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Wednesday, March 1, 2017

कबूतर और मोर



अभी कुछ देर में उन्हें आगे की यात्रा के लिए निकलना है. तैयारी हो रही है. पिताजी यहीं रहेंगे, अभी तक सुबह के भ्रमण से वापस नहीं आये हैं. छोटी ननद मेथी पुलाव बना रही है व रात के लिए रोटी व भिंडी की सब्जी. यहाँ की आवभगत का जवाब नहीं है.

कल पिताजी काफी देर तक नहीं आए तो वे सभी परेशान हो गये थे. नाश्ता खाने तक का मन नहीं हो रहा था, फिर पता चला वह अपने एक मित्र के यहाँ बैठे थे, उनके आने पर सबने नाश्ता खाया और वे स्टेशन के लिए चल पड़े. जहाँ बंदरों का एक झुण्ड छत पर लगी लोहे की पाइपों और बीम पर करतब दिखा रहा था. वह कुछ देर उनके चित्र उतारती रही. जून ने भी फोटो खींचे. ट्रेन दो घंटे लेट थी, छोटा भाई गन्तव्य पर लेने आया था, वह स्टेशन पर रात्रि के बारह बजे ही आ गया था, दो घंटे तक ओशो की किताब पढ़ रहा था. पौने चार बजे वे घर पहुंचे, सब सोये थे. छोटी बहन कुछ देर में उठकर आई. दोपहर को सारे परिवार की बैठक शानदार थी, बड़ी बहन जीजाजी व उनका बड़ा भी पुत्र आ गया था. शाम को वे छोटी ननद की ससुराल गये. उसके ससुर ज्यादा बात नहीं करते, सुन नहीं सकते, सासूजी भी कई व्याधियों से ग्रस्त हैं पर कोशिश कर रही हैं पूर्ण स्वस्थ रहने की.

दो दिन बाद वे दिल्ली के लिए रवाना हुए थे. मोर की केंआ केंआ इस भरी दोपहरी में भी सुनाई दे रही है. सामने वाले पीपल के चबूतरे पर से उतर कर दो गिलहरियाँ नीचे से कुछ उठाकर खा रही हैं. कबूतरों का आना-जाना जारी है. अभी एक तिनका लेकर आया और बक्से के नीचे घुस गया. एक कार्टन के पीछे सफेद रंग का छोटा सा अंडा भी पड़ा है. यहाँ बालकनी में बैठकर लिखना सुखद अनुभव है. एक कबूतर बिलकुल सामने आकर बैठा है, उसकी स्लेटी देह पर काली धारियां और गुलाबी व हरी चमकदार गर्दन सुंदर लग रही है. गिलहरियों की चिटक-पिटक भी जारी है.

आज दिल्ली में अंतिम दिन है, कल पुनः वाराणसी के लिए रवाना होना है. सुबह एक मोर का पुनः दर्शन किया. दिल्ली की कितनी हसीन यादें लेकर वे जा रहे हैं, बड़ी भाभी भोजन बना रही है और साथ-साथ फोन पर बात भी कर रही हैं. शाम को मंझली भाभी को फोन किया तो उसने कहा घर खाली लग रहा है. कोई आता है तो अच्छा लगता है और जाता है तो उसी अनुपात में अकेलापन खलता भी है.
दिल्ली से वापसी की यात्रा में वे दो ही हैं एसी टू टियर में. जून सामने की बर्थ पर लेटे हैं, स्टेशन से दो पत्रिकाएँ लीं, ‘अहा जिन्दगी’ तथा ‘लफ़्ज, दोनों यात्रा में पढ़ने के लिए आदर्श पत्रिकाएँ हैं. शाम हो गयी है. उसने कुछ लिखा है यात्रा की यादें ही कहा जायेगा उन्हें, एक सफल और यादगार यात्रा रही है अब तक की.
परसों सुबह पौने पांच बजे ट्रेन काशी विश्वनाथ स्टेशन पर पहुंची, घर आए तो सभी जगे थे. अभी आज अंतिम दिन उन्हें यहाँ रहना है, शाम की वापसी है. सुबह हवा में ठंडक थी पर अब मौसम गर्म है. सुबह उठकर सूर्योदय के दर्शन करने व नौका विहार करने गंगा घाट गये. घाट पहुंचने से पहले ही देशी-विदेशी पर्यटकों की भीड़ लगी थी. बड़ी-बड़ी गाड़ियाँ और बसें पंक्तिबद्ध खड़ी थीं. गंगापार रेत पर सूर्य के सम्मुख होकर सूर्य नमस्कार किया. ठंडी हवा व ठंडी रेत का स्पर्श बहुत गहरे तक मन को छू गया, बादलों से आँख-मिचौनी खेलता सूर्य का गोला कभी दीखता कभी छिप जाता था. वापस लौट रहे थे तो एक पौधे बेचने वाले से ‘रात की रानी’ व ‘अजवायन’ के दो पौधे खरीदे. यह लिखते-लिखते ही मौसम ने अचानक रुख बदल लिया है, धूल भरी आँधी आ रही है, यह घर ऊपर है, दो मंजिला, सो तेज हवा घर के सारे दरवाजों को हिला रही है. सुबह सफाई की गयी थी पर पल भर में सारे कमरे पुनः धूल से भर गये हैं. दोपहर के साढ़े बारह बजे हैं, लग रहा है शाम हो गयी है.

कलकाता गेस्ट हॉउस में वह टीवी पर बहुत दिनों के बाद श्री श्री को सुन रही है और साथ-साथ पैकिंग का कार्य भी चल रहा है. कल वे रेलवे स्टेशन पर उतरे तो वर्षा हो चुकी थी, पानी भरा था, सडकों पर भी पानी इकठ्ठा हो गया था पर दोपहर बाद धूप तेज हो गयी. वे पिताजी को विक्टोरिया मेमोरियल और बिरला प्लेनेटोरियम दिखाने ले गये. शाम को मन्दिर भी गये. आज ही दोपहर की फ्लाईट से घर वापसी है.      



Friday, November 28, 2014

पुष्प सज्जा की कला


जून घर पहुंच गये हैं, स्टेशन से ही उन्होंने फोन किया. उनके न होने से एक खालीपन तो है पर एक नयी ख़ुशी भी है कि उनके आने के बाद वे पहले से ज्यादा करीब होंगे, दूरियां निकटता को बढ़ा देती हैं. घर में सब ठीक होंगे उसे व नन्हे को याद कर रहे होंगे. कल शाम क्लब की एक सदस्या ने फोन किया, इस बार मीटिंग में पुष्प-सज्जा उसे एक सखी के साथ मिलकर करनी है. इस समय दोपहर के सवा बजे हैं, प्रूफ रीडिंग का काम हो गया है. सुबह पांच बजे वे उठ गये थे, नन्हा भी वक्त पर तैयार हो गया था, उसके कपड़ों को ठीक करना है, उसकी आलमारी भी ठीक करनी है. आज सुबह उसकी पिछले वर्ष की किताबें उठाकर देखीं तो पता चला दीमक ने घर बना लिया था. कल छोटी बहन का जन्मदिन है, कल उसे फोन करेगी, दीदी का फोन आए कई दिन हो गये हैं, बड़े भाई का भी, अब राखी के दिन उनसे बात होगी. सभी सुखी रहें यही उसकी कामना है. अड़ोस-पड़ोस में सभी को अमरूद भिजवाने हैं. उसने सोचा, नैनी के बेटे से तुड़वा कर यह कार्य भी सम्पन्न कर लेना चाहिए.

अभी-अभी छोटी बहन को जन्मदिन की बधाई दी, उसने कहा, पत्र लिखा है. भांजी और पिता से भी बात हुई. पिता ने भी पत्र लिखा है, उन्हें उसने लिखा था, माँ के पत्रों की कमी वह महसूस करती है, अभी तक उसके अंतर्मन में मोहमाया के बंधन बहुत गहरे हैं. कल रात दीदी का भी फोन आया. सुबह जून का भी, वह मित्र के बेटे की पढ़ाई के बारे में बात करने उसके यहाँ जाने वाले हैं. उनकी दिनचर्या बेहद व्यस्त रहेगी वहाँ. गुरू माँ अमीर खुसरो का लिखा एक गीत(जो गुरू की प्रशंसा में है) गा रही हैं, उनकी बातें दिल को छू जाती हैं, उनसे मिलने की इच्छा हृदय में उत्पन्न होने लगी है और वह जानती है ईश्वर उन्हें एक न एक दिन अवश्य मिलाएगा. वे दोनों उसी के द्वारा तो बंधे हैं.

“यह दिल है मेरा मन्दिर, और मन यह पुजारी है,
मन्दिर में जो रखी है, मूरत वह तुम्हारी है”

अगस्त का शुभारम्भ ! कल रात जून का फोन आया, वहाँ शाम से ही बिजली नहीं थी, घर में बैठे-बैठे वह परेशान हो रहे थे, उन्हें उसने अपनी फरमाइशें बता दीं, एक तो दीपक चोपड़ा जी की सलाह पर चांदी का टंग क्लीनर और दूसरी एक ड्रेस. कल शाम ही उसने तय किया है कि अब घर पर भी अच्छे वस्त्र पहनेगी, चालीस के बाद वैसे भी जीवन कितना रह ही जाता है जो चीजों को संभाल-संभाल कर रखा जाये. घर में भी यदि उसी तरह संवर कर रहा जाये तो अपना साथ खुद को तो भला लगेगा ही घर के अन्य लोगों पर भी इसका अच्छा असर पड़ेगा, सो पुराने वस्त्रों को अलविदा ! कल शाम की मीटिंग अच्छी रही, कार्यक्रम सभी अच्छे थे. पुष्प सज्जा का अनुभव भी अच्छा रहा. अभी एक सखी से मिलकर आ रही है जिसकी माँ घातक बीमारी से ग्रस्त हैं, अस्पताल में हैं. आज सुबह बाबाजी व गुरू माँ से भी मुलाकात हुई, उनकी वजह से ही उसका मन समता को पा सका है, ऐसा लगता है कि जीवन में आने वाली किसी भी स्थिति का सामना वह कर सकती है. ईश्वर उसके विश्वास की रक्षा करता है !



Friday, September 5, 2014

कोहरे का जाल


आज पूरे एक हफ्ते बाद डायरी खोली है. उस दिन जून उसे छोड़ने एयरपोर्ट गये थे. वह दिल्ली पहुंच गयी थी शाम साढ़े सात बजे, घर पहुंचते नौ बज गये. अगले दिन सुबह साढ़े चार बजे ही भाई के साथ टैक्सी स्टैंड गयी. कोहरा घना था और स्टेशन तक के रास्ते में कुछ भी नजर नहीं आ रहा था, लग रहा था कोई स्वप्न चल रहा है. उड़ान के दौरान भी और ट्रेन में भी सारा वक्त मन में एक वही ख्याल मंडरा रहा था. कोहरे के कारण उनकी ट्रेन बहुत रुक-रुक कर चल रही थी. दोपहर बाद वे गन्तव्य पहुंचे, मंझला भाई लेने आया था पर उसकी गाड़ी में पेट्रोल खत्म हो गया, भागदौड़ में उसे भरवाने का वक्त ही नहीं मिला था, बस से वे अस्पताल पहुंचे. जहाँ शेष सभी उनकी प्रतीक्षा कर रहे थे. थोड़ी देर में ही अस्पताल गयी, उनको ऑक्सीजन दी जा रही थी और भी कई नलियां उनके विभिन्न अंगों से जुडी थीं, देखकर उसकी आँखें भर आयीं. वह उसे देखकर पहले तो खुश हो गयी थीं, जिसे उन्होंने ताली बजकर भी दर्शाया पर उसके आँसूं देखकर दुखी हो गयीं. वह बोल नहीं सकती थीं. उन्हें इतनी पीड़ा सहते देख सभी दुखी हैं पर कोई कुछ नहीं कर सकता. उसके बाद वह चार दिन वहाँ और रही. एक बार माँ ने उसका लिखा संदेश पढ़ा और आशीर्वाद भी दिया. लिखना भी चाहा पर इस बार उनकी लिखाई ठीक नहीं रह गयी थी. एक दिन बाद वह वापस दिल्ली आ गयी और अगले दिन असम, जहाँ जून और नन्हा उसकी प्रतीक्षा कर रहे थे.

कल रात भर उसे वही स्वप्न आते रहे. ऑक्सीजन, हीमोग्लोबिन, ICU, और डॉक्टर, अस्पताल शब्द कानों में गूँजते रहे. एक बार माँ को बोलते हुए भी सुना. वह ठीक होकर आ गयी हैं और किसी बारे में पिता के सवाल का जवाब दे रही हैं. कल शाम वे लाइब्रेरी भी गये और माँ की बीमारी पर जानकारी हासिल की. उन्होंने बहुत कष्ट सहा है इस रोग के कारण. ईश्वर ही अब उनका सहायक है. उसका सिर भारी है, मस्तक के दोनों ओर की नसें तन गयी हैं. कल शाम को जून को तनावमुक्त रहने का उपदेश दे रही थी पर स्वयं तनावमुक्त रहना कितना मुश्किल है. आज सुबह सुना विजयाराजे सिंधिया तेईस दिन ICU में रहने के बाद स्वर्ग सिधार गयीं तो दिल धक से रह गया. माँ को भी अस्पताल में दो हफ्ते हो गये हैं. अभी-अभी छोटी बहन को फोन किया, शायद वह व्यस्त थी, फोन नहीं उठाया. जून भी उसे उदास देखकर परेशान हो गये हैं. उसे स्वयं को सामान्य रखने का प्रयास करना चाहिए, जिस बात पर उनका कोई वश नहीं है उसके बारे में चिन्तन करते रहने से क्या लाभ ? आज से संगीत का अभ्यास शुरू करेगी, मन को व्यस्त रखने से ही वह शांत रहेगा. सबसे बड़ा दुख संसार में है इच्छा, इच्छा पूरी हो जाये तो दूसरी उत्पन्न होगी, पूरी न हो तो दुःख देगी.

“कबिरा सब ते हम बुरे हम तज भलो सब कोई
जिन ऐसा करि देखिया मीत हमारा सोई”

मन को जितना धोते हैं उतना पता चलता है कि मैल की कितनी परतें चढ़ी हैं.


Saturday, June 18, 2011

पहली होली


रात्रिभोज का आयोजन किया था उन्होंने, अच्छा रहा, कुछ नए लोगों से परिचय हुआ. कल वे गोल्फ फील्ड में एक छोटी सी पहाड़ी पर बैठे रहे, अँधेरा था, बायीं ओर बड़े-बड़े वृक्ष अर्धवृत्त बना रहे थे, स्पष्ट दिखाई दे रहे थे, ठंडी हवा बह रही थी, महीनों बाद नूना इस तरह के वातावरण में फिर से थी, अपने शहर में कल्पना में उसके साथ होती थी, पर कल वह सचमुच साथ था.
वही कल का समय है, वह ऑफिस में है, कल दोपहर को जब वह घर आया तो कितनी देर  दरवाजा खटखटाता रहा, पर नूना की नींद नहीं खुली, याद नहीं पड़ता पहले कभी ऐसा हुआ हो, इतनी गहरी नींद आयी हो कभी. उसने एक बार रसगुल्ले का नाम लिया तो ढेर सारे ले आया. वे क्लब से वापस आ रहे थे तो उसने मजाक में एक बात कही जो नूना को नागवार गुजरी, सुलह तो रास्ते में ही हो गयी पर घर आकर उसने उसके लिये चाकलेट ड्रिंक बनाया नूना ने चिवरा-मूंगफली तला, भीतर तक भरे-भरे वे दूर-दूर तक घूमने गए.

आज नूना को यहाँ आये पूरा एक महीना हो गया है. कितनी ठंड है आज, धूप भली लग रही है. कल उसने एक साड़ी को फाल लगाई, आज देखा तो पता चला सीधी ओर लगा दी है, फिर से खोल कर लगाई. उन दोनों को एक नामालूम सा डर लग रहा है, कल शाम को शायद उसी कारण से उसे कुछ बेचनी सी भी हो रही थी. रविवार होने के बावजूद आज वह घर पर अकेली थी, उसे ओसीएस जाना पड़ा है, यानि आयल कलेक्टिंग स्टेशन नूना को भी तेल उद्योग के बारे में काफी जानकारी हो गयी है, एक्सप्लोरेशन, ड्रिलिंग, प्रोडक्शन तथा ट्रांसपोटेशन सभी के बारे में उसने बताया, उसे एक परीक्षा भी देनी है लेकिन विशेष पढ़ाई नहीं कर पाया है.

अभी कुछ देर पूर्व वह आया, नूना स्नानघर में थी. कपड़े भी धोने थे, इतवार को धोने लगी तो उसने कहा यह सब काम तुम किसी और दिन भी तो कर सकती हो,  वे हर पल साथ होना चाहते हैं. कल शाम वे स्टेशन पर घूमने गए, छोटा सा स्टेशन, वे चलते ही चले गए, आकाश में रुई के फाहों की तरह बादल थे, चाँद आधा था, और शाम के धुंधलके में वृक्ष मनमोहक लग रहे थे, सुपारी के लम्बे-लम्बे वृक्ष यहाँ बहुतायत से मिलते हैं जो एक अलग ही माहौल बना देते हैं.
मार्च महीने का प्रथम दिन.. वसंत का महीना यानि फाल्गुन का महीना... नहीं.. होली का महीना !
उसके साथ पहली होली... वह अभी कुछ देर पूर्व आया था, शायद ही कोई दिन ऐसा होता हो जब वह एक बार बीच में न आता हो फील्ड जाते या आते समय. कल रात वे कितनी देर पुरानी कॉलेज की बातों में खोये रहे, उन दिनों की यादें कितनी मधुर हैं. उसने अपने कुर्ते का बटन का एक बटन टांकने को कई दिन पहले कहा था, नूना को याद ही नहीं रहा, पर उसने सोचा कि यह इतना आवश्यक कार्य है सो अभी करूंगी. उसके पास रुमाल होते हुए भी चेहरा हाथ से पोंछता है, उसे खुद समझना होगा यह अच्छी आदत नहीं है.. कभी यह बात वे दोनों तीसरे से कह रहे होंगे.

मार्च १९८५
दो-तीन वर्ष पूर्व जब नूना उत्तर प्रदेश में थी, वह उससे मिलने आया था और उसे करेले की सब्जी और मूँग की दाल खिलाई थी, आज उसी दिन को याद करते हुए वैसा ही खाना बनाया है. कल उसने पूछा  कि आज सुबह कोई विशेष कार्य तो नहीं है, क्योंकि उसे कुछ अपना काम करवाना है, जैसे उसके काम नूना के कार्यों से अलग हैं, पर इससे यह भी तो पता चलता है कि उसे मेरे कार्यों का कितना ख्याल है, उसने सोचा. कल वे टेबिल टेनिस नहीं खेल पाए क्योंकि क्लब में टीटी बाल नहीं थी. क्लब में ‘नदिया के पार’ वाली साधना सिंह की फिल्म थोड़ी देर देखी ‘ससुराल’, पर इसमें वह उतनी अच्छी नहीं लगी. घर से पत्र आये हैं हमें भी होली से पहले सभी को खत लिखने हैं.

कल का वह ना मालूम सा डर अभी तक दोनों के मन में है. आज सुबह बहुत जल्दी नींद खुल गयी और वे घूमने गए. कल शाम वे उसके बॉस के यहाँ गए थे जो कन्नड़ हैं, पहली बार गाजर का हलुआ बनाया जो उसके अनुसार अच्छा बना है, छोटे भाई का खत आया है उसकी नौकरी शुरू हो गयी है.  आज जीप में ओसीएस गए, उसका इम्तहान ज्यादा अच्छा नहीं हुआ, नूना ने सोचा कि अब मैं ध्यान रखूंगी, अध्ययन भी उतना ही जरूरी है जितना भोजन, यह भी तो मानसिक भोजन है.

कल वह नहीं लिख सकी. सुबह उठी तो स्वस्थ थी, उसके जाने के बाद उत्साहपूर्वक आसन किये, ‘स्वर संगम’ प्रभात देखते हुए ऐसा करना उसे बहुत भाता है, फिर कपड़े धोने के लिये सर्फ घोल रही थी कि  मालूम हुआ वह डर मिथ्या था, खुशी तो थी ही पर खाना बनाते समय घबराहट बढ़ने लगी और खड़ा होना मुश्किल हो गया, फिर उसके आने तक सिवा दर्द, बेचैनी के कुछ भी महसूस नहीं कर पा रही थी. कमजोरी पता नहीं कहाँ से एकाएक आ गयी थी. फिर उसकी हिदायतें याद आने लगीं वह कितनी बार कहता है कि कुछ खा लेना, चाय, काफ़ी या बिस्कुट ही सही. आने के बाद उसने बहुत अच्छी तरह देखभाल की, कभी हार्लिक्स वाला दूध, कभी बोर्नविटा वाला, फिर अंगूर और नारंगी ले आया, रात को इतना मना करने पर भी बासी रोटियाँ ही खा लीं, उसके लिये कार्नफ्लेक्स बनाया. तभी तो एक ही दिन में नूना पहले जैसी हो गयी है.



कल वह अस्पताल गयी, डॉक्टर ने देखते ही कहा I shall admit you पहले तो कुछ समझ ही नहीं पायी, दुबारा पूछा और पूरे २३ घंटे वहाँ रहने के बाद आज घर आयी है. अभी एक हफ्ता और आराम करने को कहा है डॉक्टर ने. वह चार-पांच बार मिलने आया, वह इतना ख्याल रखता है कि नूना को बरबस ही उसके प्यार पर प्यार आ जाता है. वह एक मित्र भी है और सरंक्षक भी. अभी समाचारों में सुना कि देश भर में होली का उत्सव मनाया जा रहा है, पर यहाँ तो होली की छुट्टी कल है, उसने क्या-क्या सोचा था इस दिन के बारे में, क्या वह सब पूरा होगा? वह साथ है तो अवश्य होगा, वे एक-दूसरे को रंगों से सराबोर कर देंगे.
आज होली है, या कहना चहिये कि होली थी क्योंकि इस वक्त रात के दस बजे हैं, सुबह वे बहुत जल्दी उठ गए थे. मौसम अच्छा था पर डॉक्टर ने घर से बाहर जाने को मना किया है, सात दिनों के लिये बेड रेस्ट, सो घूमने या लॉन में ही टहलने का सवाल ही नहीं था, फिर चाय पीकर उन्होंने गुझिया बनायी, अच्छा लग रहा था उसे गुझिया भरते हुए देखना, वह इतना मन लगा कर हर काम करता है कि उसके साथ काम करना बहुत आसान हो जाता है, फिर नाश्ता करके नूना आराम करने थोड़ी देर   लेट गयी और उसे सोता देख कर उसने ढेर सा रंग लगा दिया, फिर तो उनकी होली शुरू हो गयी, हमेशा याद रहेगी यह पहली होली. उसके साथी आये थे क्लब ले जाने के लिये पर वह उसके स्वास्थ्य की वजह से नहीं गया,  बड़ी मुश्किल से रंग छुड़ाया, फिर भोजन बनाया, सब उसने, नूना ने सिर्फ पूड़ी बेली. शाम को वे बाहर बरामदे में बैठे, आसमान बहुत सुंदर था. उसके असीम प्यार की तरह. उन्होंने पुरानी चिट्ठियाँ पढीं, एल्बम देखा और अब सोने का वक्त हो गया है.

नूना को उसकी प्रतीक्षा है, घड़ी बंद हो गयी है, समय का पता ही नहीं चल रहा, साढ़े दस तो बजने ही वाले होंगे. सुबह वह कह गया था कि आठ-साढ़े आठ बजे एक बार वह आयेगा, सिर्फ दो गुझिया खाकर चला गया था, सो भूख भी लगी होगी. संभव है वह आया हो, वह सो गयी थी दरवाजा बंद था, उसकी बात न मान कर सदा बाद में उसे दुःख होता है, वह दरवाजा खोल कर रखने को कह गया था. पर अब वह आने ही वाला है. मन होता है उसके लिये खाना बनाना शुरू करे पर उसे अच्छा नहीं लगेगा, उसने वादा लिया था कि उसके पीछे वह कोई भी काम नहीं करेगी. वैसे अब वह ठीक है, गला भी ठीक है और मन भी खुश है. जल्दी से फिर वे दिन आ जाएँ जब वह दस से ग्यारह के बीच उसकी प्रतीक्षा करते हुए भोजन बनाती थी. कितनी जल्दी बीत जाता था तब समय और अब काटे नहीं कटता. वही पक्षी फिर बोल रहा है वे दिन में कई बार उसकी आवाज सुनते हैं. कहीं से हारमोनियम पर गाने की आवाज भी आ रही है. मौसम अच्छा है आज, धूप निकली है. वह आने ही वाला होगा या और प्रतीक्षा कराएगा.

उसके आने का वक्त हो गया है. टालस्टाय भी क्या खूब लिखते हैं. सुबह से ही ‘अन्ना केरेनिना’ मन मस्तिष्क पर छायी है, पता नहीं आगे क्या होगा, क्या अन्ना और बोन्सकी विवाह कर लेंगे या उसी तरह रहते आएँगे जैसे अब तक रहते आये हैं, और कीटी से मिलने लेविन जायेगा ही, ऐसा लगता है. आज दोनों घर से खत आये हैं. लगातार काफ़ी देर तक पढ़ने से आँखें जलने लगी हैं अब नहीं पढ़ेगी. उसे अब आ जाना चाहिए, उसका साथ कितना अच्छा है, पर वे  सदा हल्की-फुलकी बातें ही करते हैं, ऐसी बातें जो सिर्फ उन्हें और निकट लाती हैं, जीवन की गम्भीर बातों की तरफ उनका ध्यान ही नहीं जाता.    
वही कल का समय है, उस पुस्तक का तीसरा भाग पढ़ रही है, इस सप्ताह के अंत तक अवश्य ही उसे पूरा पढ़ा जा सकता है. आज डॉक्टर ने और दवा लिख दी, उसके यह कहने पर कि साँस लेने में कठिनाई महसूस होती है. उसे वास्तव में समझ नहीं आता कि सचमुच कुछ हुआ भी है, कभी तो सब ठीक लगता है पर किसी वक्त एक घुटन सी महसूस होती है, पर यह कोई विशेष नहीं होती. आज शाम वे  कई दिनों के बाद लाइब्रेरी जायेंगे. जीवन अबाध गति से चल रहा है या कहें चल निकला है, पर इतना काफ़ी नहीं है, कुछ करना चाहिए, इतनी सुविधापूर्ण जिंदगी की कल्पना उसने नहीं की थी. मौसम अच्छा है आज. उसके कदमों की आवाज आ रही है, वह आते ही उसे देखना चाहेगा जैसे वह उसे.

कल का दिन कुछ जल्दी-जल्दी गुजर गया, डायरी नहीं लिख  पायी. जितना भी समय मिला वह अन्ना, लेविन और कीटी के साथ बिताया, इतनी अच्छी किताब है यह, अब तक नहीं पढ़ी थी आश्चर्य होता है. परसों वह पूरा एक घंटा देर से आया था, फिर हम क्लब गए, वहाँ धर्मयुग में एक मजेदार बात पढ़ी. आज छोटी बहन का पत्र आया है उसने सोवियत नारी में से ‘वह मेरे दिल की रानी’ की  बारहवीं किश्त भेजी है. उसने बीच की कुछ किश्तें नहीं पढीं. आज अन्ना की किताब भी पूरी पढ़ ली, उसका कितना दुखद अंत हुआ. अब रात के आठ बजे हैं, खाना बनाना है, उसे पसंद नहीं फिर भी पता नहीं क्यों उसने बैंगन कई सब्जी बनायी है, वह भी सोचता होगा.

भी सुबह के पौने आठ ही बजे हैं, नूना ने स्नान कर लिया है और ट्रांजिस्टर पर नूरजहाँ का यह सुंदर गीत सुन रही है, ‘’आवाज दे कहाँ है’..... आज सुबह वह जल्दी उठ गयी थी पर वह उठा अपने वही पुराने वक्त पर. कल शाम को वह उसे एक बात बता रही थी कि उसने चुप कराते हुए कहा, समझ गए...समझ गए... चाहे वह समझ ही क्यों न गया हो पहले वह पूरी बात सुनता था. और उससे पहले किसी मित्र के यहाँ से आते समय उसने दो-तीन बातों का विरोध किया, फिर तो उसने चुप रहना ही ठीक समझा. शायद यह उसका वहम हो और वह चाहती है कि यह वहम ही हो कि ...पर सुबह उनकी सुलह हो गयी वह कह गया है, उसके जाने के बाद वह उदास न रहे. नूना खुश तो है. आज सुबह सूरज कितना सुंदर था..उदय होता हुआ अरुणिम सूर्य...ठंडी हवा और सड़क पर एक सफेद बकरी खड़ी थी, दो कुत्ते आये तो वह डर कर गेट की ओर भाग आयी थी उसने गेट खोला तो वह अंदर आ गयी, अगर उस वक्त वह उसके साथ होता तो सुबह और भी सुंदर होती पर यह हो नहीं सकता.