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Wednesday, August 2, 2023

देव दिवाली की चमक

आज एक दिन और गुजर गया। जीवन कैसे पल-पल बीत रहा है। उन्हें यहाँ आये हुए एक वर्ष हो गया है। एक भविष्यवाणी के अनुसार उसके हाथ में साढ़े पंद्रह वर्षों का समय है। कितना कुछ करना है, करना था पर इधर दिन निकलता है उधर रात हो जाती है। सुबह-सुबह टहलते समय कितने सारे सुंदर विचार मन में उग रहे थे, पर अब एक भी याद नहीं है। उसी समय आकर लिख लेना ही उचित होगा। कल एक निकट संबंधी ने जून से ज़मीन ख़रीदने के लिए आर्थिक सहायता माँगी थी, पर दिन भर विचार करने के बाद शाम को उन्होंने अपनी असमर्थता जता दी। ज़मीन-मकान में पैसे लगाना अक़्लमंदी नहीं है। पहले ही दो जगह उन्होंने पैसे लगाये हुए हैं, जिसका जरा भी लाभ नहीं मिल रहा, यह वह जन स्वयं ही बता चुके थे। 


इस समय रात्रि के नौ बजे हैं। आज पहली बार उसने ज्वार के आटे का चीला बनाया, दीदी से बात हुई तो उन्होंने कहा, वह सिंघाड़े तथा कोटू के आटे का चीला भी बनाती हैं। पापा जी ने कहा, उन्होंने ‘कारवाँ’ पर दूसरी बार सारे गीत सुन लिए हैं। उनसे बात की तो अध्यात्म पर चर्चा हुई। उसने कुछ प्रश्न पूछे, जिसके उत्तर रिकॉर्ड कर लिए हैं, उन्होंने कुछ शेर भी सुनाये। उनके जन्मदिन पर यह बातचीत लिखकर एक तोहफ़े के रूप में उन्हें प्रस्तुत करेगी।सड़क पार सामने वाले घर में गृह प्रवेश की पूजा हो रही है। हरी -नीली-लाल बत्तियों से घर को और गेंदे के फूलों से द्वार को सजाया है।यह पूजा यहाँ रात भर चलती है शायद। आज तुलसी विवाह भी है। देव उठावनी एकादशी है। कितनी अद्भुत है भारत की संस्कृति; जहां  भगवान का विवाह एक पौधे से करते हैं, इसी के माध्यम से तुलसी की महत्ता बतायी गई है, उसके गुणों से परिचय कराया है। आज ‘महादेव’ में देवी ने अपने मन की पीड़ा बतायी तो शंकर भगवान एक बालक के रूप में आकर रोने लगे, वह अपनी पीड़ा किससे कहें ! अद्भुत गाथा है शिव-पार्वती की।


आज सुबह से ही यहाँ घने बादल छाये हैं, हवा भी तेज है। सुबह वे टहलकर आये तो बूँदे गिरने लगीं।चेन्नई में आये ‘निवार’ तूफ़ान का असर यहाँ पर भी हुआ है। बंगाल की खाड़ी से उठे इस तूफ़ान के कारण पुदुचेरी व आंध्र प्रदेश में भी भीषण वर्षा हो रही है। पापाजी से जो वार्तालाप उन्होंने किया था, उसे आज टाइप किया, एक साक्षात्कार के फ़ॉर्मेट में। लिखते समय रिकॉर्ड की हुई अपनी ही आवाज़ सुनी, जो स्वयं को ही पसंद नहीं आयी। अन्यों के कानों को कितना कष्ट देती होगी। उसे अपनी वाणी पर बहुत ध्यान देना चाहिए। इसी प्रकार अपनी लिखावट पर भी। दोनों ही मन की स्थिति को दर्शाते हैं। जून को जो वह लंबे लंबे भाषण देती है, वह उनके कानों को कितने अप्रिय लगते होंगे। उन्हें अपने बारे में कितनी ख़ुशफ़हमियाँ अथवा तो ग़लतफ़हमियाँ होती हैं, यही एक शब्द है जिसका विलोम भी वही अर्थ देता है। हर ख़ुशफ़हमी एक ग़लतफ़हमी ही तो होती है।  नन्हा व सोनू असम गये हैं, हवाई अड्डे पर कोविड के लिए उनकी जाँच हुई,  फ़्लाइट में भी काफ़ी सावधानी बरती गई। दोपहर को आर्ट ऑफ़ लिविंग का एक छोटा अनुवाद कार्य किया। गुरु जी पत्रकारों को संबोधित करने वाले हैं। वे बतायेंगे कि कोविड से बचने के लिए आयुर्वैदिक दवाओं तथा अन्य उपायों के द्वारा रोग प्रतिरोधक क्षमता को कम होने से कैसे रोका जा सकता है। पिछले कुछ दिनों की तरह आज भी उसने कुछ कन्नड़ शब्द सीखे, प्रतिदिन कुछ शब्द सीखते-सीखते उन्हें भाषा समझ में आने लगेगी।  


कल देव दिवाली है। गुरुनानक देव का जन्मदिन भी।  उसे कुछ वर्ष पूर्व बनारस के घाटों पर देखी देव दिवाली स्मरण हो आयी। जब नौका में बैठकर उन्होंने सभी घाटों पर जलाये गये लाखों दीपकों का दर्शन किया था। शाम से ही सांस्कृतिक कार्यक्रम भी चल रहे थे और भव्य गंगा आरती भी देखी थी। सुबह उठते ही एक सुखद समाचार मिला, छोटा भाई नाना बन गया है। पापा जी भी भाई-भाभी के साथ पोती के घर गये हैं।जून का स्वास्थ्य ठीक नहीं है, शारीरिक से अधिक मानसिक, वे अपने काम के दिनों की व्यस्तता में कितना खुश रहते थे। सेवा निवृत्ति के बाद संभवतः यह उदासी स्वाभाविक है उस व्यक्ति के लिए जो दिन-रात अपने कार्य के प्रति समर्पित रहा हो, जिसने और कुछ करने के बारे में सोचा ही न हो। उसने उन्हें कुछ सुझाव दिये पर जब तक कोई बात ख़ुद के दिल से न निकली हो उस पर अमल करना आसान नहीं है।    


रात्रि के नौ बजे हैं। आज का दिन काफ़ी जीवंत रहा। सुबह के भ्रमण व साइकिल चलाने के बाद वे जंगल की तरफ़ कार द्वारा लंबी ड्राइव पर गये। पहली बार गुलदाउदी के फूलों का विशाल बगीचा देखा। धूप में फूलों का रंग बहुत शोख़ लग रहा था। आकाश में कार्तिक पूर्णिका का चंद्रमा अपनी पूरी दमक के साथ सुशोभित है। टीवी पर देव दीपावली का आँखों देखा हाल देखा। मोदी जी का भाषण भी सुना। घाटों पर ग्यारह लाख से अधिक दीपक जलाये गये हैं। वाराणसी में काफ़ी बदलाव आ रहा है। गंगा का पानी स्वच्छ हो गया है।सारनाथ में भी लेजर शो दिखाया जाए


Saturday, December 8, 2018

मणिकर्णिका घाट



आज अचानक उसे चार वर्ष पहले बनारस में बिताये दिनों की याद हो आई है, कोई न कोई कारण अवश्य होगा इसके पीछे, हो सकता है इसलिए कि एक और यात्रा पर अगले माह उन्हें जाना था, वह शायद सम्भव नहीं हो पायेगी. वे कोलकाता तक फ्लाइट से गये थे और उसके आगे कालका मेल से. सुबह उठे तो बिहार आ गया था, खेतों में सुनहरी फसल खड़ी थी, कहीं कट रही थी, कहीं कटने के इंतजार में. मीलों तक फैले खेत कहीं खाली पड़े थे. खेतों में नर-नारी दोनों काम कर रहे थे. मुगलसराय स्टेशन पर उतरे तो एक टैक्सी वाला सामने आ गया, उसके पास अम्बेसडर थी, कहने लगा एक-दो वर्षों में ये कारें दिखनी बंद हो जाएँगी, अब पार्ट्स नहीं मिलते. अगले दिन वे गंगा घाट गये. होटल बिलकुल घाट पर था, मीर घाट पर जो अपेक्षाकृत साफ-सुथरा था. कमरे में सामान रखकर दशाश्वमेध घाट पर शीतला माता के मन्दिर गये, आस-पास बहुत गंदगी थी, पर लोगों की कतार लगी हुई थी. गंदगी से जैसे उन्हें कोई फर्क ही नहीं पड़ रहा था. मणिकर्णिका घाट का दृश्य विचित्र था. दस-बारह शव जल रहे थे, जैसे ही एक शव जलता, चिता पर पानी डालकर उसे ठंडा कर दिया जाता व फूल चुनकर वे लोग गंगा में बहा देते थे. सीढ़ियों पर लोग बैठे थे जिनके प्रियजन जल रहे थे, पर कोई रोना-धोना नहीं था. माहौल उत्सव सा ही लग रहा था, मृत्यु का उत्सव ! लकड़ियों के ढेर लगे थे और तेज हवा में चिताएं धू-धू कर जल रही थीं. पुआल में एक अंगारा रखकर चिता जलाने के लिए लाया जाता था. देखते-देखते ही नई-नई लाशें चिता पर रखी जा रही थीं. यह कर्म चौबीस घंटे चलता रहता है. कहते हैं काशी में मरने वालों को मोक्ष मिल जाता है. गंगा की धारा हजारों वर्षों से यहाँ बह रही है, मृतकों को अपने आश्रय में लेती आ रही है, लोग इसे पावनी गंगा मानते हैं. कुछ देर बाद उन्होंने भी एक दूसरे घाट से गंगा पार जाकर इसकी धारा में स्नान किया. अपने अंदर के कल्मष को दूर करने में यह अवश्य ही सहायक होगा इस भावना के साथ. पानी पहले तो ठंडा लगा फिर देह अभ्यस्त हो गयी. गंगा के पावन जल का स्पर्श अत्यंत सुखद था, पैरों के नीचे लोगों द्वारा छोड़े गये वस्त्र छूने में आ रहे थे. सफाई की बहुत आवश्यकता है यहाँ, पर लोगों की भीड़ अनवरत आती रहती है की सफाई के लिए अलग से समय निकलना कठिन होता होगा. वापसी में उन्होंने आरती का भी आनंद लिया. आरती भव्य थी, अद्भुत क्षण थे वे, परमात्मा की उपस्थिति का अनुभव हो रहा था. उसके बाद विश्वनाथ मंदिर भी गये थे वे, जहाँ पुलिस का सख्त इंतजाम था. देवी अन्नपूर्णा के दर्शन किये शनिदेव के और बड़े हनुमान के भी. विशालाक्षी मन्दिर तथा अन्य भी कई मन्दिर मार्ग में देखे. होटल लौटे तो चाँद आकाश में चमक रहा था और शीतल हवा बह रही थी. अगले दिन सुबह घाट पर ही होने वाले योगाभ्यास में भाग लिया. उसके बाद घर लौटते समय वारही देवी के दर्शन किये. एक गली में था मन्दिर. मूर्ति दर्शन भी विचित्र था. ऊपर से एक चौकोर छिद्र में से झांककर देखने होता था, नीचे जिस कक्ष में मूर्ति थी वहाँ जाना सम्भव नहीं था. बनारस की हर गली में कोई न कोई छोटा बड़ा मन्दिर है, अद्भुत नगरी है यह. कुछ देर एक चबूतरे पर बैठकर गंगा की लहरों से आती ठंडक तथा सूर्य की नव रश्मियों का स्पर्श करते हुए ध्यान भी किया. शाम को नगर में स्थित आयुर्वैदिक केंद्र में पहली बार शिरोधारा का अनुभव लिया. पडोस के घर में विवाह था, उसमें भी सम्मिलित हुए थे. बनारस से वे वापस कोलकता आये थे और बंगाली सखी की बिटिया के विवाह में सम्मिलित हुए थे.

रात्रि भोजन हो चुका है. नन्हा अभी तक नहीं आया है, शायद मार्ग में हो, लगभग बारह घंटे की उसकी ड्यूटी है. अपने काम के अलावा आजकल उसका कोई दूसरा शौक नहीं रह गया है. शाम को वे टहलने गये. दुकान से इडली के लिए सूजी खरीदी. आज अपेक्षाकृत ठंड ज्यादा है. सुबह छह बजे से थोड़ा पहले उठे. फूलवाली ने तब तक अपनी दुकान नहीं लगाई थी, जब वह प्रातः भ्रमण के लिए गयी, न ही सूर्य देवता ने दर्शन दिए जब छत पर गयी. हर दिन अन्य दिनों से कितना भिन्न होता है. उनकी भावनाएं भी भिन्न हों तो क्या बड़ी बात है. मन बदलता है, आत्मा सदा एक सी रहती है, द्रष्टा है, साक्षी है. जून ने कहा वह बहुत धीरे-धीरे खाती है. उसने इस बात को गम्भीरता से ले लिया, पल भर के लिए ही सही अपनी मूल स्थिति से डिग गयी, पर आत्मा को मंजूर नहीं है. वह एक बार अपने सिंहासन पर बैठ गयी है तो उसे अपनी गद्दी से उतरना मंजूर कैसे होगा.


Monday, September 4, 2017

धम्म गंगा


वे घर लौट आये हैं. मन अधिक शांत है और स्मृतियों से भरा है. दस दिनों तक ध्यान के गहन प्रयोग के बाद भीतर कितना शून्य जग गया है. उसने मन को पीछे ले जाकर देखा और लिखना आरम्भ किया - उस दिन शांत दोपहरी को दो बजे कोलकाता के IIMC से सोदपुर स्थित विपासना केंद्र ‘धम्म गंगा’ के लिए रवाना हुई थी. कोलकाता से लगभग तीस किमी दूर गंगा के तट पर स्थित केंद्र तक पहुंचने में दो-ढाई घंटे लग गये. ड्राइवर को बाहर छोड़कर लोहे के गेट के बायीं तरफ छोटे द्वार से अंदर पता करने के लिए चली गयी कि कार अंदर जा सकती है या नहीं, लौटी तो कार कहीं नजर नहीं आ रही थी. मन के भीतर छिपा भय का  संस्कार सामने आ गया, गोयनका जी कहते हैं कोई भी विकार दुख का कारण ही बनता है. अब भय जगा तो झट प्रतिक्रिया हुई, पतिदेव को फोन कर दिया, उनके आशाजनक शब्दों ने विश्वास दिलाया. ड्राइवर दूसरी गली में जाकर गाड़ी मोड़ने चला गया था. वह वापस आया तो मन ही मन उससे क्षमा मांगी. धैर्य का दामन छोड़कर जो मन झट प्रतिक्रिया करने में जुट जाता है वह गलत निर्णय पर ही पहुंचता है. यह पाठ आते ही सीख लिया था.
भीतर पहुंच कर कुछ समय औपचारिकताओं में बीत गया. फार्म भरवाया गया. प्यास भी लग रही थी और लम्बे सफर से सिर में हल्का दर्द भी था. अगले दस दिनों तक रहने के लिए जो कमरा मिला उसका नम्बर आठ था, एक युवा बंगाली लड़की जो बैंगलोर में रहकर काम करती है, पर उसका घर कोलकाता में है, उस कमरे में पहले से ही थी. उसने दो-चार बातें ही की होंगी कि पता चला ऑफिस में जाकर मोबाइल व अन्य कीमती सामान लॉकर में रखवाने हैं. वहीं पता चला छह बजे घंटा बजेगा तब नाश्ता व चाय मिलेगी, जो आज का अंतिम भोजन होगा. शाम का वक्त था, सूर्यास्त का समय. केंद्र का बगीचा जहाँ खत्म होता था, वहाँ बरगद के एक विशाल वृक्ष के चारों तरफ एक बड़ा चबूतरा था. जिसपर चढ़कर गंगा का चौड़ा पाट देखा. नदी का शांत पानी और उस पर नाचती हुई छोटी-छोटी लहरें, सूर्य की लाल रश्मियाँ उन लहरों के साथ नृत्य करती हुई बहुत आकर्षक लग रही थीं. अगले कुछ दिनों तक रोज ही शाम को बल्कि दिन में कई बार गंगा को निहारना उसका प्रिय कार्य बन जायेगा यह उस वक्त मालूम नहीं था. उसी वृक्ष के नीचे तितलियों से गुफ्तगू भी रोज का हिस्सा बन जाएगी यह भी नहीं जानती थी. जैसे ही शाम के वक्त वहाँ जाती, हवा चल रही होती और जाने कहाँ से उड़ती-उड़ती दो काली तितलियाँ आ जातीं और कभी सिर कभी बांह पर बैठ जाती थीं, आश्चर्य होता था, भरोसा भी होता था कि परमात्मा ही उनके द्वारा संदेश भेजता है. कुछ पंक्तियाँ तभी एक दिन जेहन में आई थीं-
तितलियाँ परमात्मा की दूत होती हैं
पुष्प उसके चरणों की शोभा बढ़ाते हैं
उन पुष्पों पर मंडराती हैं तितलियाँ...
उसी का संदेश ले आती हैं !

जब घंटा बजा, सभी डाइनिंग हॉल में गये जिसमें तीन ओर दीवारों से सटी हुई सीमेंट की पतली मेजें थीं, जिनपर काला मोजाइक लगा था तथा जिनके सामने प्लास्टिक की कुर्सियां रखी हुई थीं. चौथी तरफ लम्बा सा बेसिन था, कुछ दूरी पर कई नल लगे थे, बर्तन धोने का सामान रखा था, जहाँ नाश्ते व खाने के बाद सभी को स्वयं बर्तन धोकर रखने होते थे. कमरे के बीचोंबीच लकड़ी की दो मेजें सटाकर रखी गयी थीं जिनपर बर्तन व भोजन की सामग्री थी. उस दिन ‘पोहा’ मिला जो स्वादिष्ट था तथा हल्की मिठास लिए था. बाद के दिनों में भी कई व्यंजनों में मीठे से खबर मिलती रही थी कि बंगाल में हैं, जहाँ छाछ में भी मीठा डाला जाता है.

Wednesday, March 1, 2017

कबूतर और मोर



अभी कुछ देर में उन्हें आगे की यात्रा के लिए निकलना है. तैयारी हो रही है. पिताजी यहीं रहेंगे, अभी तक सुबह के भ्रमण से वापस नहीं आये हैं. छोटी ननद मेथी पुलाव बना रही है व रात के लिए रोटी व भिंडी की सब्जी. यहाँ की आवभगत का जवाब नहीं है.

कल पिताजी काफी देर तक नहीं आए तो वे सभी परेशान हो गये थे. नाश्ता खाने तक का मन नहीं हो रहा था, फिर पता चला वह अपने एक मित्र के यहाँ बैठे थे, उनके आने पर सबने नाश्ता खाया और वे स्टेशन के लिए चल पड़े. जहाँ बंदरों का एक झुण्ड छत पर लगी लोहे की पाइपों और बीम पर करतब दिखा रहा था. वह कुछ देर उनके चित्र उतारती रही. जून ने भी फोटो खींचे. ट्रेन दो घंटे लेट थी, छोटा भाई गन्तव्य पर लेने आया था, वह स्टेशन पर रात्रि के बारह बजे ही आ गया था, दो घंटे तक ओशो की किताब पढ़ रहा था. पौने चार बजे वे घर पहुंचे, सब सोये थे. छोटी बहन कुछ देर में उठकर आई. दोपहर को सारे परिवार की बैठक शानदार थी, बड़ी बहन जीजाजी व उनका बड़ा भी पुत्र आ गया था. शाम को वे छोटी ननद की ससुराल गये. उसके ससुर ज्यादा बात नहीं करते, सुन नहीं सकते, सासूजी भी कई व्याधियों से ग्रस्त हैं पर कोशिश कर रही हैं पूर्ण स्वस्थ रहने की.

दो दिन बाद वे दिल्ली के लिए रवाना हुए थे. मोर की केंआ केंआ इस भरी दोपहरी में भी सुनाई दे रही है. सामने वाले पीपल के चबूतरे पर से उतर कर दो गिलहरियाँ नीचे से कुछ उठाकर खा रही हैं. कबूतरों का आना-जाना जारी है. अभी एक तिनका लेकर आया और बक्से के नीचे घुस गया. एक कार्टन के पीछे सफेद रंग का छोटा सा अंडा भी पड़ा है. यहाँ बालकनी में बैठकर लिखना सुखद अनुभव है. एक कबूतर बिलकुल सामने आकर बैठा है, उसकी स्लेटी देह पर काली धारियां और गुलाबी व हरी चमकदार गर्दन सुंदर लग रही है. गिलहरियों की चिटक-पिटक भी जारी है.

आज दिल्ली में अंतिम दिन है, कल पुनः वाराणसी के लिए रवाना होना है. सुबह एक मोर का पुनः दर्शन किया. दिल्ली की कितनी हसीन यादें लेकर वे जा रहे हैं, बड़ी भाभी भोजन बना रही है और साथ-साथ फोन पर बात भी कर रही हैं. शाम को मंझली भाभी को फोन किया तो उसने कहा घर खाली लग रहा है. कोई आता है तो अच्छा लगता है और जाता है तो उसी अनुपात में अकेलापन खलता भी है.
दिल्ली से वापसी की यात्रा में वे दो ही हैं एसी टू टियर में. जून सामने की बर्थ पर लेटे हैं, स्टेशन से दो पत्रिकाएँ लीं, ‘अहा जिन्दगी’ तथा ‘लफ़्ज, दोनों यात्रा में पढ़ने के लिए आदर्श पत्रिकाएँ हैं. शाम हो गयी है. उसने कुछ लिखा है यात्रा की यादें ही कहा जायेगा उन्हें, एक सफल और यादगार यात्रा रही है अब तक की.
परसों सुबह पौने पांच बजे ट्रेन काशी विश्वनाथ स्टेशन पर पहुंची, घर आए तो सभी जगे थे. अभी आज अंतिम दिन उन्हें यहाँ रहना है, शाम की वापसी है. सुबह हवा में ठंडक थी पर अब मौसम गर्म है. सुबह उठकर सूर्योदय के दर्शन करने व नौका विहार करने गंगा घाट गये. घाट पहुंचने से पहले ही देशी-विदेशी पर्यटकों की भीड़ लगी थी. बड़ी-बड़ी गाड़ियाँ और बसें पंक्तिबद्ध खड़ी थीं. गंगापार रेत पर सूर्य के सम्मुख होकर सूर्य नमस्कार किया. ठंडी हवा व ठंडी रेत का स्पर्श बहुत गहरे तक मन को छू गया, बादलों से आँख-मिचौनी खेलता सूर्य का गोला कभी दीखता कभी छिप जाता था. वापस लौट रहे थे तो एक पौधे बेचने वाले से ‘रात की रानी’ व ‘अजवायन’ के दो पौधे खरीदे. यह लिखते-लिखते ही मौसम ने अचानक रुख बदल लिया है, धूल भरी आँधी आ रही है, यह घर ऊपर है, दो मंजिला, सो तेज हवा घर के सारे दरवाजों को हिला रही है. सुबह सफाई की गयी थी पर पल भर में सारे कमरे पुनः धूल से भर गये हैं. दोपहर के साढ़े बारह बजे हैं, लग रहा है शाम हो गयी है.

कलकाता गेस्ट हॉउस में वह टीवी पर बहुत दिनों के बाद श्री श्री को सुन रही है और साथ-साथ पैकिंग का कार्य भी चल रहा है. कल वे रेलवे स्टेशन पर उतरे तो वर्षा हो चुकी थी, पानी भरा था, सडकों पर भी पानी इकठ्ठा हो गया था पर दोपहर बाद धूप तेज हो गयी. वे पिताजी को विक्टोरिया मेमोरियल और बिरला प्लेनेटोरियम दिखाने ले गये. शाम को मन्दिर भी गये. आज ही दोपहर की फ्लाईट से घर वापसी है.      



Wednesday, October 17, 2012

छोटा सा स्कूल



उसने एक हफ्ते बाद लिखना शुरू किया तो अहसास हुआ कि पिछले कई दिनों से खुद को खुद की खबर नहीं है. बीएड की ट्रेनिंग का मुख्य भाग अध्यापन कार्य चल रहा है. फोन आया है कि जून इसी माह आ रहे हैं, उसका मन उत्साहित है. नन्हा भी खबर सुनकर हँसने लगा था. उसने उन दिनों की कल्पना भी आरम्भ कर दी है, शंकालु मन कहने लगा यदि न आ पाए तो..उसने मन को झटक दिया और विश्वास से भीतर कहा, ऐसा नहीं होगा. उसने उन दिनों के लेसन प्लान अभी से बना कर रखने का निश्चय भी किया, तब समय मिले न मिले.

कल वह आ गए अड़तालीस घंटे की ट्रेन की यात्रा करके, लगभग पौने दस बजे, वह नीचे कमरे में ही थी. दिन भर एक खुमारी सी छायी रह मन पर, कल रात भी एक बजे तक बातें ही करते रहे. शाम को वे गंगा घाट तक गए थे. कल उसका चौथा पीरियड है, दोपहर को बारह बजे जाना होगा. आज टीवी पर नेहरु जन्मशताब्दी के उपलक्ष में कुछ कार्यक्रम आएंगे..पर कब आएंगे, समय का तो पता नहीं है उसे. नन्हा बहुत खुश है और उसने वादा किया है कि माँ का कहना मानेगा.

और आज वह चल भी गया. एक दिन उनका फोन आया कि वह आ रहे हैं, तब से लेकर  आज तक दिन कैसे बीते पता ही नहीं चला. एक खुमारी...मदहोशी सी और भी जाने क्या...जिसे प्यार कहें या..? प्यार ही तो है जो उन्हें बांधता है इतना. उसने सोचा वह ठीक ही कहता है कि.. वह सभी कुछ तो ठीक कहता है. कल रात उसने कितनी बातें याद दिलायीं. उसे एक एक बात याद है... वह कैसे उसे मिला था, कैसे उसने उसे पहली बार देखा था और भी जाने क्या क्या .अब चला गया है..निर्मोही..नहीं, इतना चाहने वाला कभी निर्मोही हो सकता है?

चुनाव परिणाम आने शुरू हो गए हैं. कर्नाटका में कांग्रेस  आगे है, उत्तर प्रदेश में काफी पीछे है. जून को उसने आज दूसरा खत लिखा, जाने से पहले वह उसकी डायरी में एक पत्र लिख गए थे जो बाद में उसने पढ़ा. कल सुबह वह घर पहुँचेगे और कल ही टेलीग्राम भी भेजेंगे और शायद पत्र भी. चुनाव परिणाम सुनने में उसे इतना आनंद आ रहा है जितना एक अच्छी फिल्म या धारावाहिक में भी नहीं आता. नन्हा इस वक्त लिखने में मस्त है.

आज बहुत दिनों बाद अपने कालेज गयी, शायद इसी कारण या कल रात या कल दिन में देर तक टीवी देखते रहने के कारण आँखों में दर्द हो रहा है. पता नहीं क्या होगा...अर्थात चुनाव का परिणाम. कल उसे फिर पढ़ाने जाना है वहीं गोपीराधा में. यह पेन चलते चलते रुक क्यों जाता है?
आज जून का टेलीग्राम नहीं आया, कल आए या परसों. माँ-पिता व दीदी के पत्र मिले. बड़े  भाई बनारस के पास तक आकर भी उससे मिलने नहीं आए, खैर..उसने सोचा अब कभी भी उन्हें कोई शिकायत नहीं लिखेगी, शायद वह उससे नाराज हो गए हैं. कल उन्हें एक जन्मदिन कार्ड भेजेगी. नन्हे को आज दिन में सोने के लए कहा तो भाग गया, बिलकुल ही बात नहीं सुनता है, उसे जबरदस्ती सुलाया है. माँ के भांजे आए हैं उल्हासनगर से, पिछले डेढ़-दो घंटे से बातें कर रहे हैं, ठहरे कहीं और हैं, उसने सोचा पता नहीं वे रात का खाना यहीं खायेंगे या पता चल जाता तो..वह तैयारी कर लेती. ध्यान फिर बंट गया, उसके दो लेसन प्लान बेकार जायेंगे शायद..कल के दो मिलाकर उन्नीस होंगे और अगर कल दो और मिल गए तो इक्कीस, फिर बचेंगे दस आर्य महिला के लिए. यूनिट टेस्ट का भी एक लेसन प्लान होगा.

कल दिन भर व्यस्त रही सो लिख नहीं पायी. आज दस बजे ही घर आ गयी थी. कल से उसे साढ़े दस बजे जाना है, साढ़े ग्यारह बजे से क्लास है. आज क्लोजिंग डे होने के कारण रुक्मिणी विद्यालय हायर सेकेंडरी स्कुल जल्दी बंद हो गया था. स्कूल के नाम पर कुछ कमरे ही तो हैं वहाँ. एक घर है उस में कुछ बच्चों को लेकर स्कूल चल रहा है. पन्द्रह दिसम्बर तक उसे यहाँ जाना है. तेरह दिन मिलेंगे. समझ नहीं आ रहा टेस्ट कहाँ लेना होगा. भविष्य बताएगा. अगर यहीं ले लें तो भी क्या हर्ज है? कल तो पहला दिन होगा, छोटी सी क्लास है सिर्फ तेरह लड़कियों की. एक दिन में एक का नाम याद करे तो पूरी कक्षा के नाम याद हो जायेंगे. आज जून का पत्र आना चाहिए, नहीं टेलीग्राम, पत्र आने में तो एक सप्ताह लग एकता है. उसने सोचा थ्योरी की पढ़ाई भी जो इतने दिन से छूटी हुई है शुरू कर देनी चाहिए आज से ही. और साथ ही मेजर की कॉपी के लिए पूर्णिमा मैम से कहना होगा. आज एक दो जगह पत्र भी लिखने हैं.

Monday, October 1, 2012

आलू की भुजिया





कल दोपहर को बड़ी ननद अपने पति व बिटिया के साथ आयी है, घर जैसे भर गया है, दामाद जी तो रात को ही लौट गए, वे दोनों रहेंगी. वे सब बाजार गये थे, गंगा किनारे की विश्वनाथ गली में, जो बनारस का मीनाबाजार है, जहां सैकड़ों दुकाने हैं, खिलौनों, कपड़ों, बर्तनों, पूजा के सामानों, चूड़ियों, और साड़ियों के साथ-साथ न जाने कितनी वस्तुओं की. उसने कुछ खिलौने खरीदे. कल पड़ोस का एक छात्र उससे एक सवाल पूछने आया, वह समस्या को इस तरह रख रहा था जैसे टीचर क्लास में रखते हैं, जैसे वह खुद भी रखती थी जब पढ़ाती थी, अब काफी समय से पढ़ाई से सम्पर्क नहीं रहा तो जैसे सब भूल गयी है. पिछले दो-तीन दिनों से नन्हा कुछ भी खाने में रूचि नहीं दिखा रहा है. गर्मी भी बढ़ गयी है, सुबह अपेक्षाकृत ठंडी होती है पर दिन बेहद गर्म. कल जून के पत्र मिले पर उसने लिखा नहीं है कि वह जश्न के अवसर पर आ रहा है या नहीं. कल माँ ने उससे पूछा कि वह कितने दिनों के लिए जा रही है, फिर बोलीं, चार-पाँच दिन में लौट आए, वरना उनका मन नहीं लगेगा. उसने सोचा, सभी को अपने मन का ही ध्यान रहता है दूसरे के मन की बात कोई क्यों सोचे. वह पिछले वर्ष कुछ दिनों के लिए घर गयी थी, सोचती है इस बार दसेक दिनों के लिए तो जायेगी ही. दीदी का पत्र भी आया है वे लोग उसी दिन पहुँचेंगे. भाई का पत्र भी आया है, वह छब्बीस को रात साढ़े आठ बजे की गंगा-सतलज एक्सप्रेस से आ रहा है, उन्हें लेने. उसने सोचा वह उसे लेने स्टेशन जायेगी, यदि ट्रेन लेट न हुई. टीवी पर गुफ़्तगू कार्यक्रम में उर्दू के मशहूर शायर जौक का लिखा एक खूबसूरत शेर उसने सुना, ‘लायी हयात आए, कज़ा ले चली चले, न अपनी खुशी से आए न अपनी खुशी चले’.

आज सुबह पाँच बजे से पहले ही वह उठ गयी थी, देर तक स्नान किया, ताकि भीतर तक ठंडक को भर ले. आज भी हवा की वही स्थिति है, बनारस में गर्मी बढती जा रही है. सीढ़ियों पर जहां वह रोज बैठती थी, आज बिलकुल हवा नहीं है. सुबह के मात्र सवा छह बजे हैं. सोच रही है कपड़े प्रेस करने की बात, दिन में तो यह कमरा तपता है, बैठने का मन ही नहीं होता. फिर समय भी कहाँ मिल पता है. प्रेस गर्म हो रही है. आज बंदर न ही आयें तो अच्छा है...सोनू ऊपर ही सो रहा है. कल रात सोने से पहले कहानी सुनते-सुनाते समय उसके साथ छत पर एक-डेढ़ घंटे का समय बिताया जो अनमोल था, वह बेहद खुश था और वह भी, उसकी तुलना में नीचे गर्मी और घुटन भरे कमरे में फिल्म देखना व्यर्थ था. जून इस समय ऑफिस जाने की तैयारी कर रहे होंगे. अचानक एक हवा का झोंका आया और चेहरे को सहला गया, उसने उसका शुक्रिया किया. लखनऊ से उसकी छोटी बहन भी घर साथ जायेगी, उसने लिखा है.

कल घर में सुबह चार बजे से ही कार्य शुरू हो गया था, दोपहर को होने वाले छह ब्राह्मणों के भोज के लिए, सो लिखने-पढ़ने का वक्त नहीं मिला. सब कुछ ठीकठाक ही रहा, सिवाय उससे हुई दो गलतियों के, एक तो आलू की भुजिया का न देना और दूसरा खरबूजे को न छीलना, भविष्य के लिए एक सीख पर किसी ने कुछ कहा नहीं, यहाँ सभी लोग उसका बहुत ध्यान रखते हैं. कल जून को एक पत्र लिखा पर वैसा नहीं जैसा वह चाहता है या जैसा वह लिखा करती थी. दिन भर दिमाग स्थिर तो हो ही नहीं पाता, इधर-उधर की बातें...और फिर गर्मी, कुछ भी तो ऐसा नहीं जो दिल की बातें उभार दे...जो थोड़ा सा रोमानी होने के लिए प्रेरणा दे.   



Wednesday, September 12, 2012

गंगा घाट पर सुबह की सैर



आज उन्हें यहाँ पूरा एक हफ्ता हो गया, बाजार गयी थी, किताब तो मिली नहीं..कला संकाय के लिए थी वह किताब वैसे फार्म में तो ऐसा कोई वर्गीकरण नहीं था. अगले हफ्ते विज्ञान संकाय की पुस्तक भी आ जायेगी ऐसा दुकानदार ने कहा तो है. कल रात उसने पत्र लिखा, कल संभवतः उसका पत्र भी आयेगा, थोड़ा-थोड़ा गुस्सा तो वह जरूर होगा न..पर लगता है इस गुस्से में भी एक अजीब तरह की मिठास है, प्यार है. मौसम भी आज अच्छा रहा और यहाँ सभी का व्यवहार सभी के प्रति बहुत अच्छा है. स्नेह भरा, ऐसे वातावरण में रहकर ही वह बड़ा हुआ है. तभी उसका दिल भरा हुआ है प्यार से. आज दोपहर को उसके एक मित्र अपनी पत्नी के साथ आए थे, कुछ देर रुके फिर चले गए.

कल दोपहर और कल रात भी अपने घर की बहुत याद आयी. नन्हे को सुलाना था कि मेहमान आ गए. वह इतनी जिद करता है पर उसे यहाँ डांटा नहीं जा सकता, सब उसकी पैरवी करने लगते हैं. सोचा है आज से कम से कम वह तो समय से भोजन कर लेगी. और सोनू को भी साढ़े नौ बजे तक सुला देगी. ग्यारह बजे रात तक जागना उसके लिए ठीक नहीं है. इस समय सुबह के छह बजे हैं, कुछ देर पूर्व माँ को उठया गंगा जी जाने के लिए, पर शायद वह उठना नहीं चाह रही हैं. लगता है कल रात वर्षा हुई, अभी भी हवा में ठंडक है.

कल उनका असम जाने के बाद पहला खत आया. गोहाटी से भेजा है. उनकी ट्रेन १२ घंटे देर से पहुंची, सो शनिवार को दफ्तर नहीं जा सके. दूसरे खत से मालूम होगा कि सीएल की जगह पीएल तो नहीं लेनी पड़ी. अब जबकि वह दूर है तो इतना याद आता है, इतना ख्याल रहता है उसका और जब वह नजदीक था उसे...चलो अब मिलने पर सारी शिकायतें दूर हो जाएँगी. घाट तक माँ के साथ घूमने जाना है पर वह हैं कि आ ही नहीं रही हैं. लगता है वह मन से जाना नहीं चाहती हैं टालना चाहती है, हम सभी के कहने पर. बेमन से हाँ कह देती हैं. वह चाहती है कि जल्दी जाकर जल्दी लौट आये जिससे नन्हा सोया रहे जब तक वे आयें. कल का दिन सामान्य था, हाँ, चिट्ठी आयी यह बात तो थी.

डायरी लिखती है पर कल ध्यान ही नहीं था तिथि कौन सी है, कल ड्राईक्लीनर से साड़ियां मिलनीं  थीं, आज सुबह तो माँ बीस मिनट में ही तैयार हो गयीं, मगर पन्द्रह मिनट में ही वे लोग लौट आये, अखबार लेने का मन हुआ पर पर्स नहीं ले गयी थी. कल रात स्वप्न में जून को देखा, उसे भी आते होंगे ऐसे स्वप्न, अगर वह उसे एक बार लिख दे कि अप्रैल में आ जाये तो वह आ जायेगा पर वह ऐसा नहीं करेगी. वे जून में ही मिलेंगे. और उसके बाद अक्तूबर में. यहाँ सब ठीक चल रहा है. माँ कभी कभी पुरानी बातें दोहराने बैठ जाती हैं, और जानबूझ कर उदास होती हैं, जैसे दुखी होना उनके लिए जरूरी हो. पिता ठीक रहते हैं समझ गए हैं और ननद भी. अभी विशेष गर्मी शुरू नहीं हुई है, सुबह-शाम मौसम बेहद अच्छा रहता है.



Thursday, May 31, 2012

नामकरण संस्कार


इस समय टीवी पर ‘गंगा प्रदूषण मुक्ति’ अभियान दिखाया जा रहा है, जो वाराणसी में राजीव गाँधी द्वारा राष्ट्र को समर्पित किया जा रहा है. प्रधानमंत्री इस परियोजना के प्रतीक का अनावरण कर रहे हैं. उसे याद आ रहे हैं वे दिन जब पूरे परिवार के साथ वह गंगा भ्रमण के लिये जाती थी, जो भी मेहमान उनके यहाँ आते थे, उन्हें भी गंगा दर्शन के लिये ले जाना होता था. पानी तब इतना दूषित नहीं था.
आज इतवार है, अभी तक का समय खट्टा-मीठा बीता है और यह इस बात का प्रतीक है कि अभी जीवन में स्पदंन है. बिना कोई परेशानी आये, सीधे-सीधे जीवन का पथ तय होता जाये तो आनंद ही क्या. कल शाम वे नवजात शिशु से मिलने गए थे जो कल ही घर आया है, अभी तक उसका नाम नहीं रखा गया है, नामकरण संस्कार होने पर ही नाम रखेंगे उसकी माँ ने बताया, नूना को थोड़ा आश्चर्य हुआ, उसने तो अभी से नाम सोच रखा है. कल वह फिर जायेगी उसके लिये उपहार लेकर, आज तो बाजार बंद है. वे घर लौटे तो दो परिवार उनसे मिलने आये हुए थे. रात को स्वप्न में वह अमेरिका पहुँच गयी थी, और छोटी बुआ को भी देखा. सुबह नींद देर से खुली, पर जून ने बिना कोई जल्दबाजी किये आराम से ही ऑफिस जाने की तैयारी कर ली. उसकी यही बात नूना को बहुत भाती है, वह कभी भी घबराता नहीं है, न दूसरे को ही इसका अनुभव करने देता है.

कल टीवी पर व्ही. शांताराम की प्रसिद्ध फिल्म देखी, ‘झनक झनक पायल बाजे’ उसे तो बहुत अच्छी लगी, पर जून को ऐसी फ़िल्में अच्छी नहीं लगतीं शायद, वह बीच-बीच में उठ कर चला जाता था. रात दस बजे फ़्रांस में हुए ‘इंडिया फेस्टिवल’ की समाप्ति पर एक विशेष कार्यक्रम था, कितना मन था उसका देखने का पर यह जून है न जो, उसे नींद आती है दस बजे ही, बेड में आने के बाद चाहे ग्यारह, बारह बजे तक जगता रहे.