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Wednesday, July 16, 2014

नुक्ते का फेर


नुक्ते की फेर में जुदा हुआ, नुक्ता ऊपर रखा तो खुदा हुआ” उसने जब यह सुना तो जोर से हँसे बिना न रह सकी, उर्दू भाषा भी कमाल की है, एक नुक्ते से कितना फर्क पड़ जाता है. वह भी अपने मन रूपी नुक्ते को सही जगह नहीं लगाती और ईश्वर से विमुख हो जाती है. ‘जागरण’ में आज फिर सुना, सुख-दुःख आदि अवस्थाओं से परे जो ‘आत्मा’ रूपी चैतन्य सभी में है, यदि उसका भान नहीं हुआ तो मस्तिष्क को ज्ञान की हजारों बातों से भर लेने से भी कोई लाभ नहीं, विवेकानन्द ने भी कहा है, कि मात्र धार्मिक पुस्तकें पढने और प्रवचन सुनने भर से वह बौद्धिक विकास बन कर रह जाता है, यदि वास्तव में उसे अनुभव की वस्तु न बनाया तो धर्म भी नशे की तरह है. किन्तु उसे अपने भीतर आये बदलाव की भनक है, धीरे-धीरे ही सही किन्तु यात्रा जारी है. अब इस संसार को स्वप्न की भांति देखने की समझ आई है. दूसरों की दृष्टिकोण को समझने की समझ, हरेक में उसी अन्तर्यामी के प्रकाश को देखने की समझ, अपनी गलतियों का अहसास फौरन हो जाता है. और उसे स्वीकारने की हिम्मत भी वः अपने भीतर पा रही है. इससे मानसिक ऊर्जा का व्यय नहीं होता सो मन हमेशा शांत रहता है, कमल के फूल पर पड़ी ओस की बूंदों की भांति. जून भी आजकल खुश हैं, नन्हा भी एकाग्रता से पढ़ाई में व्यस्त है. वह अभी से धीर-गम्भीर है, उसने प्रार्थना की, ईश्वर उसे सन्मार्ग पर ले जाये. इसी महीने उन्हें घर जाना है, जून ने सुबह कहा, उपहार खरीदने भी शुरू करने चाहिए. उसे याद आया, दो सखियों के माता-पिता आए हुए हैं, उन सभी को भोजन पर बुलाना है. वर्षा फिर हो रही है.

“जो टिकता नहीं वह अवस्था है जो मिटता नहीं वह परम सत्य है”. बस इतनी सी बात समझ में आ जाये तो जीवन सहज हो जायेगा. आज ‘जागरण’ पर प्रवचन दिल को छूने वाला था, कितनी सरलता से सन्त कितनी गूढ़ बातें कह जाते हैं, लोगों की भाषा बोलते हैं, उनके हित के लिए उनकी अपनी ही शब्दावली से शब्द लेते हैं, उसे उनमें श्रद्धा होती है, पर कुछ बातों के प्रति अविश्वास भी होता है, शायद उसकी रूचि नहीं उन बातों में सो उनके प्रति उदासीनता बनी रहती है. आज ध्यान में बैठी ही थी कि फोन की घंटी बजी सो पूरा नहीं सका. इस वक्त साढ़े नौ हुए हैं, सुबह से अब तक का वक्त ईश्वर के प्रति कृतज्ञता के भाव के कारण अच्छा रहा है, किन्तु यह भी एक अवस्था है. सुखद स्थिति में प्रीति होने से वह सुखकर लगती है, दुखद स्थिति में प्रीति न होने से वह दुखकर लगती है, उसे इन दोनों से ही परे जाना है. यह जग कई पाठ पढ़ाता है, ठोंक पीटकर इस काबिल बनता है कि सत्य को समझने लायक हो सकें. जग में विभिन्न लोगों से व्यवहार करते समय, तरह-तरह की परिस्थितियों में मन का संतुलन बनाये रखते समय, अनुकूल हो या प्रतिकूल दोनों वक्तों में, ईश्वर का स्मरण करते समय वह कितना कुछ सीखती है अथवा तो उस सीख का उपयोग करती है जो सदा से उसके अंतर्मन में सुप्तावस्था में थी. मानव मन असीम सम्भावनाओं का भंडार है, इसमें कई खजाने छुपे पड़े हैं आवश्यकता है तो मंथन की, अमृत भी यहीं है और विष भी यही हैं !

कल पिता का पत्र मिला, पढकर अच्छा लगा, उन्हें उसका घर-परिवार, समाज तथा राष्ट्र के बारे में सोचना, लिखना अच्छा लगा. यदि मन जागरूक हो कोई हर पल सचेत हो तभी ऐसा हो सकता है, बहुत पहले पिता ने एक बार कहा था जब वह घर पर थी, “अपने मन पर नजर रखो, कहीं वही तम्हारे खिलाफ न हो जाये” और अब टीवी पर जागरण शुरू हो गया है. मन के स्वभाव को बदलना होगा जो सदा बाहर की ओर जाता है, ऊर्जा नष्ट होती है. अपने दोष दबाने के लिए दूसरों के दोष देखता है. यदि दूसरों के गुण देखने की आदत आ जाये तो साधक जल्दी सफल हो जाता है. किन्तु अपने दोष देखकर दुःख या पीड़ा न हो बल्कि यह बाहर से आया हुआ है इसे निकालना है, ऐसा संकल्प जगे. तभी कोई निर्दोष जीवन जी सकेगा और ऐसा निर्दोष जीवन ही ईश्वर के प्रेम का अधिकारी है. वक्ता अपने दोषों को दूर करने की बात कहते-कहते भावुक हो गये और श्रोताओं पर भी असर हुआ, कइयों की आँखें भीग गयीं और कई तो रोने भी लगे, लेकिन उसका मन शांत है, ईश्वर कभी नहीं चाहता कि वे दुखी हों अशांत हों या निराश हों ! वह जानती है हृदय में संकल्प के साथ प्रार्थना भी हो तो लक्ष्य मिल सकता है, प्रयत्न केवल अपने बलबूते पर किया तो अहंकार या विषाद दोनों में से एक होगा, और यदि प्रयत्न नहीं केवल प्रार्थना ही की तो निष्क्रियता घेर लेगी.   




Tuesday, November 19, 2013

लौह पुरुष- सरदार वल्लभ भाई पटेल


आज बहुत दिनों बाद सुबह लॉन में धूप में बैठकर लिख रही है, हल्की हवा भी बह रही है जो प्रातः उठने पर बर्फीली थी पर अब सूर्य के उगने से उसका दंश कम हो गया है. बहुत दिनों से बड़ी बहन का खत नहीं आया, एक बार उन्हें लिखा था, अब पहले की सी कंपाने वाली ठंड नहीं पडती पर इस बार पूरे देश में बल्कि सम्पूर्ण विश्व में ठंड बहुत है. उधर ऑस्ट्रेलिया में तापमान ५० डिग्री तक पहुंच गया है. पहले दूध वाला आया फिर स्वीपर, सो वह घर के अंदर चली गयी. कुछ देर पूर्व एक धारावाहिक का अंश देखा, उसकी नायिका एक लेखिका है, भावुक और सच्चे प्रेम की आकांक्षी, अंत अच्छा था. जैसे उसकी और जून की नाराजगी का अंत कल अच्छा हुआ, कल उन्होंने परेड देखी, नन्हे ने बाहर झंडा भी फहराया और आटे का एक तिरंगा भी बनाया है. दोपहर को ‘सरदार’ फिल्म देखी, लौह पुरुष सरदार वल्लभ भाई पटेल का जीवन कितना महान था. उन्होंने देश की आजादी के बाद सारे राज-रजवाड़ों को एक करने में, एक राष्ट की स्थापना में अमूल्य सहयोग दिया. परेश रावल ने पटेल की भूमिका अच्छी बनाई. ‘दो आँखें बारह हाथ’ भी कुछ देर देखी, अच्छी कहना उपयुक्त नहीं होगा, ऐसी फ़िल्में अब कभी नहीं बनेगीं. शाम को पड़ोसिन के यहाँ से मिली ब्रोकोली बनाई सबको बहुत पसंद आई.

पिछले दो दिन फिर यूँ ही निकल गये, नन्हे के स्कूल न जाने से कल सुबह उसी के साथ व्यस्त रही. परसों भी उसकी बस एक घंटा लेट आई थी, सेन्ट्रल स्कूल के बस ड्राइवरों की हड़ताल आज भी जारी रही और शायद कुछ दिन और चलेगी. नन्हा आज पड़ोसी की गाड़ी में गया और वापस अपने मित्र के साथ आया. सुबह एक सखी का सुंदर बगीचा देख कर आयी थी सो आज शाम अभी कुछ देर पहले उसने भी बगीचे में काम किया. उसने बहुत स्वादिष्ट गाजर का हलवा खिलाया, जून को बताया तो उनके मुंह में पानी भर आया. परसों दोपहर वह ‘ऊर्जा संरक्षण’ पर कविता या कहें तुकबन्दी करने की कोशिश करती रही, तीन ‘नारे’ भी लिखे हैं, जो आज जून ने भिजवा दिए हैं, देखें इस मशक्कत का क्या परिणाम निकलता है.

कभी ओस से भीगी घास पर पाँव पड़े
जो ठंडक दिल में समा गयी
वही मेरे और तुम्हारे मन के बीच पुल बन गयी है
कभी फूलों के झुरमुट में सिकुड़ा तन
उनकी रंगत और खुशबु समेटे नयन
तुम्हारे स्वप्न उकेरने लगे...  
ग्यारह बजने वाले हैं और अभी खाने में फिनिशिंग ट्चेज शेष हैं, पर सुबह से इधर-उधर के कामों को निपटते हुए अब थोड़ी थकन सी महसूस होने लगी है. नन्हा और पड़ोस का उसका मित्र आज साइकिल से स्कूल गये हैं, बसों की हड़ताल लम्बी खिंचती चली जा रही है. थक तो काफी गये होंगे, चार-पांच किमी दूर है उनका स्कूल, सवा नौ बजे निकले थे आधे घंटे में पहुंच गये होंगे. सुबह एक अजीब सा स्वप्न देखा, अब कुछ भी याद नहीं है पर वह फीलिंग याद है जिसने उसे उठा दिया, फिर ‘जागरण’ सुना, बाद में ध्यान करते समय मन केन्द्रित नहीं कर पाई, वे आवाजें भी तब और स्पष्ट सुनाई देने लगती हैं वैसे जिनकी तरफ ध्यान भी नहीं जाता.

कल दोपहर वह बैकडोर पड़ोसिन के साथ बैडमिंटन खेलने क्लब गयी, अच्छा लगा पर जून के साथ जाना और खेलना उसे ज्यादा पसंद है, उसने सोचा, देखे, यह दोपहर का रूटीन कितने दिन चलता है, वैसे उसकी पड़ोसिन अच्छा खेलती है और वह उससे कुछ सीख सकती है. फिर cycling का अपना आनन्द है, कुछ दिन यही सही. आज सुबह गोयनका जी ने बताया, धर्म जब तक धारण न किया जाये उस पर चर्चा करना व्यर्थ है. कल उसकी एक सखी आई थी जो अपनी चचेरी, ममेरी बहनों की खूब बातें बताती है, इधर उसकी कजिन्स तो कभी भूलकर भी याद नहीं करतीं या कहें वह ही नहीं करती. कल दोनों बहनों को पत्र लिखे जून ने भी, वे यकीनन खुश होंगीं.