Showing posts with label आचार्य रजनीश. Show all posts
Showing posts with label आचार्य रजनीश. Show all posts

Friday, September 27, 2013

हवाई जहाज की दुर्घटना


..और आखिर आज धूप निकल आई है, इतने दिनों के बाद पेड़, पौधे, घास सभी को धूप अच्छी लग रही होगी. पंछियों को भी, जैसे उन्हें इसका स्पर्श कोमल लग रहा है. यहाँ उसके कमरे में खिड़की से आती हल्की तपन भली लग रही है. कल रात आठ बजे वे तीनों आये, थके हुए थे पर स्वस्थ थे. पिता इतना सारा सामान लाये हैं, और माँ उन सबके लिए वस्त्र लायी हैं सदा की तरह, उसे अपनी ड्रेस उतनी अच्छी नहीं लगी, क्यों कि वे बहुत गहरे रंग के रेशमी वस्त्र लाती हैं. वह हल्के और सूती कपड़े पहनना पसंद करती है, पर वह उन पर यह बात जाहिर नहीं करेगी. कल शाम को इंतजार करते समय और आज सुबह भी कुछ देर आचार्य रजनीश की किताब पढ़ी, मन को बांध लेते हैं उनके शब्द, उसे उनकी कुछ बातें अच्छी लगीं कुछ नहीं भी लगीं. कुछ बातें समझ में आती हैं, कुछ बहुत मुश्किल हैं और कुछ पर विश्वास ही नहीं होता.


जून उनकी डाइनिंग टेबल लाने तिनसुकिया गये हैं और कार की बैटरी भी जो परसों गोहाटी से वापस आने पर उन्हें खराब मिली. नन्हा आज देर से आयेगा उसकी असमिया कक्षा होगी. सारी सुबह आजकल कैसे बीत जाती है पता ही नहीं चलता, इस समय पिता टीवी पर क्रिकेट मैच देख रहे और माँ ने स्वेटर बनाना शुरू किया है. घर में चुप्पी है, सिवाय टीवी की हल्की आवाज के या किचन में नैनी के बर्तनों की आवाज के. कल शाम उनके एक मित्र स्वयं ही आ गये, उसने देखा है, यदि लोगों के पीछे भागो तो दूर भागते हैं उन्हें छोड़ दो तो स्वयं ही निकट आते हैं.  और आचार्य के शब्दों में मित्रता सिर्फ प्रसन्नता का आभास मात्र देती है वह भी प्रारम्भ में, बाद में उससे उदासी ही ज्यादा मिलती है. सो जैसा मार्ग में आता जाये वैसा ही लेकर चलते रहना चाहिए. किसी से बंधने की कोशिश करना व्यर्थ है. इन्सान जब स्वयं अपने आप का मित्र नहीं रह पाता है कई अवसरों पर, तो वह दूसरों से हर वक्त ऐसी उम्मीद कैसे कर सकता है ? लेकिन पहले कई बार उसे ऐसा लगा है और आगे भी लगता रहेगा कि दोस्ती भी एक सच्चाई है और वे उससे मुंह नहीं मोड़ सकते, they need friends and they matter for them. आज भी मौसम अच्छा है, यानि बगीचे में काम किया जा सकता है. आज सभी को भाईदूज की चिट्ठियां लिख दीं.

आज बहुत दिनों के बाद लिख रही है, सुबह उसकी लापरवाही से बाएं हाथ की छोटी ऊँगली जल गयी, हल्की जलन है पर उसे सावधान रहना चाहिए था. शाम को मार्किट जाना है, दीवाली की पूजा का सामान लाना है तथा उसके अगले दिन होने वाले विशेष भोज के लिए भी. मौसम आजकल सुहाना है, न ठंड न गर्मी, दीवाली के लिए आदर्श मौसम.

दीवाली आई और चली भी गयी और उन्होंने दीवाली की ख़ुशी में पार्टी का आयोजन भी सफलता पूर्वक किया, और आज घर पहले की तरह व्यवस्थित हो चुका है. पिछले दिनों लिख नहीं सकी और इसी का परिणाम है शायद उसका विचलित मन, पता नहीं कहाँ से आते हैं, छोटे, नाटे, व्यर्थ विचार जो मन को हिला देते हैं और यकीनन चेहरे पर उनकी झलक पडती ही होगी. पर अब जैसे धुंध छंटने लगी है और सूरज निकलने लगा है.

अभी कुछ देर पूर्व पिछले साल का इसी दिन का पन्ना पढ़ा, अच्छा लगा, आज भी सब कुछ ठीक है, वे तीनो स्वस्थ हैं, कोई उलझन नहीं और न किसी प्रकार की प्रतीक्षा, किसी वस्तु, घटना या किसी प्राणी की. दोपहर का वक्त है, धूप जो सुबह बहुत तेज थी, अब गायब हो गयी है. थोड़ी देर में जून माँ को अस्पताल ले जाने के लिए आने वाले हैं, नन्हे के लिए चार्ट पेपर्स पर उसे बाउंड्री लाइन्स खीचनी हैं. आज पिछले दो दिन का अख़बार पढ़ा, दोनों पर मुख्य समाचार हवाई जहाज की दुर्घटना का है. दिल्ली हवाई अड्डे से उड़ान भरना सुरक्षित नहीं है, black listed है हमारा सबसे बड़ा हवाई अड्डा, कमी हर चीज में है फिर भी हम भारतीय सन्तोषी जीव हैं, काम चलाना जानते हैं. पर कभी-कभी ऐसी भयंकर दुर्घटनाओं का सामना करना ही पड़ता है. परसों नन्हे के लिए नानी का बनाया सुंदर सा स्वेटर मिला. कल वे पड़ोस के बच्चे के जन्मदिन की पार्टी में गये, नन्हे ने उसकी सहायता की, दोपहर को गुब्बारे लगाने में और बाद में बच्चों के लिए गेम करवाने में, और उसे इस बात पर कोई अभिमान नहीं था, he was just a helping friend. कभी-कभी बड़े बच्चों से बहुत कुछ सीख सकते हैं.