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Thursday, November 13, 2014

नाटक की रिहर्सल


आज उनके नाटक की ड्रेस रिहर्सल है, बाबाजी आ चुके हैं पर नैनी अपने जीवन की व्यथा सुना रही है. उसके पास कहानियों एक नहीं अनेक हैं, अपने लम्बे-चौड़े भूतपूर्व परिवार की कहानियाँ, उसके पति ने दूसरी शादी कर ली तो वह अपने तीन बच्चों को लेकर घर छोड़कर आ गयी, बर्तन मांजकर गुजारा करने लगी. यह कई साल पहले की बात है फिर उसके पति की दुखद मौत हुई. देवर-जेठ सभी समर्थ थे पर किसी ने सहारा नहीं दिया यहाँ तक कि जायज हक भी नहीं दिया. ननदें भी अचछे घरों में ब्याही हैं, उनके बच्चे भी पढ़लिख रहे हैं पर इसके बच्चे बिन पढ़े ही रह गये अब तो बेटियों की शादियाँ हो गयी हैं. बेटा भी काम तलाश रहा है, कभी मिल जाता है कभी नहीं मिलता. आज भी सर्दी ने उसे परेशान किया हुआ है, विश्वास पूर्ण हृदय ले ईश्वर से शक्ति के लिए प्रार्थना की ताकि आज और कल अपने कर्त्तव्य का पालन कर सके. इतना विश्वास तब तो नहीं होता जब वह स्वस्थ होती है. कबीरदास ने सच ही कहा है- दुःख में सुमिरन सब करे, सुख में करे न कोई.. जून आज सुबह समझा कर गये हैं कि वह अपना ख्याल रखे. वह उसका बेहद ख्याल रखते हैं, कल उसके साथ उन्होंने ‘संघर्ष’ फिल्म देखी. फिर वह क्लब गयी. मौसम आजकल ठीकठाक है, न बेहद वर्षा न बेहद गर्मी.

आज शनिवार है, शाम को नाटक है, स्वास्थ्य पूरी तरह तो नहीं सुधरा है पर शेष पात्रों को आभास तक नहीं हुआ सो स्पष्ट है कि आवाज और अभिनय पर पकड़ पूर्ववत् ही है. कल क्लब में तीन घंटे से भी ज्यादा वक्त लग गया, आज भी तीन-चार घंटे तो देने ही होंगे. जून और नन्हे को उसकी अनुपस्थिति का धीरे-धीरे अभ्यास हो रहा है. आज मौसम अच्छा है रात भर वर्षा होती रही. पहले-पहल नींद कुछ अस्त-व्यस्त सी रही पर बाद में आ गयी. काफी देर तक नाटक के संवाद बिन बुलाये मेहमान की तरह चक्कर लगते रहे. स्वप्न में वह घंटों नेपाल के राजा से बातें करती रही, उनके राज्य में विद्रोह करने वाले नेताओं, क्रांतिकारियों से भी मिली. जून ने कल पिता से बात की, उनके घर में नये मालिक आ गये हैं, अब वह उनका कहाँ रहा ?

आज गोयनकाजी ने महावीर स्वामी और गुरुनानक का उदहारण देते हुए विपासना का महत्व समझाया. महावीर ने कहा है, जो भीतर है वही बाहर है और जो बाहर है वही भीतर है. बाहर की सच्चाई को बुद्धि के स्तर पर समझा जा सकता है पर भीतर के सत्य को अनुभूति के स्तर पर ही समझना होगा. नानक ने कहा है, “थापिया न जाई, कीता न होई, आपे आप निरंजन सोई” भीतर की सच्चाई को देखने के लिए कुछ आरोपित नहीं करना है न ही कुछ करना है, जो अपने आप है वही हरि है !  कबीर ने भी इस प्रश्न के उत्तर में, कि हरि कैसा है ? कहा, जब जैसा तब वैसा रे...जिस क्षण हमारे अंतर की स्थिति जैसी होगी हरि उस क्षण वैसा ही होगा. प्रतिपल अंतर को साक्षी भाव से देखते  रहना ही विपासना है. यदि मन में विकार भी जगा है तो उसे देखना है कि उसके प्रति कैसी संवेदना जगी है. उस संवेदना के मूल का ज्ञान होने से वह स्वतः ही नष्ट हो जाती है और ऐसे धीरे-धीरे विकार जड़ से दूर होते हैं, दमन करने से जड़ भीतर ही रह जाती है और वह विकार पुनः-पुनः सर उठाते हैं. उसे यह सब सुनना अच्छा लगता है, लगता है  अपनी विचार शक्ति को जितना ऊंचा बनाएगी उतना ही जीवन उन्नत होगा. वह कहाँ है और क्या करती है यह उतना महत्व नहीं रखता जितना कि उसका मन कहाँ है और वह कैसी भावना से कर्म करती है, इसका महत्व है.



Wednesday, November 12, 2014

सोलर कुकर का मॉडल


जब चित्त में संसार का कोई भी ख्याल नहीं उठता है तब मन ठहर जाता है, भीतर परम मौन उभरता है और उसी शांति में परमात्मा की झलक दिखाई देती है. ध्यान करते करते जब प्राणायाम की विधि, मन्त्रजप व सारी चेष्टाएँ अपने आप छूट जाएँ तभी ऐसी स्थिति आती है ! जितना सच्चाई भरा व्यवहार होगा उतना अंतःकरण शुद्ध होगा और उतना ही ध्यान टिकेगा, मन में कोई उहापोह न हो कोई द्वेष की भावना न हो, अपने प्रति व दूसरों के प्रति ईमानदार रहें, ईश्वरीय आदर्शों की और जाने की आकांक्षा हो तो जीवन में सहजता आने लगेगी. आज सुबह जो सुना था उसमें से ये बातें उसे याद रह गयी हैं. अभी-अभी छोटी बहन से बात की, कह रही थी सभी को उसकी फ़िक्र है जानकर अच्छा लगा. कल रात को वर्षा हुई सो धूप तो अब नहीं है पर उमस बरकरार है. नन्हा स्कूल से आया तो वह रिहर्सल पर चली गयी वापस आयी तो नन्हा और जून दोनों अपना-अपना कम कर रहे थे. जून का मूड कुछ देर के लिए जरूर बिगड़ा पर उन्होंने अपने को फिर संयत कर लिया. वह चाहे कितनी देर बाहर रहें पर उसका बाहर रहना उन्हें खलता है, इसके पीछे क्या है यह तो वही जानते हैं. दीदी को मेल लिखे चार दिन हो गये हैं पर भेज नहीं पा रही है, जून से कहेगी ऑफिस से ही भेज दें, उन्हें प्रतीक्षा होगी. कल बंगाली सखी का जवाब भी आ गया अभी तक पढ़ा नहीं है.

उसके गले में दर्द है, पिछले दिनों ठंडा पेय पीया, शायद इसी कारण. शनिवार को नाटक है तब तक सभी को सेहत ठीकठाक रखनी है. आज से ठंडा पानी पीना बंद. जब वे स्वस्थ होते हैं तो देह की तरफ ध्यान भी जाता, अस्वस्थता जितनी विवश कर देती है पर बाबाजी के अनुयायियों को विवश होने की क्या आवश्यकता है, वह देह नहीं है, न ही मन या बुद्धि, बल्कि मुक्त, पवित्र, शुद्ध आत्मा है, इन छोटे-छोटे या बड़े भी दुखों का उस पर कोई असर नहीं पड़ने वाला. कल दोपहर बाद तेज वर्षा हुई, बिजली भी चली गयी, उन्होंने अँधेरे में ही भोजन बनाने की तैयारी की तो पता चला अँधेरे में उनके रसोईघर में किन्हीं और प्राणियों का राज है. नन्हे ने कितनों को भगाया, आज नैनी पूरा किचन धो-पोंछकर साफ कर रही है. उसका काम बढ़ गया है, सो उसने कपड़े धोने के लिए मशीन लगाने का निश्चय किया. वाजपेयी जी के घुटने का सफल आपरेशन हो गया है, ईश्वर उन्हें दीर्घायु दे, देश को चलाने का जो बीड़ा उन्होंने उठाया है उसे पूरा कर सकें, पाकिस्तान के साथ समझौता करने में सफल हों ! आज नन्हा प्रोजेक्ट के लिए बनाया ‘सोलर कुकर’ ले गया है.

“ईश्वर का स्मरण करने से अहम् विसर्जित होता जाता है, राग-द्वेष संसार की चर्चा करने से होता है लेकिन ईश्वरीय चर्चा यदि मन में चलती रहे तो ये नष्ट हो जाते हैं तथा मानसिक दुःख से भी निवृत्ति होती है, एहिक सुखों और सुविधाओं में डूबा हुआ मन विपत्ति आने पर तिलमिला उठता है किन्तु ईश्वरीय भाव में युक्त मन चट्टान की तरह दृढ़ होता है, छोटे-मोटे दुःख वह साक्षी भाव से सहता है ऐसे ही सुख भी उसे प्रभावित नहीं करता वह शांत भाव से नश्वर सुख-दुःख को सहता है. ईश्वर असीम बल से परिपूर्ण करता है, क्योंकि वह पूर्णकाम है, कुछ पाना उसे शेष नहीं है. जितना सुखद जीवन है, उतनी ही सुखद मृत्यु भी है. मृत्यु एक पड़ाव है, नये सफर पर जाने से पहले की विश्रांति है. कर्मों का फल हर किसी को भुगतना पड़ता है. नये कर्म करने की आकांक्षा न रहे और पुराने कर्मों के बंधन काटते चलें तो मुक्त कहे जा सकते हैं”. आज बाबाजी ने उपरोक्त विचार कहे. यह बिलकुल सही बात है और उसे कई बार इसका अनुभव भी हुआ है जब वह ईश्वरीय विचार से दूर चली जाती है स्फूर्ति का अनुभव नहीं करती. सत्कर्म करने के लिए सद्प्रेरणा और सद्गुण उसे उन आदर्शों का सदा स्मरण रखने से ही मिल सकती है. संसार नीचे गिराता है और मन नीचे के केन्द्रों में जाकर तामसिक वृत्ति धारण कर लेता है. सात्विक भाव बने रहें इसके लिए प्रतिपल सजग रहना होगा. ईश्वर की अखंड अचल मूर्ति सदा सर्वदा आँखों के सम्मुख रखनी होगी जो प्रेरित करती रहे. उन का बल, शक्ति और आशर्वाद मिलता रहे, उनका स्नेह मिलता रहे और वह तभी सम्भव होगा जब वह उन्हें दिल से चाहेगी !


Thursday, February 20, 2014

एड़ी का घाव


पता नहीं कैसे उसे कल या परसों याद नहीं आया कि मीटिंग की तैयारी के लिए दो जनों को फोन करने हैं. आज सुबह नाश्ता करते समय अचानक मन में खटका हुआ और नतीजा यह कि पहले ने शिकायत की, एक दिन पहले बोल देने से उसे सुविधा होती है. शिकायत कैसे सुन लेता मन, झट प्रतिक्रिया की कल भी फोन किया था. बाद में स्मरण आया अपनी आत्मा पर एक धब्बा और लगा लिया जिसे छुड़ाने के लिए न जाने कितने जन्म और लेने पड़ेंगे. सेक्रेटरी हर बार एक से अधिक बार फोन करके याद दिलाती हैं इस बार उन्होंने भी याद नहीं दिलाया. अभी कुछ देर पहले ही वह क्लब से आ रही है, हॉल बिलकुल गंदा पड़ा था, पर उस व्यक्ति ने बताया शाम तक हो जायेगा. वह साइकिल से गयी थी, खोलते समय उसका लाक टूट गया, अनाड़ी है वह जिन्दगी के खेल में अभी.

आज शाम से skit की रिहर्सल शुरू होनी है, कल की मीटिंग अच्छी रही, पर व्यर्थ में ही बहुत समय लग गया. डॉ बरुआ ने महिला स्वास्थ्य पर एक लेक्चर दिया, HRT के बारे में बताया यहाँ के अस्पताल में भी इसकी सुविधा है उसे जानकर आश्चर्य हुआ. वह लौटी तो जून का चेहरा उतरा हुआ था, उसने सोचा यदि रोज-रोज जाना पड़े तो क्या होगा..खैर..जो होना है वह होगा ही. नन्हे की पढ़ाई आजकल जोर-शोर से चल रही है. उसे ‘ऊर्जा संरक्षण’ पर आयोजित चित्रकला प्रतियोगिता में भाग लेना है.

शाम हो गयी है, पिता कैसेट सुन रहे हैं, माँ किताब पढ़ रही हैं. वह एक क्षण भी खाली नहीं बैठ सकतीं. उसके और जून के लिए स्वेटर बना दिए हैं, उनके जाने में केवल दस दिन शेष रह गये हैं. उसने सोचा अब तक तो उन सभी को एक-दूसरे के साथ रहने का अभ्यास हो गया है. कितना कुछ मिल रहा है उनके साथ से, और वे उन्हें क्या दे रहे हैं बस थोड़ा सा स्नेह और सम्मान ! उसने सोचा वह भी स्वेटर के कुछ डिजाइन सीखेगी. आज सुबह राग आसावरी पर आधारित एक गीत का अभ्यास किया, अभ्यास ठीक ही रहा पर अभी तक सुर सधे नहीं हैं. पता नहीं वे लोग कैसे होंगे जो पूरी तरह अपने कार्य से संतुष्ट होने का सुख अनुभव कर पाते होंगे, उसके जीवन में एक पल तो ऐसा आये जब अपने कार्यों से पूरी तरह संतुष्ट हो पाए.

हवाई जहाज का तेज शोर ! आज बहुत दिनों बाद घर के ऊपर से उडकर कोई प्लेन गया है. कल से बसंत का मौसम शुरू हो गया है. जून के एक मित्र ने माँ-पापा को भोजन पर बुलाया है, पर पिता का कहना है कि वे लोग तो चले जायेंगे फिर ये लोग कहाँ मिलेंगे और उनके खिलाये अन्न का ऋण लेकर वह जाना नहीं चाहते, उनका ऋण कोई और चुका देगा इसका उन्हें विश्वास नहीं है, न ही वे इतनी निकटता किसी के साथ महसूस करते हैं. जल में रहकर जैसे कमल उसमें लिप्त नहीं होता उसी तरह अपने परिवार से भी वह लिप्त नहीं हैं. यही उनकी शांति का सबसे बड़ा कारण है.

आज सुबह नैनी के बेटे को एक कुत्ते ने बुरी तरह से काट लिया. इतनी बुरी तरह से किसी जानवर का काट खाना उसने पहली बार देखा है, खून से लथपथ एड़ी और घाव के गहरे निशान, वह बुरी तरह से चिल्लाया, सोच कर भी कंपकंपी होती है कि...ईश्वर ने साथ दिया जून फोन पर मिल गये और समय पर अस्पताल ले जा सके. उसका मन देर तक सामान्य नहीं हो पाया, भूख भी जैसा गायब हो गयी. और नैनी पर क्या बीत रही होगी, वह अंदाजा लगा सकती है, हँसता-खेलता बच्चा घर में बंद होकर रह गया है.