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Wednesday, February 20, 2013

चाय-बागान में छिड़काव



कल दिल्ली से भी पत्र आ गया, छोटी बहन की सास ने लिखा है और उसके पति ने भी, उसने जून से उनके लिए एक बधाई कार्ड लाने को कहा है. असम में मौसम एक दिन में इतने रूप बदलता है जितनी पोशाकें फिल्मों में नायिका बदलती है, उतनी ही शीघ्रता से, कभी बदली, फिर धूप, फिर ओले, कभी तेज वर्षा, फिर धूप और न जाने क्या-क्या..नन्हा आज स्कूल गया है, कल मौसम का मिजाज बिगड़ा हुआ था, जून अपनी कार का पंक्चर ठीक करवाके घर आए थे, बोले, इसे मत भेजो, सर्दी विशेष तो नहीं पर खांसी अभी ठीक नहीं हुई है उसकी, बहुत खुश रहता है स्कूल जाकर, मगर वे दोनों सोचते हैं, घर में उससे ज्यादा पढ़ सकता है, आराम कर सकता है, गर्म भोजन भी खा सकता है, लेकिन स्कूल जाने से उसको खेलने को मिलता है, दोस्त मिलते हैं, घर से बाहर कुछ वक्त गुजार सकता है, सो जहाँ तक सम्भव हो उसे नियमित स्कूल भेजना ही ठीक है. दोपहर के दो बजे हैं, उसने कुछ देर फोन पर बात की. उसके बाद युद्ध कांड के दो-तीन अध्याय पढ़े, अद्भुत है ‘बाल्मीकि रामायण’. कल रात वे देर तक योजना बनाते रहे, बगीचे में क्या-क्या परिवर्तन लाना है, जो जगह खाली पड़ी है, वहाँ कौन से फूल लगाने हैं. बहुत दिनों से उसने काव्य जैसा कुछ नहीं लिखा-

कविता को लिखा नहीं जाता
उसे जीया जाता है
और उसे जीने के लिए पल दो पल का नहीं
एक लम्बा वक्त गुजारना होता है
ऐसा वक्त जब मन को अपनी गिरफ्त से परे छोड़ा जा सके
उन्मुक्त विचर सके वह भावों की अनोखी दुनिया में
कविता वस्तु नहीं है
यह एक प्रेरणा है, एक स्पंदन..
मगर इसे जगाने के लिए प्रयास चाहिए आतुर
उस हृदय का जो पत्थर में से पानी निचोड़ने की ताब रखता हो
पिघल पिघल कर स्वयं को गला सके, विचारों का ऐसा ताप ला सके
तब जो फूटेगा वह निर्झर सा स्वच्छ होगा
मुक्त होगा...असीम होगा और अपरिमित होगा...
वह बनेगा मधुर गीत..जिसे पोर पोर गायेगा ...
अंतर्मन से उपजा होगा न ...

नन्हे से सुबह कहा था कि वह नाश्ता खाने में इतनी देर लगाता है और अरुचि से खाता है, इस पर एक कहानी लिखेगी. उसने एक पात्र की कल्पना की, जाहिर है वह भी एक बच्चा ही होगा, जो सुबह उठाना पसंद नहीं करता हो, जो भोजन करते समय कुछ और करना चाहता हो, किताब पढ़ना, टीवी देखना या खेलना, अक्सर उसकी स्कूल बस छूटते छूटते रह जाती हो ....

मार्च का महीना शुरू भी हो गया और दूसरा हफ्ता खत्म होने को है. आज हफ्तों बाद डायरी खोली है. बाईस फरवरी को नन्हा अस्वस्थ हुआ, फिर जून भी गले के कारण परेशान थे, पता नहीं क्यों ऐसा लगता है कि कभी ऐसा वक्त आयेगा भी या नहीं जब वे तीनों एकदम ठीक हों, पहले की तरह. उसे ही ज्यादा ख्याल रखना पड़ेगा, खानेपीने का, सफाई का और नियमित व्यायाम का. होली का त्यौहार भी बीत गया, पंजाबी दीदी का बेटा आया था, जो जोरहाट में पढ़ाई कर रहा है. कल माँ-पिता के पत्र के साथ छोटी बहन का पत्र भी आया, लगता ही नहीं कि वह बड़ी हो गयी है, वही पुराना लहजा.. बच्चों की सी बातें. पड़ोसिन की तबियत भी ठीक नहीं है, लगातार दो दिन उसका पुत्र स्कूल नहीं गया. अस्वस्थ होना आजकल रोजमर्रा की बात हो गयी है, हवा इतनी दूषित हो चुकी है कि..इतने पेड़-पौधे होने के बावजूद हवा में एक गंध सी भरी रहती है, शायद सामने के चाय-बागान में कीट नाशक दवा का छिड़काव होता है या कोई रासायनिक खाद डाली जाती है.

उसने कहानी आगे बढ़ाई, स्कूल में सब बच्चे उसे मोटू कहकर बुलाते थे, क्योंकि जब वह छोटा था तो बिल्कुल गोल-मटोल था, उसके जन्मदिन की पार्टी में मित्रों ने उसके बचपन की कुछ तस्वीरें देखीं और तभी से उन्होंने उसका नाम मोटू रख दिया. शुरू में तो उसे बहुत बुरा लगा लेकिन माँ के समझाने पर उसने बाद में इस बात पर ध्यान देना छोड़ दिया. उसकी माँ ने कहा, लगता है तुम्हारे मित्रों को इसमें बहुत खुशी मिलती है, तुम्हें भी उनके साथ खुश होना चाहिए, क्योंकि तुम सचमुच के मोटे नहीं हो. उसकी एक बात अच्छी नहीं थी, वह थी बिना सोचे-समझे सबकी हाँ में हाँ मिलाना, वह कभी किसी को न नहीं कह पाता था. चाहे उसे बाद में कितनी हानि उठानी पड़े. एक बार उसके एक मित्र ने कहा कि वह अपना कलर बॉक्स लाना भूल गया है. टीचर जब उसकी मेज तक आयेंगी तब वह धीरे से कलर बॉक्स उसकी तरफ बढा दे जिससे उसे डांट न पड़े, वह मान गया, और नतीजा यह कि टीचर ने उसे ऐसा करते देख लिया और डांट उसे खानी पड़ी.