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Monday, July 24, 2017

कृष्ण जन्माष्टमी


आज कृष्ण जन्माष्टमी का अवकाश है. सुबह वर्षा हो रही थी, वे प्रातः भ्रमण के लिए नहीं जा सके. इस समय भी बरामदे में बैठ कर अनवरत बरसती जल धाराओं को निहारना अच्छा लग रहा है. पिछले दो दिन से वह मौन का अभ्यास कर रही है, भीतर का मौन भी घट सके इसलिए कुछ सुनना भी नहीं है. अभी कुछ देर पहले भीतर कविताएँ उमड़ रही थीं, अब लिखने बैठी तो कुछ याद नहीं आ रहा. जीवन में कब क्या घटने वाला है कोई नहीं जानता पर इतना तो तय है जो भी होता है वह उन्हें आगे ले जाने होता है. आज शाम को कुछ अन्य लोगों एक साथ क्लब जाना है, बाढ़ पीड़ितों के लिए जो सामान महिलाओं ने एकत्र किया है, उसे सहेज कर अलग-अलग थैलों में भरना है. जून ने उसकी उस दिन वाली कविता पढ़ी तो उन्हें अच्छा नहीं लगा, दुःख भरी कविता किसे अच्छी लगती है, पर जीवन में सुख भी है और दुःख भी. कविता तो आईना है, जो जैसा है, प्रकट हो ही जायेगा.

कई दिनों में मन में एक विचार था कि जून को एक पत्र लिखे, कई बातें जो कहनी हैं, कही जानी चाहिए आमने-सामने, नहीं कही जा पायीं. ये बातें ही ऐसी हैं कि इन्हें समझने के लिए एक स्थिर मन की जरूरत है और जब भी इस विषय पर बात हुई है, मन को स्थिर रख पाना सम्भव नहीं रहा है. मानव का जीवन क्रम एक अबोध बचपन से शुरू होता है, एक कोरी स्लेट सा होता है उसका मन, फिर वातावरण, परिवार व स्कूल, मित्रों आदि से उसे जो संस्कार मिलते हैं, वही वह बन जाता है और स्वयं को वही मानने लगता है. युवावस्था में देह में परिवर्तन होते हैं और प्रकृति के नियम के अनुसार (जैसे की सभी प्राणियों में होता है) विपरीत लिंग के प्रति आकर्षण उत्पन्न होता है. इसे ही प्रेम मान लिया जाता है. हाँ, सहज ही मानव के भीतर प्रेम, आनन्द, सुख, शांति, पवित्रता आदि के प्रति लगाव होता है, पर वह कभी-कभी ही प्रकट होता है. प्रौढ़ावस्था तक आते-आते मानव को समझ में आने लगता है कि समय हाथ से निकल रहा है, अब कुछ ही वर्षों के बाद जगत से प्रस्थान करना होगा. वस्तुओं पर उसकी पकड़ ढीली होने लगती है, अहंकार भी छूटने लगता है, उसके भीतरी गुण ज्यादा प्रकट होने लगते हैं. यही वक्त है जब उसे यह जानना होगा कि वास्तव में जीवन का अर्थ क्या है ? क्यों इस संसार में इतना दुःख है ? क्यों मानव कुछ आदतों को बार-बार दोहराता है, क्यों वह भूलने लगता है. यही वक्त है जब उसे किसी मार्ग दर्शक की जरूरत होती है. जब उसे शरण में जाने की जरूरत होती है, क्योंकि कुछ ही समय में वृद्धावस्था उसे इसके लिए विवश करने ही वाली है.

आज जून दिल्ली गये हैं. टीवी पर आस्था चल रहा है वरना समाचार या कोई धारावाहिक चल रहा होता जिसे वह भी बहुत आनंदित होकर देख रही होती. इस समय वेद मन्त्रों की चर्चा हो रही है. परमात्मा निराकार है, वह एक ऊर्जा है, अचिन्त्य है, निर्विकल्प है. परमात्मा के विविध नाम उसके अनेक गुणों के आधार पर हैं. ब्रह्मा का अर्थ है जो सृष्टि की रचना करे. सर्व व्यापक तत्व विष्णु है और संहारक तत्व शिव है. अनंत काल से प्रतिपल ये तीनों कार्य चल रहे हैं.    


Friday, March 3, 2017

अँधेरे के प्राणी


दोपहर के तीन बजने को हैं, आज धूप तेज है, ग्रीष्म ऋत है सो गर्मी होना स्वाभाविक है. जून चार-पांच दिनों के लिए अहमदाबाद गये हैं. उसने सोचा गर्मियों के वस्त्र सहेज कर रखने और सर्दियों के वस्त्र बाहर निकलने का यही उचित समय है. कल रात तेज वर्षा, आंधी, तूफान के कारण बिजली चली गयी. घोर अंधकार छा गया, बाहर भी भीतर भी. पल भर के लिए एक अजीब सा भय उत्पन्न हो गया. भीतर न जाने कितने संस्कार दबे हैं. भय का संचार होते ही वे जग जाते हैं. जैसे अँधेरे में सारे रात्रि के जीव निकल आते हैं वैसे ही मन यदि तनिक भी भय का शिकार हुआ तो भूत बनकर कुसंस्कार चिपक जाते हैं. प्रकाश होते ही सब जीव चले जाते हैं वैसे ही ज्ञान का प्रकाश होते ही वे भी जल जाते हैं. साधना के द्वारा उन्हें पूरा नष्ट करना होगा, ताकि घोर अंधकार में भी मन अभय का पात्र ही बना रहे.

उस दिन से शुरू हुई वर्षा आज थमी है, पर हवा ठंडी है, स्वेटर पहनना पड़े इतनी ठंडी. आज सुबह सुंदर व्याख्यान सुना, शब्दों को वे सुनते हैं, कानों को भले लगते हैं पर थोड़ी ही देर में अपना असर खो देते हैं. उसके अर्थ पर जब ध्यान हो, अर्थ में मन टिक जाये, वे अर्थरूप ही हो जाएँ तभी शब्दों का काम पूरा होता है.

कल दोपहर एक सखी के यहाँ हालैंड वासी एक आर्ट ऑफ़ लिविंग के स्वामी से भेंट हुई, वह बहुत अच्छी हिंदी बोलते हैं तथा संस्कृत में धाराप्रवाह श्लोक भी. शाम को जून के दो मित्र आए, समय बदलता रहता है, एक सा नहीं रहता. कभी वे सब परिवार एक साथ बैठकर भोजन करते थे, अब सब दूर-दूर हो गये हैं. मृणाल ज्योति का एक बच्चा जिसे कई रोग एक साथ थे, कल रात नींद में ही चल बसा. उस दिन वह स्कूल गयी थी तो हॉस्टल के कुछ बच्चे मिले थे, पता नहीं उनमें से कौन सा था.

कुछ दिनों से नन्हे का स्वास्थ्य ठीक नहीं है, उससे बात करके उसने कुछ सोचा और जून को एक पत्र लिखा, ताकि वापस आकर वह इसे पढ़े. उन्होंने इकलौते पुत्र को बचपन में बहुत स्नेह से पाला, लेकिन उसकी युवावस्था में उसे अकेला छोड़ दिया, अठारह वर्ष की उम्र बहुत नाजुक होती है. कोटा में उसे हॉस्टल में छोड़ आए थे तो वह बहुत तनाव में रहा होगा. घर की सुरक्षा से दूर एक अनजान शहर में...फिर कालेज में कितनी हिंसा और तनाव झेलना पड़ा, अच्छे पल भी यकीनन थे पर वह कहते हैं न कि नकारात्मक की ओर झुकने की प्रवृत्ति मानव में सहज ही होती है. उसे लगता है बंगलुरू में भी उसे कार्यभार और जीवन की कठिनाइयों से अकेले ही जूझना पड़ रहा है. उसे लगता है पुत्र के प्रति अपना कर्त्तव्य निभाने में उनसे कुछ चूक अवश्य हुई है. वे एक-दूसरे के प्रति जिस तरह पूर्ण समर्पित हैं वैसे ही उसके प्रति नहीं हो पाए. उसने लिखा, जून को अब मजबूत बनना होगा, उसके बिना रहने की आदत डालनी होगी. कुछ दिनों के लिए वह नन्हे के साथ रहना चाहती है. उसे नया जीवन शुरू करना है, जिसके लिए उसे मानसिक व शारीरिक रूप से स्वस्थ होना चाहिए. उसे उनका साथ सदा ही चाहिए था पर वे अपने जीवन में इतना खोये थे कि उसके साथ रहकर उसे सहारा नहीं दे सके. वह कितनी-कितनी परेशानियों को अकेला ही सहता रहा, उसने कभी उन्हें अपना राजदार नहीं बनाया. अब समय आ गया है पुत्र के लिए अपने सुख के त्याग का समय, उसे अपना कर्त्तव्य स्पष्ट दिखाई दे रहा है. उनका शेष जीवन उसके लिए हो, उसे जीवन में अभी प्रवेश करना है. यही उम्र है जब उन्होंने विवाह बंधन में बंधकर नया जीवन शुरू किया था और उन्हें परिवार का पूर्ण सहयोग था. उसने उम्मीद की, जून जब यह पत्र पढ़ेंगे, उसकी बात समझ रहे होंगे.  

    

Friday, August 21, 2015

मलेशिया का मौसम


अभी-अभी नैनी ने कुछ कहा पर वह ठीक से सुन नहीं सकी और कुछ और समझ कर उस बात का जवाब दिया. उसका ध्यान पूरी तरह से उस पत्र में था जो वह सद्गुरु को लिख रही थी. आज सुबह एक परिचित का फोन आया, तीन दिनों के लिए उन्हें स्थान मिल जायेगा. कोई शुभ कार्य करने जब कोई निकलता है तो प्रकृति उसमें सहायता करने को आ जाती है. उसे लगता है उनका यह सेवा प्रोजेक्ट बहुत सफल होगा. ईश्वर के लिए किया गया कार्य कभी असफल हो ही नहीं सकता. कुछ देर पहले जून का फोन आया था, सुबह ससुराल से पिताजी का फोन भी आया, टिकट कराने की बात कह रहे थे. आज सुबह चिड़ियों की आवाज ने जगाया, स्वप्न में देखा( या वह तंद्रा थी) कि नीले आकाश में गुरूजी आगे-आगे तथा वह पीछे-पीछे चल रही है. मौन है प्रकृति ! मौन से ही ओंकार की उत्पत्ति हुई, उस दिन यह बात सुनी, यह बात सीधे दिल में उतर गयी है, मौन भाने लगा है..भीतर का मौन, कभी-कभी जब कोई विचार नहीं रहता वह इस मौन को सुनती है. यही वह शांति है, जिसे वह अनुभव करती आई है उसमें से फिर आनंद फूटता है, सभी क्यों नहीं इस आनंद को चख पाते, कितना सहज है यह पर जिसे नहीं मिला उसके लिए उतना ही कठिन ! तभी तो कहते हैं ईश्वर निकटतम है और दूरस्थ भी ! वह तो जैसे कृत-कृत्य हो गयी है. कृतज्ञता से कभी-कभी आँखें भर आती हैं. शास्त्रों के वचन कितने सच्चे लगते हैं. संतजन प्रिय लगते हैं और परमात्मा अपने लगते हैं, यही तो भक्ति है न !
बाहर तपन है पर भीतर शीतलता है ! जिसे तृष्णा की आग नहीं जलाती वह सदा ही शीतलता का अनुभव करता है. आज सुबह उठी तो मन-प्राण ध्यान से पूर्ण थे, आज एकादशी है, मन भोजन का ध्यान तो कर रहा है पर फलाहार का ही. मन का निरोध करना तो सम्भव नहीं लगता हाँ उसकी धारा को एक गति अवश्य दी जा सकती है. कल ध्यान करते समय मन में वह घटनाएँ मुखर हुईं जिनमें अन्यों का दोष देखा था. अपनी गलती तब नजर नहीं आई थी, पर अब स्पष्ट दिखी. भीतर की गंदगी को बाहर कर ध्यान पवित्र कर देता है. उस दिन जून जो इतना क्रोधित हुए तो बिलकुल सही था. उसने श्रद्धा का दामन छोड़ दिया था, अपनी अस्वस्थता से कितनी शीघ्र घबरा गयी थी. धैर्य का साथ छोड़ देने से वे बाहरी वस्तुओं, व्यक्तियों, परिस्थितियों को अपने सुख-दुःख के लिए दोषी मानने लगते हैं, वे यह भूल जाते हैं कि उनके स्वयं के कर्म ही उन्हें सुखी-दुखी बनाते हैं, फिर जिन्हें वे स्वयं से भी अधिक प्रेम करते हैं, उन्हें अपनी पीड़ा के लिए ( अपनी तुच्छ पीड़ा के लिए ) दोषी ठहराना तो निहायत ही घटिया काम है. वह कितना नीचे गिर गयी थी, ईश्वर ने सब देखा होगा, हंसा होगा वह कि उससे प्रेम का दम भरने वाली स्वयं का दर्द नहीं सह पायी. इस जन्म में जिस किसी को भी उसने जितनी भी बार दुखी किया है, सबमें उसका दोष स्पष्ट रूप से था, वह सभी से क्षमा मांगती है ! अपने उस दोष के कारण ही उसने स्वयं भी बहुत दुःख उठाया है, अब और नहीं..बस..यह बात सदा याद रहे !

हँसी आती है अपनी मूर्खता पर कि अपने जिस दुःख को वह इतना महत्व दे रही थी, वह तो कुछ था ही नहीं, उसकी तुलना में औरों के दुःख कितने बड़े थे पर वे तब भी मुस्कुरा रहे थे. उसका अहंकार ही तुच्छ से दुःख को बड़ा करके दिखाता है बल्कि जहाँ नहीं भी होता वहीं खड़ा कर लेता है. आज ब्यूटी पार्लर में काम करने वाली एक लड़की की बातें सुनकर लगा कि वह अपने सारे दुखों के बीच कितनी शांत है. उसके पिता कैंसंर के मरीज हैं, मृत्यु की प्रतीक्षा कर रहे हैं. कल उसने जून से कहा कि ठीक ही चल रहा है, वह सोच रहे होंगे ऐसा क्या हो गया, आज फोन आने पर कहेगी कि सब कुछ बिलकुल ठीक है. वहाँ का मौसम कैसा है ? खाना कैसा मिलता है ? शाम को क्या करते हैं? तथा तबियत कैसी है ? उसने उनके बारे में कुछ पूछा ही नहीं, अपने तथा नन्हे के बारे में ही बताती रही. जून घर से दूर हैं, उन्हें उससे ज्यादा सम्भल कर चलना होता होगा. आज ध्यान में अद्भुत अनुभव हुआ, उससे पहले सद्गुरु का स्मरण हुआ और मन कृतज्ञता से भर  गया, कितना विश्वास है उनके भीतर, कितनी सहजता, कितना अपनापन, कितना प्रेम..उन्हें सुनना एक अनोखा अनुभव है, वह शांति का सागर हैं, सुबह उठी तो कैसी बेचैनी थी कि अभी तक सत्य का भान नहीं हुआ, पर उन्होंने बताया कि जो भी विकार हैं उन्हें देखते रहें, निर्मूल करने जायेंगे तो वे और दृढ़ होंगे, भीतर अपने आप से जुड़ते जाना है तो जो व्यर्थ है वह छूटता जायेगा अपने आप ही ! क्रोध के प्रति क्रोध का आना भी बंद करना होगा. प्रकाश, प्रवृत्ति तथा मोह के उत्पन्न होने पर भी जो न तो हर्षित होता है न उद्ग्विन होता है, वही कृष्ण के शब्दों में स्थिरमति है ! 

Monday, March 30, 2015

चित्रों की प्रदर्शनी


आज बाबाजी अपने विट्ठल को याद करते-करते भाव समाधि में प्रविष्ट हो गये हैं, और उन्हें इस तरह परम आनंद में मगन देखकर हजारों की भीड़ भी भाव विभोर हो गयी है. परम भाग्य होता है तभी संत या सद्गुरु मिलते हैं और उनकी कद्र हृदय जानता है. वास्तव में सद्गुरु क्या है ? कौन है ? कोई नहीं जान पाता. उनकी कृपा का एक अंश ही मिल जाये तो कल्याण हो जाता है लेकिन उसे पाने के लिए अहम् को पूरी तरह नष्ट करना होगा. जहाँ प्रेम होता है वहाँ परमात्मा तत्क्षण जवाब देते हैं, हृदय के सच्चे प्रेम को वह अस्वीकार नहीं कर पाते और धीरे-धीरे भक्त के हृदय से अहंकार नष्ट होने लगता है. कल शाम वह सत्संग में गयी, बाद में भोजन का भी इंतजाम था, पर चना-पूरी खाने की जरा भी इच्छा नहीं थी सो वह लौट आयी. कल सुबह दोनों ननदों को पत्र लिखे, अब यह प्रतीक्षा नहीं करनी है कि उनका जवाब भी आये और ऊपर से यह भी कि वह उसके अनुकूल हो, यह तो अहंकार को पोषने वाली बात होगी. आज सुबह वे उठे तो देखा नन्हा रात को कम्प्यूटर चलाकर बिना मच्छरदानी लगाये, बत्ती जलाये ही सो रहा था. दूध भी ऐसे ही पड़ा था. शायद वह सोने नहीं गया था नींद ने उसे घेरे में ले लिया. कल उसकी किताबें भी दिल्ली से आ गयीं. इस वर्ष कोचिंग के कारण उसे नूना से पढ़ने की जरूरत नहीं है, यानि उसे साधना के लिए समय मिलेगा. आत्मिक बल बढ़ेगा, सहनशीलता बढ़ेगी, उपेक्षा जगेगी, अपेक्षा कमेगी !

आज सुबह चार बजे उठी, वातावरण में निस्तब्धता छायी थी. ढेर सारे अमरूद गिरे हुए थे. पका हुआ फल स्वयं ही झर जाता है ऐसे ही परिपक्व मन स्वयं ही झुक जाता है, अपरिपक्व मन हठी होता है. आज नन्हा स्कूल नहीं गया है. कल बड़ी ननद की राखी मिली, पत्र भी नहीं है और जल्दी में भेजी गयी लगती है. ईश्वर ही सबका रखवाला है और वही तो अपनों के माध्यम से सबकी सहायता करवाता है. कल एक सखी के यहाँ गये वे, उसके पतिदेव का जन्मदिन था. उसकी सासूजी से बातें किन. वह इस उमर में भी काफी संयत लगती हैं. एक सुसंस्कृत महिला..वह भी वृद्धावस्था में ऐसी ही रहेगी. सजग अपने स्वास्थ्य के प्रति था अपने व्यवहार, अपनी बातों के प्रति भी.

मन पुनः उद्ग्विन हुआ. कारण वही है इच्छा’. कल शाम वे कला प्रदर्शनी देखने गये. मन ललक उठा कि इनमें से एक तो उनके घर की शोभा बढ़ाए. जून को येन, केन, प्रकारेण मनाया कि वे एक पेंटिंग खरीदेंगे. लेकिन आज सुबह विचार आया कि अभी तक वस्तुओं के प्रति आकर्षण कम तो नहीं ही हुआ है सो मुक्त कैसे होगा मन ? जून को जैसे ही कहा कि इतना जरूरी नहीं है कि पेंटिंग ली ही जाये लेकिन जैसे ही ये शब्द कहे, मन ने फिर एक दांव फेंका कि छोटी ही ले ली जाये. यानि आकर्षण इतना प्रबल था कि..मन को समझना बहुत मुश्किल है. पर उसे उस पर नजर रखनी ही है. जून ने जब ऐसा कुछ कहा जो उसे पसंद नहीं था तो उसे भी समझाने लगी. नैनी देर से आयी तो उस पर भी झुंझलाई. अर्थात मन पर नियन्त्रण नहीं था. प्रेय और श्रेय दो प्रकार के कर्म होते हैं. जो कार्य तत्पल सुख दें वे प्रेय है लेकिन भक्त को, साधक को तो श्रेय का मार्ग अपनाना होगा. पहले तो उसे यह निर्णय कर लेना चाहिए कि वह एक सांसारिक व्यक्ति है अथवा एक साधिका, यदि साधिका है तो उसे सजग रहना ही होगा. किसी के दोष देखना बंद करना होगा औरों को सुधारने से पूर्व अपने अंदर की हजारों कमियों को दूर करना होगा. व्यर्थ का चिन्तन, व्यर्थ की वाणी और व्यर्थ के कार्यों से भी स्वयं को दूर करना होगा, और ऐसा करना ही अंतत सुख का कारण होगा. क्षणिक सुख का नहीं ऐसा सुख जो बाद में पछतावे का कारण बने. श्रेयस कार्यों को करने के बाद पछताना नहीं पड़ता. परम लक्ष्य को प्राप्त करना ही उसका ध्येय होना चाहिए. सदा उसके सम्मुख आदर्श रहे, क्योंकि मन को तृप्त करना वैसा ही है जैसे अग्नि को ईंधन देना, मन को तृप्त करते करते वे चुक जायेंगे पर इसे तृप्त नहीं कर सकते जबकि ईश्वर को पाने की इच्छा ही अपने आप में शांतिदायक है. यह प्रारम्भ में, मध्य में और अंत में भी सुखद है ! यह मुक्त करती है जैसे वह परमात्मा मुक्त है, हर तरफ व्याप्त  ऐसे ही वह उन्हें बनाना चाहता है पर वे हैं कि देह के घेरे से बाहर आना ही नहीं चाहते !     



Friday, March 27, 2015

दिल का ताला




ईश्वर उनका अन्तरंग है, उसकी उपासना करने के लिए विधि विधान की नहीं भाव भरे हृदय की आवश्यकता है. सहज रूप से जब अंतर में उसके प्रति प्रेम की हिलोर उठे तो उसी वक्त पूजा हो गयी, फिर धीरे-धीरे यह प्रेम उसकी सृष्टि के प्रत्येक प्राणी के प्रति उत्पन्न होने लगता है, सभी में उसी के दर्शन होते हैं. कल शाम को उसे सड़क पर साइकिल पर जाते एक हॉकर को देखकर उसे बुलाकर कुछ देने का मन हुआ, शुद्ध प्रेम के कारण, पर उसने स्वयं को रोका क्योंकि बिना कुछ काम कराए वह शायद कुछ लेना पसंद भी नहीं करता और जून को उसकी इस बात के पीछे की भावना भी समझ में नहीं आती. ...और आज सुबह एक दिवास्वप्न देखा कि उसे ईश्वर प्राप्ति हो गयी है और..खैर, दिवास्वप्नों की बात यहीं छोड़ दे. अभी बहुत सफर तय करना है. एकांत में रहे तो ज्ञान सदा साथ रहता है. मन प्रसन्न व मस्तिष्क उद्वेग रहित, स्पष्ट..लेकिन जब इस ज्ञान को व्यवहार में लाने का समय आता है तो मन पुराने संस्कारों के कारण विक्षेपित हो जाता है. सारा ज्ञान कुछ पल के लिए तो धरा ही रह जाता है, इतना अवश्य है कि शीघ्र ही कोई सचेत करता है पर तब तक वह क्षण गुजर चुका होता है. यह भी सही है कि पहले की तरह बाद में मन शीघ्र संयत हो जाता है, रेत पर पड़ी लकीर की तरह..पर उसे तो अपने मन को पानी की धार सा बनाना है जिस पर कोई लकीर पड़े ही न. अपने मन के विश्वास को, सरलता को बचाकर रखना है. आज भी वर्षा बदस्तूर जारी है. ‘जागरण’ में नारद भक्ति सूत्र पर चर्चा हो रही है. उसका भी अनुभव है कि जब कोई ईश्वर को याद करता है उसी क्षण वह जवाब देता है. पर जब कोई अभिमान वश या अन्य किसी कारण से उसे भुला देता है और दुःख में होता है तो वह नहीं आता अर्थात मन उसे ग्रहण नहीं करता. इसका अर्थ हुआ कि यदि लगातार उसका सान्निध्य चाहिए तो ध्यान भी अनवरत चलना चाहिए. एक पल का भी विस्मरण पुनः उसी स्थिति में ला देता है.

आज सुबह छोटी बहन को फोन किया उसका जन्मदिन है, बड़ी बिटिया को स्कूल छोड़ने जा रही थी सो थोड़ी देर ही बात हो सकी. दोनों ननदों से भी बात हुई, छोटी का स्वास्थय ठीक नहीं है. बड़ी ने बताया ननदोई जी मुम्बई में रहने लगे हैं, शनिवार को घर आते हैं. घर-बाहर के सारे कार्य उसे खुद ही करने होते हैं. सासु माँ आजकल आयी हुई हैं, इस वक्त टहलने गयी हैं. कल क्लब में लेडीज क्लब की चेयर परसन से मिलना हुआ, उनकी बातें सुनीं, आत्म विश्वास से परिपूर्ण ! कल उसने पत्र लिखने शुरू किये थे, अभी कुछ शेष हैं, कुल नौ पत्र लिखने हैं. आज सुबह ‘जागरण’ में दिल का ताला खोलने की चर्चा हुई, ताला जो ममता का है और जिसे खोलना वैराग्य से है. उसने प्रार्थना की, कृष्ण सदा उसकी स्मृति में रहें, वह उसे न भूले और साधना के पथ पर आगे बढ़े, ऐसा संकल्प करे. संकल्प उसका और बल परमात्मा का. उसी की कृपा होती है तो साधना का सामर्थ्य जगता है !


Thursday, January 1, 2015

गीत समर्पण के


पिछले दो दिन डायरी नहीं लिख सकी. सुबह का वक्त जो श्रवण-लेखन में बीतता है, छुट्टी होने पर अन्य कार्यों में चला जाता है. जीव हर वक्त इन्द्रियों को तुष्ट करने में लगा रहता है. देहात्म बुद्धि से निजात पाना कितना कठिन हो जाता है पर इन सबके बीच ‘क्रिया’ के क्षण वरदान बनकर आते हैं, जब मन आत्मभाव में स्थित हो जाता है. आज बड़े भांजे का जन्मदिन है, सुबह सभी से बात की, कल रात पिता से भी बात हुई, उन्होंने बताया, पत्र लिखा है. दीदी ने पत्र का जवाब फोन पर दिया. कल दोनों भाई उनके यहाँ परिवार सहित पहुंच गये आज दोपहर तक वापस आयेंगे. कुछ देर पहले छोटी बहन का फोन आया उसने नन्हे से यहाँ का पिन पूछा और कुशलता का समाचार लिया दिया. सुबह ससुराल से फोन आया यह याद दिलाने के लिए कि वे बधाई देने के लिए फोन अवश्य करें. यह फोन उन सभी परिवारजनों को आपस में जोड़े हुए है.

आज पूरे एक हफ्ते बाद नन्हे का स्कूल खुला है. वे सुबह जल्दी नहीं उठ पाए सो क्रिया भी नहीं हो सकी. अभी कुछ देर पहले बाबाजी का हिमाचल में हुआ सत्संग देखा, मन भर आया, गुरू का सन्निध्य कितना अमूल्य होता है. योग शिक्षक से वे पिछले इतवार को डिब्रूगढ़ में मिले थे, उसके बाद से कोई खबर नहीं है. उस दिन एक मित्र परिवार ने दो कैसेट दिए एक में समपर्ण के गीत हैं. सुनकर बहुत अच्छा लगता है. गुरू उन्हें कितनी ऊँचाइयों तक ले जाते हैं, गुरू भीतर ही हैं, सदा उनके पास हैं पर फिर भी किसी बाहरी आश्रय की आवश्यकता का अनुभव होता है, कोई ऐसा जो दो आँखों से ही अंदर का सारा हाल जान लेता है, जिसका एक वचन ही काफी होता है. जीवन के प्रत्येक कार्य के लिए किसी न किसी से शिक्षा लेनी पड़ती है तो ईश्वर को जानने जैसे महान कार्य के लिए गुरू की आवश्यकता हो इसमें आश्चर्य क्या है. गुरू मन का वैद्य होता है. जो विकारों से मन को मुक्त करता है. ऐसा सद्गुरु आसानी से नहीं मिलता, पर ईश्वर की अनुभति वही करा सकता है. वह शिष्य के मंगल की कामना हर क्षण करता है, उसका हृदय ईश्वर की तरह अनंत प्रेम से भरा हुआ है. कल शाम से ही बल्कि दोपहर से ही उसका सिर भारी था, खैर, शरीर का अपना धर्म है और आत्मा तो सदा मुक्त है, कल उसने इन दोनों को अलग-अलग रखते हुए कोई दवा आदि नहीं ली और रात को कब अपने-आप ही दर्द ठीक हो गया पता नहीं चला. आज ‘जागरण’ में विभिन्न चक्रों के बारे में सुना. आत्मा के स्तर पर जीना यदि कोई सीख ले तो सारे चक्र अपने आप ही जाग्रत हो जायेंगे और उनसे मिलने वाली ऊर्जा से जीवन ओत-प्रोत हो जायेगा.

कल अंततः जून को शिक्षक का ईमेल मिला. उनके भाई का देहांत हो गया था जिसके एक्सीडेंट की खबर सुनकर वे गोहाटी गये थे, जीवन कितना क्षणिक है यह उनसे बेहतर कौन जान सकता है. देह का संबंध क्षणिक है मात्र ईश्वर से मानव का संबंध शाश्वत है. उन्होंने उसे दो आदेश दिए थे पहला सेवा करनी चाहिए दूसरा ऋषिकेश जाकर एडवांस कोर्स करने का आदेश. पर दोनों ही आदेशों का पालन वह नहीं कर पायी है. सेवा करने की क्षमता नहीं है, अपने परिवार और निज आत्मा की सेवा करने में ही सारा समय बीतता है. ईश्वर प्राप्ति की इच्छा बलवती होती जा रही है. कृष्ण की चेतना में अपनी चेतना जोड़ने की इच्छा. भगवद स्मरण के सिवा और कोई भी कार्य स्वीकार्य नहीं लगता है. आज सुबह वे उठे तो गला खराब लग रहा था पर अब देह को आत्मा से अलग रख कर देखने की कला गुरूजी ने सिखा दी है. परमात्मा उसे जिस हाल में रखना चाहें, क्योंकि वही सब करा रहे हैं. उसके लिए जो भी अच्छा है वही होगा. वह जड़ वस्तु पर निर्भर न रहकर चेतना की ओर कदम बढ़ा रही है. इन्द्रियां अपना काम करती रहेंगी, मात्र उसकी चेतना इन्द्रियों की ओर न जाकर कृष्ण की ओर जा रही होगी.


कल सुबह एक सखी आई थी अपनी समस्या लेकर और गुरूजी ने उसे उसकी सहायता करने की प्रेरणा दी. सुबह उसको फोन किया. सुबह एक अन्य सखी के साथ बाजार गयी, वह अपने यहाँ कल पूर्णिमा की कथा का आयोजन कर रही है. बाद में लंच भी होगा जो उसके जन्मदिन का भी होगा, क्योंकि उस दिन करवाचौथ है. कल शाम दीदी का फोन आया उन्होंने बताया उनके घर के पास एक नर्सिंग होम बिक रहा है वह चाहती हैं वे सभी मिलकर उसे खरीद लें और चलायें पर उन्हें यह विचार जंच नहीं रहा है, न तो  उन्हें इसका कोई अनुभव है और न ही इतना धन है. जून आज देर से आने वाले हैं. इसी माह होने वाले एक कोर्स के लिए सहायता करने में व्यस्त हैं. कल पिता का एक लम्बा सा पत्र आया है. उसने उनके लिए एक कार्ड खरीदा और अभी छह कार्ड खरीदे जो जिनको मिलेंगे उन्हें ख़ुशी अवश्य देंगे, क्योंकि बहुत प्यार से चुने गये हैं. सुबह एक सखी को भी उसने इसी प्यार और विश्वास की बात कही, उसका जीवन कैसा अजीब सा हो गया है उसने स्वयं ही बना लिया है. ईश्वर से प्रार्थना करेगी और गुरूजी से भी की उसे सामर्थ्य दे, शक्ति दे ! art of living ने जैसे उसके जीवन में एक शांति, स्निग्धता और प्रेम की लहर ला दी है वैसी ही लहर उसके जीवन में भी आये. वह अपने रिश्तों की कद्र करना सीखे. 

Wednesday, December 17, 2014

विवेकानन्द के पत्र


सद्गुरु का मिलना दुर्लभ है, मिल भी जाये तो उसके प्रति पूर्ण समर्पण होना भी कठिन है. मन में अनेकों संकल्प-विकल्प उठते हैं जो श्रद्धा को हिला देते हैं पर उसके मन में गुरुओं के परम गुरू उस परम पिता के प्रति प्रेम की ऐसी लहर उठी है जो हर वक्त उसे लपेटे रहती है. उस प्रेम का उदय तो पहले ही हुआ होगा पर उससे परिचय सद्गुरु की कृपा से ही सम्भव हुआ है. ऐसी कृपा करने वाले के प्रति भी मन श्रद्धा से भर जाता है. उसे ऐसा प्रतीत होता है कि उसके जीवन का लक्ष्य निर्धारित हो रहा है. भगवद् प्रेम और संगीत अब ये दो क्षेत्र ही उसे आकर्षित करते हैं. ईश्वर के लिए गाना और उससे प्रेम करना ये दो कार्य जग में करने योग्य हैं. कल शाम वे टहलने गये तो बात इसी विषय पर हो रही थी अब जून और उसके बीच बातचीत का ज्यादातर भाग art of living ही रहता है. कल रात सोने से पूर्व स्वामी विवेकानन्द का एक पत्र पढ़ा जिसमें उन्होंने ईश्वर के प्रति अखंड विश्वास का वर्णन किया है. ‘यदि कोई अपना सारा भार कृष्ण पर छोड़ दे तो वह उसे भार मुक्त कर देंगे. ईश्वरीय प्रेम महान है इसकी अनुभूति चेतना के उच्च स्तरों पर ले जाती है. स्थूल देह अन्नमय कोष है, प्राणमय कोष में जीने वाले को प्राणायाम व भजन कीर्तन बताया जाता है. मनोमय कोष के भीतर विज्ञानमय कोष है और उसके भीतर आनंद मय, जो थोड़ी ही ख़ुशी मिलने पर शांत हो जाता है. भिन्न-भिन्न कोशों में स्थित व्यक्तियों को भिन्न-भिन्न साधन की पद्धति सिखायी जाती है, जिससे ईश्वरीय अंश जागृत होता है. मौन, ध्यान, उपवास यह तपस्या है, परमात्मा को पाने के लिए यह तपस्या अपने जीवन में लानी है और ये सहज रूप से जीवन का अंग बनने चाहिए ! और यदि प्रेम सच्चा हो तो ये सब सहज प्राप्य हैं !’ वह आनन्दमय कोष में स्थित है !

निःशब्द ईश्वर तक पहुंचने के लिए शब्दों की नाव बनानी पडती है पर अंततः शब्द भी छूट जाते हैं क्योंकि वह शब्दातीत है. ईश्वर का स्मरण करने से जो सुख मिलता है वह अन्य किसी वस्तु, कार्य या परिस्थिति से नहीं मिलता, अच्छा हो या बुरा दोनों की आसक्ति छोड़नी होगी जो, जब, जैसा मिले, जब हो उसे पूरे मन से स्वीकारना होगा वृत्ति में यदि ईश्वरीय प्रेम हो तो वही प्रगट होगा, जो हम मांगेंगे वही तो मिलेगा. मेरा हो तो जल जाये और तेरा हो तो मिल जाये यह भाव सदा बना रहे तो ईश्वर मन का स्वामी बन जाता है. कामनाएं अपने आप मिटती जाती हैं, उसी का अधिकार हमारे हृदय पर हो जाये तो सम अवस्था में रहना आ जाता है, पर आज सुबह जब उनकी नींद देर से खुली तो मन ने स्वयं को धिक्कारना शुरू कर दिया, वह भी ठीक नहीं था. उन्ही नकारात्मक भावनाओं का परिणाम है कि उसके पैरों में हल्का खिंचाव है वरना इतने दिनों से किसी भी तरह का कोई दर्द महसूस नहीं किया. आज सुबह फिर गुरू का स्मरण हो आया, उनकी प्रभुता व महानता पर जितनी श्रद्धा की जाये कम है, जनहित के लिए अपने को मिटा देना, पर उस मिटा देने में ही वे सब कुछ पा जो लेते हैं. जब कोई किसी के लिए निस्वार्थ भाव से कुछ करता है तो ईश्वर जीवन में सुख का सागर बनकर आता है. ईश्वरीय कृपा का साक्षात् अनुभव उसने किया है पर इस मन को नियन्त्रण में रखना तब कठिन हो जाता है जब प्रभु का स्मरण नहीं रहता. मन में यदि उसी की लौ लगी रहे तो कोई उलझन नहीं रहती. उसकी प्रार्थना बस इतनी सी तो है और वर्षों से है, हे ईश्वर ! तू साथ साथ रह या कि वह उसे कभी न भूले क्यों कि उसके मिलने से बाकी सब अपने आप ही मिल जाता है. उसका एक पेन नहीं मिल रहा है पर वे उसे भी ढूँढने में उसकी मदद करेंगे. आज बाबाजी भाव समाधि में चले गये थे.   


Monday, December 15, 2014

गीता का गीत


नन्हा विज्ञान पढ़ने गया है. उसने ‘इंडिया टुडे’ में दिली के एक चूड़ीवाले के बारे में रोचक लेख पढ़ा .पढ़ते-पढ़ते ही पता नहीं कब आँख लग गयी और स्वप्न में एक नन्हे बच्चे की गार्गलिंग जैसी ध्वनि सुनी, आवाज इतनी वास्तविक थी कि वह झट उठ गयी. चाय पीकर तरोताजा हुई और स्वामी विवेकानन्द की पुस्तक का अध्ययन शुरू किया, जो उसे बहुत भाती है. संगीता अध्यापिका फिर चली गयी हैं, सो अभ्यास नहीं हो रहा. हर क्षेत्र में गुरू की आवश्यकता है. आज शाम को क्लब में मीटिंग है, वह कुछ देर ध्यान करने के बाद ही जाएगी. पहली तारीख से एक और कोर्स आरम्भ हो रहा है, पुराने प्रतिभागी भी जा सकते हैं. वे जायेंगे. पिछले महीने के अंतिम दिन ही उसे वह अनुभव हुआ था जिसने उसके जीवन को बदल दिया है.

आज ध्यान में अद्भुत शांति का अनुभव हुआ. मन की आँखों से कई अद्भुत रंग देखे. भीतर से एक ध्वनि भी आती प्रकट हुई पहले तो थोड़ा सा डर लगा पर बाद में सुनने में भली लग रही थी. अब ध्यान के लिए बैठने पर मन शीघ्र एकाग्र हो जाता है. सुबह वे उठे तो तेज हवा चल रही थी, देखते-देखते तेज वर्षा होने लगी. नन्हे को स्कूल जाना था पर नहीं गया. आज से उसके स्कूल में ‘स्पोर्ट्स मीट’ शुरू हुई है. उसे बहनों को पत्र लिखने हैं पर उस क्षण की प्रतीक्षा है जब सहज स्फुरणा होगी और कलम खुदबखुद चलने लगेगी.

कल रात जब उन्होंने गेट पर ताला लगा दिया था तो केन्द्रीय विद्यालय की अध्यापिकाएं आयी थीं फिर वे पड़ोसिन के यहाँ गयीं और वहाँ से फोन किया, पर उन्होंने फोन भी स्टैंड पर रख दिया था जो इस कमरे से दूर होने के कारण सुनाई नहीं दिया, कुल मिलाकर उनसे मुलाकत होनी नहीं बदी थी सो नहीं हुई. यूँ भी बिना इत्तला किया किसी के यहाँ इतनी देर से जाना ठीक तो नहीं है. खैर, सुबह पड़ोसिन ने ये सारी बातें फोन पर बतायीं तो नन्हे के हाथ से वह पत्र मंगवाया जो वे देने आयी थीं. कल दोपहर को कार्यक्रम है.

आज सुबह प्रवृत्ति तामसिक थी, बिस्तर छोड़ने में थोडा विलम्ब किया फिर ध्यान भी कहाँ गहन होने वाला था. कल शाम को जून के मजाक पर झुंझलाई और उससे पूर्व बातचीत में परचर्चा की. नये संगीत अध्यापक मिले हैं, अगले हफ्ते फिर जाना है. संगीत की शिक्षा मानव को ऊपर उठाती है और उसे तो उस पथ पर ही अब आगे बढ़ना है.

अक्तूबर का आरम्भ हो गया है. ‘जागरण’ में कृष्ण की गीता से आये अमृत वचन सुने तो अंतर में आह्लाद हुआ. ईश्वर महान है विभु है पर भक्त के छोटे से उर में समा सकता है. उसके दिव्य प्रेम का अनुभव ही साधक को बदल देता है. वही ज्योति बनकर चैतन्य रूप में मानव के भीतर है. वह मित्र भी है और किसी की पुकार को अनसुना कर ही नहीं सकता. ध्यान में तुष्टि बनकर वही तो साधक को प्रेरित करता है. कल शाम जून की लायी एक पुस्तक पढ़ती रही. शाम को एक सखी के यहाँ से भी श्री श्री की भी दो पुस्तकें लायी. उनकी कृपा है जो आनंद के स्रोत का पता बताया है. खबरों में सुना था, विमान दुर्घटना में श्री माधवराव सिंधिया की मृत्यु हो गयी. जीवन कितना क्षणिक है. अगले पल का भी भरोसा नहीं है. कल श्रीनगर में आतंकवादी हमले में इक्कतीस लोग मारे गये, कौन कब किस वक्त इस धरती से उठ जायेगा कौन कह सकता है सो जितना उनका जीवन है, वे पल-पल उल्लास पूर्वक जीयें, उस की याद में जीयें जो उनका पालक है, उन्हें चाहता है. आज उसने योग शिक्षक को अपने अनुभव बताये तो उन्होंने कहा, अच्छा है, पर इसे बहुत महत्व नहीं देना है. अहंकार को पोषने वाली हर शै से दूर रहना है. जिनमें उस की स्मृति बनी रहे वही क्षण मुक्ति के होते हैं शेष तो बंधन में डालने वाले ही हैं !





Sunday, November 30, 2014

कबीर का दोहा


इस समय एक तरफ तो धूप निकली है दूसरी तरफ बादलों के गरजने की आवाज भी सुनाई दे रही है. सुबह-सवेरे मौसम ठंडा था, जून को सर्दी लग गयी है, सो पहले वह उठी, बाहर गयी तो हवा शीतल थी पर कल सुबह चार बजे की शीतल स्वच्छ हवा का एक झोंका भी कितना प्रफ्फुलित कर गया था. ब्रह्म मुहूर्त में उठने की महिमा यूं ही तो नहीं गयी गयी है धर्म ग्रन्थों में ! अब दोपहर के पौने एक बजे हैं, अभी कुछ देर पहले जून को बाहर तक छोड़कर आने लगी तो उन्होंने पौधों पर पड़ रही धूप की ओर ध्यान दिलाया, पौधों को टोपी से ढका अन्यथा शाम तक कुम्हला जायेंगे. जून ने वह पुस्तक भेज दी है, अगस्त का आरम्भ है यदि वर्ष के अंत तक भी छप जाये तो बड़ी बात होगी. ढेर साडी पत्रिकाएँ पड़ी हैं पढने के लिए, लिखना भी है, पत्र व इमेल भी. एक ड्रेस पर बटन टांकने हैं, अभ्यास करना है, और यह सब करना है इन सवा दो घंटों में. जागरण में आज कर्मवाद पर सुना, मानव कर्म करने के लिए स्वतंत्र है पर फल भोगने के लिए नहीं, वह उसके चाहने अथवा न चाहने पर भोगना ही पड़ेगा, सो कर्म करते समय प्रतिक्षण सजग रहना होगा. उस वक्त वह जीनिया के सूखे फूलों से बीज निकाल कर अलग कर रही थी, इस कर्म का फल तो रंगीन ही होने वाला है. ‘आत्मा’ में गीता के ‘प्रथम अध्याय’ पर चर्चा हुई, मन ज्ञानियों की सी बातें तो बहुत करता है पर ज्ञान उसके भीतर टिकता नहीं है !

‘जब कोई उसे ढूँढ़ता है तो वह उसे नहीं मिलता पर जब वह ढूँढ़ते-ढूँढ़ते खो जाता है तो वह उसे ढूँढ़ता है !’ आज सुबह के समाचारों में जम्मू स्टेशन पर आतंकवादियों द्वारा अँधा-धुंध गोलियां चलाये जाने से दस व्यक्तियों के मरने की खबर सुनी. पिछले एक हफ्ते के अंदर यह तीसरी बड़ी दुर्घटना है जिसमें निर्दोष लोगों की जान जा रही है. सरकार अपने नागरिकों की सुरक्षा करने में असफल है. कुछ दिन पहले लगा था कि इस समस्या का हल शीघ्र निकल आएगा पर अब ऐसा नहीं लगता. कल शाम को बड़ी ननद को पत्र लिखा. तीन इमेल लिखे. पर सर्वर में कुछ खराबी होने के कारण भेज नहीं सकी. जून का स्वास्थ्य अभी भी पूरा ठीक नहीं है पर वह art of living का कोर्स करने के बाद काफी सचेत हो गये हैं. कल शाम से प्राणायाम का अभ्यास भी शुरू कर दिया है. वे दोनों टहलने भी गये. लाइब्रेरी से ‘झुम्पा लाहिरी’ की एक किताब लायी और हैरी पॉटर का एक और भाग. कल रात नन्हे को दस बजे ही सोने को कहा ताकि सुबह वक्त से उठ सके, सुबह उठा, तब तक गुस्सा दिखा रहा था पर स्कूल से आने तक सब भूल जायेगा. उसे इक्यानवे प्रतिशत नम्बर मिले हैं इस परीक्षा में, और पढ़ाई की जरूरत है विशेषतया गणित में.


जैसे धूँए से अग्नि छिप जाये या धूल से दर्पण ढक जाये उसी तरह मन पर अज्ञान का पर्दा पड़ा रहता है. यह अज्ञान तामसिक व राजसिक गुणों का परिणाम है. पिछले दिनों वह रजोगुण के अधीन रही. सात्विकता का भाव टिक नहीं रहा क्योंकि उसको टिकने का स्थान नहीं दिया. मन निर्विचार हो, निर्विकार तभी पवित्र विचारों को प्रश्रय मिल सकता है. जीवन जीते हुए ही जनक की तरह विदेह होना बहुत कठिन है. जीवन की धारा इतनी वेगवती होती है की मन को अपने साथ ले जाती है. बाबाजी ने कहा, “सुख देवे, दुःख को हरे, करे पाप का अंत, कहे कबीर वह कब मिलें, परम सनेही संत” गुरुमाँ ने कहा स्वप्न में भी साधक को सचेत रहना चाहिए, स्वप्न मन की वास्तविक स्थिति का परिचय देते हैं. जून कल तिनसुकिया गये थे, bookcase का आर्डर दे दिया, एक महीने बाद मिलेगा. 

Tuesday, August 12, 2014

अटल जी की चुटकियाँ


मन ही मुक्ति के आकाश में उड़ना सिखाता है, मन ही बंधन की खाई में पटक देता है. मन को सात्विक आहार, एकाग्रता और अनासक्ति मिले तभी वह ऊंचे केन्द्रों में रह सकेगा, ये सुंदर वचन आज ही उसने सुने थे. आजकल उसके मन ने एक नई आसक्ति पैदा कर ली है, टीवी के एक कार्यक्रम के प्रति, निश्चित समय होते ही अपने आप कदम टीवी की ओर बढ़ते हैं, इस आसक्ति की जड़ों को गहरा होने से पूर्व ही काटना होगा. अपने को आगे ले जाना है न कि पीछे, मुक्त होना है न कि नये-नये बंधनों में स्वयं को बांधना है. माँ-पिता का पत्र आये हफ्तों हो गये हैं, उसे पत्र लिखे हुए भी, नन्हे की बात लिखने का मन ही नहीं होता, क्यों, सही कारण शायद उसे खुद भी मालूम नहीं है. उन्हें बुरा लगेगा और माँ जो पहले ही अस्वस्थ हैं, उन्हें दुखद समाचार न ही दिए जाएँ तो बेहतर है. चचेरे भाई का पत्र आया है, जिसका जवाब देना ही पड़ेगा. वर्षों बाद बिन माँ के बच्चों के जीवन में खुशियाँ आने वाली हैं. बहन की शादी तय हो गयी हैं, भाई के लिए भी बात चल रही है. उन्हें एक बधाई कार्ड भेजना चाहिए. जून को कहेगी तो वे अवश्य ला देंगे. जून ने उसे कभी निराश नहीं किया, विवाह में वे क्या देंगे यह भी उन्होंने उस पर ही छोड़ दिया है. माँ से फोन करके इस बारे में बताना होगा. अगले हफ्ते भांजी का जन्मदिन है, उसे बधाई देते समय मंझले भाई से भी बात हो जाएगी.

आज इस क्षण ऐसा लग रहा है कि दिनों बाद स्वयं से मिल रही है. पिछले दिनों जीवन क्रम चलता रहा, कुछ सहज, कुछ असहज क्षण आये, किन्हीं पलों में मन कृतज्ञ हुआ, आनन्दित भी हुई जब ओलम्पिक खेलों का उद्घाटन समारोह देखा, कुछ दृश्य अद्भुत थे. फिर कुछ लोगों से मिलना भी हुआ, उनके परिचित ही हैं पर कई बार वर्षों जानने के बाद भी कुछ अनजाना रह ही जाता है. नन्हा स्कूल से आया तो बहुत खुश था, उसके मित्रों ने बहुत सहायता की और उसे जरा भी परेशानी नहीं हुई बस में, ऐसा उसने कहा. कल विश्वकर्मा पूजा थी, जून ने ऑफिस में ही लंच लिया. उनका दूधवाला भी इस दिन अपनी साइकिल की पूजा करता है, अच्छी तरह धो-पोंछ कर माला चढ़ाता है. लोगों को आस्था के लिए कुछ तो चाहिए, गोयनकाजी कहते हैं कि नहीं, कोई आश्रय नहीं, कोई नाम नहीं, किसी परम्परा का सहारा नहीं, बस प्रतिक्षण अपनी श्वास को देखते जाना है. साँस का सीधा संबंध मन से है जहाँ मन में उद्ग्विनता जगी कि साँस तेज हो जाती है. मन शांत है तो साँस भी नीरव धारा की तरह समान गति से चलती है. अपने मन में किसी आत्मा या परमात्मा के दर्शन करने के उद्देश्य से नहीं बैठना है बल्कि मन को विकारों से मुक्त करते जाना है. पहले तो विकारों के दर्शन होंगे फिर धीरे-धीरे संस्कार मिटेंगे, गांठे खुलेंगी, पर्दे हटेंगे तो मुक्त आकाश सा मन सम्मुख होगा जिसे कोई भी नाम दे दें, आत्मा या परमात्मा. मन में ऊपर-ऊपर से तो लगता है कि स्वच्छता आ गयी है निर्मलता आ गयी है पर जरा प्रतिकूल परिस्थिति आते ही कैसा बेचैन हो उठता है, किसी को को कुछ देकर पछताने लगता है, किसी के कुछ मांगने पर व्याकुल हो उठता है. यह विकारों का ही तो सूचक है. जो हो रहा है चाहे वह शरीर के स्तर पर हो या बाहर, साक्षी भाव से देखना आ जाये तो मन शांत रहना सीख लेगा.

आज सुबह माँ से बात की, वे सोलन में हैं, बहन, बच्चे व पिता जी घूमने गये थे. सुबह ध्यान में बैठी तो एक फोन आया, एकाएक उठना सम्भव नहीं था, पता नहीं किसका था. बगीचे से एक पपीता तोड़ा है जरा सा पकते ही पक्षी खाना शुरू कर देते हैं, उनका यह पपीते का वृक्ष बहुत मीठे व रस भरे फल देता है निस्वार्थ भाव से, ऐसे ही मानव को चाहिए कि दूसरों के काम आए. अभी तक तो वे संचित पुण्यों के फलस्वरूप प्राप्त वैभव का आनंद ले रहे हैं, लेकिन कभी तो ये संचित पुण्य समाप्त हो जायेंगे. भविष्य के लिए नये पुण्यों का संचय इसीलिए करना चाहिए. सद्विचारों से, सद्कर्मों से तथा सद्भावों से. ईश्वर से प्रार्थना भी इसी बात की करनी चाहिए कि कोई असद्विचार न जन्मे, यदि एक बार बीज पड़ गया तो अनुकूलता पाते ही वह पनपेगा अवश्य. कभी-कभी क्रोध व् द्वेष के भाव जो न चाहने पर भी मन को घेर लेते हैं वे इसी का सूचक हैं कि कभी न कभी बीज बोये जरूर गये थे. सुबह जल विभाग के लोग आये थे जो कल दोपहर को भी आए थे, पानी आजकल बहुत कम आता है, ऊपर चढ़ता ही नहीं, अपनी आँखों से देखकर गये हैं शायद अगले कुछ दिनों में सुधार हो. ओलम्पिक में भारत ने अर्जेंटीना को तीन गोल से हरा दिया अपने पहले मैच में. अटलजी ने उस दिन अमेरिका में कहा, पाकिस्तान से क्या बात करें, मौसम की अथवा बीवी-बच्चों की, उनकी चुटकियाँ लाजवाब थीं.




Wednesday, July 23, 2014

भुट्टे के फायदे



उन्हें यहाँ आये अर्थात घर वापस आये तीन दिन हो गये हैं, कल दो पत्र लिखे, अभी स्मृतियाँ सजीव हैं. यहाँ भी वर्षा ने उनका स्वागत किया. जून, वह और नन्हा तीनों बहुत खुश हैं, यात्रा और कुछ दिन घर से दूर रहने के कारण घर की हर वस्तु उन्हें अच्छी लग रही है. माँ का ख्याल हमेशा बना रहता है, उनकी तबियत सुधर रही होगी या नहीं, इतनी दूर बैठे वे जान नहीं सकते, जानकर भी कुछ नहीं कर सकते, ईश्वर से मात्र प्रार्थना जरूर कर सकते हैं. प्रार्थना के आगे मात्र लगाकर उसके सत्य को कम करने का उसका इरादा नहीं है बल्कि अपनी क्षुद्रता पर पर्दा डाल रही है कि उसकी प्रार्थना में कोई असर होगा भी या नहीं. इतने दिनों भगवान से दूर जो रही, अपनी व्यस्तता में उसे भुला बैठी. सभी सखियों से फोन पर या मिलकर बात हुई, अच्छा लगा, वह बातूनी सखी दूसरी बार माँ बनी है बेटे की, कुछ दिन बाद देखने जाएगी. एक मित्र परिवार मिठाई खाने नहीं आ सका जो वे उनके लिए लाये थे, सम्भवतः आज आयें, कल शाम उन्होंने बगीचे में भी काम किया, भुट्टे बहुत हो रहे हैं, जिन्हें वे शाम को नाश्ते में खाते हैं. उसने भुने हुए भुट्टों के फायदे के बारे में कहीं पढ़ा था.

कर्म ही पूजा है, यह विचार इस समय उसके मन में प्रधान है. भक्ति की अपेक्षा कर्म का मार्ग उसे अधिक रुचता है, कर्म के द्वारा ही कोई अपने तथा अपने आस-पास के वातावरण, परिस्थितयों तथा स्तर में सुधार ला सकता है, कर्मयुक्त जीवन उहापोहों से भी दूर रहता है क्योंकि उसके पास विचार करने को अन्य कुछ नहीं रहता. कर्म, सद्कर्म हो यह लेकिन पहली शर्त है, ऐसा कर्म जो नैतिकता, धार्मिकता तथा आध्यात्मिकता के दायरे के अंदर ही हो, जो स्वार्थ युक्त न हो, ऐसा कर्म अपने आप ही भक्ति बन जायेगा. कल शाम को वह माँ के स्वास्थ्य के बारे में सोचती रही, मन कहीं और लग ही नहीं रहा था, आज सुबह फोन किया पर मिला नहीं, ईश्वर से प्रार्थना की तो चैन मिला. ईश्वर पर विश्वास किये बिना मानव का काम चल ही नहीं सकता. उसी का बनाया हुआ यह माया जाल है सो सब कुछ उसी पर छोड़कर चिंतामुक्त रहने में ही भलाई है.

आज उसे संगीत क्लास में जाना है, अभ्यास तो पिछले एक महीने में दो-चार बार ही हुआ फिर भी टीचर के साथ अभ्यास करने से उत्साह बढ़ेगा ही. आज उसे उस नये शिशु से मिलने भी जाना था पर वर्षा की झड़ी जो जून के दफ्तर जाने से पहले लगी थी रुकने का नाम ही नहीं ले रही है. अभी उसे भोजन बनाना है और नन्हे को पढ़ाई में मदद करनी है, वह आजकल रोज रात को देर से सोता है सो सुबह देर से उठता है, पर जब से घर से वे आये हैं साधारणतया खुश रहता है, उसके मित्र भी पढ़ाई में व्यस्त हैं सो फोन से ज्यादा डिस्टर्ब भी नहीं करते. आज बहुत दिनों बाद ‘जागरण’ सुना, बाबाजी आज भक्तिभाव में विभोर होकर नृत्य करने लगे थे, उसे लगता है हजारों लोग जो घंटों वहाँ बैठते हैं यदि कार्य करें तो देश का कितना कल्याण हो. लोगों का खुद कल्याण हो, हो सकता है वे श्रमदान के लिए शिविर भी लगते हों.  कल माँ-पिता से फोन पर बात हुई, माँ ने दवाएं न लेने या कम करने का फैसला किया है, दवाइयाँ खाना तो किसी को भी पसंद नहीं पर जब दवा जीने की शर्त ही बन जाये तो कोई कैसे छोड़ सकता है.





Wednesday, May 28, 2014

द तिबतियन बुक ऑफ़ लिविंग एंड डाइंग


She is waiting for Nanha to vacate the bathroom he is there since last one hour, he has to go his school with jun to bring his new books and dress  for new class. Today in the morning when she saw the capsicum bed, became sad to see its bad condition but then recalled ‘The Gospel of Buddha’ immediately became cheerful again and arranged it to be cleaned. Everything depends upon the mental state ie attitude which one  takes  towards various things. Ma-papa are sitting outside in the sun.
कल शाम माँ ने रास्ते में, जब वे घूम कर आ रहे थे, पिता की कठोरता की शिकायत की. उनका स्वभाव बच्चों जैसा है, मानसिक विकास भी उनका वहीं तक सीमित है, स्कूल कभी गयी नहीं, सीधा-सपाट मन जो प्रेम से भरा है और मीठी बोली, पर घर में सभी उनकी अस्वस्थता व भोलेपन की वजह से उन पर हुकुम चलाना अपना अधिकार समझते हैं. कोई उन्हें गम्भीरता से नहीं लेता. इसका उन्हें दुःख था.

Today is Women’s day ! she is proud to be a woman. Just now read another chapters  in ‘The gospel of Buddha’ and ‘The Tibetan book of living and dying’. Both are full of knowledge and stimulate the mind. They say all are changing with this continuously changing world. Today  weather is cloudy and cold. Her inside is also dull , feeling some fullness in stomach and hips. May be this is due to not doing exercise properly today. Yesterday they had a get together with DPS people. Nanha ‘s  maths teacher praised him very much she was happy to hear all the praise coming from all the sides. It is a great satisfaction to have a son or daughter  who is intelligent and laborious. Today she could not practice music but still there is time.

Last night it rained so weather is pleasant now. Surroundings are green and clean, wind is cool and so is earth, wet and cool. Tibetan master has advised-
Always recognize the dream like qualities of life and reduce attachment and aversion. Practice good-heartedness toward all beings. Be loving and compassionate, no matter what others do to you. What they will do not matters so much when you see it as a dream. The trick is to have positive intention during the dream. This is the essential point. This is true spirituality.
William black said-
He who binds to himself a joy
 Does the winged life destroy
He who kisses the joy as it flies
Lives in eternity’s Sun rise.

Every thing around us is bound to change so it is futile to hope for permanence and security. To let go is to love. When one lose someone he realizes  that he loves him/her.

कल उसने कुछ नहीं लिखा, ऐसा लगा जैसे लिखने को कुछ है ही नहीं. इस वक्त लेकिन मन में कितना कुछ है. सुबह छह बजे से कुछ पहले ही उठी, कल शाम को घर से जनवरी का लिखा खत आया, महीनों बाद लेकिन पूरा नहीं पढ़ा, उसके बाद का खत भी आ चुका है और फोन से बात भी हो चुकी है सो पत्र पढ़ने का उत्साह ही नहीं हुआ. वैसे भी घर पर मेहमान आये हुए हों तो दिमाग एक ही तरफ रहता है. परसों वे लोग यानि माँ-पापा वापस जा रहे हैं सो उसके बाद ही सभी पत्रों का जवाब दे पायेगी. मन की सहज स्वाभाविक स्थिति देर तक नहीं रह पाती, कभी-कभी शिकायती हो जाता है, एक क्षण में कैसे जीया जाता है कल यही पढ़ रही थी पर थोड़ी देर तक ही याद रहता है फिर सुविधाजीवी मन थोड़ी सी असुविधा भी सहन नहीं कर पाता और जाले बुनने लगता है.
वह कल का खत उसने आज पढ़ा, मन आर्द्र हो उठा है, पिता ने उसके उस पहले पत्र में व्यक्त भावों की कितनी अच्छी तरह समझा और जवाब दिया और वह सोचती रही कि उसका पत्र बिना जवाब के रह गया. डाकविभाग की बहुत बड़ी जिम्मेदारी है लोगों के बीच गलतफहमी पैदा करने में. उसे भी अब एक खत लिखना है जो उम्मीद करती है वक्त से मिल जायेगा.

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Tuesday, March 25, 2014

बुद्ध पूर्णिमा का अवकाश


तीन दिन बाद नन्हे को कविता पाठ प्रतियोगिता में भाग लेना है, अभी तक उसने याद नहीं की है, लेकिन वह जानती है आधे घंटे में ही याद कर लेगा, उसकी स्मरण शक्ति अच्छी है. उसका एक मित्र कविता पाठ की तैयारी में नूना से सहयोग लेने आया है, हिंदी जानने वाली महिला के रूप में उसका नाम थोड़ा बहुत लोग जानने लगे हैं. आज वह कम्प्यूटर से सीखी रेसिपी के अनुसार कढ़ी बनाएगी, उन्हें एक सीडी निशुल्क मिला है, ‘कम्प्यूटर एट होम’ जिसमें कई भारतीय व्यंजन है. कल से जून ने उसे कम्प्यूटर पर काम करना सिखाना शुरू किया है. आज दोपहर लंच पर एक मित्र परिवार आ रहा है, वे लोग ट्रेन से दोपहर एक बजे तक पहुंचेंगे. आज सुबह वे छह बजे उठे, पहले ट्रांजिस्टर पर समाचार सुने फिर star पर निनाद  सुना और फिर ‘जी इंडिया’ पर सन्त वाणी सुनी. भारत के कण-कण में, जन-जन के मन में उपनिषदों की वाणी का प्रचार, प्रसार है. यह कोई रहस्य नहीं रह गया है, न ही कभी था, कि मानव का शरीर प्रतिक्षण बदलता रहता है, किन्तु भीतर कुछ है जो कभी नहीं बदलता, वही आत्मा है, और वही परमात्मा का अंश है.

नौ बजने को हैं, पिछले दो दिनों की हलचल के बाद आज घर शांत है, कल ‘बुद्ध पूर्णिमा’ के कारण नन्हा और जून दोनों की छुट्टी थी. शाम को वे क्लब गये extempore speech में नन्हे ने भाग लिया पर कविता पाठ में नहीं ले पाया. बहुत देर हो चुकी थी, और उन दोनों को नींद आने लगी थी. सुबह स्कूल भी जाना है यह कहकर जून थोड़ा नाराज होकर उन सबको घर ले आये, वह भी ठीक से सो नहीं पायी, नन्हे ने तैयारी की थी पर भाग नहीं ले पाया इसी बात का दुःख अलग-अलग तरीके से तीनों ही महसूस कर रहे थे. पर सुबह वे सामान्य थे. उस दिन क्लब से ‘अनिता देसाई’ की एक किताब लायी थी, आधी पढ़ ली है, अच्छी है पर कड़वी सच्चाईयों से भरी हुई, इस दुनिया में हरेक को अपना बोझ स्वयं उठाना पड़ता है. सभी को सहारा नहीं मिलता.

कल बहुत दिनों बाद चचेरे भाई-बहन का पत्र मिला, अच्छा लगा, आजकल पत्र आना एक दुर्लभ घटना हो गयी है. अभी कुछ देर पहले फिर से पढ़ा कि मानव अपने शुद्ध रूप में आत्मा है और सर्वशक्तिमान परमात्मा से अलग नहीं है किन्तु अहम् का पर्दा होने से वह इस संबंध को पहचान नहीं पाता, ध्यान का अभ्यास भी किया पर गहराई तक नहीं पहुंच सकी. अच्छी बातें जो सुनने और पढ़ने में अच्छी लगती है उनका चित्रण साहित्य में किस तरह कर सकती है. जीवन के शाश्वत मूल्यों का चित्रण बिना किसी आडम्बर और शब्दजाल के, स्वाभाविक रूप से. देसाई की किताब के दो पात्रों तारा और विमला में से वह स्वयं को तारा के निकट क्यों पाती है, जबकि वह  किसी भी तरह से आगे नहीं है, कमजोर, डरी-डरी, लाचार, किसी न किसी पर आश्रित अपनी इस छवि से उसे बाहर निकलना ही होगा.


कल से उसे जुकाम ने जकड़ा हुआ है, बदन में हरारत सी महसूस हो रही है, नाक लाल हो गयी है, आँखें भारी सी हैं पर इन सबके बावजूद उसकी जीवनी शक्ति ज्यों की त्यों बरकरार है, यानि अपने रोजमर्रा के कार्यों को करने का उत्साह भी है और इच्छा भी. यह बात अलग है कि थोड़ा धीरे-धीरे ही कर पा रही है. अपनी छात्रा को कम्प्यूटर पर science encyclopedia दिखाया, नये स्वीपर से बाहर का नाला साफ करवाया, वह काम करना ही नहीं चाहता, दीनदास नाम है और शरीर भी मजबूत है पर थोड़ा आलसी है, सभी उतना ही काम करना चाहते हैं जितना करने भर से काम चल जाये. आज सुबह समाचार नहीं सुन पायी. परमाणु विस्फोटों के खिलाफ किस देश ने क्या कहा और कितने प्रतिबन्ध लगाये, आजकल यही तो होता है. कल शाम वे एक मित्र के यहाँ गये वहाँ उनकी अमीर दीदी के किस्से सुनकर (हजारों रूपये के गहने-कपड़े) कैसा तो लगा, वह  कल यूँ ही जुकाम से परेशान थी, फिर बाल भी धुले नहीं थे, साड़ी भी पुरानी पहनी थी. खैर कपड़ों से ही कोई अमीर नहीं बन जाता है, उसे अपनी अच्छी साड़ियाँ संभाल कर रखने के बजाय  पहननी चाहियें इतनी सीख तो मिली. आज मौसम यूँ तो गर्म है पर उसे पंखे की आवश्यकता महसूस नहीं हो रही है शायद हरारत की वजह से. उनके पेड़ में छोटी छोटी अम्बियाँ लगी हैं, एक दो तोड़कर शाम को चटनी बनाएगी, पुदीना भी अभी हरा है और हरी मिर्च के पौधे भी भरे हुए हैं. यानि सभी कुछ ताजा और शुद्ध...

Friday, March 21, 2014

नये का आगमन


सुबह के सवा आठ बजे हैं, कुछ देर पहले उसने ध्यान करने का प्रयास किया, पर इस सत्य से सामना हुआ कि जब मन में कोई बात हो तो ध्यान बंट जाता है और सफलता नहीं मिलती. उसके मन में दो विचार चल रहे हैं, पड़ोसिन आज शाम को क्लब में होने वाली क्विज प्रतियोगिता में भाग लेने जा रही है उसे फोन करना है और कल हुई बच्चों की क्विज प्रतियोगिता का परिणाम पूछना है. दूसरी बात यह की उसके मुंह का स्वाद कुछ ठीक नहीं लग रहा कुछ चिपचिपा सा..सम्भवतः पाचन क्रिया ठीक न होने के कारण.

आज इतवार है, जून और नन्हा दोनों कम्प्यूटर के साथ व्यस्त हैं, जून के एक केरेलियन मित्र आये हैं, he is computer wizard ! कल वे क्लब गये, पड़ोसिन की टीम चौथे स्थान पर रही, उसने फोन किया, उसकी आवाज में ख़ुशी थी कुछ पाने का उल्लास ! जून प्रिंटर भी ले आये हैं, और दीपक चोपड़ा की किताब से बनाया उसका कैलेंडर दीवार पर लगाने के लिए तैयार है. she knows, laws are too good to apply ! but she will try.

आज उन्हें तिनसुकिया जाना है, नया टीवी खरीदने, कल पुराना ओनिडा सात हजार में बिक गया. कई वर्ष वह उनके साथ रहा, अब किसी और का घर आबाद करेगा. उसे याद है वे पुराने घर में थे, वह उन दिनों घर गयी हुई थी, जून ने पास ही रहने वाले एक दक्षिण भारतीय मित्र से खरीदा था, वे लोग तब कम्पनी छोड़कर जा रहे थे. कल पत्रों के जवाब का दिन है पर पिछले पन्द्रह दिनों से कोई पत्र नहीं आया है, उसने सोचा, अबसे महीने में एक बार ही करेगी पत्र लिखने का काम. आजकल न किसी के पास पत्र का जवाब देने का समय है और न ही पत्र पढने का. माँ-पापा भी उम्र के साथ-साथ सांसारिक मोह-माया से मुक्त हो रहे हैं. कल शाम वे क्लब नहीं गये, नन्हे को कम्प्यूटर का आकर्षण था और उसे इतवार की शाम का भारीपन लग रहा था. सुबह उठी तो फिर उससे पहले एक स्वप्न चल रहा था, मन एक मिनट के लिए भी शांत नहीं बैठता, नींद में भी नहीं, शायद यही जीवन है. मन का यही काम है कुछ न कुछ बुनते रहना. ध्यान करने बैठी तो वॉयल के कपड़े पर कढ़ाई दिखने लगी. creative mind की यही तो पहचान है. अज नन्हे का तीसरा टेस्ट है, उसे उनसे ज्यादा नये टीवी का इंतजार है.

फिलिप्स का नया टीवी बहुत अच्छा है, देखने में भी और चलाने में भी, आवाज काफी जोरदार है और तस्वीर को कई तरह से एडजस्ट कर सकते हैं, सारा काम रिमोट से होता है. कल वे नन्हे के आने से पहले घर पहुंच गये थे पर टीवी कार से घर में नहीं लाये थे, पर उससे रहा नहीं गया और उसके खाना खाने से पहले ही उन्होंने टीवी चलाया, शाम भर घर में ही रहे, वैसे भी गर्मी बहुत थी. नन्हा पढ़ाई करता रहा वह सुनती रही जून विश्राम करते रहे.कड़कती धूप में टूटी फूटी सडक पर गाड़ी चलाना इतना आसान नहीं था, वापसी में कह रहे थे कि गाड़ी बदलने का वक्त भी आ गया है, शायद इसी वर्ष वे नई कार भी ले लें. आज भी धूप तेज है, माली लॉन में घास काट रहा है, कल कहा था उसने कि सुबह पांच बजे आयेगा ताकि ठंडे वातावरण में ही काम खत्म कर  दे पर शायद उसकी नींद नहीं खुली होगी. कल उसने अपने जन्मदिन के लिए स्वयं ही एक उपहार लिया, नील रंग की तांत की साड़ी ! नन्हे के लिए नाईट ड्रेस और टीवी जो जून ने काफी देखभाल के बाद और मोलभाव के बाद ही लिया. एक दिन एक मित्र के यहाँ बैठे-बैठे ही उनके मन में विचार आया कि पुराना अब निकाल देना चाहिए, हर कार्य पहले एक विचार ही तो होता है.



Wednesday, February 26, 2014

शिवरात्रि का अवकाश


कल ही वह दिन था, जिसके लिए इतने दिन से तैयारी चल रही थी, वह लगभग सारा दिन व्यस्त रही, सुबह का थोड़ा वक्त, दोपहर के दो घंटे और पूरी शाम वहीं बीती, बल्कि रात्रि को लौटने में उन्हें आधी रात हो गयी थी. नन्हा गहरी नींद में सो रहा था. उसने असम सिल्क की साड़ी पहनी और एक कमरे की चाबी भी उसे दी गयी थी, जिसकी देखभाल उसे करनी थी. बहुत सी समर्पित सदस्याएं थीं जो बड़ी लगन से सब काम कर रही थीं. आज फिर वह क्लब गयी और एक सखी से मंगाई लकड़ी की बड़ी मेज उनके यहाँ वापस भिजवाने का प्रबंध किया. शाम को वहाँ बधाई देने जाना भी है, उन्होंने एक पुरस्कार जीता है, तीन दिनों के लिए दो बड़ों और दो बच्चों के लिए मुफ्त गोवा यात्रा का पुरस्कार.

आज उसे लग रहा है, जीवन एक वफादार दोस्त की तरह हर पल साथ निभाता है. खुशियाँ देता है, उन्हें महसूसने की सलाहियत भी और कितने नये किस्से कहानियाँ गढ़कर मन बहलाता है उसका असीम-अतीव अनोखा स्नेह भाव, जो वह अंतर में भर देता है, कोमल भावनाएं, सिहरन और शांत हृदय की हिलोरें, ऊपर उठने का मौका देती हैं. वह सम्भालता है अपने दोनों हाथों से संवारता है आज और कल को, वह मौका देता है दानी बनने का और उसकी खुद की झोली में तो न जाने कितने कितने उपहार भरे हैं, नीले आकाश पर टंके सितारे, हरी धरती पर चमकते मोती, कोई अनोखा गीत और संगीत !

जीवन प्रतिपल बदलता रहता है, यह नदी की उस धारा के समान है जिसमें गति है, स्पंदन है, गहराइयों और अनंत की चाह है न कि उस तालाब के पानी की तरह जो अपनी सीमाओं में बंधा हुआ है.

आज नन्हे ने कहा परीक्षाएं आने वाली हैं, वह घर में ज्यादा पढ़ सकता है, सो स्कूल नहीं जायेगा, पर उस समय भूल ही गया कि आज स्कूल में निबंध प्रतियोगिता होनी थी. उसकी छात्रा का कोर्स भी पूरा हो गया है. आज संगीत कक्षा उनके घर में होगी. सुबह जून के जाने के बाद समाचार सुने, वही चुनाव सम्बन्धी और उत्तर प्रदेश के संवैधानिक संकट के समाचार, फिर zee पर सुधांशु जी महाराज का प्रवचन आ रहा था, बहुत अच्छी बातें कहीं उन्होंने, अच्छे भाव का मन में प्रस्फुरण होना कभी-कभी ही होता है सो ‘शुभस्य शीघ्रम’ का पालन करते हुए उस कार्य का सम्पादन कर ही लेना चाहिए. सात्विक लहरें मन में यदा-कदा ही उठती हैं जैसे वसंत ऋतु में वाटिका से उठने वाली सुवासित पवन ! पौधों को सहेज रही थी कि जून आ गये, आज उन्हें जल्दी जाना था. कल फोन से घर पर बात की, सासु माँ की आवाज ख़ुशी से भरी हुई थी, वहाँ इतनी परेशानियों को सहकर भी वे लोग खुश हैं, यह इन्सान की जिजीविषा का ही तो परिणाम है, मानव मन की विचित्रता पर ही तो आज प्रवचन में कहा गया - यह ऊंचा उठे तो आकाश की ऊँचाइयां भी कम हैं और गिरने को आये तो पाताल की गहराई भी कम पड़ेगी.

कल सुबह जब सारे कार्य हो गये तो जून की बात याद आयी कि वह घर पर पत्र लिख दे जिसमें सासु माँ को होली पर साड़ी खरीदने के लिए कहना था, क्योंकि जो पार्सल उन्होंने भेजा था, खुला हुआ मिला और साड़ी गायब थी. उसने एक के बजाय दोनों घरों पर पत्र लिखे. फिर कुछ देर टीवी पर ‘हम पांच’ देखा, पूरी टीम बाँध लेती है और एक बार देखना शुरू कर दें तो पूरा देखे बिना मन नहीं मानता. जून आज सुबह तीन दिनों के लिए ‘शिकोनी’ गये हैं, इस समय जोरहाट पहुंचने वाले होंगे, नन्हा आज घर पर है, आज शिवरात्रि का अवकाश है. मौसम ठंडा है, बादलों की वजह से पूरे घर में बल्ब जल रहे हैं. माँ होतीं तो पीछे आंगन में या बरामदे में चारपाई पर बैठतीं कि सुबह हो गयी है इसका पता तो चले.

जून के बिना यह शाम कितनी सूनी-सूनी लग रही है, दिल है कि बैठा जा रहा है, हाथ-पाँव ठंडे हो रहे हैं और आँखें पता नहीं क्या तलाश रही हैं, मालूम नहीं था कि जून के बिना वक्त काटना इस कदर भारी होगा, दिन भर तो ठीक ही रहा, नन्हे को पढ़ाने में कुछ टीवी देखने में गुजर गया पर शाम...लम्बी हो गयी है, फोन भी नहीं मिला, यूँ शाम को उन्होंने फोन किया था, नम्बर भी दिया था पर अभी करने पर नहीं मिला, कल सुबह बैक डोर पड़ोसिन के यहाँ जाना है, शाम को मीटिंग है, सो बीत जाएगी, वैसे, कमेटी की मीटिंग में जाने का उत्साह दिनोंदिन कम होता जा रहा है. अब उसे कोई ऐसा कार्य ढूँढना चाहिए जिसमें एक घंटा आराम से बीत जाये और याद न सताये.


Saturday, January 11, 2014

प्रिंसेस डायना


कल कुछ महिलाओं के साथ नूना क्लब की किन्हीं सदस्या के यहाँ गयी, जिनके पति रिटायर हो गये हैं. उन्हें लेडीज क्लब की तरफ से विदाई देनी थी. वह लिख रही थी कि एक कीड़ा पहले पंखे से टकराया फिर आकर उसपर गिरा, उस पल वह कुछ अस्त-व्यस्त सी हो गयी, उस दिन शाम को उनके माली ने विजिलेंस के आदमियों द्वारा उसकी दावली ले लेने व उसे लाठी से मारने की बात कही तो वह परेशान हो उठी थी, जून को भेजा, स्थिर नहीं रह पाती है हर स्थिति में, अर्थात sensitivity किसी हद तक बची हुई है. कल टीवी समाचारों में Princess Diana की मृत्यु की खबर सुनी तो स्तम्भित रह गयी, ज्यादा प्रचार ने ही उनकी जान ली, प्रेस फोटोग्राफर जो पीछे लगे थे, उन्हें अवश्य सजा मिलनी चाहिए.

कहीं से तेज दुर्गन्ध आ रही है, इतनी तेज कि उसमें साँस लेना भी मुश्किल है उसके लिए, पर बाहर बच्चे खेल रहे हैं, उन्हें खेल के सामने दुनिया की कोई बाधा बाधा नहीं लगती, उनके पड़ोसी भी टहल रहे हैं, शायद वह कुछ ज्यादा ही सेंसिटिव है. सामने वाले चाय बागान में शायद कोई जानवर मर गया है उसे उठाने कोई नहीं आया, दोचार दिन में खुद ही सड़कर मिटटी बन जायेगा मगर तब तक इस दुर्गन्ध को झेलना पड़ेगा.

कल उसकी पड़ोसिन भी उसके साथ गयी थी गाना सीखने, उसने अच्छा गाया और वह नर्वस होकर ठीक से न गा सकी, तभी से मन में वह बात घूम रही है, J Krishnamurti की किताब में ठीक ही पढ़ा था comparison is the sign of immature mind. कल शाम भी स्वयं को संयत न रख सकी और जून को एक पल के लिए परेशान कर दिया, आज सुबह अलार्म बजा तो एक झटके से उठ बैठी, पर ठीक नहीं लगा और एक पल को फिर लेटी तो आँख मुंद गयी. यूँ छोटी-छोटी बातें आत्मा को कलुषित करती चलती हैं और एक वक्त ऐसा आता है कि अपना चेहरा भी धुंधला दिखाई देता है. आज वह आंवले वाला बूढ़ा भी आया है, एक घंटा काम करके आंवले ले जायेगा. उनका पेड़ भी तो लद गया है इतना बोझ सहन नहीं कर पायेगा. आजकल वह ‘हरीश भिमानी’ की लता मंगेशकर पर  लिखी पुस्तक पढ़ रही है, लेखक ने बहुत मेहनत की होगी इसे लिखने में. जून कह रहे हैं शनिवार को वे प्रीति भोज का आयोजन करें, उस दिन ‘गणेश पूजा’ का अवकाश भी है. नन्हे के यूनिट टेस्ट चल रहे हैं, दो टेस्ट पूरी तरह ठीक नहीं हुए, कुछ देर परेशान रहा फिर भूल गया, काश वह भी इसी तरह जल्दी से भूलना सीख पाती, यूँ सीख तो रही है वह, मंझले भाई के पत्र में यहाँ आने का कोई जिक्र न पाकर थोड़ा उदास हुई थी पर एक घंटे बाद ही उसे पत्र का जवाब भी दे दिया. कल जिस दुर्गन्ध से बचने के लिए पहले वे क्लब गये फिर एक मित्र के यहाँ, आज वह नहीं आ रही है.

आज सुबह जून ने उठा दिया सो दीदी से बात कर पाई, उन्होंने पत्र भी भेजा है, कल रात्रि घर पर शेष सबसे बात की थी, नये घर में ‘गृह प्रवेश’ १३ फरवरी को हो रहा है, वे लोग जा तो नहीं सकते उपहार भेजेंगे. कल लाइब्रेरी से Fire and Rose किताब लायी है, उर्दू के आधुनिक शायरों की नज्मों से सजी हुई. उर्दू शायरी को उसी भाषा में पढ़ सकती तो बेहतर होता या फिर हिंदी में, पर अपने देश में अंग्रेजी का सहारा लिए बिना एक कदम भी आगे नहीं चल सकते. शनिवार को उनके यहाँ भोज का कार्यक्रम तो टल गया है, उसी दिन एक मित्र ने अपनी बेटी के जन्मदिन पर बुलाया है, उसी दिन क्लब में debate भी है. वे पहले क्लब जाकर फिर पार्टी में जायेंगे.