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Monday, March 30, 2015

चित्रों की प्रदर्शनी


आज बाबाजी अपने विट्ठल को याद करते-करते भाव समाधि में प्रविष्ट हो गये हैं, और उन्हें इस तरह परम आनंद में मगन देखकर हजारों की भीड़ भी भाव विभोर हो गयी है. परम भाग्य होता है तभी संत या सद्गुरु मिलते हैं और उनकी कद्र हृदय जानता है. वास्तव में सद्गुरु क्या है ? कौन है ? कोई नहीं जान पाता. उनकी कृपा का एक अंश ही मिल जाये तो कल्याण हो जाता है लेकिन उसे पाने के लिए अहम् को पूरी तरह नष्ट करना होगा. जहाँ प्रेम होता है वहाँ परमात्मा तत्क्षण जवाब देते हैं, हृदय के सच्चे प्रेम को वह अस्वीकार नहीं कर पाते और धीरे-धीरे भक्त के हृदय से अहंकार नष्ट होने लगता है. कल शाम वह सत्संग में गयी, बाद में भोजन का भी इंतजाम था, पर चना-पूरी खाने की जरा भी इच्छा नहीं थी सो वह लौट आयी. कल सुबह दोनों ननदों को पत्र लिखे, अब यह प्रतीक्षा नहीं करनी है कि उनका जवाब भी आये और ऊपर से यह भी कि वह उसके अनुकूल हो, यह तो अहंकार को पोषने वाली बात होगी. आज सुबह वे उठे तो देखा नन्हा रात को कम्प्यूटर चलाकर बिना मच्छरदानी लगाये, बत्ती जलाये ही सो रहा था. दूध भी ऐसे ही पड़ा था. शायद वह सोने नहीं गया था नींद ने उसे घेरे में ले लिया. कल उसकी किताबें भी दिल्ली से आ गयीं. इस वर्ष कोचिंग के कारण उसे नूना से पढ़ने की जरूरत नहीं है, यानि उसे साधना के लिए समय मिलेगा. आत्मिक बल बढ़ेगा, सहनशीलता बढ़ेगी, उपेक्षा जगेगी, अपेक्षा कमेगी !

आज सुबह चार बजे उठी, वातावरण में निस्तब्धता छायी थी. ढेर सारे अमरूद गिरे हुए थे. पका हुआ फल स्वयं ही झर जाता है ऐसे ही परिपक्व मन स्वयं ही झुक जाता है, अपरिपक्व मन हठी होता है. आज नन्हा स्कूल नहीं गया है. कल बड़ी ननद की राखी मिली, पत्र भी नहीं है और जल्दी में भेजी गयी लगती है. ईश्वर ही सबका रखवाला है और वही तो अपनों के माध्यम से सबकी सहायता करवाता है. कल एक सखी के यहाँ गये वे, उसके पतिदेव का जन्मदिन था. उसकी सासूजी से बातें किन. वह इस उमर में भी काफी संयत लगती हैं. एक सुसंस्कृत महिला..वह भी वृद्धावस्था में ऐसी ही रहेगी. सजग अपने स्वास्थ्य के प्रति था अपने व्यवहार, अपनी बातों के प्रति भी.

मन पुनः उद्ग्विन हुआ. कारण वही है इच्छा’. कल शाम वे कला प्रदर्शनी देखने गये. मन ललक उठा कि इनमें से एक तो उनके घर की शोभा बढ़ाए. जून को येन, केन, प्रकारेण मनाया कि वे एक पेंटिंग खरीदेंगे. लेकिन आज सुबह विचार आया कि अभी तक वस्तुओं के प्रति आकर्षण कम तो नहीं ही हुआ है सो मुक्त कैसे होगा मन ? जून को जैसे ही कहा कि इतना जरूरी नहीं है कि पेंटिंग ली ही जाये लेकिन जैसे ही ये शब्द कहे, मन ने फिर एक दांव फेंका कि छोटी ही ले ली जाये. यानि आकर्षण इतना प्रबल था कि..मन को समझना बहुत मुश्किल है. पर उसे उस पर नजर रखनी ही है. जून ने जब ऐसा कुछ कहा जो उसे पसंद नहीं था तो उसे भी समझाने लगी. नैनी देर से आयी तो उस पर भी झुंझलाई. अर्थात मन पर नियन्त्रण नहीं था. प्रेय और श्रेय दो प्रकार के कर्म होते हैं. जो कार्य तत्पल सुख दें वे प्रेय है लेकिन भक्त को, साधक को तो श्रेय का मार्ग अपनाना होगा. पहले तो उसे यह निर्णय कर लेना चाहिए कि वह एक सांसारिक व्यक्ति है अथवा एक साधिका, यदि साधिका है तो उसे सजग रहना ही होगा. किसी के दोष देखना बंद करना होगा औरों को सुधारने से पूर्व अपने अंदर की हजारों कमियों को दूर करना होगा. व्यर्थ का चिन्तन, व्यर्थ की वाणी और व्यर्थ के कार्यों से भी स्वयं को दूर करना होगा, और ऐसा करना ही अंतत सुख का कारण होगा. क्षणिक सुख का नहीं ऐसा सुख जो बाद में पछतावे का कारण बने. श्रेयस कार्यों को करने के बाद पछताना नहीं पड़ता. परम लक्ष्य को प्राप्त करना ही उसका ध्येय होना चाहिए. सदा उसके सम्मुख आदर्श रहे, क्योंकि मन को तृप्त करना वैसा ही है जैसे अग्नि को ईंधन देना, मन को तृप्त करते करते वे चुक जायेंगे पर इसे तृप्त नहीं कर सकते जबकि ईश्वर को पाने की इच्छा ही अपने आप में शांतिदायक है. यह प्रारम्भ में, मध्य में और अंत में भी सुखद है ! यह मुक्त करती है जैसे वह परमात्मा मुक्त है, हर तरफ व्याप्त  ऐसे ही वह उन्हें बनाना चाहता है पर वे हैं कि देह के घेरे से बाहर आना ही नहीं चाहते !     



Monday, July 14, 2014

विज्ञान प्रदर्शनी की रौनक


जून को सम्भवतः सोमवार को मुम्बई जाना पड़े, एक सप्ताह नन्हा और उसे अकेले रहना पड़ेगा, अपने स्वार्थ के कारण नूना ने कहा, भगवान करे ट्रिप कैंसिल हो जाये पर अब वह ऐसा नहीं चाहती यदि जून का जाना आवश्यक है, कम्पनी का लाभ है तो उन्हें वहाँ अवश्य जाना चाहिए.

जून कल चले गये, कल रात उनका फोन काफी देर से आया, वह कुछ देर पूर्व ही सोयी थी, पर नींद गहरी नहीं थी, जून के बिना पहली रात को ऐसा ही होता है, बाहर का गेट, गैराज का गेट और बरामदे का गेट बंद करके भीतर आकर दरवाजा बंद करते करते एक ख्याल कहीं न कहीं से आ जाता है सब ताले ठीक से लग गये न. नन्हा आज स्कूल से देर से आने वाला है, उसके पास आठ घंटे हैं जिन्हें उसे व्यवस्थित ढंग से बिताना है. मौसम ठंडा है, गर्मियों में ऐसा मौसम रहे तो गर्मी का अहसास ही नहीं होता. कल शाम वह अकेले टहलने गयी. जून के न रहने से इस बार उसे उदासी का ज्यादा अहसास हो रहा है, ज्यों-ज्यों उनका साथ बढ़ता जा रहा है, निकटता भी बढ़ रही है, उनका एकनिष्ठ स्नेह नूना को अंदर तक भिगो गया है. she loves him and misses him ! लेकिन वह उदास नहीं है, साधक कभी उदास नहीं होता, उसे अपनी भावनाओं को उचित दिशा देनी होगी, ढेर सारे काम भी हैं. पत्र लिखने हैं, सिलाई करनी है और दोपहर को संगीत क्लास में भी जाना है.

कल शाम उसने नन्हे के स्कूल में बितायी, बच्चे बड़े उत्साह से अपने-अपने प्रोजेक्ट के बारे में बता रहे थे. नन्हा भी खुश था. सुबह एक सखी से बात हुई, वह अपने पुत्र के भविष्य की बारे में उसी तरह चिंतित थी जैसे जून के एक मित्र अपने पुत्र के भविष्य के बारे में, लेकिन उसे नन्हे के भविष्य के बारे में चिंता करने की आवश्यकता महसूस नहीं होती न ही जून को. उसे समझाना, रास्ता दिखाना उनका काम है लेकिन वह कौन सा रास्ता चुनेगा यह समय स्वयं बतायेगा. आज उन्हें दो मित्रों के यहाँ जन्मदिन और विवाह की वर्षगाँठ के लिए जाना है. दोनों के यहाँ से निमन्त्रण आया है, इसके अलावा तीन और सखियों से बात हुई, एक महिला ने फोन पर पूछा उनके यहाँ सफाई कर्मचारी आया या नहीं, फिर स्कूल की एक टीचर से बात हुई, स्कूल बंद हो गया है.. नन्हे के स्कूल की हेड मिस्ट्रेस  से कल कुछ पल बात हुई. उसे लगा, इन सब बातों को अगर ध्यान से देखें, परखें तो पता चलता है मूलतः सभी इन्सान एक हैं, सभी के कुछ आदर्श हैं, कुछ इच्छाएं हैं, कुछ सपने हैं और सभी उस पूर्णता की तलाश में हैं, जिसे पाने के बाद कुछ पाना शेष नहीं रहता, जिसे जानने के बाद कुछ जानना शेष नहीं रहता !


एक सुहानी सुबह ! वर्षा रुक गयी है और अपना सुखद प्रभाव सब ओर छोड़ गयी है. सब कुछ धुला-धुला और शीतल प्रतीत हो रहा है. पंछी नहा धोकर चहक रहे हैं. नन्हा स्कूल गया तो वह कुछ देर बगीचे में ही टहलती रही. कल वे दोनों जगह गये, दोनों जगह सखियाँ थकी हुई लगीं, जबकि वह भीतर तक तरोताजा महसूस कर रही थी. जून का फोन आया था, इस बार वह ढेर सारे उपहार लाने वाले हैं. पिछले दिनों उसने एक किताब पढ़ी “speed post” जो बहुत रोचक और ज्ञान वर्धक भी है. लेखिका एक संवेदनशील, समझदार और वात्सल्यमयी माँ है, उनके लिखने का तरीका और सोच भी उसे अच्छी लगी. आज जागरण में भूत-प्रेतों के बाद गन्धर्वों के अस्तित्त्व के बारे में बताया जा रहा है, उसे इन सब बातों में विश्वास नहीं है, उसे लगता है मनुष्यों को ज्यादा प्रैक्टिकल होना चाहिए और जमीनी हकीकत से जुड़ा रहना चाहिए. मनुष्येतर जीवों के बारे में जानकर या देवों की पूजा करके वे महान नहीं बन सकते. उसने टीवी ही बंद कर दिया और सोचा कि उसे दिन भर में किये जाने वाले कार्यों की एक सूची ही बना लेनी चाहिए लिखित नहीं तो मानसिक रूप से ही सही. जिस भाव के साथ उसने यह पेज खोला था वह न जाने कहाँ चला गया है, भाव भी असम के मौसम की तरह हैं पल में धूप तो पल में वर्षा, जैसे कल शाम हुआ.

Friday, September 27, 2013

कश्मीरी शालें


कल सुबह एक छोटा सा झूठ बेवजह ही बोल दिया, चाहे कितना ही निर्दोष क्यों न हो, झूठ तो झूठ ही है. आत्मा पर एक दाग लगा ही जाता है. जाने कितने दाग लग चुके हैं चादर पर. दास कबीरा ने जतन से ओढ़ी थी चदरिया, पर उसने तो हर दिन उसे मैला ही किया है और साफ करने की आदत भी भूलती जा रही है. कल एक पुस्तक लायी है लेकिन पोथी पढ़ पढ़ जग मुआ..... मन का बैर तो ढाई आखर पढ़ने से ही मिलेगा न, और वे ढाई आखर भी कभी धुंधला जाते हैं. आज नन्हे को असेम्बली में एक कहानी पढ़नी है और उम्मीद है कि वह अपनी स्पष्ट आवाज में पढ़ पायेगा. इस समय सुबह के दस बजे हैं, काम लगभग हो गया है, पर मन है कि टिक ही नहीं रहा है, इतनी सी देर में सिन्धवा जाकर ब्रज, सुमन, शिव और रुकमणी से भी मिल आया है.

आज भूतपूर्व प्रधान मंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी जी का जन्मदिन है, सुबह के समाचारों में इसका जिक्र होना चाहिए था. नन्हे को आज फिर असेम्बली में समाचार बोलने हैं स्कूल में. कल उसकी कहानी ठीक रही. सभी ने उसकी तारीफ़ की, उसे पुरस्कार भी मिल सकता है . बच्चों के भोलेपन पर रश्क आता है, उनकी निर्दोष बातें बड़ों के दुराव-छिपाव के आगे कितनी बड़ी लगती हैं. नन्हा अपनी कई बातों से कई बार कितना कुछ सिखा जाता है. आज नूना को हिंदी कक्षा में जाना है वापसी में प्रदर्शनी देखते हुए आएगी, कश्मीरी सामानों की प्रदर्शनी आई है. आजकल फोन से सबसे बात हो जाती है, उसके पत्र लिखने कम हो गये हैं. कल वह नई परिचिता आई थी, उसकी बातों से लगा कि वह अपने पति से पूरी तरह जुड़ नहीं पा रही है. वह अपना व्यक्तित्व बनाये रखना चाहती है, एक अलग पहचान, सिर्फ किसी की पत्नी बन कर जीना उसे मंजूर नहीं. पर सही मायनों में एक होने के लिए दोनों को अपना-अपना अहम् छोडकर एक-दूसरे के सुख-दुःख को स्वयं महसूस करना होगा.

दोपहर का वक्त है, दूर से एक पक्षी की आवाज निस्तब्धता को भंग कर रही है, अभी-अभी वह पिता की फरमाइश पर शाम के नाश्ते के लिए कस्टर्ड बनाकर आई है. जून दफ्तर से आते समय लाये थे, माँ-बाप जब वृद्ध हो जाते हैं तो बच्चे उनका बच्चों की तरह ख्याल रखते हैं. सही कहा है कवि ने child is the father of man. वे दोनों(माँ-पिता) सो रहे हैं, बस तीन दिन और रह गये  हैं उनके प्रवास के. वह पिता के लिए एक टोपी बना रही है. आज माली ने डायन्थस व फ्लौक्स के पौधे लगा दिए.