Showing posts with label ब्रह्म. Show all posts
Showing posts with label ब्रह्म. Show all posts

Friday, March 29, 2019

रागी का पेय



कल दोपहर जून आ गये थे, बड़ी ननद ने आम व बर्फी भेजी है. सोनू ने सुंदर सी पोशाक तथा जून स्वयं ‘आर्ट ऑफ़ लिविंग’ आश्रम से नीली योगा कुर्ती लाये हैं. आज बहुत दिनों के बाद चार पोस्ट्स लिखीं. काव्यालय पर उसकी एक कविता कल प्रकाशित होने जा रही है. वर्षों पूर्व उसने ऐसा चाहा था, वह स्वप्न अब पूर्ण होने को है. कल बातूनी सखी का फोन आया, वह एक नया ब्लॉग या या पेज शुरू करने जा रही है अपने विचार लिखने के लिए, जो अन्य महिलाओं को प्रेरित करें. उसने कोई नाम पूछा था अपने पेज के लिए. जून का गला खराब है, यात्रा में काफी थकान हुई, नींद भी पूरी नहीं हुई होगी, इस उम्र में अनियमितता होने पर सेहत तो बिगड़ेगी ही. आज उसने चाय के स्थान पर रागी का पेय बनाकर पीया. बहुत दिनों बाद गुरूजी को एक पत्र भी लिखा.

जानने की शक्ति ही ज्ञान है. परमात्मा ज्ञेय नहीं है, वह ज्ञान है. जब कोई कहे, उसने जान लिया, उसकी जानने की शक्ति समाप्त हो जाती है, इसलिए ब्रह्म अनंत है. उसे जान लिया है, ऐसा कहना ही मिथ्या है. ज्ञान ही व्यक्ति को जड़ सा बना देता है. आज नेट पर अचानक ही ‘शिव सूत्र’ पर गुरूजी के प्रवचन सुनने को मिल गये. एक ही चेतना विभिन्न योनियों में प्रकट हो रही है. हर योनि के प्रति आदर रखना भीतर चैतन्य की निशानी है. वे जब इस संसार के साथ एकत्व का अनुभव करते हैं तो अपने चैतन्य को अनुभव करना सम्भव होता है. देह के साथ जब एकत्व का अनुभव करते हैं तो उसी क्षण पार्थक्य का अनुभव होने लगता है. एक कोशिका से यह देह बनी है, इससे अधिक कलात्मक क्या हो सकता है. कला का सभी आदर करते हैं, यह संसार ईश्वर की एक कला है. जीवंत व्यक्ति ही दूसरों का सम्मान कर सकता है. फिर ज्ञान का बंधन छूट जाता है !

आज सुबह देर तक परमात्मा से भीतर वार्तालाप हुआ. वर्षों पहले का एक वाक्य उभर कर आया और फिर उसे एक गहरे कुँए में धकेल दिया गया, जिसका कोई अंत नहीं था, जिसकी कोई तली नहीं थी, वह कुआं अँधेरा था पर उसकी दीवारें और गोलाई अभी भी स्पष्ट है. अहंकार के प्रतीक वे शब्द वर्षों पूर्व जून के लिए कहे गये थे. कल जब वे फिल्म देखकर आये और दीदी ने फोन पर कहा, आप लोग तो सदा समय का पालन करते हैं. जो शब्द उसने कहे, कि जून को फिल्म अच्छी लगी, वही कारण हैं इस देरी का, तो इसमें भी कहीं अहंकार छिपा हुआ था. स्वयं को विशेष मानकर अन्य को वे स्वयं से कम आंकते हैं, यही तो अहंकार है. फिर भीतर से आवाज उठी, काम समाप्त हो गया ? जिस कार्य की पूर्ति के लिए वह साधना के क्षेत्र में आई थी, वह पूर्ण हो गया. अब समझ में आ रहा है, परमात्मा की राह पर जब वे चलते हैं तो उनका एक हिडन एजेंडा भी होता है. वे स्वास्थ्य, सुन्दरता, यश की कामना से अध्यात्म के क्षेत्र में आते हैं. परमात्मा ही जिसका लक्ष्य हो ऐसे बिरले ही होते हैं. कल से ‘आर्ट ऑफ़ लिविंग’ का बेसिक कोर्स आरम्भ हो रहा है. कम से कम पन्द्रह और अधिक से अधिक बीस महिलाएं प्रतिभागिनी हो जायेंगी.

Wednesday, January 27, 2016

मेहनतकश मजदूर


अनुकूल संयोग यदि भोजन हैं तो प्रतिकूल संयोग विटामिन हैं. जीवन में जो कुछ भी अच्छा-बुरा मिलता है, स्वयं के ही कर्मों का फल होता है यदि ऐसी किसी की मान्यता है तो दुखों के आने पर उसे प्रसन्न होना चाहिए कि एक बुरा कर्म कट रहा है. भीतर समता बनाये हुआ जब कोई हर परिस्थिति को झेल जाता है तो भविष्य के लिए कोई कर्म बंधन भी नहीं बांधता. आज भी ध्यान में कुछ अलग अनुभव हुआ. एक सखी ने फोन किया, उसने स्वप्न देखा कि उसके घर में वह अपने जन्मदिन पर नृत्य कर रही है. अद्भुत है यह स्वप्न, उसका मन तो आजकल सदा ही नृत्य करता है कदम भले ही स्थिर हों. परसों एक दूसरी सखी की बिटिया का पहला जन्मदिन है, उसके लिए जो कविता लिखी थी, उसे टाइप करना है. कल शाम सत्संग था उसके बाद भोजन का भी प्रबंध था, समूह भोज का अपना ही स्वाद होता है. सुबह जून से बात हुई, वह ठीक हैं. एक समय था जब अकेलापन उसे खलता था, एक आज का वक्त है जब एकांत उसे भाता है, नितांत एकांत ! जब एक वही होता है कोई दूसरा नहीं होता. एक में कितनी शांति है, अद्वैत ही उनका लक्ष्य है, जहाँ दो हुए, सारे विकार आए.

ब्रह्म का बीज लिए तो सब आते हैं पर बिन बोये ही चले जाते हैं, ऐसे बीज और कंकर में अंतर भी क्या. हर मन की गहराई में ब्रह्म छिपा है पर जैसे बीज को मिटना होता है फूल खिलने के लिए, मन को भी मिटना होता है तभी ब्रह्म का फूल खिलता है. जिस दिन मन जान लेता है कि उसके होने में ही बंधन है तब यह स्वयं को सूक्ष्म करने की प्रक्रिया प्रारम्भ करता है. यह ‘मैं’ का पर्दा मखमल से मलमल का करना है, जिस दिन मन पूरा मिट जाता है उस दिन परमात्मा ही बचता है.  जीवन में दो ही विकल्प हैं, या तो ‘मैं’ भाव में जियें या प्रेम भाव में. जगत और परमात्मा दो नहीं है पर वह तभी दिखाई देता है जब संसार माया हो जाता है. अभी मन खाली नहीं है, भीतर कोलाहल है, इसे शांत करके ही मन महीन किया जा सकता है. जो जितना सूक्ष्म होता जायेगा उतना ही शक्तिशाली होता जायेगा. वह चट्टान सा दृढ़ भी होगा और फूल से भी कोमल. वह होकर भी नहीं होगा और उसके सिवा कुछ होगा भी नहीं, सारे द्वंद्व उसमें आकर मिट जयेंगे. वह होने के लिए कुछ करना नहीं है. वह तो है ही, केवल उसे जानना भर है. मन को खाली करना ऐसा तो नहीं है कि कोई बर्तन खाली करना हो. कामना को त्यागते ही या समर्पण करते ही मन ठहर जाता है. ठहरा हुआ मन ही खाली मन है !

कल रात स्वप्न में गुरूजी को देखा, सुबह तक उसकी स्मृति बनी हुई थी. इस समय दोपहर के ढाई बजे हैं, घर में रंगाई-पुताई का काम चल रहा है, सब सामान फैला है पर इस बिखराव में भी एक सौन्दर्य है. काम खत्म हो जाने पर जब सब सामान पूर्ववत् रख दिया जाता है तो कैसा संतोष भीतर जगता है. ये मजदूर जो दूसरों के घर सजाते हैं अपने कपड़े भी गंदे कर लेते हैं, उनके हाथ भी कितने रूखे हो जाते होंगे, पेंट छुड़ाते-छुड़ाते. इस दुनिया में हजारों पेशे करने वाले लोगों का समाज है, घटिया से घटिया काम भी और बढ़िया से बढ़िया भी, लेकिन हर काम की जरूरत तो है ही. उसका मन इन मजदूरों की ओर जाता है तो उनको कुछ देने की इच्छा होती है. चाय के साथ चंद बिस्किट देकर वह अपनी इस इच्छा की पूर्ति कर लेती है. आज सुबह से ही लग रहा है कि सद्गुरु का वरदहस्त सिर पर है. वह परमात्मा ही सदगुरुओं के रूप में समय-समय पर अवतरित होता है, उन्हें जो पहचान लेता है वह स्वयं का दीपक भी जलाने का इच्छुक हो जाता है. कृपा तो हरेक पर समान रूप से बरसती है पर कोई-कोई उस कृपा को अपने जीवन में फलीभूत होने का अवसर देते हैं. वे मस्ती में खोये रहते हैं. वे अपने भीतर आनन्द के स्रोत से जुड़ जाते हैं. ध्यान और प्रेम के पथ पर निडर होकर कदम रख देते हैं. ऐसा पथ जो प्राप्ति भी कराता है और गति भी भी प्रदान करता है !

       

Thursday, September 19, 2013

जलेबी का प्रसाद


नन्हे को सर्दी लग गयी है, वह स्कूल नहीं जा रहा है, पर शाम को कम्प्यूटर क्लास अवश्य जाता है, दिन भर उसको व्यस्त रखना होता है, नूना के गले में भी हल्की खराश महसूस हो रही है. उसने देखा है कि नन्हे को कुछ होने पर उसके खुद के भीतर भी वही लक्षण दिखने लगते हैं, पर इतनी कमजोर नहीं होना है उसे, छोटी बहन को बहादुर बनने की शिक्षा देते हुए एक पत्र लिखा था परसों. नन्हा इस समय ब्लॉक्स से घर बना रहा है, कभी-कभी पूरा एक घंटा उसे लग जाता है, छोटे छोटे प्लास्टिक के ब्लॉक्स से इमारत बनाने में. वह उसकी एक किताब ‘हमारी पुस्तकें’ पढ़ रही थी, उसमें वेद, पुराण, उपनिषद, कथा सरित सागर, जातक कथाएं आदि के बारे में पढ़ा. कुल उपनिषद १०८ हैं, जिनमें से दस प्रमुख हैं, ईश, केन, मुण्डक, माण्डुक्य, तैतरीय, छान्दोग्य, कथा, प्रश्न, कैवल्य, एतरिय आदि.

नन्हे को जून अस्पताल ले गये थे, पर डॉक्टर से मिल नहीं पाए, रात भर की वर्षा के बाद हॉस्पिटल में पानी भर गया है, जिससे वे लोग कार से उतर ही नहीं सके, उसका स्कूल भी वर्षा के कारण बंद है. उसने महसूस किया नन्हे की अस्वस्थता के कारण वह कुछ परेशान हो गयी है. जो उसके चेहरे पर भी झलक रही है. दोपहर को जब वह सो गया, वह उपनिषद पढ़ती रही कुछ समझ में आया, कुछ नहीं, कल शाम को जितने अध्याय पढ़े, ज्यादा समझ पायी थी. सारी पुस्तक का सार निकाला जाये तो यह होगा कि- ‘आत्मा मानव के हृदय में विराजमान है, आत्मा ही ब्रह्म है, जिसका दर्शन मानव ध्यान द्वारा कर सकता है. इन्द्रियों को वश में करके, मन का निग्रह करके, सदाचरण करके, ॐ का उच्चारण करके, जप द्वारा ध्यान करके आत्मा को जाना सकता है. सारे उपनिषदों में भिन्न-भिन्न प्रकार से ब्रह्म की अखंड सत्ता का, एकमात्र शाश्वत ब्रह्म का वर्णन किया है’.
कुछ देर पहले वह छाता लेकर बाहर टहलने गयी क्रिसेंथमम के पौधे कुम्हला से गये हैं, उनमें खुरपी लगाई, मन थोड़ा शांत हुआ, वैसे अशांत कब और कैसे हुआ उसे पता ही नहीं चला, फिर कैसेट लगाकर व्यायाम किया, वर्षा के कारण टहलना बंद है. अज शाम उन्हें क्लब भी जाना है, नन्हे को क्विज़ में भाग लेना है. आज सुबह जब नींद खुली थी तो दूर से आती मद्धिम सी आवाज थी, नींद में कभी लग रहा था फोन बज रहा है कभी अलार्म. कल जन्माष्टमी की छुट्टी है,  शाम को वे राधा-कृष्ण मन्दिर की सजावट देखने जायेंगे.

कल वे कृष्ण मन्दिर देखने के बाद कालीबाड़ी भी गये, पता नहीं क्यों पर ईश्वर का निराकार रूप ही उसे वास्तविक लगता है, मूर्ति या फोटो देखकर मन में श्रद्धा नहीं होती. वहीं से वे उस सखी के यहाँ गये जो वस्त्रों पर पेंटिग सीख रही है, आजकल दीवान का कवर पेंट कर रही है, रंगशोख और चटख हैं. कल दोपहर बैकडोर पड़ोसी के यहाँ सिंथेसाइजर बजाया, उसने एक गाने की स्वरलिपि भी बताई. उसकी आवाज काफी तेज थी, काफी बड़ा भी था. नन्हे ने मन्दिर सजाया है और शाम को वह जलेबी का प्रसाद भी बनाने वाली है. आज शिक्षक दिवस भी है. संयोग ही है की उसके पास डॉ राधा कृष्णन की एक पुस्तक है, जो लाइब्रेरी से लायी थी.


कल शाम को ‘स्वामी रामतीर्थ’ के भाषण पढ़े और अभी कुछ देर पूर्व भी वही पढ़ रही थी. उनके शब्दों में ओज है और आत्मा को जगाने की शक्ति, कल से कई बार इन्ही शब्दों के प्रभाव के कारण मन को व्यर्थ के जोड़-तोड़ से बचा पायी है. उसे लगा, वे अपना कितना सारा वक्त यूँही व्यर्थ की बातों में बिता देते हैं और मन की ऊर्जा जिसे किसी अच्छे काम में लगाना चाहिए, इधर-उधर की बातों को सोचने में खर्च कर देते हैं.