Showing posts with label अज्ञेय. Show all posts
Showing posts with label अज्ञेय. Show all posts

Friday, July 1, 2016

तकली और सूत


एक दिन और आधा गुजर गया. अभी तक सिंगापुर पर उसका लेख समाप्त नहीं हुआ है. दोपहर को बापू की मानस सुनती रही, पर कहते हैं न सत्संग में लोग नींद पूरी करने भी जाते हैं सो कब ध्यान नींद में बदल गया पता ही नहीं चला, सवा दो बजे नींद खुली. सिलाई का छोटा-मोटा काम किया, चाय पीकर अब डायरी खोली है. आज सुबह छोटी चाचीजी का फोन आया, उनके बड़े पुत्र का पैर दुर्घटना में घायल हो गया है, आपरेशन करना होगा. उसने सोचा, जा तो नहीं सकती पर इतनी दूर से वह कुछ मदद तो कर सकती है, जून को फोन किया उनका दिल बहुत बड़ा है. कल शाम की  जन्मदिन की पार्टी अच्छी रही, नन्ही सी बच्ची इतनी बातें करती है, पूरे वक्त खेलती रही, वह जरूर जीवन में कुछ उच्च लक्ष्य प्राप्त करेगी. उसका जीवन तो यूँ ही बीता जा रहा है. आज सत्संग का दिन है, पर वह नहीं जा पा रही है. सुबह सीडी लगा कर किचन में ही सत्संग किया. गुरूजी को टीवी पर सुना फिर गाँधीजी के पोते राजमोहन गाँधी को भी सुना, महात्मा के लक्षणों को सुना.
माँ को कई बार कुछ भी समझ में नहीं आता पर कई बार वह बिल्कुल सामान्य लगती हैं, एकदम स्वस्थ मन से भी और तन से भी ! पिताजी आज दांत के डाक्टर के पास दुबारा गये थे. उनकी आवाज बदल जाती है, जब दांत लगा के बात करते हैं, चेहरा ही बदल जाता है. बुढ़ापा स्वयं में एक रोग है. वे भी धीरे-धीरे उसी की ओर कदम बढ़ा रहे हैं. नन्हे का फोन आया दोपहर को, वह उसे आईपॉड के लिए स्ट्रैप भेज रहा है. कल पार्टी में एग लेस केक स्वादिष्ट था, ज्यादा खा लिया, तन शिकायत कर रहा है आज.
टीवी पर कपिला वात्स्यायन जी का भाषण आ रहा है. अज्ञेय से जुड़ी हैं वह. मुरारी बापू का आभार व्यक्त कर रही हैं. महात्मा गाँधी के बारे में भी कुछ कह रही हैं. उन्होंने तकली को प्रतीक बनाकर कहा कि मन भी रुई के समान है जिसमें एकाग्रता से कई सूक्ष्मतम भाव निकाल सकते हैं. मुरारी बापू की कथा पर एक ग्रन्थ का प्रकाशन परवाज साहब ने किया है, उसका लोकार्पण भी किया जा रहा है. 
उन्होंने न जाने कितने भ्रम पाल रखे हैं जो उनकी विनम्रता को विकसित नहीं होने देते. पारिवारिक जीवन में सरसता का कारण विनय का मूल्यांकन ही है ! शांत सहवास अति कठिन है यदि विनय न हो, सहन करने की शक्ति न हो. सुबह जून को थोड़ा सा परेशान किया, जब प्राणायाम करते समय खिड़की खोली. उन्हें ठंड लगी हुई है न भी लगी होती तो सुबह-सुबह खिड़की खोलना उन्हें पसंद नहीं है. लेकिन पहले की तरह वह देर तक इस बात को लेकर परेशान नहीं हुए. उनके मध्य समझ और प्रेम हर दिन बढ़ रहे हैं. भाई-भाभी व छोटे भांजे को ई-कार्ड भेजे. दोपहर को डेंटिस्ट के पास गयी. वहाँ एक मराठी परिचिता के पिता को भी देखा, प्रभावशाली व्यक्तित्त्व है उनका, अच्छी हिंदी बोल रहे थे. लौटी तो माली से काम करवाया. छोटे चचेरे भाई से बात की. उसने कहा, अभी दूसरा आपरेशन नहीं हुआ है भाई का, पैर बचाना मुश्किल है, भाभी के भाई की शादी है, उसका मन कितना परेशान होगा इस वक्त ! जून अभी आये नहीं हैं, माँ-पिताजी शाम के नाश्ते पर उनका इंतजार कर रहे हैं. शाम को वे एक मित्र के यहाँ जायेंगे उनकी बिटिया अस्वस्थ है. कल बुजुर्ग आंटी को देखने अस्पताल. आजकल सभी के साथ कोई न कोई समस्या लगी हुई है. हर तरफ दुःख ही दुःख है, ऐसे में कोई यदि शांत रहना चाहता है तो उसे अपने भीतर के मौन को सुनना सीखना होगा. शून्य को अनुभव करना होगा. बाहर तो उहापोह है, भीतर समाधान है, भीतर परमात्मा का राज्य है, वह द्रष्टा है, कवि है, मनीषी है, सर्वज्ञ है और वह उनका सुहृद है, अकारण दयालु है, हितैषी है, वह है तो वे हैं, वह उनका अपना आप है. उसकी उपासना करते हुए कर्म करते हैं तभी वे मुक्त रह सकते हैं. उनकी मुक्ति ही एकमात्र प्राप्य है, इस जगत में और क्या करना है ? सेवा करना भी मुक्ति के लिए ही है, पर उन्हें बाँधा किसने है ? उन्होंने ही तो !


Tuesday, November 25, 2014

अज्ञेय की कविताएँ


दोनों देशों के विदेश मंत्रियों ने वार्ता को असफल नहीं बताया है, उम्मीद की किरण अभी भी रोशन है. कल रात से वर्षा हो रही है, मौसम कल जितना गर्म था आज उतना ही सुहावना है. बाबाजी आज कीर्तन करवा रहे थे. उससे पहले टैगोर की जापान यात्रा का एक संस्मरण सुनाया. गुरूमाँ ने ऐसे नृत्य का जिक्र किया जो किया नहीं जाता, हो जाता है. बहुत दिनों से उसके साथ ऐसा नहीं हुआ है शायद आज शाम को ही इसका अवसर आए, क्योंकि वर्षा यदि थमी नहीं तो घर पर ही टहलना होगा जो उसके मामले में कैसेट लगाकर थिरकना होता है. कल दोनों पत्र भी लिखे और दीदी को जवाब भी दिया है. कल रात छोटी बहन व पिता से बात हुई. आज दोपहर स्टोर की सफाई करनी-करवानी है.

सुबह-सवेरे भजन जब अपने आप होने लगे, मन परमेश्वर की स्मृति में सहज रूप से लगा रहे, उसे लगाना न पड़े तो ही जानना चाहिए कि प्रेम का अंकुर फूटा है. चारों ओर उसी का वैभव तो बिखरा है, उसी की सृष्टि का उपयोग वे करते हैं पर उसे भुला बैठते हैं. जबकि वह हर क्षण साथ है, दूर नहीं है. बस एक पर्दा है जो उन्हें एक-दसरे से अलग किये हुए है. वह हर क्षण श्रद्धा का केंद्र बना है, हर श्वास उसकी कृपा है. मन यदि हर क्षण उसी को अर्पित रहे तो इसमें कोई विक्षोभ आ भी कैसे सकता है. संसार की बातें उत्पन्न करने वाला भी वही है. यही आराधना ही राधा है, जिसके माध्यम से कृष्ण को पाया जा सकता है. वह आत्मा है, जिसके प्रसाद के बिना मन आधार हीन होता है, बाहर का सुख टिकता नहीं, यह अनुभव बताता है. उस एक से प्रीति हो जाने पर परम सुविधा मिलती है जो कभी छूटती नहीं, अपने उच्च तत्व का साक्षात्कार करना यदि आ जाये तो यह जो गड्डमड्ड, खिचड़ा हो गया है, देह के अस्वस्थ या मन के दुखी होने पर स्वयं को अस्वस्थ या दुखी मानना, छूट जायेगा. जैसी दृष्टि होगी यह जगत वैसा ही दिखेगा. अँधेरी रात में एक ठूँठ को एक व्यक्ति चोर समझता है, दूसरा साधू और तीसरा रौशनी करके उसकी असलियत पहचानता है. उन्हें भी इस जगत की वास्तविकता को पहचानना है. न इससे आकर्षित होना है न ही द्वेष करना है. तभी वे मुक्त हैं.

आज अमावस्या है. सुबह से ही मन में उत्साह है. एक वक्त के भोजन में फलाहार लेना है आज, जितना हो सके उतना व्रत पालना ही चाहिए. कल दोपहर और शाम को अज्ञेय की कविताएँ पढ़ीं, अनुपम हैं और भावना के उस लोक में ले जाती हैं जहाँ प्रेम है, शरद की चाँदनी, टेसू के फूल हैं, जहाँ इष्ट की आराधना है, “मैं संख्यातीत रूपों में तुम्हें याद करता हूँ” अज्ञेय की कविता अंतर को गहरे तक छू जाती है. अभी-अभी गुरू माँ ने कहा ईश्वर को प्रेम करने का अर्थ संसार का विरोधी हो जाना नहीं है. जब जीवन में प्रेम होता है, तब वह सभी के लिए होता है. उसमें समष्टि समा जाती है. ईश्वर, प्रकृति, मानव उससे कुछ भी अछूता नहीं रहता, प्रेम में महान ऊर्जा छुपी है, वह आस-पास की हर वस्तु को एक नये दृष्टिकोण से दिखाती है. उसे लगता है, मन को एकाग्र करना हर वक्त संभव नहीं पर यह सम्भव है कि इस बात का बोध रहे कब मन एकाग्र है और कब एकाग्र नहीं है, और कब एकाग्र नहीं है ? जब मन गुण ग्राही होता है, बुरी से बुरी परिस्थिति में भी कोई न कोई अच्छाई खोज लेता है, तब वह एकाग्र होना सीख लेता है. उसने प्रार्थना की, आज का दिन ईश्वर के प्रति समर्पित हो, दिन भर वह उसकी याद अपने मन में बनाये रखे, सभी के प्रति मंगल कामना से मन युक्त रहे !