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Friday, November 16, 2018

फूलों की पौध



शाम के साढ़े पांच बजे हैं. वह ध्यान कक्ष में बैठी है. हल्की सी गंध आ रही है. अब पता नहीं यह गंध कहाँ से आती है, क्यों आती है ? यह कोई रोग है या अस्तित्त्व का प्रसाद...जैसे जो धुन सुनाई देती है वह कोई..सब कुछ एक रहस्य में डूबा हुआ है. आज गैराज से लेकर पीछे के गेट तक का रास्ता बन गया है, काफी टूट-फूट गया था. शायद कल माली कमल कुंड को ठीक करेगा, जिसमें आजकल पानी ठहरता नहीं है, शायद किनारे की दीवार में कोई दरार आ गयी है. नन्हे का फोन जो माह के प्रथम दिन खो गया था, आज मिल गया है. कल उसकी मित्र से बात की. उसने अपने घर में बता दिया है पर वहाँ से कोई जवाब नहीं आया है. आजकल वह नया जॉब भी खोज रही है. जून आज स्टार्टअप इंडिया की मीटिंग में भाग लेने गये हैं, वह कितने सरे कार्यों से जुड़े हुए हैं. उनको इस तरह काम करते देखकर बहुत अच्छा लगता है. आज बहुत दिनों बाद ‘श्रद्धा-सुमन’ ब्लॉग में पोस्ट प्रकाशित की. ‘सिया के राम’ में राम का महाप्रस्थान आज होने वाला है.! सुबह टहलने गयी, ज्ञान, भक्ति तथा कर्मयोग पर चिन्तन करते हुए प्रातः भ्रमण किया. परमात्मा उन्हें कितना प्रेम करता है. उसकी कृपा का अनुभव हर पल होता है ! एक सखी से बात की, छोले-भटूरे बना रही है, दही-बड़े भी जन्मदिन पर !

आज मृणाल ज्योति गयी. महीनों पहले जो स्वप्न देखा था, उसे साकार करने अर्थात टीचर्स के लिए एक वर्कशॉप करने का स्वप्न अंततः सम्पन्न हो गया. जिसका बीज उस दिन पड़ा था जब एक अध्यापक अपनी समस्या लेकर आया था. सभी ने उत्साह से भाग लिया. सुबह पौने नौ बजे वह गयी थी और दोपहर बाद चार बजे लौटी. वापसी में नर्सरी से फूलों की पौध भी ली. कैलेंडुला, कॉसमॉस, डहेलिया, स्टॉक और वरबीना के फूलों से उनका बगीचा अवश्य सुंदर लगेगा. माली कल सुबह लगाएगा. नन्हे से बात हुई, वह अगले हफ्ते जोधपुर व जयपुर जा रहा है, एक मित्र के विवाह में. अगले वर्ष वह भी विवाह बंधन में बंध जायेगा अगर अल्लाह ने चाहा तो..जो भी होगा अच्छा ही होगा. बाल दिवस पर दिगबोई जाना है, विश्व विकलांग दिवस के लिए कुछ स्कूलों में बैज बांटने है. जब वे समाज के लिए कुछ काम करते हैं तो भीतर जिस शांति का अनुभव होता है, वह अनोखी है.

जून का आज शाम को लगभग चार बजे गोहाटी में छोटा सा एक्सीडेंट हो गया. जहाँ पुल समाप्त होता है, वह सड़क पार करने वाले थे, सामने आ रही बस काफी दूर थी, तभी पीछे से एक मोटरसाईकिल आ गयी और वह टकरा कर गिर गये. उनका चश्मा व फोन दोनों टूट गये. कान के पास चोट लगी, एक टांका लगा है तथा पैर में भी चोट आई है घुटने के नीचे. फ्रैक्चर नहीं है, वह किन्हीं अज्ञात लोगों की सहायता से एक क्लीनिक में पहुंचे, जहाँ प्राथमिक चिकित्सा दी गयी, फिर अस्पताल आये. याद नहीं पड़ता पहले कभी उन्हें इस तरह अस्पताल में रहना पड़ा हो. नन्हे से उनकी बात हुई है, वह कल गोहाटी आ रहा है. मना करने कर भी उसका मन नहीं मान रहा. अभी-अभी जून से बात हुई. डाक्टर साहब देखने आये हैं. उनके दो मित्र वहीं बैठे हैं जो रात को वहीं रहने वाले हैं. जीवन में जो भी परेशानी आती है वह कुछ न कुछ सिखाने के लिए ही आती है. उस दिन ग्रे रंग से बात शुरू हुई और उन्होंने ने गोहाटी में उसी रंग की पेंट सिलने दे दी. उसी को लेने गये थे जब यह दुर्घटना हुई. वैसे वह आवाज से ठीक लग रहे हैं. परसों घर आ जायेंगे. कुछ दिन आराम करेंगे तो ठीक हो जायेंगे, चश्मा नया बनवाना पड़ेगा.

Friday, September 27, 2013

हवाई जहाज की दुर्घटना


..और आखिर आज धूप निकल आई है, इतने दिनों के बाद पेड़, पौधे, घास सभी को धूप अच्छी लग रही होगी. पंछियों को भी, जैसे उन्हें इसका स्पर्श कोमल लग रहा है. यहाँ उसके कमरे में खिड़की से आती हल्की तपन भली लग रही है. कल रात आठ बजे वे तीनों आये, थके हुए थे पर स्वस्थ थे. पिता इतना सारा सामान लाये हैं, और माँ उन सबके लिए वस्त्र लायी हैं सदा की तरह, उसे अपनी ड्रेस उतनी अच्छी नहीं लगी, क्यों कि वे बहुत गहरे रंग के रेशमी वस्त्र लाती हैं. वह हल्के और सूती कपड़े पहनना पसंद करती है, पर वह उन पर यह बात जाहिर नहीं करेगी. कल शाम को इंतजार करते समय और आज सुबह भी कुछ देर आचार्य रजनीश की किताब पढ़ी, मन को बांध लेते हैं उनके शब्द, उसे उनकी कुछ बातें अच्छी लगीं कुछ नहीं भी लगीं. कुछ बातें समझ में आती हैं, कुछ बहुत मुश्किल हैं और कुछ पर विश्वास ही नहीं होता.


जून उनकी डाइनिंग टेबल लाने तिनसुकिया गये हैं और कार की बैटरी भी जो परसों गोहाटी से वापस आने पर उन्हें खराब मिली. नन्हा आज देर से आयेगा उसकी असमिया कक्षा होगी. सारी सुबह आजकल कैसे बीत जाती है पता ही नहीं चलता, इस समय पिता टीवी पर क्रिकेट मैच देख रहे और माँ ने स्वेटर बनाना शुरू किया है. घर में चुप्पी है, सिवाय टीवी की हल्की आवाज के या किचन में नैनी के बर्तनों की आवाज के. कल शाम उनके एक मित्र स्वयं ही आ गये, उसने देखा है, यदि लोगों के पीछे भागो तो दूर भागते हैं उन्हें छोड़ दो तो स्वयं ही निकट आते हैं.  और आचार्य के शब्दों में मित्रता सिर्फ प्रसन्नता का आभास मात्र देती है वह भी प्रारम्भ में, बाद में उससे उदासी ही ज्यादा मिलती है. सो जैसा मार्ग में आता जाये वैसा ही लेकर चलते रहना चाहिए. किसी से बंधने की कोशिश करना व्यर्थ है. इन्सान जब स्वयं अपने आप का मित्र नहीं रह पाता है कई अवसरों पर, तो वह दूसरों से हर वक्त ऐसी उम्मीद कैसे कर सकता है ? लेकिन पहले कई बार उसे ऐसा लगा है और आगे भी लगता रहेगा कि दोस्ती भी एक सच्चाई है और वे उससे मुंह नहीं मोड़ सकते, they need friends and they matter for them. आज भी मौसम अच्छा है, यानि बगीचे में काम किया जा सकता है. आज सभी को भाईदूज की चिट्ठियां लिख दीं.

आज बहुत दिनों के बाद लिख रही है, सुबह उसकी लापरवाही से बाएं हाथ की छोटी ऊँगली जल गयी, हल्की जलन है पर उसे सावधान रहना चाहिए था. शाम को मार्किट जाना है, दीवाली की पूजा का सामान लाना है तथा उसके अगले दिन होने वाले विशेष भोज के लिए भी. मौसम आजकल सुहाना है, न ठंड न गर्मी, दीवाली के लिए आदर्श मौसम.

दीवाली आई और चली भी गयी और उन्होंने दीवाली की ख़ुशी में पार्टी का आयोजन भी सफलता पूर्वक किया, और आज घर पहले की तरह व्यवस्थित हो चुका है. पिछले दिनों लिख नहीं सकी और इसी का परिणाम है शायद उसका विचलित मन, पता नहीं कहाँ से आते हैं, छोटे, नाटे, व्यर्थ विचार जो मन को हिला देते हैं और यकीनन चेहरे पर उनकी झलक पडती ही होगी. पर अब जैसे धुंध छंटने लगी है और सूरज निकलने लगा है.

अभी कुछ देर पूर्व पिछले साल का इसी दिन का पन्ना पढ़ा, अच्छा लगा, आज भी सब कुछ ठीक है, वे तीनो स्वस्थ हैं, कोई उलझन नहीं और न किसी प्रकार की प्रतीक्षा, किसी वस्तु, घटना या किसी प्राणी की. दोपहर का वक्त है, धूप जो सुबह बहुत तेज थी, अब गायब हो गयी है. थोड़ी देर में जून माँ को अस्पताल ले जाने के लिए आने वाले हैं, नन्हे के लिए चार्ट पेपर्स पर उसे बाउंड्री लाइन्स खीचनी हैं. आज पिछले दो दिन का अख़बार पढ़ा, दोनों पर मुख्य समाचार हवाई जहाज की दुर्घटना का है. दिल्ली हवाई अड्डे से उड़ान भरना सुरक्षित नहीं है, black listed है हमारा सबसे बड़ा हवाई अड्डा, कमी हर चीज में है फिर भी हम भारतीय सन्तोषी जीव हैं, काम चलाना जानते हैं. पर कभी-कभी ऐसी भयंकर दुर्घटनाओं का सामना करना ही पड़ता है. परसों नन्हे के लिए नानी का बनाया सुंदर सा स्वेटर मिला. कल वे पड़ोस के बच्चे के जन्मदिन की पार्टी में गये, नन्हे ने उसकी सहायता की, दोपहर को गुब्बारे लगाने में और बाद में बच्चों के लिए गेम करवाने में, और उसे इस बात पर कोई अभिमान नहीं था, he was just a helping friend. कभी-कभी बड़े बच्चों से बहुत कुछ सीख सकते हैं.


Thursday, August 30, 2012

ममता के बंधन



कल जून के दो पत्र मिले, एक उसके मायके के शहर से लौट कर आया हुआ और एक वहीं से लिखा हुआ, वह बाद में उससे मिलने वहाँ गए थे. कल रात बहुत वर्षों बाद उसने अपनी एक पुरानी मित्र को स्वप्न में देखा, अभी उस दिन शादी में किसी से उसके बारे में बात की थी, सचमुच वैसी ही थी जरा भी नहीं बदली. सभी से बातें कर रही थी. फिर मैंने एक दो सवाल पूछे अद्भुत स्वप्न था. जून को भी देखा था शायद याद नहीं. उसके आने में दस-बारह दिन ही तो रह गए हैं. अब यहाँ मन नहीं लगता, कल रात नन्हें के रोने पर, मन पहले से ही भरा होने के कारण उसकी भी आँखें क्या भर आयीं सब उसे दोषी समझने लगे हैं. रात को पिता कितना रो रहे थे. पता नहीं यह सच है या उसका भ्रम कि वे  सब लोग उससे ठीक से बात नहीं कर रहे हैं. मन इतना उदास है कि जून अगर होते तो ऐसा नहीं होता.
माँ और पिता का दुःख अब देखा नहीं जाता. सुबह से ही दोनों रो रहे हैं. संतान का दुःख सबसे अधिक पीड़ात्मक होता है. पापा यह कहकर रोते हैं कि आज उस दुर्घटना को पूरे पचास दिन हो गए और माँ को किसी बहाने की जरूरत नहीं है. सुबह उनके कहने पर ही उसने उसके बैग से कपड़े निकल कर धो दिए, वह जैसे उन्हें देख नहीं पा रही थीं. मानव मन कितना भावुक होता है और स्नेह, ममता का पाश कितना मजबूत. बेटे के लिये किस तरह तडप रहे हैं दोनों. समझ नहीं आता किस दिन वे अपने आपको समझा पाएंगे, संतोष दे पाएंगे. मन इतना बोझिल हो गया है और आँखें जल रही हैं पर इस दुःख का कोई अंत नहीं, अंतहीन है यह पीड़ा, अंतहीन हैं ये आँसू. अपने छोटे से जीवन में कितनी आशाएं, कितने सपने जगाए थे उसने. अब जाने किस लोक में होगा, क्या वह महसूस कर पाता होगा कि उसके जनक उसके पिता कितना सोचते हैं उसको, उसको याद करके घंटों आँसू बहाते हैं.

कल रात उसे फिर स्वप्न में देखा, मन कितना बोझिल है सुबह से. देखा कि माँ और कविता पलंग पर सोयी हैं वह दरवाजे के बीचोंबीच रॉकिंग चेयर पर बाहर की ओर मुँह किये बैठा है, वह अपना सूटकेस खोलती है एक के बाद एक कई वस्तुएं निकलती है एक मिठाई का डिब्बा है उसमें से सबसे बड़ी अच्छी वाली मिठाई निकलकर उसके पास ले जाती है, कहती है, भाई की शादी की मिठाई तुमने खायी ही नहीं, तुम इतने दिन कहाँ चले गए थे. वह सिर्फ हँसता है, वह अपने हाथ से उसे खिलाती है थोड़ा सा रस उसके सफेद कोट पर गिर जाता है वह कहती है क्या पानी से साफ कर दूँ, वह मना कर देता है. उसके बाद देखा कि वे लोग घूमने जा रहे हैं जून वह और नूना, रास्ते में उसके दोस्त मिलते हैं जो आश्चर्य से उसे देखते रह जाते हैं. वह उनसे बात नहीं करता, थोड़ी दूर जाकर वह मुड़कर देखती है वे हाथ हिला रहे हैं. जब उसके किसी मित्र ने कोई सवाल किया तो जाने किस डर से उसका हाथ पकड़ लिया या उसने ही उसे छुपाने बचाने के लिये. उसके बाद एक दृश्य में बहुत बड़ी पार्टी हो रही है. वीडियो पर कोई फिल्म दिखाई जा रही है, वह बैठा है, उससे पूछता है, बच्चा कहाँ है, वह नन्हे को लाकर उसे दिखाती है, जो लाल पैंट और गुलाबी स्वेटर पहने है, वह फोटोग्राफर से नन्हें का एक फोटो खींचने को कहता है, पर वह अकेले खींचने को मना कर देता है. उसके बाद की बात उसे याद नहीं. जब इस स्वप्न की बात उसने माँ को बताई तो वह और पापा फिर रोने लगे, पर बिना बताए जैसे मन पर एक बोझ सा था.

उसने अपने मन को स्वच्छ करने के लिये सारी स्मृतियों से एक साथ दूर होने के लिये एक पत्र लिखा - जैसे कोई इन्द्रधनुष देखते-देखते आकाश में घुलता जाता है, जैसे कोई सुंदर सपना खत्म हो जाता है, जैसे मुट्ठी में बंद मणि कहीं खो जाये ऐसे ही तुम कहीं खो गये हो, अनंत आकाश में, जाने किस लोक में विलीन हो गए हो. मेरा तुमसे परिचय ही कितना था. कुल चार बरस ही तो हुए हैं मुझे इस घर में ब्याह कर आये हुए. विवाह से एक दिन पहले तुम आये थे मुझसे मिलने, शरमायी, सकुचायी सी मैं तुमसे ठीक से बात भी कहाँ कर पायी थी. पर देखा था पहले तुम्हें फोटो में, सो पहचान तो देखते ही गयी थी. मन में कहीं गहरे संतोष हुआ था कि सलोना, सुंदर देवर है. तुम्हारे भाई ने मुझे एक दिन तुम्हारे बारे में कई बातें बतायीं थीं कि तुम उसे बहुत प्रिय थे, तुम दोनों भाई माँ-पिता को बहुत सुख देना चाहते थे, कि तुम अपने भाई की कोई बात टाल नहीं सकते थे, कि तुम ऐसे हो, तुम वैसे हो. विवाह के बाद जब तुमसे मिलना हुआ तुम्हें जीवंत आशाओं से भरा, उत्साह से लबरेज पाया. जैसे कोई शक्ति तुम्हारे मन में कूट-कूट कर भरी थी. हर वक्त नयी उमंग, नयेपन की खोज. जाने क्या ढूँढने तुम शहर-शहर प्रदेश-प्रदेश घूमा करते थे. कौन जाने वही तलाश तुम्हें इस दुनिया से कहीं दूर ले गयी, शायद जो तुम चाहते थे वह इस दुनिया में नहीं है. तुम जैसे लोगों के लिये यह दुनिया नहीं हैं. पर कभी सोचा नहीं होगा कि तुम्हारे जाने के बाद हम सबका क्या होगा, कि तुम्हारी माँ, तुम्हारे पिता शून्य में तकते-तकते अपनी ज्योति न गंवा बैठेंगे. तुम्हारे भाई सूनी-सूनी दृष्टि लिये जब मुझे देखते हैं, मैं अंदर तक कांप जाती हूँ. उन आँखों में उठते सवाल को सहने की शक्ति नहीं है मेरे पास. सभी तो जैसे एक दूसरे से अपने से यही पूछते लगते हैं कि तुम कहाँ खो गए. पर ऐसे सवालों के भी क्या जवाब होते हैं. अनुत्तरित प्रश्न हथौड़े की तरह दिमाग से टकराते हैं ऐसा क्यों हुआ, ऐसा हमारे ही साथ क्यों हुआ. और जब कहीं कोई जवाब नहीं मिलता आँखें झुक जाती हैं आँसुओं के बोझ से भारी हो जाती हैं बरस पड़ती हैं. कोई इस दुनिया को छोड़ चुका हो चला गया हो ऊपर अनुपम लोक में तो क्या उसका खत आता है, तुम नहीं थे पर तुम्हारी चिट्ठी आयी, वही जानी पहचानी लिखावट और.. भाभी, शब्द जैसे जला रहे थे, आज तुम नहीं हो मैं तुम्हारे कमरे में देख रही हूँ तुम्हारी किताबों को, सजाये गए सामान को. इन सबमें तुम्हारा स्पर्श है अनगिनत यादें हैं. यह सब लिखकर उसका मन जैसे खाली हो गया वह नन्हें के साथ खेलने लगी.




   

Friday, July 6, 2012

खेल-खिलौने


कल जून के साथ एक छोटी सी दुर्घटना घट गयी, उसकी बाइक मोड़ते समय फिसल गयी. जल्दी आ गए थे वे, नूना उस समय बाहर वाले कमरे में कपड़े प्रेस कर रही थी. नन्हा पास ही खेल रहा था कि देखा उसके दायें बाजू में पट्टी बंधी है, पर उसने कहा मामूली खरोंच है और उसके बाद आज सुबह तक रोज की तरह सभी कार्य किये. कल तक तो वे बिल्कुल ठीक हो जायेंगे. कल घर से चिट्ठी आयी, सबसे मीठी चिट्ठी माँ का होती है, अब उनकी यात्रा में केवल पांच दिन रह गए हैं.

लगभग एक माह पश्चात उसने पुनः डायरी खोली है. कुछ दिन यात्रा में निकल गए कुछ उसकी तैयारी में फिर वापस आकर पुनः घर सहेजने में. नन्हा आज पांच माह का हो गया उसे ट्रिपल एंटीजन व पोलियो की तीसरी खुराक देने आज अस्पताल ले गए थे. सुबह जब वापस आया तो ठीक था पर दोपहर से ही बेहद परेशान है. पहली बार इतना रोया है. जून उसे इस हालत में छोड़कर ऑफिस भी नहीं जाना चाहते थे. इस समय सोया है. जो भी घर में आता है उसे देखकर बहुत खुश होता है. सभी के बुलाने पर हंस देता है, अपनी प्यारी सी हँसी. उसे कुछ होता है तो वे दोनों कितने परेशान हो जाते हैं. लगता है उसका पेट भी ठीक नहीं है. कल परसों उसे आलू खिलाया था व बिस्किट भी, शायद इसी का असर होगा, अभी तक तो वह सिर्फ दूध व सेरेलक पर था.

आज नन्हा ठीक है, कल रात वह कई बार उठा पर जल्दी ही सो जाता था. इस समय पेट के बल लेट कर सामने पड़े खिलौने को पकड़ने की कोशिश कर रहा है, इस तरह लेटने से वह जल्दी ही थक जाता है. अब वह सीधा होकर सर्वोत्तम से छीना-झपटी कर रहा है, पढ़ने का या कुछ भी करने का उसका एक ही तरीका है, वस्तु को सीधे मुँह में ले जाना ऐसा न कर पाने पर शोर मचा कर गुस्सा दिखाता है. सोया रहे तो उठते ही खिलौना उठा लेता है. वे यदि दूसरे कमरे में हुए तो उसके खिलौने की आवाज से ही समझ जाते हैं कि वह उठ गया है.
क्रमशः

Thursday, January 19, 2012

हिंदी देश की पहचान



आज कितने दिनों बाद धूप निकली है, अचार को धूप दिखानी कितनी जरूरी है, फंफूदी लगने जा रही थी. नूना ने खत लिखे, दोपहर को पड़ोसिन आयी थी उसे पर्दे सिलने थे. वह गयी तो फिर से वर्षा होने लगी, वे टहलने भी नहीं जा सके. आकाश पर जो बादल थे वह मन पर भी छा गए, मौसम का कितना असर मन पर होता है, तब जून ने हँसाया उलटी सीधी हरकतें करके.
आज घर का काम जल्दी निपट गया है, अब नूना को कुशन कवर व चेयर बैक सिलने हैं, फिर वह उन पर फूल काढ़ेगी. टीवी पर सुना कनिष्क विमान दुर्घटना की अदालती जाँच होगी, अभी तक ब्लैक बॉक्स को खोला नहीं गया है. कानून की यह गुत्थियां उसे समझ नहीं आतीं. राजीव गाँधी का भाषण ही आज के समाचार का मुख्य भाग था, उन्होंने कहा कि नेहरू और इंदिरा की भाषा नीति में जरा भी परिवर्तन नहीं किया जायेगा, उसे अच्छा नहीं लगा. आजादी के बाद भी हम अंग्रेजी को सम्मान तथा हिंदी को हेय दृष्टि से देखते हैं, ऐसा क्या हमेशा होगा....उसने सोचा.