Showing posts with label ख़ुशी. Show all posts
Showing posts with label ख़ुशी. Show all posts

Friday, April 3, 2020

पनियप्पम का स्वाद

सवा तीन बजे हैं दोपहर बाद के, आज का दिन विशेष रहा है अब तक. सुबह योग कक्षा के लिए स्कूल गयी, वापस आकर डिब्रूगढ़, जून ने कम्पनी के परिवहन विभाग के एक व्यक्ति से बात कर ली थी, उन्होंने मोटर वाहन इंस्पेक्टर से बात की, और लाइसेंस के लिए जो भी आवश्यक कार्यवाही थी, उन्हें सामने बैठाकर ही पूरी करवा दी. जिला परिवहन अधिकारी नहीं थे इसलिए कार्ड नहीं मिला. शायद दो-तीन दिनों में ड्राइविंग लाइसेंस मिल जायेगा. एक नया ड्राइविंग स्कूल भी खुला है यहाँ, उसके बारे में जानकारी दी. जान-पहचान से किस तरह काम आसान हो जाता है. वापस लौटकर भोजन किया, कुछ देर विश्राम फिर क्लब की दो सदस्याएँ आ गयीं, शिक्षक दिवस के लिए उपहार पैक किये. चालीस मिनट में चौंतीस उपहार पैक हो गए. एक ने सेलो टेप काट कर दिया, दो ने पैक किया, टीम वर्क का अच्छा उदाहरण था. उन्हें खाने-पीने का भी कुछ सामान ले जाना होगा. उसने सोचा आखिर जीवन का उद्देश्य क्या है, ऐसा नहीं है कि पहली बार सोचा है, पर हर बार कोई न कोई नया उत्तर भीतर से आता है. आज उसे लगा, वे इस दुनिया में कुछ सीखने और उन्नत होने के लिए ही आये हैं. क्यों न वे आनंद का स्रोत बन जाएँ और अपने इर्द-गिर्द उस ख़ुशी को फैलने दें. परमात्मा हर जगह है पर उसके होने से जगत में क्या अंतर आता है, उसकी उपस्थिति को उन्हें अनुभव करना होता है, जो अज्ञान से ढकी हुई है. वह आनंद स्वरूप है पर जब तक वे प्रसन्न नहीं होंगे उसके होने का प्रमाण कैसे मिलेगा. इस समय पौने ग्यारह बजे है सुबह के. दोपहर का भोजन लगभग बन गया है, आज जून की पसन्द का आलू रायता, सफेद बैंगन और मूंग की खिचड़ी बनी है. शाम को जून के दफ्तर में बैंगलोर से आये दो जन खाने पर आ रहे हैं. वह बेक्ड वेज, भरवां शिमला मिर्च व काले चने की सब्जी बनाने वाली है. जून ने कस्टर्ड सुबह ही बना दिया है. आज नैनी को पूजा के लिए लाये उपहार दे दिए, उसे सूट पसन्द आया है, बच्चों के कपड़े भी उसे अच्छे लगे. कोलकाता में तेज धूप में घूमते हुए उन्होंने ये ख़रीदारी की थी। आज एक घन्टा कार चलाई, एकाध स्थल पर कुछ समस्या हुई पर धीरे-धीरे आत्मविश्वास बढ़ रहा है. उसने आर्ट ऑफ़ लिविंग की एक स्थानीय टीचर को फोन किया, संदेश भी भेजा, पर शायद वह व्यस्त हैं. योग कक्षा में आने वाली महिलाओं के लिए बेसिक कोर्स करवाने का जो स्वप्न उसने देखा है गुरु जी को समर्पित कर दिया. पिछले दो दिन नहीं लिखा, आज से एओल का कोर्स आरम्भ हो रहा है जिसे उसके कहने पर एओल की एक शिक्षिका अपने घर पर करवा रही हैं. किसी समय उसे भी अन्य लोग कोर्स करने के लिए प्रोत्साहित करते थे, अब वह दूसरों को कर रही है. कुल छह महिलाएं हैं और तीन उनके घर के निकट की हैं. एक सखी ने पहले हाँ कही थी, पर अब उसके यहाँ मेहमान आने की सम्भावना है, एक अन्य को बुखार हो गया है, कल उसे देखने जाना है. हो सकता है उसके खान-पान में कुछ गड़बड़ हो, उसे अक्सर पेट की समस्या रहती है. कल सुदर्शन क्रिया में वह तथा दो अन्य साधिकाएं भी जाएँगी. आज सुबह जून गोहाटी गए हैं, जाने से पहले पनियप्पम खाया. दक्षिण भारतीय व्यंजन जो खमीर उठा के बनाते हैं, देह में भारीपन लाते हैं. आज फेसबुक पर गुरूजी की तस्वीर प्रकाशित की, कल शाम नैनी ने पूजा घर में सुंदर फूल सजाये थे, तस्वीर सुंदर आयी है. आज सुबह सफाई कर्मचारी की पत्नी फिर आयी थी, उसका पति रात को घर नहीं लौटा, जिस स्त्री के घर वह रात को रुका था, वह सुबह डंडा लेकर पहुँच गयी, पति के बाहर निकलते ही उसे मारा पर आदमी ने उलटे उसे ही मारना शुरू कर दिया. जिस समय वह आयी थी, जून घर आये थे, नाश्ता करके उन्हें निकलना था, उसकी बात वह सुन नहीं पायी. वह बिना कुछ कहे चली गयी. सफाई कर्मचारी ने बाद में यह सब स्वयं बताया. वह एक निर्लज्ज व्यक्ति है जो अपनी बुराई को भी आराम से बताता है, शायद उसकी दृष्टि में वह कुछ गलत नहीं कर रहा. उसे कड़े शब्दों में चेताया तो है पर उस मोटी खाल पर कुछ असर होता नजर नहीं आता. उसकी डांट सुनकर वह हँस रहा था. उसका मुख दूसरी तरफ था पर दर्पण में सब दिखाई पड़ गया. उसने हिन्दू धर्म त्यागकर ईसाई धर्म अपना लिया है, जिसमें शायद उसे सही-गलत का भेद करना भी नहीं सिखाया जाता.

Friday, February 15, 2019

पर्वतों की रानी



बचपन से लेकर आज तक कई बार इस घर में आना हुआ है और हर बार दीदी ने प्रेम से स्वागत किया है. मेज पर ढेर सारे व्यंजन और आग्रह करके खिलाना. जीजाजी भी उतना ही ध्यान रखते हैं. बड़ी भांजी भी अपनी बेटी के साथ आई हुई थी. आज दोपहर बारह बजे वे उत्तराखंड की राजधानी के लिए चले, ट्रैफिक जाम के कारण दो बजे की बजाय साढ़े तीन बजे यहाँ पहुँचे. भोजन के पश्चात बड़ी बुआ से मिलने गये. चचेरी बहन व उसकी बिटिया भी मिली, पुत्र बड़ा हो गया है, सो नहीं आया. मौसम यहाँ ठंडा है पर घर बंद है सो भीतर ठंड का अहसास नहीं हो रहा है. छोटे भाई के कई रूप आज देखने को मिले, सहज और आनंदी भी, परेशान और शिकायती भी. परमात्मा सारे विरोधों को स्वीकार करता है. पिताजी ने सुबह अपने हाथों से चाय बनाकर दी, कल रात को बिस्तर लगाया. उनकी उम्र में इतना ऊर्जावान और प्रेम से भरे रहना आश्चर्य की बात है !


होटल के इस शांत कमरे में बैठकर लिखना एक सुखद अनुभव है. एयर कंडीशनर की आवाज के अलावा कोई ध्वनि नहीं है. कमरे का तापमान न ज्यादा है न कम. बाहर लॉन में अब धूप चली गयी है, ठंडी हवा है और पहाड़ों पर सफेद कोहरे का आवरण छा गया है. आज सुबह साढ़े दस बजे वे दीदी के घर से रवाना हुए और पौने दो बजे मसूरी के इस सुंदर स्थल पर पहुँच गये. लम्बी गैलरी से चलते हुए कमरे तक, फिर सामान रखकर टैरेस पर, जहाँ धूप में बैठकर भोजन का आनंद लिया. उसके बाद दूर तक फैले सुंदर बगीचे और बच्चों के पार्क में घूमते हुए सुंदर दृश्यों की तस्वीरें उतारीं. जून को रजिस्ट्रेशन के लिए जाना था, वह यहाँ एक कांफ्रेस में भाग लेने आये हैं. वह कमरे से बाहर बने लॉन में कुछ देर बैठकर आशापूर्णा देवी की पुस्तक ‘चैत की दोपहर में’ पढ़ती रही, एक छोटा सा नंग-धड़ंग बच्चा जिसकी माँ को मसूरी में मोच आने से व्हील चेयर पर आना पड़ा था, खेल रहा था और पौधे उखाड़ रहा था. बाद में उसे डांटने पर जोर-जोर से रोने लगा. बाहर ठंड बढ़ जाने पर वह कमरे में आ गयी, केतली में पानी गर्म किया एक कप काफी बनाई. पिताजी से फोन पर बात की. दीदी का व्हाट्सएप पर वीडियो कॉल आया. और अब उसके पास समय ही समय है. चाहे जो लिखे या पढ़े. चाहे तो बाहर घूमने भी जा सकती है, पर ठंड अवश्य ही बढ़ गयी होगी. ऊंचे-ऊंचे पहाड़ों पर बने मकान तथा नीचे गहरी घाटियों में घने जंगल, बहर का दृश्य बहुत सुंदर है. उसने दीदी-जीजाजी, जून, छोटे भाई-भाभी, पिताजी, बड़े भाई, मंझले भाई-भाभी सभी के लिए उपजे मन के भावों को छोटी-छोटी कविताओं में पिरोया. सबसे मिलकर जो ख़ुशी भीतर उपजी थी उसी को शब्दों में ढाल दिया तो ख़ुशी कम होने के बजाय और भी बढ़ गयी. ख़ुशी का गणित ही कितना अलग है, यह बांटने से बढती है. ऐसे ही दुःख भी बांटने से बढ़ता ही है, उसे तो चुपचाप हृदय में रख लेना होगा. 

Wednesday, January 6, 2016

अंतहीन आकाश



उसके भीतर ख़ुशी का एक ऐसा स्रोत है, जहाँ से प्रतिपल तरंगें उठती हैं, अहैतुकी कृपा प्रतिपल बरस रही है, अमृत का स्रोत भीतर है, जिसका राज उसे मिल गया है. भीतर अनंत शांति है, अपार नीरवता, भीतर एक ऐसी दुनिया है जिसका इस बाहर की दुनिया से कोई संबंध नहीं, वह इसके बिना भी है, वह कुछ करने से प्राप्त नहीं होती, वह बस है. उसकी खबर बस भीतर ही मिलती है. उसके आसपास के लोगों को इसकी भनक भी नहीं है कि इन्सान के भीतर ऐसा भी एक खजाना छिपा है जो अनमोल है. जिसकी खबर मिलने के बाद कुछ पाना शेष नहीं रह जाता. जो संतुष्टि व तृप्ति का सागर है, जिसे पाने के बाद ही जीवन को उसकी पूर्णता में जीना वे सीखते हैं. इन्द्रियां सजग हो जाती हैं, मन सजग हो जाता है, तन हल्का हो जाता है, त्वचा की संवेदना बढ़ जाती है. कान वह भी सुनते हैं जो और लोग नहीं सुन सकते, भीतर प्रकाश का एक अजस्र स्रोत उत्पन्न हो जाता है. तरंगों के रूप में ऊर्जा का अनुभव निरंतर होता है. कोई भी समस्या होने पर ज्ञान समाधान बनकर सम्मुख आ जाता है. दूसरों के लिए कुछ करने का जज्बा हर वक्त जागृत रहता है. जब अपने लिए कुछ पाना शेष न रहे तो मन अपने आप ही दाता बन जाता है. भीतर कोई उहापोह नहीं, द्वंद्व भी नहीं, विचार भी नहीं, बस एक स्थिरता तथा आनन्द का अहसास. उसे लगता है कि इस ऊर्जा तथा इस शांति का उपयोग सृजनात्मक कार्य में करना चाहिए तथा ज्ञान के इस अमृत का औरों को भी पान कराना चाहिए.
ज्ञान ही वह दर्पण है जिसमें वे अपना वास्तविक रूप देखते हैं. संबंधों की नींव में यदि मोह नहीं है तो उनमें कभी कटुता नहीं आती, कर्म नहीं बंधते. भीतर जब एक क्षण के लिए भी विचलन न हो, सदा समता ही बनी रहे तो मानना चाहिए कि ज्ञान में स्थिति है. आज उसने सुना, उनके कर्मों के अनेक साक्षी हैं. सूर्य, चन्द्र, अनल, अनिल, आकाश, भूमि, यमराज, हृदय, रात्रि तथा दिवस, संध्या तथा धर्म और आत्मा स्वयं भी कर्मों की साक्षी है. परमात्मा रूपी सद्गुरू का हाथ सदा सिर पर है, मस्तिष्क पर उसकी पकड़ है, बुद्धि को प्रेरणा वही देता है, वही सद्विचारों से भर देता है. साधना के समय जब मन दूसरी ओर चला जाता है तो वही इसे श्वास पर टिकाने में सहायक होता है. कल दिन भर, नये वर्ष के पहले दिन तथा आज भी सुबह से अब तक उसका मन किसी बात से विचलित नहीं हुआ है. वाणी का अपव्यय अवश्य हुआ. नया वर्ष उसके जीवन में नई जाग्रति लाये, ज्ञान में स्थिति दृढ़ हो हो, अहंकार न रहे, इसके लिए सजगता की ही आवश्यकता है. इसके द्वारा ही मन की खुदाई कर उसकी गहराई में प्रवेश मिल सकता है. जहाँ का परिष्कार कर संस्कार शुद्ध किये जा सकते हैं, पिछले जन्म के संस्कारों से मुक्ति पाने के लिए यह बहुत जरूरी है.

निंदक नियरे राखिये, आंगन कुटी छवाए पति-पत्नी के लिए एक-दूसरे से बढ़कर निंदक कौन हो सकता है, आंगन की दूरी भी नहीं, दोनों एक ही कमरे में रहते हैं, एक दूसरे की कमियों को दूर करने का कितना बड़ा कार्य करते हैं. उन्हें एक-दूसरे का सम्मान इसलिए करना चाहिए. वे एकदूसरे को जागृत करत हैं, मोह को दूर करते हैं. वे यदि चाहें तो स्वयं का कल्याण हर कदम पर कर सकते हैं. आज मुरारी बापू के यह वचन सुने तो उसे लगा कितना सही कह रहे हैं वे. हर अगला क्षण कितनी नयी सम्भावनाओं से भरा है. उनके सम्मुख है ख़ुशी का आकाश, अंतहीन आकाश ! पर वे हर बार धरा को चुन लेते हैं, डरते हैं आकाश में गुम न हो जाएँ, पर गुम हुए बिना क्या कोई अपने को पा सका है. एक बार तो मरना ही होता है, खोना ही होता है, सहना ही होता है. नितांत अकेलापन जिसके बाद मिलता है निरंतर साहचर्य का भाव, उस परमात्मा से एकता का, अभिन्नता का अपार सुख ! वह जो भीतर कटुता छिपाए है, छल, वंचना तथा ईर्ष्या छिपाए है, तब प्रकट हो जाती है, वह उसे स्वयं से भिन्न देखती है. जैसे कोई अपने को देखे और अपने कपड़ों को जिन पर मैल लगी है, वैसे ही वह अपने मन को देखे और मन पर लगे धब्बों को. वह परमात्मा उन्हें उसके साथ ही कबूल करता है, वह उन्हें चाहता है, उसके उनके संबंध में कोई छल न हो बस इतना ही. वे उसके प्रति सच्चे हों. पर इस जगत में उसे अपने चारों और कोई ऐसा नजर नहीं आता जैसा गुरु जी उनसे चाहते हैं, कोशिश तो हरेक की होनी ही चाहिए.

Thursday, August 14, 2014

मन के मंजीरे -शुभा मुद्गल


कुछ देर पूर्व छोटी बहन का फोन आया, जब वे बच्चों और पिताजी के साथ पहाड़ों पर सुबह की सैर से वापस लौटी. भांजी से बात नहीं हो पाई है अभी तक. आज शाम को जून अपने एक विभाग में आये अतिथि को चाय पर बुला रहे हैं. उसने सोचा है वह पाव-भाजी बनाएगी, वे बंगाली हैं तो बाजार से जून रसगुल्ले भी लेते आएंगे. नन्हे के लिए वे कोलकाता से अभी से ISC physics books लाये हैं दसवीं व बारहवीं की. जून लंच पर आये तो उसने उन्हें उड़िया सखी के फोन की बात बताई, वह उससे पूछ रही थी कि क्या वह English classes में जाएगी जो एक परिचिता अपने घर पर लेने वाली हैं. जून का जवाब ‘न’ होगा यह सोचकर उसने मना कर दिया था, पर अब वह कहते हैं कि वह जा सकती है सो उसने सोचा है इस हफ्ते वह तीन दिन घर पर ही दूसरे कमरे में बैठकर पढ़ेगी, यदि जून और नन्हे को कोई असुविधा नहीं हुई तो अगले हफ्ते से ज्वाइन कर लेगी. उस दिन जो किताब लाइब्रेरी से लायी थी उसमें से एक कहानी पढ़ी, कुछ ऐसा ही उसके साथ हुआ था जब वह स्कूल जाती थी. इसलिए उनकी राय जाने बिना ही मना कर बैठी. लेकिन इसका कोई अफ़सोस नहीं है उसे, न ही यह समझौता है बल्कि इससे त्याग के महत्व का पता चला है. अपनी आवश्यकताएं सीमित रखना, तन की ही नहीं मन की भी. अपनी ख़ुशी अपने अंदर तलाशना, हर हाल में संतुष्ट रहना और परिवार के प्रति अपने कर्त्तव्य को समझना. नन्हे और जून की जगह पर खुद को रखकर उनकी अपेक्षाओं को जानने का प्रयत्न, सबसे बड़ी बात उनके इस छोटे से घर का वातावरण सदा प्रफ्फुलित रखना !

“तप जीवन में आवश्यक है, अन्तर्मुखी होकर, राग-द्वेष मुक्त होकर, आसक्ति को मिटाकर तप किया जा सकता है. मन को संस्कारों से मुक्त करना ही तप है. मन के दर्पण को ऊपर की ओर स्थित करने से उसमें पड़ने वाली छाया ऊपर ही चली जाएगी”. आज भी बाबा जी ने ज्ञान की शिक्षा दी. सुबह वे जल्दी उठे, आज भी भाई के यहाँ फोन किया पर लाइन नहीं मिली, सम्भवतः टेलीफोन कर्मचारियों की हड़ताल की वजह से. कल जो मेहमान आये थे उन्हें भी घर फोन करना था, पर नहीं मिला. जून को पाव-भाजी अच्छी लगी. उड़िया सखी को सुबह-सुबह फोन करके पपीते के पौधों की जानकारी दी. जब ध्यान में थी, फोन बजा पर उठने का प्रयास नहीं किया. मन को केन्द्रित करना वैसे ही कितना कठिन है, शीशे पर धूप पडती है और उसे हिलाते हैं तो चमक भी हिलती है. ऐसे ही मन रूपी दर्पण पर बाहरी आघात पड़ता है तो मन चंचल हो उठता है. नन्हे ने क्लब की पत्रिका के लिए एक लेख लिखा है, आज शाम वे उसे देने जायेंगे. उसके स्कूल में ड्रामा रिहर्सल भी शुरू हो गयी है, कुछ ही दिनों में उसका प्लास्टर भी खुल जायेगा और वह पहले की तरह रिटेन टेस्ट दे सकेगा.

It is I o’clock and she is with her diary. Few minutes ago she heard again that song, “meri chuunar ur ur jaye… it is a sweet melodious song, every time when she listens it, it attracts, another songs which she likes on Zee music are “piya basnti aa..and “man ke manjire …sung by Shubha Mudgal. All these songs are melodious and soft., they touch one’s heart. Today she talked to two friends, one was worried due to early/voluntary retirement scheme and other due to her son’s exams but she is not worried at all. Last evening they went to jun’s office and did net surfing. They have copied some wall papers from life positive site, while coming back jun purchased one copy of same magazine for her. This magazine touches one in every way. She liked it from its first issue when they saw it in library. Today weather is changing its mood frequently, earlier it was drizzling but now sun has come again. Nanha was smiling in the morning when jun and she helped him like they used to do when he was a small kid. He is slow these days, cause can use only his left hand. But during all these weeks he complained only once. They all three are one strong unit as a family and have many things common, ie why they love so much.