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Friday, March 18, 2016

पलटू साहिब की वाणी


आज बहुत दिनों बाद पूरी साधना की. स्वास्थ्य लौट रहा है. शनिवार है सो बच्चों की योग कक्षा में जाना था, गाड़ी को पौने नौ बजे बुलाया था पर देर से आई और पल भर के लिए उसका मन तथा वाणी रोष में आ गये,. सद्गुरू कहते हैं, सहज रहो और कभी-कभार यदि क्रोध आ जाये तो उस पर पश्चाताप न करो, खैर..वह क्षण भर में ही सहज हो गयी क्योंकि रोष का भागी बना ड्राइवर जिसका कोई दोष नहीं था. बच्चे काफी आये थे, लगभग तेतीस-चौंतीस बच्चे, तबला भी ले गयी थी, जिसे एक बच्चा ले गया जो बहुत सुर में गाता है. वस्तुएं भी अपना मालिक ढूँढ़ लेती हैं. हारमोनियम असमिया सखी के यहाँ है, उसकी बेटी सीख रही है, दोनों यहाँ पड़े-पड़े व्यर्थ हो रहे थे. इस समय दोपहर के तीन बजे हैं, माँ कोई दक्षिण भारतीय धार्मिक फिल्म देख रही हैं. कल जून वापस आ रहे हैं, नन्हा वापस अपने हॉस्टल जा रहा है. रात सद्वचन सुनते-सुनते सोयी तो नींद ठीक सुबह साढ़े चार बजे खुली, कोई स्वप्न भी नहीं, गहरी नींद. शुभ संकल्प मन को शांति से भर देते हैं, मन व्यर्थ ही सोचता रहे तो नींद में स्वप्न चलते हैं. दोपहर को पलटू महाराज के पदों की व्याख्या सुनी, एक में वह कहते हैं कि वसंत आ गया है और वह अभी तक सो रही है, कैसे बावरी हुई है, उसे इस बात की भी चिंता नहीं है कि कन्त अभी तक घर नहीं आए हैं. जीवन रूपी वसंत उन्हें परमात्मा ने सौंपा है पर वह स्वयं अभी दूर है, परमात्मा उन्हें इसीलिए तो दुनिया में भेजता है कि एक दिन वे उसे अपने दिल में बुलाएँ और उससे प्रेम का आदान-प्रदान करें !   

आज तो शरीर में एक और उपद्रव हो गया है, सिर के पिछले भाग में पीड़ा हो रही है, ‘मर्ज बढ़ता गया ज्यों-ज्यों दवा की’. शायद किसी कर्म का उदय हुआ है. आज रामदेव जी साप्ताहिक योगचर्या के पहले भाग ‘सोमवार’ के अनुसार आसन किये. मन शांत है क्योंकि ज्ञान में स्थिर है ! पिछले दिनों क्रोध भी जगा, ईर्ष्या भी, जब तक अहंकार की ग्रन्थि नहीं खुलती, विकार बने ही रहेंगे. एक मूल कारण है अज्ञान, आत्मा का ज्ञान न होना ही वह अज्ञान है. कई बार लगा है कि बस सब जान लिया लेकिन मन व बुद्धि के स्तर पर जानना और है, उसे जीवन मे उतारना बिलकुल अलग है. अब भी कई बार दिन भर में मन में गलत भाव बनते हैं, भाव बिगड़ता है. जब आस-पास कोई न हो तब साधना में दृढ़ रहने में क्या दिक्कत है. जब लोगों से वास्ता पड़े उनके साथ संबंध बनें तभी परीक्षा होती है. पिछले कुछ दिनों से नैनी को सुबह हरिओम कहना भी छोड़ दिया है क्योंकि कोई लाभ नहीं लगा, ईश्वर का नाम लेने में भी मन लाभ सोचता है कैसा बनिया मन पाया है, खैर उसके पीछे दूसरा कारण भी था, उसे ही बंधन लगता था सो मुक्त कर दिया. सासु माँ के साथ संबंध गहरा नहीं है, वह ज्यादा निकटता नहीं चाहती, यह भी उतना बुरा नहीं है पर क्रोध का जगना दिखाता है कि उसके भीतर अहंकार की जड़ें कितनी गहरी हैं !



Wednesday, December 4, 2013

सेवेन समर्स- मुल्क राज आनन्द


पल में बदली पल में सूरज
पल-पल मौसम रूप बदलता
हवा उड़ा ले जाती बादल
आंचल ज्यों माथे से सरकता

सूर्य रश्मियाँ प्राण फूँकती
मेघा नमी पवन को देता  
हवा बिखेरे मादक सौरभ
धरती भर देती मोहकता

खिड़की से झांकता बसंत
महक उठे हैं दिग दिगंत
ज्यों करवट ली कलियों ने
फूलों ने ली अंगडाई
कोंपल कोंपल में हरीतिमा
नव पल्लव धर मुस्काई

कल महीनों बाद मन में कविता उगी, बसंत के आगमन से कोई दिल अछूता रह भी कैसे सकता है, गेट पर खड़ा वह श्वेत फूलों से भरा वृक्ष इतना सुंदर दखता है. हवा में आम के बौर की खट्टी-मीठी खुशबू, सब कुछ इतना मोहक हो जाता है इस मौसम में और इसी मौसम में तो आता है रंगों का त्योहार होली ! वे इस बार होली पर जयपुर में होंगे. आज नन्हा समय पर तैयार हो गया था, उसका भी काम हो गया है, अभी दस ही बजे हैं, एक बार सोचा किसी सखी से फोन पर बात कर ले, पर अगले ही पल रुक गयी, क्या बात करेगी, सिवाय हाल-चाल पूछने के, यूँ मौसम पर भी बात हो सकती है और कुछ अन्य भी, पर उसे लगता है दिन भर में वे गम्भीर बातें मुश्किल से पांच प्रतिशत ही करते होंगे, ज्यादातर इधर-उधर की बातें ही तो करते हैं, तो क्यों न फोन पर एक सार्थक, थोड़ा गम्भीर किस्म का वार्तालाप किया जय, लेकिन विषय क्या हो? आज पड़ोसिन से थोड़ी देर बागवानी पर बात की, फूलों और पौधों पर, उसने सोचा अगले हफ्ते उनकी यात्रा से पहले के अंतिम पत्र लिखेगी, बहुत महीनों से बल्कि वर्षों से छोटी बुआ का कोई पत्र नहीं आया है, वापस आकर उन्हें भी लिखेगी. मौसम आज भी भीगा-भीगा है, आकाश पर सलेटी रंग के बादल एकसार फैले हैं, सूरज का कोई अता-पता नहीं है.

मुल्कराज आनन्द की बचपन की यादें रोचक हैं, seven summers कल से पढ़ना शुरू किया है, कई ऐसे शब्द हैं जिनके अर्थ उसे नहीं पता, लेकिन डिक्शनरी खोल कर पढ़ने से वह आनन्द कहाँ जो बिना रुके पढ़े जाने में है. अपने बचपन की कई यादें मन में कौंध गयीं. बस्ती में बड़ी बहन की सहेली शैला के साथ गुड़ की चाय बनाना, नल में उसके दायें हाथ की अंगुली कटना, मकान मालिक के लड़के का अपनी सांवली बहन की गुड़िया पेड़ पर टांग देना, उनके यहाँ भोजन करने जाना, उस दाल-चावल की खुशबू आज तक उसे नहीं भूली. मकान मालिक के लडके की खिलौनों से सजी आलमारी, पेड़ के नीचे चारपाई पर लेट कर आंवले खाना और मकान मालकिन की बेटियों, गौरी व मुन्नी की मोटी-मोटी चोटियाँ, बड़ा सा बगीचा, मंझले भाई का पांच रूपये का नोट लेकर चना मुरमुरा खरीदने आना, उसे नंगा बाबा कहकर चिढ़ाया जाना और तेज वर्षा में छोटे भाई का बादलों से आना, रोने पर भूत और हौआ से डराया जाना. घोड़े के मुख वाले भिखारी का भीख मांगने आना, ऐसी न जाने कितनी और छोटी-छोटी यादें होंगी जो मन के किसी कोने में पिछले इतने बरसों से दबी पड़ी होंगी. शाहजहाँपुर की यादें और स्कूल की यादें, उसे भी इन यादों को कहानी की शक्ल में ढालने का काम करना चाहिए. बचपन की उस रात को बिल्लियों की आवाजें, भूत के पैरों की छम छम, अमराई में लोगों को उलटे पैरों वाली डायन का दिखना, कितनी अजीब और रोचक यादें हैं न !