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Monday, March 5, 2012

सूना सूना घर



आज जबसे जून गया है वह उसे याद कर रही है. जानती है वह भी उसे याद कर रहा होगा चाहे वह कितना ही व्यस्त क्यों न हो. सुबह उसकी जीप अभी मोड़ तक ही गयी थी कि उसकी आँखें...और  दिल जैसे बैठने लगा. अंदर आयी तो याद आयी उसकी बात खुश रहना..सो सम्भल गयी. कुछ खाकर क्रोशिया उठा लिया. दस बजे तो खाना बनाया सब कुछ वैसे ही क्या जैसे उसके होने पर करती. किताब पढ़ी फिर भोजन किया. सोचा वह भी पहुँच गया होगा. दोपहर को कढ़ाई की फिर सोने का प्रयास किया पर नींद नहीं आयी. फिर प्रेमचन्द का उपन्यास कायाकल्प पढ़ती रही. तभी उसका  फोन आया हँस कर बात की पर वापस आयी तो वह और भी याद आया. पांच बजे तक तो किसी तरह रही फिर अकेला घर किसी तरह अच्छा नहीं लगा किसी तरह नहीं सो पड़ोस में उसी उड़िया परिचिता के घर चली गयी उसे खुद नहीं पता था कि उससे दूर रहना इतना कठिन होगा. 

Monday, February 20, 2012

नए घर में



कल शाम ही वे अपने घर आ गए थे. घर ! कितना प्रिय लगता है यह शब्द, जब इसके साथ अपना जुड़ा हो. दोपहर को ही जून का काम खत्म हो गया था. सारी सुबह नूना प्रेमचन्द की पुस्तक पढ़ती रही. दो सखियों की कहानी बहुत अच्छी लगी. कुछ देर मेजबान महिला की बातें सुनती रही, किस तरह उसके माता-पिता के देहांत के बाद मामा के यहाँ रहना पड़ा. आज ही उस नए घर की सफाई भी हो जायेगी जो उनका नया बसेरा बनने वाला है और एक दो दिनों में वे वहाँ चले जायेंगे.
शुक्रवार को जून दिन भर के लिये बाहर गया था, वह सामने वाले घर में आयी नन्ही बिट्टू से खेलने, दोपहर बाद लौटी तो वह भी उसके साथ चली आयी, दोनों सो गए. तभी उठे जब जून ने कालबेल बजाई. शनिवार को उन्होंने जीप के द्वारा कई चक्कर लगा कर सारा सामान नए घर में शिफ्ट किया, बड़ा सामान ट्रक से पहले ही आ गया था. शाम तक बहुत थक गए थे, पर करीने से सजा कमरा देखा तो सारी थकान उतर गयी.