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Wednesday, May 20, 2026

‘त्रिपुरा रहस्य’

‘त्रिपुरा रहस्य’


कल से संसद का सत्र शुरू हो रहा है।परसों गुजरात व हिमाचल प्रदेश में हुए चुनावों का परिणाम भी आ जाएगा। फुटबॉल का विश्व कप चल रहा है। आज वे जून के पूर्व उच्च अधिकारी के घर गये, जहां एक अन्य सहकर्मी भी मिले।मेज़बान महिला ने घर का बना ‘मुरक्कु’ खिलाया, जो दक्षिण भारत का एक कुरकुरा स्वादिष्ट पारंपरिक नाश्ता है, ‘मुरुक्कु’ का अर्थ है मुड़ा हुआ। उन्होंने साथ में ताजा निकाला संतरे का रस पीने को दिया। कुछ देर सब पुरानी यादें ताजा करते रहे,  इसके बाद सब लंच के लिए ‘पाकशाला’ गये। जहाँ सबकी पसंद थी, ‘उत्तर भारतीय भोजन’ दोपहर बाद वे घर लौटे। शाम को पुन: गले में दर्द महसूस हुआ। 


आज स्वास्थ्य कल से बेहतर है। कई बार नमक मिले गुनगुने पानी से गरारे किए और भाप भी ली।कल रात को देखे अनोखे स्वप्न के कारण आज जीरा-धनिया का पानी पिया और उसकी सुगंध भी ग्रहण की। आज एक अच्छी हास्य फ़िल्म देखी, ‘नज़र अन्दाज़’, जिसमें एक उदार अंधे व्यक्ति की कहानी है। उनकी नौकरानी और एक चोर के बीच हुई रोचक प्रतिस्पर्धा की कहानी ! गुजरात में बीजेपी और हिमाचल में कांग्रेस को विजय हासिल हुई है।आज दोपहर छोटे भाई का फ़ोन आया, बिहार के मुज्ज़फ़रनगर के उस आश्रम से, जहाँ असम में रहने वाली  नूना की एक परिचिता रहने गयी थी, पर लौट आयी।आश्रम के संचालक ने उससे विवाह तो किया पर निर्वाह नहीं कर पाये, वैसे यह बेमेल विवाह था। आज उसने पहली बार आई पैड पर लिखा, आश्चर्य है, इतने दिनों से अभ्यास क्यों नहीं किया।बहुत आसान है उस पर लिखना और इसे यात्रा में साथ भी रखा जा सकता है। शाम को छोटी बहन का फ़ोन आया, पंजाब में उनके मकान को बेचने में आने वाली अड़चनें घटने का नाम ही नहीं ले रही हैं। उन्हें अदेयता प्रमाणपत्र नहीं मिला है। घर के लिए अठारह साल पहले ऋण लिया गया था, जिसका कोई रिकॉर्ड नहीं है। 


आज नन्हा आया था, सोनू असम में है। परसों सुबह उन्हें एक और यात्रा पर निकलना है। सुबह साढ़े छह बजे नन्हा उन्हें एयरपोर्ट ले जाएगा।आज वे पहली बार आर्ट ऑफ़ लिविंग के श्रीश्री आयुर्वेदिक अस्पताल गये, आना-जाना मिलाकर तीन घंटे लग गये। वैद्य ने सर्दी के लिए एक हफ़्ते की दवा दी है और बाद में सामान्य आरोग्य के लिए एक महीने की। ‘मृणाल ज्योति’ की रजत जयंती का उत्सव संपन्न हो गया। अगले हफ़्ते उन सभी से नूना की भेंट होगी। 


आज पूरे एक हफ़्ते बाद इस डायरी में लिख रही है। दोनों यात्रायें अच्छी रहीं। पूरे विश्वास और धैर्य के साथ सफ़र का आनंद लिया, घर वापस आकर भी अच्छा लग रहा है। कल से घर की बायीं दीवार पर रंगरोगन होगा, जो दो साल से साथ वाले मकान के निर्माण के दौरान स्वच्छ नहीं रह पायी है। 


आज महीनों बाद उसने ब्लॉग्स पर पोस्ट प्रकाशित कीं, पूरी पाँच पोस्ट ! अच्छा लग रहा है।असम में जब थी तो कभी-कभी ही होता था कि कुछ न लिखे। जब कोई रचनात्मक होता है तो ईश्वर उसके साथ होते हैं। हर कर्म में देव का योगदान तो होता ही है। चेतना ही मन-देह के द्वारा अभिव्यक्त हो रही होती है। दीदी से बात हुई, उन्हें डाक्टर ने घुटने बदलवाने की बात कही है, यह भी कहा है, अभी कोई जल्दी नहीं है।कुछ दिन की दवा भी दी है। पापाजी ने कहा, मोबाइल पर जो गेम वह खेलते हैं, उसके पैसे भी देने चाहिये, आख़िर किसी ने इतनी मेहनत से बनाया है।वह अति आदर्शवादी हैं।


आज शाम उसने ‘त्रिपुरा रहस्य’ का कुछ अंश सुना, ‘ललितासहस्रनाम’ में  देवी त्रिपुर सुंदरी के स्वरूप, महत्व और रहस्य को बताया गया है। कितने सरल शब्दों में आत्मा का ज्ञान दिया है, और यह भी कहा है कि आत्मा का ज्ञान देना ऐसा ही है जैसे कोई कहे कि उसे उसकी आँखें दिखला दो।आज उसने गुरुजी के नये वर्ष के दो संदेशों का अनुवाद किया। गूगल की सहायता से काम बहुत सरल हो गया है। समाचारों में सुना, चीन में कोरोना के केस बढ़ रहे हैं, अन्य कई देशों में भी कोरोना अभी समाप्त नहीं हुआ है। दोपहर को वे नन्हे के यहाँ गये थे, उसे लेकर एसबीआई होम लोन की दो शाखाओं में गये, अब उनके घर का कोई लोन बकाया नहीं है। अगले महीने मकान के कागज मिल जाएँगे। 


आज आँख है कि भर-भर आती है, प्रेम की इस तरह की तड़प का अनुभव बहुत दिनों बाद हुआ। यह भी परमात्मा की कृपा है, वह भावपूर्ण हृदय से ही ज़्यादा संतुष्ट होते हैं, उन्हें ज्ञानी भक्त ही प्रिय हैं, रूखा-सूखा ज्ञानी नहीं ! प्रीत के आँसुओं से भरकर जब कोई गोपी कृष्ण को याद करती होगी, तो वह रह ही नहीं पाते होंगे, आत्मिक रूप से उसके भीतर आकर उसे सांत्वना देते होंगे, प्रेम का अनुभव केवल प्रेम के लिए कैसा होता है, भक्ति यही सिखाती है, उसमें कोई चाह नहीं है, अपनी माँग नहीं है, बस यही भावना है कि सामने वाले को कोई दुख न हो, वह प्रसन्न रहे। जब अन्य का दुख देखा न जाये और उसे मिटाने का भाव भीतर प्रबल हो जाये तब समझना चाहिए कि प्रेम अपने शुद्ध स्वरूप में है। ईश्वर प्रतिपाल उसके साथ है, बल्कि वही है ! आज शाम को वे एक घंटा टहलते रहे, फिर ‘योग निद्रा’ की, पहले श्रम फिर विश्राम, बहुत अच्छा अनुभव था। आज भी अनुवाद कार्य किया, गुरुजी ने कितने ही विवादों का हल करने में विश्व की मदद की है। बहुत दिनों बाद उसने ‘चिदाकाश गीता’ पढ़ी। जो महान अवधूत संत भगवान नित्यानन्द के मुख से निकले आध्यात्मिक वचन हैं। जिनमें वह अहंकार का नाश करके, वैराग्य को साधकर, साक्षी भाव का अभ्यास करने की बात कहते हैं । गुरुजी की तरह वह भी कहते हैं एक ही सत्ता से, एक ही ब्रह्म चेतना से सब कुछ निर्मित हुआ है। यह अद्वैत बोध पहले समाधि में घटित होता है, फिर सहज हो जाता है ।   


आज क्रिसमस है, संदेश भेजे और संदेश आये। नन्हा सुबह आ गया था, शाम को गया, पहले गो- कार्टिंग फिर घर।कह रहा था, अगले हफ़्ते वे सब नये वर्ष का स्वागत करने कहीं बाहर जाएँगे, सोनू भी वर्ष के अंतिम दिन आ जाएगी। वे लोग अगले वर्ष मार्च में घर जा सकते हैं, पापाजी को आश्चर्य होगा, दीदी-जीजाजी को भी।


Tuesday, May 19, 2026

चैत्य भूमि मुंबई


चैत्य भूमि मुंबई 



आज सुबह कोहरा बेहद घना था, पचास मीटर से आगे कुछ दिखायी नहीं दे रहा था। दिन भर ठंड बनी रही। पापाजी को ‘वर्ड्स ऑफ़ वंडर’ गेम का लिंक भेजा है, शायद उन्हें पसंद आये। आज स्वतंत्रता सेनानी वीर सावरकर की एक पुस्तक ‘हिंदुत्व’ के कुछ पृष्ठ पड़े, बहुत प्रभावशाली लेखन कला है उनकी।उनके अनुसार जो व्यक्ति सिंधु नदी से लेकर समुद्र तक फैली इस विशाल भूमि को अपनी पुण्यभूमि मानता है, वही हिंदू है।हिंदुत्व केवल एक धार्मिक आस्था नहीं है, यह व्यक्ति की सांस्कृतिक, ऐतिहासिक और राष्ट्रीय पहचान है। नूना ने सोचा, वे अपने छोटे-छोटे कार्यों में ही लगे हुए हैं कि समाज और देश के प्रति भी उनका कुछ कर्त्तव्य है, इसका चिंतन नहीं करते। 


आज रविवार है, बच्चे नहीं आये।शनिवार की सुबह वे आ गये थे, मिलकर व नाश्ता करके चले गये। आज अपने किसी मित्र के साथ ‘कॉमिक कॉन’ गये हैं। इस आयोजन में कॉमिक्स की नयी व पुरानी किताबें ख़रीदने, पढ़ने और भारतीय व विदेशी कलाकारों व कॉमिक रचनाकारों से  मिलने का मौक़ा मिलता है। यहाँ कुछ लोग कॉमिक  किरदारों की वेशभूषा भी पहन कर आते हैं।  नन्हे ने वहाँ से फ़ोटो भेजे हैं।आज पापाजी को फ़ेसबुक पर लिखते देखकर अच्छा लगा, वह वहाँ शेरों-शायरी लिख सकते हैं। उन्होंने शब्दों का खेल भी खेला, कह रहे थे, बहुत रोचक है।


आज सुबह वे टहलने गये तो आकाश पर हल्के बादल थे पर नूना ने जरा आँख गड़ाकर देखा तो तारे भी दिखाई दिये। वह तारामंडल भौतिक जगत का था या किसी दूसरे आयाम का, यह एक रहस्य है। भीतर भी एक आकाश है, चित्ताकाश तथा चिदाकाश, जिसमें चाँद-तारे भी होते हैं; वैसे ही जैसे सूक्ष्म शरीर की भी सूक्ष्म इंद्रियाँ होती हैं। दिव्य गंध, ध्वनि, दृश्य तथा स्पर्श उन्हीं के द्वारा अनुभव में आते हैं।मन से कई परतें खुल रही हैं, परमात्मा ही जैसे निर्देशित करता है या गुरुजी स्वयं ! आज सुबह वे असमिया पड़ोसियों से मिलने गये, उन्होंने न्यूजर्सी में अपनी पुत्री के यहाँ किए अपने प्रवास की बहुत सी बातें बतायीं। वे व्हाइट हाउस देखने भी गये और ग्रेट कैनियन भी, न्यूयार्क भी गये। उन्होंने एक फ्रिज मैगनेट और एक कैंडल स्टैंड उपहार में दिये। 


आज सुबह उठे तो वर्षा हो रही थी, शाम को कुछ देर थमी, वे छाता लेकर टहलने गये। सड़क पर बहुत कम लोग थे। इस समय भी बारिश हो रही है। मौसम काफ़ी ठंडा हो गया है।आज पहली बार ‘ब्रिज’ खेल का पहला पाठ सीखा। असमिया पड़ोसी, जो कभी ब्रिज के चैंपियन रह चुके हैं, एक मित्र को अपने साथ लाए थे, जो आर्ट ऑफ़ लिविंग में काम करते हैं। यह रणनीतिक और मस्तिष्क का खेल है। इसमें दो काम करने होते हैं, पहला, बोली लगाना, दूसरा खेलना। जो सबसे बड़ी बोली लगाता है, उसका साथी कार्ड खोल देता है।उसे खेल कुछ-कुछ ही समझ में आया। आज भी पापाजी ने फ़ेसबुक पर उसकी कविताओं पर कमेंट किया, वह नियमित रूप से पढ़ते हैं। 


आज भी दिन भर वर्षा होती रही। सुबह देर तक योग अभ्यास किया, क्योंकि बाहर जा ही नहीं सकते थे।आपदा को अवसर में बदलना चाहिए न। मन में तीव्र भाव था कि अब जो कुछ भी होगा, ईश्वर के लिए होगा, ईश्वर के द्वारा होगा।परमात्मा के सिवा जब कोई दूसरा है ही नहीं तो उनके होने में भी तो वही झलकता है। शाम को गुरुजी द्वारा ‘नारद भक्ति सूत्रों’ की व्याख्या सुनी। बहुत संक्षिप्त तथा सरल शब्दों में उन्होंने बताया, भक्ति के मर्म को बताते ये सूत्र अनमोल हैं। सुबह उन्हीं के मुख से ‘रुद्रम’ सुना था। परमात्मा के सिवा इस जग में जानने योग्य कुछ भी तो नहीं है, उसे जानकर सब जान लिया जाता है।वह तो ऊर्जा के रूप में हर जगह मौजूद है, उन्हें ही स्वयं को उसकी ओर उन्मुख करना है।शेष काम उनके ऊपर छोड़ देना है।   

सुबह वे चार बजे से भी पहले उठ गये थे। नहा-धोकर तैयार होकर सात बजे नन्हे के यहाँ पहुँच गये। उनके विवाह की वर्षगाँठ मनाने। केक, मिठाई व फूल लेकर गये थे, उनके कुक ने दक्षिण भारतीय नाश्ता बनाया था। दस बजे नन्हा ऑफिस गया और वे घर लौट आये। सोनू को दिन में भाई के साथ आइकिया जाना था। 

सुबह ऑन लाइन योग अभ्यास किया, गुरुजी की आवाज़ सुनकर सुदर्शन क्रिया भी। एक घंटा पलक झपकते बीत गया। आज बड़ा भांजा आया था, वह अपने विवाह की तैयारियों की बातें बता रहा था।पापा जी से बात हुई, नन्हे की भेजी रज़ाई और गर्म कपड़ों के बारे में बता रहे थे। 


आज दिन भर बादल बने रहे पर बरसे नहीं। नन्हे-सोनू का फ़ोन आया, वे इंदौर से पाँच बजे निकले थे, उज्जैन में साढ़े आठ बजे उनकी उड़ान थी। दो घंटे का रास्ता है, पर राहुल गांधी की ‘भारत जोड़ो यात्रा’ के कारण यातायात में फँस गये। किसी तरह एक अन्य रास्ते को तलाश कर अंततः फ्लाइट पकड़ ली। छोटी भांजी के विवाह में शामिल होने के लिए परसों उन्हें भी यात्रा पर निकलना है।


यात्रा की तैयारी हो गई है। आज रास्तृपति मूर्मू का भाषण सुना, उनके मन में जेल में बंद व्यक्तियों के प्रति बहुत सहानुभूति है, वह चाहती हैं कि जेलों की संख्या न बढ़ायी जाये बल्कि जो क़ैदी वर्षों से  बिना मुक़दमा चले बंद हैं, उन्हें निकाला जाये।जितना समय कोई इस दुनिया में है, यदि किसी के काम आ रहा है तो अच्छा है। उसका होना किसी के दुख का कारण न बने, परमात्मा के सान्निध्य को महसूस करके वह उसकी शक्तियों का वाहक बने, उसकी प्रकृति के साथ एकत्व का अनुभव करके भीतरी आनंद को जगत में बिखराये।  

  

कल रात तीन दिन बाद वे घर वापस आ गये थे।विवाह अच्छी प्रकार से संपन्न हो गया। आज सुबह चार दिनों बाद प्रात: भ्रमण के लिए गये। शाम को पापाजी से बात हुई। कहने लगे, सुबह-सुबह ठंड के कारण वह अपने काम ठीक से नहीं कर पाते हैं, समय लगता है।यात्रा से आने के बाद उसे भी ठंड लग गई है।इतने सारे लोगों से मिलना, बाहर का खाना, नींद पूरी न होना, कितने ही कारण हो सकते हैं। आज की तरह अगले कुछ दिन भी मौसम बदली भरा रहेगा। आज अंबेडकर का महापरिनिर्वाण दिवस है। उनका देहांत ६ दिसंबर १९५६ को दिल्ली में हुआ था, पर मुख्य कार्यक्रम चैत्य भूमि मुंबई में होता है। उसनकी अस्थियाँ इसी स्थान पर विसर्जित की गई थीं। यह दिन सामाजिक न्याय, समानता और मानवाधिकारों के लिए उनके अतुलनीय योगदान को याद करने का प्रतीक है।  


Wednesday, January 10, 2018

बगीचे में काली मुर्गी


शाम के पाँच बजने को हैं, बाहर तेज धूप है, सो अभी लॉन में जाने के लिए आधा घंटा प्रतीक्षा करनी होगी. मालिन बर्फ मांगने आई थी, वे एयर कंडीशन कमरे में बैठे हैं, उनके यहाँ बहुत गर्मी होगी. बरामदे से एक जंगली काली मुर्गी मुँह में अपने से भी बड़ा एक घास का टुकड़ा लेकर दौड़ते हुए दिखी,  हुए दिखी, दूसरी अपनी पूँछ हिलाकर मुँह से आवाज कर रही थी. वे जाने किस भाषा में बातें कर रही थीं. उन्हें भी ऐसा ही लगता होगा कि अन्य प्राणी किस भाषा में बात करते हैं ! ‘भारत एक खोज’ में आज औरंगजेब का द्वितीय भाग देखा. नब्बे वर्ष तक जीया था वह अपने भाइयों व पिता को मरवा व कैद करवा कर. आगे शिवाजी का प्रकरण आरम्भ होगा. दोपहर को एक स्वप्न देखा. एक नन्हा बच्चा उसकी गोदी में है और कुनमुना रहा है. उसे चुप कराते उठा लेती है और वह लिपट कर सो जाता है. नैनी माँ बनने वाली है शायद इसी से जुड़ा हो यह स्वप्न या फिर ओशो की उस बात से कि हर स्त्री माँ होती है और तब जून का भी ख्याल हो आया. मन कृतज्ञता से भर गया था. परमात्मा ही तो विभिन्न रूपों में आकर उनकी मदद करता है. जीवन कितना विचित्र है. यहाँ रहस्यों की परतें कभी समाप्त ही नहीं होतीं. सुबह उठी तब भी एक विशेष स्वप्न देखा था, अब जरा भी याद नहीं है पर तीन बजे थे. नन्हे से बात की, वह घर पर ही था. भोजन की समस्या अब उसकी हल हो गयी है. उसके कॉलेज के फोटो फेसबुक पर पोस्ट किये वह उनींदा लग रहा है. शांति निकेतन की यात्रा के चित्र भी प्रकाशित किये. कल बीहूताली यानि ओपन थियेटर में योग कैम्प है, वह नौ बजे जाएगी. विश्व योग दिवस मनाया जा रहा है.

आज मौसम कल रात की गर्जन-तर्जन के बाद ठंडा है. उसे लग रहा है, प्राणशक्ति कुछ कम हुई है. ध्यान जो नहीं किया, रात को शोर से नींद खुल गयी. परमात्मा से जुड़े रहकर ही वे प्राणवान बनते हैं. आज शाम को मीटिंग है, क्लब का संविधान बन रहा है. फेसबुक पर रश्मिप्रभाजी ने परिकल्पना ग्रुप में उसे शामिल किया है. उसके ब्लॉग का जिक्र किया है. वह बहुत कर्मशीला हैं और सभी को जोड़कर रखना उनका स्वभाव है. उनके भीतर ऊर्जा का एक अनंत स्रोत है जो इस उम्र में भी उन्हें इतना गतिशील बनाये है.

मौसम ने फिर मूड बदला है, गर्मी है बाहर. वृक्षों के नीचे भी हवा महसूस नहीं हुई. पिछले कई दिनों से वह वहीं टहलते हुए चाय पीती थी. पूना के आकाश में कल पूर्ण इन्द्रधनुष देखा गया जिसे ब्रह्म धनुष का नाम दिया गया है. आज फेसबुक पर नन्हे के चित्र में उसका एक मित्र भी था, जाने कैसे उसने देख ली और फ्रेंड रिक्वेस्ट भेज दी है. नन्हे का वह तिब्बती मित्र कुछ दिन उनके यहाँ रहा था. अच्छा लगा था. उसने बौद्ध धर्म पर दो किताबें भी भेजी थीं. अब पढ़ने से शायद कुछ और प्रकाश मिले, उसने सोचा पुनः उन्हें निकालेगी.  

Wednesday, April 5, 2017

नन्ही चिड़िया


परसों नवरात्र का अंतिम दिन था. वह अस्पताल में थी. टीवी पर माँ दुर्गा की सुंदर मूर्तियों के दर्शन किये थे. कमरे के बाहर लगातार पानी गिर रहा था, उसी का शोर नींद आने में बाधा डाल रहा था. लेकिन भीतर रंगों व ध्वनियों का एक अनोखा संसार है, वहाँ जड़-चेतन का कोई भेद नहीं है, परमात्मा वहीँ है, वहाँ सौन्दर्य है. रात को देखा, वह गहन गुफाओं से गुजरती है, टेढ़े-मेढ़े रास्तों पर सहजता से बढ़ती जाती है. सुंदर दृश्य भी थे और अँधेरे भी, दिव्य लोक भी थे और सामान्य जन भी. कभी सामान्य जीवन के कितने ही दृश्य दिखे, बड़ी फैक्ट्रियां और लोग, अब ठीक से याद नहीं आता. जब तक यह हुआ, शरीर का सुख-दुःख कुछ भी याद नहीं रहा. याद रहा तो पानी का स्पर्श, पानी में सहज तैरकर या उड़कर एक स्थान से दूसरे स्थान पहुंचना.

कल रात्रि अस्पताल के कमरा नम्बर पांच व बेड नम्बर एक सौ अट्ठारह पर पड़े हुए भीतर कविताएँ फूटतीं देखीं. रंगों का सुंदर मुजस्मा था. शब्द नहीं हैं जिसे कहने को, हीरों, मोतियों, माणिकों के अद्भुत सुंदर रंगीन नजारे, फूलों की नदियाँ, खिलते हुए सहस्रदल कमल और चमकता प्रकाश, तारे, सुंदर ध्वनियाँ, रुनझुन सी आवाजें..ऐसा अद्भुत फूलों का उपवन, खिलते हुए बैंगनी, गुलाबी, लाल, नारंगी, पीले रंगों वाले फूल, जाने कौन खिला रहा था. परमात्मा उनके भीतर है, वह इतना सुंदर है सुना था, पढ़ा था, संतों की वाणी सुनी थी, वह जैसे सच बन कर प्रकट हो रही थी. एक तरफ इतना अपार आत्मिक आनंद, दूसरी तरफ दैहिक कष्ट. इस जीवन का एक-एक पल रहस्यों से भरा हुआ है. चार दिन अस्पताल में रहने की बाद आज घर लौटी है. अभी तबियत पूरी तरह ठीक नहीं है. इतनी सारी दवाएं भीतर गयी हैं, देह को सामान्य होने में वक्त तो लगेगा. जब तक देह साथ दे तभी तक जीवन है. पिताजी की आवाज दूसरे कमरे से आ रही है, वह उठ गये हैं. जून दफ्तर गये हैं. उसके कारण सभी परेशान हैं. इन्सान की जीवन यात्रा सुख-दुःख के दो तटों के मध्य बहती है, द्वन्द्वों से युक्त है यह जीवन. जहाँ से सुख मिला है, दुःख मिलेगा ही. कई दिनों बाद लिख रही है, अपने ही हाथों को अजीब लग रहा है. पेन से लिखना वैसे भी कम हो गया है. टाइप ही करती है. शाम तक या कल तक वह भी शुरू कर देगी.

कल रात एक अद्भुत स्वप्न देखा. वह कहीं जा रही है, लेकिन चलना उसका नहीं हो रहा. मार्ग स्वयं ही चल रहा है, एक व्यक्ति उसे परेशान करना चाहता है तो एक नजर से ही वह दूर चला जाता है. सामने विशाल आकाश पर सुंदर बेल-बूटे बने हैं, बचपन में एक स्वप्न में आकाश में बड़े राजमहल व हाथी देखे थे, वैसा ही स्वप्न था लगभग. आगे जाते ही एक वाहन में सवार चार व्यक्ति उसे सुनसान सड़क पर अकेले देखकर चिढ़ाने के मूड में आ जाते हैं, वह उन पर चिल्लाती है फिर गर्दन हिलाती है, एक लड़की वैसा ही करने लगती है तो वे सभी वैसा ही करते हैं और सम्मोहित होकर वहीं गिर जाते हैं. आगे जाती है तो दूर से कोई पुकार लगाता हुआ आता है. उसके हाथ जुड़े हैं, मानो वह उसका इंतजार ही कर रहा था. देखती है वह एक चिड़िया थी, नन्ही सी, जिसके तन पर घाव थे, वह एक हाथ में लेकर उस पर दूसरा हाथ फेरती है और कहती है वह ठीक हो जाएगी, चिड़िया मानवी भाषा में उससे बात करती है. यह स्वप्न बताता है अहंकार पहला व्यक्ति था, चार विकार चारों व्यक्ति थे और घायल चिड़िया उसका मन, जिसे उसे स्वस्थ करना था. लगता है अब उसके जीवन में बड़ा परिवर्तन होने वाला है. कुछ बदलाव पहले ही शुरू हो गये हैं. जून उसका बहुत ध्यान रख रहे हैं, शारीरिक दुर्बलता का अहसास कभी-कभी होता है पर मानसिक शक्ति अनंत गुणा बढ़ गयी है. परमात्मा उसके पोर-पोर में समा गया है, वही तो है, उसके सिवा कुछ है भी कहाँ ? वह परमात्मा ही ‘वह’ बनकर बैठा है, अब जब वही है तो वही रहे..अब उसके सिवा यहाँ कोई नहीं है. जो उससे मिलने आएगा वह खाली ही जायेगा, क्योंकि यहाँ ‘अहम्’ नहीं है अब ‘त्वम्’ ही है.  



Monday, August 8, 2016

बुलवर्कर का विज्ञापन


आज उसने सुना, ‘तत्व’ ज्ञान के बाद दुखों के संयोग से वियोग हो जाता है तथा परमात्मा के साथ योग ! ध्यान के बाद जिस आनंद का अनुभव वे करते हैं, वह सत्वगुण का आनंद है, जिससे वियोग हो सकता है. बीच-बीच में जो उसके मन की स्थिति विचलित हो जाती है, वह इसी कारण कि अभी तीनों गुणों से पार हो जाने पर मिलना वाला सुख उन्हें नहीं मिला. क्या है यह तत्व ! नहीं जानती पर सद्गुरू की कृपा से उसे नित नवीन अनुभव हो रहे हैं, भीतर जरा सा भी उद्वेग होता है तो कोई तत्क्षण सचेत कर देता है. आज ध्यान में बचपन में दादाजी के पास आने वाले एक सन्यासी को देखा जिन्हें कभी-कभी वह भोजन कराया करते थे. फिर बुलवर्कर शब्द आया जो बड़े भैया मंगाना चाहते थे, उसके विज्ञापन उनके पास आते थे. जीवन रहस्यों से भरा हुआ है पर पुराने अनुभवों व मान्यताओं से ग्रसित मन की उस तक नजर ही नहीं जाती. जो उसे देख लेता है प्रतिपल आनन्द की वृद्धि का अनुभव करता है, ऐसा सुख से भरा यह जीवन है कि जितना लुटाओ खत्म ही नहीं होता. नित नवीन परमात्मा का यह संसार भी नित नवीन है.

आज आत्मा के विषय में फिर सुंदर वचन सुने. आत्मज्ञान हुए बिना मुक्ति सम्भव नहीं है. आत्मा के सात गुण हैं – शांति, आनंद, सुख, प्रेम, ज्ञान, पवित्रता और शक्ति, जिनकी कमी से जीवन अधूरा ही नहीं रहता बल्कि उसमें घुन लग जाता है. पीड़ा का घुन, अशांति, दुःख, घृणा व दुर्बलता के कीट उसमें बसेरा कर लेते हैं. शांति यदि न हो तो नर्वस सिस्टम रोगी हो जाता है. आनंद न हो तो अंतरस्रावी ग्रन्थियां अपना काम ठीक से नहीं करतीं. सुख न हो भोजन ठीक से नहीं पचता, प्रेम न हो हृदय रोग होने का खतरा है. पवित्रता न हो तो कर्मेन्द्रियाँ रोगी हो जाती हैं तथा शक्ति न हो तो संकल्प दृढ़ नहीं हो पाते. इन सभी रोगों का इलाज योग के पास है. योग होते ही आत्मा के द्वार खुल जाते हैं और जीवन में विस्मय हो तो योग घटित होता है. विस्मय घटित होने के लिए जरूरी है कि वे स्वयं को जानकार न मानें, बालवत हो जाएँ, तभी हर समय जगत अपने पर से पर्दा हटाकर नवीनता का दर्शन कराएगा !


छोटी बहन उदास है. वह द्वंद्व का शिकार हो गयी है. नौकरी छोड़ना भी चाहती है और करना भी चाहती है. उसने स्वयं को मानसिक व शारीरिक तौर पर रुग्ण बना लिया है. कल रात उससे बात हुई. उसकी सखी उदास है जो विवाह के इतने वर्षों बाद भी सासूजी से एडजस्ट नहीं कर पायी है. वह स्वयं कितनी बार यह अनुभव कर चुकी है कि अपनी ही मान्यताओं के दायरे में बंधा मन स्वयं उनसे टकरा – टकरा कर घायल होता है फिर अपने भाग्य को दोष देता है. दुखी होने को अपनी उपलब्धि मानता है और दया के पात्र होकर जीने में भी उसे कोई शर्म महसूस नहीं होती. उसका जीवन एक विडम्बना के रूप में सामने आता है जिसमें रस नहीं.. प्रेम नहीं..कला नहीं..आनंद नहीं..ऐसा जीवन जो खिलने की सम्भावना लिए था पर अपनी ही कमजोरियों के कारण जो पीड़ा का स्रोत बन गया, जहाँ उपवन पनप सकते थे, घास पतवार उग आती है. जहाँ इन्द्रधनुष बन सकते थे, मन के उस आकाश में घोर काले बादल छा जाते हैं, जहाँ झरने फूट सकते थे हृदय की उस गुफा में चट्टानें द्वार बंद कर देती हैं..ऐसा दुश्मन है मन स्वयं अपना...

Monday, October 5, 2015

काजीरंगा के अरण्य


कितना रहस्यमय है यह जीवन, इसमें प्रवेश करें तो न जाने कितनी दीवारें खड़ी हो जाती हैं, किसी भी सवाल का जवाब नहीं मिलता, सद्गुरु कहते हैं कुछ प्रश्न अति प्रश्न हैं जिनका उत्तर साधना की परम अवस्था तक पहुंचा हुआ व्यक्ति ही दे सकता है, क्योंकि जब तक कोई उस अवस्था तक न  पहुंचे तब तक उसे बताये जाने पर भी नहीं समझ सकेगा. आजकल वह बच्चन सिंह’ की एक पुस्तक पढ़ रही है, ‘महाभारत पर आधारित इस पुस्तक में पांडवों व अर्जुन-कृष्ण की महानता पर प्रश्नचिह्न लगाया गया है. वे जिन्हें पूज्य मानते हैं उन पर कोई आक्षेप कैसे लगा सकते हैं, वास्तव में माया के प्रभाव से कोई नहीं बच पाता, ‘माया’ मानव व देवता दोनों को ही नचाती है. जब तक भीतर का विवेक नहीं जगता, तब तक कुछ भी कहने का अधिकार उन्हें नहीं है. पौराणिक कथाएं न जाने कितने रूप बदल कर समुख आती हैं, और प्रतीकात्मक होती हैं. कोई उनसे कुछ सीख ले सके तो अच्छा है वरना उन्हें मात्र कथा मानकर ही पढ़ना उचित है. जीवन तो स्वयं के ज्ञान से ही चलेगा. ज्ञान और ज्ञानी के प्रति श्रद्धा ज्ञान प्राप्त करने के लिए प्रेरित करेगी, लेकिन काम तो वह अर्जित ज्ञान ही आएगा. दिसम्बर आ चुका है यानि एक वर्ष और बीत गया. जनवरी में उसने स्वयं से वायदा किया था कि इस वर्ष अध्यात्म के पथ पर और आगे बढ़ेगी पर अभी भी लगता है कुछ नहीं जानती. अभी भी खोज जारी है. कल नन्हा आ रहा है.

शाम के पौने छह बजे हैं, वे परसों सुबह काजीरंगा के लिए रवाना हुए थे और आज वापस लौट आए. वर्षों पहले भी वे एक बार गये थे, तब ठंड बहुत थी. इस बार मौसम अच्छा था, कई पशु-पक्षी देखे, हाथी की सवारी भी की. वापस आकर घर साफ करते तथा कपड़े आदि धोते-धोते, खाना बनाते इतना वक्त लग गया और अब वे आराम से बैठे हैं. कल रात्रि सोने से पूर्व जंगल, नदी, पशु-पक्षी जैसे भीतर पुनः जागृत हो गये थे. सब कुछ कितना स्पष्ट दिख रहा था, जो बाहर है वही भीतर है, यहाँ तक कि पक्षियों की आवाजें भी स्पष्ट सुनाई दे रही थीं. अभी-अभी उन्होंने पुरानी फोटो देखीं ‘अरण्य’ की, जिसमें इस बार पुनः गये, कुछ-कुछ बदल गया है, कुछ-कुछ वैसा ही है. जैसे वे स्वयं भी समय के साथ कुछ बदल जाते हैं कुछ वैसे ही रहते हैं. यह वर्ष जाने को है, इस साल को विदा करें इसके पूर्व कुछ नये वादे करने हैं खुद से जिन्हें अगले वर्ष पूरा करना है. हर दिन एक कविता लिखनी है और हर दिन एक गीत गाना है. हर दिन बगीचे में भी काम करना है और हर दिन वे सारे काम भी करने हैं जो पिछले साल करती आई है जैसे ध्यान अदि ! व्यर्थ चिन्तन, व्यर्थ बातें, व्यर्थ कार्यों से बचना है. अभी कुछ देर पहले सासु माँ का फोन आया, वह स्वयं सत्संग में गयीं और स्वयं फोन किया उनका आत्मविश्वास बढ़ा है.


आज जीसस का जन्मदिन है, क्रिसमस का शुभ दिन ! बचपन में कितने गीत उन्होंने गाये हैं प्यारे यीशू के. यीशु उसका गड़रिया है, वह उसकी भेड़ है, वह उसका चरवाहा है, उसका दूल्हा है इस भाव में भी संत टेरेसा के साथ वह कई बार डूबी है, यीशू अद्भुत है, अनोखा है, उसे सारे प्यार करें यह बिलकुल स्वाभाविक है, उसे फिर भी मरना पड़ा, कोई जितना-जितना सत्य के करीब जाता है उसे अपमानित किया जाता है, सत्य कोई सहन नहीं कर पाता, सत्य की आंच को कोई सह नहीं पाता तो वह पलट कर वार करता है. कोई यदि मीठे-मीठे शब्दों से काम लेता रहे तो सभी खुश रहते हैं. यीशू सच्चा है, गाँधी सच्चा है तो उन्हें मरना ही पड़ेगा और बाद में लोग उनको याद करेंगे, कितनों को वे प्रेरणा भी देंगे, क्रिसमस के बाद आता है नया वर्ष ! आने वाले साल में वह पहले से भी ज्यादा उस परमेश्वर के निकट जाये, उसे प्रेम करे, उसका ज्ञान भीतर प्रकट हो और वह उसके व्यवहार में उतरे, उसका आचरण पवित्र हो, भाव पवित्रतर हों तो ही पवित्रतम प्रभु भीतर उतरेगा. यीशु का जन्म भीतर होगा जब मन मरियम की तरह पाक होगा. नये वर्ष में कितने ही कार्य उसे करने हैं. अगले पृष्ठ पर वह अपनी दिनचर्या लिखेगी. काजीरंगा पर लिखी कविताएँ अभी तक ठीक नहीं की हैं वापस आकर, नन्हा दिन-रात कम्प्यूटर पर काम रहता है. नये वर्ष में उसका ध्यान-कक्ष भी बन जायेगा !   

Thursday, January 22, 2015

श्री अरविन्द का वेद रहस्य


उसने प्रार्थना की, उनका चित्त विषमता मुक्त और कामनाओं से मुक्त रहे. भौतिक सौन्दर्य के पीछे छिपे उस दिव्य सौन्दर्य का अनुभव करे. तीनों गुणों से परे उस गिरधर कान्हा का ध्यान उन्हें हो जो चिन्मय है. अज्ञान का आवरण जो उनकी आत्मा ने ओढ़ा हुआ है, छिन्न-भिन्न हो जाये, सहज प्रेम का स्रोत जो अंतर में प्रवाहित हो रहा है वह सारी बाधाएँ पारकर जीवन में बहने लगे, और यह तभी सम्भव है जब अनंत का सुख उनके हृदयों में समा जाये, मन भी तो अनंत है, उसकी गति अगम्य है, अपार है तो उसे तृप्त वही तो कर पायेगा जो स्वयं अगम्य है, वही कान्हा उसका सखा है !

ईश्वर के प्रति प्रेम ही वास्तविक प्रेम है, यह प्रेम प्रतिदान नहीं चाहता, प्रेम के लिए ही प्रेम होता है, क्योंकि वह इतना मोहक है, इतना पवित्र है, इतना उच्च है कि प्रेम किये बिना कोई रह ही नहीं सकता. भगवद् भक्ति का सुख कभी समाप्त नहीं होता, यह धरा से प्रवाहित होते जलस्रोत की तरह है जो निरंतर बहता रहता है !

उसने सोचा, मानव तीन स्तरों पर जीते हैं, देह के स्तर पर, मन के स्तर पर और तीसरा आत्मा के स्तर पर. इन तीन स्तरों की तुलना पदार्थ की तीन अवस्थाओं से की जा सकती है. ठोस, तरल तथा गैसीय अवस्था. देह स्थूल है, जहाँ भिन्नता का भाव रहता है, जैसे दो ठोस वस्तुएं अपनी भिन्न प्रकृति बनाये रखती हैं. दूसरा तरल जैसे मन जो सूक्ष्म है, तरल की तरह मन भी एक-दूसरे के निकट आयें तो भिन्नता कम होती है. आत्मा यानि गैसीय अवस्था जो इतनी सूक्ष्म है कि हर जगह व्याप्त हो जाती है. आत्मा के स्तर पर कोई भेद नहीं रह जाता.


आजकल वह ‘श्री अरविन्द’ द्वारा रचित ‘वेद रहस्य’ पढ़ रही है. वेद को वे कर्मकांड का वर्णन करने वाली पुस्तक के रूप में जानते हैं, जिसमें विभिन्न देवी-देवताओं का आवाहन किया जाता है कि वे यज्ञ के माध्यम से हवि स्वीकार करें और इच्छित वर दें, जिनमें धन-धान्य, सम्पत्ति, गोधन, अश्व तथा कई अन्य भौतिक लाभ हैं, लेकिन इस पुस्तक में यज्ञ के रूपक को आध्यात्मिक अर्थ दिया है जिसमें अग्नि मन के संकल्प का प्रतीक है, इंद्र मन का प्रतीक है. मानव जन्म की सार्थकता इसी में है कि मानव मन के उच्चतम केन्द्रों तक पहुँचे, उन रहस्यों को खोजें जो अतिचेतन मन में छुपे हैं. चेतन, अवचेतन और अचेतन मन से परे प्रकाश के उस लोक को चुन लें जो उन्हें अतिमानव बनाता है. जहाँ से समय-समय पर ईश्वर के संदेश तो आते हैं पर रहस्य रहस्य ही रह जाता है. ईश्वर को वही तो जान सकता है जो उसके निकट जाये, उच्च का संग करने से मन स्वयंमेव उच्च स्तरों पर जाने लगता है. 

Tuesday, March 25, 2014

बुद्ध पूर्णिमा का अवकाश


तीन दिन बाद नन्हे को कविता पाठ प्रतियोगिता में भाग लेना है, अभी तक उसने याद नहीं की है, लेकिन वह जानती है आधे घंटे में ही याद कर लेगा, उसकी स्मरण शक्ति अच्छी है. उसका एक मित्र कविता पाठ की तैयारी में नूना से सहयोग लेने आया है, हिंदी जानने वाली महिला के रूप में उसका नाम थोड़ा बहुत लोग जानने लगे हैं. आज वह कम्प्यूटर से सीखी रेसिपी के अनुसार कढ़ी बनाएगी, उन्हें एक सीडी निशुल्क मिला है, ‘कम्प्यूटर एट होम’ जिसमें कई भारतीय व्यंजन है. कल से जून ने उसे कम्प्यूटर पर काम करना सिखाना शुरू किया है. आज दोपहर लंच पर एक मित्र परिवार आ रहा है, वे लोग ट्रेन से दोपहर एक बजे तक पहुंचेंगे. आज सुबह वे छह बजे उठे, पहले ट्रांजिस्टर पर समाचार सुने फिर star पर निनाद  सुना और फिर ‘जी इंडिया’ पर सन्त वाणी सुनी. भारत के कण-कण में, जन-जन के मन में उपनिषदों की वाणी का प्रचार, प्रसार है. यह कोई रहस्य नहीं रह गया है, न ही कभी था, कि मानव का शरीर प्रतिक्षण बदलता रहता है, किन्तु भीतर कुछ है जो कभी नहीं बदलता, वही आत्मा है, और वही परमात्मा का अंश है.

नौ बजने को हैं, पिछले दो दिनों की हलचल के बाद आज घर शांत है, कल ‘बुद्ध पूर्णिमा’ के कारण नन्हा और जून दोनों की छुट्टी थी. शाम को वे क्लब गये extempore speech में नन्हे ने भाग लिया पर कविता पाठ में नहीं ले पाया. बहुत देर हो चुकी थी, और उन दोनों को नींद आने लगी थी. सुबह स्कूल भी जाना है यह कहकर जून थोड़ा नाराज होकर उन सबको घर ले आये, वह भी ठीक से सो नहीं पायी, नन्हे ने तैयारी की थी पर भाग नहीं ले पाया इसी बात का दुःख अलग-अलग तरीके से तीनों ही महसूस कर रहे थे. पर सुबह वे सामान्य थे. उस दिन क्लब से ‘अनिता देसाई’ की एक किताब लायी थी, आधी पढ़ ली है, अच्छी है पर कड़वी सच्चाईयों से भरी हुई, इस दुनिया में हरेक को अपना बोझ स्वयं उठाना पड़ता है. सभी को सहारा नहीं मिलता.

कल बहुत दिनों बाद चचेरे भाई-बहन का पत्र मिला, अच्छा लगा, आजकल पत्र आना एक दुर्लभ घटना हो गयी है. अभी कुछ देर पहले फिर से पढ़ा कि मानव अपने शुद्ध रूप में आत्मा है और सर्वशक्तिमान परमात्मा से अलग नहीं है किन्तु अहम् का पर्दा होने से वह इस संबंध को पहचान नहीं पाता, ध्यान का अभ्यास भी किया पर गहराई तक नहीं पहुंच सकी. अच्छी बातें जो सुनने और पढ़ने में अच्छी लगती है उनका चित्रण साहित्य में किस तरह कर सकती है. जीवन के शाश्वत मूल्यों का चित्रण बिना किसी आडम्बर और शब्दजाल के, स्वाभाविक रूप से. देसाई की किताब के दो पात्रों तारा और विमला में से वह स्वयं को तारा के निकट क्यों पाती है, जबकि वह  किसी भी तरह से आगे नहीं है, कमजोर, डरी-डरी, लाचार, किसी न किसी पर आश्रित अपनी इस छवि से उसे बाहर निकलना ही होगा.


कल से उसे जुकाम ने जकड़ा हुआ है, बदन में हरारत सी महसूस हो रही है, नाक लाल हो गयी है, आँखें भारी सी हैं पर इन सबके बावजूद उसकी जीवनी शक्ति ज्यों की त्यों बरकरार है, यानि अपने रोजमर्रा के कार्यों को करने का उत्साह भी है और इच्छा भी. यह बात अलग है कि थोड़ा धीरे-धीरे ही कर पा रही है. अपनी छात्रा को कम्प्यूटर पर science encyclopedia दिखाया, नये स्वीपर से बाहर का नाला साफ करवाया, वह काम करना ही नहीं चाहता, दीनदास नाम है और शरीर भी मजबूत है पर थोड़ा आलसी है, सभी उतना ही काम करना चाहते हैं जितना करने भर से काम चल जाये. आज सुबह समाचार नहीं सुन पायी. परमाणु विस्फोटों के खिलाफ किस देश ने क्या कहा और कितने प्रतिबन्ध लगाये, आजकल यही तो होता है. कल शाम वे एक मित्र के यहाँ गये वहाँ उनकी अमीर दीदी के किस्से सुनकर (हजारों रूपये के गहने-कपड़े) कैसा तो लगा, वह  कल यूँ ही जुकाम से परेशान थी, फिर बाल भी धुले नहीं थे, साड़ी भी पुरानी पहनी थी. खैर कपड़ों से ही कोई अमीर नहीं बन जाता है, उसे अपनी अच्छी साड़ियाँ संभाल कर रखने के बजाय  पहननी चाहियें इतनी सीख तो मिली. आज मौसम यूँ तो गर्म है पर उसे पंखे की आवश्यकता महसूस नहीं हो रही है शायद हरारत की वजह से. उनके पेड़ में छोटी छोटी अम्बियाँ लगी हैं, एक दो तोड़कर शाम को चटनी बनाएगी, पुदीना भी अभी हरा है और हरी मिर्च के पौधे भी भरे हुए हैं. यानि सभी कुछ ताजा और शुद्ध...