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Thursday, January 14, 2021

चंदा और सूरज

 

आज सुबह अपने आप ही नींद खुल गयी पौने चार बजे. हल्की सी वर्षा हो रही थी. जब छाता लेकर वे टहलने निकले, सड़कों पर पानी जमा था पर कुछ ही देर में बारिश थम गयी. उससे पहले एक स्वप्न देखा था. वे सब कहीं बाहर गए हैं, किसी सराय या धर्मशाला में हैं. माँ व भाई एक कार में बैठ जाते हैं, वह सामान लेकर जाती है पर वे उसे वहीं छोड़कर चले जाते हैं. एक अन्य व्यक्ति भी कार में है  पर कौन है पता नहीं . बचपन में झगड़े का कारण किसी जन्म में हुई इस घटना में छिपा लगता है. इस दुनिया में अकारण कुछ भी नहीं होता, उनके जीवन में जो कुछ भी घटता है उसके पीछे कोई न कोई कारण अवश्य होता है. आज छोटे भाई से बात हुई वह माह के अंत में एक सप्ताह के लिए यहाँ आएगा, उसे एक बैंक में ऑडिटिंग करनी है. दोपहर साढ़े बारह बजे उन्हें मृणाल ज्योति जाना था, विदाई भोज के लिए. कार्यक्रम बहुत अच्छा था. हॉस्टल में रहने वाले विद्यार्थी और सभी शिक्षक स्वागत के लिए खड़े थे. उन्हें सुंदर सा पीतल का होराई उपहार में दिया और कृतज्ञता पत्र भी पढ़कर सुनाया. इस संस्था से उनका जो संबंध है वह तो दिल में सदा ही रहेगा, जैसा कि जून ने अपने भाषण में कहा था. शाम को छोटे बच्चों के स्कूल में योग कक्षा की शुरुआत की. उनके जाने के बाद वहीं पर महिलाओं का नियमित योग का सत्र होगा।  कम्पनी की तरफ से विदाई समारोह के लिए जून को अगले हफ्ते की एक डेट देने को कहा गया था, पर दो दिन बाद वह बनारस जा रहे हैं. कल शाम छोटी बहन से बात की, रात अपने एक डॉ मित्र से उन्होंने बात की. आज सुबह ननदोई से, सभी ने कहा उनके एक बचपन के मित्र का स्वास्थ्य ठीक नहीं है. जून ने तय किया कि वह उनसे मिलने जायेंगे.  


आज हफ्तों बाद ब्लॉग्स पर लिखा. अभी भी काफी सामान समेटना शेष है, आज कुछ पेपर्स जला  दिए, और भी निकलेंगे. जून अभी फ्लाइट में होंगे, देर रात वह घर पहुंचेंगे. आज सुबह  व्यर्थ ही उनसे विवाद किया, उनका स्वभाव जानते हुए भी. खुद की बात ही सही है ऐसा सबका विश्वास है. इसलिए हर बात को सिर झुकाकर क़ुबूल कर लेना चाहिए. आर्ट ऑफ़ लिविंग का पहला सूत्र भी यही है, लोगों और परिस्थितियों को जैसे वे हैं वैसे ही स्वीकार करें.  दिल बहुत कोमल भी है और उतना ही कठोर भी. आर्ट ऑफ़ लिविंग का एक और सूत्र है, विपरीत मूल्य एक दूसरे के पूरक हैं. आज मंझली भाभी से बात हुई, उनकी बिटिया मलेशिया गयी है, वहाँ से उसे स्पेन जाना है, उसका होने वाला पति भी उसी के दफ्तर में काम करता है. दो महीने बाद उनके विवाह में उन्हें जाना है. दीदी ने कहा है, वे लोग भी उनके साथ उस यात्रा के दौरान पंजाब व हिमाचल जायेंगे. जून ने उनकी भी टिकट बुक कर दी हैं. आज एक पुरानी साधिका का फोन आया, वह दो-तीन महीने के लिए अपनी बिटिया के पास विदेश जा रही है. कहने लगी, उसके जाने से यहाँ कमी खलेगी, पर इस दुनिया में किसी के आने-जाने से कोई फर्क नहीं पड़ता. दुनिया को उनकी नहीं उन्हें दुनिया की जरूरत होती है ! 


आज शाम से ही पुरानी नोटबुक्स को छाँटने का काम कर रही थी. चार-पांच घण्टे लग गए. जो डायरी साथ रखनी हैं और जो नष्ट कर देनी हैं, उन्हें अलग-अलग किया. किताबों में भी इसी तरह तीन समूह बनाये, एक जो ले जानी हैं, दूसरी जो स्कूल की लाइब्रेरी में देनी हैं , तीसरी जो  महिलाओं को देनी हैं. कुछ देर पहले जून से बात हुई, उनके मित्र अस्पताल में हैं पिछले तीन दिनों से, कल दोपहर तक शायद वापस घर आ जायेंगे. आज वह उन्हें एक अन्य डॉक्टर को दिखाने ले गए. उनके दोनों पुत्र भी आ गए हैं. कल दोपहर गायत्री योग साधिकाओं के समूह ने विदाई भोज रखा है. वे सभी उसके यहाँ आएंगी और अपने साथ भोजन बनाकर लाएंगी. वे भी उनके लिए शिलांग से उपहार लाये हैं. आज दोपहर स्वप्न में कोई सुस्वादु पदार्थ खाया, कैसा जीवन्त अनुभव था. सोने से पूर्व समाधि के बारे में सुना था. पुरानी डायरी में कृष्ण को लिखे पत्र पढ़े ! परमात्मा के लिए प्रेम जैसे उन दिनों पूरे ज्वर पर था, अब भीतर कैसी स्थिरता छा गयी है. दो दिन पूर्व कैसा अनोखा स्वप्न देखा, गुरूजी को देखा, वह सम्भवतः शिष्यों को परख कर रहे हैं, वह उन्हें देखती है और सुध खोकर गिर पड़ती है, फिर देह से निकल कर आकाश में उड़ने लगती है, कितना सजीव था सब कुछ ! जीवन के रहस्य को कोई कैसे समझ सकता है ! 


वर्षों पूर्व ...कालेज खत्म होने बाद उस दिन के पन्ने पर लिखा था - अभी-अभी वह सूरज और चाँद से मिलकर आ रही है. कितना सुख था यह कहना कि वह उनके लिए है ! एक तरफ सूर्य की हल्की लालिमा तथा दूसरी तरफ पूरा गोल चाँद और इतना बड़ा आकाश, कितना सुंदर मैदान, वह पागल थी उस एक क्षण... हँसी उसके होठों से फूट रही थी और शी वाज फुल विद दैट फेमिनिन फीलिंग ... जिस स्कुल में उसने पढाना शुरू किया था, कल वह उसकी प्रिंसिपल से मिलकर अपने ओरिजनल सर्टिफिकेट लेने वाली थी, जो जॉब देने से पहले उन्होंने रख लिए थे. उसे आगे पढ़ाई के लिए अप्लाई करना था. 


Wednesday, June 17, 2020

सूरज की बिंदी


सुबह के साढ़े आठ बजे हैं. दो दिनों के ‘बंद’ के बाद आज जून दफ्तर गए हैं. सरकार सिटिजनशिप बिल के द्वारा कुछ अन्य देशों के धर्म के आधार पर पीड़ित हिंदुओं को भारत की  नागरिकता देना चाहती है, जो किसी तरह जान बचाकर भारत आते रहे हैं, बिना नागरिकता के रह रहे हैं. इसके खिलाफ ही था परसों का बंद. आज जो सफाई कर्मचारी आया है कह रहा है, उसके पूर्वजों को अंग्रेज बिहार से यहाँ असम लाये थे, पर अब तो यही उनका घर है. कल रात भर गर्जन-तर्जन के साथ वर्षा होती रही, कई बार बिजली चमकने व गड़गड़ाहट से नींद भी खुली. सुबह टहलने गए तो बारिश रुकी हुई थी, सड़क खाली थी, कुछ देर बाद ही सारी बत्तियां भी बुझ गयीं, लगभग अँधेरे में ही प्रातः भ्रमण हुआ. कल शाम को क्लब की मीटिंग थी, वर्तमान प्रेजिडेंट की अंतिम कमेटी मीटिंग. कुछ जिम्मेदारी उसे सौंपी गयी है, भावी प्रेसीडेंट ज्यादा व्यस्त है इसलिए. दुबई से लाये खजूर वह सबके लिए ले गयी थी.  आज दोपहर मृणाल ज्योति जाना है नए वर्ष के कैलेंडर, डायरी और केक लेकर, हर वर्ष वहाँ टीचर्स को प्रतीक्षा रहती है. बाहर से झगड़ने की आवाजें आ रही हैं, पिछले घर में रहने वाली किशोरियां हैं जो पिता की बात जरा नहीं मानतीं, स्कूल जाना भी छोड़ दिया है. दुबई यात्रा पर दो कविताएं लिखीं, दो सखियों की विदाई कविताएं टाइप करनी हैं जिनके पतिदेव सेवा निवृत्त हो रहे हैं. 

उस पुरानी डायरी में लिखा है, जीवन में कुछ पल भी अवसाद भरे क्यों हों, कुछ क्षण भी बोझिल क्यों हों. जिन पलों में मन की शांति भंग हो जाये, आँखों में अश्रु आ जाएँ. मुख से कोई शब्द न फूटे पर भीतर मौन भी रुचि न रहा हो. मन खुद से बात करे पर बाहर चुप्पी छायी हो. क्या ऐसा पहले भी कितनी बार नहीं हुआ होगा, इस जन्म में या पिछले जन्मों में. जीवन इसी तरह गिरता-पड़ता, रोता हुआ अपनी यात्रा तय करता आया है. ऐसे क्षण ही मन की दुर्बलता के, मन के अंधियारे के पोषक हैं. इन्हें दूर फेंक कर जलती हुई शिखा की तरह मुस्काना होगा. जीवन सुख का ही नाम है और सुख जीवन का. जिन पलों में आँखें हँसी हैं उन स्मृतियों का ऋण है मन पर, कुछ गीतों का और सपनों का भी. हँसते-गाते कुछ बच्चों का भी और सबसे बढ़कर इक धरती और इक सूरज का ऋण है उस पर ! 

मेरे गीत अमर कर दो ! इंसानी दिल को को ही यह फरियाद करने की जरूरत पड़ती है क्योंकि ऐसा करने से उसे सुकून मिलता है, पर ‘सूरज’ उसे कभी कहने की आवश्यकता नहीं हुई, वह जो नित नए गीत लिख जाता है आकाश पर, धरती पर भी ! अभी कुछ क्षणों पहले सूर्योदय का भव्य और रोमांचकारी दृश्य देखकर आयी है. मन जो पोर-पोर तक उस उस वक्त सूरज का कृतज्ञ था, ग्रे और श्वेत रंग की विशाल स्लेट पर जैसे कोई लाल चमकदार बिंदी सजा दे, और वह बिंदी उसके साथ-साथ चल रही थी. वह दो कदम आगे तो वह भी आगे पीछे तो वह भी पीछे ! कोई अन्य सजीव या निर्जीव वस्तु नहीं दिख रही थी. कोहरे की परत ने सभी पर आवरण कर दिया था, सिर्फ एक सूरज और दूसरी वह स्वयं... 

जॉली और ड्यूक ! राजकुमारी और जॉली, सिल्विया और राजा, ये पात्र बचपन से उसके मन में सजीव हैं. जब भी ‘एक गीत की मौत’ रेडियो नाटक  सुनती है, करुणा से भर जाता है मन ! जॉली और ड्यूक का अद्भुत ऊँचा प्रेम ! सोहराब मोदी की तीसरी फिल्म ‘पृथ्वी वल्लभ’ देखी आज. छोटे भाई ने एक घायल चिड़िया का बच्चा उसे लाकर दिया जैसे वह दम तोड़ने की प्रतीक्षा कर रहा था. हाथों में आते ही बिना पानी पिए चला गया, उसने ऐसा क्यों किया, पहले वह हिल-डुल रहा था फिर शांत... किसी की मौत अपने हाथों में.. पता भी नहीं चला एक सेकण्ड से भी कम समय में उसके प्राण निकल गए. उसने उसे मिट्टी में दबा दिया चंद आँसुओं के साथ ! 

Wednesday, June 26, 2019

सिस्टर निवेदिता



ठंड बढ़ गयी है. आज पहली बार इन सर्दियों में धूप में बैठकर लिख रही है. बाहर निकली तो एक बगुला बैठा था, हल्की सी आहट से ही उड़ गया, कितना संवेदनशील रहा होगा. सुबह उठे तो कोहरा बहुत घना था, तापमान बारह डिग्री था. लेकिन उसी ठंड में वे टहलने गये, आकाश पर तारे थे और सब कुछ शांत था. आज जून को लंच पर घर नहीं आना है, इसलिए किचन बंद है. कल शाम का भोजन भी फ्रिज में पड़ा है. जब भूख ज्यादा सताएगी तभी कुछ खाएगी. पिछले दिनों स्वप्न में खाने-पीने की वस्तुएं देखीं. मन भोजन के प्रति कितना आसक्त रहता है, जब तक देह भाव बना हुआ है भोजन के बिना वे रह सकते हैं, यह विचार भी नहीं आ सकता. वे भूख के बिना भी खाते हैं, केवल स्वाद के लिए भी खाते हैं. चाय से अम्लता होती है, इसका अनुभव होने के बाद भी उसके प्रति मोह बना ही हुआ है. कितने ही साधु-संत ऐसे हुए हैं जिन्होंने क्षुधा पर विजय पायी है. मन निर्विकल्प स्थिति में रहे इसका निर्णय भी अडिग नहीं रहता. पुरानी स्मृतियाँ कब मन को घेर लेती हैं, ज्ञात ही नहीं होता, स्मरण आते ही मन वर्तमान में आ जाता है पर इतनी देर ऊर्जा का व्यर्थ ही अपव्यय होता है. नैनी के बच्चे आंवला चुनने आए हैं, जो घास पर गिरे ही रहते हैं. कल शाम की मीटिंग ठीक थी, अध्यक्षा का भाषण हमेशा की तरह बहुत लम्बा था. अगले हफ्ते वह उन तीन महिलाओं से मिलेगी जिनका विदाई समारोह होना है, सभी के लिए कुछ लिखेगी. मृणाल ज्योति की पत्रिका पढ़ी, और वार्षिक रिपोर्ट भी, आज मीटिंग है, अब शायद कुछ ही समय और वह उनके साथ काम कर पाएगी. सुबह एक सखी को व्हाट्स एप पर संदेश भेजा, उसने कोई इमोजी भेजा जो उसके फोन पर खुल ही नहीं पाया. मन में विचार उठा पता नहीं क्या भेजा है.यही तो माया है, महामाया की उपासना करने से माया के पार जाया जा सकता है.

कुछ देर पहले ठंड थी, कोहरा था और अब सूरज निकल आया है, धूप कितनी भली लग रही है. आज हवा भी चल रही है. सुबह पूजा के बाद जल डालने आई तो सूर्य देव बादलों के पीछे छिपे थे, देखते ही देखते प्रकाश झलकने लगा, एक ही चेतन सत्ता से यह सारा जगत बना है, गुरूजी का यह वाक्य स्मरण हो आया. उनके भीतर जो तत्व है वही सूरज की गहराई में में है, उस तक संदेश पहुँच जाता होगा तत्क्षण ! आज शनिवार है, कल रात सोने में कुछ देर हुई, जून के बहुत पुराने मित्र भोजन के लिए आए थे, लग रहा था पहले के दिन लौट आए हैं. इधर-उधर की बातें भी ज्यादा हुईं. अख़बारों की सुर्खियाँ, राजनीति, कम्पनी की नई नीतियाँ, देश का वातावरण आजकल मिश्रित है.. देश जैसे बंट रहा है, गणतन्त्र में ऐसा होता ही है, सबको अपनी बात कहने का अधिकार है आदि आदि.  क्लब से किसी कार्यक्रम में गाने की आवाजें भी आ रही थीं. सुबह उठने में कुछ देर हुई. आज नये वर्ष का छठा दिन है. पिताजी से बात हुई. उन्होंने अपनी उम्र के कारण होने वाली तकलीफों को ख़ुशी-ख़ुशी स्वीकार कर लेने की बात कही. आत्मा का अल्प मात्र भी अनुभव हुए बिना कोई ऐसा कह नहीं सकता, अपने भीतर शक्ति और शांति के उस अमृत स्तम्भ को पाकर ही कोई निर्भार हो सकता है.

अब दोपहर हो गयी है. धूप में वे अब भी बैठे हैं. लॉन के कोने में, शायद एक दो घंटे और रहेगी धूप. आज लंच में कर्ड-राईस बनाये थे. शाम के लिए बगीचे से मेथी व हरे प्याज के पत्ते तोड़े हैं मकई के आटे में मिलाने के लिए. इस माह गुरूजी के जीवन पर लिखी उनकी छोटे बहन भानु दीदी की पुस्तक प्रकाशित हो रही है. जून ने आज ही आर्डर कर दी है. इंटरनेट पर बनी मित्र वाणी जी की कविता पर अपने विचार अभी तक नहीं लिखे हैं, उन्हें इंतजार होगा, समय कितनी शीघ्रता से गुजर जाता है, वे वहीं खड़े रह जाते हैं. योग सीखने आने वाली एक सखी ने सिस्टर निवेदिता द्वारा लिखी एक पुस्तक उपहार स्वरूप दी है. स्वामी विवेकानन्द के भीतर जगत के कल्याण की कितनी तीव्र पिपासा उनके गुरू ने जगाई थी. जैसे उनके गुरूजी सेवा के लिए प्रेरित करते हैं. उनके कर्म सहज हों, निस्वार्थ हों और कतृत्व अभिमान न हो. मनसा सेवा तो हर क्षण की जा सकती है. जब भी उनके मन अस्तित्त्व के साथ एक हो जाते हैं, वे प्रेम ही तो बहने देते हैं स्वयं के माध्यम से !

Friday, April 28, 2017

चीजलिंग का नाश्ता


आज सुबह एक स्वप्न देखा, पिछले दिनों भी कई अद्भुत स्वप्न देखे पर सुबह उठकर याद नहीं रहे, लिखा नहीं कुछ. कल देखा, एक विशाल नदी है, सागर जैसी. किनारे पर एक संकरी गली है, उसमें वह जाती है, एक गेंद जैसा हाथ में कुछ है, जो गिरकर दूर तक निकल जाता है. एक बच्चा उसे वहाँ से फेंक देता है जो नदी के किनारे के दलदल में गिर जाती है, वह उसे पकड़ने नदी में उतरती है गेंद को पकड़ते समय लहरों में आगे खींच ली जाती है. किनारे के लोग कहते हैं, डूब रही है, पर वह बड़े आराम से लहरों को पार करते-करते दूसरे किनारे पर पहुंच जाती है. आज पिताजी को डिब्रूगढ़ जाना था, वह लम्बी यात्रा से थक जाते हैं. आज दो सदस्याओं  के लिए लिखी विदाई कविताएँ टाइप कर लीं थीं. जून ने उनके लिए बहुत सुंदर कार्ड बनाये हैं.

पिछले दो दिन नहीं खोली डायरी. परसों से पिताजी का स्वास्थ्य ठीक नहीं है. दो दिन देशव्यापी बंद भी रहा. जून घर पर ही थे. सुबह वे टहलने नहीं गये, शाम को जाना है. फूलों का दर्शन भी करना है. गेस्ट हॉउस व क्लब में फूलों का मेला लगा है. सुबह उठे तो पिताजी बिस्तर पर नहीं थे, वे दोनों पानी पी रहे थे कि जोर की आवाज आई. जून दौडकर गए, बाथरूम का दरवाजा बंद था अंदर से उनकी आवाज आयी, गिर गये हैं, पर ठीक हैं, अभी दरवाजा खोलते हैं, पर दो-तीन मिनट बीत गये, फिर दुबारा पूछा तो बोले, खोलते हैं, रुको. दो-तीन मिनट और बीते तब दरवाजा खोला. उनके सिर पर बाएं ओर चोट लगी थी, हल्का गुलाबी रंग हो गया था, पर खून नहीं निकला था. उन्हें बिस्तर पर लिटाया. वे सो गये. कुछ देर बाद उन्हें उठने के लिए कहा तो मना करने लगे. फिर दर्द के कारण जब सिर को दबाया तो खून निकल आया. उन्हें अस्पताल ले गये, पट्टी बांध दी है और दवा भी दी है. अब नाश्ता करके बाहर बैठे हैं, धूप उन्हें अच्छी लग रही है. आजकल वह अपने को बहुत दुर्बल मानने लगे हैं, बात-बात पर उनकी आँखें नम हो जाती हैं. वृद्धावस्था व्यक्ति को विवश कर देती है. अभी फरवरी चल रहा है पर धूप में तेजी आ गयी है.

फिर तीन दिनों का अन्तराल. आज पिताजी का सी टी स्कैन हुआ. सोमवार को रिपोर्ट मिलेगी. जून कल दिल्ली जा रहे हैं, बुध को डाक्टर को मिलते हुए लौटेंगे. उनकी किडनी में शायद कुछ समस्या हुई है. उम्र ज्यादा होने पर शरीर के अंग अपनी कार्य क्षमता खो बैठते हैं. कल शाम बंगाली सखी की दीदी आयी थीं, उनके लिए एक कविता लिख भेजी है, उन्हें अच्छी लगी. जून सुबह से पिताजी के साथ ही थे अस्पताल में, अब दफ्तर गये हैं. बड़ी ननद की बड़ी बेटी ने पुत्र को जन्म दिया है. दुनिया इसी तरह चलती जा रही है. उसका अंतर परमात्मा के प्रेम से लबालब भरा हुआ है ! उसका साथ कितना मधुर है. जगत भी सुंदर है तो उसी के कारण, क्योंकि जो चेतना उसमें है वही सबमें है, सब उसी के कारण जीवंत हैं.


शाम के पौने पांच बजे हैं, अभी आकाश में सूरज का उजाला है, विदा लेते हुए सूरज का अंतिम उजाला. पिताजी अब पहले से ठीक हैं, उन्हें मूड़ी व चीजलिंग गर्म करके दिए उसमें काला नमक व काली मिर्च डालकर, पसंद आये, पिछले दो दिनों से ब्लॉग पर कुछ भी पोस्ट नहीं किया. लिखने की कोई वजह नजर नहीं आती, मन ध्यान में डूबा रहना चाहता है.

Monday, April 24, 2017

सूरज का लाल गोला

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नये वर्ष का चौथा दिन ! कल रात मूसलाधार वर्षा हुई, इस वक्त भी बादल बने हैं. जून आज मुम्बई गये हैं, कल कोचीन जायेंगे. वे यात्रा के नाम से बहुत प्रसन्न होते हैं, उन्हें नये-नये स्थान देखना भी भाता है और यात्रा की परेशानियाँ जरा भी परेशान नहीं करतीं. महर्षि अरविन्द पर लिखी एक पुस्तक बंगलूरू की उस दुकान से खरीदी थी, जहाँ किताबें ही किताबें पड़ी थीं, सीढियों पर भी किताबें. महान योगी थे वे. संस्कार में आजकल सद्गुरु का पतंजलि योगसूत्र पर बोला भाष्य प्रसारित हो रहा है. बहुत सी बातें स्पष्ट हो रही हैं. कितना कुछ जानने को है अभी, अनंत है वह परमात्मा..वे तो कुछ भी नहीं जानते..कई बार ऐसा लगता है जैसे पहले वह जो जानती थी अब उतना भी नहीं जानती. जीवन एक रहस्य है जो जाना नहीं जा सकता, जीया जा सकता है. शाम गहराती जा रही है, पांच भी नहीं बजे हैं अभी दस मिनट शेष हैं.

ठंड आज कुछ ज्यादा है, स्वेटर के भीतर त्वचा और त्वचा के भीतर हाड़ों को छूती हुई. सुबह आसमान पर बादल थे या कोहरा, सब श्वेत था मध्य में लालपन लिए नारंगी सूरज का गोला आकाश में ऊपर तो चढ़ आया था पर अभी तक बालसूर्य सा लग रहा था. उसे देखकर मन कैसा उल्लसित हो उठा, जैसे परमात्मा के माथे पर लगा टीका हो या..एक और उपमा उस वक्त ध्यान में आई थी पर अब मन से पुंछ गयी है. कई बार ऐसी सुंदर पंक्तियाँ मन में कौंध जाती हैं पर तब लिखने का साधन नहीं होता. एक सखी का फोन आया था, भावुक है, कलाकार है, पर बोलती कुछ ज्यादा है. कल क्लब के वार्षिक उत्सव की कला प्रदर्शनी में उसकी कृति भी लगायी जाएगी, उसे आमंत्रित किया है. कल शाम पिताजी से फोन पर बात की, बार-बार फोन कट जाता था, पर वह कोशिश करते रहे जब तक बात पूरी नहीं हो गयी, जबकि वह एक बार कट जाने के बाद दुबारा प्रयास नहीं करती, उनसे सीख लेनी चाहिए. कल एक परिचिता आयीं थीं, सेंट जेवियर्स स्कूल के बच्चों द्वारा लिखी कुछ असमिया कविताओं का हिंदी अनुवाद उसे देखने के लिए देकर गयी हैं. भविष्य में हिन्दी में यह किताब छपेगी, जिसमें भूपेन हजारिका, मामोनी और अब्दुल कलाम के लिए लिखी कविताएँ हैं.


आज धूप चमचमाती हुई निकली है. कल बड़ी ननद का फोन आया, मंझली भांजी की मंगनी तय हो गयी है, लड़का बंगाली है. उसने सोचा उसकी बंगाली सखी को सुनकर अच्छा लगेगा. आज सुबह टहलने गयी तो आई पौड पर मृत्यु पर प्रवचन सुना, कितनी अद्भुत व्याख्या करते हैं सद्गुरु ! टीवी पर मुरारी बापू की कथा आ रही है. परमात्मा का बखान करते-करते थकते ही नहीं, गाए ही चले जाते हैं. इलाहबाद में कुम्भ का मेला लगने वाला है, करोड़ों लोग आएंगे उस परमात्मा का गुणगान करने ही तो. परमात्मा घट-घट वासी है पर वह नित नूतन है, बासी नहीं है. कल रात छोटे भाई को सुंदर प्रवचन देते सुना, अद्भुत स्वप्न था वह. रात को ध्यान करते-करते सोयी थी. अभी उससे बात हुई, कल रात उसे भी स्वप्न आया कि वह किसी को समझा रहा है बहुत विस्तार से, आश्चर्य है और नहीं भी, परमात्मा सब कुछ कर सकते हैं ! भाई ने कहा वह इस बारे में ज्यादा बात करेगा तो उसकी आँखों से अश्रुपात होने लगेगा, उसने कहा, उसका यह तबादला भी कृपा से हुआ है, वह अपने सद्गुरु से जुड़ा है और वह उसे दिशा दिखाते हैं. सचमुच उसका समर्पण कहीं ज्यादा है.

Tuesday, November 15, 2016

सूरज और बादल


अप्रैल का अंतिम दिन ! देखते-देखते नये वर्ष के चार माह गुजर गये और गुजर गया उनके जीवन का का भी एक और हिस्सा. एक दिन सारी सांसें गुजर जाएँगी और वे आकाश में स्थित होकर देखेंगे अपने ही तन को निस्पंद ! उससे पहले ही यदि संसार को कुछ देना है तो दे देना चाहिए कुछ और गीत कुछ और कविताएँ ! ! मार्च माह की कविताओं में भी उसकी कविता सातवें पायदान पर आयी हुई, ‘पिता’ नामकी कविता अभी अगले तीन हफ्ते तक कहीं प्रकाशित नहीं करनी है. आज जून ऑफिस में ही लंच लेने वाले हैं. मुख्य अधिकारी का विदाई समारोह है. उन्होंने काफी कलात्मक भाषा में विदाई भाषण लिखा है. नन्हा पिछली बार एक किताब लाया था जिसमें साईं बाबा के किसी भक्त ने उनके साथ घटे अपने अनुभवों को लिखा है, आज कुछ देर पढ़ी.

पिछले दो दिन कुछ नहीं लिखा, गले में दर्द था परसों शाम से ही. आज काफी ठीक है, लेकिन नाक बंद है. शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता कम हुई है तभी जुकाम हुआ या फिर यह किसी कर्म का परिणाम है. यदि भीतर प्रश्न जिन्दा रहते हैं तो समय-समय पर नये विचार आते हैं. यदि समझा-बुझा कर मन को शांत कर दिया और भीतर तक पहुंचे नहीं तो मार्ग अवरुद्ध हो गया, उदासीन होकर बैठ जाने से रास्ता मिलता नहीं.

कल चार तारीख थी, बच्चों को पढ़ाते समय उसने तीन लिखी, उन्होंने भी नहीं बताया, जबकि वे स्कूल भी गये थे. सोये-सोये ही वे सारी उम्र गुजार देते हैं, आखिर कब होगा जागरण ? आज मौसम गर्म है. मई में यही स्वाभाविक ही है. गले में चुभन है सो चावल खाने का मन नहीं है. योग वशिष्ठ में पढ़ा कि जब भोजन पचता नहीं तब व्याधि होती है. तनाव होने से भोजन नहीं पचता. महीनों से भोजन के समय वातावरण बोझिल हो जाता है, माँ कुछ खाना नहीं चाहतीं तो कभी पिताजी झुंझला जाते हैं कभी जून. आत्मा है ऐसा भान हर समय बना नहीं रहता, रहे तो भी मन, बुद्धि, शरीर सब अपनी जगह हैं जो प्रकृति के अनुसार चलेंगे. आज उसे लग रहा है अवश्य ही साधना में कोई गहरी भूल हो रही है अभी तक परमात्मा की कृपा को पूर्ण रूप से अनुभव नहीं कर पायी है. अब भी लगता है कुछ नहीं जानती !

उस साधक की लिखी किताब पढ़कर काफी कुछ स्पष्ट होता जा रहा है, कितने सोये रहते हैं वे, आसक्ति, राग व द्वेष के शिकार होते हैं और सोचते हैं कि सब जानते हैं. अपने अज्ञान का ज्ञान होना ही वास्तव में ज्ञान की पहली सीढ़ी है. मन कैसा धुला-धुला सा लग रहा है, पर अभी भी कितनी परतें छुपी होंगी, दबी होंगी. सद्गुरू दूर रहकर भी शिष्य को सन्मार्ग पर लाने का कार्य करते रहते हैं. सद्गुरू का प्रेम अनंत है, वे उन्हें क्या प्रेम करेंगे, उनके पास एक बूंद भी नहीं जो है भी तो उसमें न जाने कितनी वासनाएं घुली-मिली हैं. परमात्मा को जो अर्पित होगा वह पावन होगा, पर परमात्मा कृपालु है, वह कोई भेद करना जनता ही नहीं, जो उसे पुकारे उसी पर कृपा लुटाता है !

तन स्वस्थ हो तो मन भी स्वस्थ रहता है. आज एक गर्मी भरा दिन है, बाहर धूप बहुत तेज है. चमचमाता हुआ सूर्य जैसे गुस्सा गया है, बादलों को चिढ़ा रहा है कि अब देखें वे उसे ढक के...उधर बादल भी जब मौका देखेंगे बदला लेगें ही. पिताजी बाहर बैठे हैं, अख़बार पढ़ चुके हैं, चुपचाप बैठे हैं, भीतर कमरे में अपनी कुर्सी पर माँ बैठी हैं जैसे उनकी दुनिया से बाकी दुनिया जुदा है, वैसे ही बाकी दुनिया से उनके बच्चों की दुनिया जुदा है. कल नन्हे को साईं बाबा की बात कही तो वह उन्हें जादूगर कह रहा था. भगवान से बड़ा कोई जादूगर है क्या ? परमात्मा की ओर जो ले जाये वह जादूगर कृष्ण भी तो था.. 


Wednesday, August 10, 2016

साँझ का सूरज


परमात्मा हर वक्त उनके साथ है, ‘सद्गुरू’ हर क्षण उनके साथ है, ‘आत्मा’ हर पल उनके साथ है. वे तीनों कितने-कितने उपायों से उन्हें संदेश भेजते हैं, कितने उपाय करते हैं कि उन्हें ख़ुशी मिले, ऐसी ख़ुशी जो वास्तविक है, जो किसी पर निर्भर नहीं है जो उनके भीतर से आयी है. वे इसके लिए कभी-कभी दंड भी देते हैं. बाहर जब सुबह का सूर्य उगा हो, शीतल सुगन्धित पवन बह रही हो, पंछियों का मधुर गुंजार हो रहा हो, ऐसे में कोई बच्चा स्वप्न में रो रहा हो तो कौन माँ उसे झिंझोड़ कर जगा न देगी, वह उसे प्रसन्नता देना चाहती है, ऐसे ही अस्तित्त्व उन्हें जगाता है. कष्ट भेजकर वह कहता है मार्ग बदलो. भविष्य में उन्हें सद्गुरू के बहुत से कामों में सहयोगी होना है, उनका आश्रय वही हैं. उसे तो पग-पग पर उनका निर्देश मिलता प्रतीत होता है. जून पुनः आर्ट ऑफ़ लिविंग का बेसिक कोर्स कर रहे हैं. दीदी से परसों बात हुई, उनके जन्मदिन पर एक कविता लिखे ऐसा मन में आया है. आज न वर्षा है न धूप, उमस भरा मौसम है.

सवा दस हुए हैं सुबह के. वर्षा इस वक्त थमी है. सुबह वे टहलने गये, लौटते समय जून ने कहा, आकाश में काले बादल हैं, उन्हें यहीं से घर चले जाना चाहिए. उसने कहा ‘यस’, और देखो, उनके घर पहुंचने के कुछ ही पलों बाद मूसलाधार वर्षा शुरू हो गयी. वे छाता भी नहीं ले गये थे, यह कृपा का प्रत्यक्ष उदाहरण है. पिछले कई हफ्तों से अनुभव कर रही है, जैसे सद्गुरू पल-पल उन पर नजर रखे हुए हैं. जब वह यहाँ आये थे, तो उनसे उसने जून के विषय में कहा था. डेली कोट्स के जरिये वह हर दिन उन्हें संदेश देते रहे हैं. कितनी बार ऐसा हुआ शाम को जिस विषय पर वे बात करते थे अगले दिन वही विषय उनके संदेश में रहता था, कैसा आश्चर्य है, सच्चे दिल से की गयी प्रार्थना कभी अनसुनी नहीं रहती. उसका हृदय कृतज्ञता से भरा है. कितने-कितने भाव उठते हैं. वह मशाल बनकर उनके आगे–आगे चल रहे हैं, वह शमा बनकर जल रहे हैं ताकि उनकी ज्योति से अनेकों आत्माएं प्रज्ज्वलित हो सकें. एक आत्मा के दीपक से ही दूसरी आत्मा का दीपक जल सकता है. वह ज्योति गुरु दृष्टि से भी भेज सकता है, स्पर्श से भी और मात्र स्मृति से भी..कैसा अनोखा संबंध है गुरु और शिष्य का. यहाँ प्रेम का आदान-प्रदान मीलों दूर से भी होता रहता है..प्रतिपल यह प्रेम बढ़ता ही जाता है, बल्कि दोनों प्रेम में एक ही हो जाते हैं. सद्गुरू ने उसे उसकी सारी दुर्बलताओं के साथ अपनाया है...उसे भी जगत को ऐसे ही स्वीकारना है..सब न्याय है..जो हुआ..जो हो रहा है...जो होगा..सब कुछ उस परम पिता का वरदान है..उन्हें सजग रहकर उसकी आवाज को सुनना है..यही साधना है !  

झूले पर बैठकर डायरी लिखना..मई की इस सुहानी साँझ को सुखद अनुभव है. पड़ोसी के घर बच्चे  झूला झूल रहे हैं, शोर मचा रहे हैं. कोई गिटार बजा रहा है, रह-रह कर संगीत की ध्वनि कान में पडती है, सूर्य सुनहरा हो गया है, कुछ ही पलों में लाल हो जायेगा और फिर शाम का धुंधलका छा जायेगा. जून कोर्स में गये हैं, माँ-पिताजी लॉन में बैठे हैं. उसने कुछ देर सूखे फूलों की कटिंग की. दोपहर को ‘शांतला’ की कहानी पढ़ी. रोचक है, वर्षों पहले उसने और माँ ने साथ पढ़ी थी, वह अब न जाने कहाँ होंगी, किसी नये रूप में किसी के घर में जन्मी तो होंगी. कितना क्षणिक होता है मानवों का आपस में मिलना थोड़े समय का और बिछड़ना अनंत काल का और परमात्मा के साथ मिलन होता है तो अनंत काल का.. आज सुबह ध्यान में अस्तित्त्व के साथ एकत्व का अनोखा अनुभव हुआ, इसी को नारद कहते हैं कि भक्ति नित नई है और सदा बढ़ने वाली है. अंतर जैसे-जैसे तैयार होता जाता है वैसे ही वैसे, प्रेम प्रकट होता जाता है. उसने दीदी के लिए कविता लिखनी शुरू की.



Friday, September 19, 2014

बादल और सूरज


कल रात फिर माँ को सपने में देखा. वे सभी थे. पिता, सभी भाई-बहन. वह काम कर रही थी, जैसे कि सशरीर हों, वास्तव में वह नहीं थीं, फिर वह पलंग पर बैठ जाती हैं और पानी मांगती हैं. वे उन्हें पानी नहीं दे पाते क्योंकि उनका भौतिक अस्तित्त्व नहीं है. मंझला भाई बोतल से उन्हीं के सामने पानी पी रहा है और वह गिड़गिड़ाती हैं, फिर दुःख और क्रोध से कहती हैं कि उन्हें पानी न देकर क्या वे सब जीवित रह पाएंगे? कैसा अजीब सा स्वप्न था, पर स्वप्न का अर्थ ही है अजीब...इसके बाद ही वह जग गयी और यही सोचती रही कि उसके ही मन ने इसे गढ़ा होगा, वास्तव में ऐसा नहीं होगा कि माँ को अंतिम समय में पानी की जरूरत रही हो और वह उन्हें न मिला हो. पर अब इन बातों का कोई अर्थ नहीं है, जाने वाले एक बार जाकर वापस नहीं आते. कल जून ने “बस इतना सा सरमाया” की spiral binding भी करवा दी. नन्हे ने उस दिन कवर पेज भी कम्प्यूटर पर प्रिंट कर दिया था. माँ की कृतज्ञ है कि न होने पर भी उन्होंने उसे इतना बल दिया. कल शाम वे उड़िया मित्र के यहाँ गये. सखी की तबियत ठीक नहीं थी पर उसने अच्छी आवभगत की अब वापसी पर घर आने का निमन्त्रण भी दे दिया है. आज सुबह से सूरज निकला है अभी पैकिंग का कुछ काम शेष है. जून के आने से पहले समाप्त हो जाने से अच्छा है वरना वह बहुत जल्दी परेशान हो जाते हैं.

आज सुबह पिता से बात की, ठंड वहाँ कम हो गयी है सो ज्यादा गर्म कपड़े ले जाने की आवश्यकता नहीं है. इस समय फिर आकाश बादलों से ढका है, धूप निकलती है तो सब कितना स्पष्ट दिखाई देता है ऐसे ही जब मन पर अज्ञान के बादल छाये हों तो कुछ भी स्पष्ट नहीं सोच पाता. ज्ञान की एक किरण ही कितना प्रकाश भर देती है. सुबह बंगाली सखी ने उसकी कविताओं की तारीफ की उसने अपने पति से उनके बारे में सुना था. कल दो और मित्र परिवारों ने भी पांडुलिपि देखी. एक रचियता के लिए सबसे सुखद पल वे होते हैं जब कोई उसकी रचना को पढ़े व समझे.    

मार्च का मध्य आ गया है. फरवरी के अंतिम सप्ताह में वे यात्रा पर निकले थे. उस दिन के बाद आज पहली बार डायरी खोली है. वे तीन दिन पहले वापस आ गये थे, आने के बाद सफाई आदि के कार्य से निबट कर पुनः पुस्तक के काम में जुट गयी है. अभी भी आठ-दस दिनों का काम शेष है. नन्हा सुबह सोकर उठा तो पेट दर्द की शिकायत कर रहा था, उसे सम्भवतः अपच हो गया है. सुबह एक सखी से बात हुई उसने कहा, वह कहानियाँ भी लिखे, एक बार पहले भी उसने यह बात कही थी. उसकी अगली पुस्तक कहानियों की हो सकती है, विचार बुरा नहीं है. अज सुबह छोटी बहन से बात की, वह थोड़ी चुपचुप लगी, परिवार से दूर होने के कारण या वे उससे मिलने नहीं गये शायद इस बात का मलाल हो या उसका वहम् भी हो सकता है. आज नन्हे को नई किताबें लेने स्कूल जाना है जून उसे दोपहर को ले जायेंगे.




Monday, September 1, 2014

योग वशिष्ठ - महारामायण


कल शाम से ठंड एकाएक बढ़ गयी है, अभी तक कोहरे ने सूरज को ढक रखा है. ऐसी शीतलता पहाड़ों पर लोग रोज ही महसूस करते होंगे. कल दुबारा डायरी नहीं खोल सकी. दोपहर को चार पत्र लिखे, शाम को वे टहलने गये, क्लब जाने का उत्साह नहीं हुआ. अभी-अभी पड़ोसिन का फोन आया, उसे लगा था सम्भवतः अस्वस्थता के कारण वे क्लब नहीं जा रहे हैं, फिर उस बातूनी सखी का फोन आया, उसे अपने बेटे के लिए एक ऐसी ट्यूटर चाहिए जो होमवर्क करा सके. दोपहर को वह कुछ समय निकाल सकती है और क्लास वन के बच्चे का साथ यकीनन अच्छा रहेगा, सो उसने हाँ कर दी है. जून को भी इसमें कोई आपत्ति नहीं होगी. कल वह जा रहे हैं, उन्हें इतवार को किये जाने वाले कार्य आज ही कर लेने हैं जिसमें बालों में मेंहदी लगाना भी शामिल है. कल रात उसने जून से पूछा कि विवाह की वर्षगाँठ मनाने का उनकी नजर में क्या औचित्य है, उन दोनों के सोचने का ढंग एक ही निकला. उसे भी हर दिन उतना ही खास लगता है जितना वह दिन !

कल शाम अंततः वे क्लब गये और वहाँ का माहौल बेहद खुशनुमा लगा. हर तरफ फूलों की बहार ही बहार थी. सामने के बरामदे को बेहद कलात्मक ढंग से सजाया गया था. पीछे स्टेज था तथा शामियाना लगाया गया था. आग तपने के लिए भी इंतजाम था. लोग आकर्षक पोशाकों में थे.

सुबह जून से बात हुई, कल शाम गन्तव्य पर पहुंच कर भी उन्होंने समाचार दे दिया था. कल रात कई बार उसकी नींद खुली, स्वप्न भी देखे जो परेशानी को बढ़ाने वाले थे. उनके जाने पर पहली रात ! सुबह सवा छह बजे उठी, नैनी कल बिना कहे दिन भर नहीं आयी, इस समय काम कर रही है, उसने अपनी गलती मान ली और उसकी फटकार का कोई विरोध नहीं किया जैसा कि वह पहले करती है. इधर कुछ दिनों से उसमें बदलाव आया है. कल क्लब गये थे वे, नीली साड़ी सुंदर लग रही थी, जून होते तो फोटो खींचते. नन्हा लिख रहा है, सुबह उसे नॉवेल पढने पर कुछ दिनों के लिए रोक लगाने को कहा तो बुरा मान गया. ‘नसीहत’ पचाना आसन काम नहीं है. आज ‘योग वशिष्ठ’ की कथा प्रारम्भ हुई है, कहानी में कहानी कहने की संस्कृत साहित्य में अनोखी प्रथा है. आज गोयनका जी भी आये थे, विपासना के बारे में आरम्भिक व्याख्यान दिया. मन को ऊपरी सतह पर शांत कर लेना तो सहज है पर भीतर का पता तो वक्त पड़ने पर ही चलता है. उस दिन ट्रेन में यात्रियों की भीड़ देखकर वे विचलित हो गये थे. आज सभी के फोन आये सभी ने एनिवर्सरी की मुबारकबाद दी.

आज सुबह सवा छह बजे चिड़ियों की चहचहाहट सुनकर नींद खुली. उठते ही जून के होटल का नम्बर लगाया, वे भी उठ चुके थे. रात को दस बजे सो गयी थी, पर कुछ देर बाद बड़ी भाभी का फोन आया, वे परसों शुभकामना देना भूल गयी थीं, भाई से भी बात हुई. जून दिल्ली में उनसे मिलने जायेंगे. कल एक परिवार को लंच पर बुलाया था, वे लोग सुबह ही तिनसुकिया मेल से आये थे. एक और सखी तभी घर की चाबी देने आई, वे मुम्बई जाने के लिए एयरपोर्ट जा रहे थे. उन्हें इतनी जल्दी थी कि एक मिनट भी नहीं बैठे. जून की समय की पाबंदी की आदत के कारण वे लोग यात्रा पर निकलने से आधा घंटा पहले ही पूरी तरह से तैयार होकर बैठ जाते हैं.





Tuesday, March 4, 2014

चुलबुली सी बालिका


आज वह बेहद हल्का महसूस कर रही है. दादा धर्माधिकारी की पुस्तक में मनुष्यता की परिभाषा पढकर मनुष्य की गरिमा और उसकी शक्ति पर विश्वास और बढ़ गया है. कल का दिन एक भरपूर दिन था. कल दिन भर उसने एक एक पल को पूरे मन से जीया. मानव होना और फिर स्त्री होना, संस्कार युक्त, शिक्षित और स्वस्थ होना, अपने आप में एक बड़ी उपलब्धि है, कुछ न कुछ करते रहने की तीव्र इच्छा, निरंतर कुछ न कुछ सीखने की आकांक्षा, जीवन को कलात्मक रूप से जीने का प्रयास, स्वयं को समाज के प्रति या परिवार के प्रति उत्तरदायी मानते हुए अपने कर्त्तव्यों का निर्वाह करना, ये सारी बातें उसमें किसी हद तक तो हैं न, और हर बात के लिए स्वयं को दोषी मानते रहना अपनी शक्ति पर संदेह करना, अपने आप पर भरोसा न कर पाना ये दोष भी हैं. पर अब उसे भयभीत होकर पीछे-पीछे रहकर चलने की जरूरत नहीं है, उसकी कमियां जो भी हों उन्हें लेकर स्वयं को अपमानित महसूस करने की जरूरत नहीं है. सदा ही तृतीय स्थान पाने की अपनी आदत को जारी रखने की भी नहीं. आज नन्हे का गणित का इम्तहान है जो उसे कठिन लगता है, पर वह जानती है वह बहुत होशियार है, अवश्य अच्छा करेगा. कल शाम वे टहलने गये, हवा ठंडी थी और चेहरे को छूकर सिहरा जाती थी

Today again she is so happy ! yesterday one friend got a prize of 16,000 Rs from the makers of Nyle Shampoo. They went there to celebrate the joy and to eat sweets. Today she rang her to say that they liked it, then she talked to asamiya friend, she is waiting for the D-day, she promised her to be there in the hour of need and it makes her happy that she will be of some use to someone ! Nanha has prepared well for Sanskrit exam. He has learnt twenty shlokas in Sanskrit, when she was of his age she never learned so many shlokas..

पिछले चार दिनों से नहीं लिख पायी, आज उन्हें तिनसुकिया जाना है, लंच भी वहीं खाना है. कल होली मनायी, परसों शाम बड़े भाई भाभी को फोन किया, छोटी बहन को फोन किया कल सुबह -सवेरे दीदी का फोन आया, उन्होंने कहा, बड़ा भांजा और छोटी भांजी शायद यहाँ आयें छुट्टियों में.

आज संगीत कक्षा में ‘काफी’ की तान सिखाई गयी. कल वे तिनसुकिया में ही थे कि पता चला उस सखी ने बिटिया को जन्म दिया है, वापसी में अस्पताल गये, गुलाबी रंग की छोटी सी बच्ची आँखें बंद किये लेटी थी, अभी तक चेहरा स्पष्ट नहीं था कि किस पर गया है, माँ स्वस्थ लगी, साहसी है वह, वैसे भी उम्र के इस मोड़ पर आकर माँ बनने का निश्चय करना ही साहस पूर्ण कदम था जो वह नहीं उठा पायी थी, अपना सब कुछ दे देना पड़ता है न. आज से उसकी छात्रा ने फिर से आना शुरू कर दिया है. कल उसने एक चप्पल ली, एक जोड़ी बुँदे, एक नेल पॉलिश और एक लिपस्टिक यानि अपने ऊपर खर्च ! इस समय तीन बजे हैं, नन्हा एक कहानी लिखते-लिखते बीच में ही टेनिस खेलने गया है. शाम को वे पुनः अस्पताल जायेंगे और बाद में एक मित्र के यहाँ, उनकी छोटी बेटी बहुत प्यारी है उतनी ही चुलबुली भी.   

‘कविता लेखन के सामान्य सिद्धांत’ पढना शुरू किया तो भीतर विचार जगने लगे. उसे लगा, मन जितना संवेदन शील होगा जितना गहराई से सोचेगा जीवन उतना ही अर्थपूर्ण होगा, वे हैं कि उथले-उथले ही जीए जाते हैं, अंतर में झाँकने से डरते हैं खुद के भी और इर्दगिर्द भी, कहीं कुछ ऐसा न दिख जाये जो आँखों में खटक जाये, बस आँखें बंद किये ताउम्र जिए चले जाते हैं, न ही टूटकर प्यार करते हैं न ही नफरत, बस कामचलाऊ जिंदगी जीते हैं, शिद्दत की कमी है अहसासों  में ती जीवन में गहराई कहाँ से आये.

पिछले कई दिनों से, हफ्तों से, महीनों से कुछ नहीं कहा, कविता लिखी नहीं जाती, कही जाती है पहले अपने आप से फिर कागज से, ऐसा तो नहीं कि महसूस करने की शक्ति नहीं रही, अब भी एक मार्मिक शब्द आँखों को धुंधला जाता है, मौसम के बदलते रूप और ढंग अदेखे नहीं रहते, आते-जाते उगता डूबता सूरज और चाँद जब दिखता है तो मन में एक हिलोर सी जगती है, फूल अब भी भाते हैं और दर्द अब भी होता है पर ऐसा भी बहुत कुछ है जो अब नहीं होता जैसे कि अपनी सुविधा-असुविधा की परवाह किये बिना किसी की सहायता करने की ललक. अपना ख्याल पहले आता है जैसे कि इस डर से फोन न पकड़ना कि कहीं पड़ोसिन किसी काम के लिए न बुला ले, अब अपने नियमित रूटीन को तोड़कर उसके लिए समय निकालना जबकि अपना सिर भी दुःख रहा हो, सेवा/सहायता ही कहलायेगा न, पर क्यों कि लोग नितांत अपने लिए जीते हैं ! दूसरों के लिए इसमें जगह कहाँ है ?





Thursday, December 5, 2013

यंग आर्किटेक्ट - बिल्डिंग ब्लॉक्स


सुबह के सवा दस हुए हैं. आज आकाश पर सूरज की बादशाहत है कल की तरह बादलों की नहीं. कल नन्हे की गर्दन में हल्का खिंचाव था आज वह ठीक है, वही है कि छोटी-छोटी बातों पर झुंझला रही थी. वह उठ तो जल्दी गया था पर आदत के अनुसार धीरे-धीरे सब काम कर रहा था. जून ने  फोन पर नन्हे के बारे पूछा, जैसा वह लगभग रोज ही करते हैं. आज उसे एक अनपेक्षित फोन आया, एक परिचित अपने बेटे के लिए हिंदी में एक पत्र लिखवाना चाहते थे, उसकी एक सखी का फोन भी आया, उसे मेडिकल गाइड से बच्चों की कान की समस्या के बारे में जानकारी चाहिए थी. कल रात उन्होंने रजाई को विदा दे दी, अब कम्बल से ही काम चल जायेगा. कल जून और वह दोनों ही उत्साह में कुछ कमी महसूस कर रहे थे, आज वह ठीक है, इसका अर्थ हुआ मौसम का असर मिजाज पर पड़ता ही है.

अचानक बिजली चली गयी है, वह करी पत्ता लेने बगीचे में गयी तो देखा बिजली विभाग के कर्मचारी घर के सामने वाली स्ट्रीट लाइट ठीक कर रहे हैं, उसे याद आया कल ही जून ने शिकायत दर्ज करवाई थी. आज फिर बादल हैं, रात को आंधी-तूफान भी आया, जिसका अंदाजा हर तरफ बिखरे पत्तों से लगाया जा सकता है. आज नन्हे का विज्ञान का इम्तहान है और कल अंतिम संस्कृत का, उसके बाद वे यात्रा की तयारी में लग जायेंगे. कल दोपहर अख़बार पढ़ने में व्यतीत हुई, टूथ ब्रश और हेयर डाई के साइड इफ़ेक्ट पर दो लेख पढ़े, दोनों ही सीमा में इस्तेमाल करने चाहिए. आजकल बंधी बंधाई दिनचर्या है, बीच-बीच में कुछ समय seven summers के लिए भी निकाल लेती है. बिजली की गाड़ी चली गयी है पर लाइट आयी नहीं है.

दस बजने वाले हैं, मन कुछ उखड़ा सा है, सुबह नन्हे पर फिर झुंझलाई, ज्यादा तो नहीं पर थोड़ा सा भी क्रोध करना नन्हे पर या किसी पर भी उसे स्वयं अपनी हार लगता है, अपनी तौहीन भी, मन देर तक परेशान रहता है. शैतान हर रूप में उन्हें लुभाता है और इसके चंगुल में वे फंस ही जाते हैं. आज नन्हे का आखिरी इम्तहान है और उसे ख़ुशी है कि आज से उसे डांटने की कोई जरूरत नहीं रहेगी. आज धूप निकली है पर पिछली वर्षा के कारण सारे फूल कुम्हला गये हैं, धूप पाकर वे फिर खिल उठेंगे. काश ऐसी कोई धूप उसके लिए भी हो जिसे पाकर...अच्छी सी एक गजल या seven summers के कुछ पेज ! आज वह टोमेटो सॉस बना रही है, बगीचे के लाल रस भरे टमाटरों से !

बारिश लगतार हो रही है, सर्दियां जाते-जाते फिर लौट आई हैं. पता नहीं बादलों में इतना पानी कहाँ से आया है. कल भी दिन भर बदली बनी रही और आज तो दिन में भी रात का अहसास हो रहा है. नन्हा young architect से नये घर का मॉडल बना रहा है. दो दिन बाद उन्हें जाना है, मौसम तब तक ठीक हो जायेगा ऐसी प्रार्थना भगवान से करनी चाहिए. आज उसे खत भी लिखने हैं और दोपहर को हिंदी कक्षा लेने भी जाना है. शाम को क्लब जाना है एक सखी से किया हुआ वादा निभाने के लिए. कल शाम थोड़ी पैकिंग की, खर्चे का हिसाब भी लगाया लगभग तीस हजार का बजट है. इतनी महंगाई के जमाने में एक महीना घूमने में इतना खर्च तो होगा ही, लेकिन राजस्थान के सुंदर किलों और रेतीले मैदानों की कल्पना करता हुआ मन रूपये-पैसे के बारे में सोचना ही नहीं चाहता.  



Wednesday, December 4, 2013

सेवेन समर्स- मुल्क राज आनन्द


पल में बदली पल में सूरज
पल-पल मौसम रूप बदलता
हवा उड़ा ले जाती बादल
आंचल ज्यों माथे से सरकता

सूर्य रश्मियाँ प्राण फूँकती
मेघा नमी पवन को देता  
हवा बिखेरे मादक सौरभ
धरती भर देती मोहकता

खिड़की से झांकता बसंत
महक उठे हैं दिग दिगंत
ज्यों करवट ली कलियों ने
फूलों ने ली अंगडाई
कोंपल कोंपल में हरीतिमा
नव पल्लव धर मुस्काई

कल महीनों बाद मन में कविता उगी, बसंत के आगमन से कोई दिल अछूता रह भी कैसे सकता है, गेट पर खड़ा वह श्वेत फूलों से भरा वृक्ष इतना सुंदर दखता है. हवा में आम के बौर की खट्टी-मीठी खुशबू, सब कुछ इतना मोहक हो जाता है इस मौसम में और इसी मौसम में तो आता है रंगों का त्योहार होली ! वे इस बार होली पर जयपुर में होंगे. आज नन्हा समय पर तैयार हो गया था, उसका भी काम हो गया है, अभी दस ही बजे हैं, एक बार सोचा किसी सखी से फोन पर बात कर ले, पर अगले ही पल रुक गयी, क्या बात करेगी, सिवाय हाल-चाल पूछने के, यूँ मौसम पर भी बात हो सकती है और कुछ अन्य भी, पर उसे लगता है दिन भर में वे गम्भीर बातें मुश्किल से पांच प्रतिशत ही करते होंगे, ज्यादातर इधर-उधर की बातें ही तो करते हैं, तो क्यों न फोन पर एक सार्थक, थोड़ा गम्भीर किस्म का वार्तालाप किया जय, लेकिन विषय क्या हो? आज पड़ोसिन से थोड़ी देर बागवानी पर बात की, फूलों और पौधों पर, उसने सोचा अगले हफ्ते उनकी यात्रा से पहले के अंतिम पत्र लिखेगी, बहुत महीनों से बल्कि वर्षों से छोटी बुआ का कोई पत्र नहीं आया है, वापस आकर उन्हें भी लिखेगी. मौसम आज भी भीगा-भीगा है, आकाश पर सलेटी रंग के बादल एकसार फैले हैं, सूरज का कोई अता-पता नहीं है.

मुल्कराज आनन्द की बचपन की यादें रोचक हैं, seven summers कल से पढ़ना शुरू किया है, कई ऐसे शब्द हैं जिनके अर्थ उसे नहीं पता, लेकिन डिक्शनरी खोल कर पढ़ने से वह आनन्द कहाँ जो बिना रुके पढ़े जाने में है. अपने बचपन की कई यादें मन में कौंध गयीं. बस्ती में बड़ी बहन की सहेली शैला के साथ गुड़ की चाय बनाना, नल में उसके दायें हाथ की अंगुली कटना, मकान मालिक के लड़के का अपनी सांवली बहन की गुड़िया पेड़ पर टांग देना, उनके यहाँ भोजन करने जाना, उस दाल-चावल की खुशबू आज तक उसे नहीं भूली. मकान मालिक के लडके की खिलौनों से सजी आलमारी, पेड़ के नीचे चारपाई पर लेट कर आंवले खाना और मकान मालकिन की बेटियों, गौरी व मुन्नी की मोटी-मोटी चोटियाँ, बड़ा सा बगीचा, मंझले भाई का पांच रूपये का नोट लेकर चना मुरमुरा खरीदने आना, उसे नंगा बाबा कहकर चिढ़ाया जाना और तेज वर्षा में छोटे भाई का बादलों से आना, रोने पर भूत और हौआ से डराया जाना. घोड़े के मुख वाले भिखारी का भीख मांगने आना, ऐसी न जाने कितनी और छोटी-छोटी यादें होंगी जो मन के किसी कोने में पिछले इतने बरसों से दबी पड़ी होंगी. शाहजहाँपुर की यादें और स्कूल की यादें, उसे भी इन यादों को कहानी की शक्ल में ढालने का काम करना चाहिए. बचपन की उस रात को बिल्लियों की आवाजें, भूत के पैरों की छम छम, अमराई में लोगों को उलटे पैरों वाली डायन का दिखना, कितनी अजीब और रोचक यादें हैं न !     






Monday, November 25, 2013

दूब घास पर दो कदम


उगती हुई सुबह और डूबती हुई शाम दोनों मन, प्राण को ऊर्जा से भर देती हैं. सुबह गुलाबी सूरज का मुखड़ा सलेटी बादलों से झांकता नजर आया जब जून सुबह बस स्टैंड गये थे और अभी शाम को बगीचे में काम करने के बाद नन्हे का इंतजार करते हुए झूले पर बैठकर वह नीले आकाश में चमकते पीले चाँद को देख रही थी. ठंडी मंद हवा सहला रही थी और आसमान में चमकता पहला तारा जैसे कोई संदेश दे रहा था. आज बहुत दिनों बाद मिट्टी में काम किया, अच्छा लगा, यह अलग बात है कि खुरपी से काम शुरू करते ही हाथ में चोट लगा ली. माली ने कल से आना शुरू किया है, पहली बार दूब घास को मशीन से काटा, सर्दियों में सूख गयी है, दो तीन महीने बाद एकदम हरी हो जाएगी. आज सुबह ही सुबह छोटी बहन और छोटे भाई से बात की, बहन के यहाँ नया मेहमान आने वाला है और भाई का मकान बनना शुरू हो गया है. माँ-पिता दिल्ली में हैं. कल शाम क्लब में एक बच्चे के साथ, जिसका नाम पारिजात था, बाहर घास पर बैडमिंटन खेला, कोर्ट खाली नहीं था.

कुदरत में सुंदर रंग बिछे
अनगिन गंधों के खिले फूल
धरती पर अनुपम चित्र खिंचे
ह्रदयों में कैसे बिंधे शूल

सुमनों उर से उल्लास उड़ा 
तितली पंखों से चुरा उमंग
भ्रमरों के गुंजन को भर के
थिरका मन ज्यों जल में तरंग

कल ‘बंद’ था और आज नन्हे की स्कूल बस नहीं आई, जून कार से ले गये हैं. कल दिन भर बादल और सूरज आँख मिचौनी खेलते रहे, एक बार तो मूसलाधार वर्षा भी शुरू हो गयी, बंद सुबह ४ बजे से शाम के ७ बजे तक था, सो कहीं जा भी नहीं सकते थे. कुछ देर नन्हे को पढ़ाया, पहली बार इस मौसम में मेथी पुलाव बनाया. सुबह फोन पर कुछ सम्बन्धियों से बात की, एक का लहजा वही पुराना था, इन्सान यदि बदलने की कोशिश करे तभी तो बदलेगा न जैसे वह ब्रिटिश ऑफिसर  MRA ज्वाइन करने के बाद बदल गया था Mr Jordine. MRA के चार सिद्धांत भी अनुकरणीय हैं – Absolute Honesty, Absolute Purity, Absolute Unselfishness, Absolute Love कई बार इन्हें याद करके अपने को संयत किया किया पिछले दिनों उसने.

आज इस वक्त सुबह से पहला मौका है जब वह स्थिर महसूस कर रही है, कल दोपहर बाद से ही सिर भारी था, शायद यह किसी हारमोन की करामत है कि पता नहीं क्या है दिल खोया-खोया सा ही रहता है, किसी जगह टिक कर बैठता नहीं, रात को कुछ देर ध्यान में बैठी तो अच्छा लगा. कुछ देर पहले बाहर गयी तो देखा उनकी नैनी अपनी रजाई को बाहर धूप में रख रही थी, उसे देखकर बहुत आश्चर्य हुआ, रजाई के नाम पर कुछ थिगड़ों को जोड़ा हुआ था, उसने सोचा कि उन्हें नई रजाई बनवा कर देगी, कल बाजार जाकर धुनिया को कहकर आएगी. कल सोमवार है, उसका व्यस्ततम दिन.. पूरे हफ्ते का, उम्मीद है कल से सब ठीक हो जायेगा, जिसकी शुरुआत अभी से हो गयी है.

अभी तक स्वीपर नहीं आया है, घर गंदा पड़ा है... अब इस बात पर इतना परेशान होने की क्या जरूरत है, आदत सी बना ली है उसने परेशान होने की और रहने की भी, हर वक्त एक अह्सासे कमतरी का शिकार खुद को बनाये रखना कहाँ तक ठीक है, हर पल यह अहसास कि समय का, अपने दिमाग का सदुपयोग नहीं कर रही है, चाहिए तो यह कि जिस वक्त जो काम करे खुशी के अहसास के साथ, शायद हारमोनों का असर कम हो रहा है. खुदबखुद दिल हैरान परेशान हो जाता है और फिर खुदबखुद ही खुश होने के उपाय सुझाता है, मन का भी यह कैसा रंगीन अजीब करिश्मा है.  आचार्य गोयनका जी कहते हैं इसी मन को तो साधना है तभी धर्म जीवन में उतरेगा. धर्म को धारण करना है न कि उसकी पूजा करनी है. मन को विचारों से मुक्त करना है...किसी भी तरह के तुच्छ विचार को दिल में जगह नहीं देनी है. बीज यदि शुद्ध होगा तो फल स्वयंमेव अच्छा होगा. 

Friday, March 22, 2013

अखरोट और मूंगफली




आज तो जून देहली में होंगे, कल वापस आना है, अब बहुत इंतजार हो गया, उसने सोचा, जल्दी से वे आ जाएँ, आज शाम से ही मन कैसा हो रहा है, इतने दिन गुजर गए पर अब कुछ घंटे गुजारना इतना मुश्किल लग रहा है. सुबह देर से उठे, नन्हे की छुट्टी थी, आज मूली के परांठे बनाये, जाने से पहले ढेर सारी सब्जियों के साथ एक किलो मूली भी रख गए थे वह, पर दो अभी भी शेष हैं. दोपहर को चने की दाल और सेम-आलू की सब्जी, नन्हे को पसंद है चने की दाल, इतने दिनों में तीन बार बनाई है और अब मन करता है तीन महीने तक नाम न ले. आलू खाते खाते भी...दरअसल बात यह है कि अब उसके बिना कुछ भी अच्छा नहीं लग रहा, वैसे भी वह किस कदर ध्यान रखते थे उसका. दोपहर भर “डॉक्टरस्” पढ़ती रही, फिर गुजराती फिल्म देखी, शाम को भ्रमण और फिर स्क्रैम्बल, और अब जून के पास है या कहें वह उसके पास है. नन्हे ने उत्साह दिला-दिला कर आलू फ्राई तथा तीन परांठे बनवाये दोनों के लिए. अब वह ब्रश करने गया है, दोपहर से बल्कि सुबह से ही उसका मन कुछ क्रिएटिव वर्क करने का है, दोपहर को दफ्ती की एक मेज बनाई, कुछ उड़ाना चाहता है वह, लिफाफे में आग लगाकर उसे उड़ाना हो या गुब्बारा या पतंग, पर कुछ भी तो नहीं दे सकी वह उसे, अब जून ही आकर देखेंगे और उसके कई सवाल भी इकट्ठे हो गए हैं.

  ओह !...और आज जून ने उसे कितना रुलाया, सुबह जब उसके बॉस की पत्नी ने फोन किया तो वह एकदम से इतनी पजल्ड हो गयी कि...जैसे कोई फूले हुए गुब्बारे में से पिन चुभाकर यकायक सारी हवा निकाल दे या ऐसा कि मंजिल पर पहुँच कर पता चले, मंजिल तो अभी और दूर है. नतीजा आँसू.. नन्हा उसे समझा रहा था, उसने जब कहा, पापा भी बस तुम्हारे....तो बोला क्या किया है पापा ने ? पर उसे तो जून जानते ही हैं, क्या-क्या सोचने लगी कि उसे उनकी फ़िक्र नहीं है, कि वह अपना वायदा भूल गए हैं, याद नहीं रहा कि जाते  समय उसने कहा था, पन्द्रह को पक्का आ जाना. वह सोचने लगी कि जानबूझकर दिल्ली में रुक गए होंगे...दोपहर भर सिर में दर्द रहा, आँखों पर जून का रुमाल रखा, दवा ली. शाम को फिर फोन आया कि वह कोलकाता पहुँच चुके हैं, यानि उसे वह सब नहीं सोचना चाहिए था...सुबह उसकी असमिया सखी अपने बेटे को छोड़ने आई थी, पति के साथ तिनसुकिया जा रही थी, उन्होंने भी कहा, फ्लाईट मिस हो गयी होगी या टिकट कन्फर्म नहीं होगी. तो जून जानबूझकर नहीं रुके बल्कि रुकना पड़ा, उसे बहुत अफ़सोस हुआ अपनी सोच पर. लेकिन सुबह फोन पर पूरी बात बता दी होती तो...पर अब वह उसे करीब ही लग रहे हैं पहले की तुलना में...कोलकाता तो यहाँ से नजदीक है न ? नन्हे को शाम से जुकाम हो गया है, इतने दिनों तक उसे एक छींक भी नहीं आई पर आज दोनों..शाम को उसने “सूरज का सातवाँ घोड़ा” देखी, अच्छी है, शायद जून ने भी देखी हो, एक रात उन्हें और सपनों में मिलना होगा.

  सोमवार सुबह, इस समय उसका हृदय स्नेह से लबालब भर गया है जैसे बादलों में से झाँकते हुए सूर्य ने धरती को रोशनी से भर दिया हो. कल शाम जब वह आया तो उनका मिलना कितना शांत था, कल्पना में उसका स्वागत जिस तरह किया था उसे बिलकुल अलग...और नन्हा कितना खुश था, उत्साह से भरा-भरा..जून ने उन दोनों को हमेशा ही इतनी खुशी दी है ! अभी-अभी वह दफ्तर गए हैं, कार में बैठकर सिर हिलाकर विदा कहना, उसे अंदर तक छू गया और अंदर आकर वह यह डायरी खोलकर बैठ गयी है, उसकी अलमारी खुली है..दूसरे कमरों में भी उसके कल लाए सामान इधर-उधर बिखरे हैं..उसके कारण घर कितना भरा-भरा लग रहा है..एक-एक सामान सहेजते हुए वह याद आते रहेंगे...आते ही रहेंगे. कल रात को उसने पिछले कई दिनों की तरह पन्नों पर अपने दिल का हाल नहीं लिखा बल्कि जून के मन पर..प्रेम में यह कैसा जादू है जो उन दोनों को इतने करीब ले आया है..वे बारह-तेरह दिन बाद मिले पर भीतर कैसी सिहरन पैदा हो रही थी जैसे वे पहली बार मिले हों. कल सुबह और रविवारों की तरह ही थी, दोपहर को टीवी पर फिल्म देखी, उन की प्रतीक्षा में समय बिताना आसान हो गया था..शाम अभी हुई भी नहीं थी शायद साढ़े तीन बजे होंगे कि आ गए. इतने सारे उपहारों की साथ- अंगूर, अनार, रसभरी, दो तरह की गजक, खजूर, तिल की मीठा, मूंगफली, अखरोट, चिरौंजी, चने, उसके लिए गाउन का कपड़ा, नन्हे के लिए दस्ताने, चप्पल और न जाने क्या-क्या...पर अपने लिए तो उसने कुछ नहीं लिया न, और अभी नाश्ता करते समय उनका पीछे हुए खर्चे का हिसाब जानना भी कितना संयत था, डिप्लोमैटिक, वह हैं ही ऐसे. वह उसे सदा प्रेम करेगी..सदा...