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Wednesday, April 23, 2014

हार्डी बॉयज के कारनामे


आज आसू ने ‘असम बंद’ का आह्वान किया है सो जून का दफ्तर बंद है और नन्हे का स्कूल भी. सुबह वे पौने छह बजे उठे, उसने खिड़की से झाँका, मौसम आज भी अच्छा है, न तेज धूप न गर्मी और न ही लगातार वर्षा से कीचड़, बादल बने हुए हैं हल्के-हल्के. कल उसने छोटी बहन को एक पत्र लिखा, एक ससुराल में. वह यह लिख ही रही थी कि बाहर वर्षा की झड़ी लग ही गयी. नन्हा अभी-अभी शिकायत लेकर आया कि पापा ने लाइब्रेरियन सर से कह दिया, उसे एजुकेशनल बुक्स भी दिया करे तो उन्होंने story books देना बंद ही कर दिया है. उसे hardy boys पढ़ने का मन है पर वह यह नहीं जानता कि किसी के मन की इच्छा हमेशा पूरी नहीं सकती और जो सच्चाई है उसे स्वीकार लेना चाहिए. आज नैनी बहुत गुस्से में थी, उसे अपनी बेटी के पैर में चोट लगने से इतना दुःख पहुंचा है कि अपनी सोचने-समझने की ताकत ही भूल गयी, आये दिन छुट्टी मांगने पर जब उसको डांट दिया तो काम छोड़ने पर ही उतारू हो गयी, ये लोग भले पैसे-पैसे को मुहताज रहें पर किसी की बात नहीं सुन सकते, इसे स्वाभिमान नहीं मूर्खता ही कहेंगे. कल उसने सिन्धी कढ़ाई का एक और नमूना सीखा, पड़ोसिन की वजह से उसका ज्ञान भी बढ़ रहा है. कल मेहमानों के लिए उसने बड़े मन से भोजन बनाया था. जून ने बहुत दिनों बाद उसके बनाये भोजन की तारीफ़ की.

उसने पढ़ा, “We all want a state of permanency. We want certain desires to last for ever, we want pleasure to have no end. Which means that we are seeking a lasting, continuous life in the stagnant pool. We refuse to accept life as it is in fact.”

जिंदगी हसीन तोहफों से भरी हुई है, अब कल की बात लें, दोपहर को तेज बिजली कडकी, इतनी तेज की वे सभी काँप गये पर उसने गिरकर भी  किसी का विशेष नुकसान नहीं किया, बस उनके रिसीवर व स्पाइक बस्टर का फ्यूज उड़ गया, पास में एक पेड़ के दो टुकड़े हो गये, गैस पाइप से रिसती गैस में आग लगी जो बड़ी आसानी से बुझा दी गयी. वर्षा अभी भी थमी नहीं है. टीवी पर खबरें आ रही हैं, काश्मीर में तरक्की का काम जोर-शोर से चल रहा है. प्रधान मंत्री ने फिर कहा है, Kashmir भारत का अटूट अंग है. उसने सोचा, एक न एक दिन थक हार कर पाकिस्तान आतंकवाद का रास्ता छोड़ ही देगा, तब तक मुश्किलें सहनी होंगी, अपने देश की अखंडता बनाये रखने के लिए कितने लोगों ने अपनी जानें दी हैं और कितनों को अभी और देनी हैं !

आज तेज धूप निकली है, कई हफ्तों की लगातार वर्षा के बाद सभी ने धूप का स्वागत बाहें फैला कर किया होगा, बाढ़ में फंसे लोगों ने भी और सीलन भरे घरों के वासियों ने भी. पेड़ों, पत्तियों, लॉन की घास सभी को तो पानी के साथ साथ धूप भी चाहिए. जून भी बहुत खुश हैं. कल दोपहर लगभग तीन बजे ( तीन बजने से पांच मिनट पूर्व) उनकी नई मारुती ८०० p red यानि मैरून रंग की गाड़ी आ गयी. वह बहुत देर तक उसकी सफाई में लगे रहे. ३००किमि के लम्बे सफर से कीचड़ मिट्टी से भरे रास्तों (सड़क कहना तो नाइन्साफी होगी) से गुजरकर सही सलामत ड्राइवर इशाक आले उसे लाया था, ढेर सारी मिट्टी उसके पहियों और बॉडी पर लगी थी. शाम को वे उसमें सवार होकर मित्रों से मिलने गये, नन्हा अपने मित्र की जन्मदिन की पार्टी में गया था.


आज इतवार की सुबह उठते ही जून फिर नई कार को सजाने में जुट गये, कारपेट, रबर मैट्स आदि लगाये फिर गैराज में जाकर मड गार्ड भी, उन्होंने कहा, कल तिनसुकिया जाकर नई गाड़ी का रजिस्ट्रेशन कराना होगा, वे उसके लिए सूट का प्लेन कपड़ा भी लायेंगे जिस पर उसका सिन्धी कढ़ाई करने व शीशे लगाने का विचार है.  उनका फोन अभी तक ठीक नहीं हुआ है, सो घर पर खबर नहीं दे पाए हैं. बहुत दिनों बाद खाने में आज दाल-चावल खाए, बचपन की याद ताजा हो आई, 

Wednesday, July 24, 2013

इम्तहान इम्तहान

पिछले चार दिन व्यस्तता में बीते. पहला दिन रविवार था, सोमवार को एक सखी के यहाँ गयी थी, शाम को नन्हे को पढ़ाने में व्यस्त थी, मंगल, बुध को शाम को खेलने भी नहीं जा पाई. आज नन्हे का पहला इम्तहान है, गणित का तैयारी ठीक हुई है, अब उसके अपने ऊपर है. जितनी चिंता उसे है उससे ज्यादा नहीं तो उतनी उन्हें भी है, जून से थोड़ी ज्यादा उसे है, अभी सोशल साइंस का पेपर बनाना है. इस तरह छोटे-छोटे इम्तहान देते वह एक दिन जिन्दगी के बड़े इम्तहान देने के योग्य भी बन जायेगा. सुबह के दस बजे हैं, अभी-अभी ‘सोना चाँदी’ पीटीवी का एक हास्य धारावाहिक देखा. आज बगीचा बहुत साफ-सुथरा लग रहा है, कल ही घास काटी गयी है. गुलाबी फूल इसकी शोभा बढ़ा रहे हैं. कल जून ने क्लब की पत्रिका के लिए लिखी उसकी दूसरी रचना भी टाइप कर दी है कम्प्यूटर पर. उन्होंने यह भी कहा, वह लिख सकती है और उसे कुछ कविताएँ हिंदी पत्रिकाओं को भी भेजनी चाहिएं. उसने सोचा कि उन्हें कहेगी वह सिर्फ लिख सकती है उन्हें टाइप करने, भेजने का काम उसके बस के बाहर है. वह  जानती है उसके कहने पर वे ये काम भी कर देंगे. उन्हें अगले महीने शायद मद्रास जाना पड़े, उनकी विवाह की सालगिरह पर उसे अकेले रहना होगा.
कल नन्हे ने परीक्षा में एक प्रश्न का उत्तर नहीं लिखा, आते हुए भी भूल से छूट गया, बहुत देर तक परेशान था, लेकिन बाद में भूल गया, अपनी गलतियों पर देर तक दुःख मनाते रहना भी कहाँ की बुद्धिमानी है? हाँ, इतना जरुर है कि वही  गलती भविष्य में न करे. आज ठंड ज्यादा नहीं है, धूप निकली है चाहे धुंधली सी ही है. नन्हे और उसके मित्र को बस में बैठकर जब वह और पड़ोसिन लौट रहे थे तो उसने अपनी परेशानी के बारे में बताया, वह अपनी लम्बी बीमारी से घबरा गयी है. नूना को लगता है, किसी भी तरह से उसकी सहायता करे, उसने सोचा जब भी समय मिलेगा वह कुछ देर के लिए उसके पास जाएगी. उसे मेडिकल गाइड में दिल के बारे में पढ़ना भी चाहिए.
पिछले कई दिनों से कुछ नहीं लिखा. इस पल अचानक महसूस होने लगा, कहीं कुछ छूट रहा है, जो पकड़ में नहीं आ रहा. दिल में एक हौल सा उठ रहा हो जैसे, अकेलेपन का एक अहसास कचोटने लगा है. यह साल विदा लेने को है, सिर्फ तीन दिनों के बाद एक नया साल आ जायेगा कुछ नई उम्मीदें और नये सपने लिए. इस बार आने वाले साल के लिए कोई कविता नहीं लिखी, कोशिश ही नहीं की. नये वर्ष के कार्ड आने शुरू हो गये हैं जैसे उन्होंने भी सभी को भेजे हैं, उन सभी को जिन्हें इस विशाल संसार में अपना कहते हैं, जिनसे उनका  परिचय है अगर वे लोग भी न होते तो वे कितने अकेले होते....
वर्ष का अंतिम दिन, समय, शाम के सात बजे हैं. वे लोग डिश एंटीना पर ‘जी टीवी’ पर नये वर्ष के उपलक्ष में कार्यक्रम देख रहे हैं. वे बहुत खुश हैं. कल एक मित्र परिवार के साथ तिनसुकिया गये थे, खाना भी बाहर खाया, जून ने उसे एक पुलोवर उपहार में दिया, विवाह की वर्षगाँठ के लिए. आज साल के अंतिम दिन बीते साल की की बातें याद आ रही हैं, कुल मिलाकर यह वर्ष अच्छा बीता लेकिन कुछ घटनाएँ ऐसी भी हुईं जो दुखद थीं जैसे हरियाणा में हुआ अग्निकांड.





Friday, July 19, 2013

पर्ल एस बक - एक महान लेखिका


आजकल हर पल एक ख्याल साये की तरह उसके वजूद के आस-पास टहला करता है कि कहीं कुछ है, अधूरा सा.. जो पूरा होना चाहिए. हर काम करते वक्त यह अहसास तारी रहता है कि इस वक्त उसे कुछ और बेहतर काम करते हुए होना चाहिए था. और बस इसी कशमकश में वह किसी भी काम को पूरे मन से नहीं कर पाती, यह नामालूम सी बेचैनी उसकी फितरत में यूँ तो हमेशा से है पर आजकल यह ज्यादा ही असरदार हो गयी है. शायद इसकी वजह यह है कि हफ्तों से उसका पढ़ना-लिखना छूटता जा रहा है. इसका सबसे बड़ा फायदा है कि  जिन्दगी बेकायदा नहीं रहती, कोई रहता है जो अनुशासित रहना सिखाता है, टोकता है, और यह वही आत्मा ही तो नहीं जिसके बारे में कई जगह पढ़ती रहती है, सुबह जागरण में जिसे सुनती है और एक योगी की आत्मकथा पढ़कर महसूस करने का प्रयत्न करती है. जाने क्यों उसकी दायीं आँख में हल्का दर्द है, यूँ दर्द का किस्सा सुनाने बैठे तो अफसाना लम्बा होता चला जायेगा, अभी तो वह पड़ोस के बच्चे के जन्मदिन की पार्टी से आ रही है, जून भी आते होंगे, नन्हा अभी वही है. बच्चे बहुत खुश हैं, बच्चों को हंसते-खिलखिलाते देखकर रश्क होता है, एक वे हैं की बेबात ही खुश हुए जाते हैं और एक उसके जैसे बड़े हैं कि  उदास होने का बहाना हर पल ढूँढा करते हैं.

आज कई दिनों बाद सुबह के साढ़े दस बजे उसके सुबह के सारे काम हो चुके हैं. मौसम में जादू है, गुनगुनी सी धूप बेहद भली लग रही है. नवम्बर का अंतिम सप्ताह आने को है पर ठंड अभी उतनी ज्यादा शुरू नहीं हुई है. कल शाम नन्हे को पढ़ाने से पूर्व वह अकेले टहलने गयी, अच्छा लगता है शामों की ठंडक और अँधेरे को अपने तेज कदमों से चीरते हुए भेदना. और थक जाने के अहसास होने तक चलते ही चले जाना. फिर वापस आकर लेडीज क्लब की पत्रिका ‘जागृति’ में असमिया के लेख व कहानी पढने का प्रयत्न किया. पढ़ सकेगी एकाध बार और इसी तरह मन लगाकर पढ़ने का प्रयत्न किया तो. कल उन्हें पिकनिक पर जाना है, उसकी तैयारी आज से ही करनी है,.. नदी की तेज धारा, बड़े-बड़े पत्थरों का किनारा, खुला आकाश और उड़ान भरता मन, सचमुच अच्छा लगेगा, ऐसे पलों को शिद्दत से महसूस करना चाहिए, सारी उलझनों को पीछे छोडकर, यूं उसकी तो फ़िलहाल कोई उलझन ही नहीं है, ‘ऊर्जा संरक्षण’ की प्रतियोगिता के लिए कविता लिखने को जून ने कहा था, सो कल दोपहर को लिख दी है, उसे लगता है इस बार कोई पुरस्कार मिलना चाहिए. यूँ न भी मिले, स्वान्तः सुखाय से प्रेरित होकर लिखी है, मात्र अपने मन की खुशी के लिए. क्लब की फैंसी ड्रेस प्रतियोगिता में नन्हे को द्वितीय पुरस्कार मिला है, वह जेम्स बॉंड बना था.

फिर दो दिन का अन्तराल, रविवार को वे पिकनिक पर गये, और उसी दिन सुबह-सुबह उसकी पड़ोसिन को छाती में दर्द के कारण अस्पताल में दाखिल होना पड़ा, अब वह ठीक है लेकिन दिल की बीमारी क्यों और कितनी है, किसी बड़े अस्पताल में जाकर विस्तृत जांच से ही पता चलेगा. उसके बेटे को भी मम्प्स हो गये हैं. परेशानी आती है तो सब ओर से एक साथ. सोमवार को जून ने प्रथम अर्धांश में अवकाश लिया, पिकनिक की थकान थी, और कल मंगल को वह सुबह  धर्मयुग की एक कहानी पढ़ने बैठ गयी सो सारे काम देर से हुए, काम खत्म करके पड़ोसिन का हाल-चाल पता करने चली गयी. दोपहर को अरुण शौरी की किताब ‘द वर्ल्डस ऑफ़ फ़तवा’ के अंश पढ़े ‘संडे’ में, वह मुस्लिम विरोधी लगते हैं लेकिन वास्तव में ऐसे हैं नहीं, उनकी विचारधारा से किसी हद तक वह सहमत है, लेकिन एक किताब को इतना महत्व देने की आवश्यकता ही क्या है.परसों लाइब्रेरी से वह कुछ किताबें लायी है, एक Pearl. S. Buck की China as I see it,  इस किताब के बारे में कई जगह उसने पढ़ा है. एक सामान्य ज्ञान की किताब जून की आने वाली क्विज प्रतियोगिता के लिए और अंतिम योग की किताब जो दुबारा ली है. पर सबसे पहले वह असमिया ही पढ़ेगी यानि उनके क्लब की पत्रिका ‘जागृति’ !