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Friday, April 27, 2018

शिवसूत्र



दोपहर के तीन बजे हैं. धूप अब कुछ ही देर की मेहमान है, इस समय ठंड ज्यादा नहीं है पर शाम होते न होते तापमान गिर जाता है. वह गुलाब और जरबेरा के मध्य हरी घास पर बैठी है. मालिन बगीचे में झाड़ू लगा रही है और उसकी बेटी क्यारियों में पानी डाल रही है. उसके इर्दगिर्द श्वेत धुंए सा पारदर्शी कोई आवरण छाया हुआ है जो गतिमान है तथा जिसके भीतर से देखने पर सामान्य दिखने वाली घास भी अति प्रकाशवान व सुन्दर हो जाती है. परमात्मा की लहर जैसे उसे छूकर जाती है, कितना दयालु है वह ! आज सुबह प्रार्थना की, वह उसे धैर्यवान बनाये, धैर्य की कमी के कारण उसे न जाने कितनी बार कितनी परेशानी उठानी पड़ी है. धैर्य की कमी का सीधा सा अर्थ है उस पर भरोसा न होना. कर्ता भाव जगते ही तो अधैर्य का जन्म होता है. शास्त्रीय ज्ञान को जीवन में उपयोग न कर सके तो उसका होना न होना बराबर ही है. लोभ की वृत्ति से भी छुटकारा पाना है. सद्गुरू के वचन सुनती है तो लगता है सब याद है पर वह मात्र स्मृति ही बन कर न रह जाये, जीवन में पग-पग पर उसका उपयोग हो सके.

संध्या के साढ़े पांच बजे हैं. आज का दिन कितना अलग रहा. सुबह देर से उठी, कल रात को क्लब से देर तक गाने की आवाजें आ रही थीं, देर से सोयी, वैसे भी जबसे जून गये हैं, रात्रि को सोने में देर हो ही जाती है. दोपहर को ग्यारह बजे क्लब गयी, इतने वर्षों में पहली बार बीहू पर होने वाले खेल देखे. पारंपरिक भोजन किया, जो स्वादिष्ट था और गर्म था. आलू पिटकी, केले के फूल की सब्जी, पालक पनीर, दाल बड़ा और दो तरह के चावल और दाल. वापस आकर बच्चों के लिए चने बनाये और उन्हें भी खेल खिलाये. जून आज रामेश्वरम गये हैं, शाम तक तमिलनाडू में अपने निवास पर आ जायेंगे, और दो दिन बाद यहाँ. आज ‘शिवसूत्र’ पर लाई किताब पढ़ी. ओशो का प्रवचन डाऊनलोड किया इसी विषय पर, कल सुनेगी. उनके जीवन पर आधारित एक फिल्म भी बनी है. सद्गुरू ने भी शिवसूत्र पर प्रवचन दिए हैं, पहले टीवी पर सुन चुकी है. सुबह पुनर्जन्म पर एक टेलीफिल्म देखी. शाम को क्लब जाना था, फिर एक सदस्या के घर, इस बार के क्लब के वार्षिक उत्सव में वे एक ‘वाल मैगजीन’ प्रकाशित करने वाले हैं, वह बहुत रुची से बना रही है. सब मिलाकर तीन घंटे वहीं लग गये. दो दिन बाद उन्हें यात्रा पर निकलना है. नैनी की बेटी कई बार कह चुकी है, उसे नृत्य के लिए बुलाये, बच्चों को नाचना अच्छा लगता है और उनके साथ नाचना उसे भी ! अब सोमवार को ही सम्भव होगा या फिर कोलकाता से आने के बाद.

सुबह भी काफी कोहरा था, एक छोटी सी यात्रा की राजगढ़ की आज. मृणाल ज्योति ने विशेष बच्चों एक लिए अपने स्कूल की एक शाखा वहाँ खोली है, उसी का समारोह था. दोपहर ढाई बजे वह लौटी और उसके कुछ देर बाद जून भी आ गये. ढेर सारा सामान लाये हैं हमेशा की तरह. तमिलनाडू के चेट्टीनाड से तीन साड़ियाँ भी. बगीचे से मेथी, फूल गोभी व हरे प्याज तोड़े, और रात के भोजन में उसका पुलाव बनाया, जून को बहुत पसंद है.

आज सुबह अँधेरे में खिड़की का पर्दा हटाते समय एक फ्रेम टूट गया, एक पिछले हफ्ते टूटा था, इसी तरह पर्दे के ही कारण. उसे प्रकाश कर लेना चाहिए सुबह उठते ही कमरों में, जैसे भीतर प्रकाश न हो तो मन में अँधेरा छा जाता है, वैसे ही बाहर भी प्रकाश अति आवश्यक है. आज मृणाल ज्योति जाना था, कम्पनी के डायरेक्टर्स की पत्नियाँ यहाँ आई हुई हैं, मुख्य अधिकारी की पत्नी उन्हें लेकर जाने वाली थी. वहाँ एक पुरानी परिचिता मिलीं, कुछ वर्ष पूर्व वे लोग यहाँ से चले गये थे, गोरी-चिट्टी हँसमुख और पूर्णतया स्वस्थ नजर आती थीं, पर उन्हें अब कैंसर हो गया है, कृशकाय हो गयी थीं, पर मुस्कान वैसी ही है. बच्चों से मिलकर सभी खुश हुए. वहीं से उसने कुछ उपहार खरीदे. कल उन्हें असमिया सखी के पुत्र, जो नन्हे का मित्र भी है, की शादी में जाना है, नन्हा भी एक दिन के लिए आएगा. अभी पैकिंग शेष है. धूप में बैठकर लिखना अच्छा लग रहा है. पंछियों की आवाजें आ रही हैं तथा घास काटने की मशीन की भी कभी-कभी ! शेष समय मौन है. आज से नैनी की बेटियों ने स्कूल जाना शुरू कर दिया है, सुबह दोनों चहकती हुईं स्कूल ड्रेस पहनकर आयीं थीं, उसने दोनों की तस्वीर उतारी.   

Tuesday, August 18, 2015

पंछियों का संसार


उसका गला हल्का सा खराब है, देह को स्वस्थ रखना कितना आवश्यक है सभी के लिए. सुबह-सुबह चिड़ियों की चहचहाहट सुनाई दी और नींद खुल गयी, पंछी दिन भर बिना थके बोलते रहते हैं, उस दिन animal planet पर सुंदर पक्षियों को देखा था, अच्छा लगा. प्रकृति के निकट आते ही वे अपनी आत्मा के निकट चले जाते हैं. इस क्षण वह अपनी आत्मा के निकट ही है ऐसा अनुभव हो रहा है. अब मन पहले जैसा नहीं रहा जो हर वक्त बीच में अपनी टांग अड़ाता था, अब कहना मानता है. आखिर मन है क्या, कुछ आशा कुछ निराशा, पर जब वे अपने सही स्वरूप में होते हैं कुछ पाने की आशा नहीं, कुछ खोने की निराशा नहीं.. पीड़ा या दर्द होता भी हो तो वह सात्विक है, इस बात के लिए कि वे किसी के काम नहीं आ पा रहे. आत्मा के निकट होने पर ईश्वर से उनकी दूरी मिटती नजर आती है. उसके प्रेम को वे अनुभव करते हैं, उसका प्रेम ही स्वयं को समर्पित करने को प्रेरित करता है. वे जीवन को पूरी गहराई से जीना चाहते हैं, सच्चाई से..उनके वचनों, कर्मों तथा विचारों में एकता आने लगती है. कल सत्संग में उसने जो कहा वह पूरे दिल से कहा था और उसको साकार होने में कोई रुकावट नहीं है उसकी तरफ से. सत्य की ही जय होती है, उसे हर कीमत पर सत्य का ही आश्रय लेना होगा, अपने जीवन के हर मोड़ पर !

आजकल उसे लगता है कि उसके जीवन की कहानी का सूत्रधार कहीं बैठा-बैठा इसके पन्नों को खोल रहा है, बाद में कुछ घटने वाला है इसके लिए वह पहले पृष्ठभूमि तैयार करता है. सदा ही ऐसा होता आया होगा पर पहले सजगता नहीं थी. ‘संजय घोष’ की पुस्तक पढ़कर उसे सेवा करने का प्रोत्साहन तो मिला ही तरीका भी पता चला. उस दिन जून के दफ्तर में भी सामाजिक कार्यों के बारे में पढ़ा था, इसका लाभ गुरूजी के जन्मदिवस के अवसर पर किये जाने वाले सेवा कार्य में उसे अवश्य मिलेगा. जून को जब दिल्ली से वापस आकर अस्वस्थ देखा तो उसे ठीक से भोजन का ध्यान न रखने के लिए टोका, पर कान्हा को अपने भक्तों का अहंकार जरा भी पसंद नहीं. उसके गले में दर्द है, यह इसका प्रमाण है. प्रकृति को उनका प्रमादी रहना पसंद नहीं है. यह भी समझ में आया कि दूसरों के अस्वस्थ होने पर उनसे सहानुभूति प्रकट करनी चाहिए न कि उनके दोष बताने चाहिए. जून के माध्यम से जीवन में कितने ही पल आते हैं जब उसे यह जांचने का मौका मिलता है कि भीतर समता बनी है अथवा नहीं.


आज सुबह साढ़े चार बजे नींद खुली, पहला विचार प्रार्थना का था, रात का जो अंतिम विचार था वही ! क्रिया करते-करते अंत में खांसी के कारण उठाना पड़ा. सम्भवतः उसका गाने का अभ्यास फेफड़ों को स्वस्थ रखने में सहायक था, सो आज से पुनः नियमित अभ्यास करेगी. प्रभु का नाम गाने से फेफड़ों के स्वास्थ्य के साथ-साथ मन भी पवित्र होता है. आज नन्हे के कमरे में रंग-रोगन होने के बाद सामान दोबारा ठीक-ठाक करके रखा, कुछ अभी शेष है. टीवी पर बाबाजी बच्चों को कहानियाँ सुन रहे हैं. कैसे सरल होते हैं संत, जो अपने ज्ञान को छिपाए बच्चों के साथ बच्चे बन जाते हैं. जब वे सारे आग्रह छोड़ देते हैं तो जीवन अपने-आप चलने लगता है. सारे कार्य वैसे भी हो रहे हैं, वे व्यर्थ ही स्वयं को कर्ता मानकर अभिमान का भार ढोते हैं !       

Tuesday, June 9, 2015

पहली विदेश यात्रा


ध्यान उसे भाता है पर आजकल उसके लिए समय व स्थान निकाल पाना कठिन होता जा रहा है. आँख बंद करते ही कैसे प्रभु का प्रेम पूरे तन-मन को ढक लेता सा लगता है. सिर के ऊपरी बिंदु पर हलचल सी होती है नहीं तो सिहरन और लगता है कि कुछ रिस रहा है. धीरे-धीरे बढ़ रहा है भीतर...उतर रहा है उस प्रभु का नाम फिर पोर-पोर में भर जाता है, उसका ताप मोहक है, उसकी याद सांसों को भर लेती है. वह जैसे छा जाता है फिर बाहर की दुनिया का होश किसे रहता है. कल बहुत दिनों के बाद सत्संग में गयी, शायद उसी का परिणाम है अथवा तो दीपावली के आगमन का उल्लास. सुबह-सवेरे संगीत का अभ्यास भी मन-प्राण को प्रफ्फुलित कर देता है और सुबह प्राणायाम का अभ्यास भी किया था, बीच-बीच में ध्यान था अथवा तंद्रा जिसके कारण श्वास गहरी नहीं हो पा रही थी. आजकल मौसम भी सुहावना है, वर्षा के बाद का आकाश कितना निर्मल होता है. कल अमावस्या है, यह दीपकों का प्रकाश इसे पूर्णिमा में बदल देगा ! उनके भीतर भी दीपक जल रहे हैं, भीतर प्रकाश ही प्रकाश है. प्रकाश के इस सागर को उसने कितनी बार देखा है, उनके भीतर ही नगाड़े भी बज रहे हैं, कितनी बार जिसे सुना है, सोहम, हंसा का अंतर्नाद स्पष्ट सुना है जैसे कोई भीतर बैठकर जप कर रहा हो, उनकी आत्मा का संगीत है वह और आत्मा का प्रकाश. आत्मा तो परमात्मा का अंश है तो वह उसका ही प्रकाश हुआ. उन्हें रस पूर्ण करने वह परमात्मा ही धीरे से घट खोल देता है, अपने रस का घट जो पूर्ण है जो मधुमय है, जो सुखमय है, जो शक्ति देता है, ज्ञान देता है और स्फूर्ति देता है. जो सभी ऐश्वर्यों का दाता है !

आज दीपावली है, दीयों का त्योहार, उजाले का त्योहार, उनके भीतर का उजाला जगमगाने लगे तभी असली दीपावली है. जब तक भीतर अंधकार हो तो बाहर का प्रकाश उनकी मदद नहीं कर सकता. आज सुबह क्रिया के बाद उसे ज्योति के दर्शन हुए, कान्हा ने भी अपने नीलमणि रूप में दर्शन दिए. परमात्मा उन्हें उनकी सभी कमियों के साथ स्वीकारता है, वह उनसे प्रेम निभाता है, चाहे वे कितना ही बड़ा अपराध करें उसे प्रेम से पुकारें तो वह जवाब देता है. वे ही उसके प्रेम को भुला देते हैं, तब जीवन कांटों में उलझ जाता है, कैसा ताप जलाता है. उसका साथ हो तो सारा जगत अपना-आप ही लगता है. उनका मन आत्मा में स्थित रहे तो हर क्षण ही उत्सव का क्षण है ! उसने प्रार्थना की, ‘उनके तन का पोर-पोर मन का हर अणु परमात्मा के नाम से इस तरह ओत-प्रोत हो जाये कि जैसे पात्र पूरा भर जाने पर जल छलकने लगता है, वैसे ही उसके नाम का अमृत उनके अधरों व नेत्रों से स्वतः ही छलकने लगे’. चित्त जब तृप्त होगा उसके नाम से पूर्ण होगा तो भीतर के ताप अशुभ वासनाएं भी धुल जाएँगी. अपनी भूलों पर वेदना होती है तो सजगता बढ़ती है, दुःख सिखाता है, क्रोध, मोह, आलस्य ताप को बढ़ाते हैं. ज्ञान उन्हें मुक्त करने के लिए, यह ज्ञान कि वे साक्षी मात्र हैं, सुख-दुःख के भोगी नहीं हैं.

उन्हें यात्रा पर जाना है, पहली बार विदेश यात्रा पर साथ-साथ. जीवन का सफर उन्होंने साथ-साथ तय करने का निर्णय वर्षों पहले लिया था, और अब यह छोटा सा सफर अमेरिका, इंग्लैण्ड की यात्रा. जिन स्थानों को टीवी अथवा पत्रिकाओं में देखा था, उन स्थानों को स्वयं देखने का अनुभव यकीनन अच्छा होगा. वे अपने साथ बहुत कुछ ले जा रहे हैं लेकिन सबसे उत्तम जो उनके साथ जायेगा वह है, वह  सुमिरन जो कान्हा ने उसे दिया है. कभी भी खत्म न होने वाला एक ऐसा प्रिय कार्य है प्रभु का स्मरण कि वे संसार में कहीं भी रहें, वह उनके साथ रहेगा. सद्गुरु की सिखाई साधना की विधि, सद्शास्त्रों का ज्ञान तथा ध्यान भी उसके साथ जायेगा और यही उसकी यात्रा के सम्बल हैं. टिकट-पैसे आदि का सारा प्रबंध जून देखते ही हैं, उन्हें ही उसकी फिकर करनी है पर उसके लिए उस परम पिता ने यही कार्य सौंपा है. गुरु माँ कहती हैं मन प्यासा है, भूखा है, और कड़वा है, न जाने कितनी बार वे संतों के उपदेश सुनते हैं, शास्त्रों का पाठ करते हैं पर फिर भी मन का बर्तन भरता नहीं, मन सूक्ष्म है वह स्थूल से कैसे भर सकता है और जब तक वह कड़वा है तब तक सूक्ष्म का स्वाद भी कैसे पता चलेगा. उन्होंने मन में न जाने कितनी गाठें बांध ली हैं पहले उन्हें खोलना होगा तभी तो मन बहेगा उस अनंत यात्रा पर. उनका अज्ञान ही उसे दुखी बनाता है, अहम् मन को सूखा रख जाता है और मोह ही भूखा रख जाता है. मन वास्तव में कुछ है ही नहीं, कल्पनाओं का एक जाल है, जो उन्होंने बुन रखा है !


Wednesday, March 11, 2015

शरदकाल का चन्द्रमा


आज बाबाजी ने उसे जन्मदिन की बधाई दी ! वायु सुखदायी हो ! आकाश सुखदायी हो ! जल सुखदायी हो ! पृथ्वी सुखदायी हो !  अग्नि सुखदायी हो !  जन्मदिन की बधाई हो ! सुबह-सुबह ससुराल से फोन आया फिर दीदी, भाई-भाभी, पिता जी व बड़ी ननद सभी ने जन्मदिन की शुभकामनायें दीं. जून और नन्हे ने भी बधाई दी. नन्हे का रिजल्ट अच्छा रहा है वे सभी खुश हैं, उसकी मेहनत का परिणाम अच्छा होना ही था. आज बाबाजी ने कहा, दान देना अच्छा है और जन्मदिन पर दान देना और भी अच्छा है. गुरुमाँ ने बताया यदि कोई दुखी है तो अपने आसपास दुःख ही फैलाता है, जिसके पास जो होगा वही तो बांटेगा. मन रूपी सागर पर जब ईर्ष्या और क्रोध रूपी फेन न हो तो जल कितना शांत हो जाता है. कल शाम योग वशिष्ठ पढ़कर उसके मन की भी वही स्थिति हो गयी थी. मुक्त, निर्विचार, शांत और स्थिर..मन की यही अवस्था सम्भवतः आत्मा की स्थिति है क्योंकि उस स्थिति को महसूस ही किया जा सकता है. वह स्थूल नहीं है, अति सूक्ष्म है और व्यापक है शरदकाल के चन्द्रमा की भांति. योग वशिष्ठ अद्भुत ग्रन्थ है. बाबाजी ने भी कहा कि वासना ही दुखों की जड़ है. ‘तू भी अपने मन की काढ़ ले भाया’ अर्थात तू भी हृदय से कामनाओं को निकल फेंक. इच्छा जब तक बनी रहती है दुःख ही देती है, लेकिन कृष्ण से मिलने की इच्छा में जो मीठी पीड़ा है वह सुख ही देती है. ईश्वर के बिना इस जगत में कुछ भी पाने के योग्य है क्या ? सब कुछ छोड़ने के ही योग्य दिखाई पड़ता है !

जून का आरम्भ ! मौसम गर्म है और उमस भरा भी, यानि कि सब कुछ सामान्य है. गला थोड़ा सा खराब है पर कल की परीक्षा की वजह से ज्यादा लग रहा है वर्ना तो इतनी परेशानी उसके लिए न होने के बराबर ही थी. सुबह-सुबह अचानक अध्यापक आ गये, वह तैयार नहीं थी. नन्हा एक मित्र के साथ स्कूल गया है, मार्कशीट व फॉर्म दोनों लेन हैं. माली घर गया हुआ है, लॉन की घास बड़ी हो गयी थी सो जून ने एक आदमी को भेजा है जो उम्र में बड़ा है पर मशीन बड़ी अच्छी तरह चला रहा है.  आज बाबाजी को कुछ ही देर सुन पायी. उन्होंने कहा ईश्वर रसमय है और मानव भी रस ढूँढ़ता है पर गलत जगह, जो मिलता नहीं. अस्तित्व उसे उन्नत बनाना चाहता है, वह विपरीत परिस्थितियों में रखकर उसे योग्य बनाना चाहते हैं. गुरू माँ की तरह दुलारते हैं, रास्ता दिखाते हैं, इस तरह ज्ञान देते हैं जो उसकी समझ के अनुसार हो, प्रकृति के अनुसार हो और धीरे-धीरे वह वास्तविक लक्ष्य को प्राप्त कर ले, जहाँ समता की निर्मल धारा है, जहाँ स्थित होकर सुख-दुःख नन्हे लगते हैं, उनमें वे फंसते नहीं, जहाँ सहज रूप से जीवन बहता चला जाता है !

कल परीक्षा से वापस आकर मन कैसा तो हल्का होगा था जैसे कोई बोझ सिर से उतर गया हो. आज भी धूप खिली है और मन का कमल भी ! जीवन कितना अनमोल है और कितना मोहक, कितना मधुर ! कान्हा की वंशी की तरह, उसकी मुस्कान की तरह और उसकी चितवन की तरह ! मन में कोई उद्वेग न हो कोई कामना न हो तो मन कितना हल्का –हल्का रहता है. किसी से कोई अपेक्षा न हो, स्वयं से भी नहीं बस जो सहज रूप में मिलता जाये उसे ही अपने विकास में साधक मानते चले. वह लिख ही रही थी कि एक परिचिता आ गयी उसकी बातों से लगा वह अपने परिवार के प्रति अविश्वास से भरी थी, ऐसे लोगों को समझाना पत्थर से टकराने जैसा ही है, वह उसके लिए ईश्वर से प्रार्थना करेगी, शायद कोई चमत्कार हो जाये ! वह गयी तो लंच का समय हो गया था. उसके बाद बहुत दिनों से पेंडिग पड़ी सफाई का कार्य और फिर शाम होने को आ गयी. जून के एक सहकर्मी के वृद्ध पिता अस्पताल में हैं, उसने उनके लिए भी प्रार्थना की, ईश्वर उन्हें शीघ्र स्वास्थ्य लाभ प्रदान करेंगे, हर एक को उस पीड़ा से गुजरना है. जन्म और मृत्यु के बीच बीमारी और बुढ़ापा सभी को पार करना ही है.    



  

Wednesday, July 23, 2014

भुट्टे के फायदे



उन्हें यहाँ आये अर्थात घर वापस आये तीन दिन हो गये हैं, कल दो पत्र लिखे, अभी स्मृतियाँ सजीव हैं. यहाँ भी वर्षा ने उनका स्वागत किया. जून, वह और नन्हा तीनों बहुत खुश हैं, यात्रा और कुछ दिन घर से दूर रहने के कारण घर की हर वस्तु उन्हें अच्छी लग रही है. माँ का ख्याल हमेशा बना रहता है, उनकी तबियत सुधर रही होगी या नहीं, इतनी दूर बैठे वे जान नहीं सकते, जानकर भी कुछ नहीं कर सकते, ईश्वर से मात्र प्रार्थना जरूर कर सकते हैं. प्रार्थना के आगे मात्र लगाकर उसके सत्य को कम करने का उसका इरादा नहीं है बल्कि अपनी क्षुद्रता पर पर्दा डाल रही है कि उसकी प्रार्थना में कोई असर होगा भी या नहीं. इतने दिनों भगवान से दूर जो रही, अपनी व्यस्तता में उसे भुला बैठी. सभी सखियों से फोन पर या मिलकर बात हुई, अच्छा लगा, वह बातूनी सखी दूसरी बार माँ बनी है बेटे की, कुछ दिन बाद देखने जाएगी. एक मित्र परिवार मिठाई खाने नहीं आ सका जो वे उनके लिए लाये थे, सम्भवतः आज आयें, कल शाम उन्होंने बगीचे में भी काम किया, भुट्टे बहुत हो रहे हैं, जिन्हें वे शाम को नाश्ते में खाते हैं. उसने भुने हुए भुट्टों के फायदे के बारे में कहीं पढ़ा था.

कर्म ही पूजा है, यह विचार इस समय उसके मन में प्रधान है. भक्ति की अपेक्षा कर्म का मार्ग उसे अधिक रुचता है, कर्म के द्वारा ही कोई अपने तथा अपने आस-पास के वातावरण, परिस्थितयों तथा स्तर में सुधार ला सकता है, कर्मयुक्त जीवन उहापोहों से भी दूर रहता है क्योंकि उसके पास विचार करने को अन्य कुछ नहीं रहता. कर्म, सद्कर्म हो यह लेकिन पहली शर्त है, ऐसा कर्म जो नैतिकता, धार्मिकता तथा आध्यात्मिकता के दायरे के अंदर ही हो, जो स्वार्थ युक्त न हो, ऐसा कर्म अपने आप ही भक्ति बन जायेगा. कल शाम को वह माँ के स्वास्थ्य के बारे में सोचती रही, मन कहीं और लग ही नहीं रहा था, आज सुबह फोन किया पर मिला नहीं, ईश्वर से प्रार्थना की तो चैन मिला. ईश्वर पर विश्वास किये बिना मानव का काम चल ही नहीं सकता. उसी का बनाया हुआ यह माया जाल है सो सब कुछ उसी पर छोड़कर चिंतामुक्त रहने में ही भलाई है.

आज उसे संगीत क्लास में जाना है, अभ्यास तो पिछले एक महीने में दो-चार बार ही हुआ फिर भी टीचर के साथ अभ्यास करने से उत्साह बढ़ेगा ही. आज उसे उस नये शिशु से मिलने भी जाना था पर वर्षा की झड़ी जो जून के दफ्तर जाने से पहले लगी थी रुकने का नाम ही नहीं ले रही है. अभी उसे भोजन बनाना है और नन्हे को पढ़ाई में मदद करनी है, वह आजकल रोज रात को देर से सोता है सो सुबह देर से उठता है, पर जब से घर से वे आये हैं साधारणतया खुश रहता है, उसके मित्र भी पढ़ाई में व्यस्त हैं सो फोन से ज्यादा डिस्टर्ब भी नहीं करते. आज बहुत दिनों बाद ‘जागरण’ सुना, बाबाजी आज भक्तिभाव में विभोर होकर नृत्य करने लगे थे, उसे लगता है हजारों लोग जो घंटों वहाँ बैठते हैं यदि कार्य करें तो देश का कितना कल्याण हो. लोगों का खुद कल्याण हो, हो सकता है वे श्रमदान के लिए शिविर भी लगते हों.  कल माँ-पिता से फोन पर बात हुई, माँ ने दवाएं न लेने या कम करने का फैसला किया है, दवाइयाँ खाना तो किसी को भी पसंद नहीं पर जब दवा जीने की शर्त ही बन जाये तो कोई कैसे छोड़ सकता है.





Tuesday, June 10, 2014

पर्दों की धुलाई


Days are passing smoothly, they are learning, enjoying and giving good company one-another. Jun, herself  and Nanha are in harmony these days. Weather is also good, Indian army is winning at border and Indian players are winning at Tennis. Leander paes and Mahesh Bhupati won Wimbledon double grand slam. Today in the morning father rang they are also waiting for Nanha’s birthday, which is falling on Saturday this week.

आज नन्हे का जन्मदिन है, सुबह उठा तो बहुत शांत था, वह किसी भी परिस्थिति में सामान्यतः शांत रहता है, न ज्यादा ख़ुशी जाहिर करता है और न ज्यादा दुःख या गुस्सा, अपनी उम्र के हिसाब से परिपक्व बच्चा, वैसे वह अब बच्चा न रहकर किशोर हो गया है. अपने बैडमिंटन सर के लिए चाय व मित्रों के लिए eclairs chocolates ले गया है. जून भी आज सुबह खुश थे, उन दोनों के लिए ही अपने पुत्र का जन्मदिन ख़ुशी का सबसे बड़ा कारण है. ईश्वर से प्रार्थना है कि वह उनकी इस ख़ुशी को सदा के लिए बरकरार रखे, उसे दीर्घायु दे, सफलता दे और दे समझदारी व विवेक. टीवी पर यह सुंदर भजन आ रहा है-

इतनी शक्ति हमें देना दाता, मन का विश्वास कमजोर हो न
नेक रस्ते पे चलते रहें हम भूल कर भी कोई भूल हो न !

उसने zee टीवी के राजेश आडवानी के लिए भी प्रार्थना की, कि सुबह को पवित्र करने वाली प्रार्थना सुनवाई. बाबाजी ने भी आज मन की एकाग्रता की बात सिखाई, बाधाओं को बादलों के समान मानने की कला भी, जो थोड़ी देर में कहीं उड़ जाते हैं.

पिछले चार दिनों से ही डायरी नहीं खोल पायी, आज समय है क्योंकि जुकाम हो जाने के कारण न ही व्यायाम करने का उत्साह है न संगीत अभ्यास करने का. सो समय अपने आप उपस्थित हो गया है. उसने अक्सर देखा है यदि कोई कार्य वे कुछ दिन न कर पाएँ और मन में उसे करने की अभिलाषा हो तो अपने आप वह हो जाता है. अर्थात परिस्थिति कुछ ऐसी बनने लगती है कि सारे कार्य समय आने पर पूरे होने लगते हैं. परसों शाम देर तक वह शावर में स्नान करती रही, गर्मी बहुत थी, पर नतीजा सर्दी लग गयी. कल सुबह पर्दे धोये, परसों बैठक में रंग हुआ था, सो सारे पर्दे धोकर लगाने का विचार था, अब जून भी कल शाम से जुकाम से परेशान हैं, दफ्तर गये हैं, सुबह उसने उन्हें सत्संग में सुनी ज्ञान की बातें सुनकर उत्साहित किया तो पहले अस्पताल जाने के बजाय दफ्तर ही चले गये. वह एक नन्हे बच्चे की तरह हैं, झट बात मान लेने वाले, हर इन्सान के अंदर एक बालक होता है, निष्पाप, सरल और...

सुबह से वर्षा हो रही है, मौसम भीगा-भीगा होने के साथ ठंडा भी हो गया है शीतल और नम हवा खिड़की के पर्दों को हिलाती उसके बालों और चेहरे को छू रही है. आज छुट्टियों के बाद नन्हे के स्कूल का पहला दिन है, सुबह जून उसे छोड़ने गये. घर में चुप्पी छायी है. अन्यथा नन्हे की आवाजें, टीवी की आवाजें और नहीं तो कम्प्यूटर. आज वह स्कूल की कक्षा में बैठ होगा, घर को याद भी नहीं कर रहा होगा. कल रात एक सखी परिवार के साथ रात एक बजे तिनसुकिया पहुंची, ड्राइवर लेने गये था, दो बजे घर पहुंच गये वे, यहाँ लगभग सभी ड्राइवर और कर्मियों दोनों को ही नशा करने की आदत है, अज्ञान वश अपनी सेहत तो बर्बाद करते ही हैं, अन्यों को भी परेशान करते हैं. कल रात तेज कार चलाने के कारण उन लोगों को डर भी लग रहा था. वृद्ध माता-पिता भी उनके साथ थे, बुढ़ापे में तरह-तरह के रोग घेर लेते हैं. उनके साथ ईश्वर है सो सब ठीक ही होगा. उसे याद आया, घर से पत्र आए कितने दिन हो गये हैं, रक्षा बंधन भी आने वाला होगा, दोनों बहनें तो घर पहुंच जाएँगी, बस वही हर साल डाक से राखियाँ भेजती है. कल टीवी पर ‘मन’ देखी.



Wednesday, April 24, 2013

गणपति बप्पा मोरया



श्रीलंका में ‘पीपुल्स अलाइंस’ को वरीयता, श्रीमती चन्द्रिका कुमार तुंगे नई प्रधान मंत्री चुनी गयी हैं. आज फिर एक अंतराल के बाद उसने डायरी खोली है, जबकि पिछले कई दिनों से मन में यह बात आ रही थी, अपने विचारों को केंद्रित करने का यही एकमात्र साधन है. पिछली रात से ही मस्तिष्क में विचार मंथन चल रहा है, यहाँ तक कि सुबह प्रार्थना के समय भी मन स्थिर नहीं रह पाया. लगा शायद तन के भारीपन के कारण ऐसा हुआ हो, सो दोपहर भोजन में फल ही लिए, एक नाशपाती और एक सेब. जून भी देर से आने वाले थे, अब तन हल्का है ही डायरी उठाते ही मन भी शांत है. कई बार वादा तोड़ चुकी है सो अब नियमित लिखने का कोई वादा नहीं, जबकि उसे मालूम है, यह उसके लिए नितांत आवश्यक है और वर्षों बाद कभी इस साल की कोई बात देखने के लिए डायरी खोलेगी तो खाली पन्ने उसका मुँह तो नहीं चिढ़ायेंगे. पिछले दिनों अपने करीब आने से बचने के लिए ही भागती रही इन पन्नों से. आज शाम को एक मित्र परिवार में बच्चे के पहले जन्मदिन की पार्टी में जाना है, याद आता है उनकी शादी के बाद उन्हें चाय पर बुलाया था. उसने पिस्ते के छिलकों से एक गणपति की आकृति बड़े से लकड़ी के बोर्ड पर बनाई है, उसे सेलोफेन पेपर से ढकना होगा धूल से बचाने के लिए और शिव-पार्वती की उस पेंटिंग को भी फ्रेम करना है जो भाभी ने बनायी था.

  कल शाम पार्टी में किसी दक्षिण भारतीय महिला ने कहा, यू हैव एन आर्टिस्टिक फेस, वर्षों बाद कोई ऐसी बात  सुनकर मन में कई भूली यादें ताजा हो गयीं. वह उसकी परिचिता नहीं थीं, और न ही उसने उनका नाम पूछा. पर घर आकर बाथरूम के शीशे में अपने ही चेहरे को ऐसे देखा जैसे पहली बार देख रही हो. पार्टी में जाने से पहले वे एक और परिचित के यहाँ गए थे, उसने ध्यान दिया अच्छा सामान स्टोर में रखा है और सामान्य सामान बाहर सजाया है. उसका मन हुआ कहे क्या एक दिन उन्हें घर सजाने में मदद कर दे.. ? जून को उसने कहा, वही, उस कम्प्लीमेंट के बारे में, कुछ नहीं बोले...तारीफ करने के मामले में थोड़ा कंजूस हैं, पर प्यार के मामले में नहीं. उसके स्वास्थ्य को लेकर जरा सा पता चल जाये तो इतना ध्यान रखते हैं..नन्हे का आज हिंदी का टेस्ट है, और सोमवार से उसके यूनिट टेस्ट भी हैं, अब उसे परीक्षा से कोई घबराहट नहीं होती, आनंद आता है. कल पार्टी में एक और परिवार मिला, वही जो उस दिन उनके यहाँ आये थे, जून के बीएचयू के प्रोफेसर तथा उनकी बेटी व दामाद. होस्ट अच्छी लग रही थी, बहुत जीवंत है वह, ढेर सारे स्वर्ण आभूषण और भारी बार्डर वाली साड़ी, थकावट का नामोनिशान नहीं था उसके चेहरे पर, शायद नन्हे के पहले जन्मदिन पर नूना भी इतनी ही खुश थी, किसी ने कहा भी था, बेटे से ज्यादा खुश माँ है. गमले में गुलाब का एक सुंदर फूल खिला है उसने सोचा, जून को दिखाएगी.

  सुबह के सवा दस हुए हैं, शनिवार को इस वक्त वह टीवी के सामने होती हैं, ‘जमीन-आसमान’ के पात्रों के साथ, लेकिन आज बिजली चली जाने के कारण पसीने में तर हवा के झोंके की प्रतीक्षा कर रही है. सचमुच अभी-अभी हवा का एक हल्का सा झोंका उसके चेहरे को सहला गया है. ‘धर्मयुग’ में उस लम्बी कहानी का अंत अच्छा नहीं हुआ, बुरे अंत भाते न हों, लेकिन होते हैं, वेद राही की कहानी में बांधे रखने की क्षमता थी. कल बहुत दिनों बाद वे एक परिचित के यहाँ गए, जून ने कहा, लुकिंग गुड, गले में नेकलेस पहन लेने से कितना अंतर आ जाता है व्यक्तित्व में, उसे अब बढ़ती उम्र के साथ इन बातों का ख्याल ज्यादा आ रहा है, शायद यही उचित भी हो. कल उन लोगों से भगवद् गीता का एक कैसेट भी लायी, अभी ध्यान से बैठकर नहीं सुना है, वाचक की आवाज उतनी मधुर नहीं है, पर उसे आवाज से क्या लेना, उनकी बात पर ध्यान देना होगा. सुबह-सुबह एक स्वप्न देखा, वे लोग घर गए हैं, राखी का दिन है पर वह राखी लाना ही भूल गयी है, सभी भाई बैठे हैं, इतने वर्षों में पहली बार ऐसा हुआ है कि शायद उसकी राखी वक्त पर नहीं मिलेगी. इसी कारण यह स्वप्न आया होगा. कल शाम उन्होंने कैरम खेला. खुली हवा में साइकलिंग की, अब उसे आसान लगती है, अभ्यास न होने के कारण ही पहले उसे परेशानी होती थी.  




Wednesday, March 13, 2013

एक योगी की आत्म कथा



कल दोपहर जून ने बताया, फोन पर छोटी बहन बहुत उदास थी, यह सुनते ही नूना को भी अपने मन पर वश नहीं रहा, बहुत देर तक मन में यही एक बात गूंजती रही, इससे हटने के लिए वह अपनी एक सखी के पास चली गयी, जब वापस लौटी मन शांत हो चुका था, इसका अर्थ है कि यदि कोई  परेशान है तो वातावरण में परिवर्तन से काफी सहायता मिल सकती है. उसके यहाँ फ्रॉक भी देखे, भांजी के लायक कोई पसंद नहीं आया, उसने एक और दिखाने का वायदा किया है. ईश्वर से प्रार्थना ही कर सकते हैं वे छोटी बहन के लिए, उसे साहस दे, अच्छे-बुरे का ज्ञान दे और सहनशक्ति भी. सपनों में जीना छोड़कर वह जितना जल्दी हो सके यथार्थ को अपना ले. कल शाम को वे एक उड़िया परिवार से मिलने गए, वही हर बार की तरह..ज्यादातर दूसरों की बातें....उस दिन चित्रहार में एक अच्छा गाना आ रहा था- दूसरों की बुराई जब किया कीजिये...सामने आईना रख लिया कीजिये. हाँ एक बात अच्छी हुई, उसके पास भगवद्गीता के कैसेट हैं, सभी अध्यायों के संस्कृत में श्लोक फिर उनका हिंदी अनुवाद. पहला अध्याय थोड़ा सा सुना.

 “एक योगी की आत्मकथा” उसकी सखी ने परसों दी थी, अभी कुछ देर पूर्व कुछ पृष्ठ पढे, ईश्वर पर विश्वास करो तो वह किस-किस तरह हमारी सहायता करता है, मन संशय युक्त हो तो विश्वास टिक नहीं पाता और इसलिए सहज प्राप्त ईश्वर की दया भी दिखाई नहीं देती, कितनी ही बार स्वयं उसने इस बात का अनुभव किया है, सच्चे मन से निस्वार्थ प्रार्थना कभी भी बेकार नहीं गयी, लेकिन मन ईश्वर की कृपा को कितनी जल्दी भूल जाता है और फिर संशयात्मक हो जाता है. इस पुस्तक को पढ़ने पर उसकी ईश्वर में श्रद्धा दृढ़तर होगी ऐसा उसे विश्वास है. क्या वह किसी को एकांतिक अहैतुक प्रेम दे पायी है...ऐसा प्रेम जो निस्वार्थ हो..सिर्फ देना जानता ओ...किसी एक क्षण भी ऐसा प्रेम किया है उसने...प्रेम में अपना सुख अपनी खुशी सर्वोच्च रखता है मनुष्य, लेकिन वह प्रेम नहीं है..वह तो दुनियादारी है..सौदा है. यह सच है कि वह अपने परिवार से बेहद प्रेम करती है, उनका दुःख उससे सहन नहीं होता..परन्तु फिर भी ऐसे कई अवसर आए हैं जब अपने स्वार्थ को ऊपर रखा है. प्रयत्न करेगी कि ऐसा न हो..कल उन्होंने सर्कस देखी. अजब करतब दिखाते है ये लोग, जिन पर हैरत से आँखें खुली रह जाएँ, लेकिन जानवरों की निरीहता देखकर मन में पीड़ा होती है.

  छोटी बहन को उस दिन फोन तो नहीं कर सकी लेकिन अभी-अभी एक पत्र लिखा है जो उम्मीद है उसके कुछ काम आयेगा.. कल वे तिनसुकिया गए थे, वह मोदी का ‘क्विक स्टिच किट’ लाई है, आज दोपहर शुभारम्भ करेगी. कल लेडीज क्लब की मीटिंग है, उसकी पुरानी  पड़ोसन भी क्लब ज्वाइन कर रही है. पिछले तीन-चार दिनों की तरह आज भी वर्षा हो रही है. आज सुबह बहुत दिनों बाद नींद देर से खुली, जून जल्दी-जल्दी में कुछ खाकर ऑफिस गए.

  उस दिन यानि नरसों, सोमवार को जून दोपहर को घर आए तो स्वस्थ नहीं थे, हल्का ज्वर था, तब से आज तक ज्वर बढता-घटता तो रहा है पर उतरा नहीं है. आज बृहस्पतिवार है, आज दोपहर अस्पताल जायेंगे. वह इसी कारण मीटिंग में नहीं जा पायी, उसने कल भी और आज भी ईश्वर से प्रार्थना की है और उसे पूर्ण विश्वास है, आज वह बिलकुल ठीक हो जायेंगे. ईश्वरसे प्रार्थना करना मात्र उसके लिए शब्द नहीं हैं परन्तु एक अनुभव है. ‘एक योगी की आत्मकथा’ पढकर तो लगता है ईश्वर यहीं उसके पास है, हवा में, धूप में, फूलों की सुगंध में, बादलों में और उसके अंतर्मन में भी. उसने उसे वचन दिया है कि अब वह सांसारिक वस्तुओं का मोह नहीं करेगी क्यों कि उसकी  सभी आवश्यकतायें तो वह स्वयं ही पूर्ण करता है. इच्छा करने से पहले ही वह उसे जान जाता है. उसने यह भी कहा है क कभी किसी को मनसा, वाचा, कर्मणा दुःख नहीं पहुंचायेगी, और न ही किसी कई बुराई या निंदा में भाग लेगी. उसके मन में सभी के प्रति समान भाव है और उसके जून का भी. वह उसके सभी वचनों में शामिल है.