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Monday, September 15, 2014

यादों की परछाइयाँ




 ध्यान वह स्थिति है जहाँ मन नहीं रहता अथवा तो मन समाहित हो जाता है, न भूतकाल की चिंता न भविष्य की कल्पनाएँ ! संसार समय की बदलती हुई स्थिति को दर्शाता है. ध्यान समय, संसार और विचार तीनों से पार ले जाता है. ध्यानस्थ मन ही ज्ञान का अधिकारी हो सकता है. ध्यान एक तरह से मन का स्नान है, मन उज्ज्वल होता है, हल्का होता है, स्वस्थ होता है अर्थात स्व में टिक जाता है, स्वच्छ होता है अर्थात निर्मल होता है. आज बाबाजी ने कितनी सुंदर बातें कहीं, जगत का अभिन्न उपादान ईश्वर है, जो इस जगत को ईश्वरमय जान लेता है उसका ध्यान टिकता है. आज सुबह छोटी बहन से बात की उसे इसी माह पुनः फील्ड ड्यूटी जाना है, अगले माह ही पूरा परिवार पुनः मिलेगा. कल शाम जून ने उसकी डायरी पढ़ी, वर्षों बाद उन्होंने ऐसा किया है. नन्हे की आज बायोलॉजी की प्रयोगात्मक परीक्षा है. कल रात खाने के समय उसका मनपसन्द कार्यक्रम टीवी पर देखने को नहीं मिला तो कैसे चुप हो गया था, हरेक के पास नाराजगी जाहिर करने का कोई न कोई उपाय है.

इस क्षण ऐसा लग रहा है, सब ठीक है. आज से दो हफ्ते पहले आज ही के दिन वे कितने उदास थे. एक बार पढ़ा था कि जब भी किसी दुःख या विपत्ति का सामना करना पड़े तो उसे दो हफ्ते या दो महीने बाद कल्पना में देखना चाहिए कि उस वक्त उसका क्या प्रभाव पड़ रहा होगा. दुःख की घड़ी में बुद्धि भ्रमित हो जाती है, सही निर्णय लेना तो दूर सही वार्तालाप भी नहीं कर पाते. अब माँ की यादें ही उनके साथ रह गयी हैं, वह स्वयं पूर्ण विश्रांति पा चुकी हैं. उसने याद करने की कोशिश की, पिछले वर्ष या पिछले महीने आज के दिन वे किस मनः स्थिति में थे. दुःख या सुख का अनुभव किया होगा किन्तु कुछ याद नहीं आया, वह समय बीत गया परन्तु वे फिर भी हैं ऐसे ही आज के सुख-दुःख भी बीत जाने वाले हैं. वे साक्षी भाव में उसे देखते चलें. उसमें डूब कर अपनी मानसिक, आत्मिक व शारीरिक ऊर्जा का हनन न करें. सन्त कहते हैं, सारा संसार सपना  है और जो उसे देखने के योग्य बनाता है वह परमात्मा ही अपना है. कल उसने बैक डोर पड़ोसिन के यहाँ, जो घर में ही पार्लर चलाती है, हेयर कट करवाए. बहुत अच्छे तो नहीं कटे पर जून ने कहा ठीक हैं, और उसके जीवन की नैया की पतवार तो उनके ही हाथ में है. गुजरात में कल फिर भूकम्प के झटके महसूस किये गये, भयभीत और पीड़ित लोग और घबरा गये. ईश्वर इतनी परीक्षा क्यों ले रहा है. धीरे-धीरे वहाँ जीवन सामान्य होता जा रहा था. पुनर्निर्माण का कार्य भी शुरू हो चुका है.

कल सुबह जून को उसने जब परेशान होकर कहा कि छोटे भाई ने फरवरी में आने के लिए मना किया था अपने बच्चों की परीक्षाओं के कारण और इस विषय में बहनों से ही उसकी बात हुई है तो वे सोच में पड़ गये. उन्होंने भी तो नन्हे की परीक्षाओं को महत्व देते हुए उनके बाद ही यात्रा करने का निर्णय लिया था. दोनों का ही दिन सोच-विचार में बीता, पर शाम होते-होते उन्होंने निर्णय ले लिया कि अब इस बात को यहीं छोड़कर आगे बढ़ने का वक्त आ गया है. बड़े भाई का फोन आया, उन्हें उसकी फ़िक्र है ऐसा लगा, उन्होंने पुनः फोन करने को कहा है. कल रात वे ठीक से सो पाए, फिर भी एक स्वप्न तो उसने पिछली कई रातों की तरह देखा जो माँ से जुड़ा था. अभी अभी ससुराल से फोन आया वे लोग इस महीने के अंत तक नये मकान में चले जायेंगे.

कल रात छोटे भाई का फोन आया, उसके अनुसार उन्हें इस बात का आभास नहीं था कि आने को मना करना इतना बुरा लगेगा. उन्होंने सामान्य तौर पर यह बात कही थी. छोटी बहन ने माना कि उसने ही पिता को इसके बारे में बताया था. जून ने भी सभी से बात की, इतने दिनों का उहापोह खत्म हो गया. उसने दीदी को भी धन्यवाद देने के लिए फोन किया जिन्होंने भाई को नूना की मनः स्थिति से परिचित कराया पर वह पूजाघर में थीं, उसने जीजाजी को संदेश दे दिया.  

आज सुबह बहुत दिनों बाद वे आराम से उठे, क्यों कि रात आराम से बीती. कल ‘जनगणना’ कार्यालय के कर्मचारी आये, उसने उनके प्रश्नों के उत्तर दिए. उनका घर जाना अब तय हो गया है. मन जैसे हल्का हो गया है. इस दौरान उन्हें भाई व दीदी के शहर भी जाना है. हो सका तो एक दिन के लिए मामीजी से मिलने उनके शहर भी जाना है. बड़ी बुआ जी के साथ भी एक दिन बिताना है. पैतृक निवास पर भी जाना होगा. चचेरी बहन से मिलना है. फुफेरी व ममेरी बहन से फोन पर बात करनी है. छोटी बुआ से भी वह बात करेगी, हो सका तो रास्ते में मासी के घर भी जाएगी. वह उन सब के साथ मिलकर माँ की उन यादों को बांटना चाहती है जो उनके मध्य साझी हैं. इसके अलावा अपनी किताब के लिए प्रकाशक की तलाश करनी है.   


Wednesday, December 4, 2013

सेवेन समर्स- मुल्क राज आनन्द


पल में बदली पल में सूरज
पल-पल मौसम रूप बदलता
हवा उड़ा ले जाती बादल
आंचल ज्यों माथे से सरकता

सूर्य रश्मियाँ प्राण फूँकती
मेघा नमी पवन को देता  
हवा बिखेरे मादक सौरभ
धरती भर देती मोहकता

खिड़की से झांकता बसंत
महक उठे हैं दिग दिगंत
ज्यों करवट ली कलियों ने
फूलों ने ली अंगडाई
कोंपल कोंपल में हरीतिमा
नव पल्लव धर मुस्काई

कल महीनों बाद मन में कविता उगी, बसंत के आगमन से कोई दिल अछूता रह भी कैसे सकता है, गेट पर खड़ा वह श्वेत फूलों से भरा वृक्ष इतना सुंदर दखता है. हवा में आम के बौर की खट्टी-मीठी खुशबू, सब कुछ इतना मोहक हो जाता है इस मौसम में और इसी मौसम में तो आता है रंगों का त्योहार होली ! वे इस बार होली पर जयपुर में होंगे. आज नन्हा समय पर तैयार हो गया था, उसका भी काम हो गया है, अभी दस ही बजे हैं, एक बार सोचा किसी सखी से फोन पर बात कर ले, पर अगले ही पल रुक गयी, क्या बात करेगी, सिवाय हाल-चाल पूछने के, यूँ मौसम पर भी बात हो सकती है और कुछ अन्य भी, पर उसे लगता है दिन भर में वे गम्भीर बातें मुश्किल से पांच प्रतिशत ही करते होंगे, ज्यादातर इधर-उधर की बातें ही तो करते हैं, तो क्यों न फोन पर एक सार्थक, थोड़ा गम्भीर किस्म का वार्तालाप किया जय, लेकिन विषय क्या हो? आज पड़ोसिन से थोड़ी देर बागवानी पर बात की, फूलों और पौधों पर, उसने सोचा अगले हफ्ते उनकी यात्रा से पहले के अंतिम पत्र लिखेगी, बहुत महीनों से बल्कि वर्षों से छोटी बुआ का कोई पत्र नहीं आया है, वापस आकर उन्हें भी लिखेगी. मौसम आज भी भीगा-भीगा है, आकाश पर सलेटी रंग के बादल एकसार फैले हैं, सूरज का कोई अता-पता नहीं है.

मुल्कराज आनन्द की बचपन की यादें रोचक हैं, seven summers कल से पढ़ना शुरू किया है, कई ऐसे शब्द हैं जिनके अर्थ उसे नहीं पता, लेकिन डिक्शनरी खोल कर पढ़ने से वह आनन्द कहाँ जो बिना रुके पढ़े जाने में है. अपने बचपन की कई यादें मन में कौंध गयीं. बस्ती में बड़ी बहन की सहेली शैला के साथ गुड़ की चाय बनाना, नल में उसके दायें हाथ की अंगुली कटना, मकान मालिक के लड़के का अपनी सांवली बहन की गुड़िया पेड़ पर टांग देना, उनके यहाँ भोजन करने जाना, उस दाल-चावल की खुशबू आज तक उसे नहीं भूली. मकान मालिक के लडके की खिलौनों से सजी आलमारी, पेड़ के नीचे चारपाई पर लेट कर आंवले खाना और मकान मालकिन की बेटियों, गौरी व मुन्नी की मोटी-मोटी चोटियाँ, बड़ा सा बगीचा, मंझले भाई का पांच रूपये का नोट लेकर चना मुरमुरा खरीदने आना, उसे नंगा बाबा कहकर चिढ़ाया जाना और तेज वर्षा में छोटे भाई का बादलों से आना, रोने पर भूत और हौआ से डराया जाना. घोड़े के मुख वाले भिखारी का भीख मांगने आना, ऐसी न जाने कितनी और छोटी-छोटी यादें होंगी जो मन के किसी कोने में पिछले इतने बरसों से दबी पड़ी होंगी. शाहजहाँपुर की यादें और स्कूल की यादें, उसे भी इन यादों को कहानी की शक्ल में ढालने का काम करना चाहिए. बचपन की उस रात को बिल्लियों की आवाजें, भूत के पैरों की छम छम, अमराई में लोगों को उलटे पैरों वाली डायन का दिखना, कितनी अजीब और रोचक यादें हैं न !     






Friday, December 21, 2012

हर्बी गोज बनाना



कल रविवार था, दिन में उसकी दो सखियाँ आयीं, दोपहर बाद गयीं, शाम भी फिर सारे काम निपटाते जल्दी से बीत गयी. पर सोमवार की शाम बिताए नहीं बीतती, उन्होंने कैरम खेला, डांस किया, नन्हे ने होमवर्क किया, कुछ देर राइम्स की किताब पढता रहा, उसकी लिखाई भी अब सुधरती जा रही है, टेस्ट में भी अच्छे मार्क्स आए हैं. और फिर वे जल्दी ही सोने आ गए, जून के होने पर वह इस समय खाना बनाने जाती है.

आज सुबह उसने अपनी पड़ोसिन को दिन में आने के लिए निमंत्रित किया था, दोपहर भर वे साथ रहे. शाम को मालूम हुआ कि उसे बुखार हो गया है, नूना को बहुत खराब लगा. शायद वह उसमें अपनी छोटी बहन को देखती है तभी उसका दुःख अपना दुःख लगता है. सुबह से जून का फोन नहीं आया था, पर उसकी बंगाली सखी आई उनका समाचार लेकर, उसके पति ने खबर दी थी जो जून के साथ ही काम कर रहे हैं. उन्होंने ड्राइवर के हाथ फल भिजवाए थे और दो कैसेट भी, एक हिंदी फिल्म “हम” दूसरा “हर्बी गोज बनाना” जो बहुत अच्छी कॉमेडी फिल्म है.

सप्ताहांत पर वे वापस आए हैं, उन्हें एक जगह सत्यनारायण की कथा में जाना था. वहाँ से लौटे तो पड़ोसियों के यहाँ गए, दरवाजा खुलने में थोड़ी देर लगी, बाद में उसे लगता रहा व्यर्थ  ही गए वहाँ. कल वे लोग तिनसुकिया जा रहे हैं और बाद में आर्मी कैंटीन भी, उसने सोचा  पहले कितना सोच-समझ कर वे पैसे खर्च करते थे और अब मन में ख्याल आते ही उस सामान को मूर्त देखना चाहते हैं. गर्मियों में माँ-पिता आ रहे हैं, कुछ सामान उसी की तैयारी है. हो सकता है तब तक वे बड़े घर में शिफ्ट हो जाएँ.

वे फिर चले गए हैं, नन्हा झूला पार्क गया है, उसने कुछ देर बगीचे में सफाई की, कुछ देर अखबार पढा, पर मन नहीं लगा. कढ़ाई का काम भी अधूरा पड़ा है. तिनसुकिया से सारिका भी लायी थी, अभी तक एक कहानी ही पढ़ी है, वह भी रास्ते में ही पढ़ ली थी कार में. किसी को दुखी देखकर, परेशान देखकर दिल में कैसी गांठ सी पड़ जाती है, आँखों में आँसू आ जाते हैं, जाने कहाँ से, क्या इसी का नाम सहानुभूति है, भाईचारा है, प्यार है, मानवता है..उनकी महरी के मन में भी ऐसी ही गांठ पड़ जाती है, उसका दिल भी ममता से भरा है, दुनिया में कितने ही लोग ऐसे होंगे.

पिछले कुछ दिनों से डायरी लिखने का अभ्यास या कहें क्रम कुछ बिखर सा गया है. आज फिर एक बार यह सीखने के बाद कि..अपने घर सा सुख कहीं नहीं..मन अपने अंदर की ओर झाँकने को कह रहा है. उसने सोचा, वे हमेशा बाहर ही देखते हैं, बाहर ही सब कुछ खोजते हैं, किसी से कुछ न कुछ कहने को, सुनने को लालायित रहते हैं. पर कितना समय वे अपने आप को देते हैं..अपने मन से बातें करते हैं, अपनी आवाज को पहचानते हैं. उसने सोचा उसे तो कम से कम इधर-उधर भटकने के बजाय अपनी प्रिय डायरी के पास होना चाहिए जो उसकी सारी बातों को सुनती है, जवाब भी देती है, उसे अकेलेपन से मुक्त करने के बजाय उससे जुड़ने का सुख देती है. जून का प्रेम असीम है यह बात वह पहले भी कई बार महसूस कर चुकी है और लिख भी चुकी है पर बार-बार कहने का मन होता है. उसका प्रेम इतना विशाल है कि उसकी कड़वी बातें भी उसकी मिठास में घुल जाती हैं, और उसे भी उसके सान्निध्य में अवश्य ही सुख मिलता होगा तभी तो..और कभी थोड़ी बहुत नोक-झोंक होने पर नन्हा बड़ी जल्दी सुलह करा देता है.

कल माँ-पिता का पत्र मिला, हमेशा की तरह चंद पंक्तियाँ पिता की अंग्रेजी में लिखी हुईं फिर लम्बा सा पत्र माँ का. सुबह से ही वह सोच रही थी कि उन्हीं रिश्तेदार को फोन करके घर आने के लिए कहेगी पर..साढ़े नौ बजे के लगभग उनकी नौकरानी ने बताया कि वे लोग घर गए हैं, उनके बड़े भाई की मृत्यु हो गयी है. सुनकर कैसा तो लगा, वह तो रो ही पडती शायद कि जून आ गए..उन्हें फिर दो दिनों के लिए तलप जाना था सो सामान लेने आए थे. दोपहर को उसकी असमिया सखी आई, शाम को सामने वाले घर की छोटी बालिका के साथ कैरम खेला, वे लोग भी आज नए घर में शिफ्ट कर रहे हैं. पुराने लोगों में इस लेन में वे ही रह गए हैं, एक दिन उन्हें भी जाना होगा, शाम के पांच बजे हैं नन्हा सोया है, वह बाहर बैठ कर  लिख रही है, पूरी लेन खाली है.

Wednesday, December 19, 2012

कैरम का खेल



जून आज सुबह जल्दी चले गए, देर रात तक लौटेंगे, सो दोपहर वह और नन्हा उन्हीं दूर की रिश्तेदार के यहाँ गए, बहुत सी बातें हुईं, अच्छा लगा वहाँ, नन्हा तो पूरा वक्त खेलता ही रहा. वहाँ एक और परिचिता मिल गयीं, जो वापसी में अपने घर ले गयीं, जिसमें उन्होंने अभी-अभी शिफ्ट किया है. घर लौटते-लौटते चार बज गए थे, उसे थोड़ी थकान हो रही थी पर नन्हा, गजब का स्टेमिना होता है बच्चों में, इतना खेलने के बाद भी शाम को खेलने के लिए तैयार हो गया. खेल कर आया तो होमवर्क करने बैठ गया, तभी उसकी एक बंगाली मित्र आ गयी मिलने, यानि पूरा दिन ही व्यस्तता में बीत गया. अकेलेपन का अहसास ही नहीं हुआ, पर वह नहीं हैं यह बात तो याद आती ही है हर बात में...वह इतना ख्याल रखते हैं उन दोनों का कि...कल ‘बंद’ है गणतंत्र दिवस के कारण, यहाँ छब्बीस जनवरी हो या पन्द्रह अगस्त यही होता है. टीवी पर ही देख पाएंगे झंडा आरोहण वे लोग.

रिपब्लिक डे ! आज एक अनूठे उत्साह से मन ओत-प्रोत है. जून और उसने साथ-साथ परेड देखी, यूँ उन्हें इतना शौक नहीं है टीवी देखने का, सारे काम निपटाते रहे, ताकि वह आराम से परेड देख सके. सुबह की चाय, गाजर का हलवा, और दोपहर का पुलाव भी बनाया, उसने बस तैयारी भर की. दोपहर को धूप में अलसाये भी. पिछले दिनों वह सोच रही थी कि अब उन्हें एक-दूसरे की कमी पहले की सी नहीं खलती, पर मूड की बात होती है और यह कोई ऐसी बात नहीं है जिसके लिए कोई हार्ड और फास्ट नियम बनाएँ जा सकें, कभी-कभी मन अपने आप ही व्याकुल हो जाता है और अक्सर ऐसा नहीं होता, यह भी सच है. विवाह के छह वर्ष भी तो गुजर गए हैं लेकिन साथ रहना कितना भला लगता है यह बात और है कि कभी-कभी रात को नींद नहीं आती...आजादी याद आती है...उसे लगा यह क्या लिखती जा रही है...कल वह चले जायेंगे और फिर अकेले रहना होगा. आज की फिल्म महानंदा ठीक सी ही थी पर देखी हुई थी, सो वे कैरम खेलने लगे. सोनू ने कल उनके किसी बात पर झगड़ने पर कैसे मासूमियत से कहा, अब मुझ पर असर पड़ेगा ! पूछा, किस बात का असर...तो बोला, आपके बोलने का, उसने कभी सुना होगा माँ-बाप की लड़ाई का असर बच्चों पर पड़ता है..कितना भावुक है वह और कितना प्यारा भी...परसों उसका टेस्ट है, तैयारी तो ठीक है..देखें क्या करता है.

इतवार है आज, जून दोपहर को ही चले गए, नन्हा सो रहा है और वह कुछ सोच रही है. परसों बालकवि बैरागी की कविता- सड़कों पर आ गए अंगारे.. बहुत अच्छी लगी थी. दिक्कत यह है कि कविता की लाइनें उसे याद नहीं हैं पर भाव अच्छी तरह से याद हैं, गोविन्द व्यास भी अच्छे रहे, और शरद जोशी थोड़ा कम जितनी उनसे उम्मीद थी..पर विचार बहुत अनूठे थे उनके भी. अनजान कवयित्री बस यूँ ही सी थी एक शेर को छोड़कर बाकी तुकबंदी थी. गाँधी जी के सपनों का जहान भी ठीक था पर उसे लाएगा कौन ? इन कवियों की बातें लोग (उस  जैसे) रात को सुनते हैं और सुबह भूल जाते हैं, दिल को अच्छी लगती हैं, भाव जगाती हैं, सहलाती हैं, प्रश्न करती हैं, बस यही तो काम है कविताओं का..उसने कविता लिखना क्यों छोड़ दिया ? क्या अब वह नहीं लिख सकती..या पहले भी जो लिखा करती थी वह तुकबंदी ही थी..वह लिखे किस पर...हर रोज बढ़ते अपने मोटापे पर...चाह कर भी व्यायाम न करने की अपनी दुर्बलता पर..यूँ ही व्यर्थ होते समय पर पर या बढ़ती हुई उम्र पर, सोनू के नन्हें सवालों पर या...इस खालीपन पर...अपने मन की उर्जा को यूँ ही से कार्यों में खर्च करने पर...अपने नेह की गर्मी को बातों की गरमी में बदलने पर ...खैर इस तरह तो लिस्ट बहुत लम्बी हो सकती है.
कल शाम को चिक्की बनाने की कोशिश की, थोड़ी सी बनाई और जब खायी तो..शायद उसके बाद पानी भी पिया होगा या फिर किसी और वजह से ही उसका गला खराब हो गया है, सुबह सोकर उठी तो आवाज जैसे फंस रही थी. जून का फोन आया, वह कल आने वाले हैं, बताया तो शाम को ही वह आने को तैयार थे पर उसने मना कर दिया, थोड़ी सी खराश ही तो है, ठीक हो जायेगी.
आज सुबह उठी तो सबसे पहले बोलना चाहा, एक शब्द भी नहीं सुनाई दिया कानों को, उसकी आवाज तो बिलकुल ही बंद हो गयी लगती है, जून अगर कल ही आ जाते तो अच्छा रहता लेकिन वह शाम को आएंगे, उसकी समझ में नहीं आ रहा है की क्या करे, सिर में भी दर्द है, नन्हा कह रहा है डिस्प्रिन लेने के लिए.

जून कल शाम आ गए थे पर काफी इंतजार कराया, सिर दर्द बढता गया और फिर जो अक्सर ऐसी में होता है खाया-पिया बाहर, गला बंद, लेकिन जून ने आते ही इलाज शुरू कर दिया. दिन भर के थके होने के बावजूद. कार की सर्विसिंग कराते हुए आए थे, काफी वक्त लग गया और फिर उसकी चिंता भी थी. एक प्रशिक्षित नर्स की तरह उसकी देखभाल करते रहे. आज सुबह वे अस्पताल गए पांच तरह की दवाएं दी हैं डॉक्टर ने. फेरिनजाईटिस शायद यही नाम है उसकी बीमारी का.

The happy and sad years  यह उपन्यास वह तीन-चार दिनों से पढ़ रही है पर अब पढ़ा नहीं जा रहा आँखों में दर्द होने लगा है, उसकी नायिका अजीब जीवट की लड़की है, ऐसे लोग कम ही होते हैं दुनिया में. Susannah Curtis का यह नॉवल उन्होंने कोलकाता में फुटपाथ से खरीदा था मात्र दस रूपये में. जिस हरे पेन से वह लिख रही थी वह ठीक से नहीं लिख रहा था और यह काला पेन भी उससे बेहतर तो नहीं है उसकी डायरी लाल, हरे, नीले, काले रंगों से भरती जा रही है.


Friday, May 4, 2012

कहो न आस निरास भई


आज उसे डॉक्टर के पास जाना था. सामान्य जाँच के लिये. हो सकता है अब हर दो हफ्ते बाद जाना पड़े. सुबह किचन की सफाई भी की. कल बाकी घर की सफाई की थी, हमेशा की तरह जून ने दीवारों, छत के कोनों की और उसने फर्श की. कमरे की सजावट में थोड़ा फेरबदल भी किया. आज बरामदे में हैंगिग फ्लावर पॉट लगाने के लिये हुक लगाने कुछ लोग आये थे. उसने कल्पना में उनमें लटकते फूल देखे और फिर कल लाइब्रेरी से लाई किताब पढ़ने लगी.
होली आयी और चली भी गयी. हर वर्ष की तरह यादें छोड़ गयी, कुछ खट्टी कुछ मीठी. आज गुड फ्राइडे है, इसी दिन ईसा को सूली पर चढ़ना पड़ा था. दो हजार से अधिक वर्ष हो गए इस घटना को पर आज भी व्यथित होते हैं लोग इसे याद करके.
सहगल का गीत, ‘कहो न आस निरास भई’ सुनते हुए उसने अधूरी चादर पुनः काढ़नी शुरू की है. अच्छा लगता है उसे फूल काढ़ना और सहगल के पुराने गीत सुनना भी. अभी कुछ देर पूर्व जून आया था, उसके स्नान के लिये गर्म पानी रख कर जाना भूल गया था, इसीलिए आया था. कितना ध्यान है उसे नूना का.