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Sunday, September 1, 2013

कालिदास का मेघदूत


आज बहुत दिनों के बाद ऐसा हुआ कि वह दोपहर को घर पर अकेले है, पुरानी दिनचर्या के अनुसार पहले अख़बार पढ़ती रही, यूँ काफी देर तक पढ़ा पर अब दोहराने बैठे तो कुछ विशेष याद नहीं, फिर भी अख़बार पढ़ना अच्छा लगता है. कुछ देर लाइब्रेरी से लाई वह पुस्तक modern Asian literature भी पढ़ी. दोपहर को टीवी देखने का अभ्यास पिछले कई हफ्तों से छूट गया है सो यही उचित लगा कि मन को साधा जाये यानि विचारों को लिखकर पहले एक बिंदु पर केन्द्रित किया जाये फिर गोयनका जी की सिखाई विपश्यना की क्रिया द्वारा कुछ देर साधना की जाये. सुबह दादा वासवानी ने भी मौन और प्रार्थना की शक्ति पर बल दिया. बाद में स्टोर की सफाई में लग गयी सो धयान नहीं कर सकी, रोज प्रयत्न ही करती है, ध्यान में सचमुच बैठने का अवसर मात्र एक बार मिला है. मन है कि विचारों की ओर दौड़ने लगता है. आज यूँ अपेक्षाकृत मन शांत है. लेकिन अभी कुछ देर में नन्हा आने वाला है, वह सुबह साढ़े चार बजे उठकर भी रात तक तरोताजा रहता है, बच्चों में या कहें मानव में शक्ति अपार है बस उसका सही इस्तेमाल करना आना चाहिए. उसके मन के खजाने में न जाने कितनी कविताएँ सोयी पड़ी होंगी, कितने अछूते भाव और ढेर सारा काम करने की कुव्वत, बस कमर कस के निकल पड़ने की देर है. फ़िलहाल तो किचन की ओर कदम बढ़ाने हैं, उसके बाद कहीं और !

वही दोपहर का वक्त और आकाश काले बादलों से घिरा हुआ. खिड़की से ठंडी हवा का झोंका आकर पीठ को छू जाता है सिर्फ दूर से किसी वाहन की ध्वनी आकर निस्तब्धता भंग कर देती है. काफी देर से reader’s digest पढ़ रही थी इस पत्रिका में पढ़ने के लिए बहुत कुछ है. आज सुबह उठने से पूर्व एक स्वप्न देख रही थी, वर्षों बाद एक पुराना स्वप्न, शायद वे स्मृतियाँ उसका पीछा कभी नहीं छोड़ेंगी, जैसे आज सुबह ध्यान में बैठने पर पांच मिनट में ही नन्हे ने माँ, माँ की गुहार लगा दी और उसके बाद इस वायु की गति से भी तेज भागते मन को पकड़ कर रखना सम्भव नहीं हो पाया. लेकिन उसे प्रयास तो करते ही रहना है, एक दिन अवश्य ऐसा आयेगा जब आचार्य के उपदेशानुसार वह अपने मन के विकारों को दूर करके उसे सम्पादित कर उस परम सत्य के दर्शन कर सकेगी अध्यात्म मार्ग पर चलने वालों को बहुत कठिन तपस्या करनी पडती है. अपने मार्ग में आये हुए सभी कार्यों को साधित करके उन्हें अपने कर्त्तव्य पालन का सदा स्मरण रहता है वे सत्य के मार्ग से कभी विचलित नहीं होते और सदा स्वयं भी तथा दूसरों को भी आनन्दित रखने का प्रयास करते हैं.


वर्षा की बूंदें पड़ने लगी हैं जो उसकी डायरी के इस पन्ने को भिगो रही हैं. सुबह के सवा पांच बजे यहाँ बाहर drive way पर जहाँ दोनों ओर से बेला के फूलों की सुंदर महक आ रही है और किसी पंछी की आवाज एक लय में आ रही है जिसमें अब बूंदों की टप टप भी मिल गयी है ऐसे सुहाने वक्त में तो मन शांत कोमल भावों से भरा होना चाहिए. उस एक की आराधना में लीन जो इस सुंदर दृश्य का चितेरा है और हर क्षण साथ रहकर चेताता रहता है, वह जो पल-पल मन को सजग रहने का निर्देश देता है गलती होने पर आत्मग्लानि से मन को भर देता है, और जिसकी बात वह सुनी-अनसुनी कर जाती है फिर भी वह नाराज नहीं होता. जो इस जगत में हर एक का रखवाला है. आज जुलाई का पहला दिन है, यानि आषाढ़ का महीना, सदियों पूर्व जब मेघों की सुन्दरता से प्रभावित होकर कालिदास ने मेघदूत की रचना की होगी. कल सुबह जून ने घर फोन किया तो पिता ‘कृष्ण’ देख रहे थे टीवी पर सबके साथ, वे लोग उसमें साक्षात् भगवान को देखते हैं, और वह नाटक, तभी देख नहीं पाती. 

Sunday, August 4, 2013

कितने आदमी थे ?


आज सरस्वती पूजा है, नन्हे का स्कूल बंद है, कल शाम जब वह स्कूल से लौटा तो उसका एक जूता जो पहले से क्रैक था ज्यादा फट गया था, उसने अपनी सखी से कहा है वे लोग उन्हें भी बाजार ले जायेंगे. कल शाम जून का फोन आया, वे खुश थे, अपने मित्र के यहाँ से किया था फोन , जरुर उन्हें भी उसकी आवाज ख़ुशी भरी लगी होगी, कभी-कभी उसे स्वयं पर आश्चर्य होता है कब वह धीरे से मोह से बाहर निकल कर स्वयं पर आश्रित होना सीख गयी, उसे स्वयं ही पता नहीं चला. जून का साथ अब मात्र उसके आश्रय के लिए नहीं चाहिए बल्कि इसलिए कि उसका साथ जिन्दगी को और कई अर्थ देता है, और उसे सामान्य देखकर नन्हा भी पहले की तरह पापा को याद नहीं करता है, पहले अक्सर उदास हो जाया करता था. कल उसे हिंदी प्रतियोगिताओं में मिले पुरस्कार, हाथ में मिले और हिंदी पढ़ाने के लिए मानदेय भी. जून के एक मित्र आकर दे गये.

४७वां गणतन्त्र दिवस ! सुबह टीवी पर परेड देखी, दोपहर को वे साइकिल से एक मित्र के यहाँ गये, चार बजे लौटे. उनके साथ टीवी पर शोले फिल्म देखी, उसने सोचा शायद जून ने भी देखी हो. पहले उसे लग रहा था शायद इस बार वह इस फिल्म को इतना पसंद नहीं करेगी पर नहीं, हर बार देखने पर भी उतनी ही अच्छी लगती है., फिर छब्बीस जनवरी का मूड और उसकी सखी ने खाना भी बहुत अच्छा बनाया था, टमाटर आलू की सब्जी, पूरी, मटर-पुलाव और बेक्ड मिक्स्ड वेज ! नन्हे ने भी शौक से देखी, उसे एक सीन न देख पाने का अफ़सोस था, कितने आदमी थे ? उस वक्त वे घर के रास्ते में थे.  घर आकर उसने बाकी की फिल्म देखी. और अब रात हो गयी है, कल नन्हे के दो टेस्ट हैं, जिनकी तैयारी वह कर चुका है, समाचारों में जयपुर और मणिपुर में हुए बम विस्फोटों के बारे में सुना, जैसे किसी ने फूले हुए गुब्बारे में पिन चुभा दिया हो. सुबह परेड देखते वक्त और देश भक्ति के तराने सुनते वक्त धमाकों और विस्फोटों की बात कैसे भुला दी, सच्चाई यह भी है और सच्चाई वह भी थी.

आज यहाँ धूप में बैठे हुए उसे सन्नाटे से उपजी अनोखी शांति का अनुभव हो रहा है, ‘इंडिया२४ऑवर’ में सुना था, जब मन शांत हो तो जिसका चित्रण करें या देखें उसमें सच्चाई होती है, जब वस्तुओं के देखने का अर्थ मात्र उन्हें देखना नहीं बल्कि महसूस करना हो. आजकल एक बूढ़ा व्यक्ति उनके यहाँ आकर पेड़ से आंवले ले जाता है, परसों वह बोरी भर के आंवले ले गया था और आज फिर आ गया, उसने कहा पहले थोड़ा सा काम करो बगीचे में तब आंवले ले जाओ. वह मान गया है. आज सुबह उसने ‘जागरण’ में सुना, ‘सुख लेने की वस्तु नहीं है देने की है. और दुःख भोगने की वस्तु नहीं बल्कि विवेक का उपयोग करते हुए पार निकलने की चीज है’. उसने सोचा जून इस समय बस में होंगे. घर तथा उनके बारे में सोचते हुए..




Friday, February 8, 2013

लहराती अलकें



मौसम में बदलाव आने लगा है, कितनी ठंडी हवा बह रही है, गर्मी का नामोनिशान नहीं. शायद यह सुबह हुई तेज वर्षा का ही असर है. आज दोपहर जून के साथ दो सहकर्मी भी आए थे. वह व्यस्त सुबह की बजाय इस खाली अपराह्न में डायरी लेकर बैठी है. बातें बहुत सी हैं, दिमाग में स्फुलिंगों की तरह आती हैं एक क्षण के लिए चमक दिखाकर चली जाती हैं. यह तो सच है कि आज वह अपने अच्छे मूड्स में से एक में है. ऐसे में कोई कविता भी बन सकती है या...इस हफ्ते अभी तक कोई पत्र नहीं आया. छोटी बहन का स्वास्थ्य अब ठीक होगा, पिछले पत्र में उसने लिखा था. ननद की शादी में शामिल होने उन्हें घर जाने में कुछ ही दिन ही रह गए हैं, उसे कोलकाता से एक साड़ी खरीदनी है और कुछ उपहार भी.
   सर्वोत्तम में एक पंक्ति अच्छी लगी कि लोग लेखक होने का स्वप्न तो रखते हैं पर अकेले घंटों टाइपराइटर पर बैठने की कल्पना नहीं कर पाते, लिखना एकांतिक, वैयक्तिक कर्म है जो समय मांगता है. समय की तो उसके पास कमी नहीं है, लेकिन इतनी अधिकता भी नहीं है. लिखने के लिए कुछ तो मन में होना चाहिए, कुछ कहने के लायक. वह कहाँ से आता है, वह कहीं रखा तो नहीं रहता कि उठाया और लिख दिया, वह तो अंदर से आता है अपने आप, जब कोई विषय लेखक चुनता है तो अब तक का सारा ज्ञान उस विषय के बारे में याद आने लगता है. धीरे धीरे पर्दे हटने लगते हैं और पर्त दर पर्त उधड़ती चली जाती है. जैसे सबसे सामान्य विषय है प्रेम, जितना सामान्य उतना ही असामान्य - लाखों प्रेम कहानियाँ लिखी जा चुकी हैं फिर भी हर कहानी  नई लगती है. जब किसी को बिना मांगे अपने आप ही सबका प्रेम मिलता रहता है, तो उसका महत्व पता नहीं चलता, फिर एक दिन जब कुछ अधूरेपन का अहसास होता है तब कीमत पता चलती है अनमोल प्रेम की. सर्वोत्तम के साथ एक उपहार आया है, “सर्वोत्तम मुशायरा” जिसमें कई गजलें बहुत उम्दा हैं. एक शेर उसे काफी पसंद आया जिसका भाव कुछ ऐसा था कि अब दुखी होने से क्या फायदा, राहे इश्क में ऐसा ही होता है. जगजीतसिंह, चित्र सिंह व लता के स्वरों में गायीं गजलें सुनती रही दोपहर बाद.. ऑंखें बंद करके चुपचप लेटकर..बहुत अच्छा लगा उसे.

जीवन में दुःख है, दुःख का कारण है, कारण दूर किया जा सकता है. कारण है इच्छापूर्ति में बाधा, बाधा तभी न रहेगी जब इच्छा ही न हो, इच्छाओं से परे एक मुक्त जीवन की कल्पना ही कितनी सुखद लगती है. उस दिन बुद्ध के ये वचन सुने थे तो अच्छा लगा था, अच्छी बातें किसे अच्छी नहीं लगतीं, पर उन पर अमल... करने का प्रयत्न तो किया जा सकता है न..आज उन्हें सोनू के स्कूल जाना है, छुट्टी के लिए प्रार्थनापत्र देना है और प्रोजेक्ट वर्क के बारे में बात करनी है. रवीन्द्रनाथ टैगोर का एक लेख पढ़ा, creation vs construction, शुरू में अच्छा लगा पर बाद में भाषा दुरूह होने के कारण समझ नहीं आ रहा था. कल वे एक परिचित के यहाँ बरसों बाद गए, अच्छा लगा, लोगों से मिलते-जुलते रहो तभी उनके बारे में पता चलता है.

पूरा अक्टूबर और आधे से ज्यादा नवम्बर बीत गया आज जाकर डायरी खोलने का सुअवसर आया है. इतने सारे दिनों में कई अच्छी बातें और कई बुरी बातें हुईं, लेकिन कुछ लिखे ऐसा मन नहीं हुआ. कोलकाता में ट्रैफिक जाम में जब फंसे थे तो एक कविता की कुछ पंक्तियाँ याद आयी थीं लेकिन घर लाकर इतने सारे लोगों से मिलकर..तरह-तरह की व्यवस्ताओं में याद नहीं रही. उसने फेमिना से जून के लिए कुछ बातें नोट कीं, बालों की देखभाल के लिए, कह रहे थे, उनके बाल झड़ने शुरू हो गए हैं.  
  

Sunday, September 23, 2012

क्यों चुप हैं तारे



साढ़े ग्यारह बज चुके हैं, रोज वे लोग इस समय तक दोपहर का भोजन खा चुके होते हैं, आज पिता गली में लगा चापाकल ठीक करने गए हैं, यह नल अगर खराब हो जाये तो उसे ठीक करने की जिम्मेदारी पिता और बाबूजी(मकान मालिक) की है, और अगर ठीक रहे तो इस्तेमाल सारा मोहल्ला करता है. पिता का व्यवहार कभी-कभी उसके समझ में नहीं आता, कभी इतने कठोर, कभी इतने उदार. कल जून का पत्र आया, उसे नहीं लगता कि वह भी उसके पिताजी की सेवानिवृत्ति के उत्सव पर घर जाने की बात पर राजी होंगे, उसने सोचा है वह दस दिन वहाँ रहेगी, कितने दिन हो गए हैं उन सब से मिले हुए, विशेषतया माँ-पिता से.
कल अंततः उसकी पासबुक बनवाने के लिए बैंक से देवर के एक मित्र आकर फार्म भरवा कर ले गए. वह ड्राफ्ट ऐसे ही पड़ा था, जो जून ने उसके लिए भेजा था. उसके पास पैसे खत्म हो गए थे, आखिर उसने माँ से कह ही दिया.
कल सुबह से समय ही नहीं मिला कि अपने निकट आ सके, यानि उसके पास, दिन भर कैसे बीत  गया पता ही नहीं चला. दिन में सोना हर तरह से हानिप्रद है, कल रात देर तक नींद नहीं आ रही थी, जिससे सुबह भी देर से उठी, और दिन में पढ़ नहीं पाई वह अलग. आज नन्हा उसके साथ ही सुबह पांच बजे ही उठ गया था, सो उसका स्नान, नाश्ता भी हो चुका है. वे दोनों ऊपर बैठे हैं, उसने सोचा एक घंटा यहाँ पढ़ाई करके ही नीचे जायेगी, यहाँ कितना शांत है वातावरण, नीचे तो शब्दों का शोर ही शोर हर तरफ.. जून के मित्र भी अजीब हैं, टिकट के पैसे ही नहीं ले रहे, अब आज तो वह आ नहीं रहे, कल आएंगे तो किसी भी तरह उन्हें पैसे देने हैं. एक अजीब तरह की बेचैनी छायी है मन पर कल शाम से जब से उन्होंने पैसे वापस किये. रात अजीब-अजीब स्वप्न देखती रही.

आज शायद उसकी दो भांजियों में से किसी एक का जन्मदिन है, कितनी बार सोचा कि चारों बच्चों  के जन्मदिन डायरी में नोट करने हैं पर ऐसा कभी कर नहीं पायी. कल रात एक फ्रेंच फिल्म देखने नीचे कमरे में गयी, नन्हा छत पर सो चुका था, पर निर्धारित समय पर फिल्म शुरू नहीं हुई, वह बैठे-बैठे ही सो गयी, फिर अचानक नींद खुली तो फिल्म शुरू हो चुकी थी, नींद का आवेग मन पर छाया था, सो वह समझ नहीं पायी कि पर्दे पर क्या चल रहा है, सो वापस छत पर आ गयी, पर आश्चर्यचकित रह गयी कि आकाश पर चमकते तारे देखकर नींद पता नहीं कहाँ खो गयी और काफी देर वह तारे ही गिनती रही. अभी कुछ देर पूर्व ही वह स्नान करने गयी, पानी में ठंडक नहीं थी और पानी की बहुत कमी भी है यहाँ, सो स्नान के बाद भी तन में ठंडक नहीं समायी है. उस जून का ख्याल आया, वह भी तैयार हो रहे होंगे. पांच दिनों बाद उन्हें भी एक परीक्षा देनी है, खूब पढ़ाई हो रही होगी. कल उसकी पासबुक व चेकबुक मिल गयी, उसने सोचा आज बैंक जाना चाहिए, देखेगी.
कल शाम जून के मित्र आए और उसने टिकट के पैसे दे दिए, कल बैंक भी गयी. उसके पेन की रीफिल खत्म हो गयी, सो घर में पड़ा एक पेन उसने उठाया, पर वह भी रुक-रुक कर चल रहा है.


  

Thursday, July 19, 2012

मुस्कुराहट कायम है



मौसम ने फिर करवट ली है. कल दोपहर बाद से वर्षा आरम्भ हुई जो आज सुबह भी हो रही थी, शाम को कुछ देर के लिए थमी, वे घूमने गए, सामने वाली उड़िया पड़ोसिन ने उसका गुलाबी सूट अच्छा सिला है, वही पहना था. नन्हा नींद में कोई स्वप्न देख कर शायद डर गया था, रोने लगा वह स्नानघर में थी. फिर सो गया. आज उसने टाटा भी किया और फूल भी बोला, और भी कई शब्दों की नकल करता है कभी-कभी जैसे दादा, नाना, मामा. पापा अभी नहीं बोल पता. माँ के पत्र का जवाब उसने दे दिया है, जैसे इतने दिन बीत गए वैसे कुछ दिन और हैं उनके आने में. परसों उन्होंने नन्हें के जन्मदिन के लिये मेहमानों की सूची बनायी और मीनू भी. जून कहते हैं उसे स्टेशन नहीं जाना चाहिए पता नहीं गाड़ी कितनी लेट हो. आज कल आम बहुत सस्ते हैं वे रोज ही लाते हैं.

उसने लिखा, “न तो वह, वह है जो होना चाहती है और न ही वह जो वह वास्तव में है. एक मिश्रण है इन दोनों का, मिलावट जो आजकल हर शै में है, उसमें भी है शायद औरों में भी हो पर इस वक्त बात सिर्फ उसकी हो रही है”. जीवन चाहे कैसा भी हो मुस्कुराने की गुंजाइश तो हमेशा ही रहती है. कल छोटी ननद का पत्र आया था, वह बीए प्रथम वर्ष में दाखिला ले रही है. कभी वे भी थे विद्यार्थी, भला था वह जीवन.. लिखते-लिखते उसकी नजर सोनू पर गयी जो मस्ती से बिछौने पर खेल रहा था.  


 

Tuesday, July 17, 2012

भीषण गर्मी शीतल वर्षा


आज सुबह तो नहीं पर दोपहर को समय था लेकिन उसे याद ही नहीं आया कि लिखना है. दिन बेहद गर्म था, बेडरूम में दोपहर को धूप आती है, पर्दे लगाने के बावजूद तपन आती रहती है, सो वे बैठक में सोये, जून ने नीचे कम्बल बिछा दिया था, उसके ऊपर चादर, उसे नन्हें व उसकी भूख, प्यास व नींद का बहुत ध्यान रहता है. शाम को वे किन्ही परिचित से मिलने गए फिर क्लब. दक्षिण भारतीय व्यंजन वहाँ अच्छे मिलते हैं. सोनू वहाँ भी किलोल करता रहा, अपनी अटपटी भाषा में पता नहीं क्या-क्या बोल रहा था. क्लब से आते ही सो गया.

आज दोपहर वह एक चित्र बनाएगी, ऐसा भाव मन में आ रहा है. मौसम कितना सुहाना है, मंद-मंद मधुर पवन और आकाश पर बादल. जून आज बस से दफ्तर गए हैं, सो आने में थोड़ा देर होगी. उसने भोजन बना कर रख दिया है. उसका ध्यान अपनी कमर की तरफ गया, जो आजकल गायब होती जा रही है, नन्हें के होने के बाद ठीक से व्यायाम तो किया नहीं और खुराक ज्यादा. अब नियमित व्यायाम आरम्भ किया है पता नहीं कब फर्क दिखेगा, शायद छह महीनों तक या एक वर्ष बाद, पर कुछ तो करना पड़ेगा ही.
 
आज उसका जन्मदिन है, बहुत दिनों बाद डायरी का स्मरण हुआ है, पर कोशिश रहेगी कि रोज लिखेगी चाहे एक वाक्य ही, जून नेह बरसाते हुए दफ्तर गए हैं. आज उनका हाफ़ डे है. शाम को उन्होंने कुछ जलपान का प्रबंध किया है बस कुछ  ही लोगों के लिये.

कल दिनभर और रात भर की भीषण गर्मी के बाद अब वर्षा की शीतल बौछार कितनी राहत दे रही है. वह कुछ देर पूर्व ही उठकर बाहर आयी है और लगता है जून भी उठ गए हैं, नन्हा सोया है पर दस-पन्द्रह मिनट में ही वह भी उठ जायेगा, कितना प्यारा बच्चा है जब कोई उसे देखकर कहता है तो अच्छा लगता है मन को. कितना हँसाता है वह उन्हें, और कभी-कभी परेशान भी करता है. पर उसका तरह-तरह के चेहरे बनाना और नहीं-नहीं कहते हुए सिर को हिलाना देखते ही बनता है. अभी तक अपने आप चल नहीं पाता है. वर्षा रुक गयी है और दूर से मुर्गे की आवाज सुनाई दे रही है. बंद व घेराव के कारण अब शुक्रवार से पूर्व न तो चिट्ठी मिल सकती है न जा सकती है. माँ-पापा ने खत लिखा तो होगा. नन्हें का जन्मदिन भी निकट आ रहा है. जून शायद अंदर बैठकर कुछ पढ़ रहे हैं या तैयार हो रहे हैं, वह देखने चली गयी.   
 

Friday, March 2, 2012

पुराने खत


आजकल सुबह शाम ठंड बढ़ जाती है और दोपहर को गर्मी रहती है. अक्टूबर शुरू हो गया है. कल वे टहलते हुए क्लब गए, धर्मयुग का नया अंक पढ़ा नूना ने और जून ने स्वामी विवेकानंद की एक किताब के कुछ पन्ने. लाइब्रेरी में ही एक परिचिता मिलीं, पुरानी पड़ोसिन, कहने लगीं, उनके पति शाम को देर से घर आते हैं सो वे लोग इतने दिनों से मिलने नहीं आ सके.
कल जब जून घर आया तो नूना पुराने खत पढ़ रही थी. कितनी स्मृतियाँ सजीव हो उठीं. उसने कहा कि वह बस यही चाहता है, वह खुश रहे, जब तक वह साथ रहता है, नूना खुश रहती है, उसके जाने के बाद उसकी बातें याद करके. रेडियो पर हिंदी फ़िल्मी गीत की धुन पर आधारित एक असमिया गीत बज रहा है. वह कढ़ाई का काम लेकर बैठी है.
सात अक्तूबर ! आज पूरे नौ महीने हो गए उन्हें साथ-साथ रहते हुए. यह तिथि कितनी यादों को समेट लाती है. विवाह पूर्व के वे वर्ष, महीने और दिन इसी तारीख पर आकर सिमटे थे और विवाह के बाद का यह अनुराग पूर्ण जीवन इसी तिथि से प्रारम्भ हुआ था. उस दिन आधी रात्रि को जून उसे उसके परिवार से बाहर एक नए घर में लाया था. आश्वासन था उसके स्पर्श में, एक पल को लगा था उसकी आँखें देखकर कि वह उदास है या कहीं मन में घबराया हुआ है कि क्या होगा आगे, पर दूसरे ही पल उसका साथ उसे बहुत पुराना लगने लगा था. जैसे वे तो पहले से ही साथ-साथ थे. जैसे उन्हें तो सब मालूम था कि आगे क्या होने वाला था. उसने इतना स्नेह दिया है कि पहले के जीवन में जिसकी झलक कहीं-कहीं ही दिखाई पड़ती थी. कल उसे मोरान जाना है कुछ दिनों के लिये, नूना को अकेले रहना होगा, रहना ही होगा उसके लिये, उनके लिये.

Tuesday, February 28, 2012

रेडियो नाटक


दोपहर के तीन बजे हैं अभी, आज दोपहर उसने कुछ देर उसने किताब पढ़ी, क्रोशिये से मेजपोश आगे बनाया, जून के आने पर लस्सी बनायी और वे बाइक से नदी पर गए, मुख्यमंत्री आने वाले थे सो जगह-जगह पुलिस के सिपाही खड़े थे, वे पहले की तरह पुल पर खड़े होकर नदी को देर तक नहीं देख सके. ‘एक सच सारे जीवन का निर्णायक हो सकता है, पर कभी-कभी कितना कटु होता है कोई सच’ चंदामामा में से एक कहानी पढ़कर सुनाई उसे जून ने, उसी का अंतिम वाक्य था यह. विवाह  पूर्व लगभग हर शुक्रवार की रात वह रेडियो पर नाटक सुना करती थी, पर यहाँ नहीं सुन पाती है, सो जून ने उसे पढ़कर सुनाया. शाम को एक परिचित परिवार अपने दो बच्चों के साथ आया था, उन्हें बहुत अच्छा लगा.
आज उमा(महरी) नहीं आयी है. वह रेडियो पर समाचार सुनते हुए बर्तन साफ कर रही थी. अकाली दल को पूर्ण बहुमत मिला है, सुरजीत सिंह बरनाला पंजाब के मुख्यमंत्री बनाये गए हैं, अब उम्मीद करनी चाहिए कि पंजाब में फिर पहले की तरह शांति रहेगी. और भारत का सबसे समृद्ध राज्य होने का गौरव वह कायम रख सकेगा.  


Friday, June 24, 2011

भरवां टमाटर


ज यह गीत याद आ रहा है, यह जिंदगी चमन है, सुख-दुःख फूल और काँटे, क्यों न हम तुम मिलकर इनको बांटें...आज दोपहर को नूना ने उसे खुशी-खुशी विदा नहीं किया था, बाद में वह सोचती रही कि क्या वह भी अब तक इस बारे में सोचता होगा या काम में व्यस्त होकर भूल गया होगा, अब वह आने ही वाला है, कल उसने एक अच्छी बात कही थी कि जहाँ अपनत्व होता है कोई अपने मन की बात झट कह देता है, और मजा तब है जब दूसरा उसको अन्यथा न ले. पर उसे अपनी ही बात याद नहीं रही. आजकल वह टैटिंग सीख रही है. शाम को वे पहले टेबल टेनिस खेलते हैं फिर लाइब्रेरी जाते हैं. आज उसने वही नीली कमीज पहनी है, जो पहन कर घर आया था मंगनी के वक्त, कितने फोटो हैं उसके इन कपड़ों में. कल साप्ताहिक हिंदुस्तान से पढ़कर भरवां टमाटर बनाये थे उसे बहुत पसंद आये.