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Friday, March 24, 2017

पंछी और कलियाँ


नन्हे की मित्र के लिए उसने कविता लिखी थी, उसका जवाब आया है, उसने दिल को छूने वाला जवाब लिखा है. कल दिन भर वह ठीक रही पर रात बेचैनी से भरी थी. आश्चर्य होता है खुद पर, कहाँ सोचा था कभी कि डायरी के पन्नों पर अपनी हेल्थ रिपोर्ट लिखेगी एक दिन, लेकिन इसकी नींव रख दी गयी थी वर्षों पहले, जन्मते ही सम्भवतः..उनके सारे रोग नए नहीं होते, उनका आयोजन पहले ही शुरू हो चुका होता है.

आज नन्हे का जन्मदिन है, उसे फोन किया तो नहीं उठाया, शायद रात को जगता रहा हो, सुबह ही सोया हो. उसके लिए बधाई के फोन आये. मोरारीबापू साऊथ अफ्रीका पहुंचा गये हैं, उनकी कथा आ रही है टीवी पर. जून आज कोलकाता गये हैं. दिसम्बर में वे बंगलूरू आश्रम जायेंगे, इस बात को सोचने से ही कैसी पुलक उठती है. आज तन और मन दोनों हल्के हैं. सारे रोगों का कारण प्रज्ञापराध है. उनका तन कितना बहुमूल्य है, इसे स्वच्छ व स्वस्थ रखना कितना आवश्यक है. यह ज्यादा कुछ मांग भी नहीं करता, लगातार काम करता रहता है. ‘कम खाओ और गम खाओ’, यह नियम अपनाना होगा यदि भविष्य में भी स्वस्थ रहना है. आज ध्यान में अच्छा अनुभव हुआ, जून जब घर पर रहते हैं उसका ध्यान गहरा नहीं हो पाता. अब उनके आने पर भी सजग रहना होगा ! परसों वे आ जायेंगे.

कुछ देर में उसे एक परिचिता के साथ मृणाल ज्योति जाना है. जब कहीं जाना हो तो प्रतीक्षाकाल में कार के हॉर्न की आवाजें ज्यादा ही सुनाई देने लगती हैं, वैसे जिनकी ओर ध्यान भी नहीं जाता. ‘लॉ ऑफ़ अट्रैक्शन’ कितना जबर्दस्त है. आज ही उसने चाहा कि माली ग्यारह बजे से पहले आये, सो आ गया है. इस तरह तो उनका भाग्य उनके ही हाथों में है. वे जो चाहते हैं, वैसा ही सोचना आरम्भ कर दें तो प्रकृति उसका इंतजाम करने लगती है. आज सद्गुरू ने अपने जीवन के कुछ प्रसंग बताये. इक्कीस वर्ष की अवस्था तक वे दुनिया के सारे सुख-आराम देख चुके थे, विदेशों में घूम चुके थे. एक विश्व प्रसिद्ध संस्था के उत्तराधिकारी बन सकते थे, पर वे लौट आये और सेवा का मार्ग चुना. ‘आर्ट ऑफ़ लिविंग’ की स्थापना की. अद्भुत है उनकी कहानी. ऐसे लोग दुनिया में विरले होते हैं, जो करोड़ों लोगों तक पहुंच पाते हैं, सभी उनसे प्रेम करते हैं.


जून आज आ रहे हैं. उनकी पसंद की ड्रेस पहनी है. प्रेम क्या होता है, इसका पता ईश्वर से प्रेम करने के बाद ही चलता है. इसीलिए संत-महात्मा युगों-युगों से उन्हें प्रभु की ओर चलने का मार्ग बताते आये हैं. परमात्मा उनके प्रेम का प्रतिदान अनंत गुणा देता है. एक बूंद जो सागर से बिछुड़ी थी, कितनी छोटी  थी और जब पुनः सागर में जा मिली तो अनंत गुणा जल उसे मिल गया. उनकी चेतना इस देह में कितनी नन्ही सी लगती है, एक चिंगारी हो जैसे या सूर्य की एक किरण और जब वह चिंगारी किसी तरह पुनः आग में गिर जाये तो...या सूर्य की किरण पुनः सूर्य में पहुंच जाये तो..कितना प्रकाश न भर जायेगा उसके भीतर; लेकिन एक बात यह भी है कि सूर्य स्वयं जाकर कलियों को खिला नहीं सकता, वह अपने हाथ बना लेता है किरणों को, जो आहिस्ता से सहलाती हैं और किरणें खिल जाती हैं; ऐसे ही अनंत परमात्मा स्वयं आकर सोए हुओं को कैसे जगायेगा, मानव उसका तेज सह ही नहीं पायेगा, वह संतों को अपना हाथ बना लेता है जो आहिस्ता से आकर जगाते हैं. कलियों के लिए किरणें संत से कम नहीं..पंछियों के लिए भी...ऊपर से तुर्रा यह कि फूल के भीतर जो भोजन बनता है वह भी सूर्य के बिना सम्भव नहीं. सूर्य उसके भीतर सदा ही है, पर वह जानता नहीं, मानव के भीतर भी परमात्मा के कारण ही चेतना है, पर वह जानता नहीं, वास्तव में स्वयं को ही जगाने आता है वह क्योंकि उसे स्वयं का अनुभव करना हो तो मन का आश्रय लेना होगा, उसके पास तो मन है नहीं..तो भक्त का मन भगवान ले लेता है और बदले में स्वयं को दे देता है, अदला-बदली हो जाती है और प्रेम का यह खेल गुपचुप चलता ही रहता है !      

Monday, February 27, 2017

तेज पत्ते का पेड़


मन के भीतर उपजा एक छोटा सा शब्द या विचार मन की शांति को भंग करने में समर्थ है, यह तो अच्छा है कि यह उनके हाथ में है उसे उपजाएँ या नहीं, लेकिन तभी तक जब तक वे सजग रहते हैं. एक बार बेहोशी में कोई विचार उपजाया तो बात हाथ से निकल सकती है और ऊपर से तुर्रा यह कि वह शब्द एक बीज बनकर भीतर जम जायेगा और भविष्य में आलंबन मिलने पर पुनः पनप सकता है. लेकिन शब्द का जन्म किसी न किसी कामना के कारण होता है, कामना ही हर दुःख के जड़ में है, कोई उसे प्रेम का नाम दे यह उसकी स्वतन्त्रता है पर भीतर कहीं भय है जो कामना को जन्म देता है और यह भय अकेले रह जाने का है, इसका मूल भी तो मृत्यु के भय में है. वे मरना नहीं चाहते किन्तु आत्मा में स्थित रहें तो मृत्यु का भय नहीं और आत्मा में रहें तो अकेलेपन का भी भय नहीं और कामना का तो वहाँ प्रश्न ही नहीं उठता. हर कामना अभाव से उपजती है, आत्मा पूर्ण है वहाँ कोई अभाव नहीं. जीवन कितना सुंदर है और वे इसे कुरूप बनाने में लगे रहते हैं. वे उन दुखों को पैदा कर लेते हैं जिनका वास्तव में कोई अस्तित्त्व ही नहीं है, वे संशय के जाल में स्वयं को फंसा लेते हैं, जहाँ विश्वास के फूल खिले हैं. उनका दुःख के प्रति लगाव तो देखते ही बनता है. वे उगते हुए सूर्य में अंगारे खोज लेते हैं और बहते हुए धारे में तलवारें खोज लेते हैं. जो उनके पास है उसकी कद्र करने की बजाय  उसके खो जाने के अज्ञात भय में रातों की नींद गंवा देते हैं !

‘जो तू है सो मैं हूँ’ इस उक्ति को जाने कितनी बार कहा, सुना था. आज पूरी तरह से अनुभव भी कर लिया. कल रात्रि सोने से पूर्व अस्तित्त्व जैसे उस पर बरसा. ऐसा अनुभव पहली बार हुआ, अज्ञात ने जैसे उसे चारों और से घेरे में ले लिया थे. अचिंतनीय भावों की वर्षा हो रही थी. शांति इतनी सघन थी कि..और तब प्रतीत हुआ कि जैसे वह है इस देह में अपनी यात्रा पूर्ण करती हुई वैसे ही अन्य आत्माएं हैं सबके साथ प्रेम का ही नाता है. जो वह है वही वे हैं, कोई भेद है ही नहीं, तभी उनके द्वारा किसी को कहा गया कटु वचन उन्हें भी दुःख दे जाता है और उनके द्वारा किसी को कहा गया प्रेमपूर्ण वचन उन्हें ही तृप्त कर जाता है क्योंकि उन्होंने स्वयं को ही कहा होता है. मन और आत्मा दोनों ही परमात्मा की सन्तान हैं, आत्मा सुर है मन असुर, आत्मा कृष्ण है और मन कंस है, मन जब तक अर्जुन नहीं बन जाता उसे मरना होगा. भक्त होकर ही मन आत्मा से एक हो जाता है, रावण होकर वह आत्मा का विरोध करता है, विभीषण होकर उसकी शरण में जाता है. जून का फोन आया था सुबह, वह उसका सच्चा मीत है, उसकी आत्मा है, उसे उसने कुछ मूर्खतापूर्ण शब्द कहे जो स्वयं को ही चुभने लगे, उससे क्षमा मांगी, मन हल्का हो गया. सुबह ध्यान के वक्त भीतर कविताएँ जन्म ले रही थीं. असीम है सद्गुरू की कृपा..उनकी कृपा ही उसे यहाँ तक लायी है, परमात्मा की चौखट पर लाने वाले उसके प्यारे सद्गुरू को कोटि कोटि प्रणाम उसने भेजे.

सरदारनी आंटी को कार्ड, फूल व छोटा सा उपहार देकर आयी है. अब उनके दिल्ली जाने से पहले सम्भवतः एकाध बार और उनसे मिलना हो. आज दायीं तरफ की पड़ोसिन का फोन आया, वे लोग भी तबादले के कारण दिल्ली जा रहे हैं. जून के एक और सहकर्मी भी जा रहे हैं, एक दिन तो सबको छोड़ना ही था, अच्छा है एक-एक कर सब बिछड़ रहे हैं. मन मुक्त रहेगा जितना उतना परमात्मा में टिकेगा. आज सुबह ध्यान में एक आकृति दिखी पहले भी कई बार दिखती है, कौन है वह ? क्या है ? कौन जानता है, कोई दिव्य आत्मा या उसका कान्हा स्वयं ही ! जून आजकल बहुत शांत हो गये हैं, वे भी अध्यात्म के पथ के यात्री हैं. परमात्मा कभी भी किसीकी पुकार अनसुनी नहीं करता, वह अनंत है, वे उसकी एक बूंद कृपा के भी आकांक्षी नहीं हो पाते अहंकार के कारण.
कल उन्हें यात्रा पर निकलना है, तैयारी अभी शेष है. मन एक भिन्न उल्लास का अनुभव कर रहा है. अभी कुछ देर पूर्व धोबी आया था, पुराना कम्प्यूटर जो उसे दिया था, चला ही नहीं, कह रहा था लौटा जायेगा. आज कढ़ी बनाई है. पिताजी को ताजा तेजपत्ता व कढ़ी पत्ता घर ले जाने का मन है. जून के मना करने के बावजूद ढेर सारे हरे पत्ते वह अपने सूटकेस में रख रहे हैं. यदि कपड़ों में कोई दाग लग जाये या गंध भर जाये इसकी परवाह किये बिना. 

Tuesday, January 3, 2017

आकाश का गीत


आज ध्यान कम टीवी पर सद्गुरू को श्रवण ज्यादा किया. आश्रम में उनसे जो प्रश्नोत्तर हो रहा था, बहुत अच्छा लगा. उन्हें नींद आ रही थी, लेकिन लोग थे कि प्रश्न पूछे ही जा रहे थे.
श्रवण दुःख पाप का नाशक, श्रवण करे जो बनता श्रावक
सुनने की महिमा है अनुपम, मिल जाता है जिससे प्रियतम
निज भाषा में सुनने का फल, मन की धारा बनती निर्मल !
पढ़ना वृत्ति, सुनना भक्ति, होगी इससे कुशल प्रवृत्ति
कल-कल नदिया की भी सुनना, पंछी की बोली को गुनना
बादल का तुम सुनना गर्जन, सागर की लहरों का तर्जन
पिऊ पपीहा केकी मोर की, गूंज मौन की सुने सही
सुनना भी एक विज्ञान, बढ़ता है जिससे प्रज्ञान
राग सुनो, आलाप सुनो, कोकिल की तुम तान सुनो
यहाँ हवाएं भी गा रही हैं, आकाश गा रहा है. संगीत से भरा है जगत !

आज सात परिचित महिलाओं को फोन किये, मृणाल ज्योति के कार्य में सहयोग के लिए, एक ने उठाया ही नहीं. लोगों से बातचीत चलती रहे तो अच्छा है. गुरूजी ने कहा, अपने में जो दोष हैं, उन्हें निकालने का प्रयास करने जायेंगे तो कोई लाभ नहीं होगा. अपना दायरा बढ़ाकर, स्वयं को व्यस्त रखकर अपनी ऊर्जा का सही उपयोग करके वे स्वयं को शुद्ध कर सकते हैं. सेवा से बढ़कर शुद्धि का कोई साधन नहीं और स्वार्थ से बढ़कर अशुद्धि का कोई साधन नहीं. सेवा में कितना आनंद भी है. परमात्मा भी तो यही कर रहा है, ‘स: इव’ जो वह कर रहा है वे उसकी नकल करते हैं, वही तो उनके द्वारा प्रतिबिम्बित हो रहा है !

आज का ध्यान और भी अनोखा था. सद्गुरू होते ही हैं अनोखे, सारी दुनिया से निराले, प्रभु के घर वाले..दिल में रहने का ध्यान था, दिल के भीतर, दिल के ऊपर और दिल के नीचे..रहना था ध्यान से, अहंकार को भूलकर, विचारों को छोड़ते जाना था और केवल महसूस करना था. बच्चे महसूस करते  हैं, वे सोचते नहीं..तभी एकदम ताजे रहते हैं, फूल की तरह कोमल और सुबह की ओस की तरह निर्मल...

कल मृणाल ज्योति गयी थी. सो कुछ नहीं लिखा. वह परमात्मा कितने-कितने उपाय करके कितने खेल रचके उन्हें अपनी ओर खींचता है. वे अनजान से बने उसकी कृपा को अनुभव कर ही नहीं पाते, बार-बार अहंकार का शिकार होते हैं और दुःख पाते हैं, पर अपने सच्चे स्वरूप को देखते ही नहीं जहाँ केवल प्रेम है, जहाँ दो हैं ही नहीं, जो उनका अपमान(तथाकथित) कर रहा है, वह भी वे ही हैं. सम्मान करने वाले भी वही हैं. जब वे किसी का सम्मान करते हैं तो पुण्य बढ़ता है क्योंकि वे अपना ही सम्मान कर रहे हैं और जब किसी का अपमान कर रहे हैं, तो उनका पुण्य घटता है क्योंकि वे स्वयं का ही अपमान कर रहे हैं. इसका अर्थ हुआ कोई जब उनका सम्मान करता है तो अपना पुण्य बढ़ाता है उनका घटाता है, और अपमान करता है तो अपना पुण्य घटाता है, उनका बढ़ाता है. अद्वैत का अनुभव किये बिना कोई इस जगत में सुख से रह ही नहीं सकता. आज का ध्यान भी अनोखा था. अपने पोर-पोर को परमात्मा से ओत-प्रोत मानना था, एक-एक कण को..आज सुबह प्राणायाम करते समय भी उसे अपने घर में टिकने का अनुभव हुआ. वे व्यर्थ ही बाहर भटकते हैं. कभी धूल फांकते हैं तो कभी दामन फड़वाते हैं. उनका अपना मन ही मूर्खता भरे विचार उन्हें सिखाता है और वे उसकी बातों में आ जाते हैं. यहाँ करने को कुछ भी नहीं है सिवाय मस्ती में झूमने के..पर वे वही छोड़कर सारे काम करते हैं !        



Friday, June 3, 2016

आत्मा नर्तकः


आज सुबह गुरुकृपा का बादल बरसा. कैसा अनोखा अनुभव था, सारे संदेह मिट गये. आत्मा की कैसी स्पष्ट अनुभूति ! मन, बुद्धि, चित्त व अहंकार से परे अपने सही स्वरूप की प्रतीति हुई, ऐसा लगा जैसे एक पर्दा हट गया हो. कृतज्ञता के अश्रु झलक आये, फिर झरनों की सी खिलखिलाहट भी भीतर भर गयी. शरीर पृथक है, प्राण पृथक है, वे साक्षी स्वरूप आत्मा हैं, चैतन्य शक्ति हैं जो शांति स्वरूप है, आनन्द व सुख स्वरूप है, पावन है, दिव्य है, सारे अवगुणों की सीमा जहाँ समाप्त हो जाती है, सारा अज्ञान मिट जाता है, वहाँ उस प्रकाश पूर्ण सत्ता का आरम्भ होता है. सदियों से जन्मों से मन जिस अंधकार में भटक रहा था वह जैसे नूर मिलते ही छंट गया है, अब कोई भ्रम नहीं रहा, कोई कामना नहीं रही, कोई वासना नहीं रही, अब शेष है तो केवल एक चिर स्थायी शांति जो आनंद से भरी है, अनोखी है यह अवस्था ! सारा अतीत जैसे किसी और के साथ घटा था, वह कोई और था, इसे ही सद्गुरू मृत्यु कहते हैं, वह जो व्यक्ति पहले था उसकी मृत्यु हो गयी यह जो व्यक्ति अब है यह बिलकुल ही नया है, समय से पूर्व कुछ नहीं होता. पकते-पकते मन झर गया है, अब इस देह से जो भी होना है, वह परमात्मा के द्वारा ही होना है, क्योंकि वह तो अब है ही नहीं ! जन्म जन्मांतरों के गुनाह योग अग्नि में जल जाते हैं, भीतर गहराई में जो ज्ञान छिपा है तभी बाहर आता है जब गुनाहों की, विकारों की परतें जल जाती हैं, तब वे पहली बार विश्राम को उपलब्ध होते हैं !  

आज पुनः क्रिया के बाद अनोखा अनुभव हुआ, परमात्मा के साथ अपनी एकता का अनुभव ! बचपन से किये गये सारे दुष्कृत्य एक-एक कर याद आए और माया के प्रभाव में किये वे सारे कर्म एक साथ ही जल गये. मन हल्का हो गया है कोई अतीत रहा ही नहीं, जो कुछ भी उनसे अज्ञान दशा में होता है, ज्ञान मिलते ही उसका कोई अर्थ नहीं रह जाता, तभी संत कहते हैं कि इस संसार में अन्याय जैसा कुछ भी नहीं, सभी न्याय है. पिछले जन्मों के भी कई अनुभव पिछले कुछ महीनों में हुए. अस्तित्त्व हर क्षण उन पर नजर रखे है, वह चाहता है कि जीव उसके साथ एक हो जाये. भीतर एक पुलक भर गयी है. गीत और नृत्य सहज ही होने लगते हैं. सभी के भीतर यही आनंद छिपा है, सभी एक न एक दिन इसी आनंद को अनुभव करेंगे. अभी वे स्वयं को मन, इन्द्रियों के घाट पर पाते हैं, उड़ने का तरीका नहीं जानते. चिदाकाश में उड़े बगैर ही वे इस दुनिया से चले जाते हैं. मन्दिर मस्जिद भी लोग जाते हैं तो अपनी इच्छाओं की पूर्ति के लिए !

चेतना नित नूतन है. पल-पल बदल रही है. जो घड़ी अभी आई है वह न पहले कभी थी न आगे कभी आएगी, फिर भी वह अनादि है. कितना सुंदर है यह ज्ञान ! परमात्मा सर्वव्यापक है, वह सर्वकालिक है, सर्वदेशीय है, इस क्षण भी वह उन्हें घेरे हुए हैं, कैसी पुलक उठ रही है !


सद्गुरु के प्रति अहोभाव से मन भर गया है. जिनको न कुछ पाने को शेष रह गया ही न कुछ करने को, वही संत जन अहैतुकी कृपा या सेवा कर सकते है. वे जो कुछ करते हैं वह आनंद के लिए,  जिसे वह मिल गया हो अब उसके लिए कुछ पाना शेष नहीं रहता ! प्रतिपल उनका मन आनन्द की खोज में लगा रहता है, ऐसा आनंद जो अनंत राशि का हो तथा जो कभी न छिने न. जिन्हें वह मिल गया उन्हें कुछ करने को शेष रहता नहीं, लेकिन फिर भी वह करते हैं, क्योंकि वह अन्यों को आनंद देना चाहते हैं ! वे केवल कृपा करते हैं, अकारण हितैषी होते हैं, सुहृद होते हैं !

Monday, December 21, 2015

कहत कबीर



कबीर के जीवन में भक्ति की पराकाष्ठा है, वह अपने गुरू से, साहेब से बहुत प्रेम करते हैं. उनके जीवन में ज्ञान की पराकाष्ठा है, वह कर्म योगी भी हैं, जीवन भर चदरिया बुनने का काम करते हैं. कबीर का सारा जीवन इस त्रिवेणी को जन-जन तक पहुँचने में लगा और उसके सद्गुरू जी तो ध्यान, ज्ञान, प्रेम, सेवा, भक्ति, कर्म, कीर्तन और न जाने कितने-कितने पथों का संगम कर रहे हैं. अद्भुत है उनका जीवन. स्टेज पर फूलों की बरसात करते हुए जब वह नृत्य करते से चलते हैं, मस्ती में झूमते भजन गाते हैं, आत्मविभोर होकर स्वयं पर फूलों की वर्षा करते हैं. समाधिस्थ होकर शंकर की मुद्रा बना लेते हैं तो हजारों-हजार व्यक्ति उनके भीतर के इस प्रेम को छूकर मुग्ध हो जाते हैं.

गुलाब में नई कलियाँ आई हैं, पर उसके पूर्व उसे कटना पड़ा, सिर दिए बिना फूल कहाँ खिलते हैं, भीतर भक्ति के फूल खिलाने हों या बाहर कर्म के, भीतर ज्ञान के फूल खिलाने हों या बाहर सेवा के. उन्हें अपने अहंकार को मिटाना ही होगा, तभी जीवन में संगम उतरेगा, तीर्थ का पदार्पण होगा, अंतर्मन शांत होगा, आत्मा की खबर लायेगा, दौड़-दौड़ कर फिर बाहर सुनाएगा. कैसी अनोखी शांति से उसका मन आजकल ओतप्रोत रहता है, कुछ रिसता रहता है चुपचाप, उसे कहने का लिखने का भी मन नहीं होता, वह निस्तब्धता इतनी भली लगती है कि उसे तोड़ने की इच्छा नहीं होती. कई-कई दिन हो जाते हैं डायरी खोले. कविता भी कई दिनों से नहीं लिखी. भीतर सन्नाटा है, पर कहीं आनन्द को पीने का चाव उसे अकर्मण्य तो नहीं बना देगा. लिखना-पढ़ना भी यदि छूट जाये तो जीवन में क्या बचेगा. परसों उन्हें यात्रा पर निकलना है, तब तो समय पंख लगाकर उड़ेगा. ज्ञान की पिपासा भीतर बनी रहे, पर ज्ञान की परिणति तो मौन में ही है. वह मौन भीतर उतरा है. सद्गुरु की कृपा से. अब कुछ पाना शेष नहीं पर देने की तो अभी बारी आई है. यह सेवा का मौसम उतरा है भीतर. आज एक सखी ने अपनी सासुमाँ को उससे फोन पर शिकायत करते सुन लिया और बहुत क्रोध में आ गयी, पर नूना की शांति उसे छू गयी और उस वक्त वह शांत भी हो गयी ! ईश्वर उसे ज्ञान के पथ पर लाये !

वे ईश्वर का ध्यान तभी तो कर सकते हैं जब उसे जान लें, पहचान तो सद्गुरु ही कराते हैं और एक बार उसकी पहचान हो जाये तो वह ध्यान से उतरता नहीं है. और तब लगता है कि जिन्हें दो मान रहे थे वे दो थे ही नहीं एक ही सत्ता थी. कहीं कोई भेद नहीं. तब लगता है, जो भी सहज प्राप्य हो, हितकर हो वही धारण करने योग्य है. तब सारे संशय भीतर से दूर हो जाते हैं, अंतर्मन खाली हो जाता है. कोई आग्रह नहीं, जैसे छोटा बच्चा होता है सहज प्रेरणाओं पर जीता हुआ, अस्तित्त्व तब माँ हो जाता है, ब्रह्मांड पिता होता है, सारे वृक्ष, पर्वत, आकाश तब सखा हो जाते हैं और सारे लोग भी एक अनाम बंधन में बंधे अपने लगते हैं.   



Tuesday, December 15, 2015

गणेश और शिव


आज उसे याद आ रहा है कि पहली बार जब सद्गुरू को देखा था तो देखते ही वह स्तब्ध हो गयी थी, उनके वर्तन ने, उनकी वाणी ने मन हर लिया, जिसके सामने हृदय झुक जाये वह सद्गुरु ही मंजिल तक ले जाता है. जो बुद्धि दूसरों में दोष देखती है वह नीचे गिराने वाली है, ज्ञान कभी भी नकारात्मक नहीं दिखाता, सदा सकारात्मक ही दिखाता है. उसके भीतर न जाने कितनी कमिया हैं, उन्हें यदि बुद्धि न देख सके तो वह बुद्धि पक्षपाती है, बुद्धि में राग-द्वेष हो, लोभ तथा ईर्ष्या हो तो ऐसी बुद्धि परदोष दिखाने लगती है. सद्गुरू कहते हैं आत्मा में रहकर ही कोई सारे दुखों से दूर हो सकता है. सतत् होश रखने की जरूरत है, उस समय तक रखने की जरूरत है जब तक जरा सा भी घास-पात भीतर न रह जाये, जब जरा सा भी घास-पात भीतर न रहे तो होश स्वभाव बन जाता है. यह होश मुक्त अवस्था में ला देता है. यही जीवन मुक्ति है.

इच्छा गति है, यह भविष्य में है, जब कोई इच्छा न रहे तभी कोई वर्तमान में आता है, स्मृति ही भूत है, समय केवल वर्तमान में है, वे कल्पना और स्मृति में रहकर वर्तमान को खोते रहते हैं, अपने आप को खो देते हैं. वर्तमान में आते ही वे साक्षी बन जाते हैं, शक्ति बच जाती है, और वे ऊपर की यात्रा कर सकते हैं, पानी नीचे बहता है और भाप ऊपर उठती है, भीतर भी जब ऊर्जा एकत्र हो जाती है, तो वह ऊपर की और जाने लगती है.

आज उसने सुना काल, स्वभाव, पुरुषार्थ, प्रारब्ध, नियति यह पांच संजोग मिलते हैं तब कोई कर्म होता है, और वे स्वयं को कर्ता मानकर सुखी-दुखी होते रहते हैं. कर्ता भाव से मुक्त होते ही चिंता का कोई कारण नहीं रहता. जीत भी यदि उसकी नहीं है तो अहंकार का कोई कारण नहीं बचता और हार भी यदि उसकी नहीं है तो दुःख भी नहीं, ईर्ष्या भी नहीं. उन्हें पकड़े रहने में दुखों को प्रयोजन भी क्या है, वे इतने मूल्यवान तो नहीं कि दुःख उनकी ओर आएं. यह जगत की व्यवस्था उनके लिए तो नहीं चल रही है, जो एक झूठे केंद्र को मानकर चलता है वह भीतर के सच्चे केंद्र को पाने से वंचित रह जाता है. अहंकार दूसरों के मत पत आधारित है. दूसरे का ध्यान मिले यही अहंकार का भोजन  है. यही अहंकार तो छोड़ना है.

ठीक ही कहते हैं एक माँ कई बच्चों को अकेले पाल सकती है पर कई बच्चे मिलकर एक माँ को सहारा नहीं दे सकते. जिस घर में माँ सुख से न रह पाती हो, उसे न रखा जाता हो, वह शांति का सागर कैसे बन सकता है. उसके अंतर में सासुमाँ के प्रति सम्मान है पर वाणी कठोर हो जाती है कभी-कभी, जो अवश्य उन्हें चुभती होगी. कल जून ने पिता से उनकी बात करके दोनों का दिल दुखाया. उन्हें क्या अधिकार है बड़ों का असम्मान करें. यही सोचना चाहिए कि भाग्यशाली हैं कि दोनों का हाथ सिर पर है.

आज सत्संग है, उसे सत्संग, ध्यान, साधना, स्वाध्याय के मर्म को जानना होगा. चिन्तन शक्ति व्यर्थ न हो, शक्ति का संचयन हो और फिर उस का सदुपयोग भी. बोलें तो ऐसा कि दूसरों को अप्रिय न लगे. सजगता के साथ-साथ सहजता भी आवश्यक है. जून आज गोहाटी गये हैं, परसों शाम को आयेंगे. आजकल वह अपने कम में बहुत रूचि ले रहे हैं. प्रसन्न रहते हैं तथा उत्साह से भरे. योग का चमत्कार है. उसकी साधना भी ठीक चल रही है, समय को व्यर्थ न गंवाए, यही महत्वपूर्ण है.  

अज सद्गुरू ने ‘गणेश पूजा’ का महत्व बतलाया. गणेश का जन्म पार्वती के शरीर की मैल से हुआ और शंकर जब लौटे तो उन्हें पहचान नहीं सके. पार्वती का अर्थ है जो पर्व, उत्सव अथवा जीवन के रंगमय रूप से उत्पन्न हुई है, एक अर्थ यह भी है जो पर्वत से उत्पन्न हुई है. उसमें जो भी मल, विक्षेप, आवरण है उसके द्वारा ही एक आकृति का निर्माण हुआ जो शिव तत्व, आत्मा को नहीं पहचान पाया. शिव ने उसे नष्ट करके हाथी का सिर अर्थात ज्ञान को आरोपित कर दिया. आत्मा के आने पर सारा मल दूर हो जाता है, ज्ञान उदार होता है इसलिए गणेश लम्बोदर हैं, उनके कान आँखों तक आ जाते हैं अर्थात वह देखी हुई और सुनी हुई बातों का मिलान करते हैं. उनकी सवारी चूहा है अर्थत एक छोटे से उपाय से महान आत्मा का ज्ञान गुरूजन करा देते हैं. एक छोटा सा मन्त्र साधक को भीतर के अनंत साम्राज्य से मिला देता है. उनके हाथ में पाश है अर्थात अंकुश आवश्यक है तथा पेट पर सर्प लिपटा है जो कहता है सदा सजग होकर रहो, उनके हाथ में मोदक है जो मस्ती का संदेश देता है, मस्ती भी सजगता भरी, ऐसे गणेश की उपासना उन्हें करनी है !