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Monday, August 18, 2014

सत्य के प्रयोग - बापू की आत्मकथा


Abraham Lincoln says, Most people are about as happy as they make up their minds to be. She is agreed with him… Yes, she has made her mind to be happy always ! yesterday she was busy in sewing fall to new saree and mending new dress so could not open diary. In the evening they went to meet and have dinner with one friend’s guest, they(four) all are happy, social persons. Daughter is fat and sun is studious(seems to be) lady is talkative and has jolly nature. Today she has invited them in their house for dinner. Nanha and she will decorate the house and prepare food. He takes interest in keeping the house clean and in cooking also. Jun(these days) is busy in his office work. Yesterday she got didi’s letter after so many days. It was good and informative, she will write her too and to brother also. Babaji told that God is always there so never consider alone or helpless in any condition. Her  mind is full of love for God, babaji and all. She is at peace with herself most of the time. God’s love is great and sometimes she feels very protective towards it. She enjoys each and every moment of her stay at mother earth and she…

उसे लगा कि वे दुनियावी बातों में इस कदर उलझे रहते हैं कि सर उठाकर देखने की फुर्सत भी नहीं निकाल पाते कि उलझाव से परे भी कोई दुनिया है. वे इस बात से बेखबर ही रहते हैं कि कहीं कोई उलझन है. इसी भटकाव को जिन्दगी मानकर चलते चले जाते हैं, जैसे पतंगों को दीपक की लौ में मर जाना ही अपने जीवन का परम उद्देश्य लगता है वैसे ही वे भी इन रोजमर्रा के साधारण से दिखने वाले कामों में अपनी ऊर्जा (शारीरिक, मानसिक तथा आत्मिक ) खपाते रहते हैं. इस ऊर्जा का कोई और भी उपयोग हो सकता है सोचने की जरूरत ही महसूस नहीं करते. ईश्वर से की गयी प्रार्थनाएं भी स्वार्थ से परिपूर्ण होती हैं. वे यही चाहते हैं कि इन झंझटों में वृद्धि हो कि वे इनमें और उलझे रहें, मदहोश रहें ताकि बड़े प्रश्नों से बचे रहें, ऐसे सवाल जो मन को झकझोरते हैं, आत्मा को कटघरे में खड़ा करते हैं, वे इस भूलभुलैया में मग्न रहना चाहते हैं.

दो अक्तूबर को पूज्य बापू के जन्मदिवस के अवसर पर उसने उनकी आत्मकथा ‘सत्य के प्रयोग’ पढ़नी आरम्भ की थी जो अभी कुछ देर पूर्व ही समाप्त की है. उनके जीवन को जितना गहराई से देखें उतने ही अद्भुत प्रसंग व आख्यान मिलते हैं. सागर की तरह विशाल और गहरा है उनका जीवन, आत्मशुद्धि के लिए उनका प्रयास और उसके लिए किसी भी स्तर तक पहुंच जाने की उनकी आतुरता, नम्रता में वह सबसे आगे थे तो निर्भीकता में भी. उनकी कथनी व करनी में कोई भेद नहीं था, वह महानतम थे. उनकी इस पुस्तक से आत्मदर्शन की प्रेरणा मिलती है, उसके लिए मार्ग मिलता है, सत्य और अहिंसा के प्रति श्रद्धा जगती है. यदि प्रतिपल वह सत्य की खोज में चलती रहे तो ईश्वर दर्शन सम्भव है और अहिंसक हुए बिना वह सत्य को नहीं पा सकती. अहिंसा मनसा, वाचा, कर्मणा तीनों से होनी चाहिए. उसका सौभाग्य है कि गाँधी भारत में हुए थे. उनकी बातें, उनके आदेश व उनके प्रयोग आज भी प्रासंगिक हैं, वे शाश्वत हैं क्यों कि आत्मदर्शन की इच्छा शाश्वत है, ईश्वर की खोज शाश्वत है. जैसे बाहरी शुद्धि आवश्यक है, उसी तरह मानसिक व आंतरिक शुद्धि भी. जितनी देर कोई मन का प्रक्षालन करता है, शांति का अनुभव होता है, लेकिन जैसे ही कोई विकार प्रबल होता है तो मन अशांत हो जाता है. बाबाजी ने कहा, प्रतिक्रमण सीखना है, अविद्या के कारण उत्पन्न हुए दोषों को देखना है. इच्छाओं को संयमित करना ही धर्म है, उन्हें शुद्ध करना ही उपासना है और उन्हें निवृत करना ही योग है. योग ही लक्ष्य है.




Wednesday, January 29, 2014

हावड़ा ब्रिज - कोलकाता की शान


आज उनका टीवी खराब हो गया, टीवी के बिना दिन जैसा भी गुजरे रोज से काफी अलग होगा. टीवी उनके जीवन का एक अभिन्न हिस्सा बन गया है. जून के अनुसार शाम तक ठीक हो जायेगा. कल शाम मीटिंग थी, क्लब में कुछ खा लिया, आठ बजे जब जून और नन्हा भोजन कर रहे थे, उसे जरा भी भूख नहीं थी, दस बजे उसे भूख लगी, उस समय कुछ खाना ठीक नहीं है यह सोचकर नहीं खाया, पर खाली पेट नींद काफी देर तक नहीं आ रही थी.

अब धूप में पहले की सी तेजी नहीं है. सुबह नाश्ता करने के बाद उसने नन्हे के लिए पेपर की छोटी-छोटी कारें बनायीं जो हावड़ा ब्रिज पर खड़ी की जाएँगी. उसका प्रोजेक्ट लगभग पूरा हो गया है, जिसे पिछले कई दिनों से वह और उसके मित्र मिलकर बना रहे थे. आज दो अक्तूबर है, बापू की १२८वी जयंती ! दोपहर को दूरदर्शन पर ‘गाँधी से महात्मा’, श्याम बेनेगल की फिल्म ‘Making of Mahatma’ का हिंदी रूपांतरण देखा. गाँधी दिल के और करीब हो गये. आज क्लब में कार्यक्रम है पर इतने बड़े महापुरुष के जीवन पर फिल्म देखने के बाद कुछ और देखना शेष नहीं रह जाता. बापू के पुत्रों को विशेषकर हरिदास को उनसे शिकायत रही, वैसे कुछ न कुछ शिकायत हर बेटे को अपने पिता से रहती ही है.

कुछ देर पहले छोटी बहन से फोन पर बात की, उसने अभी तक नवजात शिशु का नाम नहीं सोचा है, ३.४ केजी की गोरी सी बच्ची का नाम जो बड़ी बहन से कुछ मिलता-जुलता भी होना चाहिए. जून आज तिनसुकिया गये हैं, वापसी की टिकट के लिए, नहीं मिलने पर जाने की टिकट भी कैंसिल कर देंगे, सुनने पर यह वाक्य उसे कठोर लगा किन्तु यथार्थ यही है. आजकल बिना रिजर्वेशन के सफर करना उनके लिए असम्भव है, अपनी सुविधा की कीमत पर परिवार के साथ त्योहार में शामिल नहीं हुआ जा सकता. यह आधुनिक समाज की देन ही है जिसने एक ओर प्रगति की है दूसरी ओर कठिनाइयां भी बढ़ा दी हैं. घर से इतनी दूर रहने का खामियाजा ही समझ लें. पर यहाँ रहना उसे सदा से ही भाता रहा है और भाता रहेगा जब तक भी यहाँ रहना पड़े.

उसकी एक सखी बीएड करना चाह रही है, और उससे नोट्स मांग रही है. उसे आश्चर्य हुआ ऐसा कहते हुए वह बहुत निरीह लग रही थी, पहले कुछ ज्यादा ही उत्साहित थी. यही तो जिन्दगी है, जो कभी सिखाती है कभी झकझोरती है. हर दिन एक नया संदेश लेकर आता है. अगर कोई ध्यान से देखे और समझे तो !

कल सुबह जून को तिनसुकिया में कम्प्यूटर लिंक न होने के कारण वापस लौटना पड़ा पर उनके मित्र के छोटे भाई( जो एक ट्रेवल एजेंट बन गया है) ने टिकट ले ली है, उन्हें ख़ुशी तो हुई पर छोटी ननद उसी समय ससुराल जा रही है, उससे शायद मिलना न हो. शाम को वे टहलने गये मौसम में एक ठंडक सी आ गयी है और हरसिंगार के फूलों की महक भी. उनके हरसिंगार में अभी कलियाँ ही आई हैं. जून ने उस दिन गुलाबों की कटिंग भी कर दी है, अगले हफ्ते वे गोबर भी डलवा देंगे. कल शाम बल्कि रात को ही पड़ोसिन ने कागज की कारें बनाने के लिए कहा, पर उसके पास समय नहीं था, मना करने में अच्छा नहीं लग रहा था, पर किया, it means she is learning to be assertive, अपने वश से बाहर के काम को भी पहले वह ले लेती थी फिर चाहे कितना परेशान होना पड़े. जून अभी आने वाले हैं, उन्हें आज अस्पताल भी जाना है, उसके कान में हवा की कुछ खुसुर-पुसुर सी लग रही थी, आज सुबह से ठीक है, फिर भी कहा है न कि छोटे रोग की उपेक्षा नहीं करनी चाहिए.  




Friday, March 15, 2013

लाल लाल सा गाल



परसों यानि शनिवार को बापू के ‘एक सौ चौबीसवें’ जन्मदिन के कारण जून का ऑफिस और नन्हे का स्कूल दोनों बंद थे, वह सुबह व्यस्त थी, दोपहर को ‘गाँधी’ फिल्म देखी और शाम को एक मित्र परिवार के लिए भोजन बनाना था, फ्लाईट कैंसिल हो जाने के कारण वे एयरपोर्ट से लौट आये थे, कल गए.
 माली ने टमाटर के पौधे लगा दिए एक क्यारी में, बागवानी की किताब के अनुसार पचास-पचपन दिन में फल लगने लगेंगे. अभी गुलाब की प्रूनिंग करनी है, उसने इस बारे में भी जानकारी बढ़ाने के लिये पढ़ा. घर जाने के पूर्व रोजमिक्स भी डालना है. यकीनन इस वर्ष गुलाब अच्छे खिलेंगे, शेष फूलों के बारे में अभी कहना मुश्किल है, डहेलिया माली पर निर्भर है और गेंदा वह जाने से पहले लगा सकती है.
  आज सुबह सारे काम जल्दी हो गए हैं, उसने शॉपिंग लिस्ट बनायी, जून तो इतनी लम्बी-चौड़ी लिस्ट देखकर घबरा ही जायेंगे. उसका ध्यान लिखने से हटकर किसी आवाज से बाहर चला गया तो बाहर जाकर देखा, आज पड़ोस वाले घर में डिश एंटीना लग रहा है. आज समय बहुत है फिर भी मन से नहीं लिख पा रही है, खुशवंत सिंह की उस बात का असर ज्यादा ही ले लिया है, जिसमें वह कहते हैं, यह तो स्वार्थ हुआ कि आप योग या ध्यान के द्वारा अपने मन को शांत कर लें. अस्थिर मन उनके विचार से स्वार्थी नहीं होता, जबकि उसका मन इसके बिलकुल विपरीत है.

आखिर आज छोटी बहन का पत्र आ गया, जिसके उसे प्रतीक्षा थी, वह सोच रही थी, शायद सलाह देना उसे अच्छा न लगा हो. अभी कुछ देर पहले विवेकानंद के सुंदर विचार पढे-

Religion belongs to supersenses and not to the sense plane. It is a vision, an inspiration, a plunge into the unknown and unknowable, makine the unknowable more than known, for it can never be known.”  

 उसने सोचा तब तो मानव जीवन का उद्देश्य धर्म ही होना चाहिए न कि केवल खाना, पीना और मौज मस्ती. कल माली ने पत्ता गोभी के पौधे भी लगा दिए, पर वायदे के अनुसार कैप्सिकम नहीं लाया, उसे ध्यान आया, कहीं धूप में पौधे कुम्हला न रहे हों, उन पर कागज की टोपियां लगानी होंगी. नन्हा आज बहुत खुश था, वह पहली बार अपने मित्रों के साथ कुछ ही दूर पर स्थित डी प्लस के पार्क में खेलने गया. आजकल जून उसे कैरम में आसानी से हरा देते हैं, ‘चायनीज चेकर’ में भी अक्सर, पहले वह उन्हें हरा देती थी, पर इसका अर्थ यह नहीं कि वह अच्छा खेलती थी, बल्कि वह अब पहले से बेहतर खेलने लगे हैं, वह वैसी ही है सदा से..

….Whenever anything miserable will come, the mind will be able to say, “I know you as hallucination”, when a man has reached that state he is called Jivanmukta, living fee, “free even living”.

  अभी-अभी विवेकानंद का एक भाषण पढ़ा उसके पास शब्द नहीं हैं यह बताने के लिए कि कितना अद्भुत था उनका मानसिक संसार, कितनी गहन पिपासा होगी उनकी, ज्ञान के इस भंडार को समझकर करोड़ों तक पहुँचाने का काम सिर्फ वही कर सकते थे. शब्दों से तेज टपकता है, धारा प्रवाह वाणी जैसे मन को झिंझोड़ती चली जाती है और रह जाती है पीछे शांति. अब उसे कोई बात पहले की तरह विचलित नहीं कर पाती, क्योंकि आरम्भ में जो लिखा है, यह सब खेल है, नाटक, हमें इसे बस देखते भर जाना है, इसमें खो नहीं जाना है, दर्शक की तरह, कीचड़ में कमल की तरह इस दुनिया से गुजरते चले जाना है. आज नन्हे का पहला यूनिट टेस्ट है, सुबह उसने उसके गाल पर क्रीम लगायी, क्योकि मधुमक्खी या किसी कीट के हल्के दंश से हल्का लाल हो गया था, पर वह बहुत बहादुर है.