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Monday, March 11, 2024

पंचदशी

आज भी सरकार और किसानों के मध्य वार्ता चल रही है। पिछले साल जून में तीन नये कृषि क़ानूनों के विरुद्ध शुरू हुआ था यह आंदोलन, जिसमें बाद में किसानों ने दिल्ली की सीमा पर धरना शुरू कर दिया; शायद स्वतंत्रता के बाद से किसानों और सरकार के बीच सबसे बड़ा आंदोलन है। अब पंद्रह जनवरी को फिर से वार्ता होगी। आज उसने स्टॉक मार्केट पर एक पुस्तक पढ़नी शुरू की है। सेविंग तथा इन्वेसमेंट के बारे में पढ़ा। ​​​​इन सब विषयों के बारे में वह पूरी तरह से अनभिज्ञ है। दीदी-जीजा जी का भेजा एक उपहार मिला, पीतल जैसा आभास देता बत्तख़ों का एक जोड़ा है, उनके विवाह की वर्षगाँठ पर। आज बहुत दिनों के बाद एक पुरानी सखी का फ़ोन आया, वे लोग अगले वर्ष सेवा निवृत्ति के बाद बैंगलोर में बसना चाहते हैं। कारण पूछा तो बताया, दिल्ली का मौसम और प्रदूषण, साथ ही यहाँ के लोगों का अक्खड़पन, उसे मन ही मन हँसी भी आयी और कुछ पुरानी बातें याद हो आयीं, जब वे सब असम में रहा करते थे। आज शाम को साइकिल चलाते समय वह शायद सजग नहीं थी, एक छोटी लड़की का एक पहिये वाला स्कूटर सामने आ गया, लड़की घबरा गई, एक तरफ़ झुक गई, महक नाम है उसका, सामने वाली लाइन में रहती है। उसके साथ एक सहेली भी थी, कहने लगी, वे लोग हिंदी हैं, शायद उसका अर्थ था, वे हिन्दी बोलते हैं।उसने देखा है, ग़लत हिन्दी बोलने पर भी हिन्दी भाषी जरा भी नहीं टोकते, बल्कि ख़ुद भी उन्हीं के लहजे में बोलने लगते हैं। कन्नड़ भाषी अपनी भाषा को लेकर बहुत अधिक सजग हैं।मोबाइल पर उसने आज से‘पंचदशी’(पंद्रह) सुनना आरंभ किया है।पंचदशी स्वामी विद्यारण्य की अद्वैत सिद्धांत पर लिखी एक प्रसिद्ध कृति है। इसमें पंद्रह भाग हैं। जो तीन भागों में बाँटे गये हैं। इनमें सत्, चित्  और आनंद की व्याख्या की गई है।किंतु वह जानती है, ध्यान भी गहरा करना होगा यदि अध्यात्म में वांछित प्रगति करनी है। उस अनंत परमात्मा की अनंत शक्तियाँ हैं। जो कहता है उसे जान लिया, वह घोर अंधकार में घिर जाता है। परमात्मा तो बेअंत है, उसे जानने का एक ही अर्थ है, अधिक से अधिक उसके सान्निध्य में रहना, उसमें डूबना और त्याह ध्यान में ही संभव है। 


रात्रि के नौ बजे हैं । कल रात लगभग एक बजे अचानक नींद खुल गई।चेहरे पर पसीना था, शायद कमरा काफ़ी गर्म हो गया था।उठकर खिड़कियाँ व दरवाज़े खोले, कुछ देर बैठने से हवा का एक झोंका जैसे आकर छू गया, रात्रि की निस्तब्धता में कहीं से एक पंछी की आवाज़ सुनायी दी। दोपहर को उस सखी का फ़ोन फिर से आया।वे लोग अब मकान ख़रीदना छोड़कर किराए के मकान में रहने की सोच रहे हैं।उनके लिए घर देखना शुरू किया है। ईश्वर का विधान मानवों की समझ से बाहर है। वह बिछुड़े हुओं को कब कैसे मिलायेगा कोई नहीं जानता।अभी नन्हे और सोनू से बात हुई। सुबह वह उठा तो सिरहाने रखी दवा का नाम बिना पढ़े, आँख की दवा समझ कर डाल ली थी दिन भर परेशान रहा। डाक्टर ने दूसरी दवा दी है, कल तक अवश्य ठीक हो जाएगा। आज पापा जी से बात हुई, वह लाओत्से की एक पुस्तक पढ़ रहे हैं। उन्होंने कहा-उस पुस्तक के अनुसार, यदि कोई ये तीन बातें अपना ले तो सुखी रहेगा। प्रथम है, दिल में सारी कायनात के लिए अनायास ही प्रेम, दूसरी है किसी भी वस्तु या बात में अति पर न जाना और तीसरी कभी भी सबसे आगे रहने का प्रयास न करना। लाओत्से विनम्रता का पाठ ही तो पढ़ा रहे हैं, पीछे रहने में जिसे किसी हीनता का अनुभव न हो, वही समता में रहा सकता है और जो सबसे प्रेम कर सकता है, उसका मन भी डोलता नहीं। 


आज सुबह नींद चार बजे ही खुल गयी थी। कल रात ‘पंचदशी’ सुनकर सोयी थी। सुबह उठते ही एक सूत्र मन में आया; जो जागृत, स्वप्न और सुषुप्ति को देखता है, वह ‘मैं’ हूँ । योग वशिष्ठ में पढ़ा था, वास्तव में ब्रह्म में कुछ हुआ ही नहीं, सब स्वप्नवत् ही है। मन ठहर गया; सुबह-सुबह ही एक कविता लिखी, फिर कुछ देर का मौन, उसके बाद एक रचना उतरी। आर्ट ऑफ़ लिविंग के अनुवाद संयोजक को भेजी कि गुरुजी को पढ़ने के लिए भेजे, उसने कहा नकुल भैया से कहकर भिजवायेगा। गुरुजी का संदेश कल भी आया, आज भी एओएल के ऐप ‘सत्व’ में उनकी ज्ञान सूक्ति के माध्यम से।आज नन्हा, सोनू व बड़े भैया की बिटिया आये थे, जिसने निफ़्ट से पढ़ाई की है। दोपहर को उसके मनपसंद राजमा-चावल बनाये। नन्हे की आँख अभी तक ठीक पूरी तरह से नहीं हुई है। शाम को सब मिलकर पड़ोस में बन रहे आलीशान विशाल मकान को देखने गये, मकानमलिक भी आ गये थे।


जनवरी आधा भी नहीं बीता है, मौसम अभी से गर्म होने लगा है। आज गर्म वस्त्रों को धूप दिखाकर आलमारी में रख दिया, यहाँ उनकी कोई आवश्यकता ही नहीं है। शाम को एक और घर देखने गये, तीन कमरों का मकान अच्छा है मार्च में वे लोग आयेंगे, ऐसा कहा है।आज नन्हे ने एक दोसा तवा भिजवाया, संजीव कपूर की कंपनी का है, ग्रेनाइट का बना हुआ। कल उसका उद्घाटन करेंगे, उसने मन में सोचा ही था कि पहले आलू पराँठा बनायेंगे, ठीक उसी वक्त जून ने भी बिलकुल यही बात कही। विचार यात्रा करते हैं, यह सिद्ध हो गया। 



Wednesday, January 22, 2020

ड्राइविंग की एबीसी



जुलाई का महीना यानि आषाढ़ का महीना अर्थात वर्षा का मौसम ! आज सुबह से ही बादल बने हैं. वे छाता लेकर टहलने गए पर खोलना नहीं पड़ा. पिछले छह दिन उड़ीसा में बिताने  के बाद घर आकर ऐसा लगा, जैसे बहुत दिनों बाद लौटे हैं. यहाँ का मौसम या पानी का असर, सिर में हल्का दर्द है, पर स्वयं को उससे अलग कर पाना अब सहज हो गया है. सुबह ड्राइविंग की, दोपहर को भी, आज सातवां दिन है, पर अभी तक ए बी सी का क्रम ठीक से नहीं आया है, शायद कुछ दिनों का गैप हो गया इसलिए. गाड़ी चलना इतना कठिन नहीं है पर इतना सरल भी नहीं. सजगता इसकी पहली शर्त है. स्टीयरिंग को हल्के से पकड़ना है, क्लच दबा कर ब्रेक लगाना है, गाड़ी को गति देकर गियर बदलना है , दाएं-बाएं मोड़ते समय सिगनल देना है . ये सब बातें याद रखनी हैं. शाम को मीटिंग है, स्कूल में नया खजांची आया है, पता चला है, पहले का हिसाब ठीक नहीं है, इतने वर्षों में किसी ने ध्यान नहीं दिया. कल शाम जून को देर तक टीवी देखने के लिए उसने टोका, जैसे उन्होंने वैदिक चैनल देखने के लिए उसे मना किया था. यह बदले का कृत्य था सम्भवतः, जून सुबह तक चुपचाप थे. जो जैसा है उसे उसे वैसा ही स्वीकारना होगा. वह इस ज्ञान में स्थित रहना चाहती है . अध्यात्म को जीना चाहती है अतः उसे साक्षी भाव से ही इस जगत को देखना है. हर कोई अपने स्वभाव से प्रेरित होकर कृत्य कर रहा है. उसे भी अपने स्वभाव में रहना है. सत्य और अहिंसा के सूत्र को पकड़ कर रखना है. किसी को बदलने की इच्छा ही हिंसा है. परमात्मा जैसे सभी को बेशर्त स्वीकारता है, वैसे ही  उन्हें भी सिवाय प्रेम के किसी को कुछ भी नहीं देना है. 

आज महीनों बाद रद्दीवाला पुराने अख़बार लेने आया, उन्हें लग रहा था शायद वह बीमार है या कहीं चला गया है. उसने बताया डायबिटीज के कारण वजन बहुत घट गया है, पहले उसका शरीर बहुत भारी था. आज सुबह ही उन्होंने अपना वजन देखा था, बढ़ गया है. नैनी की तबियत ठीक नहीं है उसकी देवरानी काम पर आयी. कार धोने वाले की जगह उसके भाई ने कार धोयी, पता चला वह अपने पिता को लेकर गांव गया है, चाचा का देहांत हो गया है. धोबी ने भी कहा वह गांव में अपने चाचा से मिलकर आया है. उसे लगा उनसे कहीं ज्यादा अच्छी तरह ये लोग रिश्ते निभाना जानते हैं. कल शाम मीटिंग में हिसाब किताब  देखा, पुराने ट्रेजरर ने पैसों का काफी हेर-फेर किया है. खुद पर इतने आक्षेप लगते देखकर भी वह भावहीन दशा में चुपचाप बैठा था  और हर्जाना भरने को भी तैयार हो गया. 

वही कल का सा समय है, आज बादल छंट गए हैं, धूप नजर आ रही है. सुबह ड्राइविंग का अभ्यास किया, ज्यादातर समय सेकेण्ड गियर में ही चलाया. बाद में ट्रेनर ने कहा, अपने आप बिना कहे ही गियर बदलना चाहिए था. अब पहले से ज्यादा भरोसा आ गया है, इतवार की सुबह अकेले भी जा सकती है. आज बहुत दिनों बाद एक कविता लिखी. समय का अश्व जैसे तीव्र गति से दौड़ रहा है. नन्हा दो दिन के लिए पूना गया था, आज लौट आया है. भूटान यात्रा का संस्मरण आगे नहीं बढ़ा, वहां का इतिहास पढ़ रही है पर इतनी मोटी किताब है यह कि इसका आर-पार ही नजर नहीं आ रहा है. धार्मिक और राजनितिक रूप से भूटान में एक ही व्यक्ति का शासन चलता आ रहा है, अर्थात वहां के आध्यात्मिक नेता ही शासक रहे हैं. अंध विश्वासों और मिथकों के मध्य वहां की जनता आज भी जैसे एक रहस्य को जी रही है. अभी-अभी एक सखी का फोन आया, विशेष बच्चों के स्कूल के अध्यापक-अध्यापिकाओं के लिए होने वाली वर्कशॉप में वह उसकी मदद करेगी. 

Friday, March 29, 2019

सदिया पुल



रात्रि के सवा दस बजे हैं, जून अभी तक नहीं आये हैं, किसी ऑफिशियल मीटिंग में भाग लेने गये हैं. आज ‘विश्व योग दिवस’ है. सुबह समय पर उठे, योगा प्रोटोकाल के अनुसार प्रैक्टिस की. जून कम्पनी की तरफ से आयोजित सामूहिक योग सम्मेलन में भाग लेने बीहुताली गये. वह ‘पूर्वांचल कारिकारी स्कूल’ गयी जहाँ बच्चों को योग कराया. वापस आकर मृणाल ज्योति में भी योग सेशन का आयोजन किया. शाम को पौने चार बजे संगिनी गयी, जहाँ गायत्री समूह की महिलाओं के साथ चार घंटे तक आर्ट ऑफ़ लिविंग के ‘बेसिक कोर्स’ में भाग लिया. इस तरह आज का पूरा दिन ही योग के नाम था. सुबह से ही आज मौसम अच्छा था. शाम को कोर्स में बहुत दिनों बाद ‘सुदर्शन क्रिया’ की, वर्तमान का क्षण ही वास्तव में जीवन का अवसर देता है, वरना वे अतीत की स्मृतियों को ही ढोते रहते हैं, कभी भविष्य की आशंकाओं को. अब नींद आ रही है. उसने सोचा, जून को संदेश कर देती है, दरवाजा खुला है, आ जायेंगे !

आज कोर्स में कुछ महिलाओं को देखकर लगा, वे सभी कुछ शीघ्र चाहते हैं और जल्दी से बिना कुछ किये चाहते हैं. संसार में कुछ भी पाना हो तो प्रयास करना होता है प्रतीक्षा करनी पड़ती है. अध्यात्म में कुछ पाना है तो कुछ करना नहीं, केवल प्रतीक्षा करनी होती है. जाने अनजाने जो भूलें वे कर बैठते हैं, उनका खामियाजा एक न एक दिन भुगतना ही पड़ता है.

आज कोर्स का चौथा दिन है. अभी तक तो सब ठीक चल रहा है. सभी महिलाएं कोर्स में पूरे उत्साह से भाग ले रही हैं. एक महिला के सिर में कल से दर्द था, आज सुबह फोन आया. अब तक ठीक हो गया होगा. अभी-अभी एक सखी से बात की, सोमवार को ‘सदिया पुल’ देखने जाने का कार्यक्रम है. ब्रह्मपुत्र की उपनदी लोहित नदी पर बना भूपेन हजारिका सेतु या ढोला-सदिया सेतु भारत का सबसे लम्बा पुल, जिसका उद्घाटन मोदी जी ने पिछले महीने ही किया है. रविवार को डिब्रूगढ़ में जगन्ननाथ पुरी की यात्रा है. सम्भवतः कोर्स के बाद वे भी जाएँ, जहाँ पुरी की तरह एक नया विशाल मन्दिर वहाँ बना है. कल शाम को सोनू से बात हुई, उसके दफ्तर में एक लड़की की मानसिक अवस्था ठीक नहीं है, वह काफी परेशान लग रही थी. दीदी ने लिखा है भीतर की शांति का अनुभव योग से हुआ है उन्हें, समय निकालकर अपने साथ बैठना, फिर स्वयं को भीतर तक पहचानना कितना जरूरी है स्वस्थ रहने के लिए.

कोर्स की समाप्ति पर उसने कुछ पंक्तियाँ कहीं

अभय की चट्टान पर घर बनाना है
प्रीत का दिल में सदा दिया जलाना है
दिल के आइने को सदा सच से चमकना है
ज्ञान का दीपक सदा आगे दिखाना है
बाँट देना है जगत में पास जो कुछ भी है निखारें  
यम-नियम को साध कर वे पूर्ण जीवन को संवारें !     


Tuesday, August 16, 2016

ब्रह्म मुहूर्त


आज कई दिनों के बाद धूप निकली है. समय वही दोपहर का है पर वह भीतर है, सिर में हल्का दर्द है, आइसपैक का इलाज बेहतर रहेगा. आज जून बहुत खुश हैं. वह अध्यात्म के मार्ग पर चलने को तत्पर हैं, भीतर के प्रेम को महसूस ही नहीं कर रहे, प्रकट भी कर रहे हैं..सद्गुरु की अपार कृपा है उन दोनों पर..वह दूर होकर भी इतने पास हैं..आज भी ध्यान में उनके ही चरणकमल थे, परमात्मा को जब वे अपने जीवन का केंद्र बना लेते हैं तो प्रसन्नता उनके अंग-संग छाया की तरह रहती है, आज ब्लॉग पर एक नयी कविता पोस्ट की !

पिछले पांच दिन डायरी नहीं खोली. कल दिन भर शाम के सत्संग की तैयारी में बीता. आए कुल जमा तीन लोग. सद्गुरू उसे कुछ संदेश देना चाह रहे हैं. परसों वे डिब्रूगढ़ गये थे. जून का दर्द कम होता था फिर बढ़ जाता था. वहाँ एक डाक्टर को दिखाया, उसने एक इंजेक्शन दिया, अब काफी कम है. उससे पूर्व इतवार था, एक सखी को रात्रि भोजन पर बुलाया था, शनिवार को एक सखी का जन्मदिन था, वे पार्टी में गये. शुक्रवार को दोपहर बहुत गर्म थी, शाम को एक बुजुर्ग आंटी से मिलने गये. सो ये पिछले पांच दिन खुद से दूर ही बीते. आज पुनः खुद की सुध आई है. साधना भी कई दिन बाद मन से की. इस समय साढ़े दस बजे हैं सुबह के, दोपहर का भोजन बन गया है. थोडा सा वक्त है. भीतर सदा की तरह शांति है और है एक दृढ़ संकल्प कि कितना भी आवश्यक कार्य हो साधना नहीं छोड़नी है और न ही लिखना छोड़ना है, इससे खुद का पता रहता है कि वे किधर जा रहे हैं. जून भी शायद एकाध दिन से नहीं लिख रहे हैं. कल से वह सुबह के कीमती वक्त का पूरा उपयोग करेगी. एक पल भी व्यर्थ नहीं खोना है. ब्रह्म मुहूर्त की बेला इधर-उधर की बातों में नहीं खोयी जा सकती ! माँ-पिताजी बाहर बैठे हैं. मौसम पुनः बदली वाला हो गया है. नन्हा इतवार की रात को चेन्नई से नहीं चला, बल्कि सोमवार को मोटरसाईकिल पर एक मित्र के साथ आया. जून को इस बात की जानकारी नहीं है, वह व्यर्थ ही परेशान हो जायेंगे. छोटी बहन ने लिखा है वह फिलोसफी की अध्यापिका से मिलेगी, पर उसे अपने सवालों के जवाब भीतर ही खोजने होंगे, बाहर केवल भटकन है, हर एक को अपना रास्ता स्वयं ही बनाना पड़ता है. सद्गुरू की पहचान भी तभी होती है जब खुद से पहचान हो जाये. बड़ी भांजी को अब सन्तान की जरूरत महसूस होने लगी है. उसे जिस सहयोग व ज्ञान की जरूरत है वह परिवार से मिलना कठिन है. दीदी को ही उसे समझाना होगा, लेकिन तभी न जब वह स्वयं पूछे.

आज वर्ष का सबसे लम्बा दिन है. वे रोज की तरह चिड़ियों की चहकार सुनकर उठे. मंझला भाई दो दिनों के लिए आया था, कल शाम उसे ट्रेन में बिठाकर वापस लौटे और योग निद्रा का अभ्यास किया. ध्यान अब जीवन का स्वाभाविक अंग बन गया है और मुस्कान अपनी सहज आदत..जून भी अब बेबात मुस्कुराना सीख गये हैं ! आज उसकी छात्रा के आने का दिन था, पर शायद वह पैतृक घर गयी होगी. सुबह घर की सफाई की और साप्ताहिक स्नान भी, स्वच्छता पवित्रता से भर देती है. इस वक्त धूप निकली है और हल्की बूंदा-बांदी भी हो रही है ! उसके सम्मुख तीन न्यूज़वीक पड़ी हैं.

आज बचपन की एक स्मृति पर आधारित कविता लिखी और पिताजी, दीदी व बड़े भाई को भेजी, पता नहीं क्या प्रतिक्रिया हो उनकी..आज सत्संग का दिन है, अब जून भी पूरे उत्साह से तैयारी करते हैं. परमात्मा को केंद्र में रखे कोई तो जीवन कैसा रसपूर्ण हो जाता है, फिर किसी बात की कोई फ़िक्र रहती ही नहीं. अभी सवा पांच हुए हैं, वह इस कक्ष में आ गयी है, जहाँ अगरबत्ती की भीनी-भीनी सी खुशबू है, शीतल हवा है, श्वेत चादर है और दीवार पर गुरूजी की मुस्कुराती सी तस्वीर है. इस क्षण भीतर एक पूर्णता का अनुभव हो रहा है, जैसे कुछ भी पाना शेष नहीं है, पाना अर्थात सांसारिक दृष्टि से, आध्यात्मिक दृष्टि से तो अनंत संभावनाओं के द्वार खुले हैं !


Wednesday, June 22, 2016

क्रिसमस की कविता


कल क्लब में हसबैंड नाईट है, जून जाने वाले हैं नहीं. उसे तो जाना चाहिए, उनके क्लब का सबसे बड़ा कार्यक्रम है और नहीं तो सजावट ही देखने लायक होगी, सांस्कृतिक कार्यक्रम भी अवश्य ही बहुत अच्छा होगा, वह अकेले ही जाएगी. अभी कुछ देर पूर्व असम में जनमत कराया जाये या नहीं इस बात पर जून और उसके मध्य चर्चा चली, अपने विचारों के प्रति मोह ही इसका कारण है. भीतर अहंकार है जरा सा भी विरोध उसे सहन नहीं होता. क्षण भर के लिए सिर में भार सा महसूस हुआ पर सजग होते ही चला गया स्वप्न में देखे अशोभन दृश्य के समान. गुरूजी कहते हैं वात, पित्त तथा कफ के कुपित होने पर भी चित्त विकार ग्रस्त हो सकता है, लेकिन ये दोष भी तो उनकी बेहोशी से ही जन्मते हैं. उनके भीतर जन्मों-जन्मों की तथा इस जन्म की कामनाएं तो भरी ही हुई हैं, जरा सी असावधानी से वे सतह पर आ जाती हैं. अध्यात्म के पथ पर चलने वाले साधल को निरंतर होश चाहिए !

जून की अंगुली में परसों चोट लग गयी थी जब वह मिक्सर साफ कर रहे थे. उन्हें दर्द हो रहा है इस कारण या शायद अन्य किसी बात पर वह आज दोपहर उसे बिना उठाये आफिस चले गये. आज सुबह क्रिया के बाद कितना अनोखा अनुभव हुआ. काफी देर तक वह भावसमाधि में थी. परमात्मा उनके कितने करीब है, उसमें और उनमें कोई दूरी नहीं है, वह वे हैं और वे वह है. वे हट जाएँ तो वही रह जाता है और भीतर एक संगीत गूँजता रहता है ! इस समय भी गूँज रहा है. आज उसने अपने आप pdf फाइल बनाकर दीदी को कविता भेजी. कल उन्होंने बरामदे में क्रिसमस ट्री सजाया है, आज जून उसकी तस्वीर उतारेंगे. कल पिताजी से बात की, चाचाजी की दसवीं थी, तेहरवीं भी करनी है. वह लिख रही थी की वर्षा होने लगी और झट हाथों ने कविता की डायरी उठा ली, कविता परी उतर आयी हो जैसे उसके अंतर की बगिया में ! शब्द झर रहे थे जैसे बूंदें बरस रही हों बारिश में !

आज शाम वे अपने क्रिश्चियन पड़ोसी के यहाँ जायेंगे, एक उपहार, क्रिसमस कार्ड व एक कविता लेकर. उसकी क्रिसमस पर लिखी कविता छोटी भतीजी के स्कूल के बोर्ड पर लग गयी है. आज वह यहाँ के क्रिश्चियन स्कूल के फादर को भी उसका एक प्रिंट देने वाली है. दीदी व कुछ अन्य लोगों को भी भेजी है, कुछ शब्द जो लय में व्यवस्थित हो गये हों, कितना असर कर जाते हैं. उसे नये वर्ष पर भी एकदम नयी सी कविता लिखनी है, कुछ ऐसी जो पढने वाले के भीतर जोश भर दे. उनके भीतर अपार क्षमता है, वे शक्ति के पुंज हैं ! यूँ ही वे अपने को कोसे चले जाते हैं.

कितना सुंदर है यह जहान, कितना अद्भुत है यह वितान !
भरनी है अनंत गगन में ऊंची एक उड़ान, थक के न बैठो ओ प्यारे विहान !
उसे लगता है वे अपनी ऊर्जा के एक अंश का भी यदि उपयोग करें तो...
बदल के रख दें अपनी किस्मत, नजर उठाके जिधर देख लें, बदले जमाना अपनी फितरत ! 
प्यार के बीज बिखरा दें गर फूल दोस्ती के खिल जाएँ,
दिल से जरा सा मुस्का दें, कितनी राहें मिल जाएँ !
अपने इन दो हाथों में कितनी बड़ी जागीर छुपी है,
मानव के इस नन्हे दिल में जन्नत की ताबीर छुपी है !
करे इरादा एक बार वह सब हासिल कर सकता है,
पल भर में रोती आँखों में मुस्कानें भर सकता है !   

Friday, November 27, 2015

चाँदी की पायल


आज सदगुरु ने अभ्यास और वैराग्य पर प्रकाश डाला, जिसे साधक चित्त की वृत्तियों को शांत कर सकें. अभ्यास के लिए समय की आवश्यकता है पर वैराग्य काल निरपेक्ष है. जिस क्षण किसी को चैतन्य सत्ता से प्रेम हो जाता है जगत तत्क्षण फीका पड़ जाता है, यही तो वैराग्य है. एक बार जिसने अमृत चख लिया हो वह पुनः विष की तरफ कैसे जायेगा ? सदगुरु कितने सहज होकर सरल शब्दों में पुनः पुनः पथ पर लौटा लाते हैं, उन्हें जो बार-बार रास्ते से भटक जाते हैं. आज बहुत दिनों के बाद ध्यान की गहराई को महसूस किया. मन कितना गहरा है उन्हें इसकी कोई खबर ही नहीं है. भीतर अनंत शक्ति छिपी है इसकी भी खबर नहीं है. छोटी-छोटी चीजों के पीछे जाकर वे अपना समय और शक्ति नष्ट करते रहते हैं. उस खजाने को अनछुआ ही छोड़ देते हैं. बहुत हुआ तो थोड़ा सा ही पाकर संतुष्ट हो जाते हैं. झलक मात्र से ही संतुष्ट हो जाते हैं. पुनः-पुनः लौटकर आने में जो अब तक का कमाया था वह नष्ट प्रायः ही हो जाता है जैसे कोई एक तरफ से झोली में डाले और नीचे से निकलता जाये तो कैसे भरेगी झोली और फिर वे भरने का प्रयास ही छोड़ देते हैं. अध्यात्म का पथ निरंतर सजगता का पथ है, एक-एक क्षण में सजग. कभी भी यह न मानें कि जान लिया, पा लिया, यह तो जीवन भर की साधना है !

‘कुछ हूँ’ से ‘हूँ’ तथा ‘हूँ’ से ‘है’ तक की यात्रा ही अध्यात्म की यात्रा है. जब ‘है’ की अनुभूति होती है तो कोई भेद नहीं रहता. मुक्त अवस्था तभी मिलती है. आज सुना अभ्यास के द्वारा जो समाधि मिलती है वह असम्प्रज्ञात है, प्रेम, श्रद्धा तथा वीरता से भी समाधि घटती है. मन जब अपने मूल स्वरूप में टिक जाये तत्क्षण समाधि घटती है. आज ध्यान में उसे कुछ अनोखे दृश्य दिखे. चाँदी की पायजेब पहने सुंदर पैर, सम्भवतः कृष्ण के वे चरण जो वह उनकी मूर्ति में देखती है. रंग, प्रकाश और ध्वनि..यह आत्मा का ही स्फुरण है, उसी की ज्योति है, उसी का नाद है, उसके ही रंग हैं, मन जब ठहर जाता है तो ये सब दीखते हैं, इनसे परे वह दृष्टा है जो इन्हें देखता है और द्रष्टा से भी परे  जो है वही वह सत्ता है जिसका कोई नाम नहीं है, कोई रूप नहीं है. जो है. मन न रहे अर्थात मन ठहर जाये तो जगत भी लुप्त हो जाता है. मन ही तो जगत है. उन्हें मन को खाली करना है तब वह प्रकाश और नाद से भरेगा जब उससे भी खाली होगा तब केवल परमात्मा ही रहेगा. सच्चिदानंद स्वरूप परमात्मा, उसे कोई भी नाम दें वह एक ही सत्ता है.


आत्मा में रहना जिसे आ जाये उसे मन परेशान कैसे कर सकता है. आत्मा शुद्ध, बुद्ध, चिन्मात्र सत्ता है, वह आकाशवत् है, मन उसमें उठने वाला एक आभास ही तो है, आभास से न तो डरने की आवश्यकता है न ही उसमें बंधने की जरूरत है ! मन को जब वे अलग सत्ता दे देते हैं तभी दुःख का शिकार होते हैं. जहाँ द्वैत है वहीं दुःख है. विचार भी उसी आत्मा की लहरें हैं जो आनन्दमयी है. भीतर उठने वाले सारे संशय, डर तथा भ्रम उसी आत्मा से ही उपजे हैं, वे दूसरे नहीं हैं, उनसे कैसा डर, विचार तो शून्य से उपजा है और शून्य में ही विलीन हो जाने वाला है. सागर क्या अपनी लहरों से कभी डरेगा, चाहे लहर कितनी भी विशाल क्यों न हो, आकाश क्या बादलों की गर्जन से डरेगा ? वे क्यों अपने मन से डरते हैं, वे सागर की तरह गहरे तथा आकाश की तरह अनंत हैं, वे निर्मल हैं, स्वच्छ पावन हैं. एक भी दुर्गुण उनके भीतर प्रवेश नहीं कर सकता. वे जो हैं वहाँ न कोई गुण है न दुर्गुण वहाँ कुछ भी नहीं है. निर्दोष अनछुए वे शुद्ध प्रकाश हैं, प्रकाश का कोई आकार नहीं. वे उससे भी सूक्ष्म हैं, ऐसा प्रकाश जो भौतिक नहीं है, जो पदार्थ से परे है, ऐसी ध्वनि जो अनाहत है ऐसे स्पंदन जो स्वतः हैं, वे उन सबसे भी परे हैं, मन, बुद्धि आदि तो सहायक हैं उनके न कि दुश्मन, जिनसे बचने के लिए वे ..?  

Monday, September 7, 2015

गुजरात की बाढ़


सहनशीलता, धैर्य, मनोबल, संकल्प बल तथा दृढ़ इच्छा शक्ति जिसके पास हो वही अध्यात्म के पथ पर चल सकता है. मौत का भी डर जब मन में न रहे, कोई भी कष्ट आए, सम रहकर उसे सहना, यह जब तक जीवन में न हो तब तक कोई जीवन से दूर ही रह जाता है. आजकल उसके मन की दशा कुछ ऐसी ही है. सत्य का सामना करने की हिम्मत वह अपने भीतर नहीं जुटा पायी. यात्रा पर जाने से पहले एक सखी ने उसे एक खत पोस्ट करने को दिया था, वह भूल गयी और यात्रा के अंत में उसे पोस्ट किया, पर जब उसने पूछा तो यह नहीं बताया कि पोस्ट करने में देरी हो गयी थी. उसे बुरा लगेगा यही सोचकर नहीं बताया पर अब लगता है कि वह उसके बारे में अपनी राय को बदल देगी इस डर से. पर यह सच है कि झूठ के पाँव नहीं होते. एक बोझ जो उसने व्यर्थ ही चढ़ाया है. नीरू माँ के अनुसार उसे प्रतिक्रमण करना होगा और इस बोझ को सिर से उतार फेंकना होगा. अपने आस-पास की दुनिया की वास्तविकता को भी उसने नहीं देखा. गुजरात में बाढ़ आई है, बड़ी ननद से उसने बात भी नहीं की. वह आत्मकेंद्रित होती जा रही थी, जिस क्षण यह भास हुआ उसी क्षण से स्थिति बदल गयी है. कल वे एक मित्र के यहाँ गये, गुजरात में बाढ़ आई है, वहाँ किसी ने एक बार कहा तो उसे इसकी गम्भीरता का अंदाजा ही नहीं था. आज सुबह छोटी ननद, दीदी व बड़े भाई से बात हुई. दो सखियों से बात हुई, एक ने कृष्ण के १०८ नामों के बारे में पूछा तथा दूसरी ने गुरूजी द्वारा कही यह बात बताई कि १५ अगस्त तक का समय भारी है, उन सभी को ध्यान द्वारा इसे टालने का इसकी भयानकता को कम करने का कार्य करना चाहिए. वह ईश्वर को केवल अपने भीतर ही पाना चाहती थी पर वह तो कण-कण में बिखरा है, वह तो हर एक जड़-चेतन में है, वही तो माँ के प्यार में है और वही प्रिय के प्रेम में, वही वात्सल्य में है. ईश्वर कहाँ नहीं है, बाढ़ के पानी में फंसे लोगों में भी वही है और बाढ़ के पानी में भी वही है. उसका कण-कण इस सृष्टि के कल्याण की कामना करता है.

अभी-अभी बिजली थी, अभी-अभी चली गयी. ऐसे ही एक दिन अभी-अभी जीवन होगा, अभी-अभी नहीं होगा. एक पल में मृत्यु उन्हें अपना ग्रास बना लेगी अथवा तो एक पल में वे शरीर के बंधन से मुक्त हो जायेंगे. पीछे की खिड़की से हवा का एक शीतल झोंका पीठ को सहला गया, पंखा चलते रहने पर इसका आभास भी नहीं हो पाता, ऐसे ही जीवन के न रहने पर आत्मा तो अपने आप में रहेगी ही, परमात्मा के प्रकाश से परिपूर्ण ! कल एक पुस्तक पढ़ी, ध्यान के विभिन्न गुर बताये हैं उसमें, विपश्यना ध्यान के, जिसमें केवल बाहर जाती हुई साँस को देखना है. एक नये नजरिये से लिखी गई पुस्तक है. आज मौसम गर्म है, उसकी आँखें मुंद रही हैं, तमस का प्रभाव है.

भाव की संवेदना बहुत दूर तक जाती है, जहाँ मन नहीं पहुंचता, बुद्धि नहीं पहुंचती वहाँ भाव के सूक्ष्म कण पहुंच जाते हैं. ध्यान का दर्शन केवल मन को स्थिर करना ही नहीं बल्कि भाव शुद्धि है. अभी कुछ देर पूर्व उससे जन्माष्टमी का दिन जब एक बार पुनः पूछा सासु माँ ने तो उसका जवाब शांत भाव दिया गया नहीं था. छोटी ननद का फोन आया. पिता जी की तबियत ठीक नहीं है, उसने कहा, वह अपना ध्यान भी नहीं रखते. वह कह रही थी कि दोनों को साथ-साथ रहना चाहिये. देखें  भविष्य में क्या लिखा है. इतना तो सही है कि वृद्धावस्था में भी पति-पत्नी को एक-दूसरे का साथ तो चाहिये ही.  

कल रात तेज वर्षा हुई, आँधी-तूफान भी. मेघ अपने पूरे बल के साथ गरजते रहे. एक-दूसरे से टकराते रहे, रह-रह कर बिजली चमकती रही. वह सब कुछ अनुभव कर रही थी पर इन सबसे परे भी थी. उसके मन में तब आत्मा का गीत गूँज रहा था. मन जैसे यहाँ का न होकर किसी और लोक का था. वह निद्रा थी या तंद्रा थी या शुद्ध ज्ञान का नशा था, पर बिजली जाने से जो कमरे में गर्मी हो गयी थी, उसका भी कोई प्रभाव नहीं पड़ रहा था. जून का आज जन्मदिन है, कल उसने उनके लिए एक कविता लिखी. आजकल वह बहुत खुश रहते हैं. उन्हें भी उस प्रेम का अनुभव हो रहा है, जिसकी बात वह उनसे करती थी. अभेद प्रेम का जहाँ दो न रहें एक हो जाएँ, वहाँ कोई अहंकार नहीं बचता और तभी शुद्ध साहचर्य का अनुभव होता है, पर प्रेम की यह धारा इतनी संकीर्ण तो नहीं होनी चाहिए, यह तो सभी की ओर अबाध गति से बहनी चाहिये. उसके मन की यह धारा यूँ तो सभी ओर बहती है पर एक तरफ जाकर थोड़ी अवरुद्ध हो जाती है. एक सखी के प्रति उसके मन में एक द्वंद्व बना ही रहता है. उसने प्रार्थना की, सद्गुरु ही उसे इस धर्म संकट से बचा सकते हैं. पर सद्गुरु तो यही कह रहे हैं, जो बाधा उसने स्वयं खड़ी की है उसे कोई दूसरा चाहकर भी नहीं दूर कर सकता, ईश्वर भी नहीं. वह उसकी आजादी में व्यवधान डालना नहीं चाहता. जिस दिन उसे स्वयं अहसास होगा कि इस द्वंद्व के चलते उसकी ऊर्जा का अपव्यय हो रहा है उस दिन स्वयं ही यह छूट जायेगा, उससे पहले नहीं और उसके बाद भी नहीं. आग में हाथ पड़ जाये तो स्वयं ही निकालने की सुध जगती है. 

Wednesday, August 26, 2015

हवा चली..


धन्य है भारतवर्ष और धन्य हैं वे कि उनके पास ज्ञान का अतुल भंडार शास्त्रों के रूप में विद्यमान है. वे इसकी महिमा को समझें और इसके अनुसार चलें. अपने से बड़ों की सेवा करना तथा उनका सम्मान करना तथा छोटों को स्नेह देना..आज पुनः उसने बेवजह शब्द मुँह से निकाले, फिर भी स्थिति पहले से बेहतर हुई है. कल रात जून ग्यारह बजे आए. नन्हे से बहुत दिनों के बाद अध्यात्म पर चर्चा की. ध्यान किया. इस समय वह किताब पढ़ रहा है, शेष सभी सो रहे हैं, बाहर तेज धूप है, भीतर एसी के कारण ठंडक है, इस बार वर्षा कम हो रही है वर्ष के इस हिस्से में. दोनों भांजे अपेक्षकृत शांत तथा सुधरे हुए बच्चे हैं, बात मानते हैं तथा खाने-पीने में भी ज्यादा नखरे नहीं करते हैं. शाम को सत्संग में जाना है, निकट ही एक परिचित के यहाँ है. सुमिरन बना रहता है आजकल, अनुभव यदि एक बार हो जाये तो विस्मृत हो भी कैसे सकता है. जैसे किसी को अपने होने का अहसास हर क्षण रहता है, वैसे ही उसके होने का ज्ञान भी सदा रहता है. उसका प्रेम भीतर रिसता रहता है और वही भीतर से उदित होकर बाहर बिखरता है. उन्हें सजग होकर उसके रूप को अशुद्ध होने से बचाना है. मन उसमें कुछ जोड़ने या घटाने लगता है तो वह प्रेम दूषित हो जाता है.

कल रात को गर्मी बहुत थी और थोड़ी देर के लिए बिजली गुल हो गयी, सभी परेशान थे, पर वह इसका लुत्फ़ उठा रही थी. गर्मी का असर नहीं हो रहा था भीतर की जीवंतता और मुखर हो उठी थी. जून आज फ़ील्ड गये हैं शाम को छह बजे तक आयेंगे. कल सुबह उसे दो सखियों के साथ बच्चों से मिलने जाना है, वे भी उतने ही उत्सुक होंगे जितनी उत्सुकता उन्हें है. बाहर सम्भवतः तेज हवा चल रही है, दरवाजे की आवाज से उसने अनुमान लगाया है, पिछले कई दिनों से हवा जैसे बंद थी. सुबह सद्गुरु को सुना था, अब कुछ याद नहीं है, आजकल वह धर्म को सुन नहीं पा रही पर जी रही है. हर समय भीतर एक ऊर्जा के प्रवाह को अनुभव करती है. ‘उसकी’ उपस्थिति का अहसास हर क्षण होता है. वह है तो वे हैं. अब लगता है जैसे मन की समता पहले से कहीं देर तक टिकी रहती है और यदि मन कभी एक क्षण के लिए विचलित होता भी है तो कोई भीतर है जो उसका साक्षी रहता है अर्थात होश तब भी कायम रह पाता है. इसी महीने उसका जन्मदिन भी आ रहा है, इस वर्ष उसने जाना यदि कभी कोई उसके बारे में लिखे तो लिख सकता है. सद्गुरु कहते हैं जो जानता है वह कहता नहीं किन्तु वह जिस जानने की बात कह रही है वह तो निज स्वभाव है.


फिर एक अन्तराल..कभी प्रमाद तो कभी व्यस्तता..आज नये महीने का पहला दिन है. पुनः संगीत का अभ्यास भी शुरू किया है और लिखना भी. परसों जन्मदिन था, अच्छा रहा. मौसम पिछले हफ्ते से ही सुहावना हो गया है. वर्षा दिन-रात नहीं देखती कभी भी शुरू हो जाती है, इस समय थमी है. पिछले हफ्ते सत्संग में उसने ‘अंकुर बाल योजना’ के लिए सभी को निमंत्रित किया. उसने इस प्रोजेक्ट का नाम अंकुर रखा है, इसमें वे छोटे-छोटे बच्चों को, जो अभी अंकुर हैं और भविष्य में वृक्ष बनेंगे, अध्यात्म के मार्ग पर प्रेरित कर रहे हैं. जिनके माता-पिता के पास उन्हें देने को संस्कार नहीं हैं, घरों का माहौल दूषित है, नशा आदि जहाँ रोज की बात है. प्राणायाम, ध्यान, सत्संग तथा योगासन के माध्यम से उन्हें एक सन्मार्ग पर ले जाने को प्रेरित कर रहे हैं.   

Saturday, March 14, 2015

मौसम के मिजाज


आज सुबह पिताजी व छोटे भाई से फोन पर बात की. दोनों ने टीवी पर आने वाले आध्यात्मिक प्रवचनों की बात की. उस पर ईश्वर की कृपा हुई है कि वह अपनी पूरी शक्ति और श्रद्धा के साथ यह यात्रा कर रही है. नित नये-नये अनुभव होते हैं. कभी-कभी ऐसा लगता है जैसे वे पहले से ही तय हों. सभी कुछ सही समय पर होगा, ठीक होगा, कोई यह आश्वासन देता रहता है. उसकी इच्छाएं अपने आप पूरी होती प्रतीत होती हैं. सद्गुरु और सद्शास्त्र के प्रति कृतज्ञता की भावना बढ़ती जाती है. मन संतुष्ट रहता है जैसे कोई भौतिक इच्छा न रह गयी हो और हो भी तो उसका पूरा होना या न होना दोनों ही बराबर हैं. संसार का कोई भी सुख आकर्षित नहीं करता जितना की ईश्वर का विचार और उससे मिलन की ललक ! ईश्वर ही उसे निर्देशित कर रहे हैं, वही उसका मार्ग सुगम बना रहे हैं तभी तो समय भी है, स्थान भी है, शास्त्र भी हैं, सद्गुरु भी हैं. सभी कुछ उसके अनुकूल कर दिया है उस प्रभु ने. जून भी इसी मार्ग पर चल पड़े हैं चाहे अनजाने ही सही. दृढ़ संकल्प हो और एक मात्र यही संकल्प हो तभी सफलता सम्भव है. धैर्य भी उतना ही चाहिए तथा प्रतिक्षण सजग भी रहना होगा. श्रद्धा अटूट हो तो उस का हाथ सर पर रहेगा, वह इसी तरह उनके मार्ग को सरल करता जायेगा. उसकी स्मृति ही इतनी सौम्यता भर देती है हृदय में कि उसका साक्षात्कार कितना अभूतपूर्व होगा !


ईश्वर हर क्षण उसके साथ है, वह कितने विभिन्न उपायों से अपनी उपस्थिति को जता रहा है. सद्गुरु भी प्रेरणादायक वचन बोल रहे हैं. साधना के पथ पर कैसे चला जाये, ध्यान कैसे किया जाये, इसके सूक्ष्म तरीकों की चर्चा कर रहे हैं. सारी बातें जैसे किसी पूर्व निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार स्पष्ट होती जा रही हैं. सुबह ध्यान में कोई चेहरा दिखा, स्पष्ट नहीं था. आँख बंद करते ही अथवा खुली रहने पर भी अब वस्तुएं अपने वास्तविक रूप में दिखाई देने लगी हैं. धीरे-धीरे उस आवरण को ईश्वर अपनी कृपा से हटाना चाहते हैं. उसे पूरा सहयोग देना है, शुभ संकल्प करके मन को स्थिर रखना है, बूढी को प्रज्ञा में बदलना है. मन ध्यानस्थ रहेगा तो उस प्रभु को आने का मार्ग मिलेगा अन्यथा तो हजारों हजार विचार, वासनाएं, इच्छाएँ आदि सत्य से दूर रखती हैं. सत्य पर चलना हो अथवा सत्य को पाना हो तो मन को खाली करना होगा. सद्गुरुओं के वचन अब स्पष्ट होने लगे हैं. भौतिक इच्छाओं में कोई सार नहीं है, जो सुख इनसे मिलता है वह क्षणिक होता है किन्तु अध्यात्मिक सुख अनंत है उस अनंत प्रभु की तरह. उसे पाना ही जीवन का एकमात्र लक्ष्य होना चाहिए. जीवन अमूल्य है क्योंकि इसी में वे परम सत्य को पाने की चेष्टा कर सकते हैं, पा सकते हैं. वह उनके निकट से भी निकटतर है केवल मिथ्या अहंकार का पर्दा बीच में पड़ा है.

आज सुबह एक घंटा संगीत का अभ्यास किया. कपड़े प्रेस किये, भोजन की तैयारी की, इस मय साढ़े नौ बजे हैं. एक सखी का फोन आया. धूप तेज है उसने मौसम की जानकारी माँगी तो नूना ने कहा की मौसम सुहाना है..खैर मौसम के मिजाज तो बदलते रहते हैं. उन्हें अपने भीतर वह धुरी खोज निकालनी है जो अचल है, अडिग है, जिसका आश्रय लेकर वे दुनिया में किसी भी ऊँचाई तक पहुंच सकते हैं. उसी एक का पता लगाने योगी भीतर की यात्रा करते हैं. उस स्थिति की कल्पना ही कितनी सुखद है. स्थिर मन ही उस बिंदु तक ले जा सकता है जहाँ जाकर कुछ पाना शेष नहीं रह जाता. जहाँ जाकर लौटना नहीं होता. उसकी झलक तो उन्हें अब भी मिलती है पर यह अस्थायी होती है, संसार पुनः अपनी ओर खीँच लेता है.


Wednesday, March 4, 2015

कृष्ण की गीता


ज्ञानी गुरू की कृपा के बिना संसार सागर से पार होना असम्भव है, गुरू का हाथ उनके सिर पर रहे तभी उनका कल्याण होगा. कल के उत्सव में उसने एक कविता पढ़ी, जो सभी ने पसंद की, पर यह उतना महत्वपूर्ण नहीं है जितना यह कि गुरूजी ने ही उसे प्रेरित किया. कल उनकी पुस्तक पढ़ी. ज्ञान कितना अनमोल है यदि कोई इसे समझे, तो ही !
दोपहर को पन्द्रह-बीस मिनट ही सोयी पर भारीपन छा गया है, जबकि इससे अधिक देर तक ध्यान करने से भी थकान मिट जाती है. ध्यान में अवश्य ऐसी कोई बात है. आज सुबह बाबाजी ने अपने पुराने अनुभवों का जिक्र किया, उन्होंने विपरीत परिस्थियों में सात वर्ष गुजारे. ईश्वर प्राप्ति के लिए कठिन साधना करनी पडती है और आग में तपकर जब वह ज्ञान प्राप्त कर सके तो संत के पद पर लोगों ने उन्हें बैठाया. गुरू पद को प्राप्त करना अत्यंत कठिन है, और शिष्य बनना सम्भवतः उससे भी कठिन. अपने अहम् को मिटा देना होता है. विनम्र होकर ही गुरू से कोई कुछ पा सकता है. वरन अपने मिथ्या  अभिमान से वह स्वयं ही दबता रहेगा. अध्यात्म के मार्ग पर चलना बहुत कठिन है पर उतना ही मधुर भी...मानसिक तप करते करते मन को अपना दास बनाना है. मन ही उन्हें ऊंचाइयों पर ले जायेगा. मन की एक न सुनते हुए ज्ञान की सुनें, विवेक की सुनें तो सही मार्ग से विचलित नहीं होंगे. उसने घड़ी की ओर देखा, अब शाम के खाने की तैयारी का वक्त है.

परमात्मा की शरण में जाने पर हृदय अपने आप पावन होने लगता है. प्रज्ञा स्थूल होने पर ही अकरणीय कर्म कर बैठती है, बुद्धि यदि परमात्मा में स्थिर हो तभी प्रज्ञा सूक्ष्म होगी, यानि ईश्वर को ईश्वर से ही जाना जा सकता है. मन में न जाने कितने जन्मों के संस्कार हैं, जिनकी छाप इतनी गहरी है कि उसे मिटने में समय तो लगेगा ही. ध्यान के समय निर्विचारता की स्थिति आये उसके पूर्व लम्बे रस्ते से गुजरना होगा. कुछ देर के लिए ऐसा लगता है मन खो गया है पर जैसे ही यह भाव आता है फिर कहीं से कोई विचार प्रकट हो जाता है. ध्यान में बैठना लेकिन बहुत अच्छा लगता है. अज गुरुमाँ कहा कि संगीत अपने आप में कठिन साधना है और इसमें वर्षों लग सकते हैं. सुरों को मन में बैठना ही सबसे कठिन है. इस माह परीक्षा के बाद वह संगीत अध्यापक से विदा ले लेगी और पहले स्वयं रियाज करके जितना सीखा है उसे ही पचाना है. कल रात जून को नींद नहीं आयी, उसकी भी नींद थोड़ी डिस्टर्ब रही. शुभ-अशुभ की स्मृति न रहे, शुभ-अशुभ में प्रीति न रहे तो मन शांत रहेगा. कृष्ण ने कहा है, यदि सारे कर्मों को निष्काम भाव से करते हुए चित्त को उसमें लगाये रखेंगे तो वह बुद्धियोग प्रदान करेंगे. सभी परिस्थितियों में समभाव बनाये रखना भी चित्त को प्रभु में लगाये कहने जैसा ही है. अज वह न व्यायाम कर सकी न ध्यान, उसकी एक पुरानी छात्रा आयी थी, कलकत्ता में रहकर पढ़ी क्र रही है. आज सुबह क्रिया के बाद मन बेहद शांत था, बल्कि मन था ही नहीं, सिर्फ एक मौन था !

पिछले दो दिन डायरी नहीं खोली, शनिवार और इतवार इधर-उधर के कामों में कैसे बीत गये पता ही नहीं चला. कल शाम वह aol के भजन में गयी, योग शिक्षक आये थे, जब उन्होंने गुरू वन्दना शुरू की, उसका मन कृतज्ञता से आप्लावित हो गया. आज गुरुमाँ ने ध्यान की विधि बतलायी. विचार यदि आते हैं तो उनसे लड़ना नहीं है, असंग रहना है. एक विचार आता है वह चला जाता है, अगला अभी आया नहीं है. उस क्षण में स्थिर रहना है. गुरुमाँ नित नये तरह के वस्त्र पहनती हैं, बहुत प्यारी लगती हैं. कभी न कभी  इस जीवन में उनसे भेंट हो, यह उसकी हार्दिक इच्छा है और ईश्वर उसकी इच्छाएं सदा पूरी करते आये हैं ! बाबाजी ने बताया किस तरह संकल्प शक्ति को बढ़ाते जाना है. आत्मा में सुना, सब कारणों के कारण कृष्ण हृदय में रहते हैं, शुभ-अशुभ कर्मों तथा विचारों के साक्षी है. वही कर्म करने के लिए प्रेरित करते हैं. शरीर, मन और बुद्धि की दासता को त्याग कर जब कोई कृष्ण के प्रेम का बंधन स्वीकारता है तो सारा का सारा विषाद न जाने कहाँ चला जाता है !




Thursday, January 15, 2015

बदली में सूरज


हृदय में आध्यात्मिक क्रांति का उदय हो इसके लिए जीवन में साधना, सेवा, सत्संग व स्वाध्याय, चारों का होना अति आवश्यक है. उसके जीवन में तीन बातें तो हैं पर चौथे अंग ‘सेवा’ का कोई स्थान नहीं है. उसे घर में रहकर ही सेवा का पालन करना चाहिए. ज्यादा सचेत रहकर अपने कर्त्तव्य का पालन करना होगा. गोविन्द तभी उसका अभिन्न मित्र होगा. कृष्ण उसे एक पल के लिए भी स्वयं को भूलने नहीं देंगे. कृष्ण अपना वरद  हस्त उसके ऊपर सदा ही रखे हुए हैं, उसे ही उनकी कृपा को ग्रहण करने का सामर्थ्य अपने भीतर जगाना है. वर्तमान में रहने की कला सीखनी हो तो ‘मन्त्र जाप’ से बढ़कर कोई उपाय नहीं. इस तरह श्वास भी नियमित रहती है. ऋषि-मुनियों ने कितने सुंदर उपाय बताये हैं, यदि वे उन पर चलें तो ईश्वर उसी क्षण उन्हें प्राप्त हो सकते हैं, बल्कि वे तो कहते हैं  ईश्वर पहले से ही प्राप्त हैं, उन्हें सचेत होना है उसकी उपस्थिति के प्रति, उसके सान्निध्य में कोई विषाद नहीं रहता. सारी आवश्यकताएं अपने-आप पूर्ण होने लगती हैं. मन के भीतर सुमिरन चलता रहे तो अद्भुत शांति का प्रादुर्भाव होता है, अधर मुस्काते हैं, ऑंखें उसके रूप को देखती हैं. उसकी कविताओं में जो कामनाएं उसने व्यक्त की थीं, वे सारी की सारी सद्गुरु को भेजकर कृष्ण ने पूरी कर दी हैं. अब उसका कर्तव्य यही है कि इस मार्ग पर दृढ़ता से आगे बढ़े, क्योंकि यही ऐसा मार्ग है जहाँ आकर सारे मार्ग मिलते हैं. जो परम सत्य तक उन्हें ले जायेगा, जहाँ जाना और जाने के लिए परिश्रम करना मानव मात्र का कर्त्तव्य है, जहाँ जाने के लिए पाथेय है हृदय में असीम प्रेम, इतना प्रेम जो पोर-पोर से छलकता हो, जो उच्चता के प्रतीक उस ईश्वर के लिए हो !

जब वे धर्म के नियमों का पालन करते हैं तब प्रकृति उनका साथ देती है जब उसके प्रतिकूल चलते हैं तब प्रकृति विपरीत हो जाती है. धर्म क्या है इसका ज्ञान शास्त्र, सत्संग तथा अंतर में स्थित परमात्मा के चिन्तन से मिलता है. यह बिलकुल स्पष्ट है उतना ही जितना हथेली पर रखा आंवले का फल ! कृष्ण गीता में उसी धर्म की चर्चा करते हैं. परमेश्वर असीम हैं, उनका अनुग्रह अनंत है, दया अनंत है, उनकी स्मृति में जितना समय गुजरे वही सार्थक है. जब जीवन का हर क्षण उसके प्रति कृतज्ञता में बीते तो उसकी कृपा का अनुभव भी हर समय होगा, और धीरे-धीरे मन ख़ाली होता जायेगा, खाली मन में ही भक्ति का प्रकाश उदित हो सकता है. ईश्वर ही अपना ज्ञान दे सकते हैं तो पहले उसकी निकटता का अनुभव करना होगा, उसके शरणागत होना होगा. भजन, साधना से मन इतर से खाली होता है और उसकी ओर खिंचता है. एक वही है जो अनंत हृदय को भर सकता है, मन भी निस्सीम है. संसार की नश्वर वस्तुएं उसे तृप्त नहीं कर सकतीं, वह असीम से ही भरा जा सकता है ! आज सुबह उन्हें उठने में देर हुई, नन्हा आज स्कूल नहीं गया, सूर्य देवता बादलों के पीछे छिपे हैं, पूरे भारत में सर्दियां अपनी चरम सीमा पर हैं. यहाँ उत्तर भारत की अपेक्षा मौसम सुहावना है. अज जून उसका लेख व कविताएँ छपने के लिए दे देंगे. नया वर्ष आने में दो हफ्ते भी शेष नहीं, उन्हें एक बार पुनः घर की विशेष सफाई करनी है, नये वर्ष के स्वागत में इतना तो उनका कर्त्तव्य बनता ही है.






Monday, October 20, 2014

एंथोनी रॉबिन्स की किताब


आज उसने सुना, “मन को बहते हुए पानी सा होना चाहिए, जिसमें निरंतरता हो, सत्य हो, अगर मन रुके हुए पानी सा निष्क्रिय हो जाये तो ऊर्जा चुक जाएगी. जहाँ से तन, मन तथा बुद्धि को सत्ता मिलती है, उस परमेश्वर का स्मरण सदा बना रहे, कर्मों में योगबल बना रहे. कर्म बंधन स्वरूप न हों.” सुबह उठी तो कुछ देर के लिए मन दुखाकार वृत्ति से एकाकार हो गया था पर शीघ्र ही सचेत हो गयी. ईश्वर उसके साथ है. आज भी प्रकाशक महोदय से बात हुई, उन्होंने कविताएँ पढ़ीं, सराहा भी, कुछ नये शीर्षक भी उन्होंने सुझाये, जिनमें से चुनकर दो भेजने हैं. आज भी वर्षा की झड़ी लगी हुई है, रात भर बरसने के बाद भी वर्षा थमी नहीं है. कल दोपहर उनके बाएं तरफ के पड़ोसी के यहाँ एक बीहू नृत्य और गायन मंडली आ गयी थी. शोर बहुत था, बिजली भी नहीं थी, वह कुछ पंक्तियाँ ही लिख पायी. आज से दूसरी किताब के लिए कविताएँ टाइप करने का कार्य आरम्भ करना है. एक सखी के लिए विवाह की वर्षगाँठ का कार्ड बनाना है तथा एक कविता भी उसके लिए लिखनी है. आज नन्हे की सोशल की परीक्षा है जो अंतिम है. हिंदी में वह पेपर समय पर पूरा नहीं कर पाया, उसे इन छुट्टियों में हिंदी तथा गणित नियमित पढ़ाना होगा.

कर्म अपने अहम का पोषण न करे, किसी को दुःख देने वाला न हो तो मुक्ति का कारण हो जाता है अथवा कर्म बंधन में डालने वाला होगा. मनसा, वाचा, कर्मणा जो भी हो अंतरात्मा की प्रसन्नता के लिए हो न कि अहम् को संतुष्ट करने के लिए. जीवन उस महान सूत्रधार का प्रतिबिम्ब हो, जीवन से उसका परिचय मिले, जीवन उसका प्रतिबिम्ब हो. ऐसा करने के लिए मन को संयमित करना होगा. कल शाम को Anthony Robinson की पुस्तक में भी इसी प्रकार के विचार पढ़े. यह सब आचरण में उतरे तो यात्रा पूरी हो सकती है. कलाकार का दिल पाया है तो उसकी कीमत भी चुकानी होगी. अपनी संवेदना को तीव्रतर करना होगा और भावनाओं को पुष्ट. चिन्तन करते हुए दर्शन भी तलाशना होगा और यही अध्यात्म के मार्ग पर ले जायेगा, जो भीतर से उपजेगा वही सार्थक होगा और सुंदर भी, वही शाश्वत भी होगा.

‘बीज बोते हुए सजग रहें तो फल अपने आप सही आयेगा, कर्म  करते समय सजग रहें तो उसका फल अपने आप ही सही आएगा. नीम का बीज लगाकर कोई आम की आशा करे तो मूर्ख ही कहायेगा, ऐसे ही कर्म यदि स्वार्थ हेतु, क्रोध भाव से किया गया हो तो परिणाम दुखद ही होगा.’ आज बहुत दिनों बाद उसने गोयनका जी का प्रवचन सुना. आज नन्हे का स्कूल ‘तिनसुकिया बंद’ के कारण बंद है. तिनसुकिया में सोनिया गाँधी चुनावी दौरे पर आ रही हैं. सुबह-सुबह समाचारों में सुना काश्मीर में हिंसा बढ़ गयी है तथा असम में उल्फा ने नेताओं व कार्यकर्ताओं पर आक्रमण तेज कर दिए हैं. इस बेमकसद हिंसा से किसी का भी लाभ होने वाला नहीं है. श्रीलंका में सैकड़ों सैनिक अपनी जान दे रहे हैं, अंतहीन लड़ाई जो जमीन के एक टुकड़े के लिए अपने ही देश के लोगों से लड़ी जा रही है. कल शाम ‘बंदिनी’ फिल्म देखी. नूतन का अभिनय प्रभावशाली था. वह उसे सदा से अच्छी लगती आयी है. आजकल उसका हृदय अलौकिक आनन्द से ओतप्रोत रहता है, उस ईश्वर की स्मृति बनी रहती है. जिसका स्मरण ही इतना शांतिदायक है उसका साक्षात दर्शन या अनुभव कितना मोहक होगा. लेकिन उस स्थिति को पाने के लिए अभी हृदय को विकारों से पूर्णतया मुक्त करना होगा, शुद्ध, निष्पाप, पवित्र हृदय ही उसका अधिकारी है !


आज सुबह छोटी बहन से बात की वह फिर कुछ परेशान थी, निकट के व्यक्ति को समझ पाना या समझा पाना भी कभी-कभी कितना कठिन हो जाता है. उसने प्रार्थना की, ईश्वर उनके हृदयों में प्रेम उत्पन्न करे. मानव तो निमित्त मात्र हैं, रक्षक तो वही है. वही उसे व उसके परिवार को बुद्धियोग देगा. कल शाम उसने बैक डोर पड़ोसिन को पौधों के लिए फोन किया, वह घर पर नहीं थी पर उसका संदेश उस तक पहुंच गया होगा क्योंकि अभी कुछ देर पूर्व ही उसने माली की बेटी से कुछ पौधे भिजवाये हैं, कैसे न कहे कि वह उसकी सुनता है ! आठ बजने को हैं अभी तक स्नान-ध्यान शेष है. सन्त वाणी में इतना रस आता है कि टीवी के सामने से हटने का मन नहीं होता. मन उद्दात विचारों से भर जाता है, ईश्वर के निकट पहुंच जाता है. नन्हे को कल कई बातें बतायीं, वह सुनता तो  है पर महत्व नहीं समझता. वह भी उसकी उम्र में ऐसी रही होगी. पर ईश्वर तब भी उसके साथ था.   

Saturday, August 9, 2014

किचन में रंग-रोगन


इतने दिनों से सन्त वाणी सुनकर उसे इतना तो निश्चय हो गया है कि उन्हें अपने जीवन को आध्यात्मिक बनाना है. बाबाजी ने बताया, अध्यात्म का अर्थ है अपने भीतर उतरना, भीतर का संयोजन, नियोजन व शोधन, आत्म विश्लेषण ! मन को उच्च आदर्शों, उत्थान, और मूल्यों के प्रति समर्पित करना, अंतकरण को पवित्र करना और अपने मूल स्वरूप को पहचानना. ऊपरी मन बहुरूपिया है कभी उत्थान की ओर जाता है कभी पतन की ओर ले जाता है. कभी संयमी हो जाता है कभी विलासी, यह मन मात्र ही चरित्र का गठन नहीं कर सकता, इससे परे एक ऐसा मन भी है जिसे आत्मा कह सकते हैं, जो निर्विकार है, जहाँ उतार-चढ़ाव नहीं हैं. वहीं तक पहुंचना, अभ्यास व वैराग्य के द्वारा वहाँ तक पहुंचना ही अध्यात्म है. इसके लिए जरूरी है उनकी आस्था का केंद्र उच्च हो, मन में श्रद्धा हो. मन इच्छाओं से मुक्त हो, ऐसा मन निर्मल आकाश की तरह है - स्वच्छ, असीम, अनंत ! जीवन यदि प्रेम, भावना, करुणा से युक्त हो तो मन आत्मा में ही रहता है.

आज उसने फिर सुना, प्रेम एक व्यापक तत्व है, समन्दर की तरह विशाल और आकाश की तरह निस्सीम ! मोह संकीर्ण धारा की तरह है, मोह बंधन में डालता है जबकि प्रेम मुक्त करता है. रात से ही वर्षा की झड़ी लगी थी, जून और नन्हा जब गये तो वर्षा हो ही रही थी, अब थमी है, आकाश जो बादलों से ढक गया था फिर स्पष्ट दिखाई दे रहा है, नीला आकाश जो उसके मन का स्वभाव है, स्वच्छ, निर्मल विशाल और मुक्त ! उन्हें अपने मन के उसी स्वभाव में रहना सीखना है, विचारों के बादल उसे आच्छादित कर भी लें तो भी उन्हें उसकी स्मृति को बनाये रखना है प्रतिपल, प्रतिक्षण ! उसका मन जो चारों दिशाओं में बिखरा-बिखरा सा रहता है उसे एकत्रित करना है एक रूप देना है, यानि प्रतिक्षण जागरूक रहना है. यह संसार जैसा उसे दिखाई देता है वास्तव में वैसा है नहीं, प्रतिक्षण बदलते इस संसार को साक्षी भाव से देखते जाना है. दीदी ने बहुत पहले लिखा था, प्रतिक्रिया ही दुःख का कारण है, देर-सबेर सत्य अपने आप ही सम्मुख आ जाता है, सत्य की स्थापना नहीं करनी पडती, वह तो स्वयंभू है.

Sunday , it is quarter to eight in the evening. Today they got up at six in the morning, did all Sunday jobs, went for a walk in the afternoon. Watched tera jadu chal gya on tv, talked to parents and one friend, who came back today from Bombay. Now they are watching ‘Rishtey’ on Zee tv. Nanha is studying in his room, jun is here with her. Rishtey is very very touchy and warm  serial, really they feel it in their heart.


धर्म उसका है जो उस पर चलता है. जो खुद के प्रति ईमानदार है. जो नये-नये कर्म बंधन नहीं बांधता, ह्रदय में जो गांठे पड़ गयी हैं उन्हें खोलता चलता है. जो स्वयं के लिए सुख-सुविधापूर्ण जीवन की अभिलाषा नहीं रखता बल्कि जैसा समय और परिस्थितियां हों स्वयं को उनके अनुसार ढाल लेता है. धर्म तो भीतर की वस्तु है, अंतर्मन की, भीतर क्या-क्या चल रहा है, क्या वे अपने सहज स्वाभाविक रूप में सदा रह पाते हैं या अपने आप से नजरें चुराते हैं, यदि वे स्वयं की नजरों में धार्मिक हैं तभी दुनिया की नजरों में धार्मिक बने रहने का उन्हें अधिकार है.


उन्हें ऊपर की ओर उठना है, नीचे गिरना तो सहज है, पतन के लिए प्रयास नहीं करना पड़ता, पुरुषार्थ तो उसी में है जब मन आत्मा में स्थित रहे. आज उन्हें दिगबोई जाना है, नन्हे के स्कूल में पैरेंट-टीचर मीटिंग है. अगले सोमवार से उसकी परीक्षाएं आरम्भ हो रही हैं. तैयारी ठीक चल रही है, अब हर वक्त उसे उसके साथ नहीं बैठना होता, स्वयं ही याद करता है, स्वयं को ही सुनाता है. उसे उसकी पढ़ाई से कोई शिकायत नहीं है, जून और वह दोनों संतुष्ट हैं कि उनका पुत्र बुद्धिमान है. कल दोपहर को पहली बार उसे कुछ असहज सा महसूस हुआ शरीर में, कल रात ठीक से सो नहीं पायी. आज सुबह से ही फिर अस्वस्थ महसूस कर रही है. आज ही किचन में रंग-रोगन होने की भी बात थी पर रात से लगातार होती वर्षा के कारण शायद वे लोग आज न आयें, यही बेहतर होगा. कल शाम वे एक मित्र-दंपत्ति से मिलने गये. अगले महीने वे फिर अगले इलाज के लिए जा रहे हैं. ईश्वर चाहेंगे तो उसकी सखी की दिली इच्छा कि वह माँ बने जल्दी ही पूरी होगी.

Saturday, August 10, 2013

अंगूठे का दर्द


आज वर्षा के कारण ठंड बढ़ गयी है कल शाम वे एक मित्र की शादी की सालगिरह की पार्टी में गये. उसने वही ड्रेस पहनी थी जो जून लाये थे, सभी ने तारीफ की. खाना अच्छा था, गृहणी ने घर सलीके से सजाया था, शांत स्वभाव की है, और धीरे-धीरे बोलती है, क्या जीवन की इन छोटी-छोटी खुशियों को महसूस करना गलत हो सकता है, कभी-कभी ऐसा भी होता है. जब कोई इन छोटी-छोटी बातों को याद करता है, क्या ये पल उसने व्यर्थ गंवाए ऐसा कहना या मानना ठीक है? ईश्वर ने यह सुंदर संसार और महसूस करने वाला मन दिया है, किसी को पीड़ित न करते हुए बिना किसी राग-द्वेष के सुखी रहना और हो सके तो दूसरों को सुखी करना क्या इतना पर्याप्त नहीं है ? संसार में रहकर उसमें लिप्त हुए बिना सांसारिक कर्त्तव्यों का पालन करते जाना और जो मार्ग में आये उसे अपने हित में साधते जाना..नैतिकता के मूल्यों को समझ कर उन्हें धारण करना और सुख-दुःख दोनों में समभाव बनाये रखना यही पूजा इस जन्म में उसके लिए पर्याप्त है. आध्यात्मिकता का अर्थ अच्छाई पर विश्वास, नैतिकता पर पूर्ण श्रद्धा और संयमित जीवन चर्या ही है.

वही कल का वक्त है, पर मौसम कल जैसा नहीं है, धूप निकल आई है. रातभर की मूसलाधार वर्षा के कारण बढ़ गयी ठंड से राहत दिलाती फरवरी की धूप भली लग रही है. ‘जागरण’ आजकल नहीं देख पा रही है, आजकल प्रवचन की जगह उसमें कोई साक्षात्कार दिखाया जा रहा है. कल उसका टेबल टेनिस का मैच है, उसे यकीन है कोई पुरस्कार तो जीतेगी. अभी कुछ देर पहले एक १८-२० साल का लड़का सफेद धोती पहन कर आया श्राद्ध के लिए पैसे मांग रहा होगा, वह उसकी ड्रेस देखकर ही समझ गयी थी, भीख मांगने का यह बहुत बेहूदा तरीका है.

आज भी पीटीवी पर ‘आधा चाँद’ देखा सुना, पर आज की शायरा में वह बात नहीं थी, सामान्य सी शायरी थी, पर उन्हें अपने पर यकीन था और जिसे खुद पर यकीन होता है वह शायर चाहे अच्छा न हो इन्सान जरुर अच्छा हो सकता है. वह जापानी सिखा चुकी हैं और आज भी सर्विस करती हैं, फिर भी इतना वक्त निकल लेती हैं की मुशायरों में शिरकत कर सकें और इधर वह है कि अपने इस छोटे से घर को ही दुनिया मानकर खुश रहती है. शायद इस जन्म में यही उसकी दुनिया है अपने चंद टूटे-फूटे अश्यार के साथ.

कल मैच में उसने एक मैच जीता पर दो हारे, रात भर इसी के सपने आते रहे. कई चीजों का असर जानबूझ कर न लिया जाये तो भी गहरा पड़ता है, सुबह उठते ही जागरण में ‘श्री सिंघल’ के विचार सुने, क्वांटम थ्योरी के अनुसार शरीर और आत्मा के संबंध को समझाया फिर प्रकृति और पुरुष अर्थात ईश्वर के सम्बन्ध को. प्रकृति में कुछ भी कारण रहित नहीं होता पर ईश्वर के विधान में कारण खोजना व्यर्थ है. इसी तरह सुख, शांति, प्रेम और इसी तरह की भावनाएं देने से बढ़ती हैं तथा दुःख, अपमान और इसी तरह की भावनाएं लेने से. प्रश्नकर्ता ने उनसे पूछा था, सदा सुख का अनुभव हो तथा दुःख से मुक्ति, ऐसा क्या सम्भव है ? सांसारिक वस्तुओं का संग्रह करने से वे बढ़ती हैं पर आत्मिक वस्तुओं को बांटने से वे बढ़ती हैं, इस विरोधाभास को समझ कर उसे  ग्रहण कर लेने पर दुःख की प्रतीति नहीं होगी और सुख का अभाव नहीं होगा. आज गीता के चौदहवें अध्याय में सत्व, रज और तम गुणों के बारे में पढ़ा, कल शाम को तम गुण का असर ज्यादा हो गया था जो जून के मन को अपनी बेवजह की तकरार से चोट पहुंचाई, वह किस तरह चुप हो गये थे जैसे कोई फूल मुरझा गया हो पर आज वह जरुर खुश होंगे क्योंकि उनकी पसंद के भोजन ने उनके दिल को पहले सा भर दिया होगा. वह उसके दिल की बातें खूब समझते हैं बस कहने का अंदाज अलग है, उसे भी तो इतने सालों में समझ जाना चाहिए कि ही इज मैन ऑफ़ एक्शन नोट वर्ड्स, उसने मन ही मन उनसे क्षमा मांगी. आज उसने छह पत्र लिखे और होली के लिए सफाई भी शुरू की. नन्हा स्कूल से आ गया है और उसके toenail में बहुत दर्द है फिर भी फोन करके अपने मित्र को बैडमिन्टन खेलने के लिए बुलाया है.