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Wednesday, August 2, 2023

देव दिवाली की चमक

आज एक दिन और गुजर गया। जीवन कैसे पल-पल बीत रहा है। उन्हें यहाँ आये हुए एक वर्ष हो गया है। एक भविष्यवाणी के अनुसार उसके हाथ में साढ़े पंद्रह वर्षों का समय है। कितना कुछ करना है, करना था पर इधर दिन निकलता है उधर रात हो जाती है। सुबह-सुबह टहलते समय कितने सारे सुंदर विचार मन में उग रहे थे, पर अब एक भी याद नहीं है। उसी समय आकर लिख लेना ही उचित होगा। कल एक निकट संबंधी ने जून से ज़मीन ख़रीदने के लिए आर्थिक सहायता माँगी थी, पर दिन भर विचार करने के बाद शाम को उन्होंने अपनी असमर्थता जता दी। ज़मीन-मकान में पैसे लगाना अक़्लमंदी नहीं है। पहले ही दो जगह उन्होंने पैसे लगाये हुए हैं, जिसका जरा भी लाभ नहीं मिल रहा, यह वह जन स्वयं ही बता चुके थे। 


इस समय रात्रि के नौ बजे हैं। आज पहली बार उसने ज्वार के आटे का चीला बनाया, दीदी से बात हुई तो उन्होंने कहा, वह सिंघाड़े तथा कोटू के आटे का चीला भी बनाती हैं। पापा जी ने कहा, उन्होंने ‘कारवाँ’ पर दूसरी बार सारे गीत सुन लिए हैं। उनसे बात की तो अध्यात्म पर चर्चा हुई। उसने कुछ प्रश्न पूछे, जिसके उत्तर रिकॉर्ड कर लिए हैं, उन्होंने कुछ शेर भी सुनाये। उनके जन्मदिन पर यह बातचीत लिखकर एक तोहफ़े के रूप में उन्हें प्रस्तुत करेगी।सड़क पार सामने वाले घर में गृह प्रवेश की पूजा हो रही है। हरी -नीली-लाल बत्तियों से घर को और गेंदे के फूलों से द्वार को सजाया है।यह पूजा यहाँ रात भर चलती है शायद। आज तुलसी विवाह भी है। देव उठावनी एकादशी है। कितनी अद्भुत है भारत की संस्कृति; जहां  भगवान का विवाह एक पौधे से करते हैं, इसी के माध्यम से तुलसी की महत्ता बतायी गई है, उसके गुणों से परिचय कराया है। आज ‘महादेव’ में देवी ने अपने मन की पीड़ा बतायी तो शंकर भगवान एक बालक के रूप में आकर रोने लगे, वह अपनी पीड़ा किससे कहें ! अद्भुत गाथा है शिव-पार्वती की।


आज सुबह से ही यहाँ घने बादल छाये हैं, हवा भी तेज है। सुबह वे टहलकर आये तो बूँदे गिरने लगीं।चेन्नई में आये ‘निवार’ तूफ़ान का असर यहाँ पर भी हुआ है। बंगाल की खाड़ी से उठे इस तूफ़ान के कारण पुदुचेरी व आंध्र प्रदेश में भी भीषण वर्षा हो रही है। पापाजी से जो वार्तालाप उन्होंने किया था, उसे आज टाइप किया, एक साक्षात्कार के फ़ॉर्मेट में। लिखते समय रिकॉर्ड की हुई अपनी ही आवाज़ सुनी, जो स्वयं को ही पसंद नहीं आयी। अन्यों के कानों को कितना कष्ट देती होगी। उसे अपनी वाणी पर बहुत ध्यान देना चाहिए। इसी प्रकार अपनी लिखावट पर भी। दोनों ही मन की स्थिति को दर्शाते हैं। जून को जो वह लंबे लंबे भाषण देती है, वह उनके कानों को कितने अप्रिय लगते होंगे। उन्हें अपने बारे में कितनी ख़ुशफ़हमियाँ अथवा तो ग़लतफ़हमियाँ होती हैं, यही एक शब्द है जिसका विलोम भी वही अर्थ देता है। हर ख़ुशफ़हमी एक ग़लतफ़हमी ही तो होती है।  नन्हा व सोनू असम गये हैं, हवाई अड्डे पर कोविड के लिए उनकी जाँच हुई,  फ़्लाइट में भी काफ़ी सावधानी बरती गई। दोपहर को आर्ट ऑफ़ लिविंग का एक छोटा अनुवाद कार्य किया। गुरु जी पत्रकारों को संबोधित करने वाले हैं। वे बतायेंगे कि कोविड से बचने के लिए आयुर्वैदिक दवाओं तथा अन्य उपायों के द्वारा रोग प्रतिरोधक क्षमता को कम होने से कैसे रोका जा सकता है। पिछले कुछ दिनों की तरह आज भी उसने कुछ कन्नड़ शब्द सीखे, प्रतिदिन कुछ शब्द सीखते-सीखते उन्हें भाषा समझ में आने लगेगी।  


कल देव दिवाली है। गुरुनानक देव का जन्मदिन भी।  उसे कुछ वर्ष पूर्व बनारस के घाटों पर देखी देव दिवाली स्मरण हो आयी। जब नौका में बैठकर उन्होंने सभी घाटों पर जलाये गये लाखों दीपकों का दर्शन किया था। शाम से ही सांस्कृतिक कार्यक्रम भी चल रहे थे और भव्य गंगा आरती भी देखी थी। सुबह उठते ही एक सुखद समाचार मिला, छोटा भाई नाना बन गया है। पापा जी भी भाई-भाभी के साथ पोती के घर गये हैं।जून का स्वास्थ्य ठीक नहीं है, शारीरिक से अधिक मानसिक, वे अपने काम के दिनों की व्यस्तता में कितना खुश रहते थे। सेवा निवृत्ति के बाद संभवतः यह उदासी स्वाभाविक है उस व्यक्ति के लिए जो दिन-रात अपने कार्य के प्रति समर्पित रहा हो, जिसने और कुछ करने के बारे में सोचा ही न हो। उसने उन्हें कुछ सुझाव दिये पर जब तक कोई बात ख़ुद के दिल से न निकली हो उस पर अमल करना आसान नहीं है।    


रात्रि के नौ बजे हैं। आज का दिन काफ़ी जीवंत रहा। सुबह के भ्रमण व साइकिल चलाने के बाद वे जंगल की तरफ़ कार द्वारा लंबी ड्राइव पर गये। पहली बार गुलदाउदी के फूलों का विशाल बगीचा देखा। धूप में फूलों का रंग बहुत शोख़ लग रहा था। आकाश में कार्तिक पूर्णिका का चंद्रमा अपनी पूरी दमक के साथ सुशोभित है। टीवी पर देव दीपावली का आँखों देखा हाल देखा। मोदी जी का भाषण भी सुना। घाटों पर ग्यारह लाख से अधिक दीपक जलाये गये हैं। वाराणसी में काफ़ी बदलाव आ रहा है। गंगा का पानी स्वच्छ हो गया है।सारनाथ में भी लेजर शो दिखाया जाए


Tuesday, March 27, 2018

चोखम का बौद्ध मंदिर



यह वर्ष समाप्त होने में मात्र चार दिन रह गये हैं, जिनमें से दो वे अरुणाचल प्रदेश में बिताने वाले हैं. आज सुबह दो महिलाएं आई थीं योग कक्षा में. सोलह मिनट सूर्य नमस्कार किया, बीस मिनट का सूर्य ध्यान किया तथा शेष समय प्राणायाम तथा थोड़ा व्यायाम. सुबह का एक घंटे का अभ्यास दिन भर कैसा तरोताजा रखता है. दोपहर को बच्चे आये, कुछ नये भी थे. उन्होंने सुंदर चित्र बनाये. मंझले भाई-भाभी के विवाह की वर्षगांठ है आज. छोटी बहन ने व्हाट्सएप पर अच्छा सा गीत गाकर उन्हें शुभकामनायें दी हैं. अभी-अभी मोदी जी की ‘मन की बात’ सुनी, वह बहुत अच्छा बोलते हैं, उनका विरोध करने के लिए कांग्रेस को बहुत मेहनत करनी पड़ेगी.

मात्र तीन दिन ही शेष हैं इस वर्ष को बीतने में. जीवन भी इसी तरह एक दिन चुक जायेगा. जब तक वे जीवित हैं, जीवित रहने का कुछ तो सबूत दें अपने कृत्यों द्वारा, अपने व्यवहार द्वारा किसी के जीवन में कोई परिवर्तन ला सकते हैं तो लायें, अपने शब्दों से किन्हीं हृदयों के सुप्त पड़े भावों को जगा सकें तो उनकी कलम सार्थक होगी. वे अपने विचारों को इतना शुद्ध बनाएं कि उनकी गरिमा उनके व्यक्तित्त्व से झलके. कल प्रधान मंत्री का भाषण सुनकर बहुत अच्छा लगा. आज रूस में दिया उनका एक भाषण सुना, एक पॉप सिंगर द्वारा गए वैदिक मन्त्रों को सुना. सचमुच विश्व पुनः दैवी संस्कृति की ओर बढ़ रहा है. भारत-पाकिस्तान के रिश्ते सुधर रहे हैं. जैविक खेती के प्रयोग बढ़ रहे हैं. गली-मोहल्ले सफाई की तरफ ध्यान दे रहे हैं. विकलांगों के प्रति सोच बदली है, विश्व शरणार्थियों को बाहें फैलाये स्वागत करने को तैयार है. भारत में संस्कृत भाषा का प्रचार हो रहा है. देश में आशा की लहर जगी है.


अरुणाचल प्रदेश के रोइंग जिले का ‘मिशिमी हिल कैम्प’ दो दिनों के लिए उनका घर बन गया है. जिसे श्री पुलू चलाते हैं. इस प्रदेश की यह उनकी पहली यात्रा नहीं है, पिछले कई वर्षों के दौरान खोंसा, मियाओ, बोमडिला, तवांग, देवांग, परशुराम कुंड, आदि स्थानों को देखने के बाद इस वर्ष के दो अंतिम दिन बिताने वे रोइंग आए हैं. उत्तर-पूर्व भारत का सबसे बड़ा राज्य अरुणाचल जिसकी सीमाएं देश में असम तथा नागालैंड से मिलती हैं तथा अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चीन, भूटान और बर्मा से, प्राकृतिक सुन्दरता के लिए विख्यात है. कल सुबह साढ़े सात बजे वे घर से रवाना हुए और असम की सीमा पार कर चोखम नामक स्थान में स्थित बौद्ध मन्दिर ‘पगोडा’ में कुछ देर रुक व नाश्ता करके पांच घंटों की रोमांचक यात्रा के बाद यहाँ पहुंच गये. आलूकबाड़ी में लोहित नदी को वाहन सहित फेरी से पार किया, एक साथ चार-पांच वाहन तथा बीस-पच्चीस व्यक्तियों को लेकर जब नाव नदी पार कर रही थी तो दृश्य देखने योग्य था. नदी पर पुल निर्माण का कार्य जोरों से चल रहा है, पर आगे भी दो-तीन जगह छोटी-उथली नदियों को उनमें से गुजर कर पार करना पड़ा, जिन पर पुल बनने में अभी काफी समय लगेगा. छोटे-बड़े श्वेत पत्थरों से ढके विशाल नदी तट देखकर प्रकृति की महिमा के आगे अवनत हो जाने अथवा विस्मय से भर जाने के अलावा कुछ नहीं किया जा सकता.


Wednesday, February 22, 2017

ओले और वर्षा


नया वर्ष आरम्भ हुए दस दिन हो गये और आज पहली बार लिखने का समय मिला है. आजकल दिन अस्पताल और घर दोनों जगह की खोजखबर लेते ही बीत जाता है. सुबह सवा चार पर नींद खुली, मन में विचारों का ताँता लगा था, अब तो विचार चित्रों के रूप में दीखते हैं और सजग होते ही न जाने कहाँ खो जाते हैं. साक्षी भाव का अनुभव साधना है, अन्यथा मन में उठने वाली छोटी सी लहर भी तरंगित कर देती है. किसी विचार को रोकने जाओ तो वह टिक जाता है क्योंकि उसे ऊर्जा दे दी, सम्मान दे दिया. विचार रास्ते पर गुजर जाने वाले वाहनों जैसे ही हैं, जो आते हैं और चले जाते हैं. नदी की धारा में बहने वाले सामानों जैसे भी, आकाश पर उड़ने वाले बादलों जैसे भी, जो अभी हैं और अभी नहीं. यहाँ कुछ भी स्थायी नहीं है सो कुछ भी सत्य नहीं है, जो इनका साक्षी है बस एकमात्र वही सत्य है. उसमें टिकना आ जाये तो मन स्वतः शांत हो जाता है.

कई दिनों से हो रही वर्षा के कारण ठंड बहुत बढ़ गयी है. पूरे देश में ही वर्षा, बर्फ, ओले व कोहरे का प्रकोप जारी है. सर्दियों का मौसम अपनी पूरी सेना लेकर आया है. सद्गुरू को सुना, सहज भाव से प्रश्नों के उत्तर दे रहे थे. सहज रहना तभी सम्भव है जब किसी को कर्म के फल के प्रति आसक्ति न हो. सहजता. सरलता यदि स्वभाव बन जाये तो परमात्मा दूर नहीं है. वह हर क्षण उनके साथ है, वे ही अपनी नासमझी में उसे भुलाकर ढूँढने का नाटक करते हैं. जैसे कोई चश्मा नाक पर लगाकर खोजने का प्रयास करे. उसके सिवाय उन्हें कुछ चाहिए भी नहीं, फिर भी इधर-उधर हाथ-पांव मारते हैं, वही उनका सुहृद है, हितैषी है, यह मानते हुए भी दुनिया का मुँह तकते हैं. उसने उन्हें दाता बनाया है, वे दाता हैं, फिर क्यों मंगते बनें. उसने ‘एक जीवन एक कहानी’  पुनः लिखना शुरू किया है. अन्य पुरुष में लिखना ही ठीक रहेगा.

जून आज बड़ी ननद की बड़ी बेटी की शादी में सम्मिलित होने चले गये, भांजी की शादी में उसका जाना तो सम्भव नहीं है. नन्हा वहाँ पहले से ही पहुंच गया है. कल विवाह है. दोपहर बाद वह अस्पताल गयी, सिक्योरिटी गार्ड्स को बीहू के लिए तिल के लड्डू दिए. पिताजी ने कहा, उसकी एक सखी ने फोन करके कहा है, वह सुबह उन्हें अस्पताल से घर ले जाने आएगी, उन्हें अच्छा लगा है. माँ आज भी बेचैन लग रही थीं. उन्हें तकलीफ हो रही है, पर शब्दों में कह नहीं पाती हैं.  

दो दिनों का अन्तराल. जून आज आ रहे हैं. सुबह गहरा ध्यान लगा. अब जबकि ध्यान सधने लगा है, लगता है उसे ध्यान करना आता भी है या नहीं. उसे कुछ भी नहीं पता, ऐसा भाव भी होता है. परमात्मा ही जाने क्या हो रहा है, वह तो अब है ही नहीं, यदि वास्तव में ऐसा है तो यह लिख कौन रहा है, लिखने वाला हाथ है, कलम है, देह है, मन है, बुद्धि है, पर ये सब तो वह नहीं है. जो वह है वह निराकार है, शुद्ध चैतन्य है. आज एक लेखिका व ब्लॉगर महिला का संदेश फेसबुक पर आया है. वह उसकी कविताएँ अपने अगले कविता संग्रह में छापना चाहती हैं ! उसने दीदी की बड़ी बिटिया के लिए कार्ड बनाया उसके विवाह की सालगिरह है आज, एक कविता भी लिखी. शाम को एक विवाह में भी जाना है, हो सका तो उसके लिए भी एक कविता लिखनी है. जून माँ के इलाज के सिलसिले में आज डिब्रूगढ़ गये हैं.

एक परिचिता का फोन आया, उनके बेटे की मंगनी हो गयी, उन्हें कल ही फेसबुक से पता चल गया था. रात को लौटे जून और अभी माँ के लिए दोपहर का भोजन ले गये हैं, अब दो दिन उसे अकेले रहना है परमात्मा के साथ, ‘वह’ ही रहे नूना न रहे अब ऐसा ही भाव होता है. दीदी ने उसका चौथा ब्लॉग भी पढ़ना शुरू किया है. धीरे-धीरे और भी पाठक मिलेंगे. आज धूप कितनी तेज है, बैठा नहीं जा रहा है. कल सिहरन हो रही थी, ऐसा ही जीवन है कभी धूप कभी छांव. एक और भी जीवन है, महाजीवन..जो सदा एकरस है. मधुमय और ज्योतिर्मय..कल एक पुरानी परिचिता से वर्षों बाद मिली, उन्हें अब तक उसकी कविता की स्मृति थी. कविता दिल से निकलती है और दिल परमात्मा से..परमात्मा प्रेम से..प्रेम अमर है सो कविता भी अमर है !


Monday, May 30, 2016

आपकी अंतरा


एक परिचिता को उसे ऋषिमुख के कुछ अंक भिजवाने थे, तभी नैनी अपने आप ही आ गयी. वह परिचिता जो थोड़ी सी नाराज लगी थीं, खुश हो जाएँगी. आज सुबह से सिर में हल्का दर्द है. वह साक्षी होकर देख रही है. दर्द कितना भी ज्यादा हो या कम हो वह मुस्कुरा सकती है. स्थिति कैसी भी हो वह भीतर सदा एक सी रहने में समर्थ है. ये सब बाहर जो घट रहा है एक नाटक ही तो है. रात को तेज वर्षा होती है, दोपहर को तेज धूप निकलती है. भगवान भी मजाक करने में पीछे नहीं रहते. अब स्वाइन फ्लू का हौवा फैला दिया है, सारे लोग डरे हुए हैं. टीवी पर ‘आपकी अंतरा’ धारावाहिक  आ रहा है. छोटी सी अंतरा उसे बहुत अच्छी लगती है, सो देखती है. अन्तरा ने विद्या को अपनी माँ स्वीकार कर लिया है, विद्या भी उसे सुंदर चित्र बनाते देखकर प्रभावित हुई है. आज दोपहर जून तिनसुकिया से दस अनानास लेकर आए. वह पिछले दो-तीन महीनों से माँ के लिए वह हर वस्तु ला रहे हैं जो कोई भी उन्हें कह देता है कि उन्हें लाभ देगी. वह जीवन भर जो माँ के लिए नहीं कर पाए अब करना चाहते हैं. वह उन्हें नया जीवन प्रदान कर रहे हैं.

साक्षी भाव अब भी है पर मन की पीड़ा साफ दिखाई दे रही है. मन जो सदा नकारात्मकता पर ही जीता है, जो सदा अभाव को ही देखता है. गुरूजी कहते हैं जब प्राण ऊर्जा कम होती है तभी मन अवसाद का शिकार होता है. जून की पीठ में भी पिछले तीन-चार दिनों से दर्द है, उनकी भी प्राण ऊर्जा घट गयी है लेकिन दिन में मेहमानों के सामने वह बहुत प्रसन्न नजर आ रहे था. उसे लगता है मानव के भीतर दो व्यक्ति रहते हैं, एक वह जो बाहर से वह दिखाता है एक जो भीतर से वह है. वास्तव में भीतर वाला ही वह है, बाहर तो मुखौटा लगा लेता है. जैसे उसके भीतर विषैले सर्प हैं जो कभी भी विष की फुफकार छोड़ कर मन को जहरीला बना देते हैं, वैसे ही क्रोध के सर्प जून के मन को भी अशांत बना रहे होंगे. लेकिन जैसे कोई व्यक्ति आग में हाथ डाल दे और फिर चिल्लाये वैसे ही वे भी स्वयं ही इस विष का पान करते हैं. वे चाहें तो एक क्षण में इसे झटक कर अलग हो सकते हैं. हर समय इच्छा उनकी ही होती है कि वे किसे चुनते हैं ! 

साक्षी भाव में बने रहकर मन में उठते विचारों को जब वह देखती है तो कई बार आश्चर्य होता है. मन कितने राग-द्वेष पाले हुए हैं, कितना विकार छिपे हैं अब भी उसके गर्भ में. आज गीता ज्ञान में सद्गुरू ने बताया कि अपने सारे कर्मों को समर्पित कर देने से कर्मों से मुक्त हुआ जाता है. मन, वाणी व काया से होने वाला कोई भी कर्म यदि कोई कर्ता भाव से करे तो भोक्ता बनना ही होगा. सुबह से शाम तक मनसा, वाचा, कर्मणा जितने भी कर्म उसने किये हैं, जो इस क्षण कर रही है तथा जो भविष्य में उससे होने वाले हैं, वे सभी वह परमात्मा को समर्पित करती है. इस जन्म के पूर्व पिछले जन्मों के सारे कर्म भी ! पिछले किसी जन्म में उसने किसी की वस्तु ली और इस जन्म में भी वह उसे मिली लेकिन जिसकी वह वस्तु थी उसकी भी नजर उस पर लगी है. अब उसे उस वस्तु को बचाने की इच्छा होती है, क्योंकि यह भी पता है कि कभी यह वस्तु उसके अधिकार में थी, किन्तु इतना भी ज्ञान है कि इस जन्म में पूर्ण अधिकारी बनकर उसे प्राप्त किया है. भय व्यर्थ है, उसे दूर करना होगा तथा अपने सारे अवगुणों को परमात्मा को समर्पित करना होगा. इस धरती पर आने का मकसद सदा सामने रखना होगा. स्वयं को जागृत रखना होगा जिससे कोई भी पराया न रहे, मन आत्मा में विश्राम पाए तो भीतर का द्वंद्व समाप्त हो जाये. फिर भी यदि संस्कारों के वश मन विचलित हो भी जाये तो उसे साक्षी भाव से देखना होगा !

Wednesday, April 22, 2015

चावल की कचरी


पिछले तीन दिन वह फिर नहीं लिख सकी, पर आज से तय किया है नियमित लिखेगी. टीवी पर जागरण आ रहा है. पिताजी यहीं बैठकर सुन रहे हैं, उनका इलाज आरम्भ हो गया है. सम्भवतः चेन्नई जाना पड़ेगा. माँ स्नान के लिए गयी हैं. कल उन्हें आये पूरा एक हफ्ता हो जायेगा, उनके दिन अच्छे बीत रहे हैं, जीवन में एक रंग भर गया है. कल शाम वह क्लब गयी, मासिक मीटिंग के सिलसिले में. उसे कविता पाठ व मेहँदी के बारे में कुछ बोलने को कहा गया है. वह प्रतिपल इश्वर की स्मृति में रहने का प्रयत्न करती है और निन्यानवे बार यह सफल भी होता है. आज सुबह चार बजे उठे वे, क्रिया आदि की. आज ‘विश्वकर्मा पूजा’ है, जून ऑफिस से जल्दी आ जायेंगे.

आज उसने सुंदर वचन सुने- ‘सद्ग्रंथों का अध्ययन उन्नत करता है. सद्विचार मन को महकाते हैं. विचारों के गुलाब जब मन के बगीचे में खिलते हैं तो आस-पास सभी कुछ महकने लगता है. चेहरे पर मुस्कुराहट बनाकर आँखों से ही अपनी बात कहने की कला आती है. वाणी जब खामोश हो और मन का चिंतन भी शांत हो जाये. मन उस क्षण न ही बाहरी शब्दों को ग्रहण करता है और न ही मन से विचारों का सम्प्रेषण बाहर की ओर होता है. गहन मौन में ही उस परम सत्ता का वास है’.

अन्तर्मुखी होकर, ध्यानस्थ होकर भीतर जो भी दिखे, वह सहज ज्ञान है. भगवद् ज्ञान कहीं बाहर से मिलने वाला नहीं है बल्कि इस सहज ज्ञान का आश्रय लेकर ही पाया जा सकता है. उद्देश्य यदि दृढ़ हो तो जीवन को एक ऐसी दिशा मिल जाती है जो ऊर्जा को व्यर्थ नष्ट नहीं होने देती. कल दोपहर को वह कुछ क्षणों के लिए क्रोध का शिकार हुई और वही क्रोध या विरोध जून से भी उसे मिला. जो वे देते हैं वह पूरे ब्याज के साथ वापस मिलता है. प्रेम दें तो प्रेम ही मिलेगा. आनंद देने पर आनंद और विरोध करने पर विरोध ही हाथ आयेगा ! संसार चाहे जितना भी मिल जाये, जब तक वह परम पूर्ण सदा साथ नहीं रहेगा, संसार दुखमय होगा. उसके साथ से यह संसार अनुकूल हो जाता है. उसे भुलाकर वे एक क्षण के लिए भी सुरक्षित नहीं हैं. कर्म बंधन से मुक्ति चाहिए तो कर्म, विचार, वाणी उसी परमात्मा से युक्त होकर होने चाहियें. योग भी तभी सधेगा. सहज रूप से जीने की कला आना ही योग है. उसने प्रार्थना की कि कृपा बनी रहे इसी में उसका कल्याण है और उसके इर्दगिर्द के वातावरण का भी !

आज धूप बहुत तेज है. कल माँ-पिता जी ने चावल की कचरी बनाई थी, सूखने के लिए बहर लॉन में रख दी है. इस समय उसके हृदय में हल्का सा ताप है कितना अजीब सा लगता है गुस्सा करना भी आजकल, पर किये बिना काम ही नहीं करते स्वीपर और कभी-कभी नैनी भी. लेकिन इस क्रोध को लाने के लिए भीतर कहीं क्रोध का बीज तो अवश्य रहा होगा अन्यथा यह हल्की सी जलन भी न होती. पिता अभी तक अस्पताल से आये नहीं हैं, उनका व्यायाम चल रहा होगा. उनके एक हाथ की उँगलियाँ पूरी तरह सीधी नहीं होती. माँ को कल वह सत्संग भी ले गयी थी, उन्हें अच्छा लगा, इस वक्त भी भजन सुन रही हैं. कल भी वह ध्यानस्थ हो सकी ऐसा महसूस हुआ. बीच-बीच में कोई अन्य विचार आ जाता था पर मन सजग था. रात को स्वामी विवेकानन्द की पुस्तक का कुछ अंश पढ़ा और दोपहर को दिनकर की पुस्तक का पर ध्यान का समय उतना नहीं मिल पाता. उसकी आध्यात्मिक यात्रा में थोडा सा व्यवधान तो आया है. दुनियादारी में फंसा मन प्रभु की स्मृति में इतनी शीघ्रता से नहीं आ पाता जैसे पहले आता था. कृष्ण का नाम लेते ही मन भक्तिभाव से भर जाता था अब जैसे कई परतें मन पर चढ़ गयी हैं. संवेदना मृत हो गयी हो ऐसा भी नहीं है, पर कुछ कम अवश्य हुई है !




Friday, February 27, 2015

श्यामा तुलसी


कल शाम को जून नन्हे से नाराज थे, नूना ने कहा प्यार से समझाना चाहिए पर जो प्यार की भाषा ही न समझे उसे समझाने का कोई दूसरा तरीका खोजना ही पड़ेगा. अभी भोजन नहीं बनाया है और किचन में गैस लीक को ठीक करने कारीगर आ गये हैं. उसे एक सखी के यहाँ जाना था, जून भी आज फ़ील्ड गये हैं, पर अब सम्भव नहीं लगता.

अप्रैल का अंतिम दिन, सुबह वे वक्त से उठे, ‘क्रिया’ की. जून दफ्तर जा रहे थे कि खुले जाली वाले गेट से पूसी अंदर आ गयी, उन्हें बुरा लगा होगा क्योंकि दफ्तर जाकर उन्होंने फोन पर कहा. पिछले दिनों नन्हे के जवाब देने के कारण और फोन पर देर-देर तक बात करने के कारण वह परेशान थे ही. परिवार में आपसी सद्भाव, प्रेम व सौहार्द के साथ-साथ अनुशासन भी बहुत जरूरी है, अन्यथा सभी सदस्य अपनी मनमानी करके अपनी-अपनी राह चलने लगते हैं. रही पूसी व उसके तीन बच्चों की बात तो उन्हें कुछ सोचना होगा. उनका फोन खराब है सो छोटी ननद से बात नहीं हो पायी, उसे art of living कोर्स किये दो दिन हो गये हैं, यकीनन खुश होगी. पार्लियामेंट में आज गुजरात मुद्दे पर १८४ के अंतर्गत बहस जरी है, सरकार तो बच ही जाएगी लेकिन गुजरात कब बचेगा इसकी किसी को चिंता नहीं है. जब तक वहाँ के निवासियों को सद्बुद्धि नहीं आएगी हिंसा का दौर चलता ही रहेगा. कल शाम वे क्लब एक फिल्म देखने गये अभिनेत्री के आते ही उठ गये बहुत ही भद्दे वस्त्र पहने थी और आवाज भी भद्दी निकाल रही थी. आज क्लब में अशोका फिल्म है शायद ठीक लगे. सुबह गुरुमाँ को सुना स्वयं को खोजना ही अध्यात्म है. ध्यान में भी एक विचार गहरे विचरता है कि ध्यान चल रहा है, पर कर्ताभाव से मुक्त हुए बिना ‘उसकी’ झलक नहीं मिलती. कल रात लेकिन देह का ठोसपना गायब होता लगा, तरंगों का अनुभव हुआ.   

मई महीने का आरम्भ हो चका है. कल दिन भर वर्षा होती रही पर अज धूप निकली है. स्टोर की सफाई (मासिक) करवायी और बाएं तरफ की पड़ोसिन के यहाँ से लाकर काली तुलसी का एक पौधा लगाया. नन्हा वहाँ पूसी के बच्चों को छोड़ने गया था, पर वह उनमें से दो को वापस ले आयी है, तीसरे का पता नहीं. जून ने कहा है अब पूसी वहाँ नहीं रह सकती.

आज उसका मन अद्भुत शांति से परिपूर्ण है, बाबाजी ने ध्यान की विधि इतने सरल शब्दों में बताई जो दिल को छू गयी. वह उनके सच्चे हितैषी हैं जो उत्थान की बात करते हैं, किस तरह वे अपने मन को ईश्वर की ओर लगायें, सुख और शांति उनके सहज मित्र हो जाएँ, ज्ञान, प्रेम और आनंद स्वरूप अपने मूल को वे खोज सकें और उसमें स्थित रह सकें. उन्नत विचार, उन्नत भाव मानव को सहज बनाते हैं. आदर्शों को सामने रखते हुए, मन, वचन, काया से सद्कर्म करने हैं, तभी वे सुखी होंगे.



Thursday, November 13, 2014

नाटक की रिहर्सल


आज उनके नाटक की ड्रेस रिहर्सल है, बाबाजी आ चुके हैं पर नैनी अपने जीवन की व्यथा सुना रही है. उसके पास कहानियों एक नहीं अनेक हैं, अपने लम्बे-चौड़े भूतपूर्व परिवार की कहानियाँ, उसके पति ने दूसरी शादी कर ली तो वह अपने तीन बच्चों को लेकर घर छोड़कर आ गयी, बर्तन मांजकर गुजारा करने लगी. यह कई साल पहले की बात है फिर उसके पति की दुखद मौत हुई. देवर-जेठ सभी समर्थ थे पर किसी ने सहारा नहीं दिया यहाँ तक कि जायज हक भी नहीं दिया. ननदें भी अचछे घरों में ब्याही हैं, उनके बच्चे भी पढ़लिख रहे हैं पर इसके बच्चे बिन पढ़े ही रह गये अब तो बेटियों की शादियाँ हो गयी हैं. बेटा भी काम तलाश रहा है, कभी मिल जाता है कभी नहीं मिलता. आज भी सर्दी ने उसे परेशान किया हुआ है, विश्वास पूर्ण हृदय ले ईश्वर से शक्ति के लिए प्रार्थना की ताकि आज और कल अपने कर्त्तव्य का पालन कर सके. इतना विश्वास तब तो नहीं होता जब वह स्वस्थ होती है. कबीरदास ने सच ही कहा है- दुःख में सुमिरन सब करे, सुख में करे न कोई.. जून आज सुबह समझा कर गये हैं कि वह अपना ख्याल रखे. वह उसका बेहद ख्याल रखते हैं, कल उसके साथ उन्होंने ‘संघर्ष’ फिल्म देखी. फिर वह क्लब गयी. मौसम आजकल ठीकठाक है, न बेहद वर्षा न बेहद गर्मी.

आज शनिवार है, शाम को नाटक है, स्वास्थ्य पूरी तरह तो नहीं सुधरा है पर शेष पात्रों को आभास तक नहीं हुआ सो स्पष्ट है कि आवाज और अभिनय पर पकड़ पूर्ववत् ही है. कल क्लब में तीन घंटे से भी ज्यादा वक्त लग गया, आज भी तीन-चार घंटे तो देने ही होंगे. जून और नन्हे को उसकी अनुपस्थिति का धीरे-धीरे अभ्यास हो रहा है. आज मौसम अच्छा है रात भर वर्षा होती रही. पहले-पहल नींद कुछ अस्त-व्यस्त सी रही पर बाद में आ गयी. काफी देर तक नाटक के संवाद बिन बुलाये मेहमान की तरह चक्कर लगते रहे. स्वप्न में वह घंटों नेपाल के राजा से बातें करती रही, उनके राज्य में विद्रोह करने वाले नेताओं, क्रांतिकारियों से भी मिली. जून ने कल पिता से बात की, उनके घर में नये मालिक आ गये हैं, अब वह उनका कहाँ रहा ?

आज गोयनकाजी ने महावीर स्वामी और गुरुनानक का उदहारण देते हुए विपासना का महत्व समझाया. महावीर ने कहा है, जो भीतर है वही बाहर है और जो बाहर है वही भीतर है. बाहर की सच्चाई को बुद्धि के स्तर पर समझा जा सकता है पर भीतर के सत्य को अनुभूति के स्तर पर ही समझना होगा. नानक ने कहा है, “थापिया न जाई, कीता न होई, आपे आप निरंजन सोई” भीतर की सच्चाई को देखने के लिए कुछ आरोपित नहीं करना है न ही कुछ करना है, जो अपने आप है वही हरि है !  कबीर ने भी इस प्रश्न के उत्तर में, कि हरि कैसा है ? कहा, जब जैसा तब वैसा रे...जिस क्षण हमारे अंतर की स्थिति जैसी होगी हरि उस क्षण वैसा ही होगा. प्रतिपल अंतर को साक्षी भाव से देखते  रहना ही विपासना है. यदि मन में विकार भी जगा है तो उसे देखना है कि उसके प्रति कैसी संवेदना जगी है. उस संवेदना के मूल का ज्ञान होने से वह स्वतः ही नष्ट हो जाती है और ऐसे धीरे-धीरे विकार जड़ से दूर होते हैं, दमन करने से जड़ भीतर ही रह जाती है और वह विकार पुनः-पुनः सर उठाते हैं. उसे यह सब सुनना अच्छा लगता है, लगता है  अपनी विचार शक्ति को जितना ऊंचा बनाएगी उतना ही जीवन उन्नत होगा. वह कहाँ है और क्या करती है यह उतना महत्व नहीं रखता जितना कि उसका मन कहाँ है और वह कैसी भावना से कर्म करती है, इसका महत्व है.



Wednesday, August 20, 2014

खिली धूप में सफाई


आज सुबह उसने चित्त की विभिन्न अवस्थाओं के बारे में सुना, पहली है उदार अवस्था, इसमें चित्त जो भी देखता है, सुनता है, ग्रहण करता जाता है, चाहे वह लाभप्रद हो अथवा हानिप्रद. दूसरी विछिन्न अवस्था जिसमें मन राग-द्वेष से युक्त रहता है, कभी हताश तो कभी प्रसन्न. ज्यादातर चित्त की यही अवस्था होती है.  इस वक्त उसका चित्त थोड़ा ‘पशेमन’ है, (उर्दू के इस शब्द का सही अर्थ कुछ और भी हो सकता है) नैनी को कुछ ज्यादा ही कपड़े धोने को दे दिए हैं, जबकि मशीन घर में है, धोबी भी आता है, इसे आलस्य ही कहा जायेगा न, वह चुपचाप धो रही है, कर भी क्या सकती है. कल शाम जून ने भाईदूज के कार्ड बनाकर दिए, आज उसे खत लिखने हैं. दोपहर को संगीत अध्यापिका व उनके गोद लिए शिशु से मिलने भी जाना है, उसके मन में उस बच्चे के प्रति जो स्नेह उमड़ रहा है वह इसलिए है कि वह पहले अनाथ था या इसलिए कि वह बहुत प्यारा है. उसे देखे बिना ही तो उसके मन ने उसे अपना मान लिया था. उसकी टीचर भी तो बहुत अच्छी हैं, शांत व धैर्यवती, उसे संगीत के सुरों का ज्ञान उन्होंने ही तो कराया है, उसका मन सदा उनका ऋणी रहेगा. फूलों के जो बीज उस दिन माली ने बोये थे, सभी में अंकुर निकल आए हैं, टमाटर व गोभी की पौध नहीं बन पायी है, इन सर्दियों में उनका बगीचा फूलों से भर उठेगा. गुलदाउदी में लेकिन अभी तक कलियाँ नहीं आई हैं. कल शाम को ही उन्होंने उन्हें याद किया और बड़े भाई का फोन भी आ गया. चचेरे भाई की शादी किसी वजह से रुक गयी है, वह उदास होगा लेकिन समझदार तो है ही, संभल जायेगा.

मन रूपी मार्ग पर दिन भर विचारों के यात्री आते-जाते रहते हैं, उन्हें उन पर प्रतिबन्ध लगाना है, यात्री कम होंगे तो मार्ग स्वच्छ रहेगा और धीरे-धीरे उन यात्रियों का आना-जाना इतना कम हो जाये कि मन दर्पण की भांति चमकने लगे. इसमें सन्त उनके मार्गदर्शक हैं, उनके सद्वचनों के द्वारा ही उनमें ईश्वर के प्रति श्रद्धा भाव उत्पन्न होता है. जिससे माधुर्य, सहजता, कोमलता. सहानुभूति और करुणा अपने आप प्रगट होते हैं. वह कहते हैं, श्रद्धाहीन व्यक्ति रसहीन होता है, वह चतुर या ज्ञानी तो हो सकता है पर उसे सहज सुख नहीं मिलता ऐसा आनंद जो मात्र ईश्वर के नाम स्मरण से ही सम्भव है. आज सुबह दीदी को उनके विवाह की रजत जयंती पर बधाई दी. कल शाम को एक पत्र भी लिखा था पर बाद में वह भावुकतापूर्ण व बचकाना लगा, सो नहीं भेजा. आज नन्हे का स्कूल “लक्ष्मी पूजा” के लिए बंद है, वह पढ़ाई कर रहा है. जून का दफ्तर कल बंद है. कल शाम उसने व जून ने पर्दों के पीछे अस्तर लगाने का काम कर दिया.  

Jun is at home today. They ate Alu Paratha in breakfast with tea and now he is reading some magazine. It is raining since morning, Nanha has his last maths test today. Today ‘kartik’ has begun the month of diwali. Last evening they saw many Deepaks and candles lit in front of some houses due to Laxmi Puja. Here in Assam, Bengal and Orrisa also deepavali is the day for Kali puja and they worship Ma Laxmi on purnima. She could not listen ‘jagaran’ today, bur read ‘bhagvad gita’. They should do work for the sake of work, as their duty without any attachment to its result. Last evening she read some more experiments which bapu performed in his Ashram. He seems to be a simple as well as a very complex personality.

At this moment her mind is full of things about Deepawali celebration, whole house has to be properly cleaned and arranged. Somethings are to be purchased. She has to sew cushion covers. Diwali is festival of joy and prosperity and they are eagerly waiting for it. इस इतवार को यानि कल भी यदि मौसम आज सा रहा, जब धूप खिली हो और आकाश नीला हो तो वे सारे गद्दे, तकिये आदि धूप में रख सकते हैं, पुराना सामान घर से निकल कर उसे spacious बना सकते हैं. घर के दरवाजे खिड़कियाँ, रोशनदार सभी कुछ सलीके से पूरी तरह साफ करने हैं, शीशे चमकाने हैं. पीतल के सामान पर पॉलिश करनी है. कम से कम तीन दिन लगेंगे उन्हें, और उन्हें दीवाली आने में अभी दस-बारह दिन शेष हैं पर बगीचे में भी काफी काम शेष है.




Wednesday, July 23, 2014

भुट्टे के फायदे



उन्हें यहाँ आये अर्थात घर वापस आये तीन दिन हो गये हैं, कल दो पत्र लिखे, अभी स्मृतियाँ सजीव हैं. यहाँ भी वर्षा ने उनका स्वागत किया. जून, वह और नन्हा तीनों बहुत खुश हैं, यात्रा और कुछ दिन घर से दूर रहने के कारण घर की हर वस्तु उन्हें अच्छी लग रही है. माँ का ख्याल हमेशा बना रहता है, उनकी तबियत सुधर रही होगी या नहीं, इतनी दूर बैठे वे जान नहीं सकते, जानकर भी कुछ नहीं कर सकते, ईश्वर से मात्र प्रार्थना जरूर कर सकते हैं. प्रार्थना के आगे मात्र लगाकर उसके सत्य को कम करने का उसका इरादा नहीं है बल्कि अपनी क्षुद्रता पर पर्दा डाल रही है कि उसकी प्रार्थना में कोई असर होगा भी या नहीं. इतने दिनों भगवान से दूर जो रही, अपनी व्यस्तता में उसे भुला बैठी. सभी सखियों से फोन पर या मिलकर बात हुई, अच्छा लगा, वह बातूनी सखी दूसरी बार माँ बनी है बेटे की, कुछ दिन बाद देखने जाएगी. एक मित्र परिवार मिठाई खाने नहीं आ सका जो वे उनके लिए लाये थे, सम्भवतः आज आयें, कल शाम उन्होंने बगीचे में भी काम किया, भुट्टे बहुत हो रहे हैं, जिन्हें वे शाम को नाश्ते में खाते हैं. उसने भुने हुए भुट्टों के फायदे के बारे में कहीं पढ़ा था.

कर्म ही पूजा है, यह विचार इस समय उसके मन में प्रधान है. भक्ति की अपेक्षा कर्म का मार्ग उसे अधिक रुचता है, कर्म के द्वारा ही कोई अपने तथा अपने आस-पास के वातावरण, परिस्थितयों तथा स्तर में सुधार ला सकता है, कर्मयुक्त जीवन उहापोहों से भी दूर रहता है क्योंकि उसके पास विचार करने को अन्य कुछ नहीं रहता. कर्म, सद्कर्म हो यह लेकिन पहली शर्त है, ऐसा कर्म जो नैतिकता, धार्मिकता तथा आध्यात्मिकता के दायरे के अंदर ही हो, जो स्वार्थ युक्त न हो, ऐसा कर्म अपने आप ही भक्ति बन जायेगा. कल शाम को वह माँ के स्वास्थ्य के बारे में सोचती रही, मन कहीं और लग ही नहीं रहा था, आज सुबह फोन किया पर मिला नहीं, ईश्वर से प्रार्थना की तो चैन मिला. ईश्वर पर विश्वास किये बिना मानव का काम चल ही नहीं सकता. उसी का बनाया हुआ यह माया जाल है सो सब कुछ उसी पर छोड़कर चिंतामुक्त रहने में ही भलाई है.

आज उसे संगीत क्लास में जाना है, अभ्यास तो पिछले एक महीने में दो-चार बार ही हुआ फिर भी टीचर के साथ अभ्यास करने से उत्साह बढ़ेगा ही. आज उसे उस नये शिशु से मिलने भी जाना था पर वर्षा की झड़ी जो जून के दफ्तर जाने से पहले लगी थी रुकने का नाम ही नहीं ले रही है. अभी उसे भोजन बनाना है और नन्हे को पढ़ाई में मदद करनी है, वह आजकल रोज रात को देर से सोता है सो सुबह देर से उठता है, पर जब से घर से वे आये हैं साधारणतया खुश रहता है, उसके मित्र भी पढ़ाई में व्यस्त हैं सो फोन से ज्यादा डिस्टर्ब भी नहीं करते. आज बहुत दिनों बाद ‘जागरण’ सुना, बाबाजी आज भक्तिभाव में विभोर होकर नृत्य करने लगे थे, उसे लगता है हजारों लोग जो घंटों वहाँ बैठते हैं यदि कार्य करें तो देश का कितना कल्याण हो. लोगों का खुद कल्याण हो, हो सकता है वे श्रमदान के लिए शिविर भी लगते हों.  कल माँ-पिता से फोन पर बात हुई, माँ ने दवाएं न लेने या कम करने का फैसला किया है, दवाइयाँ खाना तो किसी को भी पसंद नहीं पर जब दवा जीने की शर्त ही बन जाये तो कोई कैसे छोड़ सकता है.





Wednesday, June 4, 2014

बन्दर वाला बैग


जून आज बहुत दिनों बाद फील्ड ड्यूटी पर गये हैं, ‘कतलानी’ नामक एक जगह पर. आज मौसम खुला है, चारों ओर उजले सोने सी बिखरी धूप अच्छी लग रही है. पूसी आजकल आलसी हो गयी है या कमजोर, मुँह से धीरे से आवाज निकलती है जो सुनाई नहीं बस दिखाई देती है. आज नन्हे के स्कूल और जून के दफ्तर जाने के बाद ‘जागरण’ सुना. कल शाम नन्हे को क्विज में प्यारा सा बन्दर वाला बैग पुरस्कार में मिला है, पर उसे पसंद नहीं आया, जबकि नूना को बहुत सुंदर लग रहा है, पर पुरस्कार की बात उन्हें आनंद देती है, क्यों कि इसके पीछे उनका प्रयास छिपा है. इस समय उसका संगीत अभ्यास का वक्त हो चला है.

आज फिर उसका मन चिन्तन में लगा है. अक्सर न जाने कहाँ से (ऐसा वह सोचती है) जो उसके अंतर में कुछ खोया-खोया सा लगता है, खालीपन जैसा वह कहीं बाहर से नहीं आता बल्कि अंदर गहरे तक भरा हुआ है जो जरा मौका मिलते ही सतह पर आ जाता है. जब सतह पर सात्विक विचार कमजोर हो जाते हैं तब ही. आध्यात्मिकता उन नकारात्मक विचारों से सदा के लिए मुक्त होने का मार्ग है. सद्विचारों का वेग इतना तीव्र हो कि सारी कमियां ऊपर आकर बह जाएँ और मन का घट अमृतमय हो जाये. तब जीवन सरल, कोमल, शांत व रसमय बनेगा, अंतर में कविता स्वयंमेव जन्मेगी. विकार मुक्त, तृप्त मन जिसने सारे नकार पर विजय पा ली हो, जिसका कोई भी शत्रु न रह गया हो, जिसने स्वयं को साध लिया हो, ऐसा स्वच्छ दर्पण सा मन जिसके पास हो दुनिया का कोई संकट उसे छू भी नहीं सकता. ऐसा ही मन उसका हो, यही उसके जीवन का लक्ष्य है.

Today is a hot and humid day of mid day. It is early morning but not very cool and pleasant like many mornings in Assam. When they will leave this place to go somewhere else most probably in UP or Uttaranchal, they will miss the calm and serene atmosphere of Assam. But that is many years away today at this moment she has to live in the present.

आज सुबह जून ने रोज की तरह उठाया, नन्हे और उनके जाने के बाद उसने घर संभाला, कितनी अच्छी-अच्छी बातें रोज ही सुनती है, पढ़ती है. कभी-कभी वे एकदूसरे का विरोध करती हुई भी प्रतीत होती हैं, कभी कोई कहता है कि अंतर में डूबकर साधना की जा सकती है, दुनियादारी से जितना दूर रहकर निर्मुक्त होकर जीयें उतना अच्छा है फिर दूसरा विचार कहता है, स्वयं को गुनना छोड़कर दूसरों के काम आना सीखो, दोनों में से कौन रास्ता ठीक है ?

Jonathan can learn flying so can she, he has no limitations of body, time and space. He is free  like true self. Jonathan taught her the same lesson she is trying to learn from Buddha and all other wise men. But now when she knows and has faith in the highest bliss, she has to find her self. She is no longer a helpless, weak, poor soul but she is the soul which can not be crushed. Which can fly higher and higher without any limit.

मानव के लिए असीम सम्भावनाएं हैं वह चाहे तो स्वर्ग तक पहुंच सकता है, स्वयं अपना स्वर्ग बना सकता है. उसे रोकती हैं तो उसकी स्वयं की कमियां, हृदय की क्षुद्रता, संकीर्णता और अपनी शक्ति पर भरोसा न होना. यह दुनिया वैसी ही दिखती है जैसा कोई देखना चाहता है, खुद के विचारों को ही जैसे आईने में प्रतिबिम्बित किया जा रहा हो, इसलिए जहाँ कहीं भी दुविधा, दुःख, क्षोभ की अनुभूति हो समझना चाहिए अंतर में कहीं मेल जमा है. वरना तो प्यार का प्रतिदान प्यार में ही मिलता है. यही दुनिया की रीत है और यही उस परवरदिगार की तदबीर है. उसने हम सबको बहुत छूट दी है और बहुत शक्ति भी दी है. चाहें तो स्वर्ग बना लें और चाहे तो अपना व अपनों का जीवन दुखमय कर लें. कल छोटे भाई का कार्ड व पत्र मिला उसके स्नेह ने नूना के हृदय में स्नेह को उत्पन्न किया. पड़ोसिन को उसने कटहल दिया तो उसने आम दिए, उन्होंने बातें कीं और लगा कि वे किसी बंधन में बंधे हैं. एक और सखी को उसने बगीचे के आम भिजवाने का वायदा किया है, उसे भी स्नेह रूप में ही वे मिलेंगे और यह सिलसिला जारी रहेगा. जीवन एक यात्रा भी है और एक पड़ाव भी जहाँ वे अन्य यात्रियों से मिलते हैं किन्तु असली मंजिल का पता भी नहीं भूलते, वहाँ अटक नहीं जाते, असली मंजिल तो रब ही है वही सृजनहार जिसने सबको बनाया तो अपने जैसा ही है पर वे खुद को कुछ और समझ बैठे, भूल ही गये..कि वे कौन थे.




Friday, March 14, 2014

हनुमान मन्दिर


उसने सोचा, वक्त आ गया है कि कुछ पल बैठकर मन का लेखा-जोखा किया जाये, मन जो इस वक्त शांत है. कल रात को जीजीएम के संदेश का अंग्रेजी से हिंदी अनुवाद करते समय आने वाली दिक्कतों से थोड़ा परेशान हो गया था, पर वक्त पर पूरा करके दे सकी इसका श्रेय भी इसी मन को है. जून होते तो रात साढ़े दस बजे तक बैठकर उसे काम नहीं करने देते शायद तब इतनी देर भी नहीं लगती, उसने दो-तीन तकनीकी शब्दों का हिंदी अनुवाद एक मित्र के यहाँ फोन करके पूछा, बाद में पता चला वे लोग पहले पैकिंग करने के कारण देर से भोजन कर रहे थे और उन्हें उठकर फोन रिसीव करना पड़ा. उसे लगा, उन्हें अपने परिचितों को taken for granted नहीं लेना चाहिए. खैर जो हुआ सो हुआ ! कल दोपहर उड़िया पड़ोसिन के साथ भोजन अच्छा लगा, उस सखी की तरह इसने भी उत्तर भारतीय खाना बनाया था, राजमा वाली काली दाल, मिश्रित सब्जी और पनीर दो प्याजा तथा कढ़ी. नन्हा जिस तरह पांच-साथ मिनट में कपड़े बदल कर वहाँ आ गया, देखकर अच्छा लगा. नये स्कूल में पढ़ने जाने से वह होशियार हो गया है स्मार्ट भी. उसने समय देखा, मात्र दो घंटे बचे हैं, समय का नियोजन यदि करे तो आधा घंटा अभ्यास कर सकती है. कल घर से भी फोन आया, उन्होंने भी उनके अकेलेपन को दूर करने के लिए फोन किया, लोगों को उनकी परवाह है, जानकर ख़ुशी होती है.

आज सुबह भी देखा तो पूसी बरामदे में रखी रॉकिंग चेयर पर सोयी थी, रात को किसी वक्त जब जाली से कूद कर आई होगी तो अपने पंजों के दबाव से एक गमला भी उल्टा किया होगा, उसे देखकर क्रोध आया और उसे डांट के भगा दिया पर मन में यह ख्याल भी बना हुआ है कि मूक जानवर भला क्या जाने कि उसके किस काम से कोई खफा है. नन्हे के पैर में कल रात अचानक cramp हो गया, घुटने के पास से दांया पैर मुड़ ही नहीं रहा था, दर्द था, फिर बाद में कुछ राहत मिली तो सो गया पर सुबह तैयार होकर जब स्कूल के लिए निकला तो दर्द फिर आ गया, मना करने पर भी स्कूल तो गया है क्योंकि अगले पांच दिन स्कूल बंद है सो आज जाना ठीक ही था, कल उसने debate के लिए कुछ points लिखवाये पर कापी ले जाना भूल गया. कल रात स्वप्न में जून को देखा, अब यूँ भी अकेले रहना खलने लगा है.

आज जून आने वाले हैं, सो नन्हा और वह उनकी प्रतीक्षा कर रहे हैं, इतवार का सारा कार्य हो गया है. आज सुबह से वर्षा हो रही है, अलार्म भी सुनायी नहीं दिया, कल एक मित्र परिवार के साथ वे हनुमान मन्दिर गये, उनके कारण कभी-कभी मन्दिरों के दर्शन हो जाते हैं, उसे ध्यान के सिवा सब बचकाना लग रहा था पर घर पर अकेले रहने से बेहतर था. ‘हनुमान जयंती’ के उपलक्ष में एक जगह हनुमान पूजा भी देखी.

कल दोपहर दो बजे जून आ गये, साथ-साथ भोजन किया, घर जैसे भर गया. उनके लाये ढेर सारे सामानों से और उनकी बातचीत से. फिर शाम को बाजार गये. नन्हे की कुछ किताबें लेने जब उसका एक मित्र आया तो उसने कुछ नानुकुर की पर नन्हे ने समझाया कि उसे इन किताबों की कोई जरूरत नहीं है, बच्चे कभी-कभी बड़ों को राह पर ले आते हैं. उसका मन संवेदनशील नहीं है, पूसी को भगाया फिर कभी-कभी बेवजह पत्ते भी तोड़ देती है. यूँ ही झुझला जाती है पर जानती है कि यह सब वह कर रही है और ऐसा करना उचित नहीं है लेकिन क्यों कि ऐसा करने से कोई विशेष दुःख उसे नहीं उठाना पड़ता सो इससे परहेज नहीं करती. आज ध्यान में वह अपने विचारों को देख पाई कभी धीरे-धीरे कभी एक के बाद एक आते जा रहे विचार, मन एक पल भी खाली नहीं बैठता, आज जून शायद देर से आयेंगे straight शिफ्ट है. आज बैसाखी है पर सुबह से उत्सव जैसी कोई बात नहीं हुई. यदि मन स्थिरता से युक्त न हो तब उत्सव भी अर्थहीन हो जाता है.



Sunday, September 1, 2013

कालिदास का मेघदूत


आज बहुत दिनों के बाद ऐसा हुआ कि वह दोपहर को घर पर अकेले है, पुरानी दिनचर्या के अनुसार पहले अख़बार पढ़ती रही, यूँ काफी देर तक पढ़ा पर अब दोहराने बैठे तो कुछ विशेष याद नहीं, फिर भी अख़बार पढ़ना अच्छा लगता है. कुछ देर लाइब्रेरी से लाई वह पुस्तक modern Asian literature भी पढ़ी. दोपहर को टीवी देखने का अभ्यास पिछले कई हफ्तों से छूट गया है सो यही उचित लगा कि मन को साधा जाये यानि विचारों को लिखकर पहले एक बिंदु पर केन्द्रित किया जाये फिर गोयनका जी की सिखाई विपश्यना की क्रिया द्वारा कुछ देर साधना की जाये. सुबह दादा वासवानी ने भी मौन और प्रार्थना की शक्ति पर बल दिया. बाद में स्टोर की सफाई में लग गयी सो धयान नहीं कर सकी, रोज प्रयत्न ही करती है, ध्यान में सचमुच बैठने का अवसर मात्र एक बार मिला है. मन है कि विचारों की ओर दौड़ने लगता है. आज यूँ अपेक्षाकृत मन शांत है. लेकिन अभी कुछ देर में नन्हा आने वाला है, वह सुबह साढ़े चार बजे उठकर भी रात तक तरोताजा रहता है, बच्चों में या कहें मानव में शक्ति अपार है बस उसका सही इस्तेमाल करना आना चाहिए. उसके मन के खजाने में न जाने कितनी कविताएँ सोयी पड़ी होंगी, कितने अछूते भाव और ढेर सारा काम करने की कुव्वत, बस कमर कस के निकल पड़ने की देर है. फ़िलहाल तो किचन की ओर कदम बढ़ाने हैं, उसके बाद कहीं और !

वही दोपहर का वक्त और आकाश काले बादलों से घिरा हुआ. खिड़की से ठंडी हवा का झोंका आकर पीठ को छू जाता है सिर्फ दूर से किसी वाहन की ध्वनी आकर निस्तब्धता भंग कर देती है. काफी देर से reader’s digest पढ़ रही थी इस पत्रिका में पढ़ने के लिए बहुत कुछ है. आज सुबह उठने से पूर्व एक स्वप्न देख रही थी, वर्षों बाद एक पुराना स्वप्न, शायद वे स्मृतियाँ उसका पीछा कभी नहीं छोड़ेंगी, जैसे आज सुबह ध्यान में बैठने पर पांच मिनट में ही नन्हे ने माँ, माँ की गुहार लगा दी और उसके बाद इस वायु की गति से भी तेज भागते मन को पकड़ कर रखना सम्भव नहीं हो पाया. लेकिन उसे प्रयास तो करते ही रहना है, एक दिन अवश्य ऐसा आयेगा जब आचार्य के उपदेशानुसार वह अपने मन के विकारों को दूर करके उसे सम्पादित कर उस परम सत्य के दर्शन कर सकेगी अध्यात्म मार्ग पर चलने वालों को बहुत कठिन तपस्या करनी पडती है. अपने मार्ग में आये हुए सभी कार्यों को साधित करके उन्हें अपने कर्त्तव्य पालन का सदा स्मरण रहता है वे सत्य के मार्ग से कभी विचलित नहीं होते और सदा स्वयं भी तथा दूसरों को भी आनन्दित रखने का प्रयास करते हैं.


वर्षा की बूंदें पड़ने लगी हैं जो उसकी डायरी के इस पन्ने को भिगो रही हैं. सुबह के सवा पांच बजे यहाँ बाहर drive way पर जहाँ दोनों ओर से बेला के फूलों की सुंदर महक आ रही है और किसी पंछी की आवाज एक लय में आ रही है जिसमें अब बूंदों की टप टप भी मिल गयी है ऐसे सुहाने वक्त में तो मन शांत कोमल भावों से भरा होना चाहिए. उस एक की आराधना में लीन जो इस सुंदर दृश्य का चितेरा है और हर क्षण साथ रहकर चेताता रहता है, वह जो पल-पल मन को सजग रहने का निर्देश देता है गलती होने पर आत्मग्लानि से मन को भर देता है, और जिसकी बात वह सुनी-अनसुनी कर जाती है फिर भी वह नाराज नहीं होता. जो इस जगत में हर एक का रखवाला है. आज जुलाई का पहला दिन है, यानि आषाढ़ का महीना, सदियों पूर्व जब मेघों की सुन्दरता से प्रभावित होकर कालिदास ने मेघदूत की रचना की होगी. कल सुबह जून ने घर फोन किया तो पिता ‘कृष्ण’ देख रहे थे टीवी पर सबके साथ, वे लोग उसमें साक्षात् भगवान को देखते हैं, और वह नाटक, तभी देख नहीं पाती. 

Thursday, October 18, 2012

नए वर्ष का स्वागत



दिसम्बर का प्रथम दिवस, सर्दी जितनी होती है इस महीने में उतनी नहीं है. सम्भव है इस महीने में ठंड बढ़े. आज बड़े भाई का जन्मदिन है. आज उसने कक्षा आठ को अंकगणित में समानुपात पढ़ाया, उनका कोर्स बहुत कम हुआ है, और छात्राएं भी होशियार नहीं लगीं, गलती छात्राओं की कम, अध्यापकों की अधिक है. गणित के वह टीचर..लगातार पान चबाते हुए...क्या प्रभाव डाल पाएंगे विद्यार्थियों पर. वितृष्णा सी होती है देखकर..खैर, किसी तरह ग्यारह दिन और पढ़ाना है.

अभी तक जून के पहुंचने की कोई खबर नहीं आयी है, उसे चिंता होने लगी है. पता नहीं क्या बात है, उसके मन में विचारों की श्रंखला चलने लगी, वह ठीक तो होगा, क्या उसे यह बात पता होगी कि उसका कोई समाचार उन्हें नहीं मिल रहा है. फिर भीतर से किसी ने कहा कि परसों यानि सोमवार को उसका पत्र अवश्य आयेगा. उसने मन ही मन ढेरों शुभकामनायें उसके स्वास्थ्य के लिए कीं, उसकी खुशी के लिए कीं और मन हल्का हो गया. आज ही उसे पता चला कि जब अगले शनिवार तक उसके गणित के सत्रह पाठ हो जाएंगे और विज्ञान के ग्यारह, उसी दिन अध्यापन का अंतिम दिन है.

इतने दिनों से डायरी नहीं खोली, आज जाकर अवसर मिला है, अध्यापन फ़िलहाल तो समाप्त हो गय है. अब सोमवार से पढ़ाई शुरू होगी. आज माँ-पिता व छोटे भाई-भाभी के पत्र आये हैं. छोटी बहन का पत्र आया था, उसे जवाब लिखा है, पता नहीं उस पर क्या प्रतिक्रिया होगी. काकू की तबियत अभी तक ठीक नहीं हुई है, उसने सोचा कि उसे एक कार्ड भेजेगी. जीजाजी भी नहीं होंगे सो दीदी का पत्र तो आने से रहा. उसकी ननद भी जो बैंक की तरफ से ट्रेनिंग में गयी हुई थी, आजकल में लौटने वाली है.

आज बहुत दिनों बाद थ्योरी की कक्षाएं हुईं, कुछ समझ में ही नहीं आ रहा था. सुबह से वे खाली थे, फिर अंतिम दो कक्षाएं हुईं, सुधा मैम का लेक्चर अच्छा था, आरती मैम का विषय बहुत उबाऊ था, और किसी दिन पढातीं तो शायद ऐसा न होता पर दिन भर प्रतीक्षा करते करते मन थक चुका था. कल कालेज में गेम्स होंगे, पीटी करवानी होगी, उसने अपना नाम तो दे दिया है. परीक्षा की तारीखें आ गयी हैं, १५ अप्रैल से शुरू होंगी और अप्रैल के आखिर तक चलेंगी संभवतः. मई में वे अपने घर जायेंगे.

आज जून का पत्र आया है. शाम को बाजार गयी थी, लौटी है कुछ देर पूर्व ही, मन-मस्तिष्क थका हुआ है. कल कालेज में कुछ नहीं हुआ सिवाय बातों के. आज सोचा है देर से जायेगी. सिर्फ ‘बागवानी’ होगी और सम्भवत ‘जनसंख्या’ का पीरियड हो, पर उसे बाद में नोट किया जा सकता है. वह नए वर्ष के लिए कुछ कार्ड्स लायी है.

नववर्ष के शुभागमन के साथ ही
तुम्हारे सौभाग्य का उदय हो...
चलते चलो
जीवन के पथरीले पथ पर
दर्द जितना अधिक हो
सुख उतना ही ज्यादा होता है उसके मिटने पर
तपकर ही निखरोगे
जीवन की धूप में तपकर
निखार आएगा
नए वर्ष में स्वप्न देखो
तारों को छूने के
तभी आकाश तक पहुंच पाओगे
जीवन के इस समुद्र में
तैर कर पार हो जाओगे
चलना, तपना, तैरना और स्वप्न पूर्ण करना
क्या चारों पर्यायवाची नहीं..?

Friday, March 16, 2012

एक नया मोड़



कई दिनों से उसने कुछ नहीं लिखा है, मन में कितने विचार उठते हैं. हर समय एक सवाल सा रहता है. आज वे डॉक्टर के पास गए थे. डॉक्टर ने जाँच की और बताया कि वह जो सोच रहे हैं, सही है. जिस तरह जाँच की गयी वह तरीका नूना को पसंद नहीं आया, वह परेशान हो गयी घर आकर भी काफ़ी देर तक परेशान रही, उसे उदास देखकर जून भी परेशान हुआ. अगले माह उन्हें घर  जाना है. ऐसे में यात्रा नहीं करनी चाहिए पर उसने सोचा देखा जायेगा. अस्पताल जाने से पूर्व वह जितनी खुश थी वापस आकर उसकी शतांश भी नहीं है. कल दीवाली है, जून आज अकेले तिनसुकिया जायेगा सब सामान लाने.