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Friday, February 10, 2023

बिजली की कार


सुबह अभी अंधेरा ही था जब वे प्रातः भ्रमण से लौट आए। योग साधना के बाद दीपक चोपड़ा का ‘चेतना’ के बारे में एक बहुत अच्छा वीडियो सुना।मुख्य विषय था कि यह जगत किस पदार्थ से बना है और चेतना क्या है ? कह रहे थे, उनके पाँच वर्ष के पोते ने उन्हें एक बार यूनिवर्स के बारे में बताया था कि वह दूसरे आयाम से बना है। आगे जे कृष्णामूर्ति का ज़िक्र किया और आइंस्टीन व टैगोर के मध्य हुए एक वार्तालाप का ज़िक्र भी किया, जब १९३० में वे दोनों मिले थे; जिसमें टैगोर कहते हैं, मनुष्य का व्यक्तित्व अनंत ब्रह्मांड को समाहित करता है। ऐसा कुछ भी नहीं हो सकता है जो मानव व्यक्तित्व द्वारा समाहित नहीं किया जा सकता है, और यह साबित करता है कि ब्रह्मांड का सत्य मानव का सत्य है। नाश्ता करते समय महादेव का अगला अंक देखा, कथा अत्यंत रोचक होती जा रही है। सती ने उन्हें स्वीकार कर लिया है पर महादेव ने अभी तक सती को नहीं स्वीकारा है. 

कल रात ओशो की किताब पढ़ी थी, सुबह तक उसकी सुवास शेष थी, जो एक कविता की शक्ल में प्रकट हुई.  ‘माँ’ पर  लिखी एक कविता भी आज पोस्ट की। मंझली भांजी का जन्मदिन है, कुछ पंक्तियाँ उसके लिए भी लिखीं. किसान आंदोलन पर दो वीडियो देखे, एक पक्ष में दूसरा विपक्ष में. हरियाणा व पंजाब की सरकारों को मंडी से बहुत आमदनी होती है, इसलिए वे इस बिल का विरोध कर रहे हैं, अन्य कोई राज्य यह विरोध नहीं कर रहा है. आज ‘कोना’कार वाले टेस्ट ड्राइव के लिए आये थे, सब ठीक था पर दो-तीन जगह हंप पर गाडी नीचे से टकराई. यह गाड़ी कोरिया की है, अभी वे तय नहीं कर पाए हैं कि कौन सी कार खरीदें. आज नंन्हा एक नया बोर्ड गेम लाया, ‘युद्धभूमि’, बहुत सरल है, बच्चों का कोई खेल हो जैसे. वह कई पार्ट्स जोड़कर  एक प्लेन बना रहा है, उस पर पेंट करने के लिए रंग और ब्रश मंगवाए हैं. दोपहर को वह ममेरी बहन का सामान लेकर आया, उसे स्टोर में रखवा दिया है. कोरोना के कारण कई बच्चे घर से काम करने के कारण अपने-अपने घरों को वापस जा रहे हैं. अब सम्भवतः वह अगले वर्ष के प्रारम्भ में लौटेगी. चार बजे वह बाइक से वापस गया तो रास्ते में बारिश आ गयी. कार होती तो भीगने से बच गया होता. 

रात्रि भ्रमण के लिए निकले तो देखा खेल के मैदान में बड़ा सा स्क्रीन लगाकर आई पी एल मैच दिखाया जा रहा था. कुछ लोग कृत्रिम घास पर नीचे बैठे थे, कुछ खड़े थे. उनके वृद्ध पड़ोसी भी बहुत रूचि से हर मैच देखते हैं, चाहे वह दिन या रात में किसी भी वक्त हो, क्रिकेट, फुटबॉल या टेनिस किसी का भी हो. आज सुबह से सिर में हल्का दर्द था, पर उसके कारण न तो दिनचर्या में कोई खलल पड़ा, न ही दवा लेनी पड़ी. देह से पृथकता का अनुभव होना शायद इसे ही कहते हैं. नन्हे ने उसकी सुविधा के लिए कम्प्यूटर के लिए नया मॉनिटर भेजा है. माइक्रोसॉफ्ट ऑफिस सॉफ्टवेयर भी खरीद लिया है. पिता जी को कविताओं की इ- बुक ‘शब्द’ भेजी,  कहने लगे, संसार में भी थोड़ा  ध्यान लगाए. कोविड के कारण पार्लियामेंट का सेशन आठ दिन पहले ही समाप्त हो गया है. किसानों का आंदोलन जारी है. उनके सुधार के बिल तो पास हो गए हैं. श्रमिकों के लिए भी कई कानूनों में सुधार किया गया है. 

सुबह वेदांत पर चर्चा सुनी, स्वामी सर्वप्रियानंद कितनी अच्छी तरह माया, जीव व ब्रह्म के बारे में बता रहे थे. ब्रह्म ही माया के कारण जगत प्रतीत होता है; जैसे आकाश वास्तव में शून्य है पर नीला प्रतीत होता है. ध्यान की गहराई में जब ज्ञाता, ज्ञान और ज्ञेय तीनों एक हो जाते हैं. तब जो अनुभूति होती है, वह ब्रह्म है. जब जानने वाला तो हो पर जानने को कुछ न हो, तब जो जानना होगा, वह ब्रह्म है. जो कुछ जाना जा सकता है और जो कुछ जाना नहीं जा सकता, उन दोनों के पार है वह ! आज सुबह टाटा मोटर्स का आदमी आकर चेक ले गया ई वी के लिए. पिताजी को बताया तो उन्होंने कहा भविष्य में बिजली की गाड़ियाँ ही चलेंगी, उन्होंने भविष्य को देखकर कार का चुनाव करने के लिए नन्हे व जून को  बधाई दी. 

Wednesday, February 17, 2021

छोटी दीवाली

 

कल का पूरा दिन घर को व्यवस्थित करने में ही निकल गया। मेहमानों का कमरा अभी भी  शेष है। आज आखिरी कार्टन भी खोल दिए। योग कक्ष में किताबें लगा दी हैं, कमरा अच्छा लग रहा है। अब शाम को यहाँ बैठकर स्वाध्याय व साधना दोनों किए जा सकते हैं। आज सुबह सिट आउट यानि शयनकक्ष के बाहर बड़ी बालकनी या बरामदे में आसन किए। चार-पाँच दिनों के बाद दीवाली है, इस नए घर में उनकी पहली दीवाली ! नन्हा कुछ लोगों को बुलाने वाला है। आजकल यहाँ शाम होते ही काले बादल छा जाते हैं और मूसलाधार वर्षा आरंभ हो जाती है। इस समय सिर में हल्का दर्द हो रहा है, नया शहर, नई दिनचर्या एडजस्ट होते-होते कुछ समय तो लगेगा। 


आज सुबह पाँच बजे से कुछ पहले ही उठे। एक नए इलाके की तरफ टहलने गए। पार्क नंबर छह व सात देखा। पूरे नापा में चौदह पार्क हैं, सभी सुंदर हैं। एक-एक करके वे सभी में जाएंगे और सुंदर तस्वीरें उतारेंगे। इस समय उसकी आँखें अश्रुओं से भरी हैं, पता नहीं कौन सी पीड़ा है, क्या दुख है, साथ ही एक मुस्कुराहट भी रह-रह कर आ रही है अधरों पर, कौन है जो यह क्रीड़ा कर रहा है ? सुबह टहलने गई तो दोनों पैर जैसे  अकड़े हुए थे, चलने में श्रम प्रतीत हो रहा था, गति भी कम हो गई थी। वापस आकर योगासन किए। नन्हा व सोनू उठ गए थे। हरसिंगार के फूल चुने। जून इडली का नाश्ता  ले आए। नौ बजे वे बच्चों को उनके घर छोड़ते हुए डेन्टिस्ट के पास गए। बाएं गाल में अंतिम दांत पर मसूढ़ा चढ़ गया था, उसने थोड़ी सी सर्जरी की, टांके लगाए। अगले हफ्ते फिर जाना है। दोपहर का भोजन सोनू ने अच्छी तरह से मेज पर लगाया था। आज सुबह असम से नैनी ने फोन किया, एक-एक करके घर के सभी सदस्यों ने बात की। उसके ससुर की तबीयत ठीक नहीं है।  दो दिन बाद दीवाली है, कल बिजली की लड़ी लगाने इलेक्ट्रिशियन आएगा। शाम को टहलते समय जून को पैरों की जकड़न के बारे में बताया तो उन्होंने कहा यह मन की उदासी के कारण है, और कोई बात  नहीं, कोई इंसान दूसरे की पीड़ा का अनुभव कैसे कर सकता है ? हर कोई स्वयं से ही पूरा भरा होता है ! परमात्मा सब जानता है, उससे कुछ भी छिपा नहीं है, कोई कर्म उदय हुआ है। 


आज दोपहर से ही बाहर बिजली की झालर आदि लगाने का काम चल रहा है। कल छोटी दीवाली है, सोनू की चचेरी बहन व भाई-भाभी आए हैं, वे लोग भी परसों आएंगे। नन्हे ने पार्टी की पूरी तैयारी कर ली है। भोजन बाहर से ही बनकर आएगा, पूरी व रोटी यहाँ बनेगी।सुबह भी पैरों में जकड़न महसूस हो रही थी। शायद हार्मोन्स की समस्या हो, जरूरत से ज्यादा भावुक होना और जल्दी थकान होना इसके लक्षण हैं। जून ने आज पैरों व हाथों में तेल लगाया, उनमें सेवा भाव बहुत है पर उसे जगाना पड़ता है, वरना उन्हें उसकी बात सुनने की भी फुरसत नहीं रहती कभी-कभी। 


वे धीरे-धीरे नए घर में रहने के अभ्यस्त हो रहे हैं। लगभग रोज शाम को भोजन के बाद सोसाइटी में स्थित छोटे से सुपर मार्केट जाकर एक-दो जरूरी समान ले आते हैं। एक महिला उसे चलाती हैं, हिंदी बोल लेती हैं। शाम को टहलने गए तो तेज वर्षा होने लगी, दस मिनट का ही रास्ता था पर घर आते-आते काफी भीग गए, आकर देखा, एक व्यक्ति उनके गैरेज में बारिश से बचने के लिए खड़े हैं। जून ने कुछ देर उनसे बात की, कह रहे थे तीन करोड़ में आपका घर बिक सकता है। आज सुबह सूर्योदय देखते हुए छत पर योगाभ्यास किया। अंग्रेजी अखबार के साथ हिंदी का एक अखबार राजस्थान पत्रिका भी लेना शुरू किया है, कुछ देर पढ़ा। दोपहर बाद डाइनिंग हॉल में बिजली की दो लड़ियाँ लगाईं। शाम को ग्यारह दीपक जलाए, कल्याण के पर्व अंक में दीपावली उत्सव के बारे में  विस्तृत जानकारी पढ़ी। इस बार पूजा का समान नहीं ला पाये हैं अभी तक। रंगोली के लिए रंग भी नहीं हैं। यहाँ वे बाजार से काफी दूर हैं। उत्तर भारत में जिस उत्साह से दीवाली मनाते हैं वैसा यहाँ नहीं है। आज सुबह वे पड़ोसियों को शाम के भोज के लिए निमंत्रित करने गए। उनके पुत्र सैकड़ों के पटाखे जलाता है ऐसा उन्होंने बताया। 


उस पुरानी डायरी के पन्ने पर उसने कहीं से एक सूक्ति लिखी थी, “स्वप्न से भागना नहीं, जागना है। स्वप्न में भागकर भी तो स्वप्न में ही रहेंगे; किन्तु स्वप्न से जागकर स्वप्न ही नहीं रह जाएगा। आज लगता है, जीवन भी तो एक स्वप्न ही है जो वे देखे ही जा रहे हैं, जाग कर पुन: सोने का अभिनय करते हुए। 


Tuesday, July 30, 2019

बरसाती मौसम



पिछले तीन दिनों से लगातार वर्षा हो रही है. दिन और रात दोनों समय. कल सुबह टहलने निकले थे पर बारिश तेज हो गयी, छाता भी काम नहीं आया, सो घर लौट आये. आज सुबह कुछ समय के लिए थमी थी, पर इस समय मूसलाधार पानी बरस रहा है. असम में सर्दियों के बाद सीधे ही बरसात का मौसम आ जाता है, बसंत और गर्मियों को आने ही नहीं देता. वे बीच-बीच में अपना काम करते हैं जब वर्षा कुछ समय के लिए विश्राम लेती है. शाम को वे घर में ड्राइव वे पर कुछ देर टहलते रहे, आकाश घने बादलों से ढका था. पेड़-पौधे फूल सभी पानी में तृप्त नजर आ रहे थे, पूरी तरह से तर ! सुबह जून ने नाश्ते में अप्पम बनाये, फिर फोन पर उसकी रेसिपी भी बताई, उन्हें दक्षिण भारतीय व्यंजन बहुत पसंद हैं.

आज वह टूटा हुआ दांत निकलवाया, तोड़कर निकालना पड़ा, दो इंजेक्शन दे दिए थे डेंटिस्ट ने सो दर्द नहीं हुआ. इस समय एक अनोखी ध्वनि सिर के ऊपरी भाग में उसे सुनाई दे रही है. दर्दनाशक दवा डाक्टर ने दे दी है, जो दर्द न होने के बावजूद वह ले चुकी है, यह सोचकर कि उस दवा का अवश्य ही कुछ और लाभ भी होता होगा. परमात्मा की कृपा अपार है.

आज सुबह उठे तो तेज वर्षा और आंधी से सामना हुआ. बिजली भी चली गयी, पर बारिश फिर रुक गयी. अँधेरे में तैयार होकर वे टहलने निकले, वापस आये तो बिजली आ गयी थी. कल शाम फ्रिज को डीफ्रॉस्टिंग के लिए बंद किया था, सारा सामान बाहर निकाल दिया था, सहेजा. तब तक जून के एक सहकर्मी व उनकी पत्नी आ गये, उनके साथ आधार कार्ड के लिए बैंक जाना था. बैंक मैनेजर छोटे भाई के परिचित हैं, उनकी ही मदद से आधार कार्ड बनने में कुछ आसानी हो रही है. लौटते-लौटते लंच का समय हो गया, जल्दी-जल्दी भोजन बनाया. दोपहर को मृणाल ज्योति गयी. वहाँ से लौटी तो एक सखी का फोन आया, उसकी बिटिया को पिछले चार-पांच दिन से बुखार है, उसे अस्पताल ले जाना है, एक घंटा लग गया. लौट कर आयी तो योगाभ्यास के लिए महिलाएं आ चुकी थीं. दिन कैसे बीत गया पता ही नहीं चला.

तीन बजे हैं दोपहर के, आज मौसम अच्छा है, धूप खिली है. कल 'विश्व महिला दिवस' है, कुछ पंक्तियाँ लिखी हैं, अभी कुछ सुधार करना शेष है. महिलाओं के सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक अधिकारों के प्रति सजग कराने के लिए मनाया जाता है यह दिवस, उनके प्रति सम्मान दिखाने के भी एक अवसर है यह दिन ! आज सुबह उठे तो आकाश में बादल थे, पर चाँद भी झलक रहा था. सुबह नाश्ते करने के बाद अस्पताल गयी. वापस आई तो दस बजे थे, बिटिया अब ठीक है. सखी को उसके परीक्षा न दे पाने की कोई फ़िक्र नहीं है, पता नहीं यह ठीक है या नहीं, पर इतना ज्यादा लाड़-प्यार बच्चे को कमजोर ही बनाता है. आज शाम क्लब में मीटिंग है. सेक्रेटरी आज ही बाहर से लौट रही है. नैनी ने बताया उसका बेटा स्कूल जाने लगा है, समय कितनी तेजी से बीत रहा है. पिताजी का फोन आया, उन्हें भी सबकी याद आती है, आज वह अकेले हैं, शाम को जून उनसे पुनः बात करेंगे.

Sunday, August 21, 2016

मिट्टी का पात्र


आज बहन को उन पर लिखी कविता भेज दी, उनकी लगभग सभी गतिविधियाँ उसमें लिखी हैं, पेंटिंग वाली बात रह गयी, दोनों भाजियों ने मिट्टी के पात्र पर सुंदर चित्रकला का अभ्यास किया था. दोपहर का वक्त है, धूप चमकती हुई सी. माँ-पिताजी अभी सो रहे हैं, माँ तो शायद काफी पहले उठ चुकी होंगी, यूँ ही लेटी होंगी. उनकी मानसिक स्थिति डांवाडोल हो गयी है, वैसे देखा जाये तो किसका मन नहीं डोल रहा है, बस मात्रा का अंतर है. डाक्टर बहन ने उनसे ज्यादा प्रोटीन युक्त भोजन लेने को कहा है, किन्तु इससे भार बढ़ गया है. कल शाम वे सेंटर में रूद्र पूजा में सम्मिलित होने गये. सद्गुरू इस पूजा के द्वारा वातावरण को शांत व हिंसा मुक्त बनाना चाहते हैं. कर्मकांड थोडा बहुत रहे तो चलता है पर बहुत ज्यादा हो और उसके पीछे कोई भावना न हो तो दिखावा लगता है. जून कल कोलकाता जा रहे हैं.

आज सुबह मूसलाधार वर्षा हुई, कड़ाकेदार बिजली चमकी, बिजली चली गयी और अभी बिजली विभाग के लोग आये हैं. माँ को डर लग रहा है, कह रही हैं, बिजली काट रहे हैं, पानी न काट दें. उनके मन में कहीं गहरे में जो बिजली, पानी जाने का डर छुपा है, वह उभर कर सामने आता है आजकल. दोपहर को किताब पढ़ते-पढ़ते आँख लग गयी, स्वप्न में बड़े भाई, छोटी बुआ और छोटी ननद को देखा, सभी कैरम खेल रहे हैं. कल उन बुजुर्ग आंटी से बात हुई, उन्होंने अपने पुत्र के जन्मदिन पर बुलाया जो जून के साथ काम करते हैं, तथा उनके पारिवारिक मित्र हैं. कई दिनों से उन लोगों से भेंट नहीं हुई, कविता लिखने के लिए कुछ तो जानकारी चाहिए, या फिर कल्पना से ही शुभकामना के साथ चंद पंक्तियाँ लिखना ठीक रहेगा. जन्मदिन किसी के भी जीवन में एक खास दिन होता है. बचपन से उसको स्मरण कराया जाता है कि वह कुछ विशेष है और वह उस दिन तो राजा होता है. वैसे तो हर कोई अव्यक्त बादशाह है पर उस दिन तो सचमुच का बादशाह हो जाता है. उस दिन सागर के एक जलीय अंश ने अपना स्वतंत्र अस्तित्त्व बनाया होता है. एक लहर उठी होती है चेतना के सागर में. जून के उन सहकर्मी को फोटोग्राफी का शौक है. धैर्यपूर्वक प्रकृति के जीवों के चित्र उतारना, सौन्दर्य की परख तथा सौन्दर्य का सृजन करना, एक कलाकार की पारखी नजर, चीजों को सम्भाल कर रखना, उनकी कद्र जानना, बाजार की समझ रखना तथा माँ का ध्यान रखना, नपा-तुला भोजन. ऐसे व्यक्तित्त्व पर कविता सहज ही बन सकती है. इसी तरह जून का जन्मदिन भी अगले महीने है, उनकी ढेर सारी खूबियों पर एक कविता लिखेगी.

जून आज वापस आ रहे हैं. कल शाम फोन पर उसका नाप पूछा. नये वस्त्र (आधुनिक परिधान) ला रहे हैं जबकि वस्त्र बहुत हैं उसके पास. अभी नन्हे से बात की वह शाम को छोटी मासी के जन्मदिन में जायेगा, वह अपने ज्येष्ठ के घर में है. सुबह उससे बात की, बहन धीरे-धीरे बोल रही थी, वहाँ अभी तक सहज नहीं हो पायी है. परमात्मा का प्रेम मिले बिना कोई सहज हो भी कैसा सकता है. उसने बच्चों को कविता भी पढ़कर नहीं सुनाई, वापस घर जाकर सुनाएगी.

मृणाल ज्योति जाना है, उससे पूर्व कुछ आवश्यक कार्य करने हैं. सेक्रेटरी तथा कन्वेनर को फोन करके योगराशि लेनी है, डोनर सदस्याओं के घर जाकर उनसे भी मिलना है. शिक्षिकाओं के लिए उपहार खरीदने जाना है. पुराने वस्त्र व प्लास्टिक का सामान भी एकत्र करना है, दो परिचारिकाओं के लिए भी कुछ लेना है. वार्षिक सभा के लिए कुछ लिखकर रखना है. भविष्य में स्कूल कैसा बने इसके लिए एक सुंदर कविता लिखनी है. रक्षा बंधन भी इसी माह है. मंझला भाई शिलांग में है. बड़ा चचेरा भाई हरिद्वार में है, छोटा अंबाला में है. सभी को राखी भेजनी है. जून आज शिवसागर गये हैं, उसे समय है, प्रकृति पहले से ही सब इंतजाम कर देती है, उन्हें बस सही कदम उठाना होता है. परमात्मा हर श्वास में उनके भीतर प्रवेश कर रहा है. उसके बिना कुछ भी नहीं हो सकता, कितना सही कहा है परमात्मा के बिना एक पत्ता भी नहीं हिल सकता. वह कण-कण में हैं, वह वर्तमान में है, श्वासों में उसकी गंध उसे आने लगी है. वह नशा है, वह खुमारी है, वह बेमोल बिकता है, वह सहज ही प्राप्त है, वह तो लुटा रहा है स्वयं को, कितना अनोखा है यह सब..उसका मन अब बचा ही नहीं है. छोटी भतीजी के लिए भी एक कविता लिखनी है, परसों जिसका जन्मदिन है

Tuesday, April 19, 2016

जय जवान जय किसान


अक्तूबर का प्रथम दिवस ! शारदीय नवरात्र कल से आरम्भ हो गये हैं. शुभ तत्वों का चिन्तन, श्रवण तथा स्मरण ही इन दिनों में विशेष करना है. ऐसे तो सभी समय शुभ का चिंतन चले, राम नाम का जप करने के पीछे यही भाव है कि भीतर उस विराट से जुड़े रहें, परमात्मा से जुड़े रहें, पर ब्रह्म से जुड़े रहें ! उसकी बगिया में जैसे कमल के फूल खिले हैं, वैसे ही जरा सी समझ से भीतर क्रांति हो सकती है. कर्ता का भाव छूटना ही वह समझ है, वही अहंकार है, हर वक्त कुछ न कुछ करने की चाह ही वह कर्ताभाव है. जीवन धारा इस अहंकार के कारण ही गंदली हो गयी है. तन स्वस्थ रहे तो मन स्वस्थ रहता है, मन स्वस्थ रहे तो तन स्वस्थ रहता है, पर आत्मा स्वस्थ रहे तो दोनों स्वस्थ रहते हैं, इसलिए आत्मा को ही स्वस्थ रखना परम लक्ष्य होना चाहिए.

बापू का जन्मदिवस, ‘जय जवान जय किसान’ का नारा देने वाले शास्त्रीजी का जन्मदिवस तथा नवरात्रि का तीसरा दिन, ईद भी आज है और आज ही उसे हिंदी काव्य प्रतियोगिता में निर्णायक की हैसियत से जाना था. कई बहुत अच्छी कविताएँ सुनने को मिलीं, नये-नये विषयों पर लिखीं अच्छे-अच्छे कवियों की कविताएँ ! इस समय दोपहर के सवा दो बजे हैं. मौसम खुशगवार है, उसकी छात्रा आ गयी है. ‘अमृता’ पढ़ रही थी कल, प्रेम का अद्भुत चित्रण हुआ है पुस्तक में.

पिछले दिनों पूजा का अवकाश था, जून घर पर थे, दिन कैसे बीत गये पता ही नहीं चला. इसी महीने उन्हें घर जाना है. नन्हा हैदराबाद में है, उससे उसने कहा कि अपने अनुभव लिखे जो उसे चार वर्षों में हुए हैं. जो उसने समय-समय पर उन्हें बताये हैं, उसे याद हैं. उसने उनकी एक सूची बनायी.
आज सभी भाइयों को भाईदूज का टीका भी भेज रही है. किताब का काम भी आगे बढ़ रहा है. कल उसके दायें हाथ में दर्द था, लिखना मुश्किल था. सुबह उठी तो दर्द गायब था. लेकिन इस एक दिन के दर्द ने सिखा दिया कि उनका दाँया हाथ कितना महत्वपूर्ण है, जितना हो सके इसका सदुपयोग उन्हें करना चाहिए. लेडीज क्लब की पत्रिका भी निकलने वाली है, जिसके लिए उसे कविताएँ भेजनी हैं. कल दीदी को भी विवाह की वर्षगांठ पर एक कविता भेजी, पता नहीं उन्हें कैसी लगेगी.

दस बजे हैं, अभी-अभी बिजली चली गयी है. सन्नाटा हो गया है. मन में हर पल कोई न कोई चाह उठती रहती है. मन का नाम ही है चाह, पर यह चाह शुभ हो, मंगलमय हो, दूसरों का हित करने वाली हो, स्वार्थ से भरी न हो, तब चाह उठने पर भी मन मुक्त ही रहता है. वह कम्प्यूटर पर लिख रही थी. आज एक नई फ़ाइल बनाई है, nature जिसमें प्रकृति पर पहले लिखीं कविताएँ टाइप करके डालेगी. सुबह जून ने अपना वजन देखा, बढ़ गया है, दो केजी उसका भी बढ़ा है. पिछले कुछ महीनों से वे ज्यादा जंक फ़ूड खाने लगे हैं, आज से सचेत रहेंगे. माँ का भार कम हो गया है, उनका भोजन बढ़ाना होगा. अभी-अभी कितना जोर का धमाका हुआ शायद कोई प्लेन आकाश में उड़ रहा था. जेट फाइटर या ऐसा ही कुछ. आज भी उठने से पूर्व चाँद दिखा, पूर्णिमा का चाँद, लेकिन जैसे ही विचार उठा यह चाँद है, वह गायब हो गया. एक सखी से बात हुई, उसके बांये हाथ की छोटी अंगुली में फ्रैक्चर हो गया है, प्लास्टर लगा है, तीन हफ्ते बाद खुलेगा. 

Wednesday, December 16, 2015

बापू का सत्याग्रह


एक में होना ही स्वर्ग में होना है, दो बनाना ही नर्क में होना है. जब वे नहीं बचते तभी परमात्मा होता है, जब तक वे हैं, तब तक परमात्मा नहीं ! नहीं होंगे दोनों एक साथ कभी भी ! वे तो न जाने कितने जन्मों में होते आये हैं, परमात्मा कभी-कभी सद्गुरू की कृपा से ही प्रकट होता है. उनका मिटना भी उसी की कृपा से सम्भव है. देखने की कला आए तो संसार के भीतर ही परमात्मा मिलेगा. जो निकट है वह उन्हें नहीं दीखता, वे भगवान को एल पल में ही भुला देते हैं, उसे भुलाने में एक पल भी नहीं लगता और उसे पाने में भी एक पल ही लगता है. लेकिन भुलाने के पल तो सदा ही सामने रहते हैं, मिलन का वह पल दुर्लभ है, वह कृपा से ही मिलता है. कृपा भी उसी को मिलती है जो सजग है. परमात्मा को सजग हुए बिना कैसे पा सकते हैं, जो चैतन्य है उसे चेतन ही जान सकता है ! वे जिस क्षण पूर्ण सजग हैं मानो परमात्मा के साथ ही हैं. इसलिए कहते हैं इस राह पर चलना तलवार की धार पर चलने के समान है, जहाँ ध्यान हटा वहाँ घाव हुआ, उनके मन को जो सता जाता है वह हर विकार तलवार की धार ही तो है ! उसने पिछले दिनों ये सुंदर बातें प्रवचन में सुनी.

आज बहुत दिनों बाद बिजली इतने घंटों से गायब है, आज बहुत दिनों के बाद स्वप्न में अपने भीतर ऊर्जा को ऊपर चढ़ते महसूस किया, स्वयं को हवा में उड़ते महसूस किया. कितना अद्भुत स्वप्न था. आज बहुत दिनों बाद सुबह निर्धारित नाश्ता भी नहीं बनाया, जब समय हुआ तब जो मन में आया बना दिया. जीवन एक बंधे-बंधाये ढर्रे से हटे तो कभी-कभी हटने देना चाहिए. वे चाहते हैं कि जीवन एक तयशुदा मार्ग पर चलता रहे, कि वे कभी भी मुश्किल में न पड़ें पर मन का स्वभाव ही ऐसा है वह परिवर्तन चाहता है. चैतन्य भी तो विविधता को पसंद करता है. कितने-कितने रूपों में वह प्रकट हो रहा है, पौधों के कितने प्रकार, जीवों के कितने प्रकार, नये-नये बन रहे हैं, पुराने नष्ट हो रहे हैं. वह चैतन्य जब माया से आविष्ट होता है तो अनेक नामरूप धर लेता है, वैसे ही आत्मा जब मन के रूप में प्रकट होती है तो नये-नये विचार गढ़ती रहती है. नई-नई कल्पनाएँ और नये-नये भाव हर पल सब कुछ नया है, न हो तो जीवन कितना उबाऊ हो जाये. हर इन्सान हर पल नया हो रहा है, हर क्षण प्रकृति बदल रही है, तभी तो वह सूरज वही चाँद युगों-युगों से हर दिन अपनी और खींचता है !

आज ‘गाँधी जयंती’ है, आज का दिन ‘विश्व अहिंसा दिवस’ के रूप में मनाया जा रहा है. आज के दिन वे एक छोटा सा कदम अपने वातावरण को शुद्ध करने में ले सकते हैं कि जो भी कूड़ा उनके घरों से निकलता है वह अलग-अलग करके फेंका जाये, जो खाद बन सकता है, उसे अलग रखें. प्लास्टिक का इस्तेमाल कम से कम करें. उन्हें गांधीजी के बताये रास्ते पर चलना है तो मनसा, वाचा, कर्मणा एक होना होगा. भीतर जो भाव हैं वही वाणी से व्यक्त हों तथा वही कर्मों में बदलें. वे अपने आदर्शों तथा व्यवहार का अंतर कम करते-करते बिलकुल खत्म ही कर दें. उनका चिन्तन सत्य और अहिंसा को जीवन के हर क्षेत्र में लेन के लिए अग्रसर हो. टीवी पर गांधीजी की पुत्री तारा गाँधी का गाँधी जयंती पर वक्तव्य आ रहा है. विश्वशांति के लिए गांधीजी के जन्मदिन पर होने वाले कार्यक्रम बहुत लाभप्रद होंगे. ‘सत्याग्रह’ की शताब्दी भी इस वर्ष मनायी जा रही है. वे अपने भीतर शांति का साम्राज्य कायम करें तो बाहर उनके चारों ओर भी शांति का साम्राज्य बनने लगेगा. उसे ऐसा कोई भी कार्य नहीं करना है जिससे भीतर की या बाहर की शांति भंग हो !

जून आज पुनः गोहाटी जा रहे हैं, उसे श्रवण की छूट है. चैतन्य अदृश्य है, वह दृश्य का सहारा लेकर टिका है. जैसे संगीत वीणा के माध्यम से प्रकट होता है, आत्मा की किरण देह के माध्यम से प्रकट होती है. देह का इतना ही मूल्य है कि वह उस किरण के सहारे परमात्मा के सूरज से मिला दे. आत्मा भीतर है मन कहीं नहीं, मन को खोजने जाएँ तो कहीं मिलता नहीं, वहाँ शून्य के सिवाय कुछ भी नहीं, ध्यान में मन खो जाता है, आत्मा प्रकट हो जाती है, जितनी देर मन नहीं है, वे सहज रहेंगे, परमात्मा ही उनके द्वारा प्रकट हो रहा होगा !


Monday, September 7, 2015

गुजरात की बाढ़


सहनशीलता, धैर्य, मनोबल, संकल्प बल तथा दृढ़ इच्छा शक्ति जिसके पास हो वही अध्यात्म के पथ पर चल सकता है. मौत का भी डर जब मन में न रहे, कोई भी कष्ट आए, सम रहकर उसे सहना, यह जब तक जीवन में न हो तब तक कोई जीवन से दूर ही रह जाता है. आजकल उसके मन की दशा कुछ ऐसी ही है. सत्य का सामना करने की हिम्मत वह अपने भीतर नहीं जुटा पायी. यात्रा पर जाने से पहले एक सखी ने उसे एक खत पोस्ट करने को दिया था, वह भूल गयी और यात्रा के अंत में उसे पोस्ट किया, पर जब उसने पूछा तो यह नहीं बताया कि पोस्ट करने में देरी हो गयी थी. उसे बुरा लगेगा यही सोचकर नहीं बताया पर अब लगता है कि वह उसके बारे में अपनी राय को बदल देगी इस डर से. पर यह सच है कि झूठ के पाँव नहीं होते. एक बोझ जो उसने व्यर्थ ही चढ़ाया है. नीरू माँ के अनुसार उसे प्रतिक्रमण करना होगा और इस बोझ को सिर से उतार फेंकना होगा. अपने आस-पास की दुनिया की वास्तविकता को भी उसने नहीं देखा. गुजरात में बाढ़ आई है, बड़ी ननद से उसने बात भी नहीं की. वह आत्मकेंद्रित होती जा रही थी, जिस क्षण यह भास हुआ उसी क्षण से स्थिति बदल गयी है. कल वे एक मित्र के यहाँ गये, गुजरात में बाढ़ आई है, वहाँ किसी ने एक बार कहा तो उसे इसकी गम्भीरता का अंदाजा ही नहीं था. आज सुबह छोटी ननद, दीदी व बड़े भाई से बात हुई. दो सखियों से बात हुई, एक ने कृष्ण के १०८ नामों के बारे में पूछा तथा दूसरी ने गुरूजी द्वारा कही यह बात बताई कि १५ अगस्त तक का समय भारी है, उन सभी को ध्यान द्वारा इसे टालने का इसकी भयानकता को कम करने का कार्य करना चाहिए. वह ईश्वर को केवल अपने भीतर ही पाना चाहती थी पर वह तो कण-कण में बिखरा है, वह तो हर एक जड़-चेतन में है, वही तो माँ के प्यार में है और वही प्रिय के प्रेम में, वही वात्सल्य में है. ईश्वर कहाँ नहीं है, बाढ़ के पानी में फंसे लोगों में भी वही है और बाढ़ के पानी में भी वही है. उसका कण-कण इस सृष्टि के कल्याण की कामना करता है.

अभी-अभी बिजली थी, अभी-अभी चली गयी. ऐसे ही एक दिन अभी-अभी जीवन होगा, अभी-अभी नहीं होगा. एक पल में मृत्यु उन्हें अपना ग्रास बना लेगी अथवा तो एक पल में वे शरीर के बंधन से मुक्त हो जायेंगे. पीछे की खिड़की से हवा का एक शीतल झोंका पीठ को सहला गया, पंखा चलते रहने पर इसका आभास भी नहीं हो पाता, ऐसे ही जीवन के न रहने पर आत्मा तो अपने आप में रहेगी ही, परमात्मा के प्रकाश से परिपूर्ण ! कल एक पुस्तक पढ़ी, ध्यान के विभिन्न गुर बताये हैं उसमें, विपश्यना ध्यान के, जिसमें केवल बाहर जाती हुई साँस को देखना है. एक नये नजरिये से लिखी गई पुस्तक है. आज मौसम गर्म है, उसकी आँखें मुंद रही हैं, तमस का प्रभाव है.

भाव की संवेदना बहुत दूर तक जाती है, जहाँ मन नहीं पहुंचता, बुद्धि नहीं पहुंचती वहाँ भाव के सूक्ष्म कण पहुंच जाते हैं. ध्यान का दर्शन केवल मन को स्थिर करना ही नहीं बल्कि भाव शुद्धि है. अभी कुछ देर पूर्व उससे जन्माष्टमी का दिन जब एक बार पुनः पूछा सासु माँ ने तो उसका जवाब शांत भाव दिया गया नहीं था. छोटी ननद का फोन आया. पिता जी की तबियत ठीक नहीं है, उसने कहा, वह अपना ध्यान भी नहीं रखते. वह कह रही थी कि दोनों को साथ-साथ रहना चाहिये. देखें  भविष्य में क्या लिखा है. इतना तो सही है कि वृद्धावस्था में भी पति-पत्नी को एक-दूसरे का साथ तो चाहिये ही.  

कल रात तेज वर्षा हुई, आँधी-तूफान भी. मेघ अपने पूरे बल के साथ गरजते रहे. एक-दूसरे से टकराते रहे, रह-रह कर बिजली चमकती रही. वह सब कुछ अनुभव कर रही थी पर इन सबसे परे भी थी. उसके मन में तब आत्मा का गीत गूँज रहा था. मन जैसे यहाँ का न होकर किसी और लोक का था. वह निद्रा थी या तंद्रा थी या शुद्ध ज्ञान का नशा था, पर बिजली जाने से जो कमरे में गर्मी हो गयी थी, उसका भी कोई प्रभाव नहीं पड़ रहा था. जून का आज जन्मदिन है, कल उसने उनके लिए एक कविता लिखी. आजकल वह बहुत खुश रहते हैं. उन्हें भी उस प्रेम का अनुभव हो रहा है, जिसकी बात वह उनसे करती थी. अभेद प्रेम का जहाँ दो न रहें एक हो जाएँ, वहाँ कोई अहंकार नहीं बचता और तभी शुद्ध साहचर्य का अनुभव होता है, पर प्रेम की यह धारा इतनी संकीर्ण तो नहीं होनी चाहिए, यह तो सभी की ओर अबाध गति से बहनी चाहिये. उसके मन की यह धारा यूँ तो सभी ओर बहती है पर एक तरफ जाकर थोड़ी अवरुद्ध हो जाती है. एक सखी के प्रति उसके मन में एक द्वंद्व बना ही रहता है. उसने प्रार्थना की, सद्गुरु ही उसे इस धर्म संकट से बचा सकते हैं. पर सद्गुरु तो यही कह रहे हैं, जो बाधा उसने स्वयं खड़ी की है उसे कोई दूसरा चाहकर भी नहीं दूर कर सकता, ईश्वर भी नहीं. वह उसकी आजादी में व्यवधान डालना नहीं चाहता. जिस दिन उसे स्वयं अहसास होगा कि इस द्वंद्व के चलते उसकी ऊर्जा का अपव्यय हो रहा है उस दिन स्वयं ही यह छूट जायेगा, उससे पहले नहीं और उसके बाद भी नहीं. आग में हाथ पड़ जाये तो स्वयं ही निकालने की सुध जगती है. 

Wednesday, June 17, 2015

बोस्टन की बर्फबारी



आज बहुत दिनों के बाद डायरी का चिर-परिचित पृष्ठ उसके सम्मुख है. मौसम ठंडा है बदली भरा. जून दो दिन की छुट्टी के बाद आज दफ्तर गये हैं. उन्हें घर आये तीन-चार दिन हो गये हैं, अभी तक पूर्व दिनचर्या आरम्भ नहीं हो पायी है. पिछले महीने के मध्य में वे यात्रा पर निकले थे, एक महीने बाद वापस आये तो उसका गला ठीक नहीं था, जो अभी तक भी पूरा ठीक नहीं है. यहाँ इतने दिनों के बाद आकर सब कुछ बदला-बदला सा लग रहा है. सम्भवतः सब कुछ वही है उनका मन ही बदल गया है. पहले सा नहीं रहा. ह्यूस्टन से वे तीन दिनों के लिए बोस्टन गये थे, जहाँ जून के मित्र और उसकी पत्नी ने स्वागत किया. मौसम बहुत ठंडा था, जितने समय वे वहाँ रहे, बर्फ गिरती रही, पहली बार बर्फ से इतने निकट से आमना-सामना हुआ था, वे मंत्रमुग्ध से खिड़की से देखते रहते, बाहर भी गये तो ढेर सारे वस्त्र पहन कर तथा उन लोगों के दिए जूते पहन कर. बोस्टन से वे लन्दन गये जहाँ तीन दिनों में मुख्य-मुख्य स्थान देखे. वहाँ भी ठंड बहुत ज्यादा थी पर बर्फ नहीं गिर रही थी. लन्दन से दिल्ली पहुंचे तो सब कुछ कितना अलग लग रहा था, वहाँ से एक दिन के लिए पिताजी से मिलने घर गये और फिर वापस असम. नन्हे की परीक्षाओं में बहुत कम समय रह गया है. अगले महीने उसके इम्तहान है. अभी-अभी उसे देखा तो पढ़ते-पढ़ते आँखें बंद थीं. जब उसने कहा, सो जाये, तो जग गया, और सीधे होकर बैठ गया.
आज बहुत दिनों बाद गुरु माँ को सुना, कह रही थीं कि बिजली की तार पर जैसे प्लास्टिक की परत होती है और फिर कपड़े की, छूने पर कुछ भी महसूस नहीं होता इसी प्रकार मन पर कितनी परतें चढ़ी हैं तभी तो ईश्वर का नाम लेते रहने पर भी कुछ नहीं होता. वे उस प्रभु को दूर-दूर से ही याद करते हैं, पास आने से डरते हैं क्यों कि ऐसा करने पर अभिमान को तज देना होगा.

एक लम्बे अन्तराल के बाद आज डायरी खोली है. आज सुबह वह हिंदी पुस्तकालय गयी थी. पिछले महीने उसको सर्दी लगी थी और अब एक-एक करके घर में सभी को जुकाम हो रहा है. मौसम हर दिन नये रूप में आता है, कभी तेज-गर्मी तो कभी बरसात के बाद की ठंड. आज सुबह से ही शीतल हवा चल रही है. वह हजारी प्रसाद द्विवेदी तथा डा. राधाकृष्णन की पुस्तकें लायी है. अध्यात्म के अतिरिक्त और कोई विषय नहीं सुहाता, इसी जन्म में मुक्त होना चाहती है. जीवन दुखों का घर है, मन को कितने-कितने विकार तपाते हैं. तन को रोगादि, तथा जरा व मृत्यु तो हैं ही. वह दुखों से भागकर ही मुक्ति चाहती है, ऐसा भी नहीं है, वह उस अवस्था का अनुभव करना चाहती है जो शब्दातीत है, जहाँ सद्गुरु पहुंचे हैं. उसकी साधना में कभी-कभी विघ्न पड़ते हैं पर जैसे सहज भाव से चलते हुए नदी अपनी मंजिल पा लेती है वैसे ही उसकी साधना भी फलवती होगी. सद्गुरु का ज्ञान उसका सबसे बड़ा सहारा है, ईश्वर का प्रेम भी उसमें मिल जाता है और मन का विश्वास तथा हृदय की श्रद्धा और आस्था भी उसमें सम्मिलित है, उसे पथ दिखाने के लिए इतने साधन तो हैं फिर उसके परिजन जो सदा उसका सहयोग करते हैं, वह अपने ज्ञान की परीक्षा परिवार में ही कर सकती है. हृदय कितना निर्मल हुआ इसकी परख व्यवहार से ही होती है.

Friday, April 24, 2015

मोमबत्ती का प्रकाश


जीव चेतन स्वरूप हैं पर जड़ की ओर उनका झुकाव है. जब वे अपनी चेतना को परम चेतना की ओर लगाते हैं तो सारे कार्य कर्मयोग बन जाते हैं, अन्यथा कर्म भी जड़वत प्रतीत होंगे. इस क्षण उसका हृदय पूर्णतया संतुष्ट है, कुछ भी पाने की न तो आकांक्षा है और न ही कुछ खो जाने की चिंता है. उसे न किसी से भय है न ही किसी को उससे भय मिले ऐसी कामना है. सभी की मित्रता उसे मिले और इस सृष्टि के सभी स्थावर-जंगम प्राणी उसकी मित्रता पायें ! जहाँ कहीं भी शुभ हो उसकी दृष्टि उसे ही देखे, अन्यों के दोषों पर नजर न जाये. अगर जाये भी तो हृदय में कटुता का उदय न हो, उन्हें उनके सम्पूर्ण गुणों व दोषों सहित वह अपना ले. कभी भी ऐसा न हो कि अपने लक्ष्य से विचलित हो जाये ! इस समय शाम के छह बजने को हैं, नन्हा कोचिंग गया है. जून पिताजी को लेकर सुबह ही डिब्रूगढ़ गये थे, सात बजे तक आएंगे. मौसम बादलों भरा है. कल शाम को जो आंधी आई थी, उसके बाद से वर्षा लगातार ही हो रही है. कल बिजली चली गयी थी और रात्रि भोजन मोमबत्ती के प्रकाश में किया. अभी कुछ देर पूर्व ही बिजली आई है. बड़े भाई का फोन आया अभी कुछ देर पहले.

टीवी पर ‘जागरण’ आ रहा है, गुरूमाँ कह रही हैं, पानी जैसे तापमान के बदलने पर अपनी अवस्था बदलता रहता है वैसे ही मन बदलता रहता है. लेकिन इन सबको देखने वाला निर्विकार आत्मा है जो अचल है. उसे लगता है जब कोई अध्यात्म के मार्ग पर चल पड़ता है तो हानि-लाभ की चिंता से मुक्त हो जाता है. कर्म सहज होते हैं. कोई कामना पूर्ति उनका लक्ष्य नहीं होती. अंतर में समता जगती है. प्रेम की भावना का उदय होता है, प्रेम ही जीवन को रसमय करता है. आज वर्षा थमी है. कल शाम उसने लिखना शुरू किया था कि जून आ गये, डाक्टर ने कहा है आपरेशन करना पड़ेगा.

आज उसे लग रहा है, उनकी कथनी और करनी में कितना अंतर होता है. किसी निकट के सम्बन्धी ने उनसे मदद मांगी और उन्होंने खुले दिल से फौरन मदद करने की बजाय सोच-विचार शुरू किया. मन जो सदा संदेह करता है, कैसे-कैसे तर्क देने लगा. मन के लोभ का कोई अंत नहीं है. उसने जून को सही सलाह नहीं दी या उनकी स्वयं की भी यही इच्छा रही होगी और उसे समर्थन मिल गया. वे धर्म की सिर्फ ऊपरी सतह तक ही पहुंचे हैं, अभी मन विशाल नहीं हुआ है. गुरू से प्रेम करने वाले भी यदि मन छोटा रखें तो इसका अर्थ है कि प्रेम अभी हुआ ही नहीं, स्वार्थ से ऊपर अभी उठे ही नहीं, अविश्वास दिल से निकला ही नहीं, अविश्वास भी अपने ही जन के प्रति..अभी बहुत दूर जाना है ! स्वय को यदि कष्ट होता हो तो भी यदि कोई कुछ मांगता है तो मुँह से ‘ना’ न निकले, ईश्वर ऐसा हृदय उन्हें दे. ईश्वर की प्रसन्नता भी इसी में है कि उसके भक्त उसके मार्ग पर चलें. ईश्वर उन्हें हर क्षण कुछ न कुछ प्रदान करता है, अनवरत उसकी कृपा का प्रसाद उन्हें मिलता है ..तो वे क्यों कृपण बनें ! भक्त तो विश्वास की ज्योति की लौ के सहारे-सहारे अंदर-बाहर दोनों ही जगह उजाला पाता है.

आज सुबह ध्यान में एक अनोखी अनुभूति हुई, सही होगा यह कहना कि ईश्वर ने अपनी उपस्थिति का अहसास कराया ! मन कृतज्ञता से भर उठा था...और उस क्षण की स्मृति चित्त में अंकित हो गयी है. मौसम भी आज सुहावना है. विश्वास गहरा हो तो कोई निश्चिन्त होकर जीवन बिताता है, एक-एक क्षण का आनंद लेता है. भक्ति के कितने ही कीर्तिमान संतों व भक्तों ने बनाये हैं और कुछ हो सकने की सम्भावना उनके भीतर भी है. उसके लिए कुछ होने का अर्थ है..उसका होना ! ईश्वर की सुखद स्मृति में मन को सदा लगाये रखना..इन्द्रियों, मन व वाणी पर नियन्त्रण ही उसे इस पथ पर आगे ले जायेगा ! देह रूपी यंत्र को स्वस्थ रखना उनका कर्त्तव्य है जिससे आत्मा स्वयं को प्रकाशित कर सके. आत्मा को साधन रूपी मन तथा तन मिले हैं, जिन्हें सजग रहकर  स्वस्थ रखना है यह करने का मार्ग भी आत्मा ही सिखाता है.








Friday, July 18, 2014

तुलसी और सूर



आज कितने सुंदर वचन उसने सुने, “बुद्धि रूपी मछली जब आत्मा रूपी सागर से बिछड़ कर मन व इन्द्रियों के सीमित जल में आ जाती है तो छटपटाने लगती है” सागर की मछली को सागर के बिना चैन आ ही नहीं सकता. जीव का सम्बन्ध ईश्वर से वैसा ही है जैसा बूंद का सागर से, उसे याद आया बचपन में एक कविता पढ़ी थी, एक बूंद निकल पड़ती है यात्रा पर और मरुथल में गिर कर खो जाती है, कभी कोई बूंद नदी में गिर जाये तो पुनः सागर से मिल सकती है. आज भी धूप बहुत तेज है, सुबह के आठ बजे ही दोपहर का भास हो रहा है. कल जून ने उन दिनों को याद किया जब वे यहाँ नये-नये आये थे, वे कुछ देर के लिए पुराने वक्तों में लौट गये और अच्छा लगा सारी बातों को मन के पट पर फिर से घटित होते हुए देखना. कल एक सखी परिवार सहित यात्रा पर जा रही थी पर ‘भारत बंद’ के कारण ट्रेन  नहीं चली सो स्टेशन से वापस लौट आयी, शाम को उन्हें भोजन के लिए बुलाया, इस बंद से सबका नुकसान ही नुकसान होता है कोई लाभ तो नजर नहीं आता. अगले हफ्ते उन्हें भी जाना है, यात्रा से पहले जो आशंका पहले होती थी अब बिलकुल नहीं होती. कल उसके पैर में दर्द हुआ था, पर उसने स्वयं से कहा, दुःख-दर्द तो शरीर को है, वह तो इससे अलग है, और मुस्करा दी. थोड़ी ही देर में दर्द महसूस होना ही बंद हो गया. भगवद् कथा का असर लगता है, हो रहा है, ईश्वर हर क्षण उसके साथ है. जून को आज फील्ड जाना है, उसे लंच अकेले ही करना पड़ेगा.   

परसों सुबह ‘जागरण’ नहीं सुन पायी, ‘केबल’ नहीं आ रहा था, कल सुना पर इतवार की सुबह बेहद व्यस्त होती है, डायरी लिखने का समय नहीं मिलता. आज भी धूप तेज है, मौसम का ताप प्रकृति कैसे चुपचाप सह लेती है, मानव ही हैं जो शिकायत करते रहते हैं. गीता में सुख-दुःख, मान-अपमान के साथ-साथ ग्रीष्म-शीत का जिक्र भी किया गया है. मौसम भी आया है तो जायेगा ही. आज गोयनका जी ने धर्म की परिभाषा बताते हुए कहा, “जिसे धारण किया जा सके, जो कर्म से जाना जाये न कि कर्मकांडों से, वही धर्म है”. बाबाजी ने भागवद की कई कहानियाँ सुनायीं, सुनकर भागवद् का अध्ययन करने की प्रेरणा होती है. नन्हे का स्कूल गर्मी के अवकाश के लिए बंद हो चुका है. वह केक बनाने के लिए कह रहा है, बच्चों की फरमाइश भी बच्चों जैसी ही होती हैं.
“नैतिक मूल्यों का ह्रास हो रहा है इससे ज्यादा चिंता की बात यह है कि नैतिकता के प्रति आस्था ही खत्म हो रही है. यदि चेतना का स्तर ऊंचा हो जाये तो मूल्यों की स्थापन अपने आप हो जाएगी.” आज किन्हीं जैन मुनि ने अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा. आज साढ़े सात बजे बिजली गुल हो गयी, सो बाबाजी से आज भेंट नहीं हुई. कल रात भी तीन बजे के लगभग बिजली गायब हुई थी कुछ देर के लिए. काफी देर तक नींद नहीं आयी, फिर आयी भी तो स्वप्नों भरी. गहरी शांत नींद उसे एसी में सोने से अक्सर नहीं आती, एक तो शोर दूसरे ताजी हवा नहीं आती, आज इस क्षण कैसी शीतल मंद बयार बह रही है.

आज भी कल सुबह की तरह मौसम शीतल है, पवन चेहरे को छूकर जाती है तो ठंडक का अहसास होता है. कल तक यदि ऐसा ही रहे तो उनकी यात्रा की सुखद शुरुआत होगी वरना तो...झुलसा देने वाली धूप में पसीना पोंछते वे रेलवे स्टेशन पहुंचेंगे. अभी बाबाजी आने वाले हैं, अब संभवतः उनसे जून के दूसरे सप्ताह में ही मिलना हो, सो आज की पूरी बात वह ध्यान से सुनेगी. आज उन्होंने नारद की वह कथा सुनाई जिसमें उनका अहंकार तोड़ने के लिए भगवान विष्णु ने उन्हें वानर का चेहरा प्रदान किया था. साथ ही उन्होंने मन, बुद्धि आदि के विकारों को अपना न मानकर उन्हें दूर करने की बात कही, जब कोई उनसे एकाकार हो जाता है तो इलाज मुश्किल हो जाता है जैसे कोई डाक्टर या वकील अपना केस खुद नहीं देखते. ईश्वर से आग्रह करते हुए कि हृदय तो तुम्हारा घर है और तुम्हारे रहते हुए इसमें विकार रूपी चोर घुस जाएँ तो इसमें तुम्हारा भी अपयश होगा. तुलसी और सूर की भांति, “अब लौं नसानी अब न नसैहों”, अपने को शुद्ध करते जाना है. ईश्वर का नाम स्मरण आते ही मन कैसी करुणा से भर जाता है.

Wednesday, April 23, 2014

हार्डी बॉयज के कारनामे


आज आसू ने ‘असम बंद’ का आह्वान किया है सो जून का दफ्तर बंद है और नन्हे का स्कूल भी. सुबह वे पौने छह बजे उठे, उसने खिड़की से झाँका, मौसम आज भी अच्छा है, न तेज धूप न गर्मी और न ही लगातार वर्षा से कीचड़, बादल बने हुए हैं हल्के-हल्के. कल उसने छोटी बहन को एक पत्र लिखा, एक ससुराल में. वह यह लिख ही रही थी कि बाहर वर्षा की झड़ी लग ही गयी. नन्हा अभी-अभी शिकायत लेकर आया कि पापा ने लाइब्रेरियन सर से कह दिया, उसे एजुकेशनल बुक्स भी दिया करे तो उन्होंने story books देना बंद ही कर दिया है. उसे hardy boys पढ़ने का मन है पर वह यह नहीं जानता कि किसी के मन की इच्छा हमेशा पूरी नहीं सकती और जो सच्चाई है उसे स्वीकार लेना चाहिए. आज नैनी बहुत गुस्से में थी, उसे अपनी बेटी के पैर में चोट लगने से इतना दुःख पहुंचा है कि अपनी सोचने-समझने की ताकत ही भूल गयी, आये दिन छुट्टी मांगने पर जब उसको डांट दिया तो काम छोड़ने पर ही उतारू हो गयी, ये लोग भले पैसे-पैसे को मुहताज रहें पर किसी की बात नहीं सुन सकते, इसे स्वाभिमान नहीं मूर्खता ही कहेंगे. कल उसने सिन्धी कढ़ाई का एक और नमूना सीखा, पड़ोसिन की वजह से उसका ज्ञान भी बढ़ रहा है. कल मेहमानों के लिए उसने बड़े मन से भोजन बनाया था. जून ने बहुत दिनों बाद उसके बनाये भोजन की तारीफ़ की.

उसने पढ़ा, “We all want a state of permanency. We want certain desires to last for ever, we want pleasure to have no end. Which means that we are seeking a lasting, continuous life in the stagnant pool. We refuse to accept life as it is in fact.”

जिंदगी हसीन तोहफों से भरी हुई है, अब कल की बात लें, दोपहर को तेज बिजली कडकी, इतनी तेज की वे सभी काँप गये पर उसने गिरकर भी  किसी का विशेष नुकसान नहीं किया, बस उनके रिसीवर व स्पाइक बस्टर का फ्यूज उड़ गया, पास में एक पेड़ के दो टुकड़े हो गये, गैस पाइप से रिसती गैस में आग लगी जो बड़ी आसानी से बुझा दी गयी. वर्षा अभी भी थमी नहीं है. टीवी पर खबरें आ रही हैं, काश्मीर में तरक्की का काम जोर-शोर से चल रहा है. प्रधान मंत्री ने फिर कहा है, Kashmir भारत का अटूट अंग है. उसने सोचा, एक न एक दिन थक हार कर पाकिस्तान आतंकवाद का रास्ता छोड़ ही देगा, तब तक मुश्किलें सहनी होंगी, अपने देश की अखंडता बनाये रखने के लिए कितने लोगों ने अपनी जानें दी हैं और कितनों को अभी और देनी हैं !

आज तेज धूप निकली है, कई हफ्तों की लगातार वर्षा के बाद सभी ने धूप का स्वागत बाहें फैला कर किया होगा, बाढ़ में फंसे लोगों ने भी और सीलन भरे घरों के वासियों ने भी. पेड़ों, पत्तियों, लॉन की घास सभी को तो पानी के साथ साथ धूप भी चाहिए. जून भी बहुत खुश हैं. कल दोपहर लगभग तीन बजे ( तीन बजने से पांच मिनट पूर्व) उनकी नई मारुती ८०० p red यानि मैरून रंग की गाड़ी आ गयी. वह बहुत देर तक उसकी सफाई में लगे रहे. ३००किमि के लम्बे सफर से कीचड़ मिट्टी से भरे रास्तों (सड़क कहना तो नाइन्साफी होगी) से गुजरकर सही सलामत ड्राइवर इशाक आले उसे लाया था, ढेर सारी मिट्टी उसके पहियों और बॉडी पर लगी थी. शाम को वे उसमें सवार होकर मित्रों से मिलने गये, नन्हा अपने मित्र की जन्मदिन की पार्टी में गया था.


आज इतवार की सुबह उठते ही जून फिर नई कार को सजाने में जुट गये, कारपेट, रबर मैट्स आदि लगाये फिर गैराज में जाकर मड गार्ड भी, उन्होंने कहा, कल तिनसुकिया जाकर नई गाड़ी का रजिस्ट्रेशन कराना होगा, वे उसके लिए सूट का प्लेन कपड़ा भी लायेंगे जिस पर उसका सिन्धी कढ़ाई करने व शीशे लगाने का विचार है.  उनका फोन अभी तक ठीक नहीं हुआ है, सो घर पर खबर नहीं दे पाए हैं. बहुत दिनों बाद खाने में आज दाल-चावल खाए, बचपन की याद ताजा हो आई, 

Thursday, March 27, 2014

गोलगप्पों वाली चाट


रात को बिजली की कड़क और बादलों की गरज से जब नींद खुली तो पाया, मन अगले दिन के बारे में सोच रहा है, जन्मदिन के बारे में. सुबह-सुबह नन्हे ने चॉकलेट और जून ने सुंदर सा ग्रीटिंग कार्ड देकर शुभकामना की. फिर सखियों के फोन आए और दीदी का भी. मौसम सुहावना हो गया है. शाम को गोलगप्पे और मैंगो शेक के साथ चने और आलू की चाट यकीनन अच्छी रहेगी. आज वह बहुत अच्छा महसूस कर रही है, फूल सा हल्का और रुई के फाहों सा नर्म ! इस दिन में कोई बात होती जरूर है आम दिनों से काफी अलग, ख़ुशी जैसे छलकी जाती है. आज कोई भी बात उसे उदास नहीं कर पायेगी, टकराकर वापस लौट जाएगी यदि प्रतिकूल हुई तो और अनुकूल हुई तो उस आवरण को और घना कर देगी जो प्रियजनों ने उसके चारों ओर बना लिया है.

पड़ोसिन ने अपनी बहनों के लिए खरीदी असम सिल्क की साड़ियाँ दिखने के लिए बुलाया है. वह  भी पड़ोसिन से एक उड़िया सांबलपुरी साड़ी मंगा रही है बरसात फिर शुरू हो गयी है, पर वह छाता लेकर जा सकती है. सुबह बड़ी भाभी से बात करने का मन था फोन देखा तो खराब था. इस बार किसी भी भाई से जन्मदिन  पर बात नहीं हो सकी.

टीवी पर वित्त मंत्री यशवंत सिन्हा बजट प्रस्तुत कर रहे हैं. Only 37% of our land is under direct irrigation. Water, houses, agriculture, roads, foreign investment, provident fund, small scale industries, education all have already been mentioned in his speech. 50% increase is done in education budget. It is a taxpayer friendly and gives proper attention to agriculture. Prices of some articles have increased but price of some have been reduced.

आज बड़ी बहन का जन्मदिन है, उनके साथ-साथ भाई भाभी से भी बात हुई, उस दिन की पार्टी भी अच्छी रही थी, सखी ने गोलगप्पों की तारीफ की, उसे लगा बात सिर्फ भावना की है, जहाँ अपनेपन की शुद्ध प्रेममयी भावना होगी तो वहीं सहजता व सरलता संबंधों में आएगी. कल जून और उसने साथ साथ बजट सुना, कुल मिलाकर बजट अच्छा रहा है. जून उसे मौका ही नहीं देते कि वस्तुओं के दामों में अंतर जान सके, सामान खत्म हो उसके पहले ही ले आते हैं, जैसा उन्होंने अपने घर में पिता को बचपन से करते देखा है. वैसे अब किसी भी परिस्थिति में वे एक-दूसरे के साथ हैं, भरोसा कर सकती है वह पूरी तरह उन पर और अब वह पहले की तरह चुप्पा भी नहीं रहते, उसकी बातें भी सुनते हैं और कभी कोई बात चर्चा के लायक हो चर्चा भी करते हैं, स्वस्थ चर्चा. नन्हा आजकल थका-थका सा रहता है, शायद कम्प्यूटर के सामने देर तक बैठने के कारण ऐसा हो रहा हो, पर उसे समझाना आसान नहीं लगता क्योंकि कम्प्यूटर के सामने बैठना, उस पर खेल खेलना उसे बहुत पसंद है.

दोपहर को DCH का तीसरा पेपर हल करने बैठी तो नहीं कर पायी, थोड़ी सी थकान, कुछ उलझन सी महसूस हो रही थी. उसे लगा, पहले की तरह शामों को या जब भी मन व दिमाग दोनों चुस्त-दुरस्त हों लिखना चाहिए बाद में फेयर कॉपी के लिए दोपहर का समय ठीक है. कल शाम उसने पुरानी कविताएँ छांटनी शुरू की जो लेखन परियोजना के लिए चाहिए, कुछ कविताएँ जो उस वक्त अच्छी लगती थीं काफी बचकानी सी लगीं पर कुछ ऐसी थीं जिन्हें तराशा जा सकता है. कविता की पहली पहचान है भाषा में विसंगति, जहाँ शब्दों के वे अर्थ न निकलते हों जो सामान्यतः होते हैं नहीं तो कविता के गद्य बनने में देर नहीं लगेगी. इस बार जो पुस्तकें लाइब्रेरी से लायी है वे ऐसी नहीं हैं जो Jane Austen की सेंस एंड सेंसिबिलिटी की तरह मन को बाँध कर रख सकें, एक तरह से ठीक ही है, वह ज्यादा समय DCH को दे पायेगी.

आज सुबह ही उसने लॉन की तरफ गहरी नजर से देखा और उन कामों की सूची बनाई जो अगले एक हफ्ते में करने हैं, माली ने आज से ही शुरू कर दिए हैं. बालसम के पौधे फूलों से भर गये हैं. पूसी उन्ही के पास बैठी है पर उसके मुंह से लार टपक रही है, शायद वह अस्वस्थ है. आज बहुत दिनों बाद असमिया सखी से बात हुई, उसने अपने यहाँ आने के लिए कहा और वह पिछले सारे अनुभव भूलकर उसकी छोटी सी बेटी को देखने की इच्छा से भर उठी.





Monday, January 20, 2014

मदर टेरेसा-ममता की मूर्ति


No more collections of concepts ! from today onward only factual life ! Today in the morning her student did not show up, she read J Krishnamurti ‘s dialogue with some unknown persons, they were not able to appreciate those things, he was trying to…oh no..saying but she thinks she has understood them well and that is why no more books, that take one in imaginary world, why to escape from day to day problems and enjoyments. Life is like that and they have to live it, can not escape it. If child is not studying much for his exam then being angry or annoyed is wasting the mental energy in something which is not going to help a bit.
She, read -
‘Most of persons realize, when they  dare look at it, that they are terribly lonely, isolated human beings. The self preoccupation which operates in daily life and relationship does bring this iso lation. If they understand that relationship between two human beings is the same as relationship with the rest of the world, then isolation, loneliness has quite a different meaning’.
She thought -
Their relationship is based on images, for many years she has built images about herself and about others, she has isolated herself through her activities, through her beliefs and so on. Images are formed when the mind is not attentive, and most of the time it is inattentive.

उसकी एक सखी जा रही है, वे लोग दिल्ली जा रहे हैं, पहली बार जब उसने यह बात सुनी थी तो दुःख हुआ था पर अब नहीं, उन्हें वे अक्सर याद तो किया करेंगे पर धीरे धीरे..वे यादें भी धुंधली पपड़ जाएँगी और जीवन यूँ ही चलता चला जायेगा. अभी-अभी उसने फोन किया, कितनी सुबहों को उन्होंने यहाँ वहाँ की हजारों बातें की हैं, कितनी शामें साथ बितायी हैं, एक मधुर सम्बन्ध जो दोनों परिवारों के मध्य पिछले कुछ वर्षों में बन गया था उसको दूरी सम्भवतः हल्का कर देगी, शायद न भी करे और दूर रहकर भी वे अच्छे मित्र बने रहें. कल रात बहुत जोरों की आँधी आयी, बिजली भी गायब है, कल शाम वे टहलने गये, मौसम थोड़ा ठीक ही हो गया था, आकाश में चाँद-तारे बहुत सुंदर लग रहे थे. जून के सिर में हल्का दर्द था उन्हें भी अपने मित्र के जाने का दुःख तो होगा ही. मदर टेरेसा के जीवन के बारे में नन्हे ने अपनी जीके की कॉपी में अख़बार से उतारा. उनकी अंत्येष्टि अगले शनिवार को होगी.  





Thursday, July 4, 2013

आलू-प्याज की सब्जी


अभी कुछ देर पूर्व बिजली चली गयी, मौसम भी आज अपेक्षाकृत गर्म है, नन्हे का स्कूल २० तक बंद है, आज सोलह तारीख है. जून के जाते ही हमारा नया माली काम करने आ गया, चुपचाप सारे काम कर देता है. वह सोच रही थी कि कुछ देर नन्हे को पढ़ाने का वक्त मिल जायेगा पर उन्होंने अभी फोन करके एक मित्र को भोजन पर साथ लाने की बात कही, एक सब्जी और बनानी थी, पर घर में आलू-प्याज के आलावा कुछ भी नहीं, देखें जून को यह आलू-प्याज की सब्जी पसंद आती है अथवा नहीं. पिछले हफ्ते उसकी पुरानी पड़ोसिन लौट आई, इतवार तक उनके साथ ही वे व्यस्त रहे, सोमवार को जून का जन्मदिन था, नन्हे का स्कूल बाढ़ के कारण बंद चल रहा था, कल उन्होंने पन्द्रह अगस्त मनाया सुबह अपने घर में छोटी सी पार्टी, शाम को एक मित्र के यहाँ गये. अचानक उसे किचन याद आ गया और लिखना छोड़कर वह बाकी काम निपटाने चली गयी.

समाचारों में सुना फिरोजाबाद के पास कालिंदी व पुरुषोत्तम एक्सप्रेस में टक्कर से भयंकर दुर्घटना. उसे ट्रेनों के नाम पर आश्चर्य हुआ, कालिंदी यमुना का नाम है और पुरुषोत्तम कृष्ण का, जैसे यमुना का जल उमड़ आया था कृष्ण के चरण छूने, वैसे ही कहीं..दोनों की टक्कर..

मन एक गाय है जो ‘मैं’ के खूंटे से बंधी
एक संकुचित दायरे में अनवरत घूम रही है
दूर.. जहाँ तक दृष्टि जाती है
नीले पहाड़ों के नीचे
घाटियों में है चाँदी सी चमकती जल धारा
वह उस मीठे पानी की ठंडक महसूस करना चाहता है  
लेकिन अपने अहम् के दायरे में ‘मैं’ के दायरे में बंधे होना उसकी नियति है
उसके इर्दगिर्द की हरियाली सूख गयी है
ऊपर तपता हुआ सूरज है
और सुदूर.. मैदानों में ठंडी छाँव
पर उस छाँव तक पहुंच पाना कितना दुर्लभ है
और ‘मैं’ के खूंटे से बंधे रहना कितना सुलभ....

Yesterday night she was feeling so helpless. She could not sleep much and then she thought above poem. It shows the true state of her mind. Jun has more stable mind. He is so calm and she does,nt know why did she behave so badly. She must be above the mere myness . There are others also beyond me and true happiness one can get only when he/she forgets him/herself. She shall always remember this and she knew this yesterday also when she was furious for nothing.


सुबह की शुरुआत ‘जागरण’ के साथ हुई. अन्तर्मुखी होकर ही अपने अंदर परमात्मा से साक्षात्कार किया जा सकता है. प्रतिदिन आधा घंटा ध्यान का अभ्यास करना होगा. नन्हा आज बहुत दिनों के बाद स्कूल गया है, सो सुबह तैयार होने में नखरे कर रहा था, कहा, ‘अच्छा नहीं लग रहा है’, शायद उसने नूना को ऐसा कहते सुना होगा, बच्चे नकल करने में होशियार होते ही हैं. जून तभी कहते हैं वह उस पर गया है. आजकल वे नियमित खेलने क्लब जाते हैं, अच्छा लगता है, तन-मन दोनों शक्ति से भर जाते हैं.

Tuesday, July 2, 2013

डिश एंटीना- स्वप्नों का संसार


सोमवार के बाद आज शनिवार को डायरी खोलने का समय मिला है, यूँ दोपहर को समय होता है पर उस वक्त मन नहीं होता, सुबह ही लिखने का अभ्यास हो गया है और वह है कुछ नियम-कायदों पर चलने वाली, हाँ, यह बात और है कि सारे नियम-कायदे अपनी सुविधा के अनुसार बनाये हैं, और हो भी क्यों न, आखिर वही तो उन्हें बना रही है और उनका उपयोग कर रही है ! तो पिछला पूरा हफ्ता इतनी व्यस्तता में गुजरा कि कल आखिर उसने जून से बात कर ही डाली कि साधू माली को हटाकर जो आजकल उनके आया रूम में रह रहा है, एक नैनी ही रख लेते हैं, बाहर से आकर काम करने वाली नैनी के साथ खुद भी लगना ही पड़ता है. उसने अपनी पड़ोसिन से बात की है, उसकी नौकरानी यदि आने को तैयार हो जाती है तो अच्छा रहेगा तब वह साफ-सफाई और सब्जी काटने के कामों के अलावा कुछ रोचक काम कर सकती है.
 बुधवार की शाम को बिजली चली गयी तो वे अपने एक मित्र के यहाँ चले गये, कल भी बिजली सुबह चार बजे से ही गायब थी, जो शाम को तीन बजे आई, दोपहर को जून भी नहीं आये, उसका मन कुछ अस्त-व्यस्त सा था, पहले दो घंटे एक किताब पढ़ती रही फिर साइकिल चला कर बिना फोन किये असमिया सखी के यहाँ गयी, उसे शायद उम्मीद नहीं थी, खैर, उसे साइकिल चलाना अच्छा लगा. नन्हे को उसकी कक्षा का कैप्टन बनाया गया है, उसने ध्यान दिया कि वह भी उसकी तरह एक ही बात को बार-बार पूछने पर नाराज हो जाता है. उसकी बैक डोर पड़ोसिन गढ़वाली है, उसकी तबियत का हाल पूछने वह उसके घर गयी थी बातों-बातों में उसने बताया कि उसके पति भी उसी वर्ष गढ़वाल के उसी शहर में थे जब वे लोग वहाँ थे.

आज भी अभी तक जून नहीं आए हैं, उसने मेज पर खाना लगा दिया और इंतजार के क्षणों को काटने के लिए पत्र लिखने लगी, तीन पत्र पूरे भी हो गये और उनका पता नहीं था तो उसने डायरी उठा ली है. कल रात लगभग ग्यारह बजे उन्हें कमरे में कुछ आवाज सुनाई दी, पर जगकर देखने के बाद कहीं उसका स्रोत नजर नहीं आया, वह कुछ देर सो नहीं सकी, रात को मन कितनी जल्दी  आशंकित हो जाता है. अचानक उसे याद आया एक खत और लिखना है, जो वह लंच के बाद लिखेगी. बीते हुए कल उसने डिश एंटीना के बारे में जून से बात की और आने वाले कल उनके बगीचे के पिछवाड़े में वह लग भी जायेगा, उसने सोचा कितना अच्छा होगा जब वे जी टीवी के सभी कार्यक्रम देख पाएंगे.

आज फिर जून लंच पर नहीं आएंगे, वे अपने साथ टिफिन ले गये हैं और उसके पास हैं किताबें और ढेर सारा समय, जो चाहे करने के लिए या कहीं जाने के लिए, लेकिन वह तय नहीं कर पाई, कहाँ जाना चाहिए, फिर उसने सोचा, वह स्वयं को कुछ नये कामों में व्यस्त रखेगी, पर वह जानती है ज्यादा समय तो पढ़ने में ही बीतेगा. वह कुछ लिखने का प्रयास भी कर सकती है जैसे कोई भूली हुई कविता या कोई अच्छी सी बात उस किताब से नोट कर सकती है बाद में पढ़ने के लिए. उसे अभी अखबार भी पढ़ना है इतवार का स्पेशल एडिशन भी और नन्हे का लाया बच्चों का जासूसी उपन्यास भी है ‘हार्डी बॉयज’, जो उसे अच्छा लग रहा है, अपने बचपन में उसने ऐसी कोई किताब कभी नहीं पढ़ी. कल जून ने माली की सहायता से डिश के लिए पोल लगवा दिया, नन्हा बहुत खुश है और वे दोनों भी,किसी ने सही कहा है, हर चीज का एक वक्त होता है, कुछ दिन पहले तक वे सोचते थे कि डिश एंटीना लगवाना व्यर्थ है और किसी हद तक हानिकारक भी, पर आज लग रहा है, घर में डिश एंटीना होना तो बिलकुल सामान्य सी बात है. नन्हे को पिछले कुछ दिन से हल्की खांसी है उसे होमियोपैथी दवा दिलवाने शाम को ले जायेंगे.

जून आज दोपहर को खाने पर आएंगे, अभी अभी फोन पर कहा है और वह उत्साह से भर गयी है, सुबह वह ‘लंच पैक’ अपने साथ ले गये थे पर शायद उन्हें फील्ड से जल्दी आना पड़ा है. Nanha made her cry in the morning, she told him to gargle and he became irritated, she doesn't know why did she feel pain, pain of losing him, he is grownup and and doesn't listens as before. She cried that one day he will go so far from her that her presence will make no difference for him, but after 10-11 minutes he saw her red eyes and asked the reason, when she told him, he himself brought tear in eyes, He is so sensitive too and she thinks she is not going to lose him ever. All morning chores is done and after writing few more lines she will read that book of positive thinking and health. Yesterday they got one cute letter from her cousin brother. He seems much mature through his letters. They all will reply him. Raksha bandhan is also in next month, she has to bring rakhis for all of them, sending them is must for her, Rakhies  at least binds them together.