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Tuesday, September 27, 2016

कांगड़ी की आग


यहाँ इस कमरे में झींगुर की आवाज आ रही है. उसके भीतर कुछ पंक्तियाँ गूँज रही हैं.
तुमने ही सींचा है दुःख को
निज प्राणों से सींचा है
साहस करके छोड़ उसे दो
जिसको खुद ही भींचा है
तुमने ही जो राह बनायी
तुम्हीं उसे मिटा सकते हो
काँटों से जो भरी हुई है
तुम्हीं उसे तज सकते हो
खोज रहे हो जिसे जगत में
वह न कभी पा सकते हो
कठिन सही भीतर जाना पर
तुम ही तो जा सकते हो
उलझे हुए हैं सारे रस्ते
जो भी बाहर जाते हैं
एक ही रस्ता भीतर को है
जिस पर संत सभी आते हैं
विधियाँ सारी बाहर-बाहर
छिपा खजाना भीतर है
जब तक स्वयं को खो न डालो
खुद को न पा सकते तुम
स्वयं को खोकर स्वयं को पाते
यह सब प्रश्नों का उत्तर है !

जीवन को यदि एक सुमधुर संगीत में बदलना हो, एक सुंदर चित्र में बदलना हो या एक कविता में ढालना हो तो जीवन में एक लय की बहुत आवश्यकता है. एक नियम, एक मर्यादा का यदि पालन नहीं किया तो जीवन एक अभिशाप बन जाता है. सभी कुछ समय पर हो तथा सभी कृत्यों को सम्मान मिले. यहाँ कुछ भी हेय नहीं है. प्रातः काल उठना भी जरूरी है और रात्रि को समय पर सोना भी. दिन में आधा घंटा विश्राम भी जरूरी है और नियमित व्यायाम भी. जीवन का एक ही पक्ष यदि दृढ़ हो शेष नहीं तो जीवन बेडौल हो जायेगा. कल दोपहर से देर रात्रि तक वह अस्वस्थ थी, कारण थी मर्यादाहीनता. पिछले दिनों दिनचर्या सुचारुरूप से नहीं चल पाई, कभी देर तक पुस्तक लेकर बैठी ही रह गयी, कभी बिना भूख लगे ही क्योंकि समय हो गया था, भोजन कर लिया, कभी अधिक खा लिया, कभी कोई मिलने वाला आ गया तो चाय ज्यादा हो गयी. आज सब कुछ नियमित चल रहा है. पिछले दिनों नियमित साधना भी नहीं की, मन कुछ ज्यादा ही वाचाल हो गया है, उसे साधना होगा, नियमित ध्यान बहुत जरूरी है. जून कल मुंबई से लौट आयेंगे. मौसम अच्छा हो गया है. दिसम्बर की धूप भाने लगी है, पिछले बरामदे में बैठे हुए उसके पैरों पर धूप पड़ रही है, जो सुहा रही है, तेज नहीं लग रही. अस्वस्थता उन्हें स्वास्थ्य की कद्र कराती है, स्वस्थ होने पर वे लापरवाह हो जाते हैं. आज सुबह बड़ी भाभी व भतीजी से बात की, उसका जन्मदिन था. सर्दियों में पिछवाड़े नैनी क्वार्टर्स से कितनी आवाजें सुनाई पड़ती हैं, सब घर के ठंडे कमरे छोडकर बाहर धूप में आ जाते हैं. यूरोप में ठंड बढती जा रही है, काश्मीर में लोग कांगड़ी खरीद रहे हैं, गर्म अंगारों को फिरन के भीतर रखते हैं, मौसम की मार से बचने के लिए आग को अपनी देह के साथ सटा कर रखते हैं. जीवन कितना विचित्र है, महाश्चर्य है.

इसी महीने मंझले भाई व भाभी के विवाह की पचीसवीं सालगिरह है. उनके लिए एक कविता लिखनी है. दोनों का विवाह भी अनोखी परिस्थितियों में हुआ. बड़ी भाभी की छोटी बहन से विवाह का शुरू में विरोध हुआ था, घर में किसी को भी पसंद नहीं आया था यह कार्य. लेकिन धीरे-धीरे सब ठीक होता गया और अब तो सभी को लगता है दोनों एक-दूजे के लिए बने थे. दोनों की एक बेटी है जो होशियार है, धीर-गंभीर है. अपना घर है, धन-दौलत है, कोई कमी नहीं है. भाई ने इंजीनियरिंग की, भाभी ने बनारस हिन्दू विश्विद्यालय से पढ़ाई की, कुछ वर्ष नौकरी भी की विवाह से पूर्व. देखते-देखते समय बीत गया और आज पच्चीस वर्ष हो गये हैं.


Thursday, June 26, 2014

शाकाहारी भोजन



दिसम्बर माह का प्रारम्भ हुए तीन दिन हो गये हैं पर न इन दिनों न ही पिछले कितने दिनों उसे लिखने का समय मिला, उस तरह, जैसे वह चाहती है. इधर-उधर के कार्यों में ही समय गुजरता गया. स्कूल में अभ्यस्त हो गयी है कहना ठीक नहीं होगा क्योंकि अभी भी क्लास वन के बच्चों को पढ़ाने में कुशल नहीं हो पाई है, हरेक बच्चा बोर्ड पर लिखा हुआ अपनी कापी में लिख ले इसकी जाँच करने में कुछ न कुछ छूट जाता है, एक को ज्यादा ध्यान दे तो अन्य ध्यान बंटाते हैं, खास-तौर पर पिछले दो दिनों से गला खराब है, तेज आवाज में बोलना अच्छा नहीं लगता. कुछ बच्चे ज्यादा ही शरारती हैं, कोर्स पूरा करना है, यही सोच कर वह और अन्य अध्यापिकाएं पढ़ाने जाती हैं, पर उन्हें समझाने सुधारने का समय नहीं मिल परता. आज भी घर लायी है स्कूल का काम, क्लास फाइव में सब ठीक चल रहा है. इसी महीने उन्हें दक्षिण-पश्चिम भारत की यात्रा पर भी निकलना है. ऊर्जा संरक्षण पर भी कुछ लिख कर देना है. आज अपेक्षाकृत गला ठीक है सो शाम को वे घूमने जायेंगे, व्यायाम की आदत छूटती जा रही है. इस बार यात्रा में मुम्बई से योगासन करने के लिए विशेष ड्रेस लेगी. पिछले कई दिनों से खत न लिखे न ही कोई पत्र आया. अभी कुछ देर में नन्हा स्कूल से आ जायेगा और फिर जून भी, उनकी शाम का शुभारम्भ हो जायेगा, कुछ देर बागवानी, डिनर की तयारी, अध्ययन और फिर टीवी. कल दो वर्ष पूर्व की डायरी में एक कविता पढ़ी, मन को छू गयी, अपनी ही लिखी एक कविता !

फिर एक अन्तराल, आज शाम उन्हें एक पार्टी में जाना है, जून के दफ्तर के एक उच्च अधिकारी के यहाँ, उसने सुबह से ही तैयारी शुरू कर दी है. उन्होंने पूरे विभाग को बुलाया है. वे भी उनकी तरह शाकाहारी हैं, सो यकीनन उसे वहाँ भोजन पसंद आएगा, वरना तो अक्सर उसे गंध के कारण बहुत जगह दिक्कत होती है. लौटने में जरूर आधी रात हो जाएगी पर ऐसे में नींद कहाँ आती है. उसने आज सुबह भी ‘जागरण’ सुना था, आत्म चिन्तन ही असली दर्पण है जिसमें अपना वास्तविक रूप झलकता है. दूसरा कोई दर्पण दिखलाये तो अहं को चोट लगती है सो स्वयं को दर्पण खुद ही दिखाओ ऐसा सन्त कह रहे थे. मौन रहकर अपनी भावनाओं और विचारों को इतना प्रबल बनाया जा सकता है कि मन प्रसन्न रहे, क्योंकि प्रसन्नता में ही मधुरता है और मधुरता में ही मौन है. मौन में ही आत्म नियन्त्रण आता है. उसने सोचा कितना सही कहा है, आत्म नियन्त्रण रहे तो अहं भी सिर नहीं उठाएगा. मन अपनी हुकुमत चाहता है, अपनी कमियां देखना नहीं चाहता पर इसे समझाने में यदि कोई समर्थ नहीं है तो...क्रोध उपजेगा ही और क्रोधी मन विवेकहीन हो जाता है. छोटा मन स्वयं को ढकने के लिए कितने सरंजाम जुटता है पर बड़ा मन कुछ न कुछ देना चाहता है. देने की स्थिति में ही मन सुखी रह सकता है मांगने की स्थिति में तो सदा शंकित रहेगा. सो मन का मौन बड़ा तप है, मौन ही इन्सान को बनता है, उसकी सुबहों और संध्याओं को सजाता है, इसी सोच-विचार में वह बाहर आई तो लगा दैवीय संगीत चारों ओर बिखरा हुआ है. वर्षा की बूँदों का संगीत, पंछियों और पत्तों का संगीत.. वैसा ही संगीत शायद भीतर भी छिपा हुआ है. मौन में वही संगीत अद्भुत शांति बनकर प्रकट होता है.







Saturday, May 11, 2013

ऊर्जा संरक्षण


   

 दिन खिला-खिला है आज, दोपहर के लिए उसने कई काम सोचे हुए हैं, शाम नन्हे को परीक्षा की तैयारी कराते ही गुजरेगी. कुछ देर के लिए टहलते हुए लाइब्रेरी भी जा सकते हैं. कल दोपहर वे घूमने गए थे पाइप ब्रिज पर, रोमांचक अनुभव था. कल उनकी असमिया टीचर ने व्याकरण पढ़ाई, और साथ ही कहा अब वे नहीं आ पाएंगी, उन्हें अपने घर आने का निमंत्रण भी दिया. उनकी याद हमेशा बनी रहेगी और एक दिन जब वे भाषा सीख जायेंगे उनके घर जायेंगे उनसे मिलने. दीदी का खत नहीं आया न ही छोटी बहन का बहुत दिनों से, क्या हुआ होगा वह कल्पना कर सकती है, और इसलिए कोई विशेष इंतजार भी नहीं है, अर्थात बेताबी भरा इंतजार. आज क्लब जाना है, इम्ब्रायडरी किट के साथ, कल दोपहर भर अभ्यास किया, देखें क्या होता है, फ़िलहाल तो अभी पौने दस हुए हैं, अभी कुछ काम बाकी है...पेट में कुछ हलचल सी लगती है, लगता है ठंड भी लग गयी है एक नामालूम सी बेचैनी भी है..पर इतनी नहीं कि रोजमर्रा के कामों में रुकावट पड़े, सो सब ठीकठाक ही है. जून को सुबह आलू+मकई की रोटी बना कर  दी थी, उसने भी खायी थी, शायद उसी का असर हो. नन्हा आज बिना स्वेटर पहने ही बस में चढ़ गया, फिर पड़ोस के बच्चे के हाथ उसे स्वेटर भिजवाया.

 मौसम आज कल जैसा बिलकुल नहीं है, कल शाम से ही बदली बनी है, बरसने को तैयार.. ठंडी हवा भी बह रही है. कल शाम से ही मन में विचारों का बवंडर उठ रहा है, वही खामख्याली...अपने आप से शिकायतें...उसकी बंगाली सखी ठीक ही करती है कि इन सब से ऊपर रहती है. न पानी में उतरेंगे न डूबने का डर रहेगा..मगर उसे आजकल ओखली में सर देने का शौक जो हो गया है. खैर, बहुत हो गया, इस पर और मगजमारी करना ठीक नहीं, जानती है सिर्फ इतना लिख भर देने से ही उस से मुक्ति नहीं है, वह तो समय ही लाएगा...समय जो सबसे बड़ा मरहम है हर जख्म को भर देता है. नन्हा आज जल्दी आयेगा, माह का अंतिम दिन है, खाना वे एक साथ ही खायेंगे. परसों जून एक सुंदर नया जग लाए हैं, प्लास्टिक बॉडी है अंदर स्टील है, शाम को कोई मेहमान आया तो वे उसे पहली बार इस्तेमाल करेंगे.

  दिसम्बर महीने के दो दिन गुजर गए, वक्त पंख लगाये उड़ रहा है जैसे. कल दोपहर उसकी पुरानी पड़ोसिन आई अपनी बहन के साथ, अच्छा लगा, पुरानी यादें फोटो देखकर ताजा कीं और शाम को मिलकर सबने कवितायें भी पढीं, पर रात होते तक इतना थक चुकी थी कि बिस्तर पर जाते ही नींद ने घेर लिया. कल जून क्लब मीट के सिलसिले में एक नोटिस लाये जिसमें सोविनियर में हिंदी अनुभाग के लिए उसका नाम भी था, अच्छा लगा पहली बार अपना नाम कमेटी मेम्बर्स की लिस्ट में देखकर. दो दिन पहले ऊर्जा संरक्षण के लिए स्लोगन व कविता लिखने का काम भी दिया था जून ने, जो अभी तक शुरू भी नहीं किया है.


Saturday, February 9, 2013

अयोध्याकाण्ड


  
 दिसम्बर शुरू हो गया है, उसके पास फुर्सत नहीं कि आते-जाते दिनों, महीनों का हिसाब रख सके. पता नहीं कहाँ से एकाएक इतनी व्यस्तता आ गयी है. लाइब्रेरी से लायी किताबें व घर से लायी दो किताबें भी अनपढ़ी रह गयी हैं, पत्रिकाएँ भी बिन पढ़े लौटा दी जाती हैं, कुछ मित्रों ने मिलकर एक पत्रिका क्लब बनाया है, हर हफ्ते ही नई आ जाती हैं. पिछ्ले दिनों वीसीपी पर तीन फ़िल्में जरूर देखीं, पर्दे सिले, चादर पूरी की, मिक्सी का कवर भी बनाना आरम्भ किया है उसने. नन्हे के लिए एक टोपी भी बनानी है उसे. चिट्ठियाँ लिखीं. अभी नए साल के कार्ड सहित कुछ पत्र और लिखने हैं.  कल बड़े भाई का जन्मदिन था, उन्हें कार्ड मिला होगा, उसने मन ही मन पुनः शुभकामनायें दीं. कल पंजाबी दीदी का भी एक बड़ा लम्बा सा पत्र आया है. सुबह से सूरज महाशय छिपे हुए थे बादलों के पीछे, अभी-अभी दर्शन दिए हैं. परसों जो बड़ियां बनाई थीं, वह तो रसोईघर में सूख रही हैं, यहाँ गैस का चूल्हा चौबीसों घंटे जलता रहता है कभी मद्धिम कभी तेज, सो गीले कपड़े हों या चिप्स और वड़ियाँ, सभी किचन में सुखाये जा सकते हैं. लेकिन उसे आश्चर्य होता है, हर बार जब भी मुन्गौड़ी आदि बनाये, धूप गायब..मौसम का मिजाज समझना बहुत मुश्किल है यहाँ..

आज फिर वही कल का वक्त है, लेकिन धूप नहीं है, कल थोड़ी बहुत निकली भी थी, आज तो बदल छंटे भी नहीं, ठंड काफी बढ़ गयी है. सुबह किसी का भी बिस्तर छोड़ने का मन नहीं था, नन्हा सुबह स्कूल जाने में एक बार तो डरा. पर फिर समझ गया कि स्कूल एक दिन छोड़ सकता है पर ठंड तो रोज रहेगी ही. महीने के अंतिम सप्ताह में छोटा भाई परिवार सहित आने वाला है, वे बहुत उत्साहित हैं. कल शाम जून का एक मित्र परिवार विदा लेने आया, वे अपना मकान बनवाने का शुभारम्भ करने जा रहे हैं, उनका भी मकान बनवाने का स्वप्न है, जमीन खरीदने की बात वे करके आये थे.

अयोध्या में हुए टकराव की वजह से देश के कई शहरों में, उतर प्रदेश के अठारह जिलों में कर्फ्यू लगना पड़ा है. हालात कब तक सुधरेंगे कहा नहीं जा सकता. पता नहीं यात्राएँ भी सुरक्षित होंगी या..उसे भाई का स्मरण हो आया. कहीं उसे कार्यक्रम स्थगित न करना पड़े, क्या इतना निराश होना सही है, पर इस अनिश्चित वातावरण में कुछ भी नहीं कहा जा सकता. नन्हे की परीक्षाएं चल रही हैं, आज उसका तीसरा पेपर है, गणित का. कल शाम से ही उसका मन अस्थिर है, बात यूँ तो कुछ भी नहीं, पर मन का कोई क्या करे जो ‘आ बैल मुझे मार’ की तर्ज पर चलता है.


 


Thursday, October 18, 2012

नए वर्ष का स्वागत



दिसम्बर का प्रथम दिवस, सर्दी जितनी होती है इस महीने में उतनी नहीं है. सम्भव है इस महीने में ठंड बढ़े. आज बड़े भाई का जन्मदिन है. आज उसने कक्षा आठ को अंकगणित में समानुपात पढ़ाया, उनका कोर्स बहुत कम हुआ है, और छात्राएं भी होशियार नहीं लगीं, गलती छात्राओं की कम, अध्यापकों की अधिक है. गणित के वह टीचर..लगातार पान चबाते हुए...क्या प्रभाव डाल पाएंगे विद्यार्थियों पर. वितृष्णा सी होती है देखकर..खैर, किसी तरह ग्यारह दिन और पढ़ाना है.

अभी तक जून के पहुंचने की कोई खबर नहीं आयी है, उसे चिंता होने लगी है. पता नहीं क्या बात है, उसके मन में विचारों की श्रंखला चलने लगी, वह ठीक तो होगा, क्या उसे यह बात पता होगी कि उसका कोई समाचार उन्हें नहीं मिल रहा है. फिर भीतर से किसी ने कहा कि परसों यानि सोमवार को उसका पत्र अवश्य आयेगा. उसने मन ही मन ढेरों शुभकामनायें उसके स्वास्थ्य के लिए कीं, उसकी खुशी के लिए कीं और मन हल्का हो गया. आज ही उसे पता चला कि जब अगले शनिवार तक उसके गणित के सत्रह पाठ हो जाएंगे और विज्ञान के ग्यारह, उसी दिन अध्यापन का अंतिम दिन है.

इतने दिनों से डायरी नहीं खोली, आज जाकर अवसर मिला है, अध्यापन फ़िलहाल तो समाप्त हो गय है. अब सोमवार से पढ़ाई शुरू होगी. आज माँ-पिता व छोटे भाई-भाभी के पत्र आये हैं. छोटी बहन का पत्र आया था, उसे जवाब लिखा है, पता नहीं उस पर क्या प्रतिक्रिया होगी. काकू की तबियत अभी तक ठीक नहीं हुई है, उसने सोचा कि उसे एक कार्ड भेजेगी. जीजाजी भी नहीं होंगे सो दीदी का पत्र तो आने से रहा. उसकी ननद भी जो बैंक की तरफ से ट्रेनिंग में गयी हुई थी, आजकल में लौटने वाली है.

आज बहुत दिनों बाद थ्योरी की कक्षाएं हुईं, कुछ समझ में ही नहीं आ रहा था. सुबह से वे खाली थे, फिर अंतिम दो कक्षाएं हुईं, सुधा मैम का लेक्चर अच्छा था, आरती मैम का विषय बहुत उबाऊ था, और किसी दिन पढातीं तो शायद ऐसा न होता पर दिन भर प्रतीक्षा करते करते मन थक चुका था. कल कालेज में गेम्स होंगे, पीटी करवानी होगी, उसने अपना नाम तो दे दिया है. परीक्षा की तारीखें आ गयी हैं, १५ अप्रैल से शुरू होंगी और अप्रैल के आखिर तक चलेंगी संभवतः. मई में वे अपने घर जायेंगे.

आज जून का पत्र आया है. शाम को बाजार गयी थी, लौटी है कुछ देर पूर्व ही, मन-मस्तिष्क थका हुआ है. कल कालेज में कुछ नहीं हुआ सिवाय बातों के. आज सोचा है देर से जायेगी. सिर्फ ‘बागवानी’ होगी और सम्भवत ‘जनसंख्या’ का पीरियड हो, पर उसे बाद में नोट किया जा सकता है. वह नए वर्ष के लिए कुछ कार्ड्स लायी है.

नववर्ष के शुभागमन के साथ ही
तुम्हारे सौभाग्य का उदय हो...
चलते चलो
जीवन के पथरीले पथ पर
दर्द जितना अधिक हो
सुख उतना ही ज्यादा होता है उसके मिटने पर
तपकर ही निखरोगे
जीवन की धूप में तपकर
निखार आएगा
नए वर्ष में स्वप्न देखो
तारों को छूने के
तभी आकाश तक पहुंच पाओगे
जीवन के इस समुद्र में
तैर कर पार हो जाओगे
चलना, तपना, तैरना और स्वप्न पूर्ण करना
क्या चारों पर्यायवाची नहीं..?