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Friday, August 24, 2018

भेलपूरी की चाट



पिछले दो दिन फिर कुछ नहीं लिखा, दिन जैसे उड़ रहे हैं. मन भी श्रद्धा और विश्वास के पंख लगाकर ऊंची उड़ान पर निकल जाता है अक्सर, कितने-कितने भाव उमड़ते हैं पर उन्हें शब्दों में बांधने का अवसर नहीं आता, कलम हाथ में ही नहीं ली तो अवसर भी कैसे आएगा. आज शाम को एक मित्र परिवार भोजन पर आ रहा है, उनका पालतू कुत्ता भी आएगा. एक अन्य सखी भी अपने पुत्र के साथ आएगी. सात्विक जैन भोजन बन गया है. चावल व रोटी समय पर ही बनेंगे. वे लोग प्याज अदि नहीं खाते, उम्मीद है भोजन सबको भायेगा. सुबह स्कूल से लौटकर देखा, पूसी के पैर में चोट लगी है, वह लंगड़ा कर चल रही थी. सुबह से एक ही जगह बैठी है. सुख-दुःख हरेक जीव के साथ लगा रहता है. वह शांत भाव से इसे सह रही है. उसने दवा लगाई, कल तक सम्भवतः ठीक हो जाएगी.
आज रथयात्रा है. भगवान जगन्नाथ, बलराम व सुभद्रा की अपनी मौसी के यहाँ जाने की यात्रा का उत्सव, नौ दिन बाद वे पुनः अपने घर लौट कर आयेंगे. कितने अद्भुत त्यौहार हैं भारत की संस्कृति में, कितनी कहानियाँ जुडी हैं इस उत्सव के पीछे. वे पहली बार डिब्रूगढ़ के जगन्नाथ मन्दिर में रथयात्रा देखने गये. मन्दिर को बहुत कलात्मक तरीके से सजाया गया है. धूप तेज थी, संगमरमर की सीढ़ियाँ तप रही थीं. उन्होंने खिचड़ी का प्रसाद पाया और कुछ देर रुक कर लौट आये, रथ को रज्जु से खींच कर दो किमी तक ले जाया जाना अभी शेष था. उससे पूर्व उन्होंने श्वेत फूलों से बनी सुंदर माला वहाँ रखवाई. मूर्ति भी आने के बाद वहीं रखी जाएगी, तब उसे चढ़ाया जायेगा, ऐसा उन्हें बताया गया. कल रात का भोज अच्छा रहा. सखी अपने पेट् डॉग के साथ बाहर बरामदे में ही बैठी. पूसी का पैर अब ठीक है, वह ठीक से चल पा रही है. आज सुबह बहुत दिनों के बाद श्वास की तीव्र गति के साथ ध्यान किया, जिसके बाद काफी देर तक मन बिलकुल स्थिर हो गया था, प्रवृत्ति में आना ही नहीं चाहता था. वर्षा के कारण प्रातः भ्रमण के लिए नहीं जा सके, बल्कि बगीचे में जामुन बीने, पके और मीठे, कल नन्हा आ रहा है, उसे भी पसंद आयेंगे. उसके एक स्कूल के मित्र का विवाह है, जो अब डाक्टर बन गया है.

नन्हा आ गया है, दोपहर को कार से उतरा तो साथ उसका एक मित्र भी था. बिना बताये मित्रों को घर लाने की उसकी पुरानी आदत है. कल रात एक अनोखा स्वप्न देखा. जिसमें अपने भीतर आँतों में भोजन को पचते हुए देखा. पालक का साग था या अन्य कोई हरी पत्तेदार सब्जी, कितना हर रंग था, जो आँतों में घूम रही थी. रात को सोने से पूर्व हृदय व फेफड़े पर ध्यान किया था कि भीतर क्या चल रहा होगा. प्रकृति उन्हें सब जताना चाहती है, यदि कोई जानना चाहे तो.

दस बजने को हैं. नन्हा अपने मित्रों के साथ तिनसुकिया गया है, वहीं से वे दिगबोई जायेंगे, दोपहर लंच तक वापस आयेंगे. एक मित्र मुम्बई से आया है, एक मैंगलोर से और एक बंगलूरू का, सभी डाक्टर हैं तथा दूल्हे के मित्र हैं. नन्हे की एक मित्र भी आई है, जो आज रात विवाह में शामिल होने के बाद कल वापस जा रही है.

कल दोपहर वह डिब्रूगढ़ के जेजे मेमोरियल अस्पताल गयी थी, क्लब की प्रेसिडेंट की बेटी को देखने. उसके रक्त में प्लेटलेट्स की संख्या काफी घट गयी है, कई दिन से इलाज चल रहा है. आज नन्हे का जन्मदिन है. सम्भवतः इस वर्ष के अंत तक वह विवाह करने का निर्णय ले ले. सर्दियों में ही विवाह का कार्य सम्पन्न करेंगे. सादा विवाह जिसमें विधि का ध्यान रखा जाये, एक गरिमापूर्ण आयोजन हो. यहीं पर करना ठीक होगा क्योंकि यहाँ का शांत वातावरण सभी मेहमानों को भी पसंद आएगा. देखे, भविष्य में क्या लिखा है, पहले तो सभी को सुनकर कुछ अजीब लग सकता है, पर जब उन्होंने इसे स्वीकारा है तब किसी को कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए.

नन्हे के मित्र का विवाह सम्पन्न हो गया. कल गये थे वे रिसेप्शन पार्टी में. वापसी में नन्हे ने कहा वह अपने मित्र के मित्र के साथ शिवसागर जाना चाहता है. जून को लगा वे लोग उनकी कार में जाने की बात सोच रहे हैं. उन्हें अपनी कार से लगाव है, फिर उन्हें यह भी अच्छा नहीं लगा होगा कि इतने कम समय के लिए पुत्र आया है और घर में समय बिताना नहीं चाहता. वह वापसी की यात्रा में चुपचाप बैठे रहे. पिता-पुत्र में एक दूरी सी आ गयी हो ज्यों. कल्पना के कारण मन स्वयं को दुखी कर लेता है. शायद वह दुखी होने का बहाना ही खोज रहा होता है, अहंकार का भोजन ही है दुःख, वह उसी पर पोषित होता है. पर आत्मा यह भूल जाती है कि हर नकारात्मक विचार उसे खुद से कितना दूर ले जाता है. शाम के साढ़े तीन बजने को हैं, नन्हा सुबह से कम्प्यूटर पर ही है. शाम को एक मित्र परिवार मिलने आएगा, वे भेल-पूरी और चाट बनायेंगे. सुबह-सुबह ही एक सखी का फोन आया, वह बाद में खुद आई और प्राणायाम व आसन की विधि सीखी. कितना सहज हो गया है उसके लिए अब किसी को यह सब सिखाना. भीतर की ग्रन्थि जो कट गयी है. उसकी बिटिया को पूसी से खेलना बहुत पसंद है. हो सकता है शाम को वर्षा हो जाये, इस समय बाहर बहुत तेज धूप है. जुलाई भी आधा बीतने को है, पहली अगस्त से स्कूल खुल जायेगा. आज सुबह क्लब की सेक्रेटरी से बात हुई, वह शीघ्रातिशीघ्र अपने पद से मुक्त होना चाहती है. नई कमेटी जितनी जल्दी बने उतना ही अच्छा है. एक तमिल सखी का फोन आया, सदा की तरह कहा, एक दिन आएगी योग सीखने !  

Saturday, July 30, 2016

चाट का स्टाल


आज उनके घर में इस ध्यान कक्ष में ‘सहज समाधि’ कोर्स का पहला भाग सम्पन्न हुआ ! सद्गुरु की कृपा उनके शहर पर हुई है उनके घर पर भी हुई है, उन सब पर हुई है. सदा से ही थी पर वे उसे  अनुभव कर सकें ऐसी पात्रता भी तो चाहिए ! आज सुबह उसने गुरू पूजा की तैयारी की, ठीक समय पर टीचर आ गयीं, कुल उन्नीस साधक हो गये, तीन ने पहले ही कोर्स कर लिया था, उसे और पिताजी को मिलाकर सोलह ने दीक्षा ली. पहले सहज समाधि का अर्थ बताया फिर मस्तिष्क की कार्य प्रणाली, फिर तनाव का कारण..और फिर एक-एक करके मन्त्र दिए. सात बार मौन होकर जाप करने को कहा, बीच-बीच में सात सामान्य श्वास लेनी हैं. उसे छोटा सा मन्त्र मिला है, सुंदर है, हो सकता है सभी को यही देते हों, क्योंकि किसी को बताना तो है नहीं, है न गुरूजी का ट्रेड सीक्रेट ! बहुत अच्छी तरह सारा कार्य हो गया, अब कल सुबह नौ बजे से एक घंटा ध्यान होगा तथा परसों भी. उसने कल कितनी जगह फोन किये लेकिन दो महिलाओं को छोड़कर कोई नहीं आया, जो लोग एडवांस कोर्स कर रहे हैं, उनमें से ही अन्य सभी लोग आये. जून अभी तक फील्ड से नहीं आये हैं, सम्भवतः अब आ रहे हों. आज कितना हल्का-हल्का लग रहा है, वैसे तो रोज ही लगता है पर आज सद्गुरु का एक काम उनके घर पर हुआ, वे निमित्त हुए, आर्ट ऑफ़ लिविंग परिवार का हिस्सा तो वे थे ही आज उस पर मोहर लग गयी. आज का दिन खास है. आज पिताजी ने अपने जीवन में पहली बार मन्त्र दीक्षा ली. उन्होंने बाद में अभ्यास भी किया, उनका जीवन सफल माना जा सकता है, उम्र के अस्सीवें वर्ष में हैं पर जोश जवानों से बढ़कर है, जीवन दर्शन बहुत ऊंचा है, प्रेम भी है पर थोड़ा  क्रोध है और अभी तक परमात्मा का पूर्ण अनुभव नहीं किया है, झलकें अवश्य पायी होंगी. उसे इस क्षण लग रहा है जैसे कुछ करने को नहीं है, कृत-कृत्य हो गया है मन..प्राप्त-प्राप्तव्य हो गयी है आत्मा..   
पिछले साल इन्हीं दिनों दीदी अपने बड़े पुत्र के विवाह की तैयारी कर रही थीं और वे भी यहाँ योजना बना रहे थे कि जाना है भांजे की शादी में...
महीनों से करती तैयारी..     
भरे उमंग, उत्साह अति मन में  
सारे घर को चमका डाला
कितना कुछ नया मंगवा डाला
दुकानों में जातीं लम्बी फेहरिस्तें
मेहमानों के आने के देखे रस्ते
साड़ियाँ, सूट और रेशमी परिधान
सपनों में आने लगे अब तो थान
कार्ड छपवाने से हाल बुक करने तक
चाट, मिठाई के स्टाल लगाने तक
सजाने हैं फूलों से आंगन और हाल     
बेटे की शादी है नहीं कोई खेल !

थोड़ी देर पहले टीचर से मिलकर आयी, उनके घर पर बचपन से ही आध्यात्मिक माहौल था. पिताजी रामकृष्ण मिशन से जुड़े थे, कई संत उनके घर आकर रुकते थे, भविष्यवाणी की थी कि वह भी अध्यात्म के पथ पर चलेंगी, पर वह ऐसा मानती थीं कि दोनों मार्ग साथ-साथ चलेंगे. सामान्य जीवन भी अपने कर्म से चलेगा और अध्यात्म का भी एक उचित स्थान रहेगा, पढ़ाई आदि उसी तरह की, लेकिन सन सतानवे में बेसिक कोर्स करने आश्रम गयीं तो वहाँ योग की टेकनीक सीखने गयी थीं पर गुरूजी से मिलने के बाद जो अनुभव हुआ, वह अविस्मरणीय था. उसने जीवन की दिशा ही बदल दी.



Sunday, February 3, 2013

रिमोट कंट्रोल वाली कार


आज नन्हा घर पर है, उसके स्कूल में रक्षाबंधन का अवकाश है. उसने नारियल की बर्फी बनाई है जो यकीनन जून को पसंद आयेगी. कल छोटे भाई का खत आया, वह उदास है पर उसकी कविता उसे मिली होगी..शायद कुछ पलों के लिए ही सही उसे उत्साह मिला तो होगा. कल शाम जून के विभाग के दक्षिण भारतीय सहकर्मी अपनी नव विवाहिता पत्नी को लेकर आए थे, उनकी माँ भी साथ थीं. वे लोग बहुत अच्छे लगे खासतौर पर उनकी पत्नी जिसका नाम भी पूछना वह भूल गयी. वह जीवन-उर्जा से भरी हुई थी और उसका व्यक्तित्त्व भी बहुत आकर्षक था.

साल का आठंवा महीना भी आधा बीत गया यानि यह डायरी अब उसके साथ कुछ ही वक्त रहेगी, फिर नया साल और नई डायरी. कितने वर्षों से कितनी ही डायरियां उसके साथ चली हैं लेकिन सही अर्थों में लिखना उसे अभी तक नहीं आया. डायरी अपने मन का आईना होती है लेकिन क्या वह, वह सब लिख पाती है जो लिखना चाहिए, कभी मूड नहीं होता, कभी समय नहीं, कभी रात को सोते वक्त कोई बात याद आती है लेकिन सुबह तक भूल जाती है. वैसे भी मन पर वश है कहाँ, जैसे आज लिखने को कह रहा है कल पलट भी सकता है. आज मौसम  अच्छा है, धुप मद्धिम है, जून के आने का वक्त हो गया है, अभी भोजन का कुछ कार्य शेष है मसलन रोटी बनाना, सो वह पाकशाला में चली गयी.

कल वह तीसरी बार कर्मचारियों के क्लब में लगा मेला देखने गयी, सोनू और उसका मित्र उत्साह से भरे थे, उसकी असमिया सखी को लॉटरी खेलने का मन था. वह यूँ ही सबके साथ गयी थी. कल कोई खत नहीं आया, पता नहीं उसे किन पत्रों की प्रतीक्षा है. दीदी, माँ-पिता, छोटी बहन, तीनों भाई, शायद सभी के पत्रों का. नन्हे को अगले वर्ष से वे पिलानी के पब्लिक स्कूल में पढ़ाएंगे, ऐसा उनका विचार तो है और अब धीरे-धीरे वह भी रूचि लेने लगा है.उसे एडजस्ट करने में ज्यादा मुश्किल नहीं होगी क्योंकि साल भर में मानसिक रूप से वह तैयार हो जायेगा. जुलाई में परीक्षा होगी. अभी पूरा एक वर्ष है. और इस एक वर्ष में उसे यहाँ के सेंट्रल स्कूल में जाना है, जो किसी भी लिहाज से आदर्श स्कूल नहीं है.

उसके साथ कई बार ऐसा हुआ है, पिछले हफ्ते एक दिन उसने सोचा कि बहुत दिनों से वह अस्वस्थ नहीं हुई है और कल से परेशान है इस सर्दी से. कल व परसों हल्की खराश सी थी गले में, लेकिन आज ऑंखें भी भारी लग रही हैं और आवाज भी बदल गयी है. कल शाम वे कहीं जाने के लिए तैयार हो रहे थे कि उनका परिचित एक पंजाबी परिवार आ गया, अच्छा लगा उनसे बातें करके, उनकी छोटी सी गुड़िया खूब बातें करती है. कल दोपहर को उसने गोलगप्पे बनाने का असफल प्रयास किया, पांच-छह ही फूले, बाकी की पापड़ी बन गयी. फिर जून ने अच्छी सी चाट बनाई-पापड़ी, आलू, चने की चाट. नन्हे की रिमोट कंट्रोल वाली कार का एक छोटा सा पार्ट कहीं खो गया कल रात, सुबह जल्दी उठकर वह ढूँढ भी रहा था..लेकिन मिला नहीं. कल उसका अंग्रेजी का टेस्ट है. कल नूना ने असमिया की किताब पढनी शुरू की थी, कम से कम इतनी असमिया तो सीख ही लेनी चाहिए कि किसी का हालचाल पूछ सकें.