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Saturday, July 19, 2014

हिमाचल की वादियाँ



कल शाम दीदी चली गयीं, माँ की अस्वस्थता के कारण वे नहीं गये, आज सुबह उसने फोन पर उन्हें माँ के स्वास्थ्य के बारे में बताया, छोटी बहन भी यहाँ आने के लिए तैयार है पर पिता ने उसी की असुविधा को देखते हुए मना कर दिया. इस समय भाई के साथ जून भी माँ को डाक्टर के पास ले गये हैं. बच्चे यहीं पढ़ाई में लगे हैं, पिता उन्हें फल व खाखरा आदि खिला रहे हैं. आज कई दिनों बाद उसने पिता के हारमोनियम पर रियाज किया, सुबह ‘ओशो’ की एक पुस्तक में से चंद लाइनें पढ़ीं, सभी धर्मगुरू सभी धर्म एक सी बातें कहते हैं. कल रात वह काफी देर तक सो नहीं सकी, उसके बिस्तर से माँ का बिस्तर दिख रहा था वह हर पांच-दस लेटने के बाद उठ जाती थीं, उठ कर बैठतीं फिर बैठ-बैठे ही सोने लगतीं, उन्हें देखकर लगा कि उनकी तबियत काफी खराब है पर दिन में जाहिर नहीं होने देती हैं, उनकी हिम्मत देखकर रश्क होता है.

दो ही दिन हुए हैं पर लग रहा है बहुत दिनों के बाद लिख रही है. उस दिन सुबह वे हिमाचल प्रदेश के सुंदर शहर सोलन जाने के लिए रवाना हुए तो माँ का स्वास्थ्य पहले जैसा ही था. छोटी बहन वहाँ प्रतीक्षा कर रही थी सो वे चल पड़े, रास्ता आराम से कट गया. तीन बजे वे गंतव्य स्थल पर पहुंच गये. सोलन एक खुबसूरत पहाड़ी जगह है, बहन उन्हें लेने आई थी, उसने बताया, भाई का फोन आया था, माँ को अस्पताल ले जाना पड़ा है. कल ही वह भी उनके साथ घर जाएगी, वह उन्हें घर के पास की पहाड़ी पर ले गयी, दो घंटे वे पहाड़ों पर घूमते रहे, वापस आकर खाना बनाया और सुबह की वापसी की तैयारी करके सो गये.

उनके पूर्व कार्यक्रम के अनुसार आज उनका यात्रा का दिन था, पर इन्सान जो सोचता है वही तो नहीं होता. उन्हें यहाँ आये आज आठवां दिन है. कल मामी जी भी माँ को देखने आयीं, आज वापस चली गयीं. माँ अब काफी ठीक हैं पर पूरी तरह से नहीं, उन्हें अभी बहुत देखभाल की जरूरत है. जून छोटी बहन के साथ अस्पताल गये हैं, जो डाक्टर है सो उसका यहाँ होना लाभदायक है. जून और वह एक बार भी साथ-साथ नहीं गये, शायद यह इस कारण हो कि वह यहाँ आकर अपने पुराने दिनों में लौट आयी है. अपनी उम्र का भी अहसास नहीं होता. नन्हा दीदी के यहाँ गया हुआ है, उसे लेने उन्हें जाना है. शायद आज या कल. मौसम यहाँ बेहद गर्म हो गया है और बिजली चली जाने पर घुटन हो जाती है. रात को वे सोये तो छोटी बहन और उसकी बेटियां भी उनके कमरे में थीं, देर रात तक बातें कीं फिर भांजी सोये-सोये कोई स्वप्न देखने लगी या गर्मी से परेशान होकर रोने लगी. बहन को उसने कहा उसे थोड़ा स्वालम्बी बनाये पर उसने कई और बातें कहीं, जिससे यही सिद्ध हुआ कि वह वैसे ही खुश है, उसे बच्चों के रोने या जिद करने पर खीझ नहीं होती, न झुंझलाहट. वह हिम्मती तो है ही और किसी को judge करने या सलाह देने की भूल करने की सजा तो भुगतनी ही पडती है.

आज उसका जन्मदिन है, किन्तु हर वर्ष जैसी उमंग जो इस दिन स्वतः ही होती थी आज नहीं है, पिछले वर्ष वह असम में थी, सुबह-सुबह सभी ने फोन से मुबारकबाद दी थी, आज यहाँ घर पर है, छोटी बहन, भाभी, पिता और जून बधाई दे चुके हैं, ससुराल से भी फोन आ चुका है. असम में भी उसकी सखियों ने याद किया होगा. कितने दिनों से बाबाजी को सुना नहीं, यहाँ सुबह ही बिजली चली जाती है. माँ कल घर वापस आ गयी हैं, अभी कुछ दिन मंझले भाई के यहाँ रहेंगी. आज बड़े भैया-भाभी वापस जा रहे हैं. पिछले दिनों सभी ने मिलजुल कर माँ-पिता को सहयोग दिया, सभी भाई-बहन एक सूत्र में बंधे हैं. चौबीस घंटों के लिए दीदी के घर भी गयी, उनका घर बहुत बड़ा है, सामान भी तरह-तरह के हैं. दीदी को भी क्रॉस वर्ड भरने का शौक है, अभी भी बच्चों की तरह उत्साह से भर जाती हैं छोटी-छोटी बातों पर, उम्र का कोई असर उनके मन पर नहीं हुआ है. छोटी बहन भी वैसी ही है, उसको डाक्टरी ज्ञान, लेकिन बहुत है, पिछले दस-बारह वर्षों का अनुभव ! जून से उसकी बातचीत बहुत सीमित ही हो पाती है, कल वे मार्केट गये, घरके लिए व स्वयं के लिए कई छोटे-मोटे सामान खरीदे. अभी एक हफ्ता उन्हें यहाँ और रहना है.



Thursday, November 1, 2012

देखो मम्मा, चढ़ा बुखार



कल शाम से ही नन्हा कुछ अस्वस्थ लग रहा था, सुबह उठा तो और भी ज्यादा परेशान था, वह उसी के पास बैठी रही, साढ़े ग्यारह बजे निकली, कालेज बंद था सोचा लिफाफे ही खरीद लेगी, खत्म हो गए हैं, कल इतवार है सोच रही है सुबह जल्दी उठकर कपड़े धोएगी, कई दिन से सारा काम माँ पर आ गया है, ननद को बाहर जाना था, वह कल ही वापस आयी है.

पिछले चार दिनों से नन्हे को बुखार चढ़ता-उतरता रहता है, दवा ले रहा है पर उसका असर नहीं हो रहा है, उसका खुद का स्वास्थ्य भी पूरी तरह ठीक नहीं हुआ है, पढ़ाई तो हो नहीं पा रही है पर उसकी चिंता अवश्य है. घर का माहौल भी प्रफ्फुलित नहीं रह गया है, सभी के मन जैसे इस जिंदगी ने स्नेह से वंचित कर दिए हैं, नन्हा ठीक था तब वे उसके साथ हँसते-खेलते थे.
आज वह नन्हे की रिपोर्ट लेने गयी थी, डाक्टर ने रक्त की जाँच करने को कहा, दवा बदल दी है. कल से उसका ज्वर तेज नहीं हुआ है. कल कालेज गयी थी, लाइब्रेरी से किताबें बदलनी थीं. उनसे कुछ नोट्स बनाने हैं, पूर्णिमा मैडम बहुत सहयोगी स्वभाव की हैं, सुधा मैम उतनी ही अक्खड़.

सुबह स्वयं नहाकर फिर सोनू को उठाने आयी, थर्मामीटर लगा रही थी कि सुनील (इसी मकान में रहने वाला दस-बारह साल का बच्चा) ने आकर बताया, भैया आए हैं, वह जानती थी जून जरूर आएंगे, अगले ही पल सीढ़ियों पर चिर-परिचित आवाज जूतों की और वह  अपने हाथ में सूटकेस लिए कमरे में आ रहे थे, वह खुश थी उस क्षण और भय भी था...दुःख था ही,  नन्हे का थर्मामीटर निकालते-निकालते उसकी ऑंखें बरस पडीं, कितने दिनों से आँसू बहना चाहते थे और आज वह आए हैं इतनी दूर से, जिन्हें उन आंसुओं की कद्र थी. नन्हे को देखकर वह भी उदास हो गए, पर अब सब ठीक हो जायेगा, कल उन्हें राजस्थान जाना है दस दिनों के लिए, जब तक लौटेंगे सब सामान्य हो चुका होगा. दोपहर को वे उन्हें लेकर मार्केट गए, उसे दो बेहद सुंदर साड़ियां उपहार में दिलायीं और नन्हे के लिए भी एक ड्रेस खरीदी.

जून किसी काम से बाहर गए हैं, कह गए थे दो-ढाई बजे तक आएंगे, वह जानते नहीं कि हर पल कोई उनका इंतजार करता होगा. अभी-अभी उनका एक पत्र मिला तब उन्हें पता नहीं था कि वह यहाँ आ सकेंगे, आज डीलक्स से दिल्ली, फिर वहाँ से जोधपुर तथा आगे फील्ड, दस दिन बाद एक दिन के लिए पुनः यहाँ और फिर वापस असम. उसने कल्पना में देखा कि परीक्षाओं के बाद वह नन्हे को लेकर अपने माँ-पिता के यहाँ गयी है, वहीं उसे लेने जून आए हैं, फिर वे सब अपने घर गए हैं और जीवन पूर्ववत् हो गया है, खूब घूमना...कहानियाँ पढ़ना.. खूब सारे पानी से जी भर कर नहाना...सब तरह की दालें बनाना..और भी कई काम, जिंदगी में सभी कुछ एक साथ तो नहीं मिल जाता है, कभी धूप कभी छाँव, कभी प्यार तो कभी इंतजार...कभी मिलन तो कभी बिछड़ना..पर अब और नहीं बिछड़ना.

अभी-अभी वह चले गए, कल सुबह आए और आज शाम चले गए पर इस एक रात और दो दिनों में कितना-कितना स्नेह भर गए हैं, उसने वादा किया कि कभी उदास नहीं होगी, उन्हें भी मालूम है और उसे भी की उनकी याद कितनी आयेगी और कभी रुला भी जायेगी लेकिन उनका आना उसे बहुत अच्छा लगा, इतने दिनों से एकाकी मन जो एक ख़ामोशी से भर गया था, उसे तोड़ना कितना सुकून दे गया. कितनी खुशी से भर गया, जो इतनी दूर थे, जिन्हें वह रोज बुलाती थी, वह उसकी आवाज सुनकर एक सच्चे मित्र की तरह उनके पास आ गए. नन्हा भी बहुत खुश है वह जल्दी ठीक हो जायेगा अब. कुछ दिन बाद फिर आएंगे अब उसका समय उसी दिन के इंतजार में कटेगा.

सोनू आज सुबह से उठा है तभी से बहुत परेशान सा है, बात-बात पर रो देता है, दूध नहीं पीना...ब्रश नहीं करना..चाय भी नहीं..और बिस्किट भी नहीं...हर बात में नहीं और ज्यादा कहने पर सिसकियाँ लेकर रोना, उसे लगता है पापा की याद आ रही है. जब तक वह आएंगे तब तक तो बिल्कुल ठीक हो जायेगा, कितना कमजोर हो गया है, पर ठीक होकर पुनः दौडेगा पहले की तरह छत पर, फिर अपने घर में.. वह सोच रही थी आज कालेज जायेगी, पर अब मुश्किल लगता है. बहुत दिनों का गैप हो गया है उसका, अब तो लगता है सब खुद ही पढ़ना होगा. अगर अच्छे नम्बर नहीं भी आए तो कोई बात नहीं, नन्हे से बढकर कुछ नहीं उसके लिए. उसे छोड़कर तो नहीं जा सकती.



Tuesday, April 10, 2012

नव जीवन


दिसम्बर का आरम्भ हो गया है. पिछले कई दिनों से उसने डायरी नहीं लिखी. कितनी ही बातें हो गयी है इस मध्य. पिछले हफ्ते वह अस्वस्थ रही कारण वही, अब ठीक है, डाक्टर की बताई दवाएं ले रही है. इसी माह उन्हें घर जाना है. वे दोनों बहुत खुश हैं. जुलाई के प्रथम दस दिनों में से कोई भी दिन हो सकता है जब वह मेहमान उनके सम्मुख होगा जीता जागता, उनके सपनों का केन्द्र, जो अब उनके भीतर है. अभी उन्होंने किसी को नहीं बताया है पर एक न एक दिन तो पता चल ही जायेगा. जून को अपने बॉस को बताना पड़ा था क्योंकि वह उसे बाहर भेज रहे थे. पिछ्ले दिनों वह कितनी अस्वस्थ थी, जून उसे छोड़ कर नहीं जाना चाहता था. वह भी चाहती है कि अब उन्हें हर पल एक साथ ही रहना चाहिए, ताकि वे हर परिवर्तन को साथ-साथ महसूस कर सकें.