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Friday, July 19, 2024

‘द अनटेथर्ड सोल’

द अनटेथर्ड सोल


खिड़की से आती हुई ठंडी हवा के झोंके यहाँ पलंग तक आ रहे हैं, जहाँ बैठकर वह लिख रही है। आज भी वर्षा की भविष्यवाणी थी, पर हुई नहीं। एक और रविवार परिवार के साथ मिलकर मनाया। सुबह माली से आश्रम से लाए तुलसी और पोंसेतिया के पौधे लगवाए। माइकल की दूसरी किताब ‘द अनटेथर्ड सोल’ आ गई है, कुछ पन्ने पढ़े। उसमें भी यही कहा है, अपनी वास्तविक पहचान का विस्मरण नहीं करना है। स्वयं को आत्मस्थ रखना है, भूलना नहीं है कि वे कौन हैं ? वे बाहरी दृश्यों में स्वयं को इस तरह खो देते हैं कि अपने आपको ही भूल जाते हैं। विचारों और भावनाओं से स्वयं को तुष्ट करना चाहते हैं पर वे उनसे भी परे हैं। सुबह टहलते समय पुस्तक में ह्रदय चक्र के बारे में पढ़ी बातों पर ध्यान लगा रहा। 

आज संस्कारों के बारे में पढ़ा, किस तरह कोई वर्षों पुराना संस्कार जागृत होकर ह्रदय की धड़कन को बढ़ा सकता है। साधक को साक्षी भाव में रहकर उसे देखना है, प्रभावित नहीं होना है। संस्कार ऐसे ही छूटते जाते हैं और एक दिन भीतर शुद्ध चेतना ही रह जाती है। भय का संस्कार भी ऐसे ही निकल सकता है।आत्मस्थ रहने का प्रयास ही साधना है, वही पुण्य है और वही समाधि है। मौन से बहुत से काम आसानी से हो जाते हैं।आज मौसम ज़्यादा गर्म है, फागुन आने ही वाला है, अर्थात होली की रुत ! बचपन में कितने पापड- चिप्स बनते थे इन दिनों। शाम को पापाजी से बात हुई, उन्होंने कहा, उसे अपनी रचनाएँ अख़बार में छपने के लिए भेजनी चाहिए। वे मोदी जी की बहुत तारीफ़ कर रहे थे। बड़े भाई ने एक पुस्तक का लिंक भेजा है, ‘लिविंग ऑन द एज’, इस पुस्तक की समाप्ति पर उसी को पढ़ना शुरू करेगी। 


‘देवों के देव’ में जालंधर का आज अंत हो गया। शिव व पार्वती का पुनर्मिलन हुआ। प्रकृति और पुरुष का मिलन, जैसे मन और आत्मा का मिलन। मन प्रकृति का अंश है और आत्मा पुरुष का।सुबह टहलने गये तो जून ने कहा, उम्र के कारण उन्हें थकान का अनुभव हो रहा है। फिर उन्होंने दीपक चोपड़ा की पुस्तक ‘एजलेस बॉडी टाइमलेस माइंड’ के कुछ अंश उन्हीं की वाणी में सुने। वह कहते हैं, शरीर ठोस नहीं है, बल्कि तरंगों से बना है तथा प्रतिपल बदल रहा है। उसमें बदलाव लाता है मन, यदि मन सकारात्मक है तो शरीर में अच्छे रसायन उत्पन्न होंगे तथा रोग नहीं होंगे। यदि तनाव बना रहा तो हानिकारक रसायन उत्पन्न होंगे जो बुढ़ापे के लक्षण जल्दी ला सकते हैं। क्वांटम फ़िज़िक्स के अनुसार सभी पदार्थ ऊर्जा से ही बने हैं, अंततः वे ऊर्जा हैं, मन भी ऊर्जा है, जो देह पर हर क्षण प्रभाव डालती है।


आज आश्रम में हुए सत्संग में गुरुजी को सुना। उन्होंने कई प्रश्नों के उत्तर दिये। एक प्रश्न के उत्तर में बताया, सब कुछ ब्रह्म है, ब्रह्म ही सत्य है, शेष सब मिथ्या है, सब स्वप्न है अथवा तो शून्य है। इतना श्रेष्ठ ज्ञान इतने सारे लोगों को एक साथ वह दे देते हैं क्योंकि वह स्वयं उसमें स्थित हैं। जैसे कृष्ण ने आरंभ में ही अर्जुन को आत्मा का श्रेष्ठ ज्ञान दिया, पर वह समझ नहीं पाया। धीरे-धीरे कर्मयोग व भक्ति योग की बात करते हुए पुन: गुह्यतम ज्ञान दिया।सुबह योग साधना करते समय ‘वृद्धावस्था में वजन क्यों कम हो जाता है’, इसकी जानकारी एक वीडियो से ली, ताकि दीदी को कुछ सुझाव दे सके। 


जून के एक पुराने सहकर्मी के यहाँ गये आज सुबह, उन्होंने नींबू, इलायची और गुड़ का शरबत पिलाया। बातचीत के दौरान वह कहने लगे, कोरोना विष्णु का ग्यारहवाँ अवतार है, जो दुनिया में असमानता को दूर करने के लिए आया है। अमीर-ग़रीब हर देश को इसका क़हर झेलना पड़ा है। उन्हें साथ लेकर एक अन्य सहकर्मी के श्राद्ध में जाना था। वहाँ कई पुराने परिचितों से भेंट हुई। पता चला, जाने वाले को दर्द रहित बहुत आसान मृत्यु मिली, वह स्वयं गाड़ी चलाकर डाक्टर के पास सीने में हो रही घबराहट का इलाज कराने गये थे, जहाँ से लौट नहीं पाये। दो पुत्रों व पत्नी को छोड़ गये हैं, परिवार धीरे-धीरे संभल ही जाएगा। केले के पत्ते पर परोसा गया श्राद्ध का दक्षिण भारतीय भोज सोलह व्यंजनों से बना था।जीवन इसी आवागमन का नाम है।    

   


Friday, January 31, 2020

तेनालीरामा का पुत्र


आज सुबह जब वे उठे तो वर्षा हो रही थी, रात्रि को ही आरम्भ हो गयी थी. ड्राइव वे पर ही छाता लेकर कुछ देर टहलते रहे, फिर योग कक्ष में आ गए. कल शाम वहां एक दर्जन योग साधिकाएं थीं, कमरा पूरी तरह से भर गया था, उसने सोचा कमरे के बाहर गैलरी में भी चटाई बिछा कर दो लोगों का स्थान बन सकता है. कल मुख्य सड़क से होकर ट्रेनर ने कार को बाजार की तरफ ले जाने को कहा. सड़क पर पानी भरा था, एक बार उसमें गाड़ी रुक गयी, उसे डिफेंसिव ड्राइविंग करने की जरूरत नहीं है, ऐसा ट्रेनर ने कहा, एक कंट्रोल उसके पास भी है. दोपहर को तीसरे गियर पर गाड़ी चलाई. लर्नर लाइसेंस  के लिए अगले महीने की डेट आयी है, एक परीक्षा देनी होगी डिब्रूगढ़ जाकर. उसने मॉक टेस्ट दिया, कुछ ही प्रश्नों के उत्तर नहीं आते थे. अभ्यास करते-करते आ जायेंगे जैसे एक दिन गाड़ी चलना अभ्यास में आ जायेगा. कुछ देर पहले जून के भूतपूर्व अधिकारी की पत्नी का फोन आया, अधिकारी का गॉल ब्लेडर का ऑपरेशन होना था, लेप्रोस्कोपी करते समय आंत में छिद्र हो गया, हालत बिगड़ने से ओपन सर्जरी करनी पड़ी, अभी भी एक प्रक्रिया शेष है. अभी छह हफ्ते और वहां रहना पड़ेगा .उनका परिवार वहां पहुँच गया है. कल मृणाल जयति के एक टीचर का फोन आया, वह भोजन के बाद आम खा रही थी, जून ने कह दिया दो बजे के बाद फोन करें.  बाद में पता चला उसके पिता का देहांत हो गया, कभी भी किसी के फोन को नजर अंदाज नहीं करना चाहिए. भीतर का मौन खो नहीं सकता पर कभी-कभी विस्मृत हो जाता है. नन्हा अगले हफ्ते सिंगापुर जा रहा है, जून उसी दिन बंगलूरू से वापस आ रहे होंगे, वह इतवार को जा रहे हैं. 

टीवी पर तेनाली रामा धारावाहिक आ रहा है. जिसमें उसका पुत्र भी हो चुका है, जो अपने माता-पिता की बातों को सुन सकता है, उनका जवाब देता है. दर्शक सुन पाते हैं पर वे नहीं सुन पाते. आज योग कक्षा में एक साधिका अपनी माँ को भी लायी थी, उसकी बेटी आज नहीं आयी. शाम को एसी व पंख चलाने के बावजूद कमरे में काफी गर्मी थी, शायद कल पुनः वर्षा हो जाये. 

पौने नौ बजे हैं सुबह के, सफाई कर्मचारी नहीं आया है, कुछ देर पहले उसकी पत्नी आयी थी. ग्यारह वर्ष उनके विवाह को हो गए हैं. दो पुत्र हैं व एक पुत्री. दो पुत्र पहली पत्नी के हैं, जिसकी मृत्यु होने के बाद इनका विवाह हुआ. पांच बच्चों को संभालती है. पति की शिकायत कर रही थी, किसी के साथ चक्कर है, चार-चार दिनों तक घर नहीं आता है. वैसे घर में सब कुछ लेकर देता है, पर कौन पत्नी है जो पति को इस तरह देख सकती है. उसे हिम्मत दिलाने के लिए कुछ शब्द कहे. अपने मन को शांत करने के लिए पूजा करने को कहा तो कहने लगी वे लोग क्रिस्तान हैं. माथे पर लाल बिंदी, साड़ी, मांग में सिंदूर.. वह पूरी हिन्दू लग रही थी. कानपुर में मायका है. पति ने विवाह से पहले बताया भी नहीं कि धर्म परिवर्तन कर लिया है. उससे बात चल ही रही थी कि नैनी की सास भी अपना दुखड़ा लेकर आ गयी. घर के दोनों जवान बेटों ने कल रात नशा करके बहुत झगड़ा किया, दोनों ज्यादा नहीं कमाते पर नशा करने के लिए पैसे जुटा लेते हैं. घर का मुखिया कमाकर लाता है तो घर का खर्च चलता है. वह अपनी बात कहकर थोड़ा शांति प् लेती है, पहले उसकी बात सुनकर वह बेटों को समझाती थी, पर उस समय वादा करने के बाद वे कुछ दिनों बाद फिर वही करते हैं. अजीब गोरखधंधा है यह दुनिया, सुना है गोरखधंधा शब्द का जो अर्थ लगाया जाता है वह गलत है, अब इसका उपयोग नकारात्मक रूप में नहीं किया जा सकता। आज गर्मी बहुत ज्यादा है. सुबह टहल कर आये तो घर में बिजली नहीं थी, लॉन में बैठकर आसन व प्राणायाम किया. मोबाइल पर सदगुरू के मधुर वचन सुने. पहले उनकी आवाज में एक सहज भोलापन झलकता था, जब वे छोटे थे. अब उम्र के साथ-साथ एक परिपक्वता आ गयी है. इसी महीने गुरू पूर्णिमा भी है. 

Friday, July 12, 2019

वीरवार की पूजा



शाम के पांच बजने वाले हैं. ''जब वे अपने आप से भी बात करना बंद कर देते हैं तब वास्तविक मौन होता है, ऐसा संत कह रहे हैं. मन पर काम करने का पहला उपाय है अपने आप से बातें करना बंद करना, दूसरा उपाय है दृश्य से हटकर द्रष्टा में टिक जाना. मन में जब विचार आते हैं तब शब्दों के वस्त्र पहन कर ही आते हैं, शब्दों के बिना वे कोई चिन्तन नहीं कर सकते, शब्द निर्माण होते ही मन निर्माण हो जाता है. मन ही दृश्य है, इसे देखने वाला साक्षी जब अपने आप में ठहर जाता है, तो विचार बंद हो जाते हैं. आगे उन्होंने कहा, जगत के विषयों का प्रभाव इन्द्रियों पर नहीं पड़ता. जैसे  शब्द होने या न होने से कानों को कोई लाभ या हानि नहीं होती. इसी तरह इन्द्रियों का प्रभाव मन पर नहीं पड़ता और मन का प्रभाव साक्षी पर नहीं पड़ता. साक्षी सदा अलिप्त रहता है. आत्मा भी अलिप्त है, जिसका संसार से कोई भी संबंध नहीं है. परछाई जैसे दिखती है, उसकी अपनी कोई सत्ता होती नहीं, संबंध भी ऐसे ही होते हैं, जो दीखते तो हैं होते नहीं. कुछ देर पहले जून से बात हुई, आज उनका प्रेजेंटेशन था, ठीक हो गया. कल भी जाना है, वह कह रहे थे कि एक दिन के लिए घर हो आयें, पर उसने मना कर दिया, जिस कार्य के लिए गये हैं, उसे ही पूरा करना ज्यादा ठीक होगा. दोपहर की योग कक्षा में पांच महिलाओं के अलावा बच्चे भी थे, शाम की कक्षा में पता नहीं कौन-कौन आएगा ? आज भी एक कविता लिखी, संगीत सुनते हुए मन में सहज ही कुछ पंक्तियाँ आ रही थीं. सुबह गाँधी जी के चित्र सहित उनके कुछ विचार पोस्ट किये फेसबुक पर, आज उनकी पुण्यतिथि है. सुबह ओशो को सुना, ताओ पर उनका प्रवचन अद्भुत है.

आज सुना, नींद में देहात्म भाव खो जाता है. स्वप्न में कुछ-कुछ बना रहता है और जागृत अवस्था में पूर्ण रूप से बना रहता है. देहात्म भाव से मुक्त होना है और जीव भाव से भी मुक्त होना है. स्थूल शरीर और सूक्ष्म शरीर दोनों से परे जाना है. ध्यान में साधक को कुछ नहीं होना है, जब वे कुछ भी नहीं हैं, उन्हें कुछ भी सिद्ध नहीं करना होता. जब वे स्वयं को कुछ भी देखते हैं, उसी के अनुरूप उन्हें कर्त्तव्य कर्म करने होते हैं. मन वृत्तियों को जगाता है. मन के दो मुख्य कार्य हैं, पहला- देह में होने वाली क्रियाओं को करना तथा दूसरा- देह का आकार ले लेना. जो मन सभी के लिए समान है वह पहला कार्य करता है तथा दूसरे कार्य में व्यक्ति स्वयं को अन्यों से पृथक समझने लगता है. यदि हाथ में कोई वस्तु हो और कोई उसी हाथ से लिखने का प्रयास करे तो लेख अच्छा नहीं होगा. इसी तरह मन जिस देह को धारण करता है, उसी के विषय में विचार करता है, जब देह भाव से मुक्त हो जाता है, तब विचारों से भी मुक्त हो जाता है. इस समय पौने दस बजे हैं रात्रि के. कल जून आ रहे हैं. क्लब में 'पद्मावत' दिखाई जाएगी. गुरूवार का सत्संग वे दोपहर को ही करेंगे. कर्ता भाव से मुक्त होने पर कोई कर्म करना ही है, ऐसा भाव नहीं रहता, जो होता है वही संतुष्टि देता है.

आज फरवरी का प्रथम दिन है. सुबह नींद खुली तो सदा की तरह मन में चिन्तन आरम्भ हो गया. आज का चिन्तन बिलकुल अलग था, लगा जैसे हृदय से कुछ बाहर निकला और सभी कुछ तोड़ता हुआ पूरे विश्व में फ़ैल गया. खुदी को जैसे खुदा का ठिकाना मिल गया. कितने ही सत्य प्रकट होने लगे, जो इतनी बार शास्त्रों में पढ़े थे. सद्गुरु कहते हैं, आत्मा, परमात्मा और गुरू में कोई भेद नहीं है, तीनों एक ही सत्ता से बने हैं. एक ब्रह्म ही विभिन्न रूपों में प्रकट हुआ है. देवी-देवता भी उसी की शक्तियाँ हैं. जीव-जगत के सारे प्राणी भी उसी की शक्ति से प्रकट हुए हैं. देह को आधार देती है आत्मा और आत्मा की गहराई में छिपा है परमात्मा. जिस तरह एक ही व्यक्ति विभिन्न भूमिकाएं निभाता है वैसे ही एक ही चेतना जाग्रत, स्वप्न तथा सुषुप्ति अवस्था को आधार देती है. जीवन उस आधार भूत सत्ता पर ही टिका है. आज स्वयं ही श्वेत वस्त्र पहनने का मन हुआ तथा प्रार्थना भी भीतर स्वयं घटी, पूजा भी स्वयं घटी. गुरूजी कहते हैं, पूर्णता से ही पूजा प्रकट होती है. देवता का स्मरण भी हो आया. बचपन में बड़ी बुआ को वीरवार को पूजा करते देखा करती थी, उसमें की गयी प्रार्थना वर्षों से नहीं सुनी थी. आज मन पंजाबी की उस प्रार्थना को अपने-आप ही गाने लगा. परमात्मा की कृपा निरंतर बरस रही है.


Thursday, March 28, 2019

ओस की बूँदें



तीन दिनों का अन्तराल ! डायरी लेखन की कला अब जैसे छूटती जा रही है. रात्रि के पौने नौ बजे हैं. जून बंगलूरु हवाई अड्डे से नन्हे के घर जा रहे हैं. पांच-छह दिन बाद आयेंगे. उसे इस समय का उपयोग अपनी साधना में करना होगा. सुबह कितने सुंदर वचन सुने थे, जिनकी सुगंध से मन का कण-कण अभी तक भीगा हुआ है पर क्या कहा था, कुछ भी याद नहीं है. कल से साथ-साथ नोट कर लेना उचित होगा, पर शब्दों का उद्देश्य तो पूर्ण हो ही गया. गुरूजी कहते हैं जो शब्द मौन में ले जाते हैं, वे ही सार्थक हैं. शाम को एक पुरानी परिचिता का फोन आया, दोपहर को भी एक सखी का फोन आया था, कल से इन दोनों को व्हाट्सएप ग्रुप में शामिल कर लेगी. दोपहर वाली सखी नन्हे की तारीफ कर रही थी. उसने इन्हें न केवल अपने घर आने का निमन्त्रण दिया, बल्कि कहा, नाश्ता भी यहीं करें और यहीं से उनकी बिटिया कालेज जाये. उसका कालेज यहाँ से निकट है. वह नन्हे के बचपन की बातें भी बता रही थी, उसका पुत्र और नन्हा साथ ही बड़े हुए हैं. कल ही एक अन्य पुरानी सखी ने फेसबुक पर वर्षों पहले की एक समूह तस्वीर पोस्ट की, उसमें की एक महिला ने कल से ही योग कक्षा में आना आरंभ किया है. वक्त कैसे बिछुड़े हुओं को बार-बार मिलाता है. आज दोपहर मृणाल ज्योति गयी थी. नेट पर दिव्यांगों के लिए सरकार की तरफ से चलाई जाने वाली योजनाओं के बार में पढ़ा. उसे उनके लिए एच आर पालिसी बनाने के लिए कुछ सुझाव देने को कहा गया है. नन्हे और सोनू से बात की, सोनू ड्राफ्ट बनाकर कल तक भेजेगी.  

परमात्मा स्वयं की उपस्थिति जताता है. वह अनंत ज्ञान का सागर है. वही आत्मा रूप से इस देह में व अनंत देहों में विद्यमान है. इस सृष्टि का चक्र कितनी कुशलता से चला रहा है. वास्तव में प्रकृति में सारी क्रियाएं हो रही हैं. यह हाथ कलम के माध्यम से लिख रहा है, चेतन इसका साक्षी मात्र है. बुद्धि में चिन्तन चलता है, मन में भाव उठते हैं, इन्हें भी कोई देखता है. रात्रि के नौ बजने को हैं, जून अपने गन्तव्य पर पहुँच गये हैं. सुबह नन्हे के आसन करते हुए फोटो उन्होंने भेजे, अच्छा लगा. मौसम आज काफी गर्म है. तापमान चौंतीस डिग्री है. दीदी घर आ गयी हैं, और छोटी बहन अपने घर. मंझला भाई अपनी नई पोस्टिंग पर चला गया है. जीवन अपनी गति से आगे बढ़ता ही रहता है.

आज सुबह सवा चार बजे नींद खुली. सुबह होने के बाद भी वातावरण में उमस थी, हवा बंद थी, हरी घास पर नंगे पैर चलने से गर्मी का असर कुछ कम हुआ. प्राणायाम करने बैठी तो एक सखी का फोन आया. उसकी तबियत कल रात से ही खराब है, पतिदेव टूर पर हैं. बुखार, पेट दर्द और सिर दर्द भी. नहाकर हार्लिक्स पीया, फिर सात बजे से कुछ पहले ही उसके घर गयी फिर अस्पताल. नौ बजे घर लौटी, उसके लिए नाश्ता बनाकर आई. उसकी बिटिया को दोपहर के भोजन के लिए निमन्त्रण देकर. उसे चिल्ड्रेन मीट के लिए डांस प्रेक्टिस में भी जाना है. सबसे बड़ा बल है आत्मा का बल और वह जन्मता है श्रद्धा और प्रेम से. स्वयं तथा परम के प्रति आस्था से. किताब जो लाइब्रेरी से लायी थी काश्मीर पर, काफी रोचक है, कुछ देर बाद पढ़ेगी.

शाम के पांच बजे हैं. बाहर धूप है, शायद शाम तक बदली छा जाये. जून मदुराई से वापस बंगलूरू पहुँच गये हैं. आज वे उनका नया घर विला देखने जाने वाले हैं. परमात्मा ने उन्हें कितना कुछ दिया है. इस सुंदर सृष्टि में मानव जन्म दिया, सद्गुरू का सान्निध्य दिया. यह सृष्टि कितनी रहस्यपूर्ण है. यहाँ वे कुछ भी तो नहीं जानते. गुरूजी के सुंदर वचन सुने. कितना अद्भुत ज्ञान उन्होंने सरल शब्दों में दे दिया. आज की सुबह सुंदर थी. हरी घास पर ओस की बूंदे थीं, उन पर टहलना व ज्ञान के मोतियों को भीतर समेटना एक साथ हो रहा था. दोपहर को नैनी बगीचे से ढेर सारी सब्जियां लेकर आई. पड़ोसी के यहाँ भिजवाई, पर उनके यहाँ भी इतनी ही सब्जी हो रही है. इसी बहाने उससे बात हो गयी. कल क्लब की प्रेसिडेंट से ‘योग दिवस’ पर ‘आर्ट ऑफ़ लिविंग’ का ‘बेसिक कोर्स’ कराने के सिलसिले में बात की. अब वह सखी स्वस्थ है पर उसकी बिटिया के हाथ में चोट लग गयी है, एक्सरे कराया है, परसों रिपोर्ट मिलेगी. मिलने गयी तो उसने औरा देखना सिखाया और एक ध्यान के बारे में बताया जिसमें सभी चक्रों पर विभिन्न रंगों का ध्यान करना होता है.

Wednesday, December 5, 2018

आकाश में लाल गेंद



छह दर्शनों में एक हैं सांख्य दर्शन. योग तथा सांख्य का एक जोड़ा है, न्याय और वैशेषिक का एक युग्म है और पूर्व तथा उत्तर मीमांसा एक साथ रखे जाते हैं. सांख्य दर्शन मोक्ष का दर्शन है. महर्षि कपिल इसके रचियता हैं. सांख्य का अर्थ है सम+आख्य, ठीक से अपने विचारों को रखना ही सांख्य है. इसे सम्यक ख्यान या विवेक ख्याति भी कहते हैं. आज सुबह भी योग-प्राणायाम करते समय आचार्य सत्यजित को सुना. इस समय साढ़े ग्यारह बजे हैं, सुबह का काम समाप्त हो गया है, नैनी सफाई करके गयी और रसोइया भोजन बनाकर चला गया है. नन्हा दफ्तर चला गया है.

आज वे दुबारा अस्पताल गये, डाक्टर ने कहा, प्लास्टर दुबारा लगाना होगा. दस दिन बाद फिर बुलाया है. सुबह नींद देर से खुली, कल रात नन्हे को देर से आना था, मन में कहीं पीछे विचार चल रहा था कि अभी तक आया या नहीं, सो गहरी नींद नहीं आ रही थी. सुबह छत पर सूर्योदय देखने गये, बहुत सुंदर दृश्य था. रक्तिम शोख रंग का सूर्य एक लाल गेंद की तरह लग रहा था. वापस आकर प्राणायाम किया, नाश्ते में वेजरोल बनाये. लंच में इडली, सांबर व चटनी. अभी-अभी असम में नैनी से बात की, वहाँ सब ठीक है.

नव प्रातः नव दिवस उगा
शुभ रूप धरे नव गगन सजा

मौसम सुहाना है. आज सुबह भी उगते हुए बाल सूर्य की तस्वीरें उतारीं और फेसबुक पर पोस्ट कीं. छत पर हवा ठंडी थी और स्वच्छ भी, सोचा, कल से प्राणायाम वहीं करेगी. मीनाक्षी मन्दिर के बाहर बैठी मालिन से बेला के फूलों की माला खरीदी, तो लाल गुलाब के फूल उसने अपने आप ही दे दिए. कल सेक्रेटरी का फोन आया, उसे हिंदी का आलेख भेजा, उसे PPT के लिए तस्वीरें भेजने को कहा. उम्मीद तो है कि अगले महीने के दूसरे सप्ताह में वे घर पहुंच जायेंगे. उसके तत्काल बाद ही क्लब का वार्षिक कार्यक्रम है, वह शामिल हो पायेगी. भविष्य ही बतायेगा क्या होने वाला है.

उसने गुरूजी को एक पत्र लिखा, उन बीसियों पत्रों की तरह जो कभी प्रेषित नहीं किये गये, क्योंकि लिखते ही भीतर शांति के रूप में उनका जवाब उसे सदा ही मिलता रहा है. उसके पास बहुत समय है पर इस समय को व अपने भीतर की ऊर्जा को सार्थक रूप देने की सामर्थ्य नहीं है. भीतर एक मौन है, जिसमें से कुछ भी नहीं छलकता. यह मौन इतना पवित्र है और इतना अचल कि अति प्रयास करके भी इसे तोड़ा नहीं जा सकता. यह वहीमौन है जिसकी चाहना उसने की थी. भीतर कोई कामना नहीं है, कोई दुःख नहीं, कोई उद्वेग नहीं और शायद साहित्य रचने के लिए यही सब चाहिए. इसीलिए अब न तो कविता बनती है न ही कविता रचने के लिए भीतर प्रेरणा ही उदित होती है. उसे अपने समय का और कोई उपयोग आता भी तो नहीं. उसने गुरूजी से राह दिखाने को कहा.

बिछड़ गयी है कविता या

छोड़ दिया है शब्दों का खजाना
नदी के उस तट पर
मंझदार ही मंझदार है अब
दूसरा तट कहीं नजर नहीं आता
एक अंतहीन फैलाव है और सन्नाटा
किन्तु डूबना होगा सागर की अतल गहराई में
जहाँ मोती-माणिक भी हैं और शैवाल भी
अभी ऊर्जा शेष है जिसे ढालना है सौन्दर्य और भावना में
वक्त के इस विराम को वरदान में बदलना है
जीवन की इस सौगात को
यूँही नहीं लुटाना है
अभी हाथों में कलम है
और दिल में शुभ भावना है 




Tuesday, January 9, 2018

रिमझिम गिरे सावन


दोपहर का वक्त है, आसमान बादलों से ढका है. ढाई बजने वाले हैं. आज सुबह की प्रार्थना में कुछ ऐसा घटा है कि भीतर का मौन घना हो गया है, जैसे कोई मिट गया है भीतर जो बहुत शोर मचाता था. अब कोई नहीं है जो खोज रहा था, जिसे तलाश थी. क्योंकि वहाँ कुछ भी नहीं है जिसे पाया जा सके. न संसार में कुछ है न परमात्मा में कुछ है. एक परम मौन के अतिरिक्त कुछ भी तो नहीं है वहाँ, कुछ पाने को नहीं है. सत्य इस क्षण सम्पूर्ण है, न कुछ जोड़ना है उसमें न कुछ घटाना है. वहाँ कुछ है ही नहीं, जिसमें जोड़-तोड़ हो सके. पाने वाला ही झूठ है तो पायेगा कौन ? और पायेगा क्या ? जब वहाँ शून्य के सिवा कुछ है ही नहीं. जब कोई चाह नहीं बचती तो कुछ करने को भी नहीं रहता और न ही जानने को, क्योंकि जानने वाला ही नहीं बचता. जून आज गोहाटी गये हैं. अगले दो दिन पूर्ण मौन में बीतेंगे, कितने सही समय पर यह अनुभव घटा है. बाहर घास काटने वाली मशीन शोर कर रही है. नैनी मशीन पर सिलाई कर रही है पर भीतर का सन्नाटा उससे भी मुखर है. शाम को एक उच्च अधिकारी की पत्नी से बात करनी है, उनके लिए विदाई कविता लिखेगी. परसों पिताजी की बरसी है. बच्चों को बुलाकर खिलाना है. लेह जाने की तैयारी शुरू कर दी है.

आज सुबह से वर्षा नहीं हुई, हवा चल रही है. शाम के चार बजने को हैं. सुबह एक सखी के यहाँ गयी, वह अपने बगीचे के लिए कुछ और पौधे लायी है. बगीचे की हरियाली जून में देखते ही बनती है. दोपहर को जून का फोन आया था. उन्हें अपने यहाँ एक प्रोजेक्ट के लिए दो वर्षों हेतु एक रिक्त स्थान की पूर्ति के लिए इन्टरव्यू लेने थे. कुल साठ अभ्यार्थी आये थे, चालीस का साक्षात्कार लंच से पहले हो गया था, शेष का होना था.

रिमझिम के तराने लेके आयी बरसात.! अभी-अभी बादल बरसने लगे हैं, धरती तृप्त हुई है, पंछी, पादप सभी झूम रहे हैं. जैसे परम बरसता है भीतर तो मन की धरती अंकुआने लगती है, मन भीग-भीग जाता है. आज पिताजी की दूसरी बरसी है. दोनों ननदों में से किसी का फोन नहीं आया है, न जून यहाँ हैं न ही नन्हा. जीवन ऐसा ही है, जो चला गया उसे जगत भूल जाता है. इन्सान जब तक है तब तक ही है, और भक्त तो तब भी, होकर भी नहीं ही है, केवल परमात्मा ही है, वह मिटकर ही तृप्ति पाता है. उसका होना भी क्या जो परमात्मा के बिना हो और सबसे बड़ी बात ऐसा करने में ही उसका हित है. वह अपने लिए ही ऐसा करता है, परमात्मा को भला किसी से क्या लेना. अहंकार का भोजन दुःख है और समर्पण का अर्थ है परम शांति, और इस शांति का अनुभव तो भक्त को ही होने वाला है, परमात्मा तो पहले से ही शांत है. वर्षा तेज हो गयी है.


जून वापस तो आये पर सीधे ऑफिस चले गये. उनके भीतर कार्य के प्रति समर्पण बढ़ा है, वैसे भी जिम्मेदारी बढ़ी है तो व्यक्तिगत सुख त्यागना ही होगा. शाम को मीटिंग है उसे जाना है. सुबह बाजार से लौट रही थी तो भीतर गायन स्वयं से उतर आया. धुन सहित गीत बजने लगा जैसे कोई भीतर से गा रहा हो. परमात्मा कितना सृजनात्मक है ! 

Wednesday, September 13, 2017

समता की चट्टान


रात्रि के आठ बजने को हैं. एक दिन और साक्षी भाव में बीत गया. सुबह समय से उठी, गला अभी भी पूरी तरह ठीक नहीं है, बायीं तरफ के निचले दांत में दर्द है, पर लगता है ये सब किसी और को हैं. मन भी जैसे दूर खो गया लगता है, भीतर बस एक गहन मौन है. उम्मीद है अगले एकाध दिन में स्वास्थ्य पूर्ववत हो जायेगा. मन में एक विचार आता है, कोर्स के दौरान अन्यों को खांसते जो विरोध का भाव मन में जगाया था, वह सही नहीं था. शायद उसी का परिणाम हो, साक्षी में रहना होगा. देखकर सुबह ब्लॉग पर एक कविता पोस्ट की, कुछ अन्य पढ़ने का अब मन नहीं होता. जीवन में एक बिलकुल ही नया मोड़ आया है.  दोपहर को धम्मा रेडियो खोलकर कुछ सुनना चाहा तो हर्मन हेस के उपन्यास सिद्धार्थ की बात ही सुनाई दी. पुस्तक का नायक वासुदेव एक नदी को देखकर अपने मन के रहस्यों का पता लगा लेता है. मन भी हर वक्त एक नदी की तरह बहता जाता है. नदी की तरह कितने मौसम बदलते हैं मन के. मन का आधार वे संस्कार हैं जो हर पल लहरों की तरह बनते-मिटते रहते हैं. मन के किनारे बैठकर जो इसे देखना सीख जाता है, वह इससे प्रभावित नहीं होता. कल मृणाल ज्योति गयी थी, कमेटी में वर्किंग प्रेसिडेंट का काम देखना होगा. पहले सा ही काम होगा, बस कुछेक जगह हस्ताक्षर करने होंगे.

आज सुबह जून से कहा, डाक्टर को दिखा लेते हैं. अस्पताल गयी, दोएक दवाएं दी हैं. अब शाम हो गयी है, पर जून को किसी कार्यवश दफ्तर जाना पड़ा है. आजकल वह उसका बहुत ध्यान रखने लगे हैं, उन्होंने उसके भीतर आए परिवर्तन को देखा है और उसने भी उनके भीतर आए परिवर्तन को. उनके मध्य आत्मिक मैत्री की एक मधुर रसधार बहने लगी है. वे एक-दूसरे के साथ उतने ही सहज रहते हैं जैसे अपने साथ. आज सुबह उठी तो वर्षा हो रही थी, इस वक्त भी बादल गरज रहे हैं. सुबह एक स्वप्न में देखा जून और वह बिना छाता लिए तेज वर्षा में एक लम्बी सड़क पर चल रहे हैं, आगे जाकर अँधेरा होने लगता है पर वे रुकते नहीं, फिर पता नहीं कब स्वप्न टूट गया. उसकी आध्यात्मिक यात्रा एक पड़ाव पर आकर रुक सी गयी लग रही है, पर अभी और आगे जाना है, मंजिलें और भी हैं. अपने भीतर जगी इस अनोखी शांति को परिपक्व होने देना है. जीवन को एक उत्सव बनाना है, जीवन की पूर्णता को प्राप्त करना है. परमात्मा हर क्षण उसके साथ है, वही तो है. उसकी स्मृति, उसका ख्याल नहीं वही साक्षात् ! जीवन की पूर्णता का अनुभव यही तो है, जीवन का उत्सव भी यही है. चित्त की निर्मलता ही साधना का लक्ष्य है, कोई अनुभव कितना भी सुंदर क्यों न हो, समाप्त हो जाता है पर भीतर की समता एक चट्टान की तरह अडिग रहती है.


आज भी वर्षा हो रही है, सुबह-शाम दोनों वक्त बरामदे में ही टहलना पड़ा, कुछ देर के लिए लॉन और ड्राइव वे पर निकले पर रह-रह कर बूंदे बरसती रहीं और कुछ ही मिनटों में वापस आना पड़ा. फरवरी का मौसम असम में ऐसा ही होता है, शाम होते ही बादल गरजने लगते हैं और..उसका मन एक अतीव मौन में डूबा हुआ है. अभी तक देह अस्वस्थ है पर वह उससे प्रभावित नहीं है, देह और मन से दूरी बढ़ती जा रही है. उस अनाम की उपस्थिति का अहसास गहराता जा रहा है. लगता है अब कुछ भी पाने को या जानने को शेष नहीं रहा है, जीवन आगे बढ़ने का नाम अवश्य है पर अब आगे बढ़ना गहराई में डूबना होगा अथवा ऊँचाई पर चढ़ना, न कि किसी राह पर आगे बढ़ना. सारा विश्व जैसे एक सूत्र में पिरोया हुआ है और वह सूत्र उससे होकर भी जाता है, सदा से ऐसा ही था और सदा ऐसा ही रहेगा. यह देह एक दिन गिर जाएगी, फिर भी यह चेतना तो रहेगी ही. आज सुबह ध्यान में बैठी तो किसी विधि का आश्रय नहीं लिया, परमात्मा चारों ओर है, बस उसे सीधे ही अनुभव करना है. अब सारी विधियाँ बेमानी हो गयी हैं, जैसे अब किसी शास्त्र को पढ़ने की भी आवश्यकता भी महसूस नहीं होती. मन उस नितांत मौन में डूबे रहना चाहता है जहाँ कभी-कभी एकांत को तोड़ने एक पक्षी की दूर से आती आवाज सुनाई देती है. ईश्वर ही उसके जीवन के आगे के मार्ग का निर्धारण करेंगे. संवेदनाओं के द्वारा भीतर राग-द्वेष जगाने के दिन समाप्त हुए, अब साक्षी भाव ही सध रहा है. समता भाव ही योग है, कृष्ण ने भी कहा है.    

Wednesday, July 26, 2017

अनानास की मिठास


उस दिन दिगबोई में भाई और उसके परिवार के साथ जब वे सब दिगबोई पीक पर थे एक तितली उसके माथे पर आकर बैठ गयी थी. उस समय तो महज एक सुखद आश्चर्य मात्र लगा था, पर बाद में सोचा तो लगा, वह कोई संदेश देकर गयी थी, उस अनाम का संदेश....कि वह सदा उसके साथ है, वही तो है. वह स्वयं अब नहीं रह गयी है. कभी-कभी अचरज भी होता है, अपना आप अजनबी लगता है, सारे विचार जो एक वक्त में बड़े कीमती लगते थे अब व्यर्थ ही लगते हैं. एक मौन पसरा रहता है भीतर जो अपना लगता है. शब्द भी नहीं गूँजते भीतर ! तभी तो कोई कविता भी नहीं लिखी कई दिनों से !

कल शाम आज की सेल की तैयारी में बीती. क्लब की तरफ से वर्ष में दो-तीन बार यह सेल लगती है. बड़े से हॉल में मेजें लगवाना फिर उनपर सफेद मेजपोश और विक्रेताओं के बैठने के लिए कुछ कुर्सियां, वस्त्र लटकाने के लिए लोहे के स्टैंड अदि रखवाना, कुछ अन्य महिलाओं के साथ सारा काम खत्म करते-करते आठ बज गये थे. आज सुबह स्कूल जाना था, दोपहर को क्लब गयी. कुछ खरीदारी भी की. पता चला उसका नाप बढ़ गया है, उम्र बढ़ने के साथ-साथ वे भोजन तो कम करते नहीं, व्यायाम कम कर देते हैं. घर का काम भी कितना कम रह गया है. जून कल दोपहर आ जायेंगे, जब वह बच्चों की संडे क्लास ले रही होगी. अब वह नहीं कहते कि उनके घर आने पर उसे घर में ही रहना चाहिए, वह आत्मनिर्भर बनते जा रहे हैं. नन्हा आज व्यस्त होगा, तीस घंटों के लिए एक प्रतियोगिता होने जा रही है, उसे आज सुबह वहाँ जाना था. आज बगीचे से एक अनानास तोड़ा, जिसे पक्षियों ने चख लिया था, मीठा है बहुत. घर में बगीचा हो तो कितना अच्छा है न..बड़ी भतीजी ने लिखा है, स्वर्ग की तरह है उनका घर, सचमुच ..स्वर्ग ही तो है, जहाँ देवता रहते हैं !


कल यात्रा पर निकलना है, अभी तक पूरी पैकिंग नहीं की है. जून आज बहुत व्यस्त हैं, उनकी नयी प्रयोगशाला का उद्घाटन होना है. सीएमडी आने वाले थे, अब तक तो हो गया होगा. शाम के पांच बजे हैं, लगातार होती वर्षा के कारण मौसम ठंडा हो गया है. वह पिछले एक घंटे से साहित्य अमृत पढ़ रही थी. ज्यादा बोलने वाली सखी का फोन आया, वह कलाकार है. पानी के रंगों से सुंदर चित्र बना रही है और फेसबुक पर पोस्ट कर रही है. अच्छा है, उसके जीवन को एक ठहराव मिलेगा इससे और ढेर सारा सुकून भी. कल वह ब्लॉग पर विदाई संदेश लिखेगी, वापस आकर ही होगा लेखन कार्य. इस दीवाली पर उन्हें काफी लोगों को बुलाना भी है. जीवन का यह कितना सुंदर मोड़ है, बैंगलोर में हो सकता है गुरू दर्शन भी हो जाये. सद्गुरू से एकत्व की अनुभूति हर क्षण होती है. अब कुछ करे या न करे भीतर एक से रंग(मौसम)रहते हैं. एक अटूट मौन और शांति..एक सहजता और एक अखंडता..एक असीमता भी..

Friday, December 30, 2016

जीव और ब्रह्म -आदि शन्कराचार्य


कल शाम और आज पुनः बाबा को सुना. वे नई ऊर्जा से भर गये हैं. अपने अभियान को चलाये रखने का उन्होंने व्रत दोहराया और जोशीले भाषण से अपने विरोधियों के सवालों का जवाब दिया. आज वर्षा की झड़ी लगी है, वे प्रातःभ्रमण के लिए भी नहीं जा सके. कल नन्हे ने कहा उसे कविता अच्छी लगी, एकाध बात समझ में नहीं आयी. आज से नैनी काम पर आ गयी है, अभी पिताजी ने उसके बारे में कुछ कहा, उन्हें घर-गृहस्थी के मामलों में अपनी राय देने में बहुत आनंद आता है, तो नूना ने उन्हें तुरंत जिस तरह तेजी से जवाब दिया, उसे खुद पर आश्चर्य हुआ, उसने सोचा भी नहीं था, उसके अचेतन से ही यह कृत्य हुआ, उसने किया भी नहीं. इसी तरह हर कोई जो भी व्यवहार कर रहा है, वह संस्कारों के वशीभूत होकर ही कर रहा है. एक अर्थ में कर्ता वह है ही नहीं, यह केवल मानने की बात नहीं है, ऐसा ही है. यदि वह सचेत होकर, कुछ बनाकर उन्हें जवाब देती तो कर्ता होने का दावा कर सकती थी, न ही वे पुण्यकर्मों के कर्ता हैं न पाप कर्मों के, स्वभाव के अनुसार कृत्य होते हैं. स्वभाव वश यदि कोई असत्य भाषण कर देता है तो भी उसका फल उसे मिलेगा ही, उस दंड को भोगते समय भी उसे साक्षी बना रहना होगा.

आज सुबह बाबा के गुरूजी द्वारा शन्कराचार्य के वेदांत सिद्धांत को प्रस्तुत किया गया. उनके अनुसार ब्रह्म अनादि व अनंत है. अविद्या व अज्ञान अनादि तो हैं पर सांत हैं. ब्रह्म जब अविद्या अर्थात माया में बंधता है तो ईश्वर कहाता है जिसकी शक्ति व ज्ञान अनंत है पर वही ब्रह्म जब अज्ञान से बंधता है तब जीव कहाता है. ईश्वर सृष्टि रचना, पालना व प्रलय का कारण है. जीव कर्मों को करता है व उनके फलों को भोगता है. जीव अपने शुद्ध स्वरूप में ब्रह्म के समान ही है. आज का ध्यान भी अच्छा था. वास्तव में देखा जाये तो इस जगत में न कुछ अच्छा है न बुरा, दृष्टिकोण पर ही निर्भर करता है. गुरूजी भी कहते हैं विपरीत मूल्य एक दूसरे के पूरक हैं. एक ही चेतन तत्व से यह जगत बना है. जब तक द्वंद्व रहेगा, समाधान हो ही नहीं हो सकता. भीतर एकत्व तभी होगा जब कोई बाहर बांटना छोड़ देगा. वे जो बाहर वस्तुओं, व्यक्तियों और परिस्थितियों पर ठप्पा लगते हैं, बांटते हैं तो भीतर दरार पड़ने ही वाली है.


आज का ध्यान अनोखा था. विचारों को महसूस करना था, वे कहाँ से आते हैं ? क्या वे उनके हैं ? आत्मा के अनंत सागर से विचार आते हैं और जिन्हें वे अपना मानते हैं दरअसल वे सब उधार के होते हैं. उनके विचार जैसा कुछ भी नहीं है इस जगत में. केवल मौन ही उनका है. उनके संकल्प वातावरण की, शिक्षा की, उन पुस्तकों की देन होते हैं और जो कुछ उनके बावजूद भीतर से आता है वह संस्कारों के कारण हो सकता है. ‘वे’ हैं ही नहीं तो उनका कुछ भी हो कैसे सकता है. ‘वे हैं’ यह भी एक विचार ही है. ध्यान के बाद कैसी मुक्ति का अहसास हो रहा है. विचारों से ही तो वे राग-द्वेष में बंधते हैं, अहंकार के शिकार होते हैं. दुःख उन्हें पकड़ता है. विचार न हों तो एक गहरा मौन और सन्नाटा भीतर छाया रहता है !        

Monday, April 25, 2016

मौन का सागर


भीतर मौन छा गया है, आजकल लिखना नियमित नहीं हो पाता, कभी-कभी लगता है कुछ करने को नहीं रहा, परम विश्रांति को पाया मन शायद ऐसा ही होता होगा. कोई चाहत नहीं तो कोई उद्वेग भी नहीं, कुछ पाना नहीं तो कुछ सोचना भी नहीं, इस जगत में जो प्रारब्ध शेष है उसे सहज भाव से स्वीकारना है और जितना सम्भव हो सके जगत को लौटाना है. सद्गुरू कहते हैं जगत और परमात्मा का भेद भी नहीं रहे, सब एक ही है, कोई विरोध नहीं, जब जो जैसी परिस्थिति आये उसमें वैसे ही मस्त रहना, जैसे आज सफाई कर्मचारी नहीं आया है, पर काम हो ही जायेगा.

भिवानी, मुजफ्फरपुर, मोतिहारी, जोधपुर, उपरोक्त शब्दों और फोन पर हुई बात के आधार पर एक कविता लिखनी है एक परिचिता के लिए उनके विवाह की पचीसवीं वर्षगांठ पर ! इस समय दोपहर के एक बजे हैं. पुनः सुंदर वचन सुन रही है, संत कहते हैं कि आनन्द को पाने के लिए आनन्द से होकर ही गुजरना पड़ता है, जीवन को देखने की जैसी किसी की क्षमता होती है, जीवन वैसा ही दिखाई देता है. जीवन से छुटकारा धर्म का लक्ष्य नहीं, परम जीवन ही धर्म का लक्ष्य है. आनन्द के भाव से जीवन, उसका सौन्दर्य, सत्य उपलब्ध होता है. दुःख का भाव हटाकर आनन्द का भाव भीतर समोना होगा. जो जीवन को दुःख के भाव से देखना चाहता है वह गुलाब में कांटे ही देखेगा और जो जीवन को सुख के भाव से देखता है वह काँटों में फूल देखता है. दुखी, निराश व उदास चित्त अँधेरे को ही देखता है, आनन्द से भरा व्यक्ति अंधेरे को भी प्रकाश में बदल सकता है ! संसार और परमात्मा दो नहीं हैं, आनन्द के भाव में देखें तो यही संसार परमात्मा में बदल जाता है.


आज छब्बीस नवम्बर है, पिताजी की शादी की सालगिरह, माँ आज होतीं तो उनकी भी. कल नन्हा आ रहा है, इस समय ट्रेन में बैठा है. कल शाम को वह पब्लिक लाइब्रेरी की fund rasing meeting में गई. अच्छा अनुभव रहा. कल रात ध्यान के रहस्य के बारे में सुना, मन में उठते शब्दों का निरिक्षण करना चाहिए, चेतना जब किसी वस्तु को देख लेती है तो वह वस्तु विलीन हो जाती है, केवल शुद्ध चेतना ही शेष रह जाती है. ऋषिमुख में श्री श्री के विचार पढ़ते-पढ़ते भी ध्यान घटित होने लगता है. वह कहते हैं, चेतना ही निकटस्थ है, मन, बुद्धि व चित्त उसके बहुत बाद है, स्मृति और कल्पना में मन की ऊर्जा व्यर्थ जाती है किन्तु चेतना यदि स्वयं में रहे अर्थात मन चेतना में खो जाये तो ऊर्जा से भर जाता है. वे व्यर्थ ही अपनी शक्ति का अपव्यय करते हैं. जबकि शक्ति बनाने का कार्य उनके ही हाथ में है, कैसा अद्भुत ज्ञान है यह.. जिसे पाकर सारा जगत अपना हो जाता है, सहज समाधि घटित होती है और तब सारे शास्त्र, सारे कर्मकांड, सारी किताबें छोटी पड़ जाती हैं. अनुभव से प्राप्त ज्ञान का एक कण भी उधार के ज्ञान से बड़ा है. उसका मन शांत है क्योंकि इस क्षण वह शांति के उस सागर से जुड़ा है, वह जीवित है, जड़ नहीं है, वह प्रेमपूर्ण है और वह संतुष्ट है, वह है ही नहीं ! 

Thursday, February 4, 2016

नदी का पाट


फिर एक अन्तराल, इस बीच बहुत कुछ घटा. जून के दफ्तर में दो-तीन दिन काम ज्यादा रहा. आर्ट ऑफ़ लिविंग के एक टीचर ने क्रिया करवाई. ड्राइंग-डाइनिंग में पेंट हुआ और आत्मा का ज्ञान दृढ़तर हुआ, उस पर जून की नाराजगी का असर पहले से कम हुआ, उन पर भी कम होना ही था, वह भी आत्मा के बारे में सुनने लगे हैं. दीदी दुबई से लौट आई हैं. उसे सभी की चिंता करने का मोह भी घटा है. सप्रयास कोई कार्य नहीं करना है. नियमित कर्त्तव्य तथा सहज प्राप्त कार्य व सेवा के कार्य बांधने वाले नहीं होते. उसे हर हाल में इसी जन्म में मुक्त होना है. परमात्मा की व सद्गुरु की उसपर विशेष कृपा है. उसे बुद्धि योग मिलाया है. भीतर की सूक्ष्मतम सच्चाईयों को समझने की बुद्धि प्रदान की है. अनवरत अनहद नाद की धुन गूंजती है, आत्मा का आनन्द फूट-फूट पड़ता है सो और नये कर्म बंधने का प्रयास व्यर्थ ही होगा. उसे संतोष का धन प्राप्त हुआ है. कितने जन्मों में उसने वही गलती दोहराई होगी पर इस जन्म में नहीं, सद्गुरु को देख-सुन कर तो जरा भी नहीं. वह कितने सहज हैं, मुक्त, आनन्द से भरे. उनके भीतर भी वही आत्मा है. सत्, चित् आनन्द वही परमात्मा है. आज ध्यान में उसकी उपस्थिति का अहसास हुआ. मन है ही नहीं, एक मौन है जो भीतर पसरा है, शांत नदी के चौड़े पाट की तरह जिसमें आकाश अपना चेहरा देखता है !

परमात्मा से प्रेम हो जाये तो यह जगत होते हुए भी नहीं दिखता. वह प्रेम इतना प्रबल होता है कि सब कुछ अपने आप साथ बहा ले जाता है, शेष रह जाता है निपट मौन, एक शून्य, एक खालीपन, लेकिन उस मौन में भी एक नये तरह का संगीत गूँजता है, वह खालीपन भी भरा हुआ है कुछ खास ही तत्व से. अभी कुछ देर पहले फोन की घंटी बजी, वह उठा नहीं पायी, पता चल गया लेडीज क्लब की किस सदस्या का था, वह अवश्य उस लेख के बारे में बात करना चाह रही होगी जो उन्हें क्लब के लिए लिखना है. कल उसे डेंटिस्ट के पास जाना था. एक दांत में rct कराने. कोई भय नहीं था. मन शांत था. डाक्टर ने दांत में दवा भरकर छोड़ दिया है, लगातार दवा की गंध मुंह में आ रही है. किन्तु उसने स्वयं को देह मानना छोड़ दिया है सो वह गंध परेशान नहीं कर रही. वह अपना सभी कार्य सामान्य रूप से ही कर पा रही है. बैंगलोर में एक सखी का आपरेशन होना था, हो गया है, शायद इतवार को वह लौट आये. दीदी से पता चला, छोटी भांजी आई है, उससे बात करनी है. कल शिवरात्रि है, उनके यहाँ सत्संग है. आज भी वर्षा हो रही है, मार्च का महीना यहाँ ऐसा ही होता है.
जैसे-जैसे कोई परमात्मा के निकट होता जाता है, वह सरल और सहज होता जाता है, तब छोटी और बड़ी बातों में कोई भेद नहीं रहता, सारे भेद मिट जाते हैं. वह पहले छोटी-छोटी बातों में उलझा रहता था, उनसे दूर हुआ और स्वयं को ऊपर उठाया फिर उन ऊपर की बातों से भी दूर हुआ और एक चक्र जैसे पूर्ण हुआ, अब कोई भेद नही रहा.


कल सत्संग में कम लोग आये, हलुए का प्रसाद बच गया. आज गुरूजी ने बताया, देह, मन, बुद्धि, प्राण, चित्त, अहंकार तथा आत्मा इन सातों स्तरों के बारे में जानना चाहिए. आत्मा के कारण ही इनका अस्तित्त्व है. एक अर्थ में सभी को आत्मा कहा जा सकता है, धीरे-धीरे उनसे ऊपर उठते जाना है, फिर आत्मा से भी परे स्थित परमात्मा को जानना है. 

Monday, December 21, 2015

कहत कबीर



कबीर के जीवन में भक्ति की पराकाष्ठा है, वह अपने गुरू से, साहेब से बहुत प्रेम करते हैं. उनके जीवन में ज्ञान की पराकाष्ठा है, वह कर्म योगी भी हैं, जीवन भर चदरिया बुनने का काम करते हैं. कबीर का सारा जीवन इस त्रिवेणी को जन-जन तक पहुँचने में लगा और उसके सद्गुरू जी तो ध्यान, ज्ञान, प्रेम, सेवा, भक्ति, कर्म, कीर्तन और न जाने कितने-कितने पथों का संगम कर रहे हैं. अद्भुत है उनका जीवन. स्टेज पर फूलों की बरसात करते हुए जब वह नृत्य करते से चलते हैं, मस्ती में झूमते भजन गाते हैं, आत्मविभोर होकर स्वयं पर फूलों की वर्षा करते हैं. समाधिस्थ होकर शंकर की मुद्रा बना लेते हैं तो हजारों-हजार व्यक्ति उनके भीतर के इस प्रेम को छूकर मुग्ध हो जाते हैं.

गुलाब में नई कलियाँ आई हैं, पर उसके पूर्व उसे कटना पड़ा, सिर दिए बिना फूल कहाँ खिलते हैं, भीतर भक्ति के फूल खिलाने हों या बाहर कर्म के, भीतर ज्ञान के फूल खिलाने हों या बाहर सेवा के. उन्हें अपने अहंकार को मिटाना ही होगा, तभी जीवन में संगम उतरेगा, तीर्थ का पदार्पण होगा, अंतर्मन शांत होगा, आत्मा की खबर लायेगा, दौड़-दौड़ कर फिर बाहर सुनाएगा. कैसी अनोखी शांति से उसका मन आजकल ओतप्रोत रहता है, कुछ रिसता रहता है चुपचाप, उसे कहने का लिखने का भी मन नहीं होता, वह निस्तब्धता इतनी भली लगती है कि उसे तोड़ने की इच्छा नहीं होती. कई-कई दिन हो जाते हैं डायरी खोले. कविता भी कई दिनों से नहीं लिखी. भीतर सन्नाटा है, पर कहीं आनन्द को पीने का चाव उसे अकर्मण्य तो नहीं बना देगा. लिखना-पढ़ना भी यदि छूट जाये तो जीवन में क्या बचेगा. परसों उन्हें यात्रा पर निकलना है, तब तो समय पंख लगाकर उड़ेगा. ज्ञान की पिपासा भीतर बनी रहे, पर ज्ञान की परिणति तो मौन में ही है. वह मौन भीतर उतरा है. सद्गुरु की कृपा से. अब कुछ पाना शेष नहीं पर देने की तो अभी बारी आई है. यह सेवा का मौसम उतरा है भीतर. आज एक सखी ने अपनी सासुमाँ को उससे फोन पर शिकायत करते सुन लिया और बहुत क्रोध में आ गयी, पर नूना की शांति उसे छू गयी और उस वक्त वह शांत भी हो गयी ! ईश्वर उसे ज्ञान के पथ पर लाये !

वे ईश्वर का ध्यान तभी तो कर सकते हैं जब उसे जान लें, पहचान तो सद्गुरु ही कराते हैं और एक बार उसकी पहचान हो जाये तो वह ध्यान से उतरता नहीं है. और तब लगता है कि जिन्हें दो मान रहे थे वे दो थे ही नहीं एक ही सत्ता थी. कहीं कोई भेद नहीं. तब लगता है, जो भी सहज प्राप्य हो, हितकर हो वही धारण करने योग्य है. तब सारे संशय भीतर से दूर हो जाते हैं, अंतर्मन खाली हो जाता है. कोई आग्रह नहीं, जैसे छोटा बच्चा होता है सहज प्रेरणाओं पर जीता हुआ, अस्तित्त्व तब माँ हो जाता है, ब्रह्मांड पिता होता है, सारे वृक्ष, पर्वत, आकाश तब सखा हो जाते हैं और सारे लोग भी एक अनाम बंधन में बंधे अपने लगते हैं.   



Friday, November 6, 2015

रस्ता और मुसाफ़िर


वाणी का दोष पुनः हुआ, उसने नये माली की तारीफ़ की और पुराने माली की निंदा, अब निंदा का दोष जो लगा वह तो है ही, नया माली प्रशंसा सुनकर दो घंटे से पहले ही चला गया. इन्सान अपनी जिह्वा के कारण कितनी बार फंस जाता है. वाणी पर संयम रखना कितना कठिन है, एक बार वे बोलना शुरू करते हैं तो खत्म कहाँ करना है, यह भूल जाते हैं. आज शाम को सत्संग में जाना है, नॉलेज पॉइंट्स लेकर जाने हैं. सुबह सुना जिस तरह मिट्टी आग में तपकर प्याला बन जाती है और उपयोग में आती है वैसे ही उनका यह मिट्टी का तन जब ईश्वर की लगन रूपी लौ में तप जाता है तब यह उसके हाथों का उपकरण बन जाता है और काम में आता है. ईश्वर की लगन भी क्रमशः तीव्रतर होती जाती है, पहले राख में छिपे अंगारे की तरह जो ऊपर से दिखती भी नहीं, फिर तपते हुए लाल अंगारे की तरह, जो प्रकाश भी देता व ताप भी, फिर गैस के चूल्हे की नीली लपट की तरह और फिर माइक्रोवेव की तरह जो नजर भी नहीं आती, बस चुपचाप अपना काम कर देती है. सद्गुरु ने कहा कि ज्ञान पा लिया है यह अहंकार भी छोड़ना होगा पर नहीं मिला है सदा यह संदेह भी नहीं रखना है. मध्यम मार्ग पर चलना श्रेष्ठ है. आत्मा का परमात्मा से नित्य का संबंध है. उन्हें बनाना नहीं है, वे स्वयं आत्मा हैं यह बात जितनी दृढ़  हो जाएगी तो उतना ही वे परमात्मा से अभिन्नता अनुभव कर सकेंगे, और तब शेष ही क्या रहा ?

आज गुरूजी ने कहा शब्दों से वे लाख चाहें, अपनी बात समझा नहीं सकते जो काम मौन कर देता है वह शब्द नहीं कर पाते. वे अपने व्यवहार से, भीतर छिपी करुणा से अपने विरोधी को प्रभावित कर सकते हैं किसी हद तक. आज भगवद्गीता पर उनके प्रवचन का प्रथम भाग सुना, कल दूसरा सुनेगी, भीतर जो प्रतीक्षा है उसी में सारा रहस्य छिपा है. आतुरता, प्यास यही साधना की पहली शर्त है. ज्ञान को जितना भी पढ़े, सुने तृप्ति नहीं मिलती, वह परमात्मा कितना ही मिल जाये ऐसा लगे कि मिल गया है फिर भी मिलन की आस जगी रहती है. प्रेम में संयोग और वियोग साथ-साथ चलते हैं. इसलिए भक्त कभी हँसता है कभी रोता है, वह ईश्वर को अभिन्न महसूस करता है पर तृप्त नहीं होता फिर उसे सामने बिठाकर पूजता है पर दो के मध्य की दूरी भी उससे सहन नहीं होती. वह स्वयं मिट जाता है, केवल एक ईश्वर ही रह जाता है. ज्ञानी भी एक है. और कर्मयोगी के लिए यह सारा जगत उसी का स्वरूप है. एक का अनुभव ही अध्यात्म की पराकाष्ठा है.

मैं हूँ मंजिल, सफर भी मैं हूँ, मैं ही मुसाफिर हूँ...

आज सद्गुरु ने कितना सुंदर गीत गाया. मन व् बुद्धि भी उसी आत्मा से निकले हैं, यानि वही हैं जिन्हें आत्मा तक पहुंचना है ..मन रूपी यात्री विचार रूपी रस्ते को पार करके घर पहुँचता है. कितना सरल और सहज है अध्यात्म का रास्ता..न जाने कितना पेचीदा बना दिया है इसे लोगों ने. सीधी- सच्ची बात है जब मन स्वार्थ साधना चाहता है तो आत्मा से दूर निकल जाता है जब यह अपनी नहीं सबकी ख़ुशी चाहता है तो यह आत्मा में टिक जाता है. यह जान जाता है कि जगत एक दर्पण है जो यहाँ किया जाता है वही प्रतिबिम्बित होकर वापस आता है, तो यह खुशियाँ देना आरम्भ करता है. अहंकार को पोषने से सिवाय दुःख के कुछ हाथ नहीं आता, क्योंकि अहंकार उसे सृष्टि से पृथक करता है, जबकि वे सभी सृष्टि के अंग हैं, एक-दूसरे पर आश्रित हैं. स्वतंत्र सत्ता का भ्रम पलने के कारण ही वे सुखी-दुखी होते हैं. वे ससीम मन नहीं असीम आत्मा हैं !



Friday, August 21, 2015

मलेशिया का मौसम


अभी-अभी नैनी ने कुछ कहा पर वह ठीक से सुन नहीं सकी और कुछ और समझ कर उस बात का जवाब दिया. उसका ध्यान पूरी तरह से उस पत्र में था जो वह सद्गुरु को लिख रही थी. आज सुबह एक परिचित का फोन आया, तीन दिनों के लिए उन्हें स्थान मिल जायेगा. कोई शुभ कार्य करने जब कोई निकलता है तो प्रकृति उसमें सहायता करने को आ जाती है. उसे लगता है उनका यह सेवा प्रोजेक्ट बहुत सफल होगा. ईश्वर के लिए किया गया कार्य कभी असफल हो ही नहीं सकता. कुछ देर पहले जून का फोन आया था, सुबह ससुराल से पिताजी का फोन भी आया, टिकट कराने की बात कह रहे थे. आज सुबह चिड़ियों की आवाज ने जगाया, स्वप्न में देखा( या वह तंद्रा थी) कि नीले आकाश में गुरूजी आगे-आगे तथा वह पीछे-पीछे चल रही है. मौन है प्रकृति ! मौन से ही ओंकार की उत्पत्ति हुई, उस दिन यह बात सुनी, यह बात सीधे दिल में उतर गयी है, मौन भाने लगा है..भीतर का मौन, कभी-कभी जब कोई विचार नहीं रहता वह इस मौन को सुनती है. यही वह शांति है, जिसे वह अनुभव करती आई है उसमें से फिर आनंद फूटता है, सभी क्यों नहीं इस आनंद को चख पाते, कितना सहज है यह पर जिसे नहीं मिला उसके लिए उतना ही कठिन ! तभी तो कहते हैं ईश्वर निकटतम है और दूरस्थ भी ! वह तो जैसे कृत-कृत्य हो गयी है. कृतज्ञता से कभी-कभी आँखें भर आती हैं. शास्त्रों के वचन कितने सच्चे लगते हैं. संतजन प्रिय लगते हैं और परमात्मा अपने लगते हैं, यही तो भक्ति है न !
बाहर तपन है पर भीतर शीतलता है ! जिसे तृष्णा की आग नहीं जलाती वह सदा ही शीतलता का अनुभव करता है. आज सुबह उठी तो मन-प्राण ध्यान से पूर्ण थे, आज एकादशी है, मन भोजन का ध्यान तो कर रहा है पर फलाहार का ही. मन का निरोध करना तो सम्भव नहीं लगता हाँ उसकी धारा को एक गति अवश्य दी जा सकती है. कल ध्यान करते समय मन में वह घटनाएँ मुखर हुईं जिनमें अन्यों का दोष देखा था. अपनी गलती तब नजर नहीं आई थी, पर अब स्पष्ट दिखी. भीतर की गंदगी को बाहर कर ध्यान पवित्र कर देता है. उस दिन जून जो इतना क्रोधित हुए तो बिलकुल सही था. उसने श्रद्धा का दामन छोड़ दिया था, अपनी अस्वस्थता से कितनी शीघ्र घबरा गयी थी. धैर्य का साथ छोड़ देने से वे बाहरी वस्तुओं, व्यक्तियों, परिस्थितियों को अपने सुख-दुःख के लिए दोषी मानने लगते हैं, वे यह भूल जाते हैं कि उनके स्वयं के कर्म ही उन्हें सुखी-दुखी बनाते हैं, फिर जिन्हें वे स्वयं से भी अधिक प्रेम करते हैं, उन्हें अपनी पीड़ा के लिए ( अपनी तुच्छ पीड़ा के लिए ) दोषी ठहराना तो निहायत ही घटिया काम है. वह कितना नीचे गिर गयी थी, ईश्वर ने सब देखा होगा, हंसा होगा वह कि उससे प्रेम का दम भरने वाली स्वयं का दर्द नहीं सह पायी. इस जन्म में जिस किसी को भी उसने जितनी भी बार दुखी किया है, सबमें उसका दोष स्पष्ट रूप से था, वह सभी से क्षमा मांगती है ! अपने उस दोष के कारण ही उसने स्वयं भी बहुत दुःख उठाया है, अब और नहीं..बस..यह बात सदा याद रहे !

हँसी आती है अपनी मूर्खता पर कि अपने जिस दुःख को वह इतना महत्व दे रही थी, वह तो कुछ था ही नहीं, उसकी तुलना में औरों के दुःख कितने बड़े थे पर वे तब भी मुस्कुरा रहे थे. उसका अहंकार ही तुच्छ से दुःख को बड़ा करके दिखाता है बल्कि जहाँ नहीं भी होता वहीं खड़ा कर लेता है. आज ब्यूटी पार्लर में काम करने वाली एक लड़की की बातें सुनकर लगा कि वह अपने सारे दुखों के बीच कितनी शांत है. उसके पिता कैंसंर के मरीज हैं, मृत्यु की प्रतीक्षा कर रहे हैं. कल उसने जून से कहा कि ठीक ही चल रहा है, वह सोच रहे होंगे ऐसा क्या हो गया, आज फोन आने पर कहेगी कि सब कुछ बिलकुल ठीक है. वहाँ का मौसम कैसा है ? खाना कैसा मिलता है ? शाम को क्या करते हैं? तथा तबियत कैसी है ? उसने उनके बारे में कुछ पूछा ही नहीं, अपने तथा नन्हे के बारे में ही बताती रही. जून घर से दूर हैं, उन्हें उससे ज्यादा सम्भल कर चलना होता होगा. आज ध्यान में अद्भुत अनुभव हुआ, उससे पहले सद्गुरु का स्मरण हुआ और मन कृतज्ञता से भर  गया, कितना विश्वास है उनके भीतर, कितनी सहजता, कितना अपनापन, कितना प्रेम..उन्हें सुनना एक अनोखा अनुभव है, वह शांति का सागर हैं, सुबह उठी तो कैसी बेचैनी थी कि अभी तक सत्य का भान नहीं हुआ, पर उन्होंने बताया कि जो भी विकार हैं उन्हें देखते रहें, निर्मूल करने जायेंगे तो वे और दृढ़ होंगे, भीतर अपने आप से जुड़ते जाना है तो जो व्यर्थ है वह छूटता जायेगा अपने आप ही ! क्रोध के प्रति क्रोध का आना भी बंद करना होगा. प्रकाश, प्रवृत्ति तथा मोह के उत्पन्न होने पर भी जो न तो हर्षित होता है न उद्ग्विन होता है, वही कृष्ण के शब्दों में स्थिरमति है ! 

Sunday, July 19, 2015

मौन और सेवा



ध्यान में प्रभु की निकटता का आनंद पाने वाला मन क्या इतना भी पावन नहीं हो पाता कि ध्यान के बाद अपने भीतर से प्रेम को बाहर भेजे. यदि ऐसा नहीं है तो कहीं कुछ गड़बड़ है जरूर. भीतर यदि प्रेम है ही नहीं तो बाहर व्यक्त कैसे होगा, तो जो भीतर ईश्वर के प्रति महसूस होती है, वह अनुभूति जो इतनी पावन लगती है वह संसार के बीच आकर कितनी बदल जाती है.

आज उसने सेवा के बारे में कितने सुंदर वचन सुने कथा में- क्रियात्मक सेवा, भावात्मक सेवा तथा विचारात्मक सेवा अथवा ज्ञानात्मक सेवा...ये सभी परमात्मा व सद्गुरु स्वयं करते हैं तथा करने के लिए प्रेरित करते हैं. सेवा स्नेहवश होती है, वहाँ कुछ चाहिए नहीं, चाहिए तो केवल सेव्य की प्रसन्नता. यदि कोई अपनी रूचि सेव्य पर लादता है तो वह अपनी सेवा कर रहा है. सेवा किये बिना अंतर्मन की शुद्धि नहीं होती !

आज उसे लग रहा है, जीवन प्रभु का दिया अमूल्य उपहार है, आनंद से इसका एक-एक क्षण भरा है. हर श्वास एक आनंद की धारा से भीतर को स्वच्छ कर रही है तथा भीतर के विकारों को बाहर ला रही है. उसका अंतर्मन एक ऐसी अद्भुत शांति से भरा हुआ है जिसे कोई नाम नहीं दिया जा सकता. इसी तन में और इसी मन में कभी पीड़ा भी हुई थी सोचकर ही विश्वास नहीं होता. सद्गुरु ठीक कहते हैं जीवन एक सागर है, जो डूबता है इसमें वही उबरता है, इसमें छिपे खजाने को पा लेता है. वही जीवन के रहस्य को जान पाता है. इतना सुखमय जीवन क्यों किसी के लिए दुःख का कारण बना रहता है ? परमात्मा से जुड़े बिना जो जीवन बीतता है वह अधूरेपन का शिकार रहता ही है. भीतर की आँख यदि खुल जाए तो जगत पहले जैसा नहीं रह जाता, उसका क्रीड़ा स्थल बन जाता है. जब कोई खुद पर कृपा करे तभी ऐसा होता है. जो इस सच्चाई को समझ गया है कि कर्म करते समय जो आनंद मिला बस उतने पर ही उसका अधिकार है तो वह मुक्त है. आशापूर्ति के लिए अथवा प्रतिक्रिया स्वरूप किये गये कर्म ही बांधते हैं और दुःख का कारण बनते हैं. वैसे देखा जाये तो हर व्यक्ति अपनी जगह ठीक है, वह किसी कारणवश ही वहाँ तक पहुंचा है, मूल में सभी निर्दोष हैं. अंतत सभी को एक ही लक्ष्य पर पहुँचना है.

उसे मौन सुहाता है, पर उसके भीतर ‘वह’ क्या है जिसे मौन सुहाता है, शुद्ध चेतना अथवा अशुद्ध मन, मन में रहकर यदि कोई कर्म किया, चाहे वह साधना ही क्यों न हो अभिमान को जन्म मिलेगा. जगत में रहते हुए वह जगत से पूर्णतया अलग है यह मानना भी तो अज्ञान ही है. प्रेम को यदि स्वयं तक सीमित रखा तो वह सड़ने लगेगा. प्रेम को बहने देना है, चारों ओर बिखरने देना है, अपने शब्दों से, हाव-भाव से, कृत्यों से, वाणी से उसी परमात्मा की खुशबू आनी चाहिए जिसे भीतर खोजा जा रहा है. ऐसे कर्म संस्कार गढ़ने हैं जो बाद में दुःख न दें तथा जो उस क्षण भी चित्त को शुद्ध ही बनाये रखें. जैसे निर्मल आकाश अपने आप में टिका हुआ मुक्त है.