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Friday, May 2, 2014

मिलान कुंदेरा की किताब



दिल था कि संभल ही गया
जां थी कि मचल ही गयी
अक्तूबर महीने का प्रथम दिन, लॉन में हरसिंगार में फूल झरने शुरू हो गये हैं. शरद पूर्णिमा भी आने वाली है, जब चाँदनी रात में चावल की खीर बनाकर चाँद की किरणों से सेवित होने के लिए रखी जाती है. वर्षों पहले उसने वाराणसी में शरद पूर्णिमा की महत्ता पर एक प्रवचन सुना था, जिसकी स्मृति अभी तक बनी हुई है, उसमें रास का जिक्र था, राधा-कृष्ण के प्रेम का, गोपियों के मधुर भाव का. आज भी अवकाश है, उसने लंच में कढ़ी-चावल बनाये. कल शाम एक मित्र के यहाँ भोजन किया, वह भी एक सब्जी बनाकर ले गयी थी पर उसे किसी भी वस्तु में स्वाद नहीं आया.
आज दिन भर कुछ नहीं लिखा पर रात्रि भोजन के बाद बाहर वे टहलने गये तो जुगनुओं की झिलमिल ने मन मोह लिया, नन्हे ने पल भर के लिए एक जुगनू को मुट्ठी में बंद कर लिया और अंगुलियों की दरारों से झांकती रोशनी देखकर मुग्ध हो गया. उसे याद आया कभी-कभी कोई जुगनू खिड़की से उनके कमरे में आ जाता है, अँधेरे कमरे में उसकी उपस्थिति स्पष्ट हो जाती है.

बस थोड़ा सा तम हरते, टिमटिम यूँ चमका करते
बागों, खेतों, जंगल, रस्तों को जलकर उजला करते

अद्भुत काया, पंख सुनहरे, नन्हे-नन्हे दीप जलाये
सूने पथ पर साथी बनते, मीलों संग चलते-चलते

कोमल तन, छुअन कोमल, हाथों पर आ कर टिकते
हुई शाम तो दिया जलाकर, रजनी का स्वागत करते

आज उसने टीवी पर एक हास्य कवि सम्मेलन देखा-सुना, एक किताब पढ़ी Milan Kundera की, बहुत अच्छी लग रही है यह किताब. laughter का विश्लेषण लेखक ने बखूबी किया है. हँसी जो कभी-कभी आती ही जाती है, यूँही रूकती ही नहीं, महान लेखक वाकई महान होते हैं. सोचा हँसी पर खुद भी कुछ लिखे-

खन-खन करती और कभी रुनझुन पायल सी
हँसी बिखरती ज्यों नभ से वर्षा होती

अंतर से फूटे ज्यों झरना अधरों से बिखरे ज्यों नगमा
पड़ श्रवणों में मन को भी गुदगुद करती

गूँज किसी निर्दोष हँसी की बन स्मृति दिल में बसती
कभी भिगोती आँखें भी कभी नम करती  

आज भी धूप काफी तेज है, सफाई अभियान में आज वह स्टोर की सफाई करवा रही है, सुबह हल्का व्यायाम किया, पर इतना पसीना आया और श्वास भी फूलने लगी, शायद यह उसका वहम हो या अभी तक.. थक जाने की हद तक काम करने का मन अब नहीं होता. कल शाम एक सखी के यहाँ एक विज्ञापन देखा, पर इंटरव्यू उसी दिन है जिस दिन उन्हें दीवाली की खरीदारी के लिए तिनसुकिया जाना है, दिसम्बर में घूमने जाने के लिए टिकट भी उसी दिन रिजर्व करानी है. सखी ने लक्ष्मी पूजा के दिन हलवा(सूजी का) खिलाया, लगा कि प्रसाद ही खा रहे हैं. घर से ‘सगड़ा’ भी आया है, वे हर वर्ष भेजते हैं या स्वयं देते हैं, उन तीनों को हाथ पर बांधना है और फिर वापस भी भेजना है. उसे याद आया भैयादूज का टीका भी भेजना है.

Today she is alone at home since 7 in the morning. Jun has joined a training programme for three days in T &D so he is not coming for lunch. She got cleaned dining room and gallery then cooked lunch for Nanha and herself, took bath leisourly at 10.30 then read ‘bhagvad gita’ for half an hour, exercised and watched a music based prog on ptv, anchor was shanaz and guest was a modern lady singer of Pakistan. Song was about freedom, which is very essential thing for every person and for her it is a part of life, to spend some time of day with herself doing the things which she likes, so what is the use of 9-4 job for which she will have to give entire morning also at least eight hours of each day for some money, which she does not want. So ‘yes’ to tinsukiya and no to interview.

आज भी जून दोपहर को घर नहीं आये, कल शाम उन्हें घर आते-आते साढ़े पांच हो गये थे, उनकी ट्रेनिंग अच्छी रही, बहुत सी बातें उन्हें भी बतायीं. ध्यान कैसे करते हैं, मन की विभिन्न अवस्थाओं के बारे में भी, नींद, स्वप्न, तनाव सभी के बारे में. जून को इन सब विषयों के बारे में ज्यादा जानकारी नहीं थी, सो उन्हें अच्छा लगा. कल रात सोने से पहले व सुबह उठकर भी उन्होंने ध्यान किया. जिन्दगी के एक नये पहलू की ओर उनका ध्यान जा रहा है. वह बेहद खुश लग रहे थे तनाव मुक्त, वाकई में संतुष्ट. उसे इसलिए भी अच्छा लगा कि उम्र के साथ-साथ जो गम्भीरता स्वभाव में आती है वह ध्यान से ही आ सकती है. आज उन्हें प्राणायाम सिखाया जायेगा. उसने सुबह सफाई का काम आगे बढ़ाया फिर पीटीवी देखा, एक फिल्म का थोड़ा सा भाग, फिल्म की नायिका इतनी घरेलू सी लगी. मोहसिन खां का इंटरव्यू भी, जो पहले क्रिकेटर थे फिर फिल्मों में चले गये. एक सखी का फोन आया, उसने व्रत रखा है आज करवाचौथ का, जून को उसने कहा तो हमेशा की तरह उन्होंने टाल दिया उसे भी कहाँ इन बचकानी बातों में रूचि है.




  

Wednesday, October 16, 2013

आंवले का पेड़


दिल की बातें समझें ऐसे लोग कहाँ मिलते हैं
दीवाने हम जैसे जग में रोज कहाँ खिलते हैं

धूप गुनगुनी चादर ओढें नदियों की भाषा भी बूझें
पत्थर-पत्थर पाँव बढ़ाएं ऐसे कदम कहाँ चलते हैं

आँखों से मन पढने वाले खो गये वे दिल मतवाले
भूले भूले से कुछ वादे अब शाम हुए से ढलते हैं

Be happy ! it is a way of being wise !
This is a golden advice, few moments earlier she was so miserable but now heart is swinging with swing.
बाल्मीकि रामायण में किषिकंधा काण्ड के अंतर्गत राम के मुख से ‘चौमासे’ का वर्णन अद्भुत है, कल्पना की उड़ान कहाँ से शुरू होकर कहाँ तक जाती है. उपमाएं भी नवीन हैं और भाषा इतनी सुंदर, उस काल में भी मन बादलों को देखकर कैसी अनोखी कल्पनाएँ किया करता था, कवि कालातीत होता है. वह हर युग में ऐसा ही रहेगा, भाव प्रवण हृदय लिए प्राकृतिक सुन्दरता से विभोर ! वह अपने हृदय में भी उन सभी विधाओं को उमगते, विकसित होते देखता है जैसे बाहर. उसका दिल और प्रकृति कब एक हो जाते हैं पता ही नहीं चलता संसार के सबसे सुंदर गीतिकाव्यों , महाकाव्यों में से है रामायण और रामायण में प्रक्रति का सुंदर चित्रण ! कल रात बल्कि सुबह  पौने तीन बजे नन्हा बेड से नीचे गिर गया, वह तो झट दुबारा सो गया पर उसे बाद में नींद नहीं आई. सुबह जून भी यही कह रहे थे.

कल दोपहर नन्हा अपने प्रोजेक्ट वर्क के लिए मैप बना रहा था, वे खाना खाकर लेटे ही थे कि  नन्हे ने आकर कहा कोई मित्र आए हैं, उसे इस वक्त किसी के आने की उम्मीद नहीं थी, पर उसकी वह सखी सीधा कमरे में ही आ गयी और उस दिन के व्यवहार के लिए क्षमा मांगने लगी, उसकी भी आँखें भर आयीं, और कुछ ही मिनटों में सारे गिले शिकवे दूर हो गये.

पिछले आधे घंटे से कुछ ज्यादा समय से वह पत्रिका के लिए कोई अच्छी कविता खोज रही थी, पर उसे लगा डायरी में लिखी सारी कविताएँ मन की अकुलाहट को प्रकट करने का साधन मात्र हैं, इतना तो समझ में आया कि दुःख एक सिलसिला है जो आगे भी जारी रह सकता है. यूँ भी सुख-दुःख जीवन में लगा ही रहता है. ऐसी कविता जो महज आत्मकाव्य के घेरे से बाहर आ सके अर्थात सबके पढ़ने के योग्य हो अथवा जिसका आयाम विस्तृत हो, सिर्फ दो हैं, जून ने भी उन्ही दो को ठीक करने को कहा है. लेख लिखने का समय शायद ही मिले. उसने बाहर जाकर देखा माली ने आंवले का पेड़ काफी काट दिया है, कटी हुई डालियों से बच्चे आंवले तोड़ रहे हैं. एक बूढ़ा  उनके यहाँ आंवले लेने आया करता था, उसने सोचा तुड़वा कर कुछ उसके लिए रखेगी,.

कल शाम को उन्हें यात्रा पर निकलना है, पहाड़ अपनी ओर खींच रहे हैं, बर्फ से ढकी चोटियां उन्हें निमन्त्रण दे रही हैं और मन में ख़ुशी लिए वे कल अपनी यात्रा आरम्भ करेंगे. ईश्वर उनके साथ है. आज पहली बार उसने दो स्वेटर पहने हैं, धूप में बैठना भला लग रहा है., पहाड़ों पर तो शायद तीन-चार पहनने पड़ें. जाने की तैयारी भी आज करनी है. ढेर सारे गर्म कपड़े, शालें, स्कार्फ, टोपियाँ, जुराबें और दस्ताने. कल सारे कार्ड्स पर जून ने पते लिख दिए, नये वर्ष से पहले ही सबको मिल जायेंगे. नन्हे के स्कूल में स्पोर्ट्स मीट चल रही है, कल उसने तीन events में भाग लिया, खेलकूद में उसकी उतनी रूचि नहीं है जितनी पढ़ाई में, जैसे वे भाई-बहन थे बचपन में. आज उसे जून का स्वेटर पूरा करने की पूरी कोशिश करनी है, सो वह उसी क्षण से जुट गयी.

शनिवार, ३ बजे हैं दोपहर बाद के. दो घंटे बाद उन्हें निकलना है, अगले दो घंटों में उन्हें तैयार होना है, नाश्ता खाना है और साथ के लिए पैक करना है. उसने सोचा एक बार अपने साथ बैठकर सभी चीजों का जायजा ले ले, यानि सभी कुछ व्यवस्थित करने के साथ अपने विचारों को भी व्यवस्थित कर ले. सुबह उसकी पड़ोसिन का फोन आया, उसे गुजराती स्टिच सीखना था, उसने बताया तो है पर वापस आकर पुनः बताएगी. एक हफ्ते के लिए घर से दूर जाते वक्त मन थोड़ा सा आशंकित तो है, ईश्वर उन्हें सद्बुद्धि देगा और खास तौर से उसे कि सही निर्णय ले सके. छोटे-छोटे निर्णय, क्योंकि बड़े-बड़े तो जून के सुपुर्द हैं, उनके सुपुर्द कर दिया है स्वयं को और वह  सक्षम हैं उन्हें हर हाल में सुरक्षित रखने में. सो अब इस डायरी से विदा लेती है, वापस आकर फिर मिलेगी.

Wednesday, September 25, 2013

कबीर के दोहे


केवल चार दिन रह गये हैं, माँ-पापा को यहाँ आने में, उसे अभी सफाई का बहुत सा काम करना है. लिखना शुरू करते ही मन में आया कि यही सही होता इस वक्त वह कोई काम कर रही होती क्यों कि इन सामान्य बातों को लिखने से कोई फायदा नहीं, पर कुछ देर थककर/ थमकर आराम से बैठकर दिल को टटोलना भी तो आवश्यक है. दिल में क्या उमड़ रहा है, कहीं कोई रोष तो नहीं या शिकायत किसी के प्रति, कोई उलझन या परेशानी.. और अगर यह सब नहीं तो क्या दिल खुश है ? पर दिल की ख़ुशी को इतनी महत्ता ही क्यों दी जाये ? अपना कर्त्तव्य निभाते हुए यानि रोज के नियत काम करते हुए जो समझ आये जैसे स्थिति आये उसे वैसे ही लिया जाये. सुबह  बापू को सुना अब उनकी बातें समझ में आने लगी हैं, कहते हैं सत्संग मनुष्य को मालामाल कर देता है, पर सत्संग से हटते ही मनुष्य फिर कंगाल हो जाता है. कंगाल मनुष्य दुनिया को क्या दे सकता है, ईश्वर में विश्वास हमें अच्छाई में विश्वास सिखाता है. आध्यात्मिकता की पहली सीढ़ी नैतिकता है, सो चाहे उसे अपने मन के भावों को परखना हो और प्रतिदिन एक पन्ने को भरना हो, सच्ची निष्ठा के साथ करना है.

दस बजे हैं, उसका सिर भारी है, कल रात वर्षा हुई, आवाज से उसकी नींद खुल गयी और फिर आई भी तो एक लम्बा स्वप्न लिए, सुबह उठी तो मन ताजा नहीं लग रहा था. आज बहुत दिनों बाद नन्हे का स्कूल खुला है, कल जून गोहाटी जा रहे हैं, माँ-पापा को लाने. मन में एक के बाद विचार आ रहे हैं, पर पकड़ में नहीं आते. उसने जब से आँख के लिए होमियोपथिक दवा लेना शुरू किया है पानी आना कम हो गया है. जिन्दगी तो हर हाल में गुजर जाएगी, देखना है, खुद अपनी ही नजर में शर्मिंदा तो नहीं !

जून का फोन आखिर पौने आठ बजे आ ही गया, कल रात ग्यारह बजे उनका फोन आया था, पर दिन भर उन्हें समय नहीं मिल पाया होगा. आज उनकी पुरानी डाइनिंग टेबल चली गयी, जाते समय मन भर आया, किते वर्ष वह मेज उनके जीवन का अंग रही थी, अब किसी और परिवार की बातें सुनेगी. नन्हे के जाने के बाद उसने रजाई का कवर सिला. दोपहर को फिर ‘स्वामी रामतीर्थ’ की किताब से एक अध्याय पढ़ा, पत्रों के जवाब दिए, शाम को नन्हे को पढ़ाना और फिर टीवी...

And she has decided to write a beautiful prose piece describing a cold rainy day. It is raining continuously day and night since last three days. It stops for a while and then again starts. Nanha and herself had to wear woolen and she took out for jun, from the big trunk.

 सुबह एक बार नींद खुली, फिर सो गयी और सवा छह बजे आँख खुली, कल से सबको जल्दी उठना होगा, अगले एक महीने तक उनका घर भरा-भरा रहेगा. पिछले दिनों उसने कोई अच्छी पुस्तक नहीं पढ़ी, शायद यही कारण है कि शब्दों की कमी महसूस होती है, यूँही रोजमर्रा काम में आने वाले शब्दों से काम चलाना पड़ता है. कबीर के दोहे भी कई दिनों से नहीं दोहराए, सो मन ऐसे रहता है जैसे जल्दी में हो. नन्हे को सुबह तैयार होने में यूँही झुझलाहट का सामना करना पड़ता है और तना-तना सा मन लिए वह खुद भी अपराध भाव से ग्रसित रहती है. उसे लगता है वह समय का सही उपयोग नहीं कर पा रही है, समय के सही उपयोग की उसकी परिभाषा भी स्वयं को स्पष्ट रूप से नहीं समझा पाती. खैर आज शाम से इन सारी बातों का समाधान होने वाला है. वह व्यस्त रहेगी तो समय व्यर्थ जा रहा है यह भाव मन में आयेगा ही नहीं. लेकिन अभी मात्र साढ़े ग्यारह बजे हैं और शाम साढ़े छह बजे तक सात घंटे हैं जिन्हें उसे अच्छी तरह गुजारना है. हर पल का आनन्द उठाते हुए, क्योंकि ये साथ घंटे तो लौटकर आने वाले नहीं न !





Saturday, August 31, 2013

ताय कांडू yani taekwondo


‘दिल का मरहम कोई न जाने जो जाने सो ज्ञानी’

दिल का प्याला कभी छलक उठता है
और कभी खाली हो जाता है
दूर समुन्दर में कभी दिखते कभी छिप जाते
जहाज के प्रकाश की तरह
वह एक जादूगर जो छिपा है
सात पर्दों के पीछे
चुपचाप हँसता रहता है
या शायद उसकी हँसी भी रूठ जाती हो
दिल के टूटने की आवाज पर
जो वह हजार पर्दों के पीछे भी सुन सकता है !

आज मौसम ठंडा है, कल दोपहर जब वे एक और मित्र के यहाँ थे, वर्षा की मधुर झंकार सुनाई दी और तीन बजे तक बिजली भी आ गयी थी. आज शनिवार है, पिछले दो शनिवारों को नन्हे ने कोई विशेष डिश बनाने में सहायता की थी, आज भी वह तरला दलाल की किताब से कोई नई रेसिपी खोज रहा है.

टीवी पर खबरें सुनकर उसने सोचा, राजनीति यानि राज करने की नीति, राज यानि शासन और नीति यानि कुछ नियम अथवा आचार संहिता, जिसके अनुसार राज चलाया जाना चाहिए. पर राजनीति शब्द का गलत अर्थ निकाला जाता है जब उसे आज के हालात में देखा जाये, राजनीति यानि जोड़-तोड़ करके पाई गयी सत्ता का दुरूपयोग !

शाम के छह बजने को हैं, जून क्लब गये हैं, नन्हा पढ़ाई कर रहा है. वह स्कूल से आकर तायकांडू देखने एक अन्य स्कूल में गया था, आजकल वह सुबह साढ़े चार बजे उठकर क्लब तायकांडू सीखने जाता है. उसके साथ वे भी उठ जाते हैं, कुछ देर टहलते हैं, फिर समाचार देखते हुए चाय, उसके बाद जागरण. आज स्वीपर से घर का जाला आदि साफ करवाया, घर साफ-सुथरा, भला सा लग रहा है. दोपहर को हिंदी पढ़ाने गयी, लौट कर नाश्ता बनाने के बाद एक घंटा बगीचे में काम किया. कल उसने धूप की कामना की थी, जिससे आज गुलदाउदी के पौधे लगा सके, अब आज धूप न निकलने की कामना है ताकि नन्हे पौधे धूप में कुम्हला न जाएँ. इन फूलों का जिक्र आते ही उसे बंगाली सखी याद आया ही जाती है, पता नहीं वह उसे याद करती है या नहीं. सुबह से वह व्यस्त रही है फिर भी एक खालीपन का अहसास मन पर छाया हुआ है. पिछले दो तीन दिनों से जून कोई पत्रिका भी नहीं ला रहे हैं जिसे पलटकर दिल का खालीपन को भर लिया जाये, पर यह खालीपन उस एक की प्रतीक्षा में है वह उसका खुदा जाने कहाँ है ? घर से खत आया है, माँ ने लिखा है, उन्हें खुशी है कि उसकी दिनचर्या व्यस्त है. कल लेडीज क्लब की मीटिंग में गयी थी, वहाँ कुछ खास नहीं हुआ पर घर आई तो नन्हे और जून ने जिस तरह स्वागत किया वह मन को छू गया. फिर ‘हम पांच’, सैलाब और समाचार के बाद जब आँख बंद कर लेटी तो मन में क्लब की बातें ही थीं.