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Tuesday, August 25, 2015

पॉवर ऑफ़ नाउ


परसों वह दोपहर बारह बजे एयरपोर्ट गयी, चार बजे लौटी, नन्हा खुश था, सामान काफी लाया है, ढेर सारे कपड़े कल धोये, प्रेस किये. उस दिन शाम को पौने छह बजे ही उत्सव स्थल पर पहुंच गयी, बच्चे पहले ही आ चुके थे. कार्यक्रम ठीकठाक हो गया, एक सखी ने रंगोली बनाई थी, सभी का सहयोग रहा, साढ़े नौ बज गये वापस आते. कल दिन भर कपड़े ठीक करने तथा मेहमानों( जो नन्हे से मिलने आये थे ) की देख-रेख में ही लग गया आज सुबह जल्दी उठ गयी, नन्हा दस बजे उठा, रात को तीन बजे वह सोया, उसे समझाना व्यर्थ है, भगवान भी शायद उसे नहीं समझा सकते. भगवान ने बन्दों को पूरी आजादी है, जैसे चाहें वे निर्णय लें, लेकिन उसका फल भुगतने को भी तैयार रहें. इस समय दो बजे हैं, अभी दो छात्राएं पढ़ने आएँगी, दोपहर के भोजन के बाद कुछ देर सो गयी, अभी भी तमस छाया है, पर काम में जुट जाओ तो सब चला जाता है. जीवन में एक लक्ष्य हो, ज्ञान हो तो ऊर्जा भीतर से मिलने लगती है.

जून कल आ रहे हैं, कल सुबह ही फोन करेंगे, कल ‘पटाया’ से उन्होंने बताया. नन्हे ने कम्प्यूटर में कुछ फेरबदल कर दी है, सुबह से ही उसे ठीक करने में लगा है. उसकी सुबह ग्यारह बजे शुरू होती है जैसे उसकी रात दो बजे शुरू होती है. पता नहीं आज की पीढ़ी को क्या हो गया है. वे निरे व्यक्तिवादी होते जा रहे हैं, अकेले पड़ जायेंगे वे इस तरह. वह कहता है कि कोई अच्छा दोस्त नहीं है, शायद लगाता है एकाध नाम के आगे, शायद यह उम्र ही ऐसी है, इस साल वह बीस का हो जायेगा. वह भी जब बीस की थी अब से कितनी अलग थी. जीवन उन्हें कई पाठ पढ़ाता है और उम्र के साथ वे परिपक्व होते जाते हैं. कल शाम लाइब्रेरी से दो किताबें लायी है, पॉवर ऑफ़ नाओ तथा टिप्स फॉर 366 डेज, दोनों अच्छी हैं. किताबें सच्ची मित्र हैं, कितना साथ देती हैं वे हर परिस्थिति में. सुबह गुरूजी को सुना, एक ने पूछा कि क्या वे सूक्ष्म शरीर से साधक के साथ रहते हैं और उनका id भी माँगा. दोनों ही सवालों के जवाब उन्होंने गोल-मोल दिए, पहले में कहा कि आप क्या मानते हैं, यदि संशय है तो भ्रम है, यदि विश्वास है तो सत्य है अर्थात यह साधक के मानने पर निर्भर करता है कि गुरू उसके साथ हैं, और दूसरे में कहा कि उनकी आईज डिवाइन हैं, यह उनका id है, अर्थात वे ईमेल का जवाब नहीं देते. उनके पास जो रहते हैं, शायद वही उनसे अपने सवालों के जवाब पा सकते हैं, शेष तो सत्संग में सबके सम्मुख ही रहकर उनसे प्रश्न पूछ सकते हैं. उसे तो लगता है कि संतजनों के दर्शन मात्र से वे जितना पा सकते हैं उतना उनसे सवाल पूछकर भी नहीं, वे अपने जीवन के माध्यम से ही संदेश दे रहे हैं. गुरूजी ने कहा, मन तथा इन्द्रियां फ्रीक्वेंसी एनालाइजर हैं.   

आज एक सेल्समैन से घर बैठे मेजपोश अदि खरीदे. सभी का एक सा रवैया होता है कि किस तरह ग्राहक को अधिक से अधिक बुद्धू बनाया जाये. अब वह पहले कई बार बन चुकी है बुद्धू सो आज थोड़ा मोलभाव किया, पर आज भी कुछ तो कमाया ही होगा, घर-घर धूप में जाकर सामान बेचते हैं, शहर-शहर घूमते हैं, उन्हें भी कई तरीके आते हैं..खैर जो भी हो..वे भी तो उसी परमात्मा का एक रूप हैं, तो कौन किसे ठगेगा.? जून की फ्लाइट ढेढ़ घंटा लेट है. रात को एक बार नींद खुली, ढाई बजे थे, नन्हे को सोने के लिए कहा और स्वयं की नींद गायब, उसके पूर्व एक स्वप्न देखकर नींद खुली थी. कितना अजीब सा स्वप्न था, अचेतन मन में क्या-क्या छिपा रहता है, जिसके बारे में उन्होंने कभी सोचा भी नहीं होता. न जाने कितने जन्मों के संस्कार दबे हुए हैं. पॉवर ऑफ़ नाउ अब ज्यादा समझ में आ रही है. शुद्ध वर्तमान में केवल ईश्वर है और कुछ नहीं, आदमी जो होता है या तो भूत के कारण या भविष्य की कल्पनाओं के कारण. शुद्ध वर्तमान में मन रहता ही नहीं. जिस क्षण मन की आवश्यकता हो उसे ले आयें और शेष समय स्वयं में रहें.   

Thursday, January 31, 2013

प्रतीक्षा स्कूल बस की



कल जुलाई का प्रथम दिन था, नन्हे का नए स्कूल में प्रथम कक्षा में प्रथम दिन ! सारी सुबह उसी में व्यस्त रही वह, पहले उसे तैयार करने में फिर उसके स्कूल भी गए वे. नन्हा खुश था, स्कूल से आकर भी बहुत सी बातें बतायीं उसने. इस समय सुबह के साढ़े दस बजे हैं, उसका मन शांत नहीं है इस समय, कारण वही उसकी नैनी...लक्ष्मी प्रसंग..लेकिन अब लगता है कि उसे इनके मामलों में ज्यादा उलझना ही नहीं चाहिए. मुश्किल तो यह है कि उसका मन कठोर नहीं है, खैर..सब लिख देने से मन कुछ हल्का होगा.

ढूँढते ढूँढते उसकी आँखें थक गयी थी
बोझिल हो गए थे पैर
दिल एक सवाल की तरह हर श्वास से यही
पूछ रहा था
कहाँ ? किधर ? कब ? कौन ?
लेकिन कोई जवाब नहीं होता कुछ सवालों का...

उसे याद आया कल घर से पत्र आया है, पिताजी ने लिखा है..’वह उसके विचार और सुझाव पढ़कर आनन्दित हुए’. आज शाम को उनके यहाँ एक असमिया परिवार आने वाला है, उसकी सखी की बहन, जीजा जी, तथा माँ आए हुए हैं, यहाँ परिवार से इतने दूर रहने पर किसी के भी यहाँ मेहमान आने पर ऐसा लगता है कोई अपना ही आया है.


अभी-अभी कहीं जाने के लिए घर से बाहर निकली पर जून के आने का समय हो गया है, आज सुबह से वर्षा हो रही है, नन्हे की स्कूल बस जब आई तो वर्षा काफी तेज थी. जून ने फोन करके मना कर किया उसे स्कूल भेजने के लिए, पर वह तैयार था और उसका मन भी उदास हो गया उसे उदास देखकर, स्कूल जाना ही चाहिए, पड़ोस का बच्चा उसकी ही कक्षा में पढ़ता है, वह भी गया. फिर जून उसे कार से छोड़ने गए. कल शाम वे लोग मेहमानों की प्रतीक्षा ही करते रहे, पर वे नहीं आए, तिनसुकिया चले गए थे.

उलझ गए सब मन के धागे
गुलझे तार हृदय वीणा के
कैसे उर का बोझ संभालूं
कैसे मन की गिरहें खोलूं
बंध कर गांठ हृदय पर बैठी
जैसे सर्प उठाये फन हो
फिर कैसे होगा मन हल्का
कैसे खिलेगा अंतर उपवन
रहूँ दूर गर जग प्रपंच से
बस अपने में अपने में बस
न कुछ लेना न कुछ देना
जीवन है इक ऐसी दलदल
गए निकट तो धंसना होगा
छीटें फिर अपने आंचल पर
बादल काले अपने मन पर छाने होंगे

दूर से आयी है हवा खुश्बुयें समोए हुए
कितनी खामोश है नदी साये डुबोए हुए

कल वह  किताब आ गयी, “हजार वर्ष की हिंदी कविता”, जो उन्होंने पिछले महीने मंगाई थी. जून ने कहा यह किताब इतने पैसों की नहीं लगती, उन्हें डाक का खर्च भी देना पड़ा था, लेकिन पैसों से नहीं आंकी जा सकती कीमत इन कालजयी कविताओं की. एक सौ पचासी कवियों की कविताएँ हैं इसमें. कुछ पढ़ी हैं उसने, इतनी सारी कवितायें एक साथ..कुछ तो इतनी अच्छी हैं कि मन में कहीं अंदर तक छू जाती हैं. आज उसके पास काफी वक्त है, नन्हा आज जल्दी उठ गया था सो सभी काम जल्दी जल्दी हो गए, कल उसकी स्कूल बस छूट गयी थी, कितना रोया था वह, कितना प्यारा है वह और कैसी बड़ी-बड़ी बातें करता है, स्कूल जाना उसे बहुत अच्छा लगता है. और अब शब्दों का खेल- यानि एक प्रयास- विषय क्या होना चाहिए, हाँ ‘कविता’ का विषय भी कविता ही होना चाहिए
कविता रस की धार जो प्रस्तर में भी बहा करती है
कविता मीठी कटार जो दिल में गहरे चुभा करती है
कविता इक आधार जिस पर मन पीड़ा आश्रय बनाती है
कविता इक संसार जिसे स्वप्नों की धूप जगाती है
कविता मन का प्यार जिसे पा बगिया खिल जाती है



Friday, March 16, 2012

एक नया मोड़



कई दिनों से उसने कुछ नहीं लिखा है, मन में कितने विचार उठते हैं. हर समय एक सवाल सा रहता है. आज वे डॉक्टर के पास गए थे. डॉक्टर ने जाँच की और बताया कि वह जो सोच रहे हैं, सही है. जिस तरह जाँच की गयी वह तरीका नूना को पसंद नहीं आया, वह परेशान हो गयी घर आकर भी काफ़ी देर तक परेशान रही, उसे उदास देखकर जून भी परेशान हुआ. अगले माह उन्हें घर  जाना है. ऐसे में यात्रा नहीं करनी चाहिए पर उसने सोचा देखा जायेगा. अस्पताल जाने से पूर्व वह जितनी खुश थी वापस आकर उसकी शतांश भी नहीं है. कल दीवाली है, जून आज अकेले तिनसुकिया जायेगा सब सामान लाने.