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Tuesday, May 28, 2024

सोसाइटी में तेंदुआ

सोसाइटी में तेंदुआ


आज सुबह टहलते समय दिल की धड़कन कभी बढ़ती कभी घटती रही। छोटी बहन से बात हुई, जो डॉक्टर है, उसने एलएफटी टेस्ट अर्थात फेफड़ों की क्रिया का परीक्षण  व ईको टेस्ट कराने को कहा, साथ ही  कोरोना टेस्ट करवाने को भी। जीवन व्यक्ति की परीक्षा लेता है, मज़बूत बनाता है। शनिवार को डाक्टर से अपॉइंटमेंट लेने के लिए नन्हे से कहा है, कल उसने स्टॉक मार्केट पर एक और किताब भेजी है।पिछली किताब ही अभी दो-चार पन्नों से आगे नहीं पढ़ पायी है। पापा जी ने फ़ोन पर बताया, मंझले भाई की बिटिया को कनाडा में अच्छा जॉब मिल गया है। कनाडा जाने का शौक़ भारत में विशेष रूप से पंजाब के युवाओं में बढ़ता जा रहा है. कितने सपने लेकर हज़ारों युवा हर साल वहाँ जाते हैं. लेकिन नूना का का मन तो देश से दूर रहने की कल्पना से ही कांप जाता है. उसने मन ही मन भांजी के लिए प्रार्थना की. उसे यह बात भी खल रही थी कि विवाह के एक वर्ष बाद ही उसे जाना पड़ रहा है, वह भी अकेले। रिश्ते कितनी गहराई से भीतर तक धँसे होते हैं मन की माटी में. यदि किसी अपने को पीड़ा हो तो उसका आभास स्वयं को भी होता है. 


आज नींद देर से खुली, रात को नींद गहरी नहीं थी। सुबह ऑक्सीजन लेवल भी कम था। कोरोना की आशंका हुई तो डिस्पेंसरी में फ़ोन किया, कंपाउड़र ने कहा ब्लड टेस्ट की रिपोर्ट चौबीस घंटे बाद मिलेगी, ३५०० रुपये लगेंगे। नन्हे ने प्रैक्टो के द्वारा डॉक्टर सविता राव से बात करवायी। उन्होंने कहा, माइल्ड स्टमक इन्फेक्शन है, उसी के कारण ये सारे लक्षण हो रहे हैं, दवा भी बतायी। दिल से जैसे बोझ उतर गया। शाम को छोटे भाई ने कहा, भांजी के ससुराल वाले उसके जाने से खुश नहीं हैं। जीवन कितना सुंदर हो सकता है, उसे लोग कितना जटिल बना लेते हैं। अज्ञान के कारण ही ऐसा होता है। जून उसके लिए दवा ले आये हैं, उम्मीद है दो-एक दिन में सब ठीक हो जाएगा। 


आज प्रातः भ्रमण के लिए निकले तो आकाश में गोल चंद्रमा चमक बिखेर रहा था। स्वास्थ्य ठीक नहीं है, जानकार जून बहुत ख़्याल रख रहे थे, सो तस्वीर खींचने पर कुछ नहीं कहा। रामदेव जी से सुना था, संस्कृत में एक श्लोक है, जिसका अर्थ है, हे प्रभु ! जिस प्रकार रोगी विनम्र रहता है, वैसे ही मुझे विनम्र बनाओ। वास्तव में रोग, रोगी को शांत व विनम्र रहना  सिखाता है, और उसके आस-पास के लोग भी उसका ध्यान रखते हैं। लोग सदा ही ऐसे विनम्र बने रहें तो कितना अच्छा हो। आज सुबह एक सूचना आयी, पार्क नम्बर दो में तेंदुआ देखा गया। काफ़ी देर तक लोग डर के कारण घरों से नहीं निकले, पर उसे लगता है, यह सुनी-सुनायी बात है। नन्हे ने भी लिखा है, प्रेस्टीज सोसाइटी में भी तेंदुआ निकला है। जंगल की भूमि जब मानव अधिग्रहण करने लगा है तो जानवरों के पास और चारा ही क्या है। इज़राइल दूतावास के पास बम विस्फोट हुआ है, अभी तक किसी ने इसकी ज़िम्मेदारी नहीं ली है। इज़राइल और हमास के बीच युद्ध न जाने कब तक चलता रहेगा।दोनों ही एक-दूसरे के अस्तित्त्व को नकारते हैं। इज़राइली दूतावास के राजदूत के नाम एक पत्र भी मिला है।इधर किसान आंदोलन अभी भी ख़त्म नहीं हुआ है। बॉर्डर पर हिंसा जारी है। आज शाम को बीटिंग रीट्रिट होना था, पर वे देख नहीं पाये, कल यू ट्यूब पर देख सकते हैं। 


आज बापू की पुण्य तिथि है। जिसे शहीद दिवस के रूप में मनाया जाता है। सुबह रेडियो पर उनका एक सुंदर संदेश सुना। “प्रार्थना सुबह की कुंजी है और शाम की चटकनी” अर्थात सुबह उठकर प्रार्थना करें और रात सोने से पूर्व भी। पिछले दो-तीन दिनों से रात को नींद ठीक से नहीं आती, मन पर जैसे कोई बोझ है, कुछ करना है पर कर नहीं पा रह हैं। इसी का परिणाम था कि आज दोपहर बाद एओएल से फ़ोन आया, कल एक वेबिनार है, और उसे भाग लेना है। जून को पसंद नहीं आया, तो जैसे उनकी नकारात्मकता की तरंगें उसके भीतर सब कुछ अस्तव्यस्त करने लगीं। भौतिक रूप से भी शरीर में अजीब सी संवेदना हो रही थी और मानसिक रूप से भी। सेवा का जो काम उन्होंने स्वयं ही लिया है, जो वे सदा से करना चाहते थे, उसे करने का अवसर आये और वे न करें तो मन कैसे प्रसन्न रह सकता है। भीतर जो पीड़ा इतने दिनों से एकत्र हो रही थी, वह व्यक्त हो गई। इसमें व्यक्तिगत पीड़ा के साथ-साथ अन्य कितनों की पीड़ा है। भाई-भाभी व भांजी की पीड़ा, गणतंत्र दिवस पर जो हिंसा हुई उसकी पीड़ा, जून के असहयोग के कारण हुई की पीड़ा। संभव है आज नींद ठीक से आये। दुख ही मन को माँजता है, बहुत दिनों से मन की सफ़ाई नहीं हुई थी। दुख किनारे-किनारे जम गया था। एक कवि या लेखक का दुख ज़्यादा गहरा होता है, वह सबके लिए आँसू बहा सकता है, वह पूरी सदी का बल्कि पूरे युग का हिसाब मन में रखता है। देश में हो रही घटनाओं से वह कैसे अछूता रह सकता है। सब माया है पर परम या निरपेक्ष स्तर पर, सापेक्ष जगत में जिसमें वे जीते हैं, चीजें असर करती हैं। जून ने वादा किया है, वह कभी नाराज़ नहीं होंगे और आश्रम के काम के लिए कभी टोकेंगे नहीं। देखें, वह किस तरह अपने ये वचन निभाते हैं। निभा पाये तो वे दोनों ही सदा प्रसन्न रहेंगे।  


Thursday, August 30, 2012

ममता के बंधन



कल जून के दो पत्र मिले, एक उसके मायके के शहर से लौट कर आया हुआ और एक वहीं से लिखा हुआ, वह बाद में उससे मिलने वहाँ गए थे. कल रात बहुत वर्षों बाद उसने अपनी एक पुरानी मित्र को स्वप्न में देखा, अभी उस दिन शादी में किसी से उसके बारे में बात की थी, सचमुच वैसी ही थी जरा भी नहीं बदली. सभी से बातें कर रही थी. फिर मैंने एक दो सवाल पूछे अद्भुत स्वप्न था. जून को भी देखा था शायद याद नहीं. उसके आने में दस-बारह दिन ही तो रह गए हैं. अब यहाँ मन नहीं लगता, कल रात नन्हें के रोने पर, मन पहले से ही भरा होने के कारण उसकी भी आँखें क्या भर आयीं सब उसे दोषी समझने लगे हैं. रात को पिता कितना रो रहे थे. पता नहीं यह सच है या उसका भ्रम कि वे  सब लोग उससे ठीक से बात नहीं कर रहे हैं. मन इतना उदास है कि जून अगर होते तो ऐसा नहीं होता.
माँ और पिता का दुःख अब देखा नहीं जाता. सुबह से ही दोनों रो रहे हैं. संतान का दुःख सबसे अधिक पीड़ात्मक होता है. पापा यह कहकर रोते हैं कि आज उस दुर्घटना को पूरे पचास दिन हो गए और माँ को किसी बहाने की जरूरत नहीं है. सुबह उनके कहने पर ही उसने उसके बैग से कपड़े निकल कर धो दिए, वह जैसे उन्हें देख नहीं पा रही थीं. मानव मन कितना भावुक होता है और स्नेह, ममता का पाश कितना मजबूत. बेटे के लिये किस तरह तडप रहे हैं दोनों. समझ नहीं आता किस दिन वे अपने आपको समझा पाएंगे, संतोष दे पाएंगे. मन इतना बोझिल हो गया है और आँखें जल रही हैं पर इस दुःख का कोई अंत नहीं, अंतहीन है यह पीड़ा, अंतहीन हैं ये आँसू. अपने छोटे से जीवन में कितनी आशाएं, कितने सपने जगाए थे उसने. अब जाने किस लोक में होगा, क्या वह महसूस कर पाता होगा कि उसके जनक उसके पिता कितना सोचते हैं उसको, उसको याद करके घंटों आँसू बहाते हैं.

कल रात उसे फिर स्वप्न में देखा, मन कितना बोझिल है सुबह से. देखा कि माँ और कविता पलंग पर सोयी हैं वह दरवाजे के बीचोंबीच रॉकिंग चेयर पर बाहर की ओर मुँह किये बैठा है, वह अपना सूटकेस खोलती है एक के बाद एक कई वस्तुएं निकलती है एक मिठाई का डिब्बा है उसमें से सबसे बड़ी अच्छी वाली मिठाई निकलकर उसके पास ले जाती है, कहती है, भाई की शादी की मिठाई तुमने खायी ही नहीं, तुम इतने दिन कहाँ चले गए थे. वह सिर्फ हँसता है, वह अपने हाथ से उसे खिलाती है थोड़ा सा रस उसके सफेद कोट पर गिर जाता है वह कहती है क्या पानी से साफ कर दूँ, वह मना कर देता है. उसके बाद देखा कि वे लोग घूमने जा रहे हैं जून वह और नूना, रास्ते में उसके दोस्त मिलते हैं जो आश्चर्य से उसे देखते रह जाते हैं. वह उनसे बात नहीं करता, थोड़ी दूर जाकर वह मुड़कर देखती है वे हाथ हिला रहे हैं. जब उसके किसी मित्र ने कोई सवाल किया तो जाने किस डर से उसका हाथ पकड़ लिया या उसने ही उसे छुपाने बचाने के लिये. उसके बाद एक दृश्य में बहुत बड़ी पार्टी हो रही है. वीडियो पर कोई फिल्म दिखाई जा रही है, वह बैठा है, उससे पूछता है, बच्चा कहाँ है, वह नन्हे को लाकर उसे दिखाती है, जो लाल पैंट और गुलाबी स्वेटर पहने है, वह फोटोग्राफर से नन्हें का एक फोटो खींचने को कहता है, पर वह अकेले खींचने को मना कर देता है. उसके बाद की बात उसे याद नहीं. जब इस स्वप्न की बात उसने माँ को बताई तो वह और पापा फिर रोने लगे, पर बिना बताए जैसे मन पर एक बोझ सा था.

उसने अपने मन को स्वच्छ करने के लिये सारी स्मृतियों से एक साथ दूर होने के लिये एक पत्र लिखा - जैसे कोई इन्द्रधनुष देखते-देखते आकाश में घुलता जाता है, जैसे कोई सुंदर सपना खत्म हो जाता है, जैसे मुट्ठी में बंद मणि कहीं खो जाये ऐसे ही तुम कहीं खो गये हो, अनंत आकाश में, जाने किस लोक में विलीन हो गए हो. मेरा तुमसे परिचय ही कितना था. कुल चार बरस ही तो हुए हैं मुझे इस घर में ब्याह कर आये हुए. विवाह से एक दिन पहले तुम आये थे मुझसे मिलने, शरमायी, सकुचायी सी मैं तुमसे ठीक से बात भी कहाँ कर पायी थी. पर देखा था पहले तुम्हें फोटो में, सो पहचान तो देखते ही गयी थी. मन में कहीं गहरे संतोष हुआ था कि सलोना, सुंदर देवर है. तुम्हारे भाई ने मुझे एक दिन तुम्हारे बारे में कई बातें बतायीं थीं कि तुम उसे बहुत प्रिय थे, तुम दोनों भाई माँ-पिता को बहुत सुख देना चाहते थे, कि तुम अपने भाई की कोई बात टाल नहीं सकते थे, कि तुम ऐसे हो, तुम वैसे हो. विवाह के बाद जब तुमसे मिलना हुआ तुम्हें जीवंत आशाओं से भरा, उत्साह से लबरेज पाया. जैसे कोई शक्ति तुम्हारे मन में कूट-कूट कर भरी थी. हर वक्त नयी उमंग, नयेपन की खोज. जाने क्या ढूँढने तुम शहर-शहर प्रदेश-प्रदेश घूमा करते थे. कौन जाने वही तलाश तुम्हें इस दुनिया से कहीं दूर ले गयी, शायद जो तुम चाहते थे वह इस दुनिया में नहीं है. तुम जैसे लोगों के लिये यह दुनिया नहीं हैं. पर कभी सोचा नहीं होगा कि तुम्हारे जाने के बाद हम सबका क्या होगा, कि तुम्हारी माँ, तुम्हारे पिता शून्य में तकते-तकते अपनी ज्योति न गंवा बैठेंगे. तुम्हारे भाई सूनी-सूनी दृष्टि लिये जब मुझे देखते हैं, मैं अंदर तक कांप जाती हूँ. उन आँखों में उठते सवाल को सहने की शक्ति नहीं है मेरे पास. सभी तो जैसे एक दूसरे से अपने से यही पूछते लगते हैं कि तुम कहाँ खो गए. पर ऐसे सवालों के भी क्या जवाब होते हैं. अनुत्तरित प्रश्न हथौड़े की तरह दिमाग से टकराते हैं ऐसा क्यों हुआ, ऐसा हमारे ही साथ क्यों हुआ. और जब कहीं कोई जवाब नहीं मिलता आँखें झुक जाती हैं आँसुओं के बोझ से भारी हो जाती हैं बरस पड़ती हैं. कोई इस दुनिया को छोड़ चुका हो चला गया हो ऊपर अनुपम लोक में तो क्या उसका खत आता है, तुम नहीं थे पर तुम्हारी चिट्ठी आयी, वही जानी पहचानी लिखावट और.. भाभी, शब्द जैसे जला रहे थे, आज तुम नहीं हो मैं तुम्हारे कमरे में देख रही हूँ तुम्हारी किताबों को, सजाये गए सामान को. इन सबमें तुम्हारा स्पर्श है अनगिनत यादें हैं. यह सब लिखकर उसका मन जैसे खाली हो गया वह नन्हें के साथ खेलने लगी.