का स्वास्थ्य पहले से ठीक है. मौसम आज सुहाना है, पिछले हफ्ते उसे कॉमन कोल्ड हो गया था, कुछ करने का उत्साह नहीं था. जून ने उसी दिन दांत निकलवाया हा, उसे सूजन थी अब दोनों ठीक हैं.

वर्षा अभी भी हो रही है. ऐसा लगता है कि जब भी वह डायरी लेकर बैठी है वर्षा लगातार होती ही रही है. आज वे तिनसुकिया जायेंगे यदि तब तक मौसम ठीक हो गया. कल उसने हिमांशु श्रीवास्तव की किताब खत्म की, नई सुबह की धूप, अच्छी पुस्तक है, अब दूसरी पुस्तक निमाई भट्टाचार्य की मेमसाहब भी पढ़ेगी. बहुत दिनों पहले भी पढ़ी थी जब जून को पत्र लिखा करती थी, कुछ पंक्तियाँ उसमें से चुरा कर भी लिखी थीं. उसने सोचा देखें अब उन लाइनों का वैसा असर होता है यह नहीं. कल चित्रहार में साधना का नृत्य और यह गीत सुंदर था, ‘घेरे नजरें हसीं यानि तुम हो हसीं..’

कल वे तिनसुकिया गए थे, बाद में वर्षा थम गयी थी . अच्छा रहा ट्रिप, खूब खरीदारी की, वाल्मीकि रामायण, ओवन, कुकर, इडली स्टैंड, चप्पल तथा भुने हुए चने. शाम तक थकान हो गयी थी. आलू- गोभी की तहरी ही बनायी. आज अभी आठ बजने वाले हैं, नन्हा अभी सोया है, दस मिनट ही रामायण पाठ किया होगा कि घंटी बजी, स्वीपर आया था. एक दिन भी सफाई न हो तो घर कितना गंदा हो जाता है. सुबह रसोईघर साफ किया, कितनी चीटियाँ आ जाती हैं आजकल हर जगह. उन्होंने बैठक में एक शो केस कम बुक केस रखा है, कमरा कितना भर सा गया है, जून ने किताबें भी कितने करीने से लगायी हैं उसमें.