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Thursday, February 15, 2018

तेल का रिसाव



शनिवार और इतवार फिर गुजर गये. वर्षा लगातार होती रही है पिछले दिनों. आज थमी है. सुबह वह स्कूल गयी, लौटते समय किसी गाँव के एक खेत में, जिसमें वर्षा का पानी भरा हुआ था, तेल का रिसाव हो रहा था. वहाँ सम्भवतः नाला भी रहा होगा. गाँव के लोग कम्पनी के वाहनों को रोक रहे थे. उनकी कार भी रोकी तो भीरु ड्राइवर झट बिना किसी प्रतिवाद के रुक गया और उसे भी बाहर निकलने से मना करने लगा, पर कुछ क्षणों के बाद उसने उनमें से एक व्यक्ति से इतना कहा, वह स्कूल से आ रही है, उसे जाने दें, तो उसने कहा, ठीक है जाइये. भला व्यक्ति था वह. उन्हें अधिकारियों तक अपनी बात पहुँचानी थी, ताकि जो नुकसान हो रहा है, उसे रोका जाये. तेल के नुकसान के साथ-साथ खेत का नुकसान भी हो रहा था. अब शायद अगले कुछ समय तक वहाँ कुछ भी नहीं उगेगा. पौने ग्यारह बजे हैं, जून आने वाले होंगे. आज सुबह उठते ही मोबाइल के प्रयोग पर उसने उन्हें टोका, शायद उन्हें अच्छा नहीं लगा होगा, पर हर चीज का एक वक्त होता है, यह वह खुद ही कहते हैं. जन्माष्टमी का उत्सव आने वाला है. उसे कृष्ण के लिए एक सुंदर कविता या गीत लिखना है.

कल वे हो जायेंगे विदा
और परसों भूल जायेंगे उन्हें लोग
इस तरह जैसे कि कभी था ही नहीं
उनका अस्तित्त्व इस दुनिया में
आज ही उनके हाथ में है
चाहे तो गीत गुनगुना लें
या अहंकार को सजा लें
जो है ही नहीं..
उसके कारण अपने पावों में
काँटों को चुभा लें
या दी है जिसने जिन्दगी की नेमत
उस रब को रिझा लें

आज सितम्बर की पहली तारीख है. दूधवाले का हिसाब कर लिया था, पर उसे पैसे देना भूल गयी, इसी तरह वे अनावश्यक कार्यों में स्वयं को उलझाकर सदा ही आवश्यक को भूल जाते हैं. कल दिन में एक-दो बार लगा जैसे मौसम में बदलाव आ रहा है. पर आज भी वर्षा की अनवरत झड़ी सुबह से लगी है. बरामदे में प्रातः भ्रमण किया, घर बड़ा होने का यह फायदा तो है ही. कल दोपहर को भागवद् व कल्याण का एक अंक पढ़ा. कृष्ण जन्माष्टमी के लिए कविता लिखनी आरम्भ की, कृष्ण की महिमा अनंत है और भक्तों से बढ़कर कौन उसका बखान कर सकता है. आज सुबह सद्गुरू ने विस्मय पर कितना अद्भुत प्रवचन दिया. इस जहाँ की हर शै उन्हें विस्मय से भर देती है. उस दिन, अरे, कल ही तो फिर वह बड़ी चमकीली मक्खी उसकी अंगुली पर आकर बैठी थी, उसने उसे उड़ा दिया. अस्तित्त्व उससे प्रेम करता है, वह यानि वही..फिर घनघोर वर्षा के बावजूद एक पीली तितली उडती नजर आई !

कल कुछ नहीं लिखा, ट्रेड यूनियन की हड़ताल के कारण जून का दफ्तर बंद था. तबियत भी उतनी ठीक नहीं थी, इस समय भी सिर की चोटी पर दर्द है, पर चाय से इसका कोई संबंध है, ऐसा तो नहीं होगा. मन भी आजकल कुछ का कुछ सोचता रहता है, ठीक ही कहा है स्वस्थ तन में ही स्वस्थ मन का वास होता है. वे वही होते हैं जो वे सोचते हैं, इन्सान चाहे तो आकाश की ऊंचाइयों को छू ले और न चाहे तो गहरी खाई भी कम होगी उसके लिए ! आश्चर्य होता है इतने वर्षों की साधना के बाद भी मन अपनी चाल से चलता है. आज सुबह स्कूल की उप प्रधानाचार्या ने कहा, कक्षा दस में गणित  पढ़ाना है कुछ दिनों के लिए, पिछले वर्ष भी पढ़ाया था शायद इन्हीं दिनों. इसका अर्थ है कुछ दिनों तक उसे रोज ही स्कूल जाना होगा. कल सांख्यकी का एक अध्याय पढ़ाना है. परसों मृणाल ज्योति भी जाना है, शिक्षक दिवस के उपलक्ष में.


Friday, October 13, 2017

पुदीने के परांठे


कल रात नन्हे ने कहा, वह आज आएगा, पर सुबह बताया, कल ही आ पायेगा. पिछले दो दिन से वह घर नहीं गया था. काम के बाद दफ्तर में ही सो गया. नींद भी पूरी नहीं हुई थी. उसने सोचा, ये भी आज के कर्मयोगी हैं. सुबह नींद खुली उसके पूर्व किसी ने कंधों को हल्के से हिलाया, फौरन भाभी का ख्याल आ गया. आँख खोली तो कोई भी नहीं था, इसका अर्थ...रात को मच्छर बहुत थे, कानों के पास गुनगुन कर रहे थे. पंखा तेज करके सोयी थी. देर तक नींद नहीं आई, फिर एक स्वप्न आया. दूर तक बारिश के कारण कीचड़ फ़ैल गया है. बाद में हवा चलने लगी और मिट्टी उड़-उड़कर गिरने लगी. नींद खुल गयी. सुबह बड़ी बहन के साथ सब्जी की दुकान तक गयी. नाश्ते में सैंडविच बनाये. बड़े भाई चुपचाप ही रहते हैं ज्यादातर समय, पर वे सामान्य हैं. कभी-कभी परेशान हो जाते हैं. इस समय शाम के छह बजे हैं, घर में सभी रिश्तेदार आये हुए हैं. रह-रहकर सभी को वही बातें याद आती हैं. दरअसल जब जीवन में कोई लक्ष्य न हो तो लोग दुःख को पकड़ लेते हैं.

परसों उन्हें घर जाना है. आज नन्हा भी आ गया है. भाई अब पहले से ज्यादा स्थिर लग रहे हैं. दीदी वापस चली गयी हैं. अभी कुछ देर पहले ही उनका फोन आया, पिछले कुछ दिन उनके साथ सहजता से बीते. सुबह उन्होंने आलू-पुदीने के परांठे बनाये थे. शाम का भोजन नैनी बनाकर चली गयी है. आजकल शहरों में खाना बनवाने का रिवाज बढ़ता जा रहा है. या तो बाहर खाते हैं या बनवा लेते हैं.


कल घर वापस आई, जून हवाईअड्डे लेने गये थे. वह बहुत खुश थे. आज स्कूल गयी. परमात्मा हर पल साथ है यह बात कितनी बार सत्य सिद्ध हुई है. आज भी बच्चों को व्यायाम कराते वक्त एक नन्हा सा भूरा कीट उसके दाँए हाथ की अंगुली पर आकर बैठ गया था, हाथ हिलाते समय भी बैठा ही रहा. अस्तित्त्व किस कदर आपस में जुड़ा है और परम किस कदर उनकी हर पल खबर रखता है इससे बढ़कर इसका क्या सबूत हो सकता है. कल जब भाई एयरपोर्ट तक छोड़ने गये था, तब स्क्रीन के आगे से उडती हुई एक भूरी तितली निकल गयी थी. इतने ट्रैफिक में उसका आना भीतर एक लहर को जगा गया, कितना रहस्यमय है यह संसार....और इसका नियंता..जीवन सचमुच एक उत्सव बन जाता है, जब साधना सहज हो जाती है. 

Wednesday, July 26, 2017

अनानास की मिठास


उस दिन दिगबोई में भाई और उसके परिवार के साथ जब वे सब दिगबोई पीक पर थे एक तितली उसके माथे पर आकर बैठ गयी थी. उस समय तो महज एक सुखद आश्चर्य मात्र लगा था, पर बाद में सोचा तो लगा, वह कोई संदेश देकर गयी थी, उस अनाम का संदेश....कि वह सदा उसके साथ है, वही तो है. वह स्वयं अब नहीं रह गयी है. कभी-कभी अचरज भी होता है, अपना आप अजनबी लगता है, सारे विचार जो एक वक्त में बड़े कीमती लगते थे अब व्यर्थ ही लगते हैं. एक मौन पसरा रहता है भीतर जो अपना लगता है. शब्द भी नहीं गूँजते भीतर ! तभी तो कोई कविता भी नहीं लिखी कई दिनों से !

कल शाम आज की सेल की तैयारी में बीती. क्लब की तरफ से वर्ष में दो-तीन बार यह सेल लगती है. बड़े से हॉल में मेजें लगवाना फिर उनपर सफेद मेजपोश और विक्रेताओं के बैठने के लिए कुछ कुर्सियां, वस्त्र लटकाने के लिए लोहे के स्टैंड अदि रखवाना, कुछ अन्य महिलाओं के साथ सारा काम खत्म करते-करते आठ बज गये थे. आज सुबह स्कूल जाना था, दोपहर को क्लब गयी. कुछ खरीदारी भी की. पता चला उसका नाप बढ़ गया है, उम्र बढ़ने के साथ-साथ वे भोजन तो कम करते नहीं, व्यायाम कम कर देते हैं. घर का काम भी कितना कम रह गया है. जून कल दोपहर आ जायेंगे, जब वह बच्चों की संडे क्लास ले रही होगी. अब वह नहीं कहते कि उनके घर आने पर उसे घर में ही रहना चाहिए, वह आत्मनिर्भर बनते जा रहे हैं. नन्हा आज व्यस्त होगा, तीस घंटों के लिए एक प्रतियोगिता होने जा रही है, उसे आज सुबह वहाँ जाना था. आज बगीचे से एक अनानास तोड़ा, जिसे पक्षियों ने चख लिया था, मीठा है बहुत. घर में बगीचा हो तो कितना अच्छा है न..बड़ी भतीजी ने लिखा है, स्वर्ग की तरह है उनका घर, सचमुच ..स्वर्ग ही तो है, जहाँ देवता रहते हैं !


कल यात्रा पर निकलना है, अभी तक पूरी पैकिंग नहीं की है. जून आज बहुत व्यस्त हैं, उनकी नयी प्रयोगशाला का उद्घाटन होना है. सीएमडी आने वाले थे, अब तक तो हो गया होगा. शाम के पांच बजे हैं, लगातार होती वर्षा के कारण मौसम ठंडा हो गया है. वह पिछले एक घंटे से साहित्य अमृत पढ़ रही थी. ज्यादा बोलने वाली सखी का फोन आया, वह कलाकार है. पानी के रंगों से सुंदर चित्र बना रही है और फेसबुक पर पोस्ट कर रही है. अच्छा है, उसके जीवन को एक ठहराव मिलेगा इससे और ढेर सारा सुकून भी. कल वह ब्लॉग पर विदाई संदेश लिखेगी, वापस आकर ही होगा लेखन कार्य. इस दीवाली पर उन्हें काफी लोगों को बुलाना भी है. जीवन का यह कितना सुंदर मोड़ है, बैंगलोर में हो सकता है गुरू दर्शन भी हो जाये. सद्गुरू से एकत्व की अनुभूति हर क्षण होती है. अब कुछ करे या न करे भीतर एक से रंग(मौसम)रहते हैं. एक अटूट मौन और शांति..एक सहजता और एक अखंडता..एक असीमता भी..

Saturday, June 18, 2016

हरियाली और हवा की गुपचुप


अभी दो नहीं बजे हैं, आकाश बादलों से घिरा है, ठंड भी बढ़ गयी है. उसने लंच के बाद जून के जाने पर कम्प्यूटर ऑन किया. छोटी व बड़ी बहन के मेल थे. सद्गुरु का विस्डम संदेश भी था. दिनोंदिन जिसकी भाषा परिष्कृत होती जा रही है या वह ज्यादा गहराई से समझने लगी है, कितने कम शब्दों में कितना सटीक उत्तर वे देते हैं, अद्भुत है उनका ज्ञान, अद्भुत हैं वे ! परसों एक बुजुर्ग परिचिता का जन्मदिन है, उनके लिए कविता लिखी है. परसों ही सत्संग भी है, जून को उसका वहाँ जाना पसंद नहीं है और उनकी इच्छा के खिलाफ कुछ करने का अर्थ है घर में अशांति का पदार्पण ! उसका मन (आश्चर्य है कि अभी तक वह बचा है) विद्रोह कर रहा है. आज सुबह सुना था इच्छा शक्ति उमा कुमारी इच्छा कभी पूर्ण नहीं होती, यही तो विडम्बना है. इच्छा से मुक्त होना हो तो उसे समर्पित कर देना चाहिए ! जहाँ कामना है वहाँ सुख नहीं, वहाँ आनंद नहीं, वह भी अपनी सत्संग में जाने की कामना ईश्वर को समर्पित करती है, आगे वही जानें !

दोपहर के दो बजे हैं. बगीचे में झूले पर वह बैठी है, धूप और छाँव दोनों ने जिस पर इस समय अपना अधिकार जमा रखा है. उसके पैर धूप में है शेष भाग छाया में है पर सिर की चोटी पर धूप की तपन का अनुभव हो रहा है, हल्की हवा भी बह रही है. सामने मैजंटा रंग के फूल खिले हैं बायीं ओर एक बड़े प्लास्टिक के गमले में साइकस जाति का एक पादप अपने पूरे गौरव के साथ उगा है. उसका सिर  थोडा भारी है और पेट भी, सम्भवतः वस्त्रों के कारण या सर्दियों की शुरुआत में पौष्टिक भोजन के कारण ! कल शाम को सब कुछ ठीक-ठाक चल रहा था, वे संध्या भ्रमण के लिए निकले तो उसने सत्संग में जाने की बात कही, जून ने चुप्पी ओढ़ ली, उसने कहा, उन्हें उसकी जरा भी परवाह नहीं है. पर बाद में लगा यह ठीक नहीं था. उसके भीतर दो व्यक्तित्त्व हैं, एक पूर्ण तृप्त है, वह रहस्यमय है, वह होते हुए भी नहीं के बराबर है, एक दूसरा है जो जग में सबके साथ हिलमिल कर रहना चाहता है. वहाँ जाने अथवा न जाने से उसे कोई हानि या लाभ होगा ऐसा भी नहीं है. हानि-लाभ की अब कोई बात ही शेष नहीं रह गयी है. भजन गाते-गाते भाव में डूबना उसका सहज स्वभाव है, बस इतना ही. सो वह इस नीले आकाश के नीचे चमकते हुए प्रकाश में हरियाली और हवा की इस गुपचुप को सुनते हुए पंछियों के सुर में सुर मिलाकर अपने आप को जीवन की धारा में निर्विरोध बहने के लिए छोड़ देती है ! जो हो सो हो...एक तितली उसके वस्त्रों पर आकर बैठ गयी है, उस पर फूल बने हैं, वह शायद फूल की खोज में ही आई है और रस न मिलने पर भी कैसे आराम से बैठी है.

आज फिर वही कल का सा समय है, झूले पर धूप-छाँव का खेल चल रहा है, जैसे जीवन में प्यार और तकरार का खेल साथ-साथ चला करता है. जून के साथ उसका रिश्ता भी कुछ ऐसा ही है. शाम को चार बजे मृणाल ज्योति जाना है, विश्व विकलांग दिवस के लिए मीटिंग है. उसके बाद वे उन बुजुर्ग महिला से मिलने जायेंगे जिनका जन्मदिन है.