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Tuesday, June 2, 2020

सरसों के फूल



नया वर्ष ! आज सफाई करते समय उसे वर्षों पुरानी एक डायरी मिली, जब वह कालेज के अंतिम वर्ष में थी.  उसके पहले पन्ने पर लिखा है, आज प्रथम जनवरी है. कल रात्रि टीवी पर नए वर्ष के विशेष कार्यक्रम देखे सो वर्ष के प्रथम दिन ही देर से उठी. आज भी तो ऐसा ही हुआ. उस समय भी उसे लगा था कि एक ही दिन में पिछला वर्ष पुराना कैसा हो गया. वही आकाश, वही धरती बस मानव का बनाया हुआ सन ही तो बदला है. एक वर्ष गुजरता है तो उनकी उम्र का एक वर्ष और बढ़ गया, नहीं घट गया..., फिर भी नया साल मुबारक हो !  एक पुस्तक में एक पंक्ति पढ़ी थी उसने उस दिन, जैसे या जो कुछ आप करते हैं, वही आप हैं, पढ़कर चौंक गयी थी एकबारगी, पर बाद में लगा ठीक ही तो है किसी के मन में क्या है यह उसके कर्मों से ही तो जाहिर होता है. यदि मन में आदर्श भरे हों पर आचरण उनके अनुकूल न हो तो, आज भी वाचा, मनसा, कर्मणा एक होने की बात वह कहती है. जितना -जितना भाव, विचार तथा कर्मों में एकता होती जाएगी जीवन से दुःख विदा होते जायेंगे. 

दो जनवरी को मंझले भाई का जन्मदिन होता है, उस समय फूफाजी भी जीवित थे, दोनों के लिए अपने-अपने घरों में गाजर का हलवा बना करता था. आज भी यह प्रथा कायम है, सभी भाई-बहनों के जन्मदिन पर माँ एक विशेष व्यंजन अवश्य बनाती थीं. उन दिनों पिताजी उन्हें रविवार को गांव-खेत में घुमाने ले जाया करते थे. सर्दियों की उतरती हुई धूप में खेतों की पगडंडियों पर चलते हुए वे सब बेवजह ही ख़ुशी से भरे रहते थे. इतवार की फिल्म भी सब साथ बैठकर देखते थे, उस दिन सिकन्दर देखी थी, पृथ्वीराज कपूर सिकन्दर बने थे और सोहराब मोदी पोरस, दोनों बड़े कलाकार ! उन दिनों रेडियों पर कवि सम्मेलन आया करते थे, शिव कुमार की एक कविता की कुछ पंक्तियां भी उसने लिखी हैं - 

हवा बंधी पर नए बन्धन  में गुजर गयी पगडंडी से 
पीले-पीले चेहरे वाले हिला किये सरसों के फूल 
शायद किसी किशोरी की वेणी आमन्त्रित इन्हें करे 
देर रात तक जगते रहते यह छलिये सरसों के फूल
मौसम के अपशब्द सहे अपमान सहा हँसते-हँसते
खेतों के सुकरात बने खूब जिए सरसों के फूल !

दस दिन बाद कालेज खुलना था, गयी भी, किन्तु हाकी मैच जीतने की ख़ुशी में बन्द था. कम्पनी बाग़ के रास्ते से बेरी बाग चली गयी. कम्पनी बाग़ बिल्कुल वैसा ही लगा जैसा उस समय से दस वर्ष पहले था, उसके बचपन की कितनी ही संध्याएं वहाँ गुजरी हैं. वहां एक छोटी लड़की से भेंट हुई, कितनी प्यारी और समझदार ! उस नन्ही बच्ची में सौंदर्य की सराहना करने की शक्ति है, हवा में भागते हवा से खेलते बोली, हम कबूतरों की तरह उड़ रहे हैं. वह नदी को सराह सकती थी, उसने ठंडी हवा और उसकी मित्रता को  एक वाक्य कहा - तुम अच्छी लगती हो ! आज भी याद  करे तो उस सुबह के दृश्य उसकी आँखोँ  के सामने आ जाते हैं. अगले पन्ने पर भी किसी कविता की चार पंक्तियाँ लिखी हैं -

आँखें पगडंडी पर रख दीं दिया रख दिया देहरी पर 
तुमने मेरे इंतजार में लट में क्यों उलझाई रात 
पलकें हैं बोझिल-बोझिल और चेहरे पर सिंदूर लगा 
सुबह पूछती है सूरज से बोलो कहाँ बितायी रात !

Tuesday, July 30, 2019

बरसाती मौसम



पिछले तीन दिनों से लगातार वर्षा हो रही है. दिन और रात दोनों समय. कल सुबह टहलने निकले थे पर बारिश तेज हो गयी, छाता भी काम नहीं आया, सो घर लौट आये. आज सुबह कुछ समय के लिए थमी थी, पर इस समय मूसलाधार पानी बरस रहा है. असम में सर्दियों के बाद सीधे ही बरसात का मौसम आ जाता है, बसंत और गर्मियों को आने ही नहीं देता. वे बीच-बीच में अपना काम करते हैं जब वर्षा कुछ समय के लिए विश्राम लेती है. शाम को वे घर में ड्राइव वे पर कुछ देर टहलते रहे, आकाश घने बादलों से ढका था. पेड़-पौधे फूल सभी पानी में तृप्त नजर आ रहे थे, पूरी तरह से तर ! सुबह जून ने नाश्ते में अप्पम बनाये, फिर फोन पर उसकी रेसिपी भी बताई, उन्हें दक्षिण भारतीय व्यंजन बहुत पसंद हैं.

आज वह टूटा हुआ दांत निकलवाया, तोड़कर निकालना पड़ा, दो इंजेक्शन दे दिए थे डेंटिस्ट ने सो दर्द नहीं हुआ. इस समय एक अनोखी ध्वनि सिर के ऊपरी भाग में उसे सुनाई दे रही है. दर्दनाशक दवा डाक्टर ने दे दी है, जो दर्द न होने के बावजूद वह ले चुकी है, यह सोचकर कि उस दवा का अवश्य ही कुछ और लाभ भी होता होगा. परमात्मा की कृपा अपार है.

आज सुबह उठे तो तेज वर्षा और आंधी से सामना हुआ. बिजली भी चली गयी, पर बारिश फिर रुक गयी. अँधेरे में तैयार होकर वे टहलने निकले, वापस आये तो बिजली आ गयी थी. कल शाम फ्रिज को डीफ्रॉस्टिंग के लिए बंद किया था, सारा सामान बाहर निकाल दिया था, सहेजा. तब तक जून के एक सहकर्मी व उनकी पत्नी आ गये, उनके साथ आधार कार्ड के लिए बैंक जाना था. बैंक मैनेजर छोटे भाई के परिचित हैं, उनकी ही मदद से आधार कार्ड बनने में कुछ आसानी हो रही है. लौटते-लौटते लंच का समय हो गया, जल्दी-जल्दी भोजन बनाया. दोपहर को मृणाल ज्योति गयी. वहाँ से लौटी तो एक सखी का फोन आया, उसकी बिटिया को पिछले चार-पांच दिन से बुखार है, उसे अस्पताल ले जाना है, एक घंटा लग गया. लौट कर आयी तो योगाभ्यास के लिए महिलाएं आ चुकी थीं. दिन कैसे बीत गया पता ही नहीं चला.

तीन बजे हैं दोपहर के, आज मौसम अच्छा है, धूप खिली है. कल 'विश्व महिला दिवस' है, कुछ पंक्तियाँ लिखी हैं, अभी कुछ सुधार करना शेष है. महिलाओं के सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक अधिकारों के प्रति सजग कराने के लिए मनाया जाता है यह दिवस, उनके प्रति सम्मान दिखाने के भी एक अवसर है यह दिन ! आज सुबह उठे तो आकाश में बादल थे, पर चाँद भी झलक रहा था. सुबह नाश्ते करने के बाद अस्पताल गयी. वापस आई तो दस बजे थे, बिटिया अब ठीक है. सखी को उसके परीक्षा न दे पाने की कोई फ़िक्र नहीं है, पता नहीं यह ठीक है या नहीं, पर इतना ज्यादा लाड़-प्यार बच्चे को कमजोर ही बनाता है. आज शाम क्लब में मीटिंग है. सेक्रेटरी आज ही बाहर से लौट रही है. नैनी ने बताया उसका बेटा स्कूल जाने लगा है, समय कितनी तेजी से बीत रहा है. पिताजी का फोन आया, उन्हें भी सबकी याद आती है, आज वह अकेले हैं, शाम को जून उनसे पुनः बात करेंगे.

Wednesday, June 26, 2019

सिस्टर निवेदिता



ठंड बढ़ गयी है. आज पहली बार इन सर्दियों में धूप में बैठकर लिख रही है. बाहर निकली तो एक बगुला बैठा था, हल्की सी आहट से ही उड़ गया, कितना संवेदनशील रहा होगा. सुबह उठे तो कोहरा बहुत घना था, तापमान बारह डिग्री था. लेकिन उसी ठंड में वे टहलने गये, आकाश पर तारे थे और सब कुछ शांत था. आज जून को लंच पर घर नहीं आना है, इसलिए किचन बंद है. कल शाम का भोजन भी फ्रिज में पड़ा है. जब भूख ज्यादा सताएगी तभी कुछ खाएगी. पिछले दिनों स्वप्न में खाने-पीने की वस्तुएं देखीं. मन भोजन के प्रति कितना आसक्त रहता है, जब तक देह भाव बना हुआ है भोजन के बिना वे रह सकते हैं, यह विचार भी नहीं आ सकता. वे भूख के बिना भी खाते हैं, केवल स्वाद के लिए भी खाते हैं. चाय से अम्लता होती है, इसका अनुभव होने के बाद भी उसके प्रति मोह बना ही हुआ है. कितने ही साधु-संत ऐसे हुए हैं जिन्होंने क्षुधा पर विजय पायी है. मन निर्विकल्प स्थिति में रहे इसका निर्णय भी अडिग नहीं रहता. पुरानी स्मृतियाँ कब मन को घेर लेती हैं, ज्ञात ही नहीं होता, स्मरण आते ही मन वर्तमान में आ जाता है पर इतनी देर ऊर्जा का व्यर्थ ही अपव्यय होता है. नैनी के बच्चे आंवला चुनने आए हैं, जो घास पर गिरे ही रहते हैं. कल शाम की मीटिंग ठीक थी, अध्यक्षा का भाषण हमेशा की तरह बहुत लम्बा था. अगले हफ्ते वह उन तीन महिलाओं से मिलेगी जिनका विदाई समारोह होना है, सभी के लिए कुछ लिखेगी. मृणाल ज्योति की पत्रिका पढ़ी, और वार्षिक रिपोर्ट भी, आज मीटिंग है, अब शायद कुछ ही समय और वह उनके साथ काम कर पाएगी. सुबह एक सखी को व्हाट्स एप पर संदेश भेजा, उसने कोई इमोजी भेजा जो उसके फोन पर खुल ही नहीं पाया. मन में विचार उठा पता नहीं क्या भेजा है.यही तो माया है, महामाया की उपासना करने से माया के पार जाया जा सकता है.

कुछ देर पहले ठंड थी, कोहरा था और अब सूरज निकल आया है, धूप कितनी भली लग रही है. आज हवा भी चल रही है. सुबह पूजा के बाद जल डालने आई तो सूर्य देव बादलों के पीछे छिपे थे, देखते ही देखते प्रकाश झलकने लगा, एक ही चेतन सत्ता से यह सारा जगत बना है, गुरूजी का यह वाक्य स्मरण हो आया. उनके भीतर जो तत्व है वही सूरज की गहराई में में है, उस तक संदेश पहुँच जाता होगा तत्क्षण ! आज शनिवार है, कल रात सोने में कुछ देर हुई, जून के बहुत पुराने मित्र भोजन के लिए आए थे, लग रहा था पहले के दिन लौट आए हैं. इधर-उधर की बातें भी ज्यादा हुईं. अख़बारों की सुर्खियाँ, राजनीति, कम्पनी की नई नीतियाँ, देश का वातावरण आजकल मिश्रित है.. देश जैसे बंट रहा है, गणतन्त्र में ऐसा होता ही है, सबको अपनी बात कहने का अधिकार है आदि आदि.  क्लब से किसी कार्यक्रम में गाने की आवाजें भी आ रही थीं. सुबह उठने में कुछ देर हुई. आज नये वर्ष का छठा दिन है. पिताजी से बात हुई. उन्होंने अपनी उम्र के कारण होने वाली तकलीफों को ख़ुशी-ख़ुशी स्वीकार कर लेने की बात कही. आत्मा का अल्प मात्र भी अनुभव हुए बिना कोई ऐसा कह नहीं सकता, अपने भीतर शक्ति और शांति के उस अमृत स्तम्भ को पाकर ही कोई निर्भार हो सकता है.

अब दोपहर हो गयी है. धूप में वे अब भी बैठे हैं. लॉन के कोने में, शायद एक दो घंटे और रहेगी धूप. आज लंच में कर्ड-राईस बनाये थे. शाम के लिए बगीचे से मेथी व हरे प्याज के पत्ते तोड़े हैं मकई के आटे में मिलाने के लिए. इस माह गुरूजी के जीवन पर लिखी उनकी छोटे बहन भानु दीदी की पुस्तक प्रकाशित हो रही है. जून ने आज ही आर्डर कर दी है. इंटरनेट पर बनी मित्र वाणी जी की कविता पर अपने विचार अभी तक नहीं लिखे हैं, उन्हें इंतजार होगा, समय कितनी शीघ्रता से गुजर जाता है, वे वहीं खड़े रह जाते हैं. योग सीखने आने वाली एक सखी ने सिस्टर निवेदिता द्वारा लिखी एक पुस्तक उपहार स्वरूप दी है. स्वामी विवेकानन्द के भीतर जगत के कल्याण की कितनी तीव्र पिपासा उनके गुरू ने जगाई थी. जैसे उनके गुरूजी सेवा के लिए प्रेरित करते हैं. उनके कर्म सहज हों, निस्वार्थ हों और कतृत्व अभिमान न हो. मनसा सेवा तो हर क्षण की जा सकती है. जब भी उनके मन अस्तित्त्व के साथ एक हो जाते हैं, वे प्रेम ही तो बहने देते हैं स्वयं के माध्यम से !

Friday, February 15, 2019

पर्वतों की रानी



बचपन से लेकर आज तक कई बार इस घर में आना हुआ है और हर बार दीदी ने प्रेम से स्वागत किया है. मेज पर ढेर सारे व्यंजन और आग्रह करके खिलाना. जीजाजी भी उतना ही ध्यान रखते हैं. बड़ी भांजी भी अपनी बेटी के साथ आई हुई थी. आज दोपहर बारह बजे वे उत्तराखंड की राजधानी के लिए चले, ट्रैफिक जाम के कारण दो बजे की बजाय साढ़े तीन बजे यहाँ पहुँचे. भोजन के पश्चात बड़ी बुआ से मिलने गये. चचेरी बहन व उसकी बिटिया भी मिली, पुत्र बड़ा हो गया है, सो नहीं आया. मौसम यहाँ ठंडा है पर घर बंद है सो भीतर ठंड का अहसास नहीं हो रहा है. छोटे भाई के कई रूप आज देखने को मिले, सहज और आनंदी भी, परेशान और शिकायती भी. परमात्मा सारे विरोधों को स्वीकार करता है. पिताजी ने सुबह अपने हाथों से चाय बनाकर दी, कल रात को बिस्तर लगाया. उनकी उम्र में इतना ऊर्जावान और प्रेम से भरे रहना आश्चर्य की बात है !


होटल के इस शांत कमरे में बैठकर लिखना एक सुखद अनुभव है. एयर कंडीशनर की आवाज के अलावा कोई ध्वनि नहीं है. कमरे का तापमान न ज्यादा है न कम. बाहर लॉन में अब धूप चली गयी है, ठंडी हवा है और पहाड़ों पर सफेद कोहरे का आवरण छा गया है. आज सुबह साढ़े दस बजे वे दीदी के घर से रवाना हुए और पौने दो बजे मसूरी के इस सुंदर स्थल पर पहुँच गये. लम्बी गैलरी से चलते हुए कमरे तक, फिर सामान रखकर टैरेस पर, जहाँ धूप में बैठकर भोजन का आनंद लिया. उसके बाद दूर तक फैले सुंदर बगीचे और बच्चों के पार्क में घूमते हुए सुंदर दृश्यों की तस्वीरें उतारीं. जून को रजिस्ट्रेशन के लिए जाना था, वह यहाँ एक कांफ्रेस में भाग लेने आये हैं. वह कमरे से बाहर बने लॉन में कुछ देर बैठकर आशापूर्णा देवी की पुस्तक ‘चैत की दोपहर में’ पढ़ती रही, एक छोटा सा नंग-धड़ंग बच्चा जिसकी माँ को मसूरी में मोच आने से व्हील चेयर पर आना पड़ा था, खेल रहा था और पौधे उखाड़ रहा था. बाद में उसे डांटने पर जोर-जोर से रोने लगा. बाहर ठंड बढ़ जाने पर वह कमरे में आ गयी, केतली में पानी गर्म किया एक कप काफी बनाई. पिताजी से फोन पर बात की. दीदी का व्हाट्सएप पर वीडियो कॉल आया. और अब उसके पास समय ही समय है. चाहे जो लिखे या पढ़े. चाहे तो बाहर घूमने भी जा सकती है, पर ठंड अवश्य ही बढ़ गयी होगी. ऊंचे-ऊंचे पहाड़ों पर बने मकान तथा नीचे गहरी घाटियों में घने जंगल, बहर का दृश्य बहुत सुंदर है. उसने दीदी-जीजाजी, जून, छोटे भाई-भाभी, पिताजी, बड़े भाई, मंझले भाई-भाभी सभी के लिए उपजे मन के भावों को छोटी-छोटी कविताओं में पिरोया. सबसे मिलकर जो ख़ुशी भीतर उपजी थी उसी को शब्दों में ढाल दिया तो ख़ुशी कम होने के बजाय और भी बढ़ गयी. ख़ुशी का गणित ही कितना अलग है, यह बांटने से बढती है. ऐसे ही दुःख भी बांटने से बढ़ता ही है, उसे तो चुपचाप हृदय में रख लेना होगा. 

Wednesday, February 6, 2019

लकड़ी के गिलास



चार दिनों बाद परसों वे यात्रा से लौट आये. सोचा था कि रसोईघर व स्टोर में सफेदी का कार्य पूरा हो चुका होगा पर अभी भी एक दो-दिन का कार्य शेष था. आज सुबह मृणाल ज्योति गयी नये वर्ष में पहली बार. जून ने कुछ डायरी दी थीं उन्हें देने के लिए और एक पुराना लैप टॉप. उसने बच्चों को योग कराया और बिस्किट बांटे. वापसी में बाजार में लाल गाजरें मिल गयीं, यहाँ कम ही मिलती हैं, ज्यादातर नारंगी रंग की चिकनी गाजरें होती हैं. दोपहर को स्टोर में सब सामान लगाया. गाजर का हलवा बनाया. शाम को क्लब में मीटिंग हैं, योग कक्षा में आने वाली महिलाओं में से जो वहाँ जाएँगी, उन्हें अपने शाम के कार्य पहले निपटाने होंगे. योग तो छोड़ा जा सकता है पर दूसरे कार्य कहाँ ? तभी तो जीवन में योग फलीभूत नहीं होता. आज जून को गोहाटी जाना था, घर से साढ़े बारह बजे से पहले ही चले थे, पर अभी तक एअरपोर्ट पर ही बैठे हैं सभी यात्रीगण, फ्लाईट अब सात बजे जाएगी.

आज निकट के एक गाँव में मृणाल ज्योति की एक कर्मी के विवाह का निमत्रंण था, लगभग ढाई घंटे वहाँ रुकी. पहली बार असमिया शादी के ‘जुरून’ रस्म को इतने निकट से देखा. अच्छा लगा. उन्हें भी यह रस्म निभानी होगी. जून से बात हुई वह गोहाटी में ब्रह्मपुत्र नदी पर बने पुल पर ट्रैफिक में अटके हुए थे, कहने लगे एक-डेढ़ घंटा ज्यादा लग जायेगा गंतव्य तक पहुँचने में. सुबह एक सखी का फोन आया, शाम को आग जलाकर उसी में सिकी रोटी खाने के लिए, उसे इस कार्य में दक्षता हो गयी है.

सुबह उठते ही ध्यान में बैठी. भीतर जैसे कोई फिल्म चलने लगी हो. पुराने जन्म के सिलसिले जो इस जन्म तक चले आये हैं, दिखे, साक्षी भाव से सबको देखते रहो तो कुछ भी नहीं होता. दोपहर को नैनी के घर से लड़ने की आवाजें आ रही थीं, पर कोई प्रतिक्रिया नहीं हुई भीतर. आत्मा में रहो तो कितना चैन है, कुछ नहीं छूता. मैत्री, करुणा, मुदिता व उपेक्षा सहज ही घटते हैं. जो कर्म प्रारब्ध के रूप में फल देने के लिए प्रस्तुत हो चुके हैं, वे क्षीण हो जाते हैं, जब कोई साधना करता है. जून गोहाटी से लौट आये हैं, बांस के बने दो कलात्मक मूढ़े लाये हैं और भी कुछ कलापूर्ण वस्तुएं, जैसे लकड़ी के गिलास, एक गैंडा, बेंत की टोकरी आदि, आने वाले मेहमानों के लिए सुंदर उपहार ! टाटा स्काई पर गुरूजी को सुन पाती है आजकल, अच्छा लगता है, वे ध्यान भी करवाते हैं. जिसे सुनते-करते वे प्राणायाम भी कर लेते हैं. कल शाम उस सखी के यहाँ आग में शकरकंदी भी भूनी, अच्छा रहा सारा कार्यक्रम, उस सखी में बहुत ऊर्जा है.

आज ठंड बहुत अधिक है. दोपहर के एक बजे हैं, वह लॉन में धूप में बैठी है. पीठ पर तपन महसूस हो रही है. एक योगाचार्य से सुना कि शरीर को जितना विटामिन डी चाहिए, उसके लिए कम से कम पौन घंटा धूप में रहना चाहिए. आज सुबह स्कूल गयी तो रास्ते में सह शिक्षिका ने जो बात बताई, उससे मन बेचैन है. कल अख़बार में भी ऐसी ही एक खबर पढ़ी. मानव के भीतर के पशुत्व को बताती बात, छोटे-छोटे बच्चों को उस पशुत्व का शिकार होने की बात. हर मानव के भीतर पशु भी छिपा है और देव भी, कोई किसे जगाना क्घहता है यह उस पर निर्भर करता है. उस शिक्षिका ने उसे बताया की वह परेशान है और अब उसने अपनी परेशानी उसे दे दी है. मालिन से पूछताछ करने के बाद ही जून को बताना होगा. यदि यह बात सच हुई तो आगे की कार्यवाही भी करनी होगी.   


Friday, April 27, 2018

शिवसूत्र



दोपहर के तीन बजे हैं. धूप अब कुछ ही देर की मेहमान है, इस समय ठंड ज्यादा नहीं है पर शाम होते न होते तापमान गिर जाता है. वह गुलाब और जरबेरा के मध्य हरी घास पर बैठी है. मालिन बगीचे में झाड़ू लगा रही है और उसकी बेटी क्यारियों में पानी डाल रही है. उसके इर्दगिर्द श्वेत धुंए सा पारदर्शी कोई आवरण छाया हुआ है जो गतिमान है तथा जिसके भीतर से देखने पर सामान्य दिखने वाली घास भी अति प्रकाशवान व सुन्दर हो जाती है. परमात्मा की लहर जैसे उसे छूकर जाती है, कितना दयालु है वह ! आज सुबह प्रार्थना की, वह उसे धैर्यवान बनाये, धैर्य की कमी के कारण उसे न जाने कितनी बार कितनी परेशानी उठानी पड़ी है. धैर्य की कमी का सीधा सा अर्थ है उस पर भरोसा न होना. कर्ता भाव जगते ही तो अधैर्य का जन्म होता है. शास्त्रीय ज्ञान को जीवन में उपयोग न कर सके तो उसका होना न होना बराबर ही है. लोभ की वृत्ति से भी छुटकारा पाना है. सद्गुरू के वचन सुनती है तो लगता है सब याद है पर वह मात्र स्मृति ही बन कर न रह जाये, जीवन में पग-पग पर उसका उपयोग हो सके.

संध्या के साढ़े पांच बजे हैं. आज का दिन कितना अलग रहा. सुबह देर से उठी, कल रात को क्लब से देर तक गाने की आवाजें आ रही थीं, देर से सोयी, वैसे भी जबसे जून गये हैं, रात्रि को सोने में देर हो ही जाती है. दोपहर को ग्यारह बजे क्लब गयी, इतने वर्षों में पहली बार बीहू पर होने वाले खेल देखे. पारंपरिक भोजन किया, जो स्वादिष्ट था और गर्म था. आलू पिटकी, केले के फूल की सब्जी, पालक पनीर, दाल बड़ा और दो तरह के चावल और दाल. वापस आकर बच्चों के लिए चने बनाये और उन्हें भी खेल खिलाये. जून आज रामेश्वरम गये हैं, शाम तक तमिलनाडू में अपने निवास पर आ जायेंगे, और दो दिन बाद यहाँ. आज ‘शिवसूत्र’ पर लाई किताब पढ़ी. ओशो का प्रवचन डाऊनलोड किया इसी विषय पर, कल सुनेगी. उनके जीवन पर आधारित एक फिल्म भी बनी है. सद्गुरू ने भी शिवसूत्र पर प्रवचन दिए हैं, पहले टीवी पर सुन चुकी है. सुबह पुनर्जन्म पर एक टेलीफिल्म देखी. शाम को क्लब जाना था, फिर एक सदस्या के घर, इस बार के क्लब के वार्षिक उत्सव में वे एक ‘वाल मैगजीन’ प्रकाशित करने वाले हैं, वह बहुत रुची से बना रही है. सब मिलाकर तीन घंटे वहीं लग गये. दो दिन बाद उन्हें यात्रा पर निकलना है. नैनी की बेटी कई बार कह चुकी है, उसे नृत्य के लिए बुलाये, बच्चों को नाचना अच्छा लगता है और उनके साथ नाचना उसे भी ! अब सोमवार को ही सम्भव होगा या फिर कोलकाता से आने के बाद.

सुबह भी काफी कोहरा था, एक छोटी सी यात्रा की राजगढ़ की आज. मृणाल ज्योति ने विशेष बच्चों एक लिए अपने स्कूल की एक शाखा वहाँ खोली है, उसी का समारोह था. दोपहर ढाई बजे वह लौटी और उसके कुछ देर बाद जून भी आ गये. ढेर सारा सामान लाये हैं हमेशा की तरह. तमिलनाडू के चेट्टीनाड से तीन साड़ियाँ भी. बगीचे से मेथी, फूल गोभी व हरे प्याज तोड़े, और रात के भोजन में उसका पुलाव बनाया, जून को बहुत पसंद है.

आज सुबह अँधेरे में खिड़की का पर्दा हटाते समय एक फ्रेम टूट गया, एक पिछले हफ्ते टूटा था, इसी तरह पर्दे के ही कारण. उसे प्रकाश कर लेना चाहिए सुबह उठते ही कमरों में, जैसे भीतर प्रकाश न हो तो मन में अँधेरा छा जाता है, वैसे ही बाहर भी प्रकाश अति आवश्यक है. आज मृणाल ज्योति जाना था, कम्पनी के डायरेक्टर्स की पत्नियाँ यहाँ आई हुई हैं, मुख्य अधिकारी की पत्नी उन्हें लेकर जाने वाली थी. वहाँ एक पुरानी परिचिता मिलीं, कुछ वर्ष पूर्व वे लोग यहाँ से चले गये थे, गोरी-चिट्टी हँसमुख और पूर्णतया स्वस्थ नजर आती थीं, पर उन्हें अब कैंसर हो गया है, कृशकाय हो गयी थीं, पर मुस्कान वैसी ही है. बच्चों से मिलकर सभी खुश हुए. वहीं से उसने कुछ उपहार खरीदे. कल उन्हें असमिया सखी के पुत्र, जो नन्हे का मित्र भी है, की शादी में जाना है, नन्हा भी एक दिन के लिए आएगा. अभी पैकिंग शेष है. धूप में बैठकर लिखना अच्छा लग रहा है. पंछियों की आवाजें आ रही हैं तथा घास काटने की मशीन की भी कभी-कभी ! शेष समय मौन है. आज से नैनी की बेटियों ने स्कूल जाना शुरू कर दिया है, सुबह दोनों चहकती हुईं स्कूल ड्रेस पहनकर आयीं थीं, उसने दोनों की तस्वीर उतारी.   

Wednesday, July 12, 2017

किताबों वाला घर


जून का महीना भी कल आरम्भ हो गया. मौसम काफी गर्म है. आज स्कूल गयी थी, करेंट नहीं था, बच्चों को पसीना बहाते हुए व्यायाम/आसन कराए. छोटे बच्चे बहुत आनंद लेते हैं. एओल की टीचर का फोन आया, वह कल से आने वाली थीं, पर अब लडकियों को वहीं बुलाया है. कल से वे जाएँगी. शाम के सवा चार बजे हैं, बाहर धूप इतनी तेज है जैसे भरी दोपहर हो. ब्लॉग पर उसकी कहानी अब अध्यात्म की ओर बढ़ रही है. एक वर्ष पहले से ही भूमिका बननी शुरू हो गयी थी, तभी क्रिया के दौरान वह अनुभव हुआ. सद्गुरू तक उसकी प्रार्थना पहुंच ही गयी थी. कितना विचित्र है परमात्मा का यह चक्र, यह व्यवस्था कितनी अबूझ है. वह परम कितना दूर है पर कितना निकट...जीवन कितना अद्भुत है, यदि वे जाग जाएँ तो हर पल उसकी उपस्थिति का अनुभव कर सकते हैं. स्वप्न की धारा जो भीतर चलती रहती है, जिसने उनकी नींद को भी निर्दोष नहीं रहने दिया और उनके जागरण को भी, उसे रोकना ही साधना का लक्ष्य है. वह धारा उनके नियन्त्रण से बाहर हो गयी है क्योंकि वे इतने कमजोर हो गये हैं. पहले उन्हें जानना होगा किस तरह वे मन से पृथक हैं, जैसे आकाश बादलों के पार है, वैसे ही वे भी मन के पार हैं. स्वयं के मुक्त स्थान में स्थित होते ही वे मन के पार चले जाते हैं. जब वे उस स्रोत से जुड़ जाते हैं, उत्साह से भर जाते हैं, ऊर्जा से भर जाते हैं. उन्हें परमात्मा से जुड़कर पहले शक्तिशाली बनना है फिर इस धारा पर उनका नियन्त्रण होगा !

वही दोपहर की बेला है, पंछियों की आवाज के अतिरिक्त मौन की गूंज ही है जो सुनाई दे रही है. दोनों बहनें सो रही हैं, वे आज सुबह योग की कक्षा में गयी थीं, पहला दिन था, उन्हें आनंद नहीं आया. बच्चे तो बच्चे ही हैं, अब कल वे जाएँगी या नहीं, यह उन पर निर्भर करता है. आज सुबह भीतर जो भय जगा लेडीज क्लब के दफ्तर में चल रहे खिडकियों पर जाली लगाने वाले काम को लेकर, क्रोध के रूप में प्रकट हुआ नैनी की एक भूल के कारण उसके ऊपर, जो आज अचानक ही जल्दी आ गयी थी. एक ही ऊर्जा तो विभिन्न रूपों में प्रकट होती है. सुबह ध्यान किया, केवल शुद्ध चेतना में रहने का अभ्यास, स्वप्न की जो श्रृंखला जो भीतर चलती रहती थी अब खंडित होने लगी है, विचार वे स्वयं ही बनाते हैं और स्वयं ही उनसे पीड़ित होते हैं, सुबह इसका कितना स्पष्ट अनुभव हुआ. परमात्मा कितनी कृपा करता है जो पहले उन्हें प्रेम से भर देता है, वे तो उसे बाद में प्रेम कर पाते हैं. सद्गुरू को आज टीवी पर देखा, fb पर रोज ही देखती है. आज शाम उन्हें क्लब ले जाना है, आज क्लब का स्थापना दिवस है.

टीवी पर आज गुरूजी अपने कार्य के आरम्भिक दिनों के बारे में बता रहे हैं. हर इन्सान को अपना मार्ग स्वयं चुनना होता है और यदि वह सच्चे हृदय से प्रार्थना करे तो ईश्वर स्वयं उसका मार्ग प्रशस्त करते हैं. उन्हें अपने सीमित दायरे से बाहर निकल कर ही कुछ करना होता है. आज उसे क्लब की कुछ सदस्याओं के साथ मोरान ब्लाइंड स्कूल जाना है. सेक्रेटरी का फोन आया, उनके साथ इस वर्ष उसकी कई यात्रायें हो रही हैं, कितना कुछ सीखने को भी मिला है.

आज नन्हे के बचपन के मित्र, असमिया सखी के पुत्र का जन्मदिन था, उसने फोन किया. एक अन्य सखी से बात हुई, उन्होंने पोहा बनाने का अच्छा तरीका बताया, भांजियों ने वैसा ही बनाया. दोनों निकट ही बंगाली की दुकान पर भी गयीं, फल खरीदे और अपने लिए मैगी भी. दोनों बहुत शांत व समझदार हैं, अपने काम से काम रखने वालीं. क्लब की एक सदस्या सदा के लिए जा रही हैं, उनके पति रिटायर हो गये हैं, किताबों से भरा था उनका घर, ड्राइंग रूम में बड़ी सी आलमारी तो भरी ही थी, छोटी-छोटी शेल्फ पर भी ढेरों किताबें सजी थीं. उनके पति लेखक हैं, वे स्वयं भी लिखती हैं. वर्षों से बच्चों के लिए एक सांस्कृतिक विद्यालय चला रही हैं. उसने सोचा उनके लिए भी एक कविता लिखेगी. आज फेसबुक पर अस्सी वर्षीय एक महिला को सालसा नृत्य करते देखा, कमाल का नृत्य था, बच्चों की तरह वे घूम रही थीं.  देह, मन के अधीन रहे तो वे उसे अपनी इच्छा से प्रयोग कर सकते हैं. तमस और जड़ता से भरी देह मन पर हावी हो जाती है. जून आजकल बहुत व्यस्त रहते हैं, कल उन्हें दिल्ली जाना है. नन्हे के दफ्तर में एक प्रतियोगिता होनी थी, अच्छी ही होगी. वह अपनी टीम का हेड हो गया है अब. जे कृष्णमूर्ति की जो किताब वह वर्षों पहले बोस्टन से लायी थी, मिल नहीं रही थी, उस दिन मिल गयी, पढ़ना शुरू किया है.  


Monday, April 24, 2017

सूरज का लाल गोला

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नये वर्ष का चौथा दिन ! कल रात मूसलाधार वर्षा हुई, इस वक्त भी बादल बने हैं. जून आज मुम्बई गये हैं, कल कोचीन जायेंगे. वे यात्रा के नाम से बहुत प्रसन्न होते हैं, उन्हें नये-नये स्थान देखना भी भाता है और यात्रा की परेशानियाँ जरा भी परेशान नहीं करतीं. महर्षि अरविन्द पर लिखी एक पुस्तक बंगलूरू की उस दुकान से खरीदी थी, जहाँ किताबें ही किताबें पड़ी थीं, सीढियों पर भी किताबें. महान योगी थे वे. संस्कार में आजकल सद्गुरु का पतंजलि योगसूत्र पर बोला भाष्य प्रसारित हो रहा है. बहुत सी बातें स्पष्ट हो रही हैं. कितना कुछ जानने को है अभी, अनंत है वह परमात्मा..वे तो कुछ भी नहीं जानते..कई बार ऐसा लगता है जैसे पहले वह जो जानती थी अब उतना भी नहीं जानती. जीवन एक रहस्य है जो जाना नहीं जा सकता, जीया जा सकता है. शाम गहराती जा रही है, पांच भी नहीं बजे हैं अभी दस मिनट शेष हैं.

ठंड आज कुछ ज्यादा है, स्वेटर के भीतर त्वचा और त्वचा के भीतर हाड़ों को छूती हुई. सुबह आसमान पर बादल थे या कोहरा, सब श्वेत था मध्य में लालपन लिए नारंगी सूरज का गोला आकाश में ऊपर तो चढ़ आया था पर अभी तक बालसूर्य सा लग रहा था. उसे देखकर मन कैसा उल्लसित हो उठा, जैसे परमात्मा के माथे पर लगा टीका हो या..एक और उपमा उस वक्त ध्यान में आई थी पर अब मन से पुंछ गयी है. कई बार ऐसी सुंदर पंक्तियाँ मन में कौंध जाती हैं पर तब लिखने का साधन नहीं होता. एक सखी का फोन आया था, भावुक है, कलाकार है, पर बोलती कुछ ज्यादा है. कल क्लब के वार्षिक उत्सव की कला प्रदर्शनी में उसकी कृति भी लगायी जाएगी, उसे आमंत्रित किया है. कल शाम पिताजी से फोन पर बात की, बार-बार फोन कट जाता था, पर वह कोशिश करते रहे जब तक बात पूरी नहीं हो गयी, जबकि वह एक बार कट जाने के बाद दुबारा प्रयास नहीं करती, उनसे सीख लेनी चाहिए. कल एक परिचिता आयीं थीं, सेंट जेवियर्स स्कूल के बच्चों द्वारा लिखी कुछ असमिया कविताओं का हिंदी अनुवाद उसे देखने के लिए देकर गयी हैं. भविष्य में हिन्दी में यह किताब छपेगी, जिसमें भूपेन हजारिका, मामोनी और अब्दुल कलाम के लिए लिखी कविताएँ हैं.


आज धूप चमचमाती हुई निकली है. कल बड़ी ननद का फोन आया, मंझली भांजी की मंगनी तय हो गयी है, लड़का बंगाली है. उसने सोचा उसकी बंगाली सखी को सुनकर अच्छा लगेगा. आज सुबह टहलने गयी तो आई पौड पर मृत्यु पर प्रवचन सुना, कितनी अद्भुत व्याख्या करते हैं सद्गुरु ! टीवी पर मुरारी बापू की कथा आ रही है. परमात्मा का बखान करते-करते थकते ही नहीं, गाए ही चले जाते हैं. इलाहबाद में कुम्भ का मेला लगने वाला है, करोड़ों लोग आएंगे उस परमात्मा का गुणगान करने ही तो. परमात्मा घट-घट वासी है पर वह नित नूतन है, बासी नहीं है. कल रात छोटे भाई को सुंदर प्रवचन देते सुना, अद्भुत स्वप्न था वह. रात को ध्यान करते-करते सोयी थी. अभी उससे बात हुई, कल रात उसे भी स्वप्न आया कि वह किसी को समझा रहा है बहुत विस्तार से, आश्चर्य है और नहीं भी, परमात्मा सब कुछ कर सकते हैं ! भाई ने कहा वह इस बारे में ज्यादा बात करेगा तो उसकी आँखों से अश्रुपात होने लगेगा, उसने कहा, उसका यह तबादला भी कृपा से हुआ है, वह अपने सद्गुरु से जुड़ा है और वह उसे दिशा दिखाते हैं. सचमुच उसका समर्पण कहीं ज्यादा है.

Thursday, April 6, 2017

नवम्बर की धूप


पिछली तीन रात्रियों को ठीक एक बजकर सैंतालीस मिनट पर कोई उसे उठा देता है. उसके बाद भीतर से कोई कहता है जीवन अब बदल जायेगा. पूर्ववत् नहीं रहेगा. एक ख़ुशबू की परत, चारों ओर लिपटी रहती है. उनके भीतर कितने खजाने हैं, रंगों, खुशबुओं और संगीत के खज़ाने ! उसका मन एक अनोखी शांति से भर गया है, मन उसका नहीं रहा इसलिए कोई अदृश्य सत्ता ही अब सूत्रधार है. परसों लेडीज क्लब की मीटिंग है, वह मृणाल ज्योति की डोनेशन बुक लेकर जाएगी.

कल रात एक स्वप्न देखा, एक कार में वह बैठी है और उसे कुछ ही दूर जाना है पर उस कार में न स्टीरियंग है न ब्रेक. वह निर्धारित स्थान से आगे चली जाती है, सड़क आ गयी है जिस पर सामने से तेज गति से आते वाहन हैं. उसे डर लगता है पर गाड़ी बिना टकराए मुड़ कर किनारे से निकल जाती है.

कल रात कोई स्वप्न नहीं देखा, देखा भी हो तो स्मरण नहीं है. सुबह ठीक चार बजे किसी ने उठा दिया. वह कोई जो उसके भीतर रहता है, वह उसे एक पल को भी नहीं भूलता, वही वह है अब, तो स्वयं को कोई कैसे भूल सकता है. हरसिंगार के वृक्ष के नीचे की छाया में उसकी ही अनुभूति है, उसकी ही ख़ुशबू है जो चारों ओर से घेरे हुए है. सूखे पत्तों की आवाज में भी वही है, हवा की सरसराहट में भी वही, सामने हरी घास पर बिखरी धूप में उसकी ही चमक है, फूलों के रंगों में, शीतल हवा के स्पर्श में वही तो है, अब शरद काल आ गया है, आकाश नीला है और वृक्ष कितने हरे, एक सन्नाटा बिखरा है चारों ओर जो उसकी ही खबर दे रहा है. आज स्वास्थ्य पहले से बेहतर है. वह आने वाला है इसलिए ही देह को तपाकर स्वच्छ किया प्रकृति ने, फिर भीतर के सारे विकारों को निकाल बाहर किया. तन व मन दोनों हल्के हो गये हैं. अब कुछ करना शेष नहीं है, घर का मालिक आ गया है, अब जो भी वह कराएगा, वही होगा !

हरसिंगार के पत्तों से छनकर धूप के नन्हे-नन्हे गोले उसकी डायरी पर बन रहे हैं. यानि परमात्मा के हाथों से बनी कला ! उसके फूल अभी तक गिर रहे हैं, जो एकाध डाली पर अटके रह गये थे. हवा आज भी शीतल है और सड़क पर स्थित खम्भे का बल्ब आज भी कर्मचारी लगा रहे हैं, एक बल्ब के लिए पूरी की पूरी टीम आई है. पिताजी का मनोरंजन हो रहा है. उसने बोगेनविलिया के गमले धूप में रखवा दिए हैं. इस वर्ष उनमें अवश्य अच्छे फूल आएंगे. कल सिर्फ एक टिकट शेष रही, वह भी बिक जायेगी. आज की दो पोस्ट उसने सुबह ही लिख दी हैं, जून ने कहा, नौ बजे से दो बजे तक बिजली नहीं रहेगी.


नवम्बर की गुनगुनी धूप तन को सहलाती है. बाल सूर्य की किरणों की आभा में जब तृण की नोकें चमचमाती हैं, वृक्षों की डालियाँ एक अनोखी आभा से भर जाती हैं. फूलों की सुगंध रह-रह कर नासापुटों में भर जाती है. बोगेनविलिया की डालों से टपकती टप-टप ओस की बूंदें अंतर भिगाती हैं, झरते हुए फूलों की कतार सी जमीन पर बिछ जाती हैं. जीवन को उसकी सुन्दरता का अहसास जो कराती है, अम्बर की वह नीलिमा स्वप्नलोक लिए जाती है. खगों की कूजन ज्यों लोरी सुनाती है ! पत्तों की सरसराहट.. ज्यों पवन पायल छनकाती है. गुलाबी रंगत कलिका की.. भीतर मिलन का अहसास जगाती है. हर शै कुदरत की उसकी याद दिलाती है. इतनी सुंदर थी यह दुनिया क्या पहले भी..उससे इश्क के बाद नजर जो आती है. दूब घास की हरी नोक भी यहाँ सुख सरिता बहाती है, सड़क पर जाते हुए हरकारे की आवाज भी भीतर कैसी हूक जगाती है. बगीचे में करते माली की खुरपी की ध्वनि जैसे सृष्टि का संदेश सुनाती है. रचा जा रहा है हर पल इस जहाँ में चुपचाप ओ मालिक, यह बात आज समझ में आती है. 

Friday, March 3, 2017

अँधेरे के प्राणी


दोपहर के तीन बजने को हैं, आज धूप तेज है, ग्रीष्म ऋत है सो गर्मी होना स्वाभाविक है. जून चार-पांच दिनों के लिए अहमदाबाद गये हैं. उसने सोचा गर्मियों के वस्त्र सहेज कर रखने और सर्दियों के वस्त्र बाहर निकलने का यही उचित समय है. कल रात तेज वर्षा, आंधी, तूफान के कारण बिजली चली गयी. घोर अंधकार छा गया, बाहर भी भीतर भी. पल भर के लिए एक अजीब सा भय उत्पन्न हो गया. भीतर न जाने कितने संस्कार दबे हैं. भय का संचार होते ही वे जग जाते हैं. जैसे अँधेरे में सारे रात्रि के जीव निकल आते हैं वैसे ही मन यदि तनिक भी भय का शिकार हुआ तो भूत बनकर कुसंस्कार चिपक जाते हैं. प्रकाश होते ही सब जीव चले जाते हैं वैसे ही ज्ञान का प्रकाश होते ही वे भी जल जाते हैं. साधना के द्वारा उन्हें पूरा नष्ट करना होगा, ताकि घोर अंधकार में भी मन अभय का पात्र ही बना रहे.

उस दिन से शुरू हुई वर्षा आज थमी है, पर हवा ठंडी है, स्वेटर पहनना पड़े इतनी ठंडी. आज सुबह सुंदर व्याख्यान सुना, शब्दों को वे सुनते हैं, कानों को भले लगते हैं पर थोड़ी ही देर में अपना असर खो देते हैं. उसके अर्थ पर जब ध्यान हो, अर्थ में मन टिक जाये, वे अर्थरूप ही हो जाएँ तभी शब्दों का काम पूरा होता है.

कल दोपहर एक सखी के यहाँ हालैंड वासी एक आर्ट ऑफ़ लिविंग के स्वामी से भेंट हुई, वह बहुत अच्छी हिंदी बोलते हैं तथा संस्कृत में धाराप्रवाह श्लोक भी. शाम को जून के दो मित्र आए, समय बदलता रहता है, एक सा नहीं रहता. कभी वे सब परिवार एक साथ बैठकर भोजन करते थे, अब सब दूर-दूर हो गये हैं. मृणाल ज्योति का एक बच्चा जिसे कई रोग एक साथ थे, कल रात नींद में ही चल बसा. उस दिन वह स्कूल गयी थी तो हॉस्टल के कुछ बच्चे मिले थे, पता नहीं उनमें से कौन सा था.

कुछ दिनों से नन्हे का स्वास्थ्य ठीक नहीं है, उससे बात करके उसने कुछ सोचा और जून को एक पत्र लिखा, ताकि वापस आकर वह इसे पढ़े. उन्होंने इकलौते पुत्र को बचपन में बहुत स्नेह से पाला, लेकिन उसकी युवावस्था में उसे अकेला छोड़ दिया, अठारह वर्ष की उम्र बहुत नाजुक होती है. कोटा में उसे हॉस्टल में छोड़ आए थे तो वह बहुत तनाव में रहा होगा. घर की सुरक्षा से दूर एक अनजान शहर में...फिर कालेज में कितनी हिंसा और तनाव झेलना पड़ा, अच्छे पल भी यकीनन थे पर वह कहते हैं न कि नकारात्मक की ओर झुकने की प्रवृत्ति मानव में सहज ही होती है. उसे लगता है बंगलुरू में भी उसे कार्यभार और जीवन की कठिनाइयों से अकेले ही जूझना पड़ रहा है. उसे लगता है पुत्र के प्रति अपना कर्त्तव्य निभाने में उनसे कुछ चूक अवश्य हुई है. वे एक-दूसरे के प्रति जिस तरह पूर्ण समर्पित हैं वैसे ही उसके प्रति नहीं हो पाए. उसने लिखा, जून को अब मजबूत बनना होगा, उसके बिना रहने की आदत डालनी होगी. कुछ दिनों के लिए वह नन्हे के साथ रहना चाहती है. उसे नया जीवन शुरू करना है, जिसके लिए उसे मानसिक व शारीरिक रूप से स्वस्थ होना चाहिए. उसे उनका साथ सदा ही चाहिए था पर वे अपने जीवन में इतना खोये थे कि उसके साथ रहकर उसे सहारा नहीं दे सके. वह कितनी-कितनी परेशानियों को अकेला ही सहता रहा, उसने कभी उन्हें अपना राजदार नहीं बनाया. अब समय आ गया है पुत्र के लिए अपने सुख के त्याग का समय, उसे अपना कर्त्तव्य स्पष्ट दिखाई दे रहा है. उनका शेष जीवन उसके लिए हो, उसे जीवन में अभी प्रवेश करना है. यही उम्र है जब उन्होंने विवाह बंधन में बंधकर नया जीवन शुरू किया था और उन्हें परिवार का पूर्ण सहयोग था. उसने उम्मीद की, जून जब यह पत्र पढ़ेंगे, उसकी बात समझ रहे होंगे.  

    

Tuesday, August 16, 2016

ब्रह्म मुहूर्त


आज कई दिनों के बाद धूप निकली है. समय वही दोपहर का है पर वह भीतर है, सिर में हल्का दर्द है, आइसपैक का इलाज बेहतर रहेगा. आज जून बहुत खुश हैं. वह अध्यात्म के मार्ग पर चलने को तत्पर हैं, भीतर के प्रेम को महसूस ही नहीं कर रहे, प्रकट भी कर रहे हैं..सद्गुरु की अपार कृपा है उन दोनों पर..वह दूर होकर भी इतने पास हैं..आज भी ध्यान में उनके ही चरणकमल थे, परमात्मा को जब वे अपने जीवन का केंद्र बना लेते हैं तो प्रसन्नता उनके अंग-संग छाया की तरह रहती है, आज ब्लॉग पर एक नयी कविता पोस्ट की !

पिछले पांच दिन डायरी नहीं खोली. कल दिन भर शाम के सत्संग की तैयारी में बीता. आए कुल जमा तीन लोग. सद्गुरू उसे कुछ संदेश देना चाह रहे हैं. परसों वे डिब्रूगढ़ गये थे. जून का दर्द कम होता था फिर बढ़ जाता था. वहाँ एक डाक्टर को दिखाया, उसने एक इंजेक्शन दिया, अब काफी कम है. उससे पूर्व इतवार था, एक सखी को रात्रि भोजन पर बुलाया था, शनिवार को एक सखी का जन्मदिन था, वे पार्टी में गये. शुक्रवार को दोपहर बहुत गर्म थी, शाम को एक बुजुर्ग आंटी से मिलने गये. सो ये पिछले पांच दिन खुद से दूर ही बीते. आज पुनः खुद की सुध आई है. साधना भी कई दिन बाद मन से की. इस समय साढ़े दस बजे हैं सुबह के, दोपहर का भोजन बन गया है. थोडा सा वक्त है. भीतर सदा की तरह शांति है और है एक दृढ़ संकल्प कि कितना भी आवश्यक कार्य हो साधना नहीं छोड़नी है और न ही लिखना छोड़ना है, इससे खुद का पता रहता है कि वे किधर जा रहे हैं. जून भी शायद एकाध दिन से नहीं लिख रहे हैं. कल से वह सुबह के कीमती वक्त का पूरा उपयोग करेगी. एक पल भी व्यर्थ नहीं खोना है. ब्रह्म मुहूर्त की बेला इधर-उधर की बातों में नहीं खोयी जा सकती ! माँ-पिताजी बाहर बैठे हैं. मौसम पुनः बदली वाला हो गया है. नन्हा इतवार की रात को चेन्नई से नहीं चला, बल्कि सोमवार को मोटरसाईकिल पर एक मित्र के साथ आया. जून को इस बात की जानकारी नहीं है, वह व्यर्थ ही परेशान हो जायेंगे. छोटी बहन ने लिखा है वह फिलोसफी की अध्यापिका से मिलेगी, पर उसे अपने सवालों के जवाब भीतर ही खोजने होंगे, बाहर केवल भटकन है, हर एक को अपना रास्ता स्वयं ही बनाना पड़ता है. सद्गुरू की पहचान भी तभी होती है जब खुद से पहचान हो जाये. बड़ी भांजी को अब सन्तान की जरूरत महसूस होने लगी है. उसे जिस सहयोग व ज्ञान की जरूरत है वह परिवार से मिलना कठिन है. दीदी को ही उसे समझाना होगा, लेकिन तभी न जब वह स्वयं पूछे.

आज वर्ष का सबसे लम्बा दिन है. वे रोज की तरह चिड़ियों की चहकार सुनकर उठे. मंझला भाई दो दिनों के लिए आया था, कल शाम उसे ट्रेन में बिठाकर वापस लौटे और योग निद्रा का अभ्यास किया. ध्यान अब जीवन का स्वाभाविक अंग बन गया है और मुस्कान अपनी सहज आदत..जून भी अब बेबात मुस्कुराना सीख गये हैं ! आज उसकी छात्रा के आने का दिन था, पर शायद वह पैतृक घर गयी होगी. सुबह घर की सफाई की और साप्ताहिक स्नान भी, स्वच्छता पवित्रता से भर देती है. इस वक्त धूप निकली है और हल्की बूंदा-बांदी भी हो रही है ! उसके सम्मुख तीन न्यूज़वीक पड़ी हैं.

आज बचपन की एक स्मृति पर आधारित कविता लिखी और पिताजी, दीदी व बड़े भाई को भेजी, पता नहीं क्या प्रतिक्रिया हो उनकी..आज सत्संग का दिन है, अब जून भी पूरे उत्साह से तैयारी करते हैं. परमात्मा को केंद्र में रखे कोई तो जीवन कैसा रसपूर्ण हो जाता है, फिर किसी बात की कोई फ़िक्र रहती ही नहीं. अभी सवा पांच हुए हैं, वह इस कक्ष में आ गयी है, जहाँ अगरबत्ती की भीनी-भीनी सी खुशबू है, शीतल हवा है, श्वेत चादर है और दीवार पर गुरूजी की मुस्कुराती सी तस्वीर है. इस क्षण भीतर एक पूर्णता का अनुभव हो रहा है, जैसे कुछ भी पाना शेष नहीं है, पाना अर्थात सांसारिक दृष्टि से, आध्यात्मिक दृष्टि से तो अनंत संभावनाओं के द्वार खुले हैं !


Sunday, July 31, 2016

दर्द का अनुभव


सन् अठानवे में TTC Phase1(शिक्षक कोर्स) भी कर लिया और उसके बाद से पूर्णकालिक शिक्षिका हैं और सदा यात्रा करती रहती हैं, सरल स्वभाव है, रंग गोरा है, मीठा बोलती हैं, धीरे-धीरे बोलती हैं, उसे उन्होंने मन्त्र दीक्षा दी है. स्नेहमयी हैं, मस्त हैं और प्रसाद पूरी रुचि से ग्रहण करती हैं. गुरूजी के प्रति पूर्ण समर्पित हैं, कहती हैं कि वे सब कुछ जानते हैं. सहज समाधि कहाँ हुआ, किसके घर हुआ, उसे तो सुनकर ही सिहरन होने लगी. सद्गुरू के साथ उन्हें भी कृपा के कई व्यक्तिगत अनुभव हुए हैं. वह जादूगर हैं..ईश्वर से अभिन्न हैं, ऐसे महापुरुष, महात्मा कभी-कभी ही होते हैं, बिरले ही होते हैं. वह एक सखी के यहाँ बैठी थी, उनकी प्रतीक्षा कर रही थी कि सहज ध्यान होने लगा. सद्गुरू का भावपूर्वक स्मरण करते ही वह भीतर अनुभूत होने लगते हैं, वह एक ही सत्ता है, वह कैसी अनोखी सत्ता है..जितना रहस्य खुलता जाता है, उतना ही बढ़ता जाता है.  

आज बैसाखी है, पंजाब का त्यौहार ! फसलों और मेलों का उत्सव ! कुछ लोगों को उसने SMS संदेश भेजा है. कल से बीहू की छुट्टियाँ हैं. जून का दर्द अभी तक ठीक नहीं हुआ है. पूरा एक महीना होने को है. आज वह न तो टहलने गये न ही सुबह प्राणायाम, व्यायाम आदि कर पाए.

बीहू का पहला अवकाश. मौसम आज खुला है. धूप के दर्शन हो रहे हैं. कल रात जून को दर्द के कारण नींद नहीं आ रही थी. उनकी छाती में दायीं ओर पसलियों में दर्द होता है, दिल की धड़कन भी महसूस होती है. कल डिब्रूगढ़ दूसरी बार गये इसी सिलसिले में. इस वक्त भी लेटे हैं. मानव का बस, बस थोड़ी दूर तक ही चलता है, रोग, बुढ़ापा और मृत्यु के सामने उसका कोई बस नहीं चलता. इस समय दोपहर के साढ़े बारह बजने को हैं. वह सहज ध्यान करने बैठी तो दुनिया भर के विचार आने लगे, पहले कुछ शारीरिक व्यायाम करके ध्यान करने बैठो तो सहज ही होता है !
योग शिक्षिका का SMS आया है –

छोटे से जीवन में छोटी सी
मुलाकात थी प्यार भरी
आज आपका शब्दों का गुलदस्ता पाया मैंने और समर्पित किया उनको जो मुझे बनाये आप जैसे उनके प्यारों के लिए !  

उसे जवाब लिखना है –

माना छोटी सी थी मुलाकात
दिल ने दिल से कर ली बात,
आपका जीवन जन-जन अर्पित
सृष्टा को है पूर्ण समर्पित !

शांति सरलता की जो मूरत
सदा प्रेम झलकाती सूरत,
नृत्य भरा कदमों में जिनके
याद रहेगी उनकी मन में !

मस्त चाल अनोखी मुद्रा
सजल नयन विश्वास भरा,
सारी पूजाएँ, अर्चना
हों एक के लिए सदा !





Saturday, June 18, 2016

हरियाली और हवा की गुपचुप


अभी दो नहीं बजे हैं, आकाश बादलों से घिरा है, ठंड भी बढ़ गयी है. उसने लंच के बाद जून के जाने पर कम्प्यूटर ऑन किया. छोटी व बड़ी बहन के मेल थे. सद्गुरु का विस्डम संदेश भी था. दिनोंदिन जिसकी भाषा परिष्कृत होती जा रही है या वह ज्यादा गहराई से समझने लगी है, कितने कम शब्दों में कितना सटीक उत्तर वे देते हैं, अद्भुत है उनका ज्ञान, अद्भुत हैं वे ! परसों एक बुजुर्ग परिचिता का जन्मदिन है, उनके लिए कविता लिखी है. परसों ही सत्संग भी है, जून को उसका वहाँ जाना पसंद नहीं है और उनकी इच्छा के खिलाफ कुछ करने का अर्थ है घर में अशांति का पदार्पण ! उसका मन (आश्चर्य है कि अभी तक वह बचा है) विद्रोह कर रहा है. आज सुबह सुना था इच्छा शक्ति उमा कुमारी इच्छा कभी पूर्ण नहीं होती, यही तो विडम्बना है. इच्छा से मुक्त होना हो तो उसे समर्पित कर देना चाहिए ! जहाँ कामना है वहाँ सुख नहीं, वहाँ आनंद नहीं, वह भी अपनी सत्संग में जाने की कामना ईश्वर को समर्पित करती है, आगे वही जानें !

दोपहर के दो बजे हैं. बगीचे में झूले पर वह बैठी है, धूप और छाँव दोनों ने जिस पर इस समय अपना अधिकार जमा रखा है. उसके पैर धूप में है शेष भाग छाया में है पर सिर की चोटी पर धूप की तपन का अनुभव हो रहा है, हल्की हवा भी बह रही है. सामने मैजंटा रंग के फूल खिले हैं बायीं ओर एक बड़े प्लास्टिक के गमले में साइकस जाति का एक पादप अपने पूरे गौरव के साथ उगा है. उसका सिर  थोडा भारी है और पेट भी, सम्भवतः वस्त्रों के कारण या सर्दियों की शुरुआत में पौष्टिक भोजन के कारण ! कल शाम को सब कुछ ठीक-ठाक चल रहा था, वे संध्या भ्रमण के लिए निकले तो उसने सत्संग में जाने की बात कही, जून ने चुप्पी ओढ़ ली, उसने कहा, उन्हें उसकी जरा भी परवाह नहीं है. पर बाद में लगा यह ठीक नहीं था. उसके भीतर दो व्यक्तित्त्व हैं, एक पूर्ण तृप्त है, वह रहस्यमय है, वह होते हुए भी नहीं के बराबर है, एक दूसरा है जो जग में सबके साथ हिलमिल कर रहना चाहता है. वहाँ जाने अथवा न जाने से उसे कोई हानि या लाभ होगा ऐसा भी नहीं है. हानि-लाभ की अब कोई बात ही शेष नहीं रह गयी है. भजन गाते-गाते भाव में डूबना उसका सहज स्वभाव है, बस इतना ही. सो वह इस नीले आकाश के नीचे चमकते हुए प्रकाश में हरियाली और हवा की इस गुपचुप को सुनते हुए पंछियों के सुर में सुर मिलाकर अपने आप को जीवन की धारा में निर्विरोध बहने के लिए छोड़ देती है ! जो हो सो हो...एक तितली उसके वस्त्रों पर आकर बैठ गयी है, उस पर फूल बने हैं, वह शायद फूल की खोज में ही आई है और रस न मिलने पर भी कैसे आराम से बैठी है.

आज फिर वही कल का सा समय है, झूले पर धूप-छाँव का खेल चल रहा है, जैसे जीवन में प्यार और तकरार का खेल साथ-साथ चला करता है. जून के साथ उसका रिश्ता भी कुछ ऐसा ही है. शाम को चार बजे मृणाल ज्योति जाना है, विश्व विकलांग दिवस के लिए मीटिंग है. उसके बाद वे उन बुजुर्ग महिला से मिलने जायेंगे जिनका जन्मदिन है.


Thursday, January 14, 2016

गुलाबी धूप


ज्ञान की प्राप्ति कैसे हो, इसका जवाब हरेक को खुद ही खोजना होगा. सत्य का आचरण हो तो ज्ञान अपने आप प्रकट होने लगता है. वे सत्य का निर्वाह नहीं करते, अनावश्यक झूठ भी बोलते हैं, कभी अहंकार के कारण वे झूठ का आश्रय लेने में नहीं हिचकते. भय और शंका का शिकार फिर उन्हें ही होना पड़ता है. उनके जीवन का हर पल शंका रहित हो, तृप्ति भरा हो, आनन्दमय हो, इसके लिए जरूरी है कि सत्य का आश्रय लें, स्वभाव में टिकें. संसार तो दर्पण है, वे जैसे हैं वैसा ही उसमें दिखाई देगा. संसार तो कोरा कागज है, वे जैसा चित्र उस पर बनाएं वैसा ही दीखता है. परम स्वीकार ही परम स्वतन्त्रता है.

वे देह नहीं हैं देही हैं. देहाध्यास का लक्षण है जड़ता, लोभ, काम, ईर्ष्या, द्वेष, क्रोध तथा अहंकार तथा आत्मा का लक्षण है उत्साह, सृजनात्मकता, उदारता, संतोष, प्रेम ज्ञान तथा निरभिमानता. उन्हें यह अधिकार है कि दोनों में से जो चाहे चुन लें. देहाध्यास की आदत जन्मों-जन्मों से पड़ी हुई है, यह उसी तरह सरल है जैसे पानी का सदा नीचे को बहना, आत्मा में रहने के लिए अभ्यास करना पड़ता है, ऊपर उठना हो तो श्रम चाहिए, गिरने में तो कोई श्रम नहीं है. आज सुबह नींद खुल जाने के बाद भी जो वह नहीं उठी तो स्वयं को देह ही मान रही थी, कल जून द्वारा गलती निकाले जाने पर भीतर जो परमाणु हिले, वह भी देहाभिमान के कारण. कल शाम लोहरी की पार्टी में जो शिकायत भीतर उठ रही थी वह भी इसी कारण थी कि आत्मा में स्थिति नहीं थी, पर इस समय जो भीतर नाद सुनाई दे रहा है, ध्यान में जो अद्भुत रंग दिखे वे आत्मा के कारण हैं. मन, बुद्धि तथा संस्कार के माध्यम से आत्मा ही अपनी शक्ति को दिखाती है, पर वह उनसे परे है. जीवन की सार्थकता इनके पार जाकर उस आत्मा को जानने में है. उसने प्रार्थना की, उसके जीवन से उसकी साक्षी मिले जो अदृश्य है, जो सुक्ष्तं भी है अस्थुल्तं भी. जहाँ सरे द्वंद्व समाप्त हो जाते हैं और जो सारे विरोधाभासों की जड़ है. वह परमात्मा ही उसका केंद्र है, वही लक्ष्य है, परिधि से केंद्र तक जाना है.

उन्हें जीवन से जो भी चाहिए, वह उनके पास पहले से ही मौजूद है, उन्हें जीवन के लिए जो भी चाहिए वह भी उनके पास है, तो भी वे क्या चाहते हैं कि सारी उम्र बीत जाती है और तलाश खत्म ही नहीं होती. शायद इसलिए कि उन्हें इस बात का पता ही नहीं है कि जो खजाना उनके पास है वह गहरे गाद दिया है और ऊपर इतनी घास उग आई है कि अब लगता ही नहीं कभी यहाँ खजाना रहा होगा. सत्संग के औजार से अब वह घास हटाने का काम शुरू हुआ है, झलक मिलने लगी है. पर मजा तो तब है जब इसे बाँट सकें. अनंत खजाना है तो अनंत शक्ति भी होनी चाहिए बांटने की, क्योंकि बांटने से ये कम होने वाला है नहीं. यह जगत उनसे प्रेम के रूप में उनकी भौतिक उपस्थिति को चाहता है, शांति व आनन्द से उसे कोई सरोकार नहीं. वे दोनों उन्हें स्वयं के लिए चाहिए और जब जगत से कुछ नहीं चाहते तो शक्ति अपने आप प्रवाहित होने लगती है. उसके विचार कुछ स्पष्ट नहीं हो पा रहे हैं, भीतर जो स्पष्ट है वह बाहर आकर कैसे मिलजुल जाता है. घृणा, प्रेम, लोभ, उदारता, क्रोध, ज्ञान, उत्साह, जड़ता ये सभी उनके भीतर साथ-साथ रहते हैं. एक ही शक्ति के दो रूप..तो कौन सा रूप वे बाहर प्रदर्शित करते हैं, इस पर निर्भर करती है मन की शांति ! शांति के बिना आनन्द हो ही नहीं सकता. अध्यात्म की यात्रा कितनी विचित्र है, यहाँ विरोधाभास ही विरोधाभास है. एक पल में लगता है मंजिल करीब है फिर अगले ही पल लगता है अभी तो चलना शरू ही किया है !

हरी घास पर फूलों के मध्य बैठकर गुलाबी धूप का आनन्द लेते हुए डायरी लिखना तथा बीच-बीच में ठंडी हवा से सिहर जाना..इन सर्दियों में पहली बार हो रहा है. प्रकृति का कितना अद्भुत करिश्मा है, बीहू, मकर संक्रांति के आते ही बादल छा गये, ठंड बढ़ गयी, लोग देर रात तक आग तपते रहे और बीहू की छुट्टियाँ खत्म होते ही धूप निकल आयी है. यह जगत कितने आश्चर्यों से भरा हुआ है और जगत्कर्ता भी आश्चर्यों की खान है. उनका खुद का जीवन, तन, मन कितने-कितने आश्चर्यों से भरा है ! प्रकृति में अनंत जीव हैं, उनके भीतर भी लाखों जीव हैं. यह सब कुछ कितना अद्भुत है. आज सुबह उठी तो लगा रात भर में कितने स्वप्न देख लिए. अजीबोगरीब स्वप्न. एक में तो घोर अंधकार में वे सड़क पर बैठकर चल रहे हैं. छोटी ननद का छोटा पुत्र आगे है और वह मध्य में जून पीछे हैं, अँधेरा घुप है पर वे ख़ुशी-ख़ुशी आगे बढ़ रहे हैं. आज जून भी जल्दी उठ गये, कल उन्हें आत्मा को जानने से क्या होता है, इस पर जो भाषण दिया था, उसका असर रहा होगा. जो फ्रेंच नहीं जानता उसे यदि कोई फ्रेंच में समझाये तो उसे क्या समझ में आयेगा. इसी तरह जो आत्मा को नहीं जानता वह परमात्मा के बारे में क्या समझ पायेगा. आत्मा को जानना तो पहला कदम है, वे देह नहीं हैं, आत्मा हैं इस विश्वास को दृढ़ करते जाना है तथा आत्मा में जीना शुरू करना है. इसकी अनुभूति होने लगती है जब वे बार-बार इसका चिन्तन करते हैं, ध्यान करते हैं और देह, मन अदि को स्वयं से अलग देखने लगते हैं. उनका मन हावी नहीं होता, देह स्वस्थ रहती है. बुद्धि विकसित होती है तथा भीतर प्रकाश तथा शांति का वातावरण छाया रहता है. ऐसी शांति जिसकी गहराई नापी नहीं जा सकती !

  

Tuesday, August 25, 2015

केलों का गुच्छा


आज गुरू माँ ने पुनर्जन्म की एक घटना कही, जिसमें उन्होंने कहा कि यदि किसी की यात्रा एक जन्म में अधूरी रह जाये तो वह अगले जन्म में पूरी हो सकती है. इसमें सद्गुरु मदद करते हैं. अगले जन्म में गुरू उसे प्रेरित करते हैं. सुनते ही उसे लगा कि सद्गुरु ने ही प्रेरित किया है और वह उसके मार्ग का निर्देशन कर रहे हैं, तभी पहली बार जब गौहाटी में उनके दर्शन किये तो चित्रलिखित सी खड़ी रह गयी और आज तक वह असर कम नहीं हुआ है. कितने अभागे होते हैं वे लोग जो गुरू कृपा से अछूते रह जाते हैं, कुछ तो वहाँ पहुंच कर भी और कुछ पहुंच भी नहीं पाते. आज सुबह मौसम अच्छा था जो दिन चढ़ते-चढ़ते गर्म होता गया है. दोनों भांजे जो परसों सुबह यहाँ आये थे, पूरी तरह रच-बस गये हैं. उनका साथ अच्छा लग रहा है. माँ-पिता के बिना बच्चे कितने मुक्त हो जाते हैं. माँ-पिता चौबीस घंटे उनके पहरेदार बन कर रहते हैं तो वे ठीक से स्वयं को व्यक्त नहीं कर पाते. सासु माँ टीवी देख रही हैं, दोपहर के तीन बजे हैं. आज एक और केले के पेड़ पर लगे फल तोड़ कर पकने के लिए घर में रखे, विशाल गुच्छा है सौ से अधिक होंगे शायद डेढ़ सौ. छोटा भांजा कितना छोटा सा है पर कितना साहसी, पौधों को पार करता केले के झुरमुट तक गया और उसे उत्साहित करने लगा. वह इतना मासूम है. तभी सद्गुरु कहते हैं बच्चों जैसे बनो. उसकी बातें दिल को छू लेती हैं. उसमें नन्हा कान्हा दिखाई देता है. सद्गुरु का ही यह प्रयास रहा होगा, तभी तो वह नन्हा बच्चा उसे प्रेम का पाठ सिखाने के लिए आया है.

आज उसने पुनः कठोर शब्दों का प्रयोग किया. सुबह नींद खुली उसके पहले एक स्वप्न देख रही थी. गुरू माँ को पुनः देखा, वह कितने अपनेपन से बात कर रही थीं. वह नाम लेकर बुलाती हैं, लोगों का जिक्र करती हैं. वह स्वप्न में किसी ग्रुप को निकट से निर्देशित कर रही थीं. आज सद्गुरु को भी सुना. वह थोड़े दूर से लगते हैं अपने होकर भी, वह खुदा की तरह हैं, वह तो स्वयं को भगवान कहते हैं, वह मिलकर भी नहीं मिलते और दूर होकर भी दूर नहीं होते. वह तो उसकी आत्मा हैं पर गुरू माँ उनकी सहायिका हैं, पथ प्रदर्शिका..उसके डायरी में उनका जिक्र ज्यादा हो रहा है, पता नहीं इसके पीछे क्या राज है. आज एक सखी की बेटी का रिजल्ट आया है, ९५% अंक हैं, दो विषयों में १००% हैं. उसने अपने माता-पिता को गौरव दिलाया है, वे भी उसको पूरा सहयोग देते आये हैं पढ़ाई में. आज शाम को वे उनके यहाँ जायेंगे. धूप बहुत तेज है, लॉन में पुनः झूला लगाने के लिए खंभे आज गाड़े गये हैं. नये कमरे का काम यूँ ही ठप पड़ा हुआ है. आजकल सुबह किचन में गुजर जाती है, दोपहर बच्चों के साथ तथा शाम को पुनः घूमना, नाश्ता और डिनर..पढ़ने का समय नहीं निकाल पाती. आज से प्रयास करेगी कि कुछ देर पढ़ सके. इस समय दोनों पेंटिंग कर रहे हैं. बच्चों के साथ ऊर्जा काफी व्यय होती है, वे तो ऊर्जा से भरपूर होते हैं, बड़ों को प्रयास करना पड़ता है. मन होता है कि..यह सोचते ही वह सजग हो गयी, जहाँ मन में कामना उठी कि शांति का हनन हुआ. जो जैसा है उसे वैसा ही स्वीकारना होगा, हर क्षण अपने आप में अमूल्य है, हर क्षण पूर्ण है, जो इस क्षण में तृप्त नहीं हुआ, वह कभी नहीं होगा !


दोपहर के डेढ़ बजे हैं, आज भी धूप तेज है. उन्हें उठने में आज थोड़ी देर हो गयी. रात को स्वप्न तो नहीं देखे, देखे भी होंगे तो याद नहीं, नन्हे ने कहा कि उसने एक स्वप्न में स्वयं को जलते हुए देखा, आत्महत्या करते हुए स्वयं को देखना.. कितना अजीब सा स्वप्न था, इस समय वह फुफेरे भाई को कम्प्यूटर पर बेसिक पढ़ा रहा है. छोटा रंग भर रहा है. सासु माँ के साथ वह अभी भी घुलमिल नहीं पा रही है. अज सद्गुरु ने कहा सभी के साथ घुलमिल कर रहना चाहिए, तो उन्होंने सुना और कहा, ठीक हो तो कह रहे हैं. लगा जैसे उसे लक्ष्य करके कह रही हैं. उसे लगता है जो हर वक्त कुछ चाहता है, उससे लोग दूर भागते हैं. किसी से कुछ भी पाने की इच्छा न हो तो सब कुछ अपने आप झोली में आने लगता है. आज उन्होंने ‘ध्यान’ भी किया, धीरे-धीरे वह अपने आप पर निर्भर रहना सीख लेंगी. वे सभी उन्हें प्यार करते हैं, उनका भला ही चाहते हैं, शायद पिछले जन्म का कुछ प्रभाव हो जो..पर उसे प्रतिक्रमण करना होगा और सारे हिसाब समाप्त करने होंगे, नये हिसाब तो शुरू ही नहीं करने हैं. कल शाम वे उस छात्रा से मिलने गये मिठाई खाने. इस हफ्ते उसने बच्चों को पुनः बुलाया है, वे महीने में दो बार उन्हें सिखायेंगे. उस दिन भोजन माँ बना लेंगी. उसने स्थान के लिए बात की तो सम्बन्धित महिला फौरन तैयार हो गयीं. आर्ट ऑफ़ लिविंग का यह प्रोजेक्ट अब यहाँ चलता रहेगा. गुरूजी का आशीर्वाद उन्हें मिल रहा है, मिलता रहेगा. वह इसे नारायण सेवा कहते हैं. बच्चों के रूप में भी स्वयं ईश्वर ही तो है !