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Thursday, August 10, 2017

एओल का आनंद उत्सव


आज शाम पांच बजे से उनका कोर्स शुरू हो रहा है. तेरह वर्ष पहले पहली बार ‘आर्ट ऑफ़ लिविंग’ से जुड़ी थी, तब से अब तक जीवन में कितना परिवर्तन आया है, शब्दों में इसे कहना कठिन है. मन शांत है और बहुत से सवालों के जवाब भी मिल गये हैं. तन, मन दोनों की सफाई भी हुई है. आत्मा और श्वास के संबंध का ज्ञान हुआ है. प्राण ऊर्जा ही आत्मा को इस देह से बाँध आकर रखती है. मन ही खो गया है, पुराना वाला मन और परमात्मा से परिचय हुआ है..पर अभी भी बहुत दूर जाना है, क्योंकि वह अनंत है..उसकी ओर की जाने वाली यात्रा भी. कोर्स के अंतिम दिन का आयोजन भी कितना आनन्द दायक होता है सभी के लिए. आज मृणाल ज्योति के लिए वहाँ के एक कर्मचारी ने आंकड़े भेजे हैं. कुल डेढ़ सौ बच्चे हैं अब वहाँ, स्कूल आगे बढ़ रहा है. ‘विश्व विकलांग दिवस’ के लिए तिनसुकिया के एक स्कूल के बच्चों ने काफी अच्छे पोस्टर बनाये हैं. उन्हें कल धन्यवाद का पत्र लिखेगी. एक अन्य स्कूल के बच्चे और वहाँ की प्रधानाचार्या मृणाल ज्योति के बच्चों से मिलने आ रही हैं. सभी टीचर्स उत्साहित हैं.

‘आर्ट ऑफ़ लिविंग’ के टीचर एक सखी के यहाँ रुके हुए हैं. उसने आज सुबह का नाश्ता बनाकर भेजा उनके लिए, वह एक विदेशी गोरे व्यक्ति हैं पर हिंदी और संस्कृत पर अच्छी पकड़ है. सभी को कोर्स में आनन्द आ रहा है. अंतिम दिन एक प्रतियोगिता है और समूह में सेवा का एक कार्य भी करना है. गुरूजी की तस्वीर के लिए फूलों की एक माला भी उसने बनवाई है नैनी से, शाम को लेकर जाएगी.

कोर्स पूरा हो गया और अंतिम दिन का उत्सव भी. आज सुबह प्रसाद रूप में एक अनोखा अनुभव हुआ, सद्गुरू की कृपा का प्रसाद अनवरत बरस ही रहा है. अब ठंड बढ़ गयी है. आज से गर्म वस्त्र निकाल लिए हैं. आलमारी में उसने मंगनी व शादी की साड़ियाँ देखीं, किनारे से रेशमी धागे निकल आये थे, पीको के लिए दीं तथा पल्लू पर झालर बनाने के लिए भी, इतने वर्षों बाद भी पहले सी सुंदर लग रही थीं. बगीचे में सर्दियों के फूलों की पौध भी लग गयी है. बोगेनविलिया अपने शबाब पर है और जरबेरा के फूल भी खिल रहे हैं. सब्जी बाड़ी में भी लगभग सभी के बीज व पौध लगा दिए हैं. कल से प्रतिदिन एक घंटा बाड़ी में बिताएगी ऐसा निर्णय लिया है. कल कम्पोस्ट खाद भी मंगानी है.

अगले हफ्ते आज ही के दिन विश्व विकलांग दिवस है, उसे उद्घोषणा के लिए स्टेज पर रहना होगा और दोपहर को हॉल की सज्जा के लिए भी जाना है. नन्हे ने उस दिन के लिए कुछ सहायता राशि भेजी है. उसने बताया, उसका एक मित्र लंदन से आया हुआ है. स्कूल के प्रबन्धक ने अपने पुत्र के अन्न प्राशन का निमन्त्रण भेजा है. आज लेडीज क्लब की मीटिंग में एमवे के उत्पाद का प्रस्तुतिकरण भी था. काफी तारीफ की उन्होंने. वे सौन्दर्य उत्पादों के साथ साथ स्वास्थ्य के लिए भी उत्पाद बनाते हैं. आज जून ने उसका एक पासपोर्ट साइज फोटो खींचा, पर उसे पसंद नहीं आया. अब चेहरे पर उम्र का पता चलने लगा है, जो कि स्वाभाविक ही है, पर आत्मा तो कभी वृद्ध नहीं होती, वह तो सदा ही एकरस है, सत्यम.. शिवम.. सुन्दरम ! जून आज एक कांफ्रेंस के लिए दिल्ली से आगे जयपुर रोड पर स्थित नीमराना जा रहे हैं. डिब्रूगढ़ का रास्ता रोका जा रहा है, ऐसी खबर सुनकर वह तिनसुकिया होते हुए जाने वाले थे कि किसी ने गलत सूचना दी, रास्ता खुल गया है, पर उन्हें लौटकर पुनः दूसरे रास्ते से जाना पड़ा. एअरपोर्ट पर सूचना भिजवा दी थी, किसी तरह वे लोग समय पर पहुँच पाए. असम में बंद व रास्ता रोको एक सामान्य घटना है पर इसका खामियाजा जिसको भुगतना पड़ता है, वही जानता है. आज प्रधानमन्त्री भी गोहाटी आ रहे हैं.


Wednesday, August 3, 2016

भीगा भीगा मौसम


आज सुबह क्रिया के दौरान तथा बाद में ध्यान में भी सद्गुरु की कृपा का अनुभव हुआ, भीतर उस चैतन्य शक्ति का अनुभव हुआ और उनकी उपस्थिति इतने स्पष्ट तौर से महसूस की कुछ पलों के लिए ! कितना अद्भुत है यह आत्मा का ज्ञान ! आज का दिन उसके लिए (भाषा के कारण कहना पड़ता है वरना एक ‘लहर’ के लिए, ‘आत्मा’ के लिए) बहुत खास हो गया है. शब्द छोटे पड़ते हैं उन भावों को व्यक्त करने के लिए, वह अकारण दयालु है, सुहृद है..हितैषी है, करुणा का सागर है..आज ये सारे शब्द अनुभव में आये हैं. एक-एक कर वह उसकी कमजोरियों से मुक्त करा रहे हैं. उसका ध्यान कक्ष जैसे उनका आश्रम ही बन गया है. वहाँ योग शिक्षिका ने कोर्स कराया, उस दिन सद्गुरु वहाँ अवश्य उपस्थित रहे होंगे. कितने सरल ढंग से कितनी गूढ़ बातें वह उन्हें सिखा देते हैं, कहते हैं वे यूज़फुल बनें, मस्ती और ज्ञान में डूबे हुए, छोटे बच्चे की तरह निर्दोष ! वे कितने बेहोश जीते चले जाते हैं, कंकरों, पत्थरों को सम्भालते हैं और हीरे गंवा देते हैं ! परमात्मा की कृपा अनंत है, वह महान हैं और इतने भोले भी कि सभी को अपने जैसा ही मानते हैं, वह उन्हें उनकी सारी कमियों के साथ अपना लेते हैं.


दोपहर के दो बजे हैं, मौसम सुहावना बना है, अभी –अभी आइसलैंड के राष्ट्रपति का भाषण सुना कि जो ज्वालामुखी अभी फटा है उससे बड़ा फटने को है. पिछले कई दिनों से यूरोप में हवाई उड़ानें बंद हैं. कुछ देर पहले एक सखी से बात हुई, उसकी बिटिया कुछ ही दिनों में घर लौट आएगी. जून ऑफिस में हैं, माँ-पिताजी सो रहे हैं. तीन दिन बाद माली आया है, गुलाब के पौधों की कुड़ाई कर रहा है. उससे कुछ बात करने का सहज ही मन नहीं हो रहा. मौसम अभी भी भीगा-भीगा सा है. जून का स्वास्थ्य अभी भी ठीक नहीं है, आज दोपहर उन्होंने कहा कि प्रेम की कमी भी कारण हो सकती है...जो स्वयं प्रेम हो वह दूसरों से प्रेम मांगे, अजीब लगता है पर जिसने अभी यह नहीं जाना कि वह प्रेम है वह तो ऐसा ही कहेगा.. उसे भी अपना अतीत नहीं भूलना चाहिए, जून की ज्यादा देखभाल करनी होगी, उसके खोये विश्वास को पुनः जगाना होगा. वह जिसमें जीते ऐसे खेल उसके साथ खेलने होंगे, उपदेश से कुछ भी नहीं होने वाला है. जब उसे स्वयं के लिए अब कुछ भी करना नहीं है, कुछ भी पाना नहीं है तो उसकी हर श्वास अब जून के लिए ही होनी चाहिए..उसके प्रेम में पड़ना होगा  जैसे पहले उन दिनों में थी..उसके भीतर भी तो वही परमात्मा है..परमात्मा भी केवल प्रेम चाहता है और जून भी केवल प्रेम ही चाहते हैं, ढेर सारा प्रेम..और वह सिवाय प्रेम के कुछ रह ही नहीं गयी है..अनंत प्रेम से ही वह बनी है..जीवन कितना सुंदर है यहाँ कुछ भी खोने को नहीं है केवल पाना ही पाना है अनंत प्रेम, आनन्द और शांति..फिर वही देते जाना है..अस्तित्त्व को..लोगों को..प्रकृति को..और जून को..उसके होना तभी सार्थक होगा जब जून भी पूर्णस्वस्थ हों..पूर्णतृप्त हों..पूर्णमुक्त हों..और..पूर्ण प्रसन्न हों..अब उसे उन्हीं के लिए जीना है. स्वार्थ समाप्त हुआ क्योंकि वहाँ कोई है ही नहीं. वहाँ  जो है वह देने वाला है..लेकिन एक्टिंग भी करनी पड़ेगी लेने वाले की..अभिनय भी करना होगा जैसे भक्त और भगवान करते हैं..एक होकर भी दो का अभिनय करते हैं ! जून अवश्य ही ठीक हो जायेंगे..उसने स्वयं से वादा किया. 


Thursday, July 7, 2016

चन्दन की लकड़ी


आज गुरूजी दुलियाजान आये. कल रात से ही उसका मन, प्राण सभी उनकी प्रतीक्षा कर रहे थे. सुबह से ही मन पुलकित था. वे नौ बजे आयोजन स्थल पर पहुंच गये. भजन गायन का आरम्भ हुआ तो उन्होंने मगन होकर भजन गाए. पंडाल बहुत सुंदर सजाया गया था. उसने हिंदी में उनका परिचय दिया, असमिया में एक अन्य व्यक्ति ने दिया, जो मंच पर कार्यक्रम प्रस्तुत करने वाला एक प्रोफेशनल कलाकार था. गुरूजी ग्यारह बजने से कुछ देर पहले आये. उन्होंने उसे दृष्टि भर देखा, वह स्टेज पर पीछे बैठी थी, सोच रही थी, वह पीछे मुड़कर देखेंगे तो वह उनके दर्शन करेगी. उन्होंने ध्यान भी कराया. बहुत सी बातें कीं. वे पूरा कार्यक्रम नहीं देख सके क्योंकि उन्हें सेंटर जाने की जल्दी थी, जिसका उद्घाटन करने वे आने वाले थे. वहाँ कुछ देर प्रतीक्षा की, भजन गाए. तब गुरूजी आये, उसने उन्हें उनके आगमन पर लिखी कविता व ‘श्रद्धा सुमन’ पुस्तिका दी, घर पर बनायी मिठाई दी जिसपर उन्होंने हाथ रखा, पर बाद में उसने आर्ट ऑफ़ लिविंग के एक टीचर से भिजवा दी. उन्होंने अवश्य ही खायी होगी. उससे कहा, बिंदी क्यों नहीं लगाई, लगानी चाहिए तब जून की शिकायत की उसने उनसे, कि वही मना करते हैं ! वह उसके दिल के इतने करीब हैं कि उनसे कुछ छिपाने का कोई अर्थ नहीं रह जाता, वह उसे उससे भी अधिक जानते हैं. क्लब में भी उन्होंने प्रवचन दिया, सूक्ष्म व्यायाम करवाए, प्रश्नों के उत्तर दिए. सौ प्रतिशत शक्ति लगाकर काम करें, दूसरों के बारे में गलत न सोचें, ईश्वर सदा सबके साथ है और सदा मुस्कुराएँ ! ज्ञान के ये अनमोल मोती उन्हें दिए. यादों का एक खजाना छोड़ गये हैं वह दुलियाजान वासियों के दिलों में. उसके सिर पर हाथ रखा, अभी भी उस स्थान पर सिहरन हो रही है. परमात्मा सत्य है, वही शिव है और शिव ही सुंदर है. सद्गुरु परमात्मा का ही रूप है और वे कितने भाग्यशाली हैं कि ऐसे जीवित सद्गुरु उनके जीवन में हैं. उनकी कृपा तो उन पर सदा ही बरस रही है, उन्हें उसे पाने के लिए सुपात्र बनना होगा. उसने प्रार्थना की कि वह उनकी कृपा के लिए सुपात्र बनेगी.

गुरूजी कल दोपहर वापस चले गये लेकिन उसके मन में अमिट यादें छोड़ गये हैं. उनकी दृष्टि भीतर तक बेध गयी, उनका उसके सिर पर प्रेम भरा स्पर्श, याद आते ही ऑंखें भर आती हैं, वह प्रेम का महासागर हैं. कितना अद्भुत है परमात्मा जो एक मानव देह का आश्रय लेकर प्रकट होता रहा है. कितने भाग्यशाली हैं वे जो उनका प्रेम पा सके हैं. उसका मन कृतज्ञता के अश्रुओं से सराबोर है. यही हाल तब हुआ था जब वह गोहाटी से वापस आई थी. सुबह से सिवाय उनको याद करने व अश्रु बहाने के और कुछ भी नहीं किया है. शाम को एक सखी के यहाँ जाना है, उसकी विवाह की वर्षगांठ है. उसके लिए कुछ लिखने का भाव ही नहीं जग रहा, वह खुश रहे यही भाव उठ रहा है. मन किसी भी तरह के पूर्वाग्रह या द्वेष से न ग्रसित हो, सद्गुरु की पावन स्मृति बनाये रखे, बुद्धि निर्मल रहे यही प्रार्थना है ! गुरूजी कहते हैं शब्दों को अर्थ मानव प्रदान करते हैं. शुभ-अशुभ, हानि-लाभ से परे जो शुद्ध तत्व है उसी में उन्हें विश्राम पाना है. उसके भीतर एक गूँज दिन-रात गूँजती है, इस समय कितनी स्पष्ट सुनाई दे रही है, उसे बिंदी लगाने को कहा उन्होंने पर उसने उनका कहना अभी तक नहीं माना है. उसके पास बिंदी है ही नहीं. सम्भवतः जून ने चन्दन की लकड़ी व घिसने का पत्थर कहीं छिपा दिए हैं या फेंक ही दिए हैं. उन पर उसकी बात का कोई असर नहीं होता पता नहीं किस मिट्टी का उनका दिल है जो तिलक के लिए पिघलता ही नहीं. शायद अंत में पिघले अथवा तब भी नहीं. उसे एक कविता सखी के लिए लिखनी है और एक होली पर हिंदयुग्म के लिए तथा एक हिंदी कविता के लिए. एक लेख लिखना है जो बच्चों के सही पालन-पोषण पर है ताकि भविष्य में वे अच्छे नागरिक बन सकें. गुरूजी के लिए भी एक और किताब लिखनी है, नई कविताएँ होंगी उसमें. उनके जीवन व बचपन पर एक कहानी भी लिखनी है. कितना अनोखा व्यक्त्तित्व है उनका, बचपन से ही भक्तिभाव में डूबे हुए.. सदा मुस्कुराते हैं.. लाखों लोग उनके दीवाने हैं और सभी को वे अपने लगते हैं. उसे भी उनके अपरिमित स्नेह में भीगने का डूबने का अवसर मिला है. तन, मन, प्राण सभी भीगे हैं उस प्यार के रंग में..अब वे किसी नये शहर में अपना जादू बिखेर रहे होंगे. पिताजी बाहर बगीचे में पानी डाल रहे हैं, उन्होंने यह काम बखूबी सम्भाल लिया है, माँ रोज की तरह कुर्सी पर बैठी हैं, आज वे ठीक हैं.



Friday, July 1, 2016

हरी हरी वसुंधरा


इसी महीने की इक्कीस तारीख को गुरूजी दुलियाजान आ रहे हैं. यह भी हो सकता है वे कुछ दिन पहले तक सोच भी नहीं सकते थे. कल वह कोलकाता में थे, शिवरात्रि उत्सव मनाया गया. उन्होंने कहा, परमात्मा हर क्षण साथ है और जैसे वे उसे याद करते हैं, वह भी उन्हें याद करता है, चाहता है.
आज टीवी पर सुना...वसुधा, वसुंधरा, धरा, धरित्री, पृथ्वी, मही, भू, भूमि, मेदिनी, श्री, विष्णुपत्नी इतने सारे नाम हैं धरती माँ के ! हर एक का अलग अर्थ है. वसुधा कहते हैं क्योंकि कितना सम्पदा इसके पास है, वसु धन भी है और रहने का साधन भी है. वह देवता भी है, वसुधा का अर्थ इसलिए घर मात्र नहीं है, घर की आत्मीयता भी है ! धरा, धरित्री, धरती का अर्थ धारण करने वाली अर्थात सहनशीलता, क्षमा, शक्ति, क्षमता, माँ, उदारता ! भू का अर्थ है होना, पृथ्वी जड़ नहीं, स्थिर नहीं, किसी आकर्षण में घूम रही है. भूमि का अर्थ होने की प्रक्रिया को आधार देने वाली अर्थात जिन्हें वह आधार देती है उनको भी एक-दूसरे के लिए क्रियाशील देखना चाहती है. विष्णु ने मधु-कैटभ का वध किया, उसके मेद से बना स्थूल पिंड ‘मेदिनी’ कहलाया. श्री भूदेवी है आश्रय देने वाली. इन सब अर्थों को लेकर पृथ्वी की अवधारणा करें तो वसुधैव कुटुम्बकम का आधा अर्थ समझ में आता है, शेष इस पर रहने लोगों की आत्मीयता से बनता है !
चचेरे भाई का पैर डाक्टर बचा नहीं पाए. अभी पिताजी से बात की उन्होंने बताया. जीवन में बड़ी दुर्घटनाएं भी घटती हैं पर समय के साथ-साथ मानव उनकी भीषणता को पार कर जाता है ! Right parenting creates right citizen अर्थात ‘उचित पालन पोषण से ही जिम्मेदार नागरिक का निर्माण संभव है’ या ‘माता–पिता द्वारा सही पालना जिम्मेदार नागरिक को जन्म देती है’ अथवा जिम्मेदार नागरिक के निर्माण हेतु उचित पलना आवश्यक है’ या फिर जिम्मेदार माता-पिता ही जिम्मेदार नागरिक का निर्माण करते हैं’ उपरोक्त सभी वाक्य उसने लेडीज क्लब के बुलेटिन के लिए कल लिखे. कल मीटिंग है. एक सखी ने फोन करके कहा वह सांस्कृतिक कार्यक्रम में भाग ले रही है. एक बात के लिए कई बार फोन किया, वे अपनी कितनी शक्ति यूँ ही गंवाते हैं.  

गुरूजी दुलियाजान आ रहे हैं, यह बात उसे कई दिनों से ज्ञात थी. लेकिन पहले-पहल यकीन ही नहीं हो रहा था. इस छोटी सी जगह में इतने बड़े गुरूजी आ भी सकते हैं, इस बात का यकीन नहीं हो रहा था. पर अब तो पक्की हो गयी है यह बात कि वह आ रहे हैं ! हवाएं भी यही गीत सुना रही हैं, पंछी भी यही तराना गा रहे हैं, चारों ओर कोई धीमे-धीमे स्वरों में कह रहा है, वह आ रहे हैं..उसका सद्गुरु आ रहा है. जितना पीछे लौटती है उनकी कृपा का आवरण घना होता हुआ पाती है. तब यहाँ पहला एओल कोर्स भी नहीं हुआ था. वह पुकारती थी, प्रार्थना करती कि ईश्वर उसके लिए कोई गुरु भेज दे, इस स्थान से कहीं जाकर गुरू की तलाश करना उसके लिए असम्भव था. प्रभु ने सुन ली. यहाँ एओल का पहला कोर्स हुआ, फिर दूसरा जिसमें उसे क्रिया के दौरान अनोखा अनुभव हुआ. उस दिन से ही सही अर्थों में उसकी आध्यात्मिक यात्रा का शुभारम्भ हुआ, जो अनवरत जारी है, कितने विकारों से ग्रसित था मन, धीरे-धीरे जैसे कोई काँटों पर से रेशमी वस्त्र को उतारता है, मन को विकारों के काँटों से मुक्त किया और आज मन का दर्पण भीतर की शांति को, प्रेम को, आनंद को प्रतिबिम्बित करता है. भीतर उनके यदि कटु स्मृतियाँ हैं तो प्रेम का सागर भी है. वे वही हैं. एक बार अपने सच्चे स्वरूप की झलक मिल जाने के बाद कोई विषाद नहीं रह जाता, सारे संशय मिट जाते हैं. गुरु उनके स्वरूप का बाह्य रूप ही तो है, वह इतना पावन इतना महान है कि वे बरबस ही उसकी ओर खिंचे जाते हैं. वे उसमें अपनी झलक ही देखते हैं, वह ईश्वर का भेजा दूत है जो उन्हें पुनः उनके घर का पता बताने आया है, सद्गुरु आ रहे हैं ठीक नौ वर्षों बाद जब ज्ञान मिला, इतने वर्षों में उसे पकाया और अब अगले नौ वर्षों में उसका जीवन कैसा होने वाला है इसका बीज बोने सद्गुरु आ रहे हैं !

Friday, June 3, 2016

आत्मा नर्तकः


आज सुबह गुरुकृपा का बादल बरसा. कैसा अनोखा अनुभव था, सारे संदेह मिट गये. आत्मा की कैसी स्पष्ट अनुभूति ! मन, बुद्धि, चित्त व अहंकार से परे अपने सही स्वरूप की प्रतीति हुई, ऐसा लगा जैसे एक पर्दा हट गया हो. कृतज्ञता के अश्रु झलक आये, फिर झरनों की सी खिलखिलाहट भी भीतर भर गयी. शरीर पृथक है, प्राण पृथक है, वे साक्षी स्वरूप आत्मा हैं, चैतन्य शक्ति हैं जो शांति स्वरूप है, आनन्द व सुख स्वरूप है, पावन है, दिव्य है, सारे अवगुणों की सीमा जहाँ समाप्त हो जाती है, सारा अज्ञान मिट जाता है, वहाँ उस प्रकाश पूर्ण सत्ता का आरम्भ होता है. सदियों से जन्मों से मन जिस अंधकार में भटक रहा था वह जैसे नूर मिलते ही छंट गया है, अब कोई भ्रम नहीं रहा, कोई कामना नहीं रही, कोई वासना नहीं रही, अब शेष है तो केवल एक चिर स्थायी शांति जो आनंद से भरी है, अनोखी है यह अवस्था ! सारा अतीत जैसे किसी और के साथ घटा था, वह कोई और था, इसे ही सद्गुरू मृत्यु कहते हैं, वह जो व्यक्ति पहले था उसकी मृत्यु हो गयी यह जो व्यक्ति अब है यह बिलकुल ही नया है, समय से पूर्व कुछ नहीं होता. पकते-पकते मन झर गया है, अब इस देह से जो भी होना है, वह परमात्मा के द्वारा ही होना है, क्योंकि वह तो अब है ही नहीं ! जन्म जन्मांतरों के गुनाह योग अग्नि में जल जाते हैं, भीतर गहराई में जो ज्ञान छिपा है तभी बाहर आता है जब गुनाहों की, विकारों की परतें जल जाती हैं, तब वे पहली बार विश्राम को उपलब्ध होते हैं !  

आज पुनः क्रिया के बाद अनोखा अनुभव हुआ, परमात्मा के साथ अपनी एकता का अनुभव ! बचपन से किये गये सारे दुष्कृत्य एक-एक कर याद आए और माया के प्रभाव में किये वे सारे कर्म एक साथ ही जल गये. मन हल्का हो गया है कोई अतीत रहा ही नहीं, जो कुछ भी उनसे अज्ञान दशा में होता है, ज्ञान मिलते ही उसका कोई अर्थ नहीं रह जाता, तभी संत कहते हैं कि इस संसार में अन्याय जैसा कुछ भी नहीं, सभी न्याय है. पिछले जन्मों के भी कई अनुभव पिछले कुछ महीनों में हुए. अस्तित्त्व हर क्षण उन पर नजर रखे है, वह चाहता है कि जीव उसके साथ एक हो जाये. भीतर एक पुलक भर गयी है. गीत और नृत्य सहज ही होने लगते हैं. सभी के भीतर यही आनंद छिपा है, सभी एक न एक दिन इसी आनंद को अनुभव करेंगे. अभी वे स्वयं को मन, इन्द्रियों के घाट पर पाते हैं, उड़ने का तरीका नहीं जानते. चिदाकाश में उड़े बगैर ही वे इस दुनिया से चले जाते हैं. मन्दिर मस्जिद भी लोग जाते हैं तो अपनी इच्छाओं की पूर्ति के लिए !

चेतना नित नूतन है. पल-पल बदल रही है. जो घड़ी अभी आई है वह न पहले कभी थी न आगे कभी आएगी, फिर भी वह अनादि है. कितना सुंदर है यह ज्ञान ! परमात्मा सर्वव्यापक है, वह सर्वकालिक है, सर्वदेशीय है, इस क्षण भी वह उन्हें घेरे हुए हैं, कैसी पुलक उठ रही है !


सद्गुरु के प्रति अहोभाव से मन भर गया है. जिनको न कुछ पाने को शेष रह गया ही न कुछ करने को, वही संत जन अहैतुकी कृपा या सेवा कर सकते है. वे जो कुछ करते हैं वह आनंद के लिए,  जिसे वह मिल गया हो अब उसके लिए कुछ पाना शेष नहीं रहता ! प्रतिपल उनका मन आनन्द की खोज में लगा रहता है, ऐसा आनंद जो अनंत राशि का हो तथा जो कभी न छिने न. जिन्हें वह मिल गया उन्हें कुछ करने को शेष रहता नहीं, लेकिन फिर भी वह करते हैं, क्योंकि वह अन्यों को आनंद देना चाहते हैं ! वे केवल कृपा करते हैं, अकारण हितैषी होते हैं, सुहृद होते हैं !

Thursday, September 10, 2015

कृपा की बदली


सद्गुरु की कृपा हर क्षण उसके साथ है, गुरू के वचन अमृत के समान होते हैं जो भीतर की सारी कलुषता को धो डालते हैं. उसका मन इस समय शक्ति से भरा है, भविष्य के प्रति आशावान तथा वर्तमान के प्रति सजग ! परमात्मा हर क्षण उसके साथ है, कभी-कभी वह उसे याद न करे तो ‘वह’ उसे याद करता है और तब बिना किसी वजह के वह मुस्कुराने लगती है, गाने और नाचने लगती है. वह अनोखा है, अद्भुत है. उसकी महिमा के गीत यूँही तो नहीं गाये गये. वह क्या है यह तो शायद वह भी नहीं जानता..
सद्गुरु कहते हैं, कोई समस्या मूलक भी बन सकता है और समाधान मूलक भी. यदि वह केंद्र से जुड़ा रहता है तो समाधान दे सकता है, जुड़े रहने के लिए एक आधार चाहिए एक सूक्ष्म तन्तु जो भक्ति ही हो सकती है. यदि कोई परिधि पर ही रह गया तो दूसरों के साथ-साथ स्वयं के लिए भी  समस्या खड़ी कर सकता है. आत्मा केंद्र है, मन परिधि है, मन स्वयं ही योजनायें बनाता है फिर उन्हें तोड़ता है. वह कल्पनाओं का जाल अपने इर्द-गिर्द बुन लेता है. उन्हें सच्चाई की ठोस जमीन चाहिए न कि कल्पना का हवा महल.. वे सत्य के पारखी बनें !


आज ध्यान से पूर्व उसने प्रार्थना की कि सुदर्शन क्रिया के लाभ पर कुछ ज्ञान मिले. भीतर एक विचार कौंध गया ध्यान के दौरान, ‘क्रिया असम्भव को सम्भव बना देती है’. इस एक वाक्य में ही सारी बात छुपी है. हो सकता है सद्गुरु और भी कुछ कहना चाहते हों पर उसका मन ध्यान में भी चुप होकर कहाँ बैठता है. खैर..असम्भव काम तो मन को शांत करना ही है उनके लिए और क्रिया इसे भी सम्भव कर देती है. क्रिया भीतर का सुख देती है, भीतर का द्वार खटखटाना सिखाती है. भीतर अमृत से भरा घट है, जिस पर मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार के चार पर्दे पड़े हैं, क्रिया उन्हें हटाती है. न जाने कितने जन्मों की कितनी गांठें भीतर बाँध रखी हैं कितने दुःख, कितने भय तथा दर्द भीतर दबे पड़े हैं. क्रिया उन्हें निकाल कर अंतः करण स्वच्छ करती है, जैसे कोई ब्यूटी पार्लर जाये और नया सा, सुंदर सा होकर बाहर निकले वैसे ही मन को सुंदर बनाने का काम करती है. सहज होकर, निरहंकार भाव से यदि कोई क्रिया करे तो ‘वह’ अपना काम सुगमता से कर पायेगी. ब्यूटीशियन जैसे चाहे सिर को घुमाये वे कहाँ दखल देते हैं, क्रिया भी मन की ब्यूटीशियन है. पूरा खाली होकर मन उसके हवाले हो तो चाहे जिधर से वह उसे मोड़े..फिर जब बाहर आए तो मन आत्मा के दर्पण में चमचम करता हुआ दीखेगा, वे शायद स्वयं ही उसे न पहचान सकें !


सद्गुरु कहते हैं अपना प्रेम चढ़ाओ तो कृपा रूप में वही वापस मिलेगा, उसके अंतर्मन का सारा प्रेम उन्हीं चरणों में समर्पित है. प्रसाद भी वही होता है जो प्रभु के चरणों में अर्पित करके वापस मिलता है. जो वे देते हैं उससे कई गुना लौटकर ‘वे’ उन्हें देते हैं. उनकी कृपा का बखान करना सूर्य को दीप दिखने जैसा ही है, फिर भी हृदय चाहता है कि वाणी उसका बखान करे, आँखें चाहती हैं कि आंसू उनका बखान करें और मन चाहता है कि भाव उसका अनुभव कर उसकी सुगंध दूर-दूर तक फैलाए ! कल शाम उसे ऐसा अनुभव हुआ कि अध्यात्म में रूचि होना ही एक कृपा है जो किसी-किसी पर बरसती है. वे शब्दों द्वारा किसी को आत्मा का कितना ही बखान क्यों न करें, वह न तो उसकी मिठास का अनुभव कर पायेगा न ही उसके रस का, वैसे ही जिसे कोई अनुभव नहीं है वह पढ़कर ‘रस’ का अनुभव कैसे कर पायेगा. परमात्मा स्वयं रसपूर्ण है पर उसका स्वाद तो उसकी अनुभूति होने पर ही मिल सकता है. उसने अब निर्णय लिया है कि जब तक कोई स्वयं न पूछे अनुभूतियों का जिक्र नहीं करना है, न ही उन्हें ईश्वर का बखान करना है जो यह भी नहीं जानते कि वे कौन हैं ? वे कहाँ उस ज्ञान की कद्र कर पाएंगे जो परम है, सत्य है. उनकी कोई गलती नहीं है, अभी उन्हें और चलना है, एक न एक दिन तो वे भी इस पथ के राही बनेंगे. उसे अपने भीतर उस अनंत प्रेम को छिपाए-छिपाए रखना है, प्रभु के सिवाय कोई उसे नहीं चाहता ! 

Friday, June 19, 2015

अनुभव की गूंज


परसों रात को लगभग साढ़े दस बजे होंगे जब सद्गुरु के दर्शन निकट से प्राप्त हुए, ‘अब खुश हो’ ये तीन शब्द उन्होंने उससे कहे, जब उसने एक हाथ से उनका पांव छूने का प्रयत्न करते हुए उनकी आँखों में झाँका. कैसी भ्रमित कर देती है उनकी उपस्थिति, वह कुछ भी न बोल पायी, मात्र सिर हिला कर मुस्करा दी, पर उनकी दृष्टि भीतर तक छू चुकी थी, उसने अपना काम कर दिया था. बाहर निकलते-निकलते तो मन भावों से इतना भर चुका था कि एक अनजान महिला ने, जो सत्संग में उसे देख चुकीं थी, कहा, जय गुरुदेव तो वह उनके गले लगकर रोने लगी. आसपास के लोगों को अजीब लगा होगा स्वयं वह महिला भी पूछने लगी कि आपने ऐसा क्यों किया, पर इन बातों का कोई उत्तर नहीं होता, बस मौन रह जाना पड़ता है. होटल वापस आकर चुपचाप सो गयी. ऐसी मधुर नींद आई जो सुबह साढ़े चार बजे खुली. क्रिया के दौरान अनोखा अनुभव हुआ, जैसे कोई अंतर्मन में प्रविष्ट होकर कुछ समझा रहा हो, तुम वही हो, वही तो हो, तुम्हीं वह हो की गूँज भीतर उठने लगी. वह यह मानकर गोहाटी गयी थी कि इस बार उसे सद्गुरु में ईश्वर के दर्शन होंगे. उसका विश्वास दृढ़ कराने के लिए ही ऐसे दुर्लभ अनुभव कराए. पहले से ही विश्वासी मन अब पूरी तरह ठहर गया है. उस क्षण से जिस भाव समाधि में डूबा है वह अभी तक उतरी नहीं है, रह-रह कर नेत्र भर आते हैं. ट्रेन में लेटे हुए आँखें बंद करने पर न जाने क्या-क्या दिखाई दे रहा था. जंगल, नदी, कभी तालाब, वृक्ष और आज सुबह क्रिया के बाद अनोखा दर्शन हुआ. गुरू की कृपा उसके साथ है !

मन यदि एक बार उच्चावस्था में चला जाये तो उसे और कुछ भाता भी नहीं, कोई अमृत पाकर विष क्यों चाहेगा, कृपा से उसने उस अवस्था का अनुभव किया है अब वहीं लौटने के लिए ही सारी साधना है. पहले आलम यह था कि ध्यान में मन टिकता नहीं था और अब आलम यह है कि ध्यान से मन हटता नहीं है. परमात्मा को पाना कितना सरल है, जगत को पाना उतना ही कठिन, जगत को आज पाया कल खोना ही पड़ेगा, परमात्मा शाश्वत है एक बार मिल जाये तो कभी छोड़ता नहीं. जगत यदि थोड़ा सा मिले तो और पाने की इच्छा जगती है, परमात्मा एक बार मिल जाये तो और कोई चाह शेष नहीं रहती. जगत मिलता है तो दुःख भी दे सकता है, परमात्मा सारे दुखों का नाश कर देता है. और ऐसे परमात्मा का ज्ञान सद्गुरु देता है. सद्गुरु से सच्ची प्रीति किसी के हृदय में जग जाये तो उसका जीवन सफल हो जाता है. गुरु भौतिक रूप से कहीं भी हों, वह शिष्य को तत्क्ष्ण उबार लेते हैं. परसों रात को सोने से पूर्व उसके मन में जो पीड़ा थी, उसे उनके स्मरण ने कैसे हर लिया था. ‘अब खुश हो’ यह वाक्य उसके लिए एक मन्त्र ही बन गया है. गुरुमुख से निकला हर शब्द एक सूत्र ही होता है. कल रात को मृत्यु का ख्याल करके जब वह थोड़ी देर को शंकित हो गयी थी तो प्रार्थना करते-करते सोई. स्वप्न में अनोखा अनुभव हुआ जैसे वह बड़े वेग से शरीर छोड़कर ऊपर की ओर जा रही है, थोड़ा सा भय था, फिर नीचे आना शुरू हुआ और पुनः शरीर में वापस आ गयी. मृत्यु का अनुभव भी कुछ ऐसा ही होता होगा. एक दूसरे स्वप्न में बाथरूम के पॉट से विशाल जानवर निकलते देखे. ईशवर की महिमा विचित्र है. यह सृष्टि अनोखी है और इसका रचियता इससे भी अनोखा है, वह जादूगर है और यह उसकी लीला है. कोई यदि लीला समझकर जगत में रहे तो जगत बंधन में नहीं डाल सकता.         

Friday, April 10, 2015

महाप्रभु का जीवन


गुरू रूपी कीली से कोई जुड़ा रहे तो चक्की में पिसने से बच जायेगा. गुरू की कृपा रूपी छाता लेकर वह वर्षा का भी आनंद ले सकता है. गुरु की कृपा ही तो है जो उसे ध्यान में तारे और चाँद दिखे, कितना अद्भुत दृश्य था, पूर्णिमा का चाँद बादलों से झांक रहा था. मन एक अद्भुत शांति से भर गया है. आत्मभाव में स्थित रहते हुए कितना सुख है, देह व मन, बुद्धि से स्वयं को संयुक्त करके वे व्यर्थ ही अपने को सुखी या दुखी मानते हैं, जबकि संसार की किसी भी वस्तु में ऐसी सामर्थ्य नहीं जो आत्मा को अल्प कष्ट पहुँचा सके. समस्याएँ आती भी रहें पर हृदय में उसकी स्मृति है तो वह दुःख दुःख नहीं लगता. नन्हे का स्वास्थ्य ठीक नहीं है, जून उसे लेकर होमियोपैथिक डाक्टर के पास जाने वाले हैं. बीमारी पहले नहीं थी बाद में भी नहीं रहेगी सो उसके लिए परेशान होने की क्या जरूरत है, नन्हे को यही समझाना है !

जीवन में ताजगी चाहिए तो जो कुछ उसे मिला है उसे बाँटना चाहिए. तितलियाँ, फूल, खुशबू और प्रेम को तिजोरी में नहीं रख सकते. बहता हुआ पानी ही स्वच्छ रहता है. हवा एक तरफ से प्रवेश करे और दूसरी ओर से निकलने की भी व्यवस्था हो तो सब कुछ ताजा रहेगा. देह तो किसी के वश में है नहीं, यह अस्वस्थ भी होगी और इसका नाश भी होने वाला है, तो कब तक इसके पीछे दौड़ते रहेंगे जबकि सदा रहने वाला अविनाशी मुक्त आत्मा उसके साथ है बल्कि वह स्वयं ही है. कल शाम उसने भागवद् का प्रथम अध्याय पढ़ना आरम्भ किया है जो पहले नहीं पढ़ पायी थी. महाप्रभु चैतन्य के जीवन चरित पर आधारित रचनाएँ भी पढ़ीं. वे तो साक्षात् कृष्ण थे पर उनमें से हरेक को कृष्ण को स्वयं पाना है, उसकी ओर हर कदम स्वयं बढ़ाना है. कोई सद्गुरु, कोई महात्मा  और ईश्वर स्वयं भी उनकी उतनी ही मदद कर सकते हैं जो पहला कदम बढ़ाने की प्रेरणा दे, उसके आगे तो उन्हें स्वयं ही चलना होगा.

aol का हर बृहस्पतिवार को होने वाला साप्ताहिक सत्संग आज उनके यहाँ है. उसके मन में कुछ बातें हैं जो वह सभी से कहने चाहती थी, उसने सोचा लिख कर रखेगी ताकि कोई बात छूट न जाये...उसे सद्गुरु की उपस्थिति का आभास हो रहा था, सभी के रूप में मानो परमात्मा भी वहीं थे. उसने लिखा..वह जो कुछ कहना चाहती है उसका एकमात्र कारण प्रेम है, सद्गुरु और ईश्वर के प्रति प्रेम..उन सभी का आपस में प्रेम. पहली बात- ॐ के गायन से पूर्व सभी दो बार गहरी श्वास लें, तीन बार ॐ कहने के बाद दो सामान्य श्वास लेने के बाद भजन शुरू करेंगे. हर भजन के मध्य दो मध्यम श्वास लेकर नया भजन होगा. अंतिम भजन के बाद सभी अपने स्थान पर रहेंगे और प्रसाद वितरण के लिए एक या दो व्यक्तियों से अधिक की आवश्यकता नहीं होनी चाहिए. बेसिक कोर्स शुरू हुए एक वर्ष हो चुका है, इस कोर्स से जीवन की एकरसता टूटी थी जीवन में नये उत्साह को अनुभव किया था अब इस सत्संग को भी एकरस न बना लें, यह प्राणों को उत्साह से भरता है. सप्ताह दर सप्ताह मन को निर्मल करता चला जा रहा है, इसका पूरा लाभ तभी मिलेगा जब पूरी तरह मन को इसके साथ जोड़ें. भजन गाते समय मन ईश्वर के प्रति गुरू के प्रति कृतज्ञता के भावों से भरे रहे. सर्वप्रथम अपने-अपने स्थान पर उनका मानसिक पूजन करें और हर भजन के बाद भी नमन करें.

पिछल दो दिन नहीं लिख सकी. शरीर अस्वस्थ हो तो मन भी कैसा हो जाता है. ऐसा नहीं है कि शेष सभी कार्य भी छूट गये हों बस यही एक छूटा अर्थात मन का काम. लिखना तो तभी सम्भव है जब मन किसी एक विचार पर टिके. आज अपेक्षाकृत शरीर ठीक लग रहा है. शाम को एक सखी के यहाँ जाना है, उसे डिबेट में थोड़ी मदद चाहिए. आज सुबह वे समय से उठे. जून आजकल पूरे फॉर्म में हैं. उन्हें अपने काम में इस तरह जुटे देखकर अच्छा लगता है, उतनी ही तन्मयता से योग भी करते हैं. कोर्स किये उन्हें पूरा एक वर्ष हो गया है और कोई भी उनके जीवन में ए परिवर्तन को देख सकता है, जीवन को एक उद्देश्य मिल गया है. मन को एक आधार, तन को साधन और आत्मा को उसकी पहचान. वे पहले से कहीं ज्यादा खुश रहते हैं, ज्यादा स्पष्ट सोच सकते हैं. वस्तुओं को उनके वास्तविक रूप में देखने लगे हैं. दूसरों के प्रति उनका व्यवहार अधिक स्नेहपूर्ण हो गया है. क्रोध उनके लिए अजनबी हो गया है. सद्गुरु का ज्ञान भीतर टिक रहा है. यह उनकी कृपा है. उनके प्रति कृतज्ञता जाहिर करने का सबसे अच्छा उपाय यही है है कि उनके विचारों पर मनन करें जीवन में उतारें. धर्म जो पहले मात्र थ्योरी था अब प्रेक्टिकल हो गया है. उसने प्रार्थना की, जीवन सत्कर्मों से परिपूर्ण रहे और प्रेम का अविरल स्रोत जिसका पता सद्गुरु ने बताया है कभी सूखने न पाए !


Wednesday, December 17, 2014

विवेकानन्द के पत्र


सद्गुरु का मिलना दुर्लभ है, मिल भी जाये तो उसके प्रति पूर्ण समर्पण होना भी कठिन है. मन में अनेकों संकल्प-विकल्प उठते हैं जो श्रद्धा को हिला देते हैं पर उसके मन में गुरुओं के परम गुरू उस परम पिता के प्रति प्रेम की ऐसी लहर उठी है जो हर वक्त उसे लपेटे रहती है. उस प्रेम का उदय तो पहले ही हुआ होगा पर उससे परिचय सद्गुरु की कृपा से ही सम्भव हुआ है. ऐसी कृपा करने वाले के प्रति भी मन श्रद्धा से भर जाता है. उसे ऐसा प्रतीत होता है कि उसके जीवन का लक्ष्य निर्धारित हो रहा है. भगवद् प्रेम और संगीत अब ये दो क्षेत्र ही उसे आकर्षित करते हैं. ईश्वर के लिए गाना और उससे प्रेम करना ये दो कार्य जग में करने योग्य हैं. कल शाम वे टहलने गये तो बात इसी विषय पर हो रही थी अब जून और उसके बीच बातचीत का ज्यादातर भाग art of living ही रहता है. कल रात सोने से पूर्व स्वामी विवेकानन्द का एक पत्र पढ़ा जिसमें उन्होंने ईश्वर के प्रति अखंड विश्वास का वर्णन किया है. ‘यदि कोई अपना सारा भार कृष्ण पर छोड़ दे तो वह उसे भार मुक्त कर देंगे. ईश्वरीय प्रेम महान है इसकी अनुभूति चेतना के उच्च स्तरों पर ले जाती है. स्थूल देह अन्नमय कोष है, प्राणमय कोष में जीने वाले को प्राणायाम व भजन कीर्तन बताया जाता है. मनोमय कोष के भीतर विज्ञानमय कोष है और उसके भीतर आनंद मय, जो थोड़ी ही ख़ुशी मिलने पर शांत हो जाता है. भिन्न-भिन्न कोशों में स्थित व्यक्तियों को भिन्न-भिन्न साधन की पद्धति सिखायी जाती है, जिससे ईश्वरीय अंश जागृत होता है. मौन, ध्यान, उपवास यह तपस्या है, परमात्मा को पाने के लिए यह तपस्या अपने जीवन में लानी है और ये सहज रूप से जीवन का अंग बनने चाहिए ! और यदि प्रेम सच्चा हो तो ये सब सहज प्राप्य हैं !’ वह आनन्दमय कोष में स्थित है !

निःशब्द ईश्वर तक पहुंचने के लिए शब्दों की नाव बनानी पडती है पर अंततः शब्द भी छूट जाते हैं क्योंकि वह शब्दातीत है. ईश्वर का स्मरण करने से जो सुख मिलता है वह अन्य किसी वस्तु, कार्य या परिस्थिति से नहीं मिलता, अच्छा हो या बुरा दोनों की आसक्ति छोड़नी होगी जो, जब, जैसा मिले, जब हो उसे पूरे मन से स्वीकारना होगा वृत्ति में यदि ईश्वरीय प्रेम हो तो वही प्रगट होगा, जो हम मांगेंगे वही तो मिलेगा. मेरा हो तो जल जाये और तेरा हो तो मिल जाये यह भाव सदा बना रहे तो ईश्वर मन का स्वामी बन जाता है. कामनाएं अपने आप मिटती जाती हैं, उसी का अधिकार हमारे हृदय पर हो जाये तो सम अवस्था में रहना आ जाता है, पर आज सुबह जब उनकी नींद देर से खुली तो मन ने स्वयं को धिक्कारना शुरू कर दिया, वह भी ठीक नहीं था. उन्ही नकारात्मक भावनाओं का परिणाम है कि उसके पैरों में हल्का खिंचाव है वरना इतने दिनों से किसी भी तरह का कोई दर्द महसूस नहीं किया. आज सुबह फिर गुरू का स्मरण हो आया, उनकी प्रभुता व महानता पर जितनी श्रद्धा की जाये कम है, जनहित के लिए अपने को मिटा देना, पर उस मिटा देने में ही वे सब कुछ पा जो लेते हैं. जब कोई किसी के लिए निस्वार्थ भाव से कुछ करता है तो ईश्वर जीवन में सुख का सागर बनकर आता है. ईश्वरीय कृपा का साक्षात् अनुभव उसने किया है पर इस मन को नियन्त्रण में रखना तब कठिन हो जाता है जब प्रभु का स्मरण नहीं रहता. मन में यदि उसी की लौ लगी रहे तो कोई उलझन नहीं रहती. उसकी प्रार्थना बस इतनी सी तो है और वर्षों से है, हे ईश्वर ! तू साथ साथ रह या कि वह उसे कभी न भूले क्यों कि उसके मिलने से बाकी सब अपने आप ही मिल जाता है. उसका एक पेन नहीं मिल रहा है पर वे उसे भी ढूँढने में उसकी मदद करेंगे. आज बाबाजी भाव समाधि में चले गये थे.   


Monday, December 8, 2014

गुरू कृपा का अनुभव


शरण में आये हैं हम तुम्हारी, दया करो, हे दयालु भगवन !”
..और उस ज्योति स्वरूप ईश्वर को उसने देखा है, अनुभव किया है, वह उसके साथ था और उस वक्त उसे अनुपम आनंद का अनुभव हुआ, ऐसा अकल्पनीय सुख जो किसी भी अन्य स्थिति में नहीं मिल सकता. वह उससे बातें कर रही थी और वह उसे आश्वासन दे रहा था. यह सम्भव हुआ श्री श्री रविशंकर जी  द्वारा भेजे शिक्षक द्वारा सिखाई गई सुदर्शन क्रिया से. अब यह कुंजी उसके हाथ लगी है. यह अनुपम खजाना उनके ही भीतर है उसे पाने की कुंजी. ईश्वर का भजन अब कानों को अमृत के समान लगता है. बाबाजी के आँखों के आंसुओं का अर्थ और गुरू माँ के चेहरे की अनुपम मुस्कान का रहस्य भी अब खुल रहा है. अपने गुरू की याद आते ही जो उनकी आँखें रुआंसी हो जाती हैं. गुरू की महिमा का गान क्यों गाया गया है, क्यों निगुरे को चैन नहीं, यह सब कितना स्पष्ट है. उसके साथ कुछ बहुत-बहुत अद्भुत घटा है, इसके लिए वह परमात्मा की कृतज्ञ है और उन सभी की कृतज्ञ है जिनके कारण उसे यह अनुभव मिला है, ऐसा अनुभव जिसने भीतर तक आनंद की एक धारा बहा दी है. उसकी पुकार सुन ली गयी है. कल शाम को उन्होंने पुनः सुदर्शन क्रिया की, उसके पहले प्राणायाम भी किया. शिक्षक से उसकी बात भी हुई, उसके प्रश्न का उत्तर उन्होंने बाद के लिये छोड़ दिया, लेकिन उसे मालूम है कि वह जानते हैं उसने क्या पाया है ! और जो उसने पाया है वह उन्होंने भी पाया है तभी वह सेवा के इस महान कार्य से जुड़े हैं. उसे जिस मंजिल की तलाश थी वह मिल गयी है, अब कुछ पाना शेष नहीं है, कुछ भी नहीं, अब तो सिर्फ लुटाना है !

जीवन के धागों को सुलझाते हुए चलना चाहिए, अपनी मनुष्यता को सदा जागृत रखना चाहिए. मनुष्य के भीतर सम्भावनाएं असीम हैं, स्वयं को हर पल सम्भालते हुए अन्यों को भी प्रेरणा देनी चाहिए. गुरू कृपा से वेद-पुराणों का ज्ञान स्वयंमेव मिलने लगता है. वाणी पर संयम रखना बहुत जरूरी है, शब्द ब्रह्म है. व्यर्थ चिन्तन, व्यर्थ चर्चा, व्यर्थ कर्म नहीं करना चाहिए. प्रतिपल व्यवहार ही दिखाता है कि वे संसार से ऊपर उठे हैं या नहीं. जीवन में बुद्धि का महत्व उतना है जितना विमान में चालक का होता है यदि बुद्धि ईश्वर का चिन्तन करे तो परिनिष्ठित होती है. अध्यात्मिक विषयों का ध्यान करें तो बुद्धि शुद्ध होती है. जब इन्द्रियों का उपयोग ईश्वर की संतुष्टि के लिए हो तो कर्म बंधन का कारण नहीं होते, तब ईश्वर कुशल-क्षेम का भार अपने ऊपर ले लेता है और मानव को मुक्त कर देता है, मुक्त होना कितना भला है. कोई चिंता नहीं, कोई फ़िक्र नहीं. वह है न उसका प्रिय जो उन्हें बेहद-बेहद चाहता है. अचानक ही उसे शास्त्रों के अर्थ समझ में आने लगे हैं, अनायास ही उसकी वाणी में मधुरता आ गयी है, अपनी आवाज स्वयं को भली लगती है क्योंकि वह आवाज उसे भी सुनाई पड़ रही हैं, जो बातें पहले गूढ़ लगती थीं उनका रहस्य खुलता जा रहा है. बाबाजी की कई बातों का अर्थ सब स्पष्ट होता जा रहा है. अभी उसके रास्ते में सबसे बड़ी रुकावट है उसका अहम् और इसे छोड़ना होगा.

साधक का एकमात्र लक्ष्य उस परमब्रह्म को प्रसन्न करना है, आसक्ति व विरक्ति दोनों से विमुक्त वह जीवन को सहज रूप में जीता है,. वह यह जानता है कि परम पिता हर क्षण उसके साथ है उसका अभिन्न अंग है, अतः पग-पग पर वह सचेत रहता है ताकि उसके मधुर प्रेम को प्राप्त करता रहे. संसार उसे लोभी, कपटी व अहंकारी बनाता है और ईश्वर उसे उदार बनाता है !