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Tuesday, May 24, 2016

सुखबोधानन्द जी का आगमन


जून आए और उसी शाम माँ को अस्पताल में भर्ती किया गया. आज चौथा दिन है. बारी-बारी से सभी अस्पताल जाते हैं. रात को नन्हा रहता है दादी के साथ. दिन में देर तक पिताजी. आज उनके स्वास्थ्य में कुछ सुधार नजर आ रहा है. कल क्लब में मीटिंग है, उसे दो कार्य करने हैं, पहला मृणाल ज्योति पर छोटा सा भाषण दूसरा हिंदी कविता पाठ का निर्णायक बनना. उसने सोचा वह मासिक डोनर मेम्बर बनने के लिए सदस्याओं से अपील करेगी. दान की महिमा पर भी कुछ कहेगी.  

नये महीने का आरम्भ हुए आठ दिन हो गये, और वह पहली बार लिख रही है. माँ अस्पताल से वापस आयीं पर दो दिन बाद फिर उन्हें जाना पड़ा. अभी तक वहीं पर हैं. टीवी पर एक सिख संत कह रहे हैं जिन्दगी की राह का आरम्भ गर्भ में होता है, मातापिता की वासना के साथ जब जीव की वासना मिल जाती है तब एक जीवन शुरू होता है. जन्म लेने के बाद जो जन्मदिन मनाते हैं वह वास्तविक नहीं है. कोई अपना आदि नहीं जानता. इसी तरह कोई नहीं जानता सृष्टि कब बनी, क्योंकि जब सृष्टि का निर्माण हुआ उसके पूर्व समय था ही नहीं. जो सूक्ष्म से स्थूल बनता है वही स्थूल से सूक्ष्म हो जाता है. उस सूक्ष्म में प्रवेश करने के लिए सूक्ष्ममति चाहिए. मति स्थूल तब हो जाती है जब हर वक्त संसार के विचार ही मन में घूमते रहते हैं. सत्संग करते करते जब चेतन मन का दायरा बड़ा होने लगता है तब मति सूक्ष्म होने लगती है. जब मति सूक्ष्म हो जाती तब भीतर का ज्ञान प्रकट होता है.

आज शाम को क्लब में सुखबोधानन्द जी का कार्यक्रम है. उनके प्रवचन सीडी से सुने हैं पहले, एकाध बार टीवी पर भी सुना है. किताब पढ़ने का अवसर कभी न कभी मिल जायेगा. टाइम्स ऑफ़ इंडिया में उनके लेख पढ़े हैं पर सामने सुनने का अवसर मिलेगा, अवश्य अच्छा लगेगा. जून एक बार घर आएंगे, नन्हे को अस्पताल व पापा को घर छोड़ देंगे. उनकी नई नैनी काम ठीक कर रही है, उसे आज एक हफ्ता हो गया है, सभी काम जान गयी है. घर जाने की जल्दी नहीं होती उसे, अभी विवाह नहीं हुआ, एक बार इस चक्कर में आ गई तो फटाफट काम खत्म करके भागने की फ़िक्र में रहेगी. पुरानी के साथ किस्मत ने जो किया उसका चले जाना ही ठीक था. पिछले महीने उसके अपाहिज पति का लम्बी बीमारी के बाद देहांत हो गया, दो बच्चे हैं, पांच वर्ष की बेटी दो वर्ष का पुत्र. ससुराल में रहकर ठीक एक महीने का शोक उसने मनाया पर उसके अगले ही दिन पड़ोसी के पुत्र के साथ कहीं चली गयी. बच्चे दादा-दादी के पास हैं. ममता को किस तरह भुला कर उसने यह कदम उठाया होगा. आस-पड़ोस के लोग आश्चर्य कर रहे हैं पर वह जानती रही होगी, उसके बिना भी बच्चे सुरक्षित हैं. रोज-रोज के कलह से तो अच्छा है दूर चले जाना. जीवन कितना विचित्र है, माँ जब ठीक थीं उसके बच्चों के साथ खेलती थीं, बीमार होने के बाद एक दिन कहने लगीं देखना यह चली जाएगी, उस वक्त सबने उनकी बात को मजाक में लिया था.