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Tuesday, May 16, 2017

आम का मौसम


पिताजी पिछले कई हफ्तों से अस्वस्थ तो थे ही, अब उन्हें डिमेंशिया की समस्या भी हो गयी लगती है. समय का पता नहीं चलता उन्हें और अपने रोजमर्रा के काम करने में भी कठिनाई होती है. इस समय सो रहे हैं, दोपहर को उन्हें उठाया, पानी चाय, नाश्ता आदि दिया, दवा दी, फिर सो गये. प्रकृति  का यह नियम है जैसे एक चक्र पूरा हो रहा है. बूढ़ा फिर से बच्चा बन गया है, दीन-दुखिया से बेखबर..अपनी ही दुनिया में खोया हुआ. आज ‘मृणाल ज्योति’ की बीहू मंडली आने वाली है. पाँच बजे का समय दिया था पर अब तो साढ़े पांच हो गये हैं, किसी भी क्षण आते होंगे. जून आज दिल्ली गये हैं, दोपहर उनके जाने के बाद फिल्म देखी, ‘धूल का फूल’, नाम सुना था. पहले कभी देखी नहीं थी. महिलाओं पर अत्याचार न जाने कितने युगों से होते आये है. उन्हें इसके खिलाफ आवाज उठानी ही होगी, उसने भी उठायी थी अपने स्तर पर, आज आजादी का अनुभव भी होता है. कोयल के कूकने की आवाज आ रही है, आमों का मौसम है, कच्ची केरियों से पेड़ भरे हैं. उसने बाहर देखा, अब तक तो उन्हें आ जाना चाहिए था, पर भारत में समय की कीमत कहाँ पहचानते हैं वे लोग !
सुबह शीतल थी, भ्रमण को गयी, लौटकर पिताजी को उठाया, सहायक को बुलाकर स्नान आदि कराया. नाश्ता दिया पर वे पचा नहीं सके, दोपहर तक वे अस्वस्थ ही रहे, उन्हें बेल का शरबत दिया जिसके बाद से वे ठीक रहे. जून के फोन आते रहे, दोनों ननदों के फोन भी आये. बच्चों की तरह हो गये हैं वे, फुसला कर खिलाना पड़ता है उन्हें.

पिताजी को पुनः अस्पताल ले जाना पड़ा है. कल रात को उन्हें शुभरात्रि कहने के बाद से कई बार उनके कमरे में गयी, उनके पास जाकर आवाज दी पर उन्हें कुछ पता नहीं था. सुबह चार बजे के लगभग वह उठ गयी थी, टहलने गयी पर वापसी में एक विचार आया कहीं पिताजी उठ न गये हों, जल्दी-जल्दी लौटी तो वह वैसे ही आराम से सोये थे. धीरे-धीरे उनकी चेतना भीतर सिकुड़ती जा रही है, स्वाद का भी पता नहीं चलता और न ही प्राकृतिक वेगों का. कल से नैनी कितनी चादरें व वस्त्र धो चुकी है. वृद्धावस्था का यह काल शायद सभी को देखना पड़ता है. जून जब दिल्ली से वापस आये तो उनकी हालत देखकर तुरंत ही डाक्टर को फोन किया और उन्हें अस्पताल ले गये.

पिछले दो दिन उसके सिर में दर्द बना रहा, मन भी ठीक नहीं रहा, तन के स्वास्थ्य पर मन का स्वास्थ्य निर्भर करता है. आज सुबह प्राणायाम के बाद ध्यान में चाय का कप दो बार दिखा. पिछले दिनों दिन में दो बार चाय पी, अम्लता बढ़ गयी थी, सो कल से नहीं पी रही है, मन भी अपेक्षाकृत ठीक है. परसों नन्हा यहाँ आ रहा है. जून आज चौथे दिन भी अस्पताल में सोने गये हैं, कल से सहायक आ जायेगा जो कुछ दिनों से बाहर गया हुआ था. पिताजी का स्वास्थ्य सुधर रहा है, पर जब तक खुद चलने-फिरने लायक नहीं हो जाते घर नहीं आ पाएंगे. उसे अपना स्वास्थ्य भी पहले सा नहीं लग रहा है. उसके भीतर के भय और अन्य विकार भी स्पष्ट दिखने लगे हैं, जैसे कोई आपरेशन  चल रहा हो, सब कुछ निकाल कर स्वच्छ करना हो मन को ताकि परमात्मा अपनी पूरी गरिमा के साथ प्रकट हो सके.     


Tuesday, March 17, 2015

टिंडे की सब्जी


अभी बहुत दूर जाना है, सहिष्णुता की बहुत कमी है. आसक्ति अभी बनी हुई है, लोभ भी बरकरार है और वाणी पर संयम भी नहीं है. ऐसे में ध्यान का क्या लाभ मिलने वाला है. सुबह-सवेरे ही गुरू माँ ने कहा, गलती करो मगर होश से, तो थोड़ी सांत्वना मिली है क्योंकि पूरे वक्त उसे यह पता था कि जो हो रहा है वह ठीक नहीं है यानि होश तो था, अब आगे ऐसी भूल नहीं होगी. कल शाम भजन संध्या में गयी अच्छा अनुभव था. नाम संकीर्तन के द्वारा भी उससे जुड़ा जा सकता है, कृष्ण हृदयों से राग-द्वेष निकाल देते हैं, जब उसका नाम जिह्वा पर नृत्य करता है. असत संग का त्याग करना है, जो भी लक्ष्य से दूर ले जाये वही असत है. कल दोपहर को एक नया अनुभव हुआ बाथरूम में कपड़ों का ढेर उसके देखते-देखते एक निर्मल आभा से युक्त हो गया और एक बार तो हिलता हुआ भी प्रतीत हुआ. उसकी आँखों से कुछ अन्य तरंगें भी निकलने लगी हैं शायद. गुरूजी कहते हैं अनुभवों के पीछे नहीं जाना चाहिए.

आज ‘मृणाल ज्योति’ जाना है, बच्चों को योग सिखाने. मौसम सुहावना है, संगीत की कक्षा हुई. पिछले हफ्ते अभ्यास ठीक से नहीं कर पायी थी, ध्यान में ज्यादा वक्त चला गया, कई बार पुस्तक पढ़ते-पढ़ते ही भाव ध्यान घटने लगता था. ‘ध्यान’ अब एक स्वाभाविक कार्य लगता है जैसे यह उतना ही सामान्य हो जितना भोजन करना. अभी दोपहर के भोजन की थोड़ी सी भी तैयारी नहीं हुई है, नैनी टिंडे काटकर रख गयी है, जो जून कल लाये थे. कल ही वह ढेर सारे आम भी लाये थे. नन्हे को रात को देर तक पढने की आदत है. कई बार लाइट जलाकर ही सो जाता है सो जून ने उसके नॉवल वापस करने के लिए अपने आपस रख लिए थे, पर उसे यह बात नहीं भायी, बहुत नाराज हुआ और सुबह बिना बात किये ही स्कूल चला गया. वे भी कभी माँ से ऐसे ही नाराज हो जाते होंगे. स्कूल से वापस आने तक सब भूल चूका होगा. उन्होंने उसकी किताबें वापस भी रख दी हैं. जून अपने लिए एक तकिया लाये पर वह भी उन्हें अधिक माफिक नहीं आया. पिछले दिनों तकिये की वजह से उनकी गर्दन में दर्द हो गया था. परसों विभाग में उनका एक प्रेजेंटेशन था, अच्छा रहा. कल से वह रह-रह कर सिर के दायें भाग में कुछ सुरसुरी सी अनुभव कर रही है शायद ‘ध्यान’ की वजह से. ईश्वर उसके साथ है जो भी होगा या हो रहा है उनकी देख-रेख में ही हो रहा है !

जुलाई का प्रारम्भ ! मौसम बरसात का है, वर्ष रात को हो चुकी है, सभी कुछ साफ और धुला-धुला सा है. मन भी ईश्वर की भक्ति रूपी जल से धुलकर इस वक्त तो स्वच्छ  प्रतीत हो रहा है लेकिन कब, कैसे और क्यों और कहाँ इस पर मैल का छींटा लग जाता है, पता नहीं चलता, कब सिलवटें पड़ जाती हैं, पड़ने  के बाद तो लेकिन फौरन पता चल जाता है. एक पल भी नहीं लगता इसे निस्तेज होते हुए. .०००१ % भी यदि स्वच्छता घटे तो अहसास फौरन दिलाता है भीतर स्थित परमात्मा रूपी मित्र, वह तो हर क्षण सजग है न. बहुत बचा-बचा कर रखना पड़ता है, व्यर्थ की बातचीत नहीं, व्यर्थ का कुछ भी नहीं. आज सुबह दीदी का फोन आया, वे भांजियों के ब्याह की बात बता रही थीं. अगले डेढ़-दो वर्षों में दोनों की अथवा एक की तो शादी करने का वे इरादा रखते हैं. छोटे भांजे का दाखिला दिल्ली के एक कालेज में हो गया है. पर अभी वह चंडीगढ़ में बीटेक के दाखिले का इंतजार भी कर रहा है. कल शाम को सासु माँ व छोटी ननद की अस्वस्थता की खबर भी मिली. छोटी बहन इसी माह पूना जाने की उम्मीद रखती है. उस दिन चचेरे भाई का खत आया था, उसकी भाषा अच्छी है, विचार भी सधे हुए हैं पता नहीं क्यों उसने अपने शारीरिक रखरखाव पर ध्यान नहीं दिया, गरीबी को इसलिए अभिशाप कहते हैं. नन्हे की फिजिक्स की कोचिंग कल समाप्त हो गयी, अगले टीचर गणित आएंगे. वह अपने मन की करता है, आजाद ख्याल किशोर है. जून और वह दोनों ही उसे बहुत प्यार करते हैं और दो वर्ष वह उनके साथ रहेगा फिर तो पढ़ाई  के लिए उसे बाहर जाना है, हो सकता है तब उसे उनका टोकना याद आए कि वे उसके सुधार के लिए ही उसे सन्मार्ग पर लाने के लिए ही टोकते हैं ! आज दोपहर एक सखी और उसका पुत्र आ रहे हैं राखी बनवाने.     


Thursday, February 5, 2015

आम के बौर की गंध


आज सुबह कराची वाले संत से ये सुंदर वचन सुने, “जैसे वे अपना कीमती सामान सुरक्षित रखते हैं वैसे ही अपना मन तथा बुद्धि कृष्ण के भीतर सुरक्षित रख के निश्चिन्त हो जाना चाहिए. अन्यथा मन के चोर उसे ले जायेंगे  अथवा मन अपनी चंचलता के कारण ही भटक जायेगा, खो जायेगा ! मन जब कोई संकल्प करता है तो बुद्धि उसके पक्ष या विपक्ष में निर्णय लेती है. इन्द्रिय रूपी अश्व और मन रूपी लगाम यदि ईश्वर को समर्पित बुद्धि के हाथ में हो जीवन सही मार्ग पर आगे बढ़ेगा !” इस समय पौने दस बजे हैं, साढ़े आठ बजे तक जब तक जागरण सुना और उसके बाद कुछ देर तक तो उसका सुमिरन चलता रहा, फिर व्यायाम, भोजन, दो सखियों से फोन पर बाते करने में विस्मृत हो गया, लेकिन अब पुनः उसी का स्मरण हो आया है. पड़ोसिन की तबियत ठीक नहीं है, उसे दिल की बीमारी है जो कभी-कभी बढ़ जाती है, उससे मिलने जाना है.

भक्ति का अभ्यास करना होता है इसे ही अभ्यास योग या साधना कहते हैं. कृष्ण उन्हें आश्वासन देते हैं कि यदि उनकी ओर जाने का लगाता प्रयास करते हैं तो एक न एक दिन अवश्य सफल होंगे ! भगवद गीता में कृष्ण कई अध्यायों में भक्तियोग पर चर्चा करते हैं पर बारहवें अध्याय में वह स्पष्ट आमन्त्रण देते हैं. आज अभी कुछ देर पूर्व छोटे भाई का फोन आया उसे उनकी भेजी पुस्तकें मिल गयी हैं. ईश्वर हर क्षण उनके साथ है ! कल शाम उसे इसका अभूतपूर्व अनुभव हुआ ! आज मौसम बेहद अच्छा है, ठंडी, सुहानी, शीतल हवा बह रही है जिसमें आम के बौर व फूलों की सुगंध है ! सुबह पांच बजे से कुछ पहले ही उठी, क्रिया की, मन थोडा उद्व्गिन था लेकिन हर पल उसे अपने मन के भाव का बोध रहता है सो कोई भी अनचाहा भाव टिकने नहीं पाता. कृष्ण की स्मृति उसे हटा देती है. आज वह पुरानी संगीत अध्यापिका के यहाँ भी जाएगी, उन्हें पुस्तक देनी है और उनके गोद लिए पुत्र से मिले भी बहुत दिन हो गये हैं. एक और परिचिता को फोन किया पर वह मिली नहीं, कल पता चला कि उनका स्वास्थ्य ठीक नहीं है. मन में संसार समाया है जहाँ केवल कृष्ण होने चाहिए. हो सकता है वही उसे प्रेरित कर रहे हों. आज कादम्बिनी की समस्यापूर्ति का हल भी पोस्ट किया है.

आज नन्हे की अंतिम परीक्षा है. सुबह से ही वह व्यस्त है. पांच बजे उठी, उसके पूर्व पौने चार बजे जी नींद खुल गयी थी. तिनसुकिया स्टेशन से जून के एक सहकर्मी का फोन आया था, उनकी ट्रेन तीन बजे ही पहुंच गयी थी पर कार तब तक नहीं पहुंची थी. जून की नींद रात को भी डिस्टर्ब रही, सो नन्हे को छोड़ने जाते समय उनके सर में दर्द था. उसका भी हाल कुछ ठीक नहीं रहा. बेवजह ही नैनी पर क्रोध किया, अपने भीतर का उठता क्रोध का आवेग बहुत अजीब लग रहा था, आश्चर्य भी हुआ कि यह था उसके भीतर, जो भीतर न हो वह महसूस कर भी कैसे सकते हैं, फिर कृष्ण के नाम का जप किया, कृष्ण हर संकट में उसकी रक्षा करते हैं. दो परिचितों के फोन आये, दोनों को नन्हे की किताब-कापियों में से कुछ चाहिए. आज सुबह भैया-भाभी, दीदी-जीजाजी से बात हुई, दीदी AOL का कोर्स नहीं कर पा रही हैं, खैर..उन्हें भविष्य में कभी पत्र लिखकर अपने मन की बात कहेगी. पिताजी के यहाँ आने की उम्मीद उसे अब भी है, मई या जून में सम्भवत वह यहाँ आयेंगे. आज ‘आत्मा’ में गीता का बारहवां अध्याय ही चल रहा था. कृष्ण उन्हें आकर्षित करते हैं पर संसार की ओर वे खिंचे चले जाते हैं, उनकी वृत्तियाँ बहिर्मुखी हैं. अन्तर्मुखी होकर कृष्ण को अनुभव करने का प्रयास भी नहीं करते, जबकि उसका आश्रय लिए बिना इस भवबंधन से मुक्ति पाना असम्भव है. उसका मन कृष्ण का आश्रय ले चुका है और अब इससे उसे कोई नहीं अलग कर सकता !
   
 



Wednesday, June 4, 2014

बन्दर वाला बैग


जून आज बहुत दिनों बाद फील्ड ड्यूटी पर गये हैं, ‘कतलानी’ नामक एक जगह पर. आज मौसम खुला है, चारों ओर उजले सोने सी बिखरी धूप अच्छी लग रही है. पूसी आजकल आलसी हो गयी है या कमजोर, मुँह से धीरे से आवाज निकलती है जो सुनाई नहीं बस दिखाई देती है. आज नन्हे के स्कूल और जून के दफ्तर जाने के बाद ‘जागरण’ सुना. कल शाम नन्हे को क्विज में प्यारा सा बन्दर वाला बैग पुरस्कार में मिला है, पर उसे पसंद नहीं आया, जबकि नूना को बहुत सुंदर लग रहा है, पर पुरस्कार की बात उन्हें आनंद देती है, क्यों कि इसके पीछे उनका प्रयास छिपा है. इस समय उसका संगीत अभ्यास का वक्त हो चला है.

आज फिर उसका मन चिन्तन में लगा है. अक्सर न जाने कहाँ से (ऐसा वह सोचती है) जो उसके अंतर में कुछ खोया-खोया सा लगता है, खालीपन जैसा वह कहीं बाहर से नहीं आता बल्कि अंदर गहरे तक भरा हुआ है जो जरा मौका मिलते ही सतह पर आ जाता है. जब सतह पर सात्विक विचार कमजोर हो जाते हैं तब ही. आध्यात्मिकता उन नकारात्मक विचारों से सदा के लिए मुक्त होने का मार्ग है. सद्विचारों का वेग इतना तीव्र हो कि सारी कमियां ऊपर आकर बह जाएँ और मन का घट अमृतमय हो जाये. तब जीवन सरल, कोमल, शांत व रसमय बनेगा, अंतर में कविता स्वयंमेव जन्मेगी. विकार मुक्त, तृप्त मन जिसने सारे नकार पर विजय पा ली हो, जिसका कोई भी शत्रु न रह गया हो, जिसने स्वयं को साध लिया हो, ऐसा स्वच्छ दर्पण सा मन जिसके पास हो दुनिया का कोई संकट उसे छू भी नहीं सकता. ऐसा ही मन उसका हो, यही उसके जीवन का लक्ष्य है.

Today is a hot and humid day of mid day. It is early morning but not very cool and pleasant like many mornings in Assam. When they will leave this place to go somewhere else most probably in UP or Uttaranchal, they will miss the calm and serene atmosphere of Assam. But that is many years away today at this moment she has to live in the present.

आज सुबह जून ने रोज की तरह उठाया, नन्हे और उनके जाने के बाद उसने घर संभाला, कितनी अच्छी-अच्छी बातें रोज ही सुनती है, पढ़ती है. कभी-कभी वे एकदूसरे का विरोध करती हुई भी प्रतीत होती हैं, कभी कोई कहता है कि अंतर में डूबकर साधना की जा सकती है, दुनियादारी से जितना दूर रहकर निर्मुक्त होकर जीयें उतना अच्छा है फिर दूसरा विचार कहता है, स्वयं को गुनना छोड़कर दूसरों के काम आना सीखो, दोनों में से कौन रास्ता ठीक है ?

Jonathan can learn flying so can she, he has no limitations of body, time and space. He is free  like true self. Jonathan taught her the same lesson she is trying to learn from Buddha and all other wise men. But now when she knows and has faith in the highest bliss, she has to find her self. She is no longer a helpless, weak, poor soul but she is the soul which can not be crushed. Which can fly higher and higher without any limit.

मानव के लिए असीम सम्भावनाएं हैं वह चाहे तो स्वर्ग तक पहुंच सकता है, स्वयं अपना स्वर्ग बना सकता है. उसे रोकती हैं तो उसकी स्वयं की कमियां, हृदय की क्षुद्रता, संकीर्णता और अपनी शक्ति पर भरोसा न होना. यह दुनिया वैसी ही दिखती है जैसा कोई देखना चाहता है, खुद के विचारों को ही जैसे आईने में प्रतिबिम्बित किया जा रहा हो, इसलिए जहाँ कहीं भी दुविधा, दुःख, क्षोभ की अनुभूति हो समझना चाहिए अंतर में कहीं मेल जमा है. वरना तो प्यार का प्रतिदान प्यार में ही मिलता है. यही दुनिया की रीत है और यही उस परवरदिगार की तदबीर है. उसने हम सबको बहुत छूट दी है और बहुत शक्ति भी दी है. चाहें तो स्वर्ग बना लें और चाहे तो अपना व अपनों का जीवन दुखमय कर लें. कल छोटे भाई का कार्ड व पत्र मिला उसके स्नेह ने नूना के हृदय में स्नेह को उत्पन्न किया. पड़ोसिन को उसने कटहल दिया तो उसने आम दिए, उन्होंने बातें कीं और लगा कि वे किसी बंधन में बंधे हैं. एक और सखी को उसने बगीचे के आम भिजवाने का वायदा किया है, उसे भी स्नेह रूप में ही वे मिलेंगे और यह सिलसिला जारी रहेगा. जीवन एक यात्रा भी है और एक पड़ाव भी जहाँ वे अन्य यात्रियों से मिलते हैं किन्तु असली मंजिल का पता भी नहीं भूलते, वहाँ अटक नहीं जाते, असली मंजिल तो रब ही है वही सृजनहार जिसने सबको बनाया तो अपने जैसा ही है पर वे खुद को कुछ और समझ बैठे, भूल ही गये..कि वे कौन थे.




Tuesday, June 11, 2013

बगीचे के आम



‘आषाढ़ का प्रथम दिवस’ अर्थात जुलाई माह का शुभारम्भ, शुभ इसलिए की सुबह से ही वर्षा हो रही है, नन्हा सुबह साइकिल लेकर निकला ही था कि बूंदाबांदी शुरू हो गयी. सुबह-सुबह  टेनिस खेलने जाने से उसका मूड कितना ताजा रहता था, लेकिन एक तो अब स्कूल खुल जाने से दूसरे क्लब में बच्चों को अकेले जाने से मना कर दिया गया है. आज उसकी पहली बस छूट गयी, वह थोड़ा नाराज हो गया, ‘बाय’ कहे बिना ही चला गया, आज से तीन बजे आयेगा. ट्रांजिस्टर पर ‘फूलों की छाँव में’.. ‘प्यार के गाँव में’.. एक घर बनाने की कल्पना करने वाला एक गीत आ रहा है, ऐसा घर सिर्फ सपनों में मिल सकता है, यूँ अगर कोई चाहे तो उस सुख को जो ऐसा घर मिलने पर मिलेगा अपने  घर में महसूस कर सकता है. तलाश तो कर सकता है. कल सर्वोत्तम के दो-तीन पुराने अंक निकाले, अच्छा लगा कि पढ़ने के लिए इतना कुछ है घर में. कल रात को यश चोपड़ा की ‘इत्तफाक’ फिल्म देखनी शुरू की, पर कुछ देर ही देख पाए, ज्यादा अच्छी नहीं लगी. कास्टिंग में चित्रकला दिखाई जा रही थी उसमें.

कुछ मिनट पहले उसने पुरानी पड़ोसिन से बात की, वह अच्छी वक्ता है, उसे वकील होना चाहिए, बोलती कुछ ज्यादा है पर शब्दों का खजाना है उसके पास. मित्रता निभाना दुनिया में सबसे कठिन काम है शायद, हमें सामने तो उनकी तारीफ करनी होती है और बाद में आलोचना भी स्वतः ही होती है. नन्हा स्कूल गया है, शनिवार को उसने उसे स्कूल न जाने के लिए कहा था, पर आज सुबह जब तैयार होने के लिए कहा तो वह कन्फ्यूज्ड हो गया, उसे नन्हे को दुविधा में नहीं डालना चाहिए, सीधे-सादे शब्दों में सारी बात कहनी चाहिए. बड़े लोगों को तो मसलों को उलझाने में मजा आता है मगर बच्चों को इन दांवपेंच से दूर ही रखना चाहिए.

इस क्षण मन की शांत सरिता में जैसे किसी ने कंकर मार दिया है. लहरों का शोर विचारों का बिखराव दर्शाता है. मन पर कब किस बात का क्या असर होगा कहना कठिन है, जो मन पर नियन्त्रण रखने में समर्थ है वह  स्थित प्रज्ञ है. आज हल्की-हल्की सी धूप निकली है. कल शाम माली ने गुलदाउदी के लिए गमलों को तैयार कर दिया. कल शाम उसकी असमिया सखी ने पूछा, क्या बंगाली सखी का पत्र आया है, कल शाम उसके यहाँ आम खाने और ढेर सारी इधर-उधर की बातें करके बेहद अच्छा लगा उसे आभार जताने के लिए फोन करना चाहती थी पर शायद उनका फोन खराब है. इतना लिखने के बाद कलम रुक गयी, विचारों की गाड़ी को ब्रेक लग गया है, सच तो यह है कि मन शांत है पहले की तरह. यह डायरी भी एक मित्र की तरह होती है, एक ऐसे मित्र की तरह जिससे सब कुछ कहा जा सके पर वह कोई शिकायत नहीं करता. जो मन को शांत कर देता है, अपने कोमल हाथों के स्पर्श से. जिसके साथ जीना आसान हो जाता है और  कड़वाहटें मीठे बोलों में घुल जाती हैं.




   


Wednesday, February 27, 2013

आम का अचार



यहाँ आजकल एक छोटा सा मेला लगा है, वे दो बार हो आए हैं, नन्हे का उत्साह देखते ही बनता है, बचपन में वे भी ऐसे ही उत्साहित होते थे. वहाँ जादू का खेल भी देखा, जून को वहाँ बैठना पसंद नहीं था, पर प्यार के कारण...उनका प्रेम नन्हे और उसके लिए असीम है. पिछले तीन-चार दिनों गर्मी बहुत थी, आज अपेक्षाकृत कम है. कल माँ व दीदी के पत्र मिले, दीदी का पत्र बहुत अच्छा था, उसके जन्मदिन की बधाई दोनों में थी. Whatever suffering arises has a reaction as its cause, if all reactions cease to be then there is no more suffering.  दीदी के पत्र में लिखा था. नूना सोच रही है कि छोटे भाई को व्यर्थ ही अंग्रेजी की गलती के लिए लिखा, उसका जवाब आने पर एक अच्छा सा पत्र लिखेगी, किसी की आलोचना करने का भला क्या अधिकार है उसे. उसने  पुरानी पड़ोसिन को फोन किया, आजकल वह कहीं आती-जाती नहीं, उसे शक है कि वह.. काश यह सच ही हो, उसे बच्चों से बहुत प्रेम है. वह स्वयं ही उससे मिलने गयी, कॉटन के लाल-काले सूट में वह बहुत अच्छी लग रही थी. उससे कुछ छोटी पुस्तिकाएँ व चार “कल्याण” पत्रिकाएँ लायी है, मन को एकाग्र करने के लिए अच्छी हैं, जून भी एक पत्रिका लाए थे, दोपहर को नन्हा अगर सो गया तो पढ़ सकती है. उसकी असमिया सखी ने कहा है कि अपने बगीचे के पेड़ से आम तुड़वा कर रखेगी. वह अचार भी बनाएगी और जैम यानि मीठी चटनी भी. कल वे एक नए परिचित परिवार में गए, उनके माता-पिता आए हुए हैं, जून के एक और सहकर्मी के माँ-पिता भी आए हुए हैं, अच्छा लगता है उसे सबसे मिलकर.

जन्मदिन आकर चला गया, नया महीना शुरू हो गया है. गर्मी का महीना, इस समय बिजली भी नहीं है, और धूप आज तेज है, ऐसी ही गर्मी से उसे सिरदर्द हो जाता है. सुबह से मन अस्त-व्यस्त था, रात को अजीब-अजीब स्वप्न देखे शायद इसी का असर था, दूध वाले को पैसे देना तो याद रहा इस बार पहली तारीख को ही, पर बीस रूपये ज्यादा दे दिए. पता नहीं यह अस्थिरता कहाँ तक छुपी बैठी है उसके भीतर. कल नन्हे का पिलानी में एडमिशन के लिए एडमिट कार्ड मिला, शाम को तीनों का मूड ऑफ था, सिर्फ सोचने भर से यह हाल है तो जब वह वहाँ रहेगा...वह नहीं रह सकेगा, वे भी नहीं रह सकेंगे उसके बिना.

पिछले दो-तीन दिनों से वर्षा हो रही है. आज क्लब में Rhymes compition हो गया, फिर वही हुआ, उसकी लापरवाही की वजह से वे नन्हे का नाम नहीं सुन सके, दुबारा पुकारने पर ही वह जा सका. कल पर्यावरण दिवस पर “कला प्रतियोगिता” है, उसी के लिए वह अभ्यास कर रहा है. कल फुफेरे भाई व छोटी ननद का बधाई कार्ड भी मिला. आज इस समय उसका मन यूँ ही बिना किसी विशेष कारण के अशांत है, अभी यह लिखने के बाद कोई अच्छी पुस्तक पढ़ेगी, शायद अच्छा लगेगा, लेकिन अच्छा कैसे लग सकता है, जब अपने अंतर्मन में ही शांति न हो तो कोई बाहरी पदार्थ उसे क्या शांति दे पायेगा. लेकिन यह अकुलाहट यह व्याकुलता क्यों ? सब कुछ छोड़ छाड़ कर सारे बन्धनों से मुक्ति पाकर एक क्षण के लिए भी क्या कभी वह रह पायेगी...यूँ इस सारे उहापोह से मुक्ति पाने का एक साधक है, ‘कार्य’ - कुछ न कुछ करते रहने से यह विचार मन में आते ही नहीं, या फिर कोई अच्छी सी पुस्तक ही पढ़ी जाये, फ़िलहाल तो किचन में जायेगी नन्हे के लिए नाश्ता बनाना है.

Friday, February 15, 2013

साइकिल की सवारी



कल सुबह से लग रहा था कि कहीं कुछ गड़बड़ है, दोपहर को उपवास किया, फिर शाम को टिफिन में उबले आलू खा लिए कि कुछ तो खा लेना चाहिए और खेलने चली गयी, खाली पेट में आलू वात बढ़ाते हैं, यह पता ही नहीं था, गैस सिर पर चढ़ गयी और दर्द से फटने लगा अच्छा भला सिर. घर आकर वमन किया फिर एक घंटा आराम और तब जाकर सब ठीक हुआ. पूरे वक्त जून के साथ नन्हा उसका बहुत ख्याल रख रहा था. उसको हिंदी में पूरे नम्बर मिले हैं, अगले हफ्ते उसे हिंदी में समाचार बोलने हैं स्कूल की असेम्बली में. उन्हें साथ वाले घर में हो रही शादी में जाना था, जल्दी ही लौट आए वे. वहाँ का प्रबंध बहुत अच्छा था, न ज्यादा शोर न भीड़भाड़, दुल्हन बहुत छोटी लग रही थी बहुत सुंदर. कल उसका फैब्रिक पेंटिंग का काम पूर्ण हो गया, आज दोपहर को पहले पत्रिका पढ़ेगी, फिर न्यूजट्रैक का कैसेट देखेगी फिर थर्मोकोल पर काम शुरू करेगी वह. कल शाम जून ने बहुत दिनों के बाद कहा कि वह हरी साड़ी में अच्छी लग रही थी, उन्हें शिकायत थी कि वह सिर्फ कहीं जाने के लिए ही क्यों तैयार होती है, इसका अर्थ हुआ कि वह उसकी पोशाक आदि पर नजर रखते हैं.

“आदमी अगर जिन्दा रहे तो उसे सौ साल बाद भी खुशी मिल सकती है”, अभी-अभी बाल्मीकि रामायण में हनुमान के मिलने पर सीता के मुख से यह वाक्य पढा. यह बिलकुल ठीक है, हम थोड़ी सी परेशानी होने पर जीवन को व्यर्थ मानने लगते हैं लेकिन कहीं न कहीं खुशी होती है, जो हमें मिलने वाली है. जैसे आज वे खुश हैं, कल उसने गाजर का हलवा बनाया, लाल गाजरें यहाँ नहीं मिलती, नारंगी रंग का हलवा कुछ अलग सा लगता है. उन्होंने किचन में पेंट करवाया था, नई नैनी ने सूखने की प्रतीक्षा लिए बिना पानी डाल दिया, सारा पेंट उतर गया पर..अब इसे कुछ कहने से क्या लाभ. नन्हे के स्कूल जाना है, जून ने फोन पर कहा था, उसको क्लास कैप्टन ने कल मारा था, शाम को वह थोड़ा उदास था, पर सुबह बिलकुल ठीक था. फरवरी का आरम्भ हो गया है, आदर्श महीना है, न सर्दी न गर्मी..यानि वसंत का महीना. कल उसकी पड़ोसिन ने गुलाब की एक कटिंग दी, पीला, लाल व नारंगी रंग का मिलाजुला रंग है उसका, माली ने शाम को लगा दी थी, इस मौसम में तो शायद ही खिले लेकिन अगले मौसम में जरूर फूल आयेगा. कल की तरह आज भी उसने साड़ी पहनी है, अच्छा लगता है हल्का-हल्का, खुला-खुला सा. जून को पसंद भी है, और उन्हें क्या पसंद है क्या नहीं इसका तो ख्याल उसे रखना है न...और इससे उसे खुशी मिलती है, और खुशी इंसान की पहली जरूरत है.

आज नैनी जल्दी आ गयी है, खाना भी बन गया है, इसका अर्थ गाड़ी पटरी पर आ रही है, पिछले दिनों ग्यारह बज जाते थे और काम बिखरा रह जाता था. कल वे स्कूल गए थे, नन्हे की क्लास टीचर और साइंस टीचर से मिले. आज सुबह नन्हा बहुत अच्छे मूड में था, खिला- खिला और ताजा सा. टेप रिकार्डर पर ‘मिली’ फिल्म का गाना आ रहा है, छोटे भाई का उपहार उनकी शादी की सालगिरह पर. कल भी परसों की तरह उसने साइकिल चलाई, बहुत अच्छा लगता है हवा को काटते हुए गति से आगे बढ़ना. लगभग दस सालों के बाद वह साइकिल चला रही है. कितना अजीब लगता है सोचकर कि बचपन कितना पीछे छूट गया है. याद करो तो लगता है कल की ही तो बात है. नन्हा कल पिछले या उससे पिछले साल की गर्मियों को याद कर रहा था कि कैसे एक आम के लिए वह गुस्सा कर रही थी, फिर जून और भी नाराज हो गए थे, उसकी याददाश्त बहुत तेज है. उसे कहानी सुनाने की प्रतियोगिता में द्वितीय पुरस्कार मिला, उदास था कि प्रथम क्यों नहीं मिला.





Thursday, July 19, 2012

मुस्कुराहट कायम है



मौसम ने फिर करवट ली है. कल दोपहर बाद से वर्षा आरम्भ हुई जो आज सुबह भी हो रही थी, शाम को कुछ देर के लिए थमी, वे घूमने गए, सामने वाली उड़िया पड़ोसिन ने उसका गुलाबी सूट अच्छा सिला है, वही पहना था. नन्हा नींद में कोई स्वप्न देख कर शायद डर गया था, रोने लगा वह स्नानघर में थी. फिर सो गया. आज उसने टाटा भी किया और फूल भी बोला, और भी कई शब्दों की नकल करता है कभी-कभी जैसे दादा, नाना, मामा. पापा अभी नहीं बोल पता. माँ के पत्र का जवाब उसने दे दिया है, जैसे इतने दिन बीत गए वैसे कुछ दिन और हैं उनके आने में. परसों उन्होंने नन्हें के जन्मदिन के लिये मेहमानों की सूची बनायी और मीनू भी. जून कहते हैं उसे स्टेशन नहीं जाना चाहिए पता नहीं गाड़ी कितनी लेट हो. आज कल आम बहुत सस्ते हैं वे रोज ही लाते हैं.

उसने लिखा, “न तो वह, वह है जो होना चाहती है और न ही वह जो वह वास्तव में है. एक मिश्रण है इन दोनों का, मिलावट जो आजकल हर शै में है, उसमें भी है शायद औरों में भी हो पर इस वक्त बात सिर्फ उसकी हो रही है”. जीवन चाहे कैसा भी हो मुस्कुराने की गुंजाइश तो हमेशा ही रहती है. कल छोटी ननद का पत्र आया था, वह बीए प्रथम वर्ष में दाखिला ले रही है. कभी वे भी थे विद्यार्थी, भला था वह जीवन.. लिखते-लिखते उसकी नजर सोनू पर गयी जो मस्ती से बिछौने पर खेल रहा था.