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Tuesday, June 15, 2021

पुलवामा का दर्द


उस दिन “शांति धाम” से लौटकर भी वहाँ की स्मृति दिन भर मन में बनी रही. वहाँ की मैनेजर एक महिला थीं, उनके पति को मधुमेह की बीमारी है, शरीर पर पूरा नियंत्रण नहीं है फिर भी काम में उनकी सहायता करते हैं. उन्होंने ही आश्रम दिखाया. एकमात्र पुत्र दुर्घटना में चल बसा, अभी कुछ समय पहले ही वे ये लोग यहाँ आये हैं, और काम समझ रहे हैं, ऐसा कहा. पुत्र होते हुए भी कुछ लोग अकेले रहने को विवश हैं शायद यही सोचकर वे अपने मन को समझा लेते होंगे। दोपहर को मोदीजी का कोकराझार में दिया भाषण सुना, जिसको सुनने के लिए चार लाख लोग आए थे, सभी बोडो भारत सरकार के साथ हुए समझौते से प्रसन्न थे. पूरे शहर में मानो उत्सव का माहौल बना हुआ था. बीती रात असम के इस शहर में लाखों दीये भी जलाए गये. मोदीजी ने कहा कि सरकार ने बोडो की समस्याओं को समझा और उनका हल निकाला. बोडो आतंकवादी संगठनों ने भी शांति का मार्ग अपना लिया है. उन्होंने कहा, सभी को बैर छोड़ना होगा, हिंसा से कभी कुछ हासिल नहीं हुआ है. उसे असम में निवास के समय बोडो आंदोलन के कारण हुई हिंसा और आए दिन के असम बंद के दिन याद हो आए। कोकराझार का नाम ही तब हिंसा का पर्याय बन गया था। आज उसका मन भी उन लोगों की ख़ुशी में शामिल था। कल दिल्ली में चुनाव है, संभवतः इस बार बीजेपी जीतेगी। कल वे आर्ट ऑफ़ लिविंग के अनुसंधान विभाग में गये, जून को बुलाया था सेवा काम के सिलसिले में। रास्ते में श्री श्री स्कूल भी देखा। बहुत सुंदर स्थान है। परसों इस सोसाइटी में स्थित एक नया पार्क देखा, वह मुख्य सड़क से काफ़ी अलग है। आज घर के सामने की सड़क बनना आरम्भ हुई है।आज आश्रम में स्थित एम्पिथिएटेर में सत्संग हुआ। गुरूजी ने पहले ध्यान कराया फिर प्रश्नों के उत्तर दिए। उन्होंने कन्नड़ में भी बोला, अब काफ़ी समझ में आने लगा है, संस्कृत के कई शब्द इसमें भी हैं। भीड़ बहुत थी। एक व्यक्ति जो मैक्सिको से आया था उसकी श्रद्धा अपार थी, उसने थैंक्स कहा और उसकी आवाज़ डबडबा गयी हो जैसे आंसुओं में। एक लड़की ने मधुर गीत गाया। छोटी बहन ने उसके और अपने एक पुराने फ़ोटो को देखकर एक पेंटिंग बना दी है, वे दिगबोई के गोल्फ़ के मैदान में थे, जब यह चित्र लिया गया था। यूएई में उसके घर को एओएल का एक सेंटर बना दिया है। वह बहुत खुश थी, सेवा से जो ख़ुशी और शक्ति मिलती है उसकी तुलना किसी अन्य ख़ुशी से नहीं की जा सकती।


कल सुबह सवा नौ बजे वे घर से निकले और रात को नौ बजे वापस आए। जून का स्वास्थ्य परीक्षण हो गया, सब सामान्य है। वह लाओत्से की पुस्तक पढ़ती रही, कुछ देर एक फ़िल्म देखती रही मोबाइल पर प्रियंका चोपड़ा की। नन्हा व सोनू एक मित्र के विवाह के संगीत में गये हैं, उन्हें वहाँ छोड़ते हुए वे घर आए। आज सुबह वे गाँव के पोस्ट ऑफ़िस गये जो किसी के घर में है, एक कमरे का डाक खाना, जिसकी ब्रांच पोस्ट मास्टर एक महिला हैं, वह अपने पति को काम सिखा रही थीं, ताकि ज़रूरत पड़ने पर वह भी कुछ कर सकें।
सुबह से बड़ी भाभी का स्मरण हो रहा है। पाँच वर्ष हो गये उन्हें जग से विदा लिए हुए, उससे एक या दो वर्ष ही बड़ी रही होंगी उमर में। बेहद ख़ुशदिल और जीवंत स्वभाव वाली पर उन्हें हृदय का रोग था। भाई ने उनकी तस्वीरों से एक सुंदर वीडियो बनाया है। उसे एओएल के कोर्सेस के लिए बनी वेब साइट्स का हिंदी अनुवाद करना था, तब पता चला कितने सारे कोर्स होते हैं आश्रम में। गुरूजी कितना काम करते हैं, शायद सत्रह-अठारह घंटे तो करते ही होंगे। कल संभवतः वे ‘शिकारा’ देखने जाएँ, अगले हफ़्ते एक मित्र के पुत्र के विवाह में सम्मिलित होने जाना है। ‘आप’ को दिल्ली में बासठ सीटें मिली हैं और बीजेपी को मात्र आठ। केजरीवाल ने काफ़ी काम किया है दिल्ली में और बिजली पानी मुफ़्त, महिलाओं के लिए बस व मेट्रो में टिकट भी नहीं लगती।जनता तो तत्काल लाभ देखती है।


आज पुलवामा हमले को पूरा एक वर्ष हो गया। पिछले वर्ष आज ही के दिन जम्मू-श्रीनगर राष्ट्रीय राजमार्ग पर सी आर पी एफ के क़ाफ़िले पर विस्फोटक सामग्री से भरे वाहन से टकराकर आत्मघाती हमला किया गया। इस हमले की ज़िम्मेदारी पाकिस्तानी आतंकवादी संगठन जैशे मोहम्मद ने ली थी।उसे याद है टीवी पर सैनिकों के शव की पंक्तियाँ थीं, सारा देश आक्रोश से भर गया था। आज भी एक कविता लिखी, दोपहर को रिकार्ड की फिर पोस्ट भी की। शाम को आश्रम में गुरूजी का एक रिकॉर्डेड साक्षात्कार देखा, बच्चों ने सुंदर गीत गाए। आश्रम में अंतर्राष्ट्रीय महिला सम्मेलन आरंभ हो गया है। दोपहर को मृदुला सिंह जी को सुना, अन्य कई वक्ता भी थीं। पैशन, डिस्पैशन व कम्पैशन पर उन्हें बोलना था।


आज दोपहर जून के परिचित दक्षिण भारतीय एक पुराने सहकर्मी मिलने आए, पूरे तेईस वर्षों के बाद वे मिले। उनके लिए भोजन बनाने में नन्हे और सोनू ने बहुत मदद की, वे लोग कल आ गये थे, शाम को जून सभी को अपने बड़े भांजे के यहाँ ले गये, काफ़ी दूर है उसका घर, दो घंटे की ड्राइव के बाद वहाँ पहुँचे, इतने समय में तो कोई दूसरे शहर ही जा सकता है,। उसे लेकर सब ‘उटा’ गये विशुद्ध स्थानीय भोजन के लिए प्रसिद्ध है यह जगह। उटा का अर्थ कन्नड़ भाषा में भोजन होता है। पिताजी से पता चला, छोटा भाई परिवार के साथ यूरोप जा रहा है अगले महीने, उस दौरान बड़े भाई उनके पास आकर रहेंगे।

Wednesday, April 21, 2021

झींके का खेत

 

कल रात्रि वे वापस लौट आये. घर पहुंचे तो कुछ ही देर में नन्हा व सोनू भी आ गये, वे रात्रि भोजन बनवा कर लाये थे. सुबह नींद थोड़ा देर से खुली, नूना अकेले ही टहलने गयी. सोनू उठ गयी थी जब वह लौटी, नन्हे ने सुबह का नाश्ता ऑर्डर कर दिया था.  दोपहर को बड़े भैया अपनी बिटिया के साथ आये, जो यहीं रहकर जॉब करती है, सबने साथ में भोजन किया. नन्हा और सोनू  ग्वालियर से कुछ उपहार भी लाये हैं, साड़ी, सूट, बेड कवर, गजक और उबली हुई मूंगफली. बड़े भाई को उन्होंने शादी में मिला पर्स दिया, भाई उनके लिए गणेश-लक्ष्मी की मूर्तियां लाये हैं. जीवन इसी लेन-देन  का नाम है. दीदी छोटी बहन के पास विदेश जा रही हैं. वह अपने नए घर में शिफ्ट हो गयी है. उसने बताया अगले हफ्ते बड़ी बिटिया अपने पापा  के साथ भारत आ रही है, वे वैष्णव देवी की यात्रा पर भी जायेंगे.  छोटा भाई  अगले हफ्ते उनके पास आ रहा है, उसे पुट्टपर्थी में ड्यूटी मिली है, एक रात यहाँ रहकर जायेगा.  जीवन इसी तरह आने-जाने, मिलने-जुलने का भी नाम है. मौसम आज ठंडा है, पंखा चलाने की जरूरत नहीं है. दोनों नैनी समय पर आ गयीं, दूध वाला, पेपर वाला, फूलवाली भी, आज तो लॉन की सफाई व घास की कटिंग भी हुई, लॉन अच्छा लग रहा है. रात की रानी में फूल खिलने लगे हैं. शाम को वे टहलने गए तो देखा, क्रिसमस की ख़ुशी में लोगों ने यहां बिजली की झालरें लगा दी हैं. 


रात्रि के नौ बजे हैं, उसने दिन के अंतिम कार्य यानि लिखने के लिए कलम उठायी है. आज एक सप्ताह बाद योग कक्षा में बहुत अच्छा लगा. नए आसन किये शरीर को अपनी पूरी क्षमता का प्रयोग करने का अवसर मिला.  सुबह नाश्ते के वे बाद कुछ देर टहलने गए, शायद धूप के कारण सिर में थोड़ा सा दर्द हो गया. असम में स्थिति अब शांति की ओर बढ़ रही है. दिल्ली तथा देश के कुछ अन्य भागों से हिंसा की खबरें आयी हैं. यह सब कुछ अज्ञान का परिणाम है, नेता अपना लाभ देखते हैं और जनता को मोहरा बनाते हैं. हालात जिस तरह बिगड़ रहे हैं इसका परिणाम किसी के लिए भी अच्छा नहीं होगा. धर्म के नाम पर भेदभाव से कितने जीवन प्रभावित होते हैं, पर लोग जानते हुए भी यह बात समझना नहीं चाहते. तमिलनाडु की पूर्व मुख्यमंत्री जयललिता के जीवन पर आधारित वेब सीरीज ‘क्वीन’ अच्छी  लग रही है, चार एपिसोड देख लिए हैं. आज पिता जी से बात की. उन्होंने बताया, जो किताब वे पढ़ रहे हैं, उसमें लिखा है, मनुष्य को शून्य में स्थित रहना चाहिए अर्थात पूर्ण शांति में. बाहरी शांति तो उन्हें सर्वथा उपलब्ध है पर भीतर की शांति भी चाहिए, मन की शांति, यानि विचारों से पूर्ण मुक्ति ! 


आज सुबह टहलते हुए वे गांव की तरफ गए एक खेत में झींका (तरोई) लगी थी, एक किसान फसल उतार  रहा था, बेचने को भी तैयार था, वे खरीद कर लाये. छत पर सोलर पैनल लग गए हैं. अब उनके घर इस्तेमाल होने वाली बिजली इन्हीं के द्वारा आएगी, जो बिजली बच जाएगी उसके बदले विद्युत विभाग से पैसे वापस मिल जायेंगे. आज असमिया सखी से बात हुई, वे लोग भी बंगलूरू में रहते हैं. उसने बुलाया है, पर उनका घर काफी दूर है, कार से जाने में दो घन्टे लगेंगे, असम में उनके घर जाने में दो मिनट लगते थे. उन्होंने सोचा है, शुक्रवार की सुबह  जायेंगे और एक रात रुककर शनि को नाश्ते के बाद लौट आएंगे. आज मौसम कल की अपेक्षा गर्म है, दिसम्बर में भी गर्मी हो सकती है, इसका अनुभव जीवन में पहली बार हो रहा है. दोपहर वाली नैनी आज अपने पुत्र को लेकर आयी, देखने में बुद्धिमान लग रहा था. आज कई दिनों बाद ब्लॉग पर लिखना आरम्भ किया, कुछ ब्लॉग्स पढ़े. जीवन को मुड़कर देखें तो अपनी ही बातों पर कितनी हँसी आती है, उन बातों पर भी जिनपर कभी हजार आँसू बहाये थे. शाम को नन्हे का फोन आया, ‘डिनर पर आ रहा है, उन्हें लगा, जैसे उसकी पसन्द का खाना ही बना था और उसे खबर लग गयी किसी तरह, साढ़े आठ बजे आया, दो घन्टे रहा. जीवन एक शांत धारा की तरह बहता जा रहा है, अब कोई दौड़ नहीं रही. ज्ञान, क्रिया और इच्छा शक्ति जो भीतर है, अपने आप में स्थिर हो गयी है. हजारों टन भोजन इस देह में जा चुका है, हजारों बोल यह जिव्हा बोल चुकी है, हजारों विचार यह मन सोच चुका है, हजारों गन्ध यह नासापुट ले चुके हैं. अब इस जगत में कुछ देखना, जानना, पाना शेष नहीं रह गया है. जीवन जैसा है वैसा ही श्रेष्ठ है. 


आज वे आश्रम गए थे, दोनों ननदों के लिए उपहार लिए। वैद्य से नाड़ी परीक्षण करवाया। आयुर्वैदिक दवा ली एक माह की। जून के ममेरे भाई की बिटिया का ब्याह है, उसके लिए भगवद्गीता का एक सुंदर प्रति ली और घर के लिए आटे के बिस्किट आदि। गुरुजी की उपनिषद पर टीका और आर्ट ऑफ लिविंग के हिंदी भजनों की एक किताब भी। एक घंटा वे ध्यान के लिए विशालाक्षी मंटप में बैठे। ध्यान करवाया गया पर रिकार्डिंग में गुरु जी की आवाज से अधिक लोगों के खाँसने की आवाजें आ रही थीं। भजन आरंभ हुए तो लोग नाचने और झूमने लगे। रात्रि भोजन भी वहीं कैफे में किया। रागी दोसा खाया। कल दोपहर फिर आना है, समूह में सुदर्शन क्रिया में भाग लेने के लिए। दीदी का फोन आया, दो मिनट से ज्यादा बात नहीं की। जीवन इतना सरल है जिसे लोग जटिल बना लेते हैं। 


आज मोबाइल पर गुरूजी का सत्संग देखा, सुना। वह बहुत दिनों के बाद आश्रम आए हैं। परमात्मा और उनमें जरा भी दूरी नहीं है, वह वहीं है फिर भी वे उससे विरह का अनुभव करते हैं ! कैसी अजब कहानी है यह .... । मौसम आज ठंडा है, शाम को स्वेटर पहनकर वे पड़ोसी के साथ सोसाइटी के पिछले गेट से बाहर निकल कर गाँव की तरफ गए. सँकरी सड़क से गुजरते समय सूर्यास्त के सुंदर दृश्य दिखे, खेतों से कुछ दूर आगे जाकर एक नयी कालोनी दिखी, जिसमें प्लॉट्स काट दिए गए हैं, सड़कें भी बन गयी हैं पर घर बनाने का काम अभी शुरू नहीं हुआ है.  शहर अपनी सीमाएं बढ़ा रहे हैं और खेत बिकते जा रहे हैं. कल वैद्य ने रात्रि भोजन हल्का लेने को कहा था सो आज खिचड़ी बनायी उसने.  और अब उस पुरानी डायरी के पन्नों से कुछ बात।



स्थूल जगत में सेवा कार्य का रूप धारण करती है, आंतरिक सृष्टि में सहानुभूति का स्वरूप लेती यही और मानसिक सृष्टि में बोध रूप में दर्शन देती है। 


तुम्हारा हृदय तुम्हारे सेवा कार्यों की जो कीमत आंकता है, उसके मुकाबले उन्हीं कार्यों की जगत द्वारा ठहराई कीमत कुछ नहीं के बराबर है. 


सच्चे मनन  के फलस्वरूप सेवा करने की शक्ति अधिकाधिक बढ़ती जाती है और फिर अपनी उन्नति के विचार बहुत कम सताते हैं. 


आतुरता से और स्नेह से कोई भी नन्हा सा सेवा का काम सबेरे उठकर करना उस दिन के तुम्हारे सुख के भंडार को खुला रखने का सर्वोत्तम उपाय है. 


मनुष्य जिस हद तक अपने स्वार्थ का कम चिंतन करता है, उस हद तक वह अवश्य ही अपनी आत्मोन्नति की ओर ध्यान लगा सकता है.सेवा के प्रत्येक छोटे से छोटे कार्य का बदला सेवा की बढ़ती हुई शक्ति के रूप में सेवक को मिलता है. 


उसे आश्चर्य होता है विद्यार्थी काल में उसका मन ऐसे विचारों के प्रति आकर्षित होता था, युवा मन कितना आदर्शवादी होता है. कई वर्षों बाद इन आदर्शों पर चलने का मौका भी मिला, जीवन में कोई जो चाहता है अवश्य ही पा लेता है , लेकिन अभी भी बहुत कुछ किया जा सकता है. 


Wednesday, June 26, 2019

सिस्टर निवेदिता



ठंड बढ़ गयी है. आज पहली बार इन सर्दियों में धूप में बैठकर लिख रही है. बाहर निकली तो एक बगुला बैठा था, हल्की सी आहट से ही उड़ गया, कितना संवेदनशील रहा होगा. सुबह उठे तो कोहरा बहुत घना था, तापमान बारह डिग्री था. लेकिन उसी ठंड में वे टहलने गये, आकाश पर तारे थे और सब कुछ शांत था. आज जून को लंच पर घर नहीं आना है, इसलिए किचन बंद है. कल शाम का भोजन भी फ्रिज में पड़ा है. जब भूख ज्यादा सताएगी तभी कुछ खाएगी. पिछले दिनों स्वप्न में खाने-पीने की वस्तुएं देखीं. मन भोजन के प्रति कितना आसक्त रहता है, जब तक देह भाव बना हुआ है भोजन के बिना वे रह सकते हैं, यह विचार भी नहीं आ सकता. वे भूख के बिना भी खाते हैं, केवल स्वाद के लिए भी खाते हैं. चाय से अम्लता होती है, इसका अनुभव होने के बाद भी उसके प्रति मोह बना ही हुआ है. कितने ही साधु-संत ऐसे हुए हैं जिन्होंने क्षुधा पर विजय पायी है. मन निर्विकल्प स्थिति में रहे इसका निर्णय भी अडिग नहीं रहता. पुरानी स्मृतियाँ कब मन को घेर लेती हैं, ज्ञात ही नहीं होता, स्मरण आते ही मन वर्तमान में आ जाता है पर इतनी देर ऊर्जा का व्यर्थ ही अपव्यय होता है. नैनी के बच्चे आंवला चुनने आए हैं, जो घास पर गिरे ही रहते हैं. कल शाम की मीटिंग ठीक थी, अध्यक्षा का भाषण हमेशा की तरह बहुत लम्बा था. अगले हफ्ते वह उन तीन महिलाओं से मिलेगी जिनका विदाई समारोह होना है, सभी के लिए कुछ लिखेगी. मृणाल ज्योति की पत्रिका पढ़ी, और वार्षिक रिपोर्ट भी, आज मीटिंग है, अब शायद कुछ ही समय और वह उनके साथ काम कर पाएगी. सुबह एक सखी को व्हाट्स एप पर संदेश भेजा, उसने कोई इमोजी भेजा जो उसके फोन पर खुल ही नहीं पाया. मन में विचार उठा पता नहीं क्या भेजा है.यही तो माया है, महामाया की उपासना करने से माया के पार जाया जा सकता है.

कुछ देर पहले ठंड थी, कोहरा था और अब सूरज निकल आया है, धूप कितनी भली लग रही है. आज हवा भी चल रही है. सुबह पूजा के बाद जल डालने आई तो सूर्य देव बादलों के पीछे छिपे थे, देखते ही देखते प्रकाश झलकने लगा, एक ही चेतन सत्ता से यह सारा जगत बना है, गुरूजी का यह वाक्य स्मरण हो आया. उनके भीतर जो तत्व है वही सूरज की गहराई में में है, उस तक संदेश पहुँच जाता होगा तत्क्षण ! आज शनिवार है, कल रात सोने में कुछ देर हुई, जून के बहुत पुराने मित्र भोजन के लिए आए थे, लग रहा था पहले के दिन लौट आए हैं. इधर-उधर की बातें भी ज्यादा हुईं. अख़बारों की सुर्खियाँ, राजनीति, कम्पनी की नई नीतियाँ, देश का वातावरण आजकल मिश्रित है.. देश जैसे बंट रहा है, गणतन्त्र में ऐसा होता ही है, सबको अपनी बात कहने का अधिकार है आदि आदि.  क्लब से किसी कार्यक्रम में गाने की आवाजें भी आ रही थीं. सुबह उठने में कुछ देर हुई. आज नये वर्ष का छठा दिन है. पिताजी से बात हुई. उन्होंने अपनी उम्र के कारण होने वाली तकलीफों को ख़ुशी-ख़ुशी स्वीकार कर लेने की बात कही. आत्मा का अल्प मात्र भी अनुभव हुए बिना कोई ऐसा कह नहीं सकता, अपने भीतर शक्ति और शांति के उस अमृत स्तम्भ को पाकर ही कोई निर्भार हो सकता है.

अब दोपहर हो गयी है. धूप में वे अब भी बैठे हैं. लॉन के कोने में, शायद एक दो घंटे और रहेगी धूप. आज लंच में कर्ड-राईस बनाये थे. शाम के लिए बगीचे से मेथी व हरे प्याज के पत्ते तोड़े हैं मकई के आटे में मिलाने के लिए. इस माह गुरूजी के जीवन पर लिखी उनकी छोटे बहन भानु दीदी की पुस्तक प्रकाशित हो रही है. जून ने आज ही आर्डर कर दी है. इंटरनेट पर बनी मित्र वाणी जी की कविता पर अपने विचार अभी तक नहीं लिखे हैं, उन्हें इंतजार होगा, समय कितनी शीघ्रता से गुजर जाता है, वे वहीं खड़े रह जाते हैं. योग सीखने आने वाली एक सखी ने सिस्टर निवेदिता द्वारा लिखी एक पुस्तक उपहार स्वरूप दी है. स्वामी विवेकानन्द के भीतर जगत के कल्याण की कितनी तीव्र पिपासा उनके गुरू ने जगाई थी. जैसे उनके गुरूजी सेवा के लिए प्रेरित करते हैं. उनके कर्म सहज हों, निस्वार्थ हों और कतृत्व अभिमान न हो. मनसा सेवा तो हर क्षण की जा सकती है. जब भी उनके मन अस्तित्त्व के साथ एक हो जाते हैं, वे प्रेम ही तो बहने देते हैं स्वयं के माध्यम से !

Tuesday, February 12, 2019

काले और हरे अंगूर



सुबह के साढ़े नौ बजे हैं. दिल्ली आये दूसरा दिन है. कल दोपहर साढ़े ग्यारह वे घर से निकले, फ्लाईट समय पर थी. जून रास्ते में ही उतर गये यानि गोहाटी में. वह शाम को दिल्ली पहुंची, बड़े भाई लेने आये थे. कार पार्क जोन में वह मिले, उन्हें उसकी वजह से कार छोड़कर आना पड़ा, थोड़ी सी परेशानी हुई पर जल्दी ही वे घर पहुंच गये. रात्रि भोजन मंझली भाभी के यहाँ किया, वापस आते-आते देर हो गयी थी. भतीजी ने अपने विवाह की तस्वीरें दिखाईं एक वीडियो भी. भाई सोसाइटी के दफ्तर में काम करते हैं, उन्होंने बताया लोगों के बिल बनाने के लिए उन्होंने एक तकनीक बनाई है, जिसमें वर्ड में बनाये फॉर्म में एक्सेल से डाटा अपने आप ट्रान्सफर हो जाता है. हो सकता है यह विधि मृणाल ज्योति में वे काम में ला सकें. रात को सांख्य शास्त्र सुना और सुबह ओशो को. ज्ञान के बिना मन तूफान में डोलती नैया की तरह डांवाडोल ही रहता है. ज्ञान जैसे एक लंगर का काम करता है जिसके सहारे नाव स्थिर हो जाती है. सुबह वे दूर तक घूमने भी गये, तापमान १०-१२ डिग्री रहा होगा, लेकिन अनेक लोग पार्कों में निकले हुए थे. वापस आकर चाय पी, भीगे हुए बादाम, खजूर और बिस्किट के साथ. कुछ देर धूप में बैठकर इधर-उधर की बातें कीं तत्पश्चात नहाधोकर नाश्ता. भाई द्वारा बनाया अंकुरित मूंग व मोठ का नाश्ता, फिर वह सब्जी लेने नीचे चले गये. सफाई करने व खाना बनाने दो सहायिकाएं अपना काम कर रही थीं. सामने बालकनी में धूप आ रही थी, उसने सोचा कुछ देर धूप में बैठने का आनंद लिया जा सकता है.

धूप तेज है, ऊपर छत पर धूप में बैठकर उन्होंने फलों का आनंद लिया. घर में गमले में उगा अमरूद, पपीता, काले व हरे अंगूर तथा केला. सभी फल मीठे व रसीले. आज सुबह वह दिल्ली से पिताजी से मिलने आ गयी है. ट्रेन समय पर थी, छोटा भाई डिब्बे में ही आ गया था. सामान लेकर प्लेटफार्म से सीढ़ी चढकर वे बाहर निकले. अकेले आने पर भाइयों का सहयोग मिलता है निस्वार्थ और स्नेह भरा. स्टेशन से घर आते समय भाई ने मिठाई व फल खरीदे.

रात्रि के दस बजे हैं. भाई-भाभी एक विवाह समारोह में शामिल होने गये हैं, पिताजी अपने कमरे में सोने चले गये हैं. घर में शांति है आज, कल रात पिताजी का ट्रांजिस्टर भी चल रहा था और नीचे तेज आवाज में टीवी. शाम को पुरानी तस्वीरें देखीं, उससे पूर्व नाद-ब्रह्म ध्यान किया. दोपहर को चचेरा भाई आया था, अकेला रहता है और अपना ध्यान जरा भी नहीं रखता. पैरों-हाथों पर मैल जमा था, उसे गर्म पानी व साबुन दिया. पिताजी ने कहा, सेवा का मौका दिया है उसने, करनी चाहिए. उसे हर बार यानि हर महीने आने के लिए कहा. सुबह पिताजी के साथ टहलने गयी बॉस थोड़ी सी दूर. उनमें जरा भी आलस्य नहीं है. हर समय काम करने को तत्पर हैं, चलने में दिक्कत होती है पर खुद के लिए बॉर्नविटा लेने खुद जाते हैं. कल भी उनके साथ टहलने जायेगी. उसके बाद छोटी भाभी के साथ बाजार गयी. दो छोटी लडकियों के लिए उपहार खरीदने थे. भाभी के माँ-पिता के विवाह की स्वर्ण जयंती पर लिखी कविता का प्रिंट लिया. जून ने इसमें दूर से ही सहायता की. दोपहर को ओशो की पुस्तक पढ़ी. छोटा भाई ओशो के प्रवचन सुनता है और बैठे-बैठे कहीं खो जाता है, वह भाव समाधि में रहता है, सदा होश्पूर्ण विश्राम की स्थिति में !  

Wednesday, October 25, 2017

मन का मौसम


कल रात्रि वे सोने गये ही थे कि जून के एक सहकर्मी का फोन आया. कहा, माँ की तबियत ठीक नहीं है, एम्बुलेंस बुला दें. जून ने फोन किया अस्पताल में फिर उनके घर जाने के लिए कार निकाली. उसके कहने पर कि साथ ले चलें, उन्होंने मना किया, पर जाने के कुछ देर बाद ही उसे बुलाने के लिए फोन आया. बुजुर्ग आंटी ने दस-पन्द्रह मिनट के कष्ट के बाद ही प्राण त्याग दिए थे. वह पैदल ही चलकर पाँच-सात मिनट के बाद ही वहाँ पहुँच गयी. उनकी सेविका, एक परिचित डाक्टर तथा वे दंपति वहाँ थे. ग्यारह बजे तक वे दोनों भी रुके, उसी मध्य कुछ और लोग भी आये. कई फोन भी आये. गृहणी बहुत परेशान थी. वह मृतक के चेहरे को देखते हुए वहाँ बैठी रही. रात को स्वप्न देखा जो कितना अजीब था. एक कुंड में अनेक मृत वृद्ध व्यक्ति एक के ऊपर एक पड़े हैं, पास ही तीन बूढ़े जिनमें एक महिला है, कुछ काम कर रहे हैं. कितना वीभत्स था वह दृश्य, कितना विचित्र, उनके अंग बड़े-बड़े थे. फिर नींद खुली. पंछियों की आवाजें भी रात्रि को स्पष्ट सुनीं, वे वास्तविक थीं या .....कितना रहस्यमय है यह संसार.. और फिर तितलियों को उड़ते देखा. तितलियाँ आत्माएं हैं जो इधर-उधर उड़ रही हैं. इस समय शाम के सवा सात बजे हैं. वे अभी-अभी उस घर से आ रहे हैं. सुबह साढ़े छह बजे वहाँ गये थे. दस बजे के लगभग पंडित जी आये और मृत देह को दाह संस्कार के लिए ले जाया गया. वह वहीं रुकी रही, घर आकर नहा-धोकर दुबारा गयी. जून श्मशान से एक बजे लौटे तब वे घर आये, भोजन नैनी ने बना दिया था. भिजवाया व खाया. जून दफ्तर चले गये, उसने आधा घंटा विश्राम किया, एक स्वप्न पुनः देखा. इस परिवार से उनका आत्मीय संबंध है. आंटी के साथ भी प्रेम का रिश्ता था. इसी से जुड़ा स्वप्न था. अहसास बहुत तीव्र था, देह में उसे महसूस किया और नींद खुल गयी. एक कर्म बंधन छूट गया.

रात्रि के साढ़े आठ बजे हैं. जून क्लब गये हैं, एक प्रेजेंटेशन है. अभी-अभी बड़े भाई से बात हुई, वह अपने लिए रोटी बना रहे थे, सब्जी सुबह की बनी हुई रखी थी. कितना कठिन होगा उनके लिए भाभी के बिना रहना. समय के साथ शायद सब ठीक हो जायेगा, ईश्वर उन्हें शक्ति देगा. मंझली भाभी से बात की, वह उनका ध्यान रखती है, अभी तो भाई भी है. छोटा भाई भी रात को उनके घर ही सोयेगा. सभी के सहयोग से वे जीने का सम्बल जुटा ही लेंगे, ख़ुशी-ख़ुशी जीने का, एक महीने बाद उनकी बिटिया भी आ जायेगी. आज सुबह बादल बने थे पर वर्षा उनके प्रातः भ्रमण से लौटकर आने के बाद ही आरम्भ हुई, जो बाद में दिन भर होती रही. आज सुबह भीतर से आवाज आई कि प्रतिपल सजग रहो, परमात्मा सजग है, हर पल सजग..उसकी सजगता शाम को खो गयी थी पल भर के लिए..जून उसका बहुत ख्याल रखते हैं, उन्होंने उसे कितनी सहजता से लिया. व्यर्थ की बातचीत उनकी ऊर्जा को  नष्ट ही करती है. सुबह ब्लॉग पर लिखा. दोपहर को स्कूल की पत्रिका व दिल्ली स्थित क्लब की पत्रिका के लिए लेख व कविता भेजी. अभी लेडीज क्लब की वार्षिक प्रतियोगिता के लिए के लिए लेख व कहानी लिखने हैं. शाम को देवदत्त पटनायक की पुस्तक ‘पशु’ पढ़ी, उसके बाद उन्हीं मित्र के यहाँ गये. उनकी पुत्री भी आई है जिसके विवाह की प्रथम सालगिरह है आज.   

कल सुबह से वर्षा हो रही है, जो अभी तक नहीं थमी. परसों दोपहर या रात को, अब कुछ याद नहीं. ओशो को देखा. उनकी श्वेत दाढ़ी है, एक तख्त पर लेटे हैं, कुछ जन सामने बैठे हैं, वह भी है और उनसे एक सवाल पूछती है. परिवार साधना में साधक है या बाधक है. वह क्या कहते हैं, ठीक से नहीं सुन पायी पर भाव था साधक है. उससे पहले वे बातें कर रहे थे, अनोखा स्वप्न था. कल लिख ही नहीं पायी, आजकल उसकी नींद गहरी हो गयी है. कल दोपहर को सोयी तो समय व स्थान का कोई ज्ञान ही नहीं रहा. गहरी नींद भी एक तरह की समाधि होती है. अभी बड़ी ननद का फोन आया, मंझली भांजी ने कल से जॉब पर जाना शुरू किया है. वह बैंक के लिए परीक्षा भी देना चाहती है. अब उसके भीतर कुछ करने का जज्बा जगा है. जून ने कहा उनके मन का मौसम भी सदा एक सा रहता है आजकल, उसे कभी लगता है सेवा का कोई विशेष काम वह नहीं करती, फिर भी संतोष होता है, लेखन का कार्य भी सेवा का ही माना जा सकता है. नेट पर कितना कुछ पढ़ने को, जानने को मिलता है. आज श्री श्री का भाषण सुना जो उन्होंने यूरोपियन पार्लियामेंट में दिया था, ‘द योगा वे’ अभी-अभी एक ज्योति बि९न्दु डायरी पर दिखाई दिया, परमात्मा जैसे आश्वस्त करने आया हो. अस्तित्त्व को उनकी फ़िक्र है, वे उसके ही भाग हैं. वे उससे जुड़े रहकर ही खुश हैं !   

Thursday, February 25, 2016

शांति का पाठ


आज सुबह-सुबह ही उसके मुख से अपशब्द निकले, ऐसे शब्द जो नहीं निकलने चाहिए थे, व्यर्थ थे, जो जून को चुभे. उसके भीतर इतनी कठोरता, इतनी रुक्षता, इतनी हृदयहीनता छिपी हुई है इसका उसे भी भान नहीं था. नीरू माँ कहती हैं जो वे रिकार्ड करके लाये हैं वही तो निकलेगा, विडम्बना यह थी कि उसने क्रोध इसलिए किया कि उसे शांति का पाठ सीखने जाना था, सत्संग में जाने के लिए उसने क्रोध किया. उसका आज तक का सीखा हुआ ज्ञान जैसे उस पल तिरोहित हो गया था, इस बात का भी ध्यान नहीं रहा कि घर में सभी लोग थे, जिनमे काम करने वाले दो व्यक्ति भी थे. अगले ही क्षण उसे लगा कि कुछ गलत हो गया है, भीतर तो शांति हो गयी पर जून को जो पीड़ा उसने दी उसका क्या, वह चुपचाप सब सह गये, उनका कोई दोष नहीं था, उसका पूर्वाग्रह ही उसे भ्रमित कर रहा था, इसका प्रायश्चित यही होगा कि वह सत्संग में न जाये पर इससे आत्मा की उन्नति का एक अवसर वह गंवा देगी. उसे जाना तो है पर समय से लौट आना है. पिछले दिनों तथा आज भी, अन्य कई अवसरों पर भी उसने दूसरों के दोष देखे, यह आदत उसकी बहुत हानि क रही है. अहंकार भीतर कूट-कूट कर भरा है, वही क्रोध बनकर तो कभी परदोष देखने वाला बनकर सामने आता है. उसकी साधना में इससे बड़ी बाधा क्या हो सकती है ? कई दिनों से लिखने का अभ्यास भी नहीं किया, डायरी लिखने से अपने भीतर झाँकने का अवसर मिलता है. आज बहुत दिनों बाद दो सखियों से बात की, तीसरी को उस दिन फोन किया पर उसने उठाया नहीं, आज पुनः करेगी.

आज सुना, मन एक मिनट में पच्चीस से तीस संकल्प उठाता है, एक दिन में चालीस से पचास हजार विचार मन में उठते हैं. जैसे विचार मन उठाता है वैसी ही भावना भीतर जगती है. जैसी भावना होगी वैसा ही दृष्टिकोण उनका बनता है, फिर वही कर्म में बदलता है. बार-बार वह कर्म करने से वही आदत बन जाती है. विचार-भावना-दृष्टिकोण-कर्म-आदत-व्यक्तित्त्व, तो आज वे जो भी हैं वह अपने ही विचारों का ही प्रतिफल हैं, और वे जो भी काम करते हैं वही उनका भाग्य बनाते हैं.

नन्हा आज पंजाब में है, वह पहली बार किसी कम्पनी में काम करने गया है. शाम को वे उससे बात करेंगे. जून फिर से नाराज हैं, पता नहीं क्यों, आज सुबह पिताजी ने कहा कि स्त्रियों को जप-तप करने की जरूरत नहीं है, वह सेवा करके ही पुण्य लाभ कर सकती हैं. सास-ससुर की सेवा करने में ही स्त्री का मोक्ष है. समाज अभी भी उसी पुरानी सोच को लेकर बैठा हुआ है. कल शाम वह एक घंटे के लिए घर से बाहर गयी तो घर में किसी को पसंद नहीं आया, खैर इसमें उनका कोई दोष नहीं है, यहाँ किसी का कुछ भी दोष नहीं है, सब न्याय है. जो कुछ भी उसे मिल रहा है, वही उसका प्राप्य है बाहर. पर भीतर का क्षेत्र उसका अपना है जहाँ वह जो चाहे पा सकती है. वहाँ आत्मा का साम्राज्य है. वह कल्पतरु है, जो मांगो उससे मिलता है. वहाँ मौन है, शांति है, आनंद है, प्रेम है, सुख है, ज्ञान है, शक्ति है, भीतर की दुनिया अनोखी है, जहाँ विश्रांति है, जहाँ मन ठहर जाता है, बुद्धि शांत हो जाती है, जहाँ चित्त डूब जाता है, जहाँ कोई उद्वेग नहीं है, कोई लहर नहीं है, जहाँ अनोखा संगीत गूँजता है, जहाँ प्रकाश ही प्रकाश है, जहाँ जाकर लौटने की इच्छा नहीं होती, वह उसका अंतर्जगत ही तो उसका आश्रयस्थल है. वही उसका घर है, बाहर तो जैसे कुछ देर के लिए वे घूमने जाएँ या बाजार जाएँ या किसी से मिलने जाएँ अथवा तो दूसरे देश या दूसरे शहर जाएँ !


Thursday, November 12, 2015

अष्टावक्र गीता पर भाष्य


जून आज जोरहाट गये हैं, अभी-अभी उनका फोन आया, पहुंच गये हैं. कल दोपहर तक लौटेंगे सो आज किसी काम की जल्दी नहीं है. कल सत्संग है उनके यहाँ सो कुछ फोन करने हैं. आर्ट ऑफ़ लिविंग की टीचर से भी बात की, वे लोग नहीं आ पाएंगे, व्यस्त हैं. आजकल सत्संग में लोगों की उपस्थिति बहुत घट गयी है. सत्संग का एक घंटा संगीत और प्रभु के नाम में कैसे बीत जाता है पता ही नहीं चलता. मोरारी बापू की कथा टीवी पर आ रही है. वे कहते हैं सत्य, प्रेम और करुणा यदि जीवन में हों तो इन्हें बांटना शुरू कर दें, क्योंकि ये कभी खत्म न होने वाला खजाना है. जितना- जितना कोई इसे लुटायेगा उतना-उतना यह भीतर से और स्रावित होता है. कोई यदि अध्यात्म की ऊँचाई पर पहुंचना चाहता है तो प्रेम, सेवा और करुणा के मार्ग के अलावा कोई मार्ग नहीं. सद्गुरु कहते हैं भीतर देखो, भीतर उजियारा है, पर लोग डरते हैं, आत्मविस्मृति में चले जाते हैं. सम्यक बोध के बाद साधक के हाथ में पारस पत्थर आ जाता है, तब वह जो छूता है सोना हो जाता है. मनोरंजन के सभी साधन आत्मा से दूर जाने के साधन हैं ! कल रात जब वह सोई तो जीव और आत्मा की बात करके, रात को अद्भुत स्वप्न देखा, वह अपने कमरे में बिलकुल मध्य में जैसे हवा में तैर रही है और साथ ही सारे कमरे में रखे सामान भी देख पा रही है, फिर स्वयं से स्वयं ही पूछ  रही है कि इस समय उसकी आँखें बंद हैं या खुली. एक छोटे से शिशु से बात भी की स्वप्न में जो अभी बोलना नहीं जानता, उसकी आधी जीभ पर छोटे-छोटे कंटक हैं. स्वप्न की दुनिया कितनी अनोखी होती है.

आज दोपहर दीदी का फोन आया, उन्होंने ‘अष्टावक्र गीता’ पर ओशो का भाष्य पढना आरम्भ किया है जो छह भागों में है. जीजाजी ने लाकर दिया है, उन दोनों की कहानी कितनी मिलती है. आज महीनों बाद पहले की तरह कमर के निचले भाग में दर्द हुआ है, शरीर के भीतर क्या चल रहा है वे कहाँ जान पाते हैं. कल रात सोने से पहले हल्का भय का अहसास हुआ, एक हल्की सी तरंग उठी और क्षण भर में ही पूरे बदन में फ़ैल गयी, कितनी तेजी से यह हुआ पर वह उसे महसूस कर पायी, जैसे शांत झील में एक छोटा सा कंकर फेंके तो सारे पानी में हलचल मच जाती है. रात एक स्वप्न भी देखा कोई उसे कुछ सुंघा कर बेहोश करना चाह रहा है, पर वह सफल नहीं होता, वह सामना करती है, पुलिस को बुलाती है शायद किसी जन्म में उसके साथ ऐसा घटा होगा तभी वह अनजान लोगों से एक भय सा महसूस करती है. डर की जड़ें उनके भीतर होती हैं. गोयनका जी कहते हैं जब तक जड़ों से नहीं निकालेंगे डर जायेगा नहीं !


धीरे-धीरे उन्हें सेवा में आनन्द आने लगा है, बच्चे उनसे कुछ सीख रहे हैं और वे उनसे ! आज भी सुबह नौ बजे वह एक सखी के साथ पहुंच गयी, सत्ताईस बच्चे आये थे. इस समय शाम के चार बजे हैं, जून दफ्तर गये हैं शायद उसकी किताब की पाण्डुलिपि बनाने, उनके भीतर भी कोई उथल-पुथल चल रही है, वह थोड़ा मौन हो गये हैं आजकल, न जाने किस सोच में डूबे रहते हैं, वह भीतर उतरने लगे हैं. मौन इन्सान को अपना पता जानने में मददगार है. आज सुबह भी सद्गुरु को सुना, अद्भुत है उनका सहज तरीका, कठिन से कठिन विषय को भी इतना सरल बना देते हैं. वह कहते हैं कि थोडा सा क्रोध, अहंकार अपने में दिखे तो उसे रहने दो, उससे लड़ने मत जाओ. वह नम्र बनाये रखेगा. यदि कोई गलती हो जाये तो बजाय आत्मग्लानि में जाने के उससे इतना ही सीख लो कि अभी और सीखना है, बस आगे बढ़ जाओ. अपनी कमियों पर साधक न तो शर्मिंदा हों न ही उनसे डरें बल्कि उन्हें सहजता से स्वीकारें तथा उनसे आगे बढ़ जाएँ ! नन्हे का फोन ठीक हो गया होगा. उसने अपने प्रोजेक्ट पर काम शुरू कर दिया है, वह अगले महीने घर आएगा !  

Wednesday, November 4, 2015

इंदिरा गाँधी की कहानी



पिछले दो-तीन दिन छुट्टी के थे, बीहू की छुट्टी, सो डायरी नहीं खोली. इस समय दोपहर के दो बजे हैं. मौसम अब बदल गया है, गर्मी की शुरुआत हो गयी है. पिछले दिनों बगीचे से तोड़ कर गन्ने खाए, दांत व मसूड़े में दर्द है, हर सुख की कीमत तो चुकानी ही पडती है. आज सुबह वे समय से उठे, ‘क्रिया’ आदि की. ध्यान कक्ष में पंखा नहीं लगा है टेबल फैन से आवाज ज्यादा आती है, सो इस वक्त वह इधर बैठी है अपने पुराने स्थान पर. संडे योग स्कूल के बच्चों ने कार्ड बनाने का कार्य शुरू कर दिया है, लिफाफे भी बनाने हैं. पत्रिका के लिए कल उन्हें प्रेस जाना है, किताब के लिए जून ने लिख दिया है. वह आजकल कैथरीन फ्रैंक द्वारा लिखी इंदिरा गाँधी की कहानी पढ़ रही है. बनारस पर जो लेख लिखा था, वह आंटी को पढ़ने के लिए दिया था, सम्भवतः अभी उन्होंने पढ़ा नहीं है. लिखने का बहुत सा कम पड़ा है, गीतांजलि पर आधारित जो छोटे-छोटे पद लिखे थे, उन्हें भी टाइप करना है. ऐसा लगता है जैसे कुछ छूटा जा रहा है, लेकिन वह क्या है, उस पर ऊँगली रखना कठिन है. भीतर एक बेचैनी सी है, मगर इतनी तीव्र भी नहीं बस मीठी-मीठी आंच सी बेचैनी. ईश्वर ने उसे इतनी शक्ति दी है, इतना ज्ञान, इतना प्रेम और इतना समय दिया है, उसका लाभ इस जग को नहीं मिल रहा है, वह तो सौ प्रतिशत लाभ में ही है हर पल !

दोपहर के सवा दो बजे हैं, अप्रैल माह की तपती हुई दोपहरी है, सूरज जैसे आग फेंक रहा है. अभी थोड़ी देर पहले वह प्रेस से आई है, क्लब की वाइस प्रेसिडेंट और एडिटर के साथ गयी थी. उसने वाराणसी वाला लेख छपने के लिए दिया है. आज उठने में दस मिनट देर हुई पर सुबह के वक्त इतना समय भी कीमती होता है. आज उसने कई दिन बाद क्रोध का अभिनय किया, नैनी की बेटी को डांटा कि वह अपना स्कूटर जून के गैरेज के आगे न धोये, बाद में कोई उसे भीतर से डांटता रहा, वह कौन है भीतर जो उससे कोई गलती हो जाये तो चुप नहीं रहता. कल नन्हे का फोन खो जाने की खबर आई तो जून बिलकुल चुप थे, उसे कुछ भी महसूस नहीं हुआ, न दुःख न अफ़सोस..जैसे कुछ हुआ ही नहीं. वह धीरे-धीरे आत्मा में स्थित होने का प्रयास दृढ़ करती जा रही है. छह वर्ष पहले जो यात्रा शुरू की थी वह अब काफी आगे आ चुकी है, लेकिन यह यात्रा जीवन भर बल्कि जन्मों तक चलने वाली है, इसकी मंजिल भी यही है और मार्ग भी यही है. आज जून ने भी तो थोड़ा गुस्सा किया, वह ड्रेसिंग टेबल देखने गये थे पर अभी भी उसमें कमी थी. वे यह जानते ही नहीं कि ऐसा करके वे अपने को कर्मों के बंधन में फंसा लेते हैं.

धर्म को यदि धारण नहीं किया तो व्यर्थ है, नहीं तो उनकी हालत भी दुर्योधन की तरह हो जाएगी जो कहता है, वह धर्म जानता है पर उसकी ओर प्रवृत्ति नहीं होती और अधर्म जानता है पर उससे निवृत्ति नहीं होती. उसे कृष्ण के भजन भाते हैं, उसकी सूरत भी, पर उसके कहे अनुसार चलना तो अभी नहीं आता. आज सद्गुरु को सुना, वह उनसे कितनी उम्मीदें लगाये हुए हैं, वह तो उन्हें अपने जैसा ही मानते हैं, कितने भोले हैं वह, सब समझते हुए भी उनका मान बढ़ाने के लिये जो गुण उनमें नहीं हैं वे भी बताते हैं, तब वे लज्जा से झुक जाते हैं. सद्गुरु की महानता की तो कोई सीमा ही नहीं है, वह कहते हैं कि थोड़ा सा विकार यदि रह गया हो तो उससे मत लड़ो, रहने दो, उन्हें पता ही नहीं यहाँ तो विकार का ढेर लगा है, अहंकार तो इतना ज्यादा है कि..आज भी गर्मी काफी है. अभी डेढ़ बजे हैं, संगीत का अभ्यास तो उसने कई महीनों से छोड़ दिया है, लिखने-पढ़ने का कार्य ही काफी है. आज सत्संग में भी जाना है. वहाँ पढ़ने के लिए आज से अपनी कविता की जगह गुरूजी का कोई ज्ञान सूत्र ही लेकर जाएगी. किताब का काम दस मई के बाद होगा, तब तक भूमिका का प्रबंध भी हो जायेगा. नन्हा दो रातों तक अपने मित्र के साथ अस्पताल में रहा, उसमें सेवा की भावना है, अच्छी बात है. उसका पुराना मोबाइल काम करने लगा है.    


  

Monday, August 24, 2015

नीला नभ उजला पाखी


सेवा का जो इतना गुणगान किया गया है, वह यूँ ही नहीं है. आज बच्चों को उन्होंने अपना जो समय दिया वह कितना शांति प्रदायक रहा उनके स्वयं के लिए. गुरूजी के जन्मदिन के उपलक्ष्य में उन्होंने एक सेवा का प्रोजेक्ट लिया है. अभी तो यह शुरुआत है, धीरे-धीरे वे इसे और बढ़ाएंगे. कल रात को उसे नींद ही नहीं आ रही थी. शाम को वर्षा में भीगते हुए बच्चों के घर जाकर उन्हें बुलाने का दृश्य बार-बार आ रहा था हृदय पटल पर. गुरूजी लाखों लोगों को एक साथ लेकर कार्य करते हैं और शांत रहते हैं, इधर वे हैं कि छोटा सा भी कार्य उन्हें उद्वेलित करने को पर्याप्त है. उसे थोड़ी सी थकान का अनुभव हो रहा है, कल शाम दो घंटे और आज दो घंटे जो नया कार्य किया शायद उसके कारण, पर उसका मन बहुत शांति में है. आज सुबह बंद आँखों के सम्मुख गुरूजी का चेहरा अपने –आप ही आ रहा था, जैसे वह दूर से ही आशीष दे रहे हों. अभी नन्हे से बात हुई, वह यात्रा में हैं, परसों इस समय तक घर पर होगा, जून उसके और नन्हे के घर में..जब वह छोटा सा था तो वे तीनों एक साथ मिलकर कहा करते थे – ‘वे तीनों’. जून को कल बैंकाक जाना है उसके बाद सम्भवतः वे उनसे बात नहीं कर पाएंगे. आज भी मौसम सुहावना है, प्रकृति भी उनके साथ है, सभी कुछ धुला-धुला स्वच्छ है. भीतर भी कोई विचार नहीं उठ रहा. गुरू माँ कहती हैं जिसके मन में विचारों की दौड़ नहीं है वह मुक्त है. उसने प्रार्थना की, सद्गुरु का जन्मदिन मनाने का सौभाग्य उन्हें ऐसे ही मिलता रहे बरसों बरस,  वे स्वयं को जानने की तरफ कदम बढ़ाते रहें, भीतर प्रेम का दरिया बहता रहे और कविताओं के रूप में उसके मन के भाव प्रकट होते रहें, अहंकार का नाश हो !

उनकी स्वतन्त्रता का मोती चमकता रहे, साधना का यही तो लक्ष्य है. जहाँ बंधन है, वहाँ दुःख है, जब उन्हें अपनी सीमाओं का बोध होता है तो भीतर कैसी पीड़ा होती है, साधना के द्वारा वे वहाँ पहुँच जाते हैं, जहाँ कोई सीमा नहीं, कोई बंधन भी नहीं. आत्मा नित मुक्त है और वे आत्मा हैं, अनंत ऊर्जा और प्रेम का भंडार ! उनके भीतर प्रेम का दरिया अविरत रूप से बह रहा है, उनकी खुद की प्यास की तो बात ही क्या, वे अपने आस-पास भी एक सुंदर गुलिस्तां बना सकते हैं, उनके प्रेम की महक से जहाँ को महका सकते हैं. जो कार्य उन्होंने शुरू किया है उसे अवश्य ही जारी रखना होगा. आज सुबह साढ़े चार बजे नींद खुल गयी, नन्हे को फोन किया वह कोलकाता पहुंच चुका है. कल इस समय वह उसे लेने जाएगी, कल शाम को उसे कुछ देर के लिए अकेले रहना होगा, जब वह जन्मदिन के उत्सव में जाएगी. आज टीवी पर सुना कि वस्तु से ज्यादा महत्वपूर्ण है व्यक्ति, व्यक्ति से विचार, विचार से विवेक और विवेक से से भी ज्यादा महत्व परमात्मा का है, तो वह परमात्मा के लिए यदि व्यक्ति को कुछ देर के लिए छोड़ती है तो यह कत्तई गलत नहीं होगा. नन्हा इसे अवश्य समझेगा, बच्चे बड़ों से कई मामलों में अधिक विवेकी होते हैं. उपरोक्त बात सुनकर उसे अपने द्वारा की गई व्यक्ति की उपेक्षाएं स्मरण तो आयीं पर कारण वस्तु कदापि नहीं था, परमात्मा ही था, ध्यान, सत्संग ही वे कारण थे.

वर्षों पूर्व उसने अपनी एक डायरी के कवर पर लिखा है – “नीलवर्णी स्वच्छ गगन में विचरते श्वेत वर्णी पक्षी के उज्ज्वल पंखों की आभामयी ज्योति उसके मन को प्रकाशित कर दे”.. और उसकी वह पुकार अनसुनी नहीं गयी. गुरूजी कह रहे हैं भयरहित होने के चार कारण हो सकते हैं, अहंकार, घृणा, प्रेम और ज्ञान. रावण अहंकारी था, उसकी निडर अवस्था में जड़ता है पर ज्ञानी सबको सरंक्षण देता है, उसमें एक मस्ती होती है. थोडा बहुत भय यदि किसी के भीतर रहे तो वह अहंकारी होने से बचा लेता है, प्रकृति उनका बचाव करने के लिए भय देती है. आज ही उत्सव है, शाम को सत्संग तथा भोजन का आयोजन किया गया है. उसे बारह बजे नन्हे को लेने जाना है, अभी साढ़े नौ बजे हैं. भोजन बनाना है, तैयार होना है. सुबह ध्यान नहीं कर पायी, फोन आते रहे, बाहर से फूल तोड़े, नन्हे का कमरा ठीक किया. रास्ते में ध्यान कर लेगी, नैनी ने कहा है वह भी जाएगी, तब तो शायद बातचीत भी होती रहे. एक दक्षिण भारतीय सखी ने फोन किया वह बहुत उत्साहित थी. आज ‘बुद्ध पूर्णिमा’ भी है, गोयनका जी के साथ ही थोड़ी देर ध्यान हो जायेगा. ध्यान उसके जीवन का अभिन्न अंग बनता जा रहा है, परमात्मा तब स्वयं आते हैं उससे बातें करने, वे क्या सोचेंगे, इसके पास सारी दुनिया से बातें करने के लिए समय है पर मेरे साथ बातें करने के लिए वक्त की कमी पड़ गयी. सद्गुरु ने आज बताया कि जिस क्षण यह पूर्ण विश्वास हो जाता है कि एक माँ को जैसे बच्चे की फ़िक्र रहती है, उसी तरह परमात्मा को उसकी फ़िक्र है, वह उससे वैसे ही प्रेम करता है तो जीवन में कोई दुःख नहीं रहता, प्रेम ही प्रेम भर जाता है, सद्गुरु भी उनकी चिंता करते हैं !  


Monday, August 17, 2015

प्रकृति के नियम


उसने प्रभु से जो माँगा है, वह उसने उसे प्रदान किया है. उसने उससे ‘सदगुरू’ मांगे थे जो सहज ही उसे मिले, स्वयं ही उसके जीवन में आये. उसने उससे भक्ति मांगी जो प्रेम के रूप में उसके रग-रग में समाई है. उसके भीतर अनंत प्रेम उस परमात्मा ने भर दिया है कि उसके लिए उसका अंतर छोटा पड़ता है, तो उसने उससे सेवा का अवसर माँगा और अब उन्हें एक दिन गुरूजी के जन्मदिन के उपलक्ष में सेवा का कार्य करना है. अवश्य ही उनका प्रयास सफल होगा. वे अपने साधनों के द्वारा तथा अपने प्रेम के द्वारा उन लोगों तक पहुंचेंगे जो एक तरह से उनके समाज का अंग होते हुए भी  उनसे कटे हुए हैं. उनके घरों में काम करने वाली महिलाओं के घरों की वास्तविक स्थिति से वे अनभिज्ञ ही हैं. उनके दिलों में झांककर कभी देखा ही नहीं. उन्हें भी उनका प्रेम व ज्ञान मिले तो वे अपने परिवारों को अच्छा पोषण दे पाएंगी. उसका इरादा नेक है और सद्गुरु की कृपा है. सेवा करने का भाव भीतर प्रकट हो तभी से सफलता का आरम्भ हो जाता है. वे अपना आप देना चाहते हैं, सामुदायिक चेतना का विकास करना चाहते हैं. जो भी धर्म के मार्ग पर चलता है उसकी मंजिल लोक संग्रह ही होती है, सभी के भीतर उसे परमात्मा की छवि दिखाई पड़ती है. परमात्मा से प्रेम करने का अर्थ ही है उसके बन्दों के काम आना.

आज सुबह वे उठे तो वर्षा हो रही थी, वर्षा होने में कर्ता तो कोई भी नहीं, फिर भी कार्य तो हुआ, कृष्ण कहते हैं जो कर्म में अकर्म को देखता है अर्थात कर्तापन से मुक्त है और जो अकर्म में कर्म को देखता है अर्थात कुछ न करते हुए भी करता है, उसके द्वारा सहज ही कृत्य हो रहे हैं. वे कर्म तो करें पर फल की इच्छा न हो तो कितनी परेशानियों से बचे रहते हैं, जब कुछ भी न करें तो न करने के अपराध बोध से भी ग्रसित न हों, क्योंकि सहज रूप से जो सामने आये वही करना तथा विशेष कर्म का आग्रह न रखना भी साधक के लिए आवश्यक है. उसने सोचा नहाना-धोना, भोजन आदि कर्म तो सहज ही होते हैं, लिखना-पढ़ना भी होता रहे, सामने कोई पत्थर आ जाये तो हाथ उसे उठाते रहें, कोई दुखी आये तो हाथ उसके आँसूं पोछते रहें, पर करने का अभिमान न आये, तभी वह कर्मों के बंधन से मुक्त रहेगी. मन खाली रहेगा और खाली मन में प्रभु आकर बसते हैं. पता नहीं कौन सा पल होगा जब उसे ऐसा अनुभव होगा.

आजकल वह एक नई पुस्तक पढ़ रही है. अच्छी है, प्रकृति के नियमों की जानकारी यदि उन्हें हों और वे उसके अनुसार जीना शुरू कर दें तो जीवन एक उत्सव बन जाता है, उनका हर क्षण एक अमूल्य अनुभव ! वे इस धरा पर मानव देह पाकर एक अनोखी यात्रा पर निकले हैं, वह यात्रा है उनके भीतर की यात्रा, अनंत सम्भावनाएं उनके भीतर छुपी हैं. अनंत ऊर्जा, आनंद तथा शांति का खजाना उनके भीतर है. वे जब इस धरा पर आये थे तो निर्दोष थे. जगत के प्रभाव में आकर दिन-प्रतिदिन अपने मूल स्वरूप पर आवरण चढ़ाते गये, वे असहज होकर जीने लगे और परिणाम हुआ कि वे अपने भीतर एक दर्द और तथा डर को जगह देते गये. जब-जब वे अपने मूल स्वरूप से खिलाफ कार्य करते हैं, तब-तब एक दर्द भीतर उत्पन्न होता है. उनके भीतर जो परमात्मा है वह साक्षी है उनके कृत्यों का. वे ऊपर-ऊपर से अपनी गलतियों पर भले पर्दा डाल दें या उन्हें उचित सिद्ध कर दें, भीतर जो सही है वही सही है, जो गलत है वह गलत है. उनके भीतर जो डर हैं, वे भी उन्हें सच बोलने से रोकते हैं. वे डरते हैं कि यदि लोगों से ज्यादा प्रेमपूर्ण व्यवहार करेंगे तो फंस जायेंगे, डर के कारण ही वे अपने भीतर के प्रेम को घुट-घुट कर खत्म हो जाने पर विवश कर देते हैं. प्रेम करना उनका स्वभाव है, सत्य बोलना भी उनका स्वभाव है, दया, करुणा तथा अपनत्व.. ये भी उनका मूल स्वभाव है इसके विपरीत जो भी है, वह झूठ है, ओढ़ा हुआ है और वह उन्हें नुकसान पहुँचाता है !  

Sunday, July 19, 2015

मौन और सेवा



ध्यान में प्रभु की निकटता का आनंद पाने वाला मन क्या इतना भी पावन नहीं हो पाता कि ध्यान के बाद अपने भीतर से प्रेम को बाहर भेजे. यदि ऐसा नहीं है तो कहीं कुछ गड़बड़ है जरूर. भीतर यदि प्रेम है ही नहीं तो बाहर व्यक्त कैसे होगा, तो जो भीतर ईश्वर के प्रति महसूस होती है, वह अनुभूति जो इतनी पावन लगती है वह संसार के बीच आकर कितनी बदल जाती है.

आज उसने सेवा के बारे में कितने सुंदर वचन सुने कथा में- क्रियात्मक सेवा, भावात्मक सेवा तथा विचारात्मक सेवा अथवा ज्ञानात्मक सेवा...ये सभी परमात्मा व सद्गुरु स्वयं करते हैं तथा करने के लिए प्रेरित करते हैं. सेवा स्नेहवश होती है, वहाँ कुछ चाहिए नहीं, चाहिए तो केवल सेव्य की प्रसन्नता. यदि कोई अपनी रूचि सेव्य पर लादता है तो वह अपनी सेवा कर रहा है. सेवा किये बिना अंतर्मन की शुद्धि नहीं होती !

आज उसे लग रहा है, जीवन प्रभु का दिया अमूल्य उपहार है, आनंद से इसका एक-एक क्षण भरा है. हर श्वास एक आनंद की धारा से भीतर को स्वच्छ कर रही है तथा भीतर के विकारों को बाहर ला रही है. उसका अंतर्मन एक ऐसी अद्भुत शांति से भरा हुआ है जिसे कोई नाम नहीं दिया जा सकता. इसी तन में और इसी मन में कभी पीड़ा भी हुई थी सोचकर ही विश्वास नहीं होता. सद्गुरु ठीक कहते हैं जीवन एक सागर है, जो डूबता है इसमें वही उबरता है, इसमें छिपे खजाने को पा लेता है. वही जीवन के रहस्य को जान पाता है. इतना सुखमय जीवन क्यों किसी के लिए दुःख का कारण बना रहता है ? परमात्मा से जुड़े बिना जो जीवन बीतता है वह अधूरेपन का शिकार रहता ही है. भीतर की आँख यदि खुल जाए तो जगत पहले जैसा नहीं रह जाता, उसका क्रीड़ा स्थल बन जाता है. जब कोई खुद पर कृपा करे तभी ऐसा होता है. जो इस सच्चाई को समझ गया है कि कर्म करते समय जो आनंद मिला बस उतने पर ही उसका अधिकार है तो वह मुक्त है. आशापूर्ति के लिए अथवा प्रतिक्रिया स्वरूप किये गये कर्म ही बांधते हैं और दुःख का कारण बनते हैं. वैसे देखा जाये तो हर व्यक्ति अपनी जगह ठीक है, वह किसी कारणवश ही वहाँ तक पहुंचा है, मूल में सभी निर्दोष हैं. अंतत सभी को एक ही लक्ष्य पर पहुँचना है.

उसे मौन सुहाता है, पर उसके भीतर ‘वह’ क्या है जिसे मौन सुहाता है, शुद्ध चेतना अथवा अशुद्ध मन, मन में रहकर यदि कोई कर्म किया, चाहे वह साधना ही क्यों न हो अभिमान को जन्म मिलेगा. जगत में रहते हुए वह जगत से पूर्णतया अलग है यह मानना भी तो अज्ञान ही है. प्रेम को यदि स्वयं तक सीमित रखा तो वह सड़ने लगेगा. प्रेम को बहने देना है, चारों ओर बिखरने देना है, अपने शब्दों से, हाव-भाव से, कृत्यों से, वाणी से उसी परमात्मा की खुशबू आनी चाहिए जिसे भीतर खोजा जा रहा है. ऐसे कर्म संस्कार गढ़ने हैं जो बाद में दुःख न दें तथा जो उस क्षण भी चित्त को शुद्ध ही बनाये रखें. जैसे निर्मल आकाश अपने आप में टिका हुआ मुक्त है.



Tuesday, June 2, 2015

कान्हा की बांसुरी


आज सुबह गुरू माँ को कुछ देर सुना था, कह रही थीं कि अधिकतर महिलाओं को अपने पति की बचत आदि की कोई जानकारी ही नहीं रहती और अचानक जरूरत पड़ने पर बहुत परेशानी होती है. अभी कुछ देर पहले एक अनजान कॉल ने उसे कुछ देर के लिए व्यर्थ ही परेशान कर दिया, जो जून के बारे में पूछ रहा था, पर पता चल गया कि अभी भी डरने की शक्ति है ! जून को उसने फोन भी कर दिया, वह भी परेशान हुए होंगे शायद नहीं, उन्हें उसे अधिक अनुभव है. फोन उनके नये ड्राइवर का था, अभी दुबारा भी आया था, खैर ..जून ने आज ही अपना बीपी भी चेक कराया, थोड़ा अधिक है, उसे उनका ज्यादा ख्याल रखना होगा. किसी की सही कीमत का पता तभी चलता है जब उससे दूर जाने का भय हो. वह अपने मन की इस कमजोरी को नहीं जानती थी, आज का अनुभव कुछ नया सिखा गया है. वे संसार में रहते हैं तो प्रेमवश सभी से बंधे रहते ही हैं, पर इसी बंधन से मुक्ति ही तो मोक्ष है, आसक्ति से मुक्ति छोटे मन के लिए सम्भव नहीं पर जब कोई इस छोटे मन से पार चला जाये तो कोई भय नहीं, उस वक्त वह छोटे मन के साथ थी. आज पिताजी, बड़े भाई व छोटी ननद से बात की. पिताजी अब ठीक हैं पहले से. इसी महीने कृष्ण जन्माष्टमी पर विशेष सत्संग है उसे निमन्त्रण पत्र टाइप करने को दिया गया है, सेवा का छोटा सा कार्य...

आज पूर्णिमा है. रक्षाबन्धन का दिन. ‘जागरण’ में इसके महत्व पर सुना. सद्गुरु और कान्हा उसके लिए एक हो गये हैं. दोनों ही से वह साहित्य के माध्यम से मिलती है, फिर ध्यान के माध्यम से, दोनों मनातीत हैं. कल पढ़ा कि शरीर में होने वाली संवेदनाएं किसी न किसी भावना की द्योतक हैं, यदि संवेदना को देखें और देखते-देखते वह खत्म हो जाये तो वह भावना भी नहीं रहती. ध्यान में तभी उनकी सभी नकारात्मक भावनाएं समाप्त होने लगती हैं और वे साफ-स्वच्छ होकर बाहर निकल आते हैं. ध्यान एक तरह से स्नान ही हुआ न... भीतरी स्नान, फिर जब नकारात्मकता नहीं रहती तब ज्ञान प्रकट होगा, प्रज्ञा जगेगी. अभी रास्ता लम्बा है, पर रास्ता भी कितना मोहक है, अद्भुत है. सद्गुरु का ज्ञान इसे और भी मोहक और आनंद प्रद बना देता है. यह तो जन्मों की साधना है.

आज सत्संग उनके यहाँ है, जून का जन्मदिन है. सुबह से सभी के फोन आ रहे हैं. दो बजने को हैं. शाम बहुत व्यस्त बीतने वाली है. आज भी झकझोरने वाला प्रवचन सुना, संत निर्भीक होता है, वह सिर्फ देता है और जिसे कुछ चाहिए नहीं वह डांट भी सकता है. उनके सम्मुख जाते ही झूठ उजागर हो जाता है. आदर्शवादिता की बातें तो बहुत होती हैं पर उन्हें जीवन में उतारने से वे पीछे हट जाते हैं. सद्गुरु उस कान्हा की बांसुरी की तरह है जो स्वयं पीड़ा सहकर मधुर राग उत्पन्न करती है, वह कटती है, तपती है, विरह की पीड़ा सहती है तभी कृष्ण के अधरों से लगती है, वैसे ही संत, संत होने से पूर्व विरह की आग में जलते हैं फिर प्रभु से दीदार होता है. और प्रभु के मुख बन जाते हैं वह, उसकी तरफ से बोलते हैं, उसका कार्य करते हैं. जब किसी के जीवन में स्वार्थ नहीं रहता, झूठा गर्व नहीं रहता, वह भी उस प्रभु का साधन बन जाता है.