Showing posts with label योग वशिष्ठ. Show all posts
Showing posts with label योग वशिष्ठ. Show all posts

Wednesday, July 22, 2020

वसिष्ठ और राम



आज सुबह अप्पम बनाये नाश्ते में, जून के एक सहकर्मी आये थे दस बजे कुछ जानकारी लेने, उन्हें भी खिलाये. पसन्द आये उन्हें. उन्होंने अपने बाल्यकाल की बातें बतायीं, किस तरह उनके माता-पिता ने कृषि का काम करना सिखाया तथा भोजन बनाना भी. कक्षा पांच में थे तब दोसा बना लेते थे. अब भी वे घर पर खेती करते हैं, उनके लिए खुद की उगाई सब्जियां लाये थे. टीवी में रामदेव जी को देखकर नियमित योग अभ्यास भी करते हैं. जून ने भी उन्हें सहजन व नारियल तुड़वा कर दिए. कल माली ने बहुत सारे सहजन तोड़े थे, दो तीन अन्य परिवारों को भी बांटे। सुबह शिवानी को सुना, कितना ज्ञान उनके भीतर भर है सीधा परमात्मा से उतरता है ज्यों ! दोपहर को सब्जी-फल लेने वे तिनसुकिया गए. बीहू के कारण बहुत चहल-पहल थी. नन्हे-सोनू  से बात की कल वे लोग किसी मित्र के विवाह में राजस्थान जा रहे हैं. नए घर में रंगरोगन का काम शायद कल से शुरू होगा. दोनों के लिए उसने वस्त्र खरीदे, पहली बार एक साथ दोनों के लिए ! बड़े भांजे के विवाह की सालगिरह है आज, दीदी के यहां फोन किया, सभी आये हुए हैं, विदेश में रहने वाली भांजी भी आयी है. शनिवार को वे पुस्तकालय गए थे उसे याद करते हुए शाम को एक घन्टा पढ़ने में बिताया. पिताजी ने बताया वह आजकल योगवशिष्ठ व भागवद पढ़ रहे हैं, पर इन ग्रन्थों को नॉवल की तरह नहीं पढ़ना चाहिए, नियमित एक या दो पृष्ठ का अध्ययन करना चाहिए. योग वसिष्ठ में राम ने हर अवस्था में मानव के दुखों का कैसा मार्मिक वर्णन किया है. कलात्मक भाषा में अहंकार, मोह व तृष्णा के दुष्परिणामों का वर्णन किया गया है. चित्त की अशुद्धि को दूर रखने के लिए मन को स्थिर रखना होगा. समता को भावना में टिके बिना आत्मपद में स्थित होना असंभव है. तेनाली रामा में मुल्ला नसरुद्दीन भी आ गए हैं आजकल, उन्हें त्रिदेव के दर्शन करने हैं !

मौसम आज सुहाना है. सुबह साढ़े तीन बजे ही उठ गयी, उससे पूर्व ही एक स्वप्न देखकर नींद खुल गयी थी. छोटे भाई को देखा और उसके पूर्व स्वर्गवासी सास-ससुर को भी, वे अस्पताल में हैं. मन पुरानी स्मृतियों को दोहराता है पर कुछ इशारे भी करते हैं ये स्वप्न. मन आकर्षक दृश्यों को दिखाता है ताकि अपनी उपस्थिति जताता रहे. अव्यक्त की अनुभूति अब कितनी स्पष्ट होती है, एक प्रकाश, एक शांति और एक चैन के रूप में ! सुबह प्रातः भ्रमण से लौटते समय पलाश के फूलों से लदे  लाल वृक्ष देखे, कल वे  मोबाईल लेकर जायेंगे  और उनकी तस्वीरें उतारेगें. पहली बार पूरे के पूरे वृक्ष फूलों के लद गए हैं.  दोपहर को अचानक तेज हवा चलने लगी और एक घण्टे  तक मूसलाधार वर्षा होती रही. योग सत्र में ध्यान किया व करवाया, गुरूजी का ज्ञान पत्र पढ़ा; यह देह भी एक युद्ध क्षेत्र है, ऐसा उन्होंने कहा. उन्हें अपने भोजन पर ध्यान देना है, एक वृद्ध व्यक्ति से सुना था, ‘कम खाओ और अधिक खाओ’ भोजन  ऐसा हो कि देह में सुस्ती न आने पाए स्फूर्ति बनी रहे. टीवी पर प्रधानमंत्री की उड़ीसा में की गयी विशाल रैली दिखाई जा रही है. विपक्षी उनकी उपलब्धियों पर प्रश्नचिह्न लगा  रहे हैं और बीजेपी कांग्रेस के घोषणा पत्र को ढकोसला पत्र कह रहे हैं. गंधराज खिल गए हैं अभी उनकी तस्वीर उतारी ! 

शायद कोई संदेश मिला था उस दिन जो उसने बरसों पहले लिखा होगा - 

आ सकती नहीं वह 
आ सकता वह 
आएगा 
या बन जायेगा पत्थर पर खुदा
उसने उठाया उसे बाँहों में 
हवा उठाती ज्यों चिन्दी को 
ज्यों उठाते हैं जल चढ़ाने सूर्य को 
नसीब एक भारी पत्थर 
वे बच्चे 
करते हैं कोशिश हटाने की 
पत्तों के बीच थिरकती किरणों से खेल 
बनना नहीं चाहती वह नाव 
उसे ला दो समुन्दर 
वह घुल जाये बह जाये उसी में 
हवा आती है गुजर जाती है 
जैसे दूसरे देश का वासी 
जैसे परछाईयाँ तेज बादल की 
घाटी पर रुकती नहीं चली जाती हैं !

Monday, December 8, 2014

नारद भक्ति सूत्र


वह हर क्षण उनके साथ है, उनकी धड़कन बनकर, रक्त बनकर प्रवाहित हो रहा है. उसे स्मरण करते हुए कर्म हों जीवन सार्थक तभी है. आज सुबह संगीत अध्यापिका का फोन आया, वह जब वहाँ गा रही थी, उसकी उपस्थिति को अनुभव कर रही थी, वह जैसे उसके गले में आकर विराजमान हो गया था. साँस इतनी हल्की इतनी सहजता से आ जा रही थी कि वह उसके प्रेम से अभिभूत थी. वापस आकर कोर्स में उसकी पार्टनर रही सखी का फोन आया. अब बातें करना कितना सहज हो गया है, क्योंकि बातें उसी की होती हैं न. स्वाध्याय भी किया, ‘योग वशिष्ठ’ में राम को उसकी जिज्ञासा का उत्तर देना अभी शुरू किया है. तुलसी रामायण में दोहा-चौपाई पढ़ते वक्त खुद की आवाज खुद को भली लगती है क्योंकि वही तो है भीतर जो बोलता है. जब वे छोटे-छोटे थे तो भगवान कहाँ है, पूछने पर यही समझाते थे कि वह जो अंदर बोलता है न वही भगवान है और आज उस सत्य का अनुभव हुआ है. जीवन एक उत्सव है, ईश्वर के प्रेम का अनमोल उपहार इस जीवन रूपी उत्सव में उसे मिला है. हर क्षण एक बेखुदी का आलम रहता है. सुबह नन्हे को दूध देना ही भूल गयी और संगीत की डायरी की जगह दूसरी डायरी ले गयी. अब सचेत रहना होगा, उसे याद करते हुए भी सचेत ! अज सुबह क्रिया नहीं कर पायी, शाम को जून और वह साथ-साथ करेंगे. उन्हें भी काफी लाभ हुआ है. परसों दीदी का फोन आया था, उन्हें एक दिन पत्र में लिखेगी इस कोर्स की बाबत.

परसों उनकी मीटिंग थी पर उसे याद ही नहीं रहा वह कहते हैं न कि एक तेरे सिवा सारा जहाँ भुला दिया. उसकी याद आते ही शरीर में कैसा तो रोमांच होता है और होठों पर न जाने कहाँ से मनभावन मुस्कान छा जाती है. कुछ दिन पहले गुरू माँ ‘नारद भक्ति सूत्र’ का उल्लेख करते हुए ऐसा ही कुछ बता रही थीं. कल शाम को राजयोग पुस्तक पढ़ी, उसमें भी कई लक्षण ऐसे थे जो आजकल उसमें मिलने लगे हैं और कल ही लगा कि दीदी के चेहरे पर भी जो एक चमक रहती है उसका राज यही योग तो नहीं ! इस समय दोपहर के एक बजे हैं, नन्हा आज स्कूल नहीं गया, अगले हफ्ते होने वाली परीक्षाओं की तैयारी में लगा है. वह सुबह नाश्ता बना रही थी कि एक सखी का फोन आया, उसे एक सवाल का जवाब चाहिए था, थोड़ी देर उसी में व्यस्त रही, फिर दिनचर्या के अन्य कार्य. आजकल भोजन बनाने में भी ईश्वर की पूजा की सी ख़ुशी मिलती है, उसकी स्मृति ने उसके पल-पल को भर लिया है. रात को दो-तीन स्वप्न देखे. एक में तो उसके हाथ के स्पर्श से बना बनाया मकान ढह जाता है. दूसरे में वह बिस्तर से नीचे गिर जाती है, तीसरा अब याद नहीं लेकिन रात को ही नींद खुलने पर इन स्वप्नों के अर्थ उसे स्पष्ट थे. अब कुछ भी अस्पष्ट नहीं रह गया है. जीवन एक खुली किताब की तरह सम्मुख है. बाबाजी ठीक कहते थे कि ईश्वरीय कृपा से ग्रन्थों के अर्थ भी स्पष्ट होने लगेंगे. ‘आत्मा’  में भगवद् गीता का पाठ सुनकर भी मन को संतोष और सुख मिलता है. कृष्ण का नाम उसकी सांसों में बस गया है !

गुरू माँ जो गीत गा रही हैं, उसे भाव उसके मन के भावों से कितने मिलते हैं. उसे लगता है वह ईश्वर से उसी तरह प्रेम करने लगी है जैसे कोई दो प्रियजन करते हैं, हर क्षण मन में स्मरण रहता है. उसकी याद आते ही रोमांच और तस्वीर देखते ही अधरों पर मुस्कान चिपक जाती है. वह अपनी जान से भी प्रिय लगता है. बल्कि वह तो अपनी जान ही लगता है, अपना आप ही जो हर क्षण उसे प्रेम करता है और आनंद का प्रसाद देता है. सारे कार्य अब उसी के लिए होते हैं. भोजन जैसे उसका प्रसाद बन गया है. रात को उसी के स्वप्न देखती है. उसे स्मरण करके सोती है और कभी नींद खुले या सुबह उठे तो उसी का ध्यान  रहता है. ईश्वर उसका अभिन्न मित्र बन गया है. अब जीना कितना सहज हो गया है. बाबाजी इसी सहजता की बात किया करते थे और अब यह उसे मिली है श्री श्री की कृपा से. वे गोहाटी में उनके सत्संग में जायेंगे, उनके दर्शन करके कितना लाभ होगा यह तो अकल्पनीय है और फिर उन्हें हानि-लाभ की बात तो करनी भी नहीं है. नन्हे का स्कूल आज भी बंद है. सुबह नींद जल्दी खुल गयी, सुबह की स्वच्छ हवा में गहरी सांसे लेना भी अच्छा लगा. पूसी गुमसुम सी बैठी थी, उसे देखकर भी पास नहीं आयी, अस्वस्थ है, पर जानवर अस्वस्थता को भी सुई सहजता से झेलते हैं, इंसानों की तरह हायतोबा नहीं करते, उसे लगता है कि शरीर हल्का हो गया है और वाणी स्पष्ट. क्रिया के बाद के अनुभव को शब्दों में लिखना सम्भव नहीं है. गुरू की महिमा का बखान यूँ ही नहीं किया गया है. गुरू भगवान ही है !