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Saturday, October 15, 2016

गुलाब वाटिका


पौने तीन बजने को हैं थोड़ी देर में कार आ जाएगी और वह मार्केट जाएगी फिर वहीँ से उन वृद्धा आंटी से मिलने जाएगी, जिनके भाई का देहांत परसों ब्लड कैंसर से हो गया, अन्य कई रोग भी उन्हें सता रहे थे. बुढ़ापा अपने-आप में एक रोग है. उसके खुद के दांत में भी पिछले कुछ दिनों से थोड़ा दर्द है, यथा सम्भव मुंह व दांत साफ रखने की चेष्टा करती है, शेष जो हो सो हो. कल ब्लॉग पर एक हास्य कविता पोस्ट की, नन्हे को पसंद आई. कल नन्हे ने एसी से आने वाली गंध का कारगर इलाज बताया, बच्चों का दिमाग यकीनन तेज चलता है. उसका दिमाग तो अब एक ही ट्रैक पर चलता है. ध्यान का अनुभव जिसे एक बार हो जाये उसे ऐसा ही होता होगा. अब इस जगत की किसी भी वस्तु में कोई रूचि नहीं रह गयी है, सब खेल लगता है. उनके भीतर एक और जगत है, फूल उतने ही सुंदर हैं भीतर और आकाश उतना ही विशाल..लेकिन सद्गुरू की बात मानकर साधना, सत्संग, सेवा व स्वाध्याय फिर भी जारी रखने होंगे. साधना करने में अब केवल ध्यान में ही रूचि रह गयी है, ज्ञान सुनने की जगह भीतर का सन्नाटा सुनना भाता है. कल से पिताजी आ रहे हैं तो वैसे भी उनकी दिनचर्या बदल जाएगी. आज सुबह नृत्य उतर आया था और कुछ शब्द भी..कुछ पंक्तियाँ बाद में लिखीं पर जो शब्द स्वत: फूट रहे थे वे बाद में याद नहीं रहते. सुबह गुलाब वाटिका में टहलने गयी, माली, सफाई कर्मचारी सभी अपने-अपने काम में लगे थे. एक बूढ़ी महिला घास काट रही थी, उससे बात की तो कितनी खुश हो गयी. उस बगीचे के माली फूलों के बीज सुखा रहे थे, उसने भी गेंदे के फूल सुखाने को रखे हैं. जीवन उनके चारों और बिखरा है, कण-कण में वही तो है, वह परमात्मा उसका अपना है !

आज बड़े भाई-भाभी के विवाह की सालगिरह है, तीन दशक हो गये उनके विवाह को, भाई दो वर्ष बाद रिटायर हो जायेंगे. उनसे बात की, आज छुट्टी है, भाई की तबियत ठीक नहीं है, सोये थे. उसने उन्हें कार्ड में कविता भेजी थी, लेकिन मन भी तो प्रफ्फुलित होना चाहिए तभी कविता भाती है. जीवन का आनन्द क्या है इसका पता ही नहीं चल पाता कि जिन्दगी हाथ से फिसल जाती है. कल छोटी बहन को भी एक कविता भेजी. मौसम बदल रहा है, अब वे आंवले-लौकी-एलोवेरा का जूस पीना शुरू कर सकते हैं. कल सुबह उसने मन को खुली छूट दे दी थी, सुबह टहलने गयी दोपहर बाद बाजार..भगवान कृष्ण  कहते हैं जो सब जगह उन्हें ही देखता है वही देखता है, यदि ब्रह्म उनका मूल है तो एक अर्थ में वे भी वही हैं. मूल से ही फूल होता है, दोनों को एक साथ ही देखना होगा, समग्रता में. डाल से टूटा फूल कब तक रहेगा. आज पिताजी आ रहे हैं, अगले कुछ दिनों तक वे व्यस्त रहेंगे, जीवन का एक नया रंग प्रसुत होगा. आज बगीचे में कुछ काम करवाया. उसकी ऊर्जा इन्हीं छोटे-मोटे कामों में ही लग रही है, कुछ बड़ा काम उसके हाथों से होने वाला नहीं है, लेकिन सद्गुरु कहते हैं जो भी काम हो यदि उसे निष्काम भाव से किया जाये तो वह भी मुक्त करता है. सुबह से रात्रि तक मन समता में रह पाता है या नहीं इस बात पर निर्भर करता है उनका विकास, लेकिन मन यदि इस कामना से पीड़ित हो कि उसे कुछ महान कार्य करना है तो वह कामना ही बंधन का कारण बनेगी. कर्म कर्ता भाव से मुक्त होने के लिए ही है न कि कर्म करके कुछ बन जाने के लिए. उनके भीतर एक तृप्ति का अहसास हो, संतुष्टि हो और आनंद हो, वही प्राप्य है !

पिछले तीन दिन कुछ नहीं लिखा, उस दिन दोपहर ढाई बजे पिताजी आ गये थे, आज उन्हें आये पांचवा दिन है. उन्हें यहाँ रहना अच्छा लग रहा है पर और पांच दिन रह कर वापस जायेंगे ही. आज एक सखी के विवाह की वर्षगांठ है, वे सभी पार्टी में जाएँगे.