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Wednesday, February 6, 2013

जगजीत सिंह की गजल



नन्हा आज स्कूल नहीं गया, कितना उदास था, चुपचाप आँखों से आंसू गिर रहे थे, इतने छोटे बच्चे को इस तरह चुपचाप रोते नहीं देखा उसने कभी, उसको टेस्ट की चिंता थी, जो शायद आज होता भी नहीं, सुबह से दो-तीन बार टायलेट गया तो उसे चिंता हो गयी, स्कूल नहीं भेजा, सेंट्रल स्कूल में टायलेट गंदे हैं, पानी भी नहीं रहता, यह सब नन्हे ने ही तो बताया था, अभी तक तो ठीक है वह, खेल रहा है, स्कूल उसके लिए बहुत आवश्यक है, उसका दिल स्कूल में रहता है. फिर भी बच्चा आखिर बच्चा है, जितनी जल्दी उदास होता है उतनी ही जल्दी भूल भी जाता है. कल छोटे भाई का पत्र मिला, अब वह खुश है ऐसा उसके पत्र से लगा तो है. कल रात उसे नींद नहीं आ रही थी, पिछले कई दिनों से घर में काम चल रहा है, घर दिन भर पूरा खुला रहता है, रात को नन्हे को सुलाने के लिए जल्दी-जल्दी काम निपटा कर वे सोने आ जाते हैं, कभी कभी ज्यादा थकन भी विश्राम में बाधा बनती है.

सितम्बर का एक दिन बीत गया है कल और पिछले तीन-चार दिनों से डायरी नहीं खोली, जून का दफ्तर बंद था, और नन्हे का स्कूल भी, वे डिब्रूगढ़ गए थे. जगजीत सिंह की गजल आ रही है-
“खत लिखते कभी और कभी खत को जलाकर तनहाई को रंगीन बना क्यों नहीं लेते
तुम जग रहे हो मुझे अच्छा नहीं लगता चुपके से मेरी नींद चुरा क्यों नहीं लेते”

जो कुछ वह सोचा करती है अक्सर कोई काम करते समय या रात को जब नींद नहीं आ रही होती है वह सब लिखते समय याद क्यों नहीं आता है. एक उड़ता-उड़ता सा विचार मन में रहता है कि उसे एक स्कूल खोलना है गरीब बच्चों के लिए, उन्हें पढाना है, लेकिन यह विचार मात्र ही है, कैसे होगा यह इसके बारे में सोचा ही नहीं, जून को कहने से उनकी प्रतिक्रिया अनुकूल तो नहीं होगी, कहेंगे, समय कहाँ है ? जगह कहाँ है? और न जाने कितने सवाल जिनका उत्तर वह नहीं दे पायेगी.

क्यों नहीं दर्द फूट पड़ता
अगर कोई दर्द सचमुच है कहीं
नम कर दे आँखों को अंदर ही अंदर
क्यों नहीं कोई खुशी छलक उठती
अगर कोई खुशी सचमुच है
रोशन कर दे जो भीतर बाहर
क्यों नहीं कोई गीत उग आता
अगर कोई गीत सचमुच है
रसमय कर दे जो अंतर
क्यों नहीं कोई स्वप्न सजता
अगर कोई स्वप्न सचमुच है
एक कर दे जो बिछुड़े हुओं को

शब्दों की कमी क्यों खटकती है
थी पहले विचारों की, क्यों है ऐसा कि
जब यह है तो वह नहीं...वह है तो..

उसने कल एक कहानी पढ़ी, दो मित्रों की कहानी..जिनमें शत्रुता हो जाती है, शत्रु बनने के लिए पहले मित्र बनना ही पड़ता है, गलतफहमियों की दीवार अपनों के बीच ही तो खड़ी हो सकती है, अनजानों के मध्य तो नहीं...जितनी जल्दी यह गिर जाये उतना ही अच्छा ये बात दोनों ही चाहते हैं, क्योंकि शत्रुता ओढ़ी हुई है, चुभती है, भीतर मित्रता का सरवर बह ही रहा है, उसकी याद अभी ताजा है. पहले की दोस्ती याद आती है, एक को चोट लगती थी तो दर्द दूसरे को होता था, अब एक दूसरे की तरफ से उदासीन हो गए हैं, लेकिन यह उदासीनता कब तक टिकेगी...जब प्रेम नहीं टिका जो दैवीय गुण है तो शत्रुता कब तक टिकेगी..कहानी का अंत सुखद था. गलतफहमियां गिर जाती हैं और फिर दोनों एक हो जाते हैं एक बार फिर झगड़ने के लिए शक्ति जुटाने के लिए...शायद यही जीवन है.




Friday, November 23, 2012

अमृता प्रीतम का संसार



चार दिन बाद सोनू स्कूल गया, घर आकर कहने लगा ममा की याद आने पर रोने लगा था. जून चले गए हैं चप्पल देना भूल गयी वह, ड्राइवर से कहा तो है कि कोई गाड़ी जा रही हो तो चप्पल ले जाये. आज सुबह वह अपनी लेन के अंतिम घर में गयी, गृहणी नहा रही थीं, फिर दोपहर को वह आयीं, उनसे बात करके अच्छा लगा, उन्हें फूलों का भी शौक है. कल से उनकी बिटिया भी नन्हे के स्कूल जायेगी, शायद उसी रिक्शा से.

आज उसके सिर में उसी कारण से पीड़ा है, दवा ले या नहीं तय नहीं कर पा रही है. जून होते तो अब तक दे चुके होते. बाहर कभी कार का दरवाजा बंद होने की आवाज आती है तो लगता है कि वह हैं. सुबह उनका फोन आया था और शाम को एक गाड़ी आयी. जून ने एक कागज पर लिख कर भेजा था चप्पल के लिए...सोचा वह भी कुछ लिख दे पर जैसा कि उसके साथ होता है ठीक से लिख नहीं पायी, पर वह समझ गए होंगे. दोपहर को स्वप्न में दीदी-जीजा जी को देखा, उनका पत्र भी आया है.

आज उसने अमृता प्रीतम का एक उपन्यास पढा, ‘उनचास दिन’ करीम और संजय की मित्रता अनूठी है..इतनी कि जग में ऐसी मित्रता मुमकिन नहीं. और संजय से ज्यादा जीवंत करीम लगा. बुल्लेशाह की काफियाँ उसको जबानी याद हैं और कितना करीब है वह जिन्दगी के, उनकी सोच के. अमृता प्रीतम ने ऐसा पात्र गढ़ा तो वास्तव में तो वही कबीले तारीफ हैं. कितनी सुंदर बातें कह जाती हैं. वह एक महान लेखिका हैं और एक महान नारी. उनकी कहानियाँ उसने पहले भी पढ़ी हैं और आज भी पढ़ी, ‘करमांवाली’  दिल को छूती है. पर सिर्फ पढ़ना ही पढ़ना हुआ कोई काम नहीं हुआ घर का. नन्हे के कुछ कपड़े प्रेस करने हैं.

जून कल शाम को आए और आज दोपहर चले गए. पहले तो लगा जिनके साथ उन्हें जाना था, वह नहीं आएंगे, पर सवा घंटा इंतजार करने के बाद वे आए, गाजर का हलवा जो कि जून ने बनाया है, उन्हें खिलाया, तारीफ उसकी कर गए. वह बता नहीं पाई कि यह उसने नहीं बल्कि उसके ‘उन्होंने’ बनाया है..पता नहीं क्यों? उनके जाने के बाद कुछ देर नन्हे और उसने टीवी देखा फिर सो गए. शाम को नन्हा खेलने गया कुछ देर को. टीवी पर ‘गर्म हवा’ आ रही थी, जो बांधे रखती है शुरू से आखिर तक, नन्हा अपने खिलौनों में मग्न था, बीच बीच में देखता था. यह फिल्म भीतर तक छू जाती है, जैसे एक कविता हो पर्दे पर लिखी, अभिनय भी कमाल का है, वह दृश्य जहां नायिका विवाह से से पूर्व चूनरी माथे पर ओढ़ती है, और वह  दृश्य जहां आत्महत्या करती है. शायद जून ने भी देखी हो वहाँ, वैसे तो उन दोनों ने एक बार पहले साथ-साथ देखी है यह फिल्म किसी मित्र के यहाँ श्याम-श्वेत टीवी पर.

सुबह उठी तो पेट में हल्का दर्द था जो दोपहर तक बना रहा, हाजमोला ने आराम दिया, ईनो भी था पर उसे वह अच्छा नहीं लगा. नन्हे को भी सर्दी लग गयी है. कुछ देर पहले कहने लगा उसे भी पेट में दर्द है. सुरभि का पत्र आया है, उसे बधाई पत्र भेजेगी, उसकी शादी जो होने जा रही है. शाम तक सब ठीक हो गया वे घूमने गए, उसकी पंजाबी सखी ने दो कैसेट दिए, एक जगजीत सिंह और चित्र सिंह की गजलें तथा दूसरा पाकिस्तानी बेंजामिन सिस्टर्स का पंजाबी गानों का. दूसरा ज्यादा अच्छा लगेगा, गीतों के मुखड़े पढ़कर तो ऐसा ही लगता है.

जून शाम को आए थे और सुबह चले गए, फोन आया है कि पाइप स्टक हो गया है, पता नहीं कब तक चलेगी तलप में ड्रिलिंग. शाम को वे अपने दो मित्र परिवारों से मिलने गए, बहुत दिनों से जाना ड्यू था. अच्छा लगा पर एक जगह वह अपनी बात को जल्दी कहने के कारण ठीक से नहीं समझा पायी, वह ज्यादा उत्तेजित हो जाती है किसी अच्छी बात को कहने के लिए. पर बाद में सामान्य हो गयी. लेकिन घर आते समय फिर वह बात उसे याद आयी और खुद पर गुस्सा आया, और शायद अगले दो-तीन दिनों तक आता रहेगा...खैर इसी तरह ठीक हो जायेगी उसकी यह बुरी आदत.