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Monday, December 21, 2015

कहत कबीर



कबीर के जीवन में भक्ति की पराकाष्ठा है, वह अपने गुरू से, साहेब से बहुत प्रेम करते हैं. उनके जीवन में ज्ञान की पराकाष्ठा है, वह कर्म योगी भी हैं, जीवन भर चदरिया बुनने का काम करते हैं. कबीर का सारा जीवन इस त्रिवेणी को जन-जन तक पहुँचने में लगा और उसके सद्गुरू जी तो ध्यान, ज्ञान, प्रेम, सेवा, भक्ति, कर्म, कीर्तन और न जाने कितने-कितने पथों का संगम कर रहे हैं. अद्भुत है उनका जीवन. स्टेज पर फूलों की बरसात करते हुए जब वह नृत्य करते से चलते हैं, मस्ती में झूमते भजन गाते हैं, आत्मविभोर होकर स्वयं पर फूलों की वर्षा करते हैं. समाधिस्थ होकर शंकर की मुद्रा बना लेते हैं तो हजारों-हजार व्यक्ति उनके भीतर के इस प्रेम को छूकर मुग्ध हो जाते हैं.

गुलाब में नई कलियाँ आई हैं, पर उसके पूर्व उसे कटना पड़ा, सिर दिए बिना फूल कहाँ खिलते हैं, भीतर भक्ति के फूल खिलाने हों या बाहर कर्म के, भीतर ज्ञान के फूल खिलाने हों या बाहर सेवा के. उन्हें अपने अहंकार को मिटाना ही होगा, तभी जीवन में संगम उतरेगा, तीर्थ का पदार्पण होगा, अंतर्मन शांत होगा, आत्मा की खबर लायेगा, दौड़-दौड़ कर फिर बाहर सुनाएगा. कैसी अनोखी शांति से उसका मन आजकल ओतप्रोत रहता है, कुछ रिसता रहता है चुपचाप, उसे कहने का लिखने का भी मन नहीं होता, वह निस्तब्धता इतनी भली लगती है कि उसे तोड़ने की इच्छा नहीं होती. कई-कई दिन हो जाते हैं डायरी खोले. कविता भी कई दिनों से नहीं लिखी. भीतर सन्नाटा है, पर कहीं आनन्द को पीने का चाव उसे अकर्मण्य तो नहीं बना देगा. लिखना-पढ़ना भी यदि छूट जाये तो जीवन में क्या बचेगा. परसों उन्हें यात्रा पर निकलना है, तब तो समय पंख लगाकर उड़ेगा. ज्ञान की पिपासा भीतर बनी रहे, पर ज्ञान की परिणति तो मौन में ही है. वह मौन भीतर उतरा है. सद्गुरु की कृपा से. अब कुछ पाना शेष नहीं पर देने की तो अभी बारी आई है. यह सेवा का मौसम उतरा है भीतर. आज एक सखी ने अपनी सासुमाँ को उससे फोन पर शिकायत करते सुन लिया और बहुत क्रोध में आ गयी, पर नूना की शांति उसे छू गयी और उस वक्त वह शांत भी हो गयी ! ईश्वर उसे ज्ञान के पथ पर लाये !

वे ईश्वर का ध्यान तभी तो कर सकते हैं जब उसे जान लें, पहचान तो सद्गुरु ही कराते हैं और एक बार उसकी पहचान हो जाये तो वह ध्यान से उतरता नहीं है. और तब लगता है कि जिन्हें दो मान रहे थे वे दो थे ही नहीं एक ही सत्ता थी. कहीं कोई भेद नहीं. तब लगता है, जो भी सहज प्राप्य हो, हितकर हो वही धारण करने योग्य है. तब सारे संशय भीतर से दूर हो जाते हैं, अंतर्मन खाली हो जाता है. कोई आग्रह नहीं, जैसे छोटा बच्चा होता है सहज प्रेरणाओं पर जीता हुआ, अस्तित्त्व तब माँ हो जाता है, ब्रह्मांड पिता होता है, सारे वृक्ष, पर्वत, आकाश तब सखा हो जाते हैं और सारे लोग भी एक अनाम बंधन में बंधे अपने लगते हैं.   



Wednesday, February 4, 2015

वेद की ऋचाएं


आज शिवरात्रि है. सुबह दीदी का फोन आया, परसों शाम वह श्री श्री रविशंकर जी के कार्यक्रम में गयीं और अगले हफ्ते AOL का कोर्स करने जा रही हैं. टीवी पर आत्मा आ रहा है जिसमें भक्तियोग की महत्ता पर बल दिया जा रहा है. अभी-अभी एक सखी से बात की, वह शिवरात्रि का व्रत रख रही है, श्री श्री के बारे में भी चर्चा हुई और भौतिक संसार की भी, जो उनके मनों में गहरा समाया हुआ है. कृष्ण को स्थापित करें तो कैसे करें, मन में इतना बड़ा ब्रह्मांड समाया है. जो इसका स्रोत है, जिस तत्व से सारे तत्व उत्पन्न हुए हैं उसी को स्थान नहीं है, यह एक विडम्बना ही तो है. कृष्ण आदि हैं, समस्त सृष्टि का कारण हैं. ज्ञान, प्रेम और आनंद का सागर हैं और वे भौतिक देह नहीं हैं, बल्कि आध्यात्मिक स्फुलिंग हैं जो परम सत्य का अंश हैं. पूर्ण का अंश होते हुए वे क्यों विखंडित जीवन व्यतीत करें, कृष्ण का आश्रय लेने पर ही वे शांति व संतोष का अनुभव करते हैं. ऐसा सुख जो शाश्वत है, जो बदली हुई परिस्थितियों के कारण प्रभावित नहीं होता. यह जगत स्वप्नवत है, क्षणिक है, देह के संबंध भी शाश्वत नहीं हैं. युगों युगों से तो वे संसार के गुलाम रहते आये हैं, यदि इस जन्म में भक्ति का उदय हुआ है तो उसे प्रश्रय देना होगा, आँधी, धूल से उसे बचाना होगा. कृष्ण से स्नेह करना होगा और वह तो हर पल उनसे स्नेह करता है !

भक्ति मार्ग सरल है, लेकिन भक्ति उसी के हृदय में पल्लवित होगी जो सरल हृदय का होगा. भगवद गीता में कृष्ण का वचन है कि निराकार की अपेक्षा साकार की पूजा करना शीघ्र प्रगति प्रदान करता है. अचिन्त्य, अव्यक्त, निराकार रूप की अपेक्षा मनमोहन का सुंदर, सुहावना रूप हृदय को शीघ्र एकाग्र करता है और व्यवहारिक भी है भक्ति मार्ग, इसमें कुछ छोड़ना नहीं पड़ता बल्कि ईश्वर को स्वयं से जोड़ना होता है और धीरे-धीरे भौतिक विषयों से मन अपने आप विरक्त होता जाता है. आज नन्हे की गणित की परीक्षा है, पिछले चार-पांच दिनों में उसने बहुत परिश्रम किया है. जो अवश्य रंग लायेगा. कल सुबह दीदी से पिताजी के स्वास्थ्य की बात की, उनकी आँखों का इलाज चल रहा है, उसने भी बात करनी चाही पर आज सुबह से ही फोन काम नहीं कर रहा है. कल भागवद में वेद की ॠचाओं द्वारा कृष्ण की स्तुति पढ़ी, जैसे सब कुछ स्पष्ट होने लगा, अब कोई संदेह नहीं रह गया है, सारे संशय मिट गये हैं. अध्यात्म जो कभी रहस्य प्रतीत होता था, अपने सारे सौन्दर्य के साथ उसके सम्मुख प्रकट हो उठा है. यह सभी सद्गुरु की कृपा से सम्भव हुआ है. उस दिन जो अनुभव हुआ था उसके बाद ही ज्ञान क्लिष्ट नहीं लगता है. भगवद गीता भी स्पष्ट हुई है पहले कई श्लोक बिना समझे ही पढ़ जाती थी, गुरू की कृपा महान है.

कल रात टीवी पर सद्गुरु को देखा, उनकी मुस्कुराहट मोहने वाली है और सहजता आकर्षक है. ज्ञान की बात वह सरल शब्दों में कहते हैं. “Intelligence with innocence is enlightenment. ‘I don’t know’ becomes beautiful when one starts knowing that he does not know everything or there is lot more to know.” वे जितना जानते हैं वह बहुत कम है इस बात का ज्ञान हो तो अहंकार नहीं होता, वे सहज होते हैं और मन सरल होने पर ही भक्ति को प्राप्त होता है. गुरूजी कहते हैं you are love and you should smile always what may come. AOL के सूत्र उन्हें सदा याद रखने चाहिए तो ही जीवन सुखमय और सरल रहेगा. नन्हे का गणित का पेपर ठीक हुआ है. अगले हफ्ते अंग्रेजी का अंतिम पेपर है और उसके अगले दिन उन्हें  यात्रा पर निकलना है. पिछले पन्द्रह-बीस मिनट से वह फोन पर बात कर रहा है. कल शाम बल्कि रात को कुछ देर उसने भागवत सुनी. गुरूजी का इंटरव्यू भी देखा. धीरे-धीरे उसे भी अध्यात्म का ज्ञान मिल रहा है. रोज सुबह कानों में ईश्वर की चर्चा पडती है और ईश्वर का नाम इतना प्रभावशाली है कि कोई भी उससे प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकता. उसकी भक्ति भी नैतिकता से शुरू हुई थी !


Saturday, April 5, 2014

गोद्ज़िला का सीडी


आज वर्षा नहीं हो रही है, वातावरण में उमस सी है. सुबह साढ़े चार बजे वे उठे, उसने पढ़ाया, जून बाहर से अमरूद तोड़ कर लाये, पता नहीं किसने लगाया होगा यह वृक्ष जिसके मीठे फल वे खा रहे हैं. वर्षों बाद उनका लगाये नींबू, संतरे व आड़ू के पेड़ भी किसी और को फल देंगे. ध्यान के लिए आजकल सुबह समय निकालना मुश्किल होता है, सो मन किसी न किसी बात पर पल भर के लिए ही सही झुंझला जाता है, स्वयं को समझाना कितना मुश्किल है !

कल सुबह एक मित्र परिवार आया था, उन्हें घर जाना था, जाने से पूर्व नाश्ता यहीं करवाया तथा साथ ले जाने के लिए कुछ बनाकर भी उसने दिया. दोपहर को KSKT देखी, अंत बहुत दर्दनाक है, लेकिन दोनों के परिवार वालों को यही सजा मिलनी चाहिए थी. उसके एक दांत में अमरूद का बीज फंस जाने से दर्द हो रहा था, आज एक्सरे कराने जाना है. पर उसे लगता है, एक दांत निकलवाने के बाद भी यह दर्द पूरी तरह से चला जायेगा ऐसा नहीं है, इसलिए उसे सही देखभाल और सफाई के द्वारा ही दांतों को ठीक रखना चाहिए. कल शाम वे क्लब गये, रेफरेंस बुक्स की प्रदर्शनी लगी थी, इतनी मोटी-मोटी किताबें और दाम सैकड़ों, हजारों में..वे सिर्फ देखकर आ गये. वैसे भी कम्प्यूटर आ जाने के बाद वैसी किताबों की आवश्यकता नहीं रह जाती. नन्हा कल शाम बेहद चुप-चुप था, बाद में गोद्ज़िला का CD देखते देखते ही सामान्य हो गया, उसका उदास चेहरा नूना से देखा नहीं जाता. शायद ऐसा ही जून को उन दिनों लगता होगा जब विवाह के बाद शुरू-शुरू में घर की याद आने से वह  चुप हो जाती थी और उन्हें उसकी चुप्पी नागवार गुजरती थी. जो प्रेम करते हैं वे प्रियपात्र की उदासी को सहन नहीं कर सकते. जून को इस माह के अंत तक एक पेपर लिखकर भेजना है. व्यस्तता उन्हें प्रसन्न रखती है.

उसे आश्चर्य हुआ कि तिथियों के मामले में इतनी लापरवाह कैसे हो गयी, उसने जून से कहा परसों पन्द्रह अगस्त है सो आज ही उन्हें मित्रों को उस दिन लंच के लिए निमंत्रित कर देना चाहिए. डायरी खोली तो पता चला अभी चार दिन हैं पन्द्रह अगस्त आने में. नन्हा अपना प्रिय कार्यक्रम ‘डिजनी आवर’ देख रहा है. उसने कुछ देर पूर्व लाला हरदयाल की पुस्तक में पढ़ा, धर्म के नाम पर हजारों लोग मारे गये, धर्म ने लाभ के बजाय हानि ही पहुंचाई है. मानव रहस्य दर्शी है, और भगवान से बड़ा रहस्य कौन है, इसलिए तो इतने सारे धर्मों का उदय हुआ. वह खुद भी तो प्रकृति की इस अनुपम सुन्दरता को देखकर इस विशाल ब्रह्मांड को बनाने वाले के प्रति श्रद्धा से भर जाती है. उसका भगवान इस संसार का नहीं है, वह तो ऊर्जा का अंतिम स्रोत है जिससे यह सब हुआ है.


आज उसकी छात्रा ने कहा, अब वह नहीं आयेगी, पिछले दो वर्षों से हिंदी पढ़ाने का क्रम अब टूट जायेगा. उसे वाकई अच्छा लगा, हिंदी व्याकरण का ज्ञान इसी कारण उसे भी हुआ. उसके मन में एक स्वप्न है हफ्ते में दो दिन ही सही छोटी-छोटी लडकियों को पढ़ाये, यह कार्य उसके मन का होगा और इससे समय के सदुपयोग के साथ आत्म संतोष भी मिलेगा. अगले हफ्ते से नन्हे का स्कूल भी खुल रहा है. उसे कम्प्यूटर कोर्स करने का भी मन है. काम करना और अर्थपूर्ण काम करना उसकी जरूरत है सही मायनों में जीवन कार्य का ही दूसरा नाम है.