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Wednesday, March 25, 2015

तरबूज की ठंडक


आज बाबाजी ने बताया, ‘अहंता’ और ‘ममता’ ही दुखों का कारण है. उन्होंने एक सरल साधन भी बताया जिससे भीतर विश्रांति का जन्म होता है. शनिवार को जून उसे ऑफिस ले गये. eSatsang से श्री श्री की एक छोटी सी टॉक डाउनलोड की Ultimate relationship पर बोल रहे थे. वह इतने प्यार से इतनी अच्छी बातें बताते हैं, उनका ज्ञान अनंत है. कल शाम को एक परिचिता आयीं, उनकी सास icu में हैं, वह उनके दुःख को अनुभव कर पा रही थी. अंतर में प्रेम हो तभी यह सम्भव हो सकता है अन्यथा तो दूसरों की पीड़ा ऊपर से छूकर ही निकल जाती है. स्वयं को यदि ज्ञान में स्थिर करना है तो उसका लक्ष्य प्रेम ही रखना होगा, अन्यथा यहाँ भी स्वार्थ ही है. अपनी आत्मा का विकास मात्र स्वयं के लिए, अपने सुख के लिए... नहीं, अपने ‘स्व’ का विस्तार करते जाना है, सबको अपना सा देखना है. तभी मुक्ति सम्भव है. जितने-जितने उदार वे होते जायेंगे, जितनी देने की प्रवृत्ति बढ़ती जाएगी, लेने की, संग्रह की प्रवृत्ति घटती जाएगी उतने ही स्वाधीन वे होते जायेंगे.     

आज नन्हे का जन्मदिन है. सुबह ससुराल से फोन आया. बड़ों का आशीर्वाद मिले तो जीवन का पथ सरल हो जाता है. भाई-भाभी व पिताजी का फोन भी आया. सभी परिवार जन आपस में प्रेम के धागों से ही तो जुड़े हैं. यह सूक्ष्म भावना बहुत प्रबल है. यही प्रेम उन्हें बार-बार इस जगत में खीँच लाता है, लेकिन जब इस प्रेम की धारा ईश्वर की ओर मुड़ जाती है तो मुक्त कर देती है, क्योंकि उसके सान्निध्य में रहने के लिए उन्हें इस तन में आने की क्या आवश्यकता, वे जहाँ कहीं भी हों उसे चाह सकते हैं. आज अमावस्या है, ईश्वर का स्मरण करते हुए दिन का आरम्भ हुआ. उसे लगता है जिससे उन्हें ममता है उन्हें सुखी वे इसलिए करते हैं कि वे स्वयं सुखी हों. अपनी ख़ुशी के लिए ही वे दूसरों को कुछ देते हैं. ममता में स्वार्थ है पर प्रेम निस्वार्थ है. प्रकृति के गुणों के वशीभूत होकर ही ममता में बंधते हैं. ईश्वर को प्रेम करने में वे स्वतंत्र हैं. ईश्वर के नाते ही सारे सम्बन्ध हों तभी मुक्ति है.

आज सुबह बहुत दिनों बाद ऐसा हुआ कि वह ‘क्रिया’ नहीं कर पायी. नन्हे के एक मित्र के लिए भी टिफिन बनाना था सो जून ज्यादा सचेत थे. कल शाम को बड़ी बुआ का फोन आया, उनकी बेटी के बड़े पुत्र का चुनाव एयर फ़ोर्स में हो गया है. वह सत्संग में गयी थी, जून ने बताया. वहाँ शुरू में उसका मन स्थिर नहीं रह पा रहा था पर धीरे धीरे गुरूजी से मानसिक प्रार्थना करने के बाद अच्छा लगा. कुछ देर पहले दीदी से बात हुई, जीजाजी के जन्मदिन पर उन्होंने घर पर उगाया हुआ तरबूज काटा. बड़ी भांजी CA बन गयी है, उसकी पांच साल की पढ़ाई पूरी हो गयी. कल छोटे भांजे को लेकर वे दिल्ली जा रहे हैं. परसों उसे हास्टल ज्वाइन करना है. पूजा की छुट्टियों में फिर घर आयेगा. नन्हा भी एक दिन ऐसे हॉस्टल जायेगा. दीदी खुश थीं, वह भी ईशप्रेम में सदा खुश रहती आयी हैं.

कल रात सिर दर्द के कारण उसकी नींद खुली, कुछ देर बैठी रही फिर धीरे-धीरे शवासन में लेटे हुए कब नींद आ गयी पता ही नहीं चला. आज छोटी ननद का फोन आया, ननदोई जी ने aol के एडवांस कोर्स का फार्म भरा है, उन्हें अभी इसके लिए काफी लम्बा इंतजार करना होगा. ‘क्रिया’ वे नियमित करते हैं और जून को लगता है यह बहुत है.



Tuesday, May 7, 2013

विश्व संचार दिवस



आज जबकि उसे भोजन में सिर्फ दाल ही बनानी थी, पौने ग्यारह बज गए हैं, और अब जाकर वह सुबह के कामों से निवृत्त हुई है. अभी भी सलाद आदि का काम है जो जून के आने के बाद ही करेगी, थोड़े से पल ये जो मिले हैं इनका उपयोग कर ही लेना चाहिए. कल जून ने भगवद्गीता के दो कैसेट और रिकार्ड कर दिए. इस समय भी एक बज रहा है, “जो स्थिरवान पुरुष सर्दी-गर्मी, मान-अपमान, सुख-दुःख में सम है, जो ममता से रहित है, वह मुझे प्रिय है” इतने उच्च आदर्शों तक पहुंच पाना असम्भव नहीं तो कठिन अवश्य है, किन्तु वह किसी सीमा तक इन बातों पर अमल कर सकती है. मन को शांत रखने के लिए यह रामबाण है यानि सर्वोत्तम उपाय. कल उसकी एक उड़िया सखी अपनी नवविवाहिता ननद और उसके पति जो डॉ हैं, को लेकर आई थी, दोनों बहुत शांत स्वभाव के लगे, अच्छा लगा उनसे मिलकर, उसने उन दोनों को एक पेन सेट व दो पेन दिए जो पिता ने उसे बरसों पहले दिए थे. कल दोपहर बाद उसने सात पत्र लिखे, भाइयों को भाईदूज का टीका भेजना था, और दो कार्ड्स भी जो उसकी पड़ोसिन ले आयी थी तिनसुकिया से, शाम को उसे एक सखी के यहाँ जाना है, ‘जूनून’ देखने के बाद, उसे लगा कि वह इतनी छोटी-छोटी बातों को इतना महत्व देने लगी है कि उन्हें लिख रही है, शायद घर गृहस्थी के इस ताने-बाने में उलझ कर रह गया है उसके मन का वह कोना भी जो किसी और तरह सोचता था..पर यह घर संसार उसे इतना प्रिय है कि इसके बदले स्वर्ग भी मिले तो तुच्छ है. नन्हे के भोले-भाले से सवाल और शरारतें, जून का झूठमूठ का गुस्सा, सभी कुछ तो मोहक है. लेकिन उसके पास और भी बहुत कुछ है जो महत्वपूर्ण है.

  परसों रात की तरह कल स्वप्न में बिल्ली को फिर देखा, एक बार लगा गला घुट रहा है, शायद उसकी चेन फंस गयी थी. दीवाली की सफाई अभी बहुत शेष है. कल दोपहर बाद वे पड़ोसी के यहाँ गए, लगभग शाम को ही उनके यहाँ कम्यूनिटी फीस्ट था, अच्छा लगा, लोगों को बेहिचक मिलते-जुलते देखना उसे हमेशा ही अच्छा लगता है.

  कल दोपहर से ही उसे वही हर बार वाला सिर दर्द था, जून ने ऑफिस जाने से पहले दवा दी, फिर चाय बनाकर भी. कुछ देर सोयी. शाम को वह बाम लगाकर लेटी थी और जून साइकलिंग करके आये ही थे कि एक मित्र परिवार आ गया, और वे लोग जा ही रहे थे कि एक दूसरा परिवार. कल सुबह से ही बैठक की शक्ल बिगाड़ दी थी सारे कुशन कवर आदि धोबी को दे दिए थे, खैर, आज अभी रेडियो पर कमेंट्री आ रही है, वेस्टइंडीज और न्यूजीलैंड के बीच मैच हो रहा है. कल नन्हा दोनों घुटनों में चोट लगाकर आया, बहादुर है, इतनी चोट पर भी रोया नहीं, शायद रोया भी हो उसे बताया नहीं. ही इज सच अ स्वीट ...जेम ऑफ हर हार्ट. उसे अपने से दूर भेजने की हिम्मत कैसे आयेगी. कल जून ने घरों पर फोन से बात की, वे लोग भी पीएंडटी फोन के लिए अप्लाई कर रहे हैं. जून उसका व नन्हे का पासपोर्ट भी बनवा रहे हैं, इसका अर्थ हुआ कभी न कभी वे विदेश यात्रा पर जायेंगे ही.
  नवम्बर माह का पहला दिन, “विश्व संचार सप्ताह” का भी पहला दिन. दीवाली में सिर्फ एक दिन बाकी है, कल शाम उन्होंने नमकपारे बनाये आज नारियल के लड्डू बनाएंगे. उसकी उड़िया सखी का फोन आया था, उसे कैलेंडुला के पौधे चाहिए थे, वे उनका इंतजार करते रहे, जब वे नहीं आए तो वे एक मित्र के यहाँ चले गए, असमिया सखी ने आलू क्रश करके पकौड़े बनाये, जून को बहुत पसंद आये, कभी वह भी बनाएगी उनके लिए. कल शाम से ही वे एकदूसरे के साथ निकटता महसूस कर रहे थे, जैसे पहले-पहल किया करते थे, और जो कभी- कभी दुनिया भर के कामों में कहीं खो सी जाती थी. नन्हे की चोट अब ठीक हो रही है, आखिर उस दिन जून ने अन्ताक्षरी में भाग ले ही लिया, उन्हें गानों का शौक है और व गानों की धुन भी जानते हैं, लेकिन झिझक के कारण अपने इस शौक को बढ़ा नहीं पाते हैं, वह तो काम करते-करते ही गुनगुनाती रहती है. यकीनन गाना गाना थोड़ा बहुत तो आना ही चाहिए.



Thursday, August 30, 2012

ममता के बंधन



कल जून के दो पत्र मिले, एक उसके मायके के शहर से लौट कर आया हुआ और एक वहीं से लिखा हुआ, वह बाद में उससे मिलने वहाँ गए थे. कल रात बहुत वर्षों बाद उसने अपनी एक पुरानी मित्र को स्वप्न में देखा, अभी उस दिन शादी में किसी से उसके बारे में बात की थी, सचमुच वैसी ही थी जरा भी नहीं बदली. सभी से बातें कर रही थी. फिर मैंने एक दो सवाल पूछे अद्भुत स्वप्न था. जून को भी देखा था शायद याद नहीं. उसके आने में दस-बारह दिन ही तो रह गए हैं. अब यहाँ मन नहीं लगता, कल रात नन्हें के रोने पर, मन पहले से ही भरा होने के कारण उसकी भी आँखें क्या भर आयीं सब उसे दोषी समझने लगे हैं. रात को पिता कितना रो रहे थे. पता नहीं यह सच है या उसका भ्रम कि वे  सब लोग उससे ठीक से बात नहीं कर रहे हैं. मन इतना उदास है कि जून अगर होते तो ऐसा नहीं होता.
माँ और पिता का दुःख अब देखा नहीं जाता. सुबह से ही दोनों रो रहे हैं. संतान का दुःख सबसे अधिक पीड़ात्मक होता है. पापा यह कहकर रोते हैं कि आज उस दुर्घटना को पूरे पचास दिन हो गए और माँ को किसी बहाने की जरूरत नहीं है. सुबह उनके कहने पर ही उसने उसके बैग से कपड़े निकल कर धो दिए, वह जैसे उन्हें देख नहीं पा रही थीं. मानव मन कितना भावुक होता है और स्नेह, ममता का पाश कितना मजबूत. बेटे के लिये किस तरह तडप रहे हैं दोनों. समझ नहीं आता किस दिन वे अपने आपको समझा पाएंगे, संतोष दे पाएंगे. मन इतना बोझिल हो गया है और आँखें जल रही हैं पर इस दुःख का कोई अंत नहीं, अंतहीन है यह पीड़ा, अंतहीन हैं ये आँसू. अपने छोटे से जीवन में कितनी आशाएं, कितने सपने जगाए थे उसने. अब जाने किस लोक में होगा, क्या वह महसूस कर पाता होगा कि उसके जनक उसके पिता कितना सोचते हैं उसको, उसको याद करके घंटों आँसू बहाते हैं.

कल रात उसे फिर स्वप्न में देखा, मन कितना बोझिल है सुबह से. देखा कि माँ और कविता पलंग पर सोयी हैं वह दरवाजे के बीचोंबीच रॉकिंग चेयर पर बाहर की ओर मुँह किये बैठा है, वह अपना सूटकेस खोलती है एक के बाद एक कई वस्तुएं निकलती है एक मिठाई का डिब्बा है उसमें से सबसे बड़ी अच्छी वाली मिठाई निकलकर उसके पास ले जाती है, कहती है, भाई की शादी की मिठाई तुमने खायी ही नहीं, तुम इतने दिन कहाँ चले गए थे. वह सिर्फ हँसता है, वह अपने हाथ से उसे खिलाती है थोड़ा सा रस उसके सफेद कोट पर गिर जाता है वह कहती है क्या पानी से साफ कर दूँ, वह मना कर देता है. उसके बाद देखा कि वे लोग घूमने जा रहे हैं जून वह और नूना, रास्ते में उसके दोस्त मिलते हैं जो आश्चर्य से उसे देखते रह जाते हैं. वह उनसे बात नहीं करता, थोड़ी दूर जाकर वह मुड़कर देखती है वे हाथ हिला रहे हैं. जब उसके किसी मित्र ने कोई सवाल किया तो जाने किस डर से उसका हाथ पकड़ लिया या उसने ही उसे छुपाने बचाने के लिये. उसके बाद एक दृश्य में बहुत बड़ी पार्टी हो रही है. वीडियो पर कोई फिल्म दिखाई जा रही है, वह बैठा है, उससे पूछता है, बच्चा कहाँ है, वह नन्हे को लाकर उसे दिखाती है, जो लाल पैंट और गुलाबी स्वेटर पहने है, वह फोटोग्राफर से नन्हें का एक फोटो खींचने को कहता है, पर वह अकेले खींचने को मना कर देता है. उसके बाद की बात उसे याद नहीं. जब इस स्वप्न की बात उसने माँ को बताई तो वह और पापा फिर रोने लगे, पर बिना बताए जैसे मन पर एक बोझ सा था.

उसने अपने मन को स्वच्छ करने के लिये सारी स्मृतियों से एक साथ दूर होने के लिये एक पत्र लिखा - जैसे कोई इन्द्रधनुष देखते-देखते आकाश में घुलता जाता है, जैसे कोई सुंदर सपना खत्म हो जाता है, जैसे मुट्ठी में बंद मणि कहीं खो जाये ऐसे ही तुम कहीं खो गये हो, अनंत आकाश में, जाने किस लोक में विलीन हो गए हो. मेरा तुमसे परिचय ही कितना था. कुल चार बरस ही तो हुए हैं मुझे इस घर में ब्याह कर आये हुए. विवाह से एक दिन पहले तुम आये थे मुझसे मिलने, शरमायी, सकुचायी सी मैं तुमसे ठीक से बात भी कहाँ कर पायी थी. पर देखा था पहले तुम्हें फोटो में, सो पहचान तो देखते ही गयी थी. मन में कहीं गहरे संतोष हुआ था कि सलोना, सुंदर देवर है. तुम्हारे भाई ने मुझे एक दिन तुम्हारे बारे में कई बातें बतायीं थीं कि तुम उसे बहुत प्रिय थे, तुम दोनों भाई माँ-पिता को बहुत सुख देना चाहते थे, कि तुम अपने भाई की कोई बात टाल नहीं सकते थे, कि तुम ऐसे हो, तुम वैसे हो. विवाह के बाद जब तुमसे मिलना हुआ तुम्हें जीवंत आशाओं से भरा, उत्साह से लबरेज पाया. जैसे कोई शक्ति तुम्हारे मन में कूट-कूट कर भरी थी. हर वक्त नयी उमंग, नयेपन की खोज. जाने क्या ढूँढने तुम शहर-शहर प्रदेश-प्रदेश घूमा करते थे. कौन जाने वही तलाश तुम्हें इस दुनिया से कहीं दूर ले गयी, शायद जो तुम चाहते थे वह इस दुनिया में नहीं है. तुम जैसे लोगों के लिये यह दुनिया नहीं हैं. पर कभी सोचा नहीं होगा कि तुम्हारे जाने के बाद हम सबका क्या होगा, कि तुम्हारी माँ, तुम्हारे पिता शून्य में तकते-तकते अपनी ज्योति न गंवा बैठेंगे. तुम्हारे भाई सूनी-सूनी दृष्टि लिये जब मुझे देखते हैं, मैं अंदर तक कांप जाती हूँ. उन आँखों में उठते सवाल को सहने की शक्ति नहीं है मेरे पास. सभी तो जैसे एक दूसरे से अपने से यही पूछते लगते हैं कि तुम कहाँ खो गए. पर ऐसे सवालों के भी क्या जवाब होते हैं. अनुत्तरित प्रश्न हथौड़े की तरह दिमाग से टकराते हैं ऐसा क्यों हुआ, ऐसा हमारे ही साथ क्यों हुआ. और जब कहीं कोई जवाब नहीं मिलता आँखें झुक जाती हैं आँसुओं के बोझ से भारी हो जाती हैं बरस पड़ती हैं. कोई इस दुनिया को छोड़ चुका हो चला गया हो ऊपर अनुपम लोक में तो क्या उसका खत आता है, तुम नहीं थे पर तुम्हारी चिट्ठी आयी, वही जानी पहचानी लिखावट और.. भाभी, शब्द जैसे जला रहे थे, आज तुम नहीं हो मैं तुम्हारे कमरे में देख रही हूँ तुम्हारी किताबों को, सजाये गए सामान को. इन सबमें तुम्हारा स्पर्श है अनगिनत यादें हैं. यह सब लिखकर उसका मन जैसे खाली हो गया वह नन्हें के साथ खेलने लगी.