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Monday, May 4, 2015

बरामदे में गमले


जून कल दोपहर दो बजे मुम्बई के लिए रवाना हुए, वह दिल्ली होते हुए रात्रि साढ़े दस बजे वहाँ पहुंचें. उनकी याद कल दिन में कई बार आयी. शाम को वह टहलने गयी, दिन में आलमारी सहेजी. सर्दियों के वस्त्र निकले, गर्मियों के रखे. बरामदे के गमले बाहर रखवाए थे, आज माली ने निराई की. अभी कुछ देर पूर्व जून का फोन आया. उन्होंने भी ‘क्रिया’ की, उसने भी सुबह पौने पांच बज उठकर वे सभी कार्य किये जो वे रोज करते हैं. सद्गुरु का ज्ञान उसके साथ है. उसे लगता है यह देह कृष्ण का मन्दिर है, इसे स्वस्थ-सुंदर रखना उसका कर्त्तव्य है, स्वस्थ रखना तो और भी आवश्यक है, मन में उसकी मूरत जो बसी है. वह उसके इतने निकट है कि कभी-कभी उसका स्पर्श भी महसूस होता है, सारा जगत जैसे अदृश्य हो जाता है, सिवाय एक उसकी स्मृति के वह अन्य किसी छोटी-बड़ी बात को स्थान देना नहीं चाहती. वह नितांत अपने लगते हैं, पूर्व हितैषी, पुराने मित्र, जाने पहचान से और बेहद प्रिय ! कृपा उसपर अवश्य हुई है अन्यथा इतने सारे सालों में पहले तो ऐसा कभी नहीं हुआ.

आज सुबह चार बजे से पहले ही नींद खुल गयी थी, वर्षा हो रही थी. स्नान-ध्यान आदि किया, समय की यदि कोई कद्र करे तो समय भी संभालता है. आज ‘जागरण’ में ध्यान के सूत्र सुने. सरल शब्दों में धीरे-धीरे बड़े प्यार से सद्गुरु ने कुछ बातें बतायीं, कि ध्यान करते समय यदि शरीर में कहीं दर्द हो तो उसे गहराई से महसूस करना है, उसके भीतर जाना है. शरीर का वह अंग उस बच्चे की तरह है जो माँ का ध्यान अपनी ओर खींचना चाहता है. ध्यान धारणा पर आधारित होना चाहिए, कल्पना पर नहीं. अपने शरीर के अंग-प्रत्यंग की भाषा को सुनते हुए, श्वास-प्रश्वास पर अपना ध्यान टिकाते हुए जब मन एकाग्र हो जाये तो वही ध्यान है. उसके बचपन से किये कितने ही छोटे-बड़े अपराध आजकल याद आते हैं और तब लगता है इतना कलुषित था तब मन फिर भी ईश्वर की निकटता का अनुभव वह कर सकी, अर्थात उसका आश्रय लो तो सारे कलुष धुल जाते हैं. वह स्वच्छ कर देता है. भीतर से भी बाहर से भी. अपने सारे अपराधों की क्षमा मांगते हुए उसने कुछ आँसूं बहाये तो मन हल्का हो गया और आश्चर्य तो इस बात का कि ज्यादातर ऐसे में सिर भारी लगता है. सदगुरुओं की कही सारी बातें सच प्रतीत होती लगती हैं. उसके अंतर में लगा भक्ति का बीज अंकुरित हो रहा है और यह बेल बढ़ती ही जाएगी. आज एक सखी का जन्मदिन है, शाम को उन्हें जाना है.

आज फिर तमस ने अपना प्रभाव दिखाया. सुबह नींद नहीं खुली. नन्हे के मित्र ने फिजिक्स ट्यूशन पर जाने के लिए पांच बजे फोन करके उठाया. नन्हा अब समझदार हो गया है, फौरन उठकर चला गया. कार ले गया था, वापस आया तो स्कूल के लिए तैयार हुआ और दौड़ते हुए बस स्टैंड तक पहुंचा. नूना की गलती की सजा उसे उठानी पड़ी, खैर अंत भला तो सब भला ! जून से फोन पर बात भी की, आज वे वहाँ किसी संबंधी से मिलने वाले हैं.






Thursday, April 3, 2014

शरलक होम्स के कारनामे


कुछ देर पूर्व एक सखी का फोन आया, कल से वह पढ़ाने जा रही है, खुश है, फ़िलहाल प्राइमरी सेक्शन को पढ़ाना होगा. कल से उसके जीवन में एक परिवर्तन आएगा, छह घंटे उसे घर से बाहर रहना होगा. जून की आज भी फील्ड ड्यूटी है. नन्हे को आज भी कम्प्यूटर क्लास जाना है, उसे encyclopedia में ‘कोलस्ट्रोल’ पर एक लेख मिल गया है जो उसे biology project work के लिए लिखना है. कल एक सखी से बात की, पर उसका ‘कोरस प्रतियोगिता’ के बारे में एक भी सवाल न पूछना उसे अच्छा नहीं लगा. फिर स्मरण हो आया, किसी की कोई बात अच्छी लगना या न लगना यह उसकी समस्या है, और वह क्यों व्यर्थ ही अपनी समस्या को बढाये, सो वह कोई अपेक्षा नहीं रखेगी and she will not judge any body.

जून अभी-अभी तिनसुकिया चले गये हैं और वहाँ से रात की ट्रेन से घर के लिए रवाना होंगे. यूँ लग रहा है जैसे उसके मन का एक कोना खाली हो गया है, कोई कुछ ले गया है छीनकर, जून का साथ जो पोर-पोर में समाया हुआ है वह कैसी कसक जगा रहा है मन में, मन जो रुआंसा सा हो गया है. मगर आने वाले आठ-दस दिन उसे उनके बिना रहना ही होगा, सुखद स्मृतियों के साथ..मौसम बहुत अच्छा हो गया है, उसने सोचा लाइब्रेरी जाना चाहिए या यूँ ही टहलने तो दीवाना दिल कुछ तो संभल जायेगा. आज सुबह वे साथ-साथ उठे, दोपहर को साथ-साथ भोजन किया, आज का साथ पिछले कई वर्षों के साथ से ज्यादा मोहक लग रहा है, क्यों कि उनके मन उसे पूरी तरह महसूस कर अपने में समो लेना चाहते थे. प्रेम एक निहायत ही खूबसूरत व पाक जज्बा है जो दो दिलों को एक-दूसरे के लिए धड़कने पर विवश कर देता है, ऐसा ही प्रेम वह इस वक्त महसूस कर रही है.

आज उसे नींद नहीं आ रही, नई-नई मिली आजादी का जश्न मन के साथ-साथ आँखें भी मना रही हैं. जब तक नींद न आए तब तक सोया न जाये यह नियम क्रन्तिकारी तो नहीं पर जोशीला तो है. मन जोश से भर जाये ऐसा कई दिनों से नहीं हुआ, तेज संगीत पर थक जाने तक थिरकने का ख्याल भी तो कब से नहीं आया, न ही बादलों को बरसते देख मन में कविता जगी. जिन्दगी एक रस्म की तरह निभती चली जा रही है, लोग मिलते हैं, इधर-उधर की बातें होती हैं, मौसम के ऊपर कभी एक दूसरे के जीवन के बारे में, पर ऊपरी-ऊपरी सतह तक, कभी अंदर उतर कर झाँकने की कोशिश भी करें तो एक गर्म हवा का झोंका चेहरे को झुलसा डालेगा ऐसा तेजी से आता है कि चार कदम पीछे लौटना पड़ता है. हरेक अपनी-अपनी सलीब ढोये आगे बढ़ रहा है. कुछ पल रुककर बातचीत कर लेते हैं लोग, कुछ पलों के लिए कंधों का बोझ हल्का लगता है फिर वही यात्रा. लेकिन क्या ये कुछ पल भी जरूरी नहीं हैं, सतही ही सही कोई चीज तो है ही जो लोगों को जोड़ती है और अगर किसी का दिल साफ है, शफ्फाफ है, खुद पर भरोसा है, मजबूत है तो अपनी शर्तों पर जियेगा. अगर ऐसा नहीं है तो वह किसी पर विश्वास नहीं कर पायेगा, तो जीने का सही तरीका अपने अंदर की ताकत से उपजता है.

अभी कुछ देर पहले जून का फोन आया, उसे लगा, चाहे वह यहाँ से दूर हैं पर उनका दिल यहीं है. कल उसके सिर में दर्द हो गया था, नन्हे ने दवा दी. सुबह वह सोच रही थी कि जून ने उससे एक बार भी  अपने साथ जाने के लिए नहीं कहा, पर अब उसे लग रहा है, वह उन्हें यात्रा की तकलीफ से बचाना चाहते थे. आज उसने गुलदाउदी के लिए गमले साफ करवाए. नन्हे के साथ बाजार गयी, उसने मेहमानों के लिए समोसे खरीदे, एक सखी ने कहा था शाम को आयेगी, पर जब वह चाय बनाने के लिए उठी तो वे कहने लगे, उन्हें जल्दी जाना है, वह तो पहले से ही प्रसन्न नहीं थी, उनकी यह बात उसे और परेशान कर  गयी. बाद में सोचा कि उन्हें कोई आवश्यक कार्य होगा याकि लोग भिन्न समय पर भिन्न व्यवहार करेंगे ही. वह इतनी संवेदनशील है कि पलक झपकने मात्र से ही कुम्हला जाती है. उसने सोचा उसे मजबूत बनना होगा.

शाम को उन्होंने कुछ पहेलियाँ हल कीं फिर लाइब्रेरी गये, नन्हे ने ‘शरलक होम्स’ की एक किताब ली, उसे डिटेक्टिव नॉवल पढना बहुत अच्छा लगता है. नूना को भी फेलूदा की कहानियाँ अच्छी लगती हैं. जून का फोन आज आ सकता है, अब वह मात्र एक हफ्ते के लिए दूर हैं, अगले हफ्ते वे साथ होंगे, A happy family !




Wednesday, March 20, 2013

सिडनी की आग




आज छोटी बहन का पत्र व कार्ड मिला, जून के दफ्तर से उनके सहकर्मी आकर दे गए. सुबह रोजमर्रा के कार्यों में गुजर गयी. दोपहर को बरामदे में रखे गमलों की सफाई-निराई की, उनमें पानी दिया, एक घंटा उसमें लग गया, फिर मन न जाने कहाँ-कहाँ की बातें सोचने लगा, मन बहलाने को पड़ोसिन से मिलने उसके घर गयी, साथ बैठकर स्वेटर बनाया, चायनीज चेकर खेला, टीवी देखा, और फिर घर आकर नन्हे का इंतजार. शाम को वे दोनों घूमने गए और फिर वह पुरानी डायरियों में उस कविता की खोज में लग गयी जो क्लब की पत्रिका में छपने के लिए देनी है. सारी शाम इसी में निकल गयी, एक कविता व लेख चुना तो है. उसे जून का ख्याल हो आया, कल उनका सेमिनार है, जिसके लिए वह गये हैं. आज सुबह ही क्लब से भी विवाह की सालगिरह का कार्ड मिला. हो सकता है आज रात वह उसे स्वप्न में देखे. सरस्वती पूजा के लिए चंदा मांगने फिर एक ग्रुप आया था, उसने छूटते ही मना कर दिया और वे लोग चले गए.

 सुबह उठते ही मन ही मन उसने जून को मुबारकबाद दी, बाद में उसके उपहार के लिए धन्यवाद भी दिया जो नन्हे ने सुबह उठते ही अपनी बधाई के साथ उसे दिया, एक सुंदर कार्ड व चॉकलेट ! जो जून उसे देकर गए थे. वह आजकल जरा भी नखरे नहीं करता है, अच्छे बच्चे की तरह उसका हर कहा मानता है. आज सुबह ठंड ज्यादा थी, नन्हे के जाने के बाद बाहर के गमलों की देख-रेख की, फिर तीन कवितायें उतारीं, पत्रिका में देने के लिए. दोपहर को कुछ देर कढ़ाई की. फिर शाम को नन्हे के साथ अपने घर के सामने वाली सड़क पर घूमने गयी. शाम को पहले उसकी बंगाली सखी आयी, फिर असमिया सखी जो साथ में कचौडियाँ भी लायी थी. और बाद में उड़िया सखी, स्वीट डिश में चॉकलेट बहुत काम आई. कुल मिला कर शाम अच्छी रही, सिर्फ जून की कमी खल रही थी. कल स्वप्न में उसने सचमुच जून को देखा, कह रहा था, दीदी लोगों से मिलने रात को दो बजे गया, सपने तो सपने ही होते हैं आखिर.

  आज पांचवी रात है यानि लगभग आधे दिन बीत गए हैं. उसने सोचा वह भी सोने की तैयारी कर रहे होंगे. दोपहर को नन्हे की पसंद पर अरहर की दाल की खिचड़ी बनाई उसने, सुस्वादु थी. आज लौंग स्टिच की कढ़ाई का कार्य पूर्ण हो गया, अब उसे फ्रेम करवाना होगा. शाम को बैडमिंटन, भ्रमण और वापस आकर नन्हा खेलता रहा, अपने कई पुराने खिलौने निकाले उसने. रोज रात को चम्पक पढकर सोता है. कल नए गमलों में माली ने मिटटी भरी और पौधे लगाये. शाम को ‘रुदाली’ फिल्म थी टीवी पर, उसने सोचा शायद जून ने भी देखी हो. आज सुबह उसने एक नई कविता लिखी ‘रात’, जून के आने पर उसे सुनाएगी, नन्हे ने आज उसकी कुछ पुरानी कवितायें सुनीं, पता नहीं वह कितना समझ पाता है. आज गर्म पानी नहीं आया तो जून की बात याद आई कि शाम को गैस तेज कर दिया करे. पिछली बार जब जून गए थे तो नन्हा बहुत उदास हो गया था, पर इस बार ठीक है, अब वह बड़ा हो रहा है, शायद इसीलिए, या उसे शांत देखकर वह ऐसा है और उसे इस बार शायद ज्यादा उदासी इसलिए नहीं हुई कि दस-ग्यारह दिन ही तो बात है, सिर्फ छह रातें और..उसके स्वप्नों के सहारे.

  उसने डायरी में ही जून को एक खत लिखा जो वह जानती है कि भेजेगी नहीं, आज अभी सवा आठ ही हुए हैं, उसका रात्रि भोजन हो चुका है, नन्हा अभी खा रहा है. आज शाम से ही अच्छा नहीं लग रहा, खल रही है उसकी कमी. सुबह से शाम हो गयी, नन्हा और उसने किसी से बात नहीं की, उनके पड़ोसी भी घर में रहे दिन भर, एक बार भी बाहर नहीं निकले. शाम को वह दो-तीन बार नन्हे पर झुंझला भी गयी, पर वह बहुत बहादुर है उससे भी ज्यादा. सुपरमैन बना था, आज वही सेफ्टी पिन्स से टॉवेल लगाकर. शाम को वे घूमने भी गए. माली आज दूसरे दिन भी नहीं आया, सो शाम को पानी दिया बगीचे में. ‘गार्डन टैप’ लगता है जून के आने के बाद हो ठीक होगी, दोपहर को असमिया फिल्म देखी “मयूरी”, आज उसकी जितनी याद आ रही है पिछले पांच दिनों में एक दिन भी नहीं आयी होगी ऐसी याद जो व्याकुल कर  देती है. उसने सोचा वह उसके पिता के घर गए होंगे, अपना नया बनता हुआ मकान देखा होगा, यकीनन अच्छा लगा होगा. समाचारों में सिडनी की आग के बारे में सुना, कितनी भयंकर आग है, संभवतः आस्ट्रेलिया में तो घर भी लकड़ी के होते हैं न अधिकतर.